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नर्सों के सामने नंगे हुए जमाती: वायर की आरफा खानम का दिल है कि मानता नहीं

प्रोपेगेंडा वेबसाइट द वायर की वरिष्ठ संपादक आरफा खानम शेरवानी को तबलीगी जमात के सदस्यों की नंगई पर यकीन नहीं हो रहा। उन्हें लगता है कि गाजियाबाद से एमएमजी हॉस्पिटल में नर्सों के सामने जमात के सदस्यों के पतलून उतारने की खबरें झूठी हैं। आरोप लगाने वाली नर्सें प्रोपेगेंडा में शामिल हैं। यह दूसरी बात है कि एडीएम और एसपी के ज्वाइंट इन्वेस्टीगेशन में नर्सों के आरोप सही पाए गए हैं और इस तरह की हरकत करने वाले जमात के 5 सदस्यों पर मुकदमा भी दर्ज किया गया है।

लेकिन, आरफा ने यह मानने से इनकार कर दिया है कि तबलीगी जमात वाले महिलाओं के साथ बदसलूकी या उनका शोषण कर सकते हैं। उसने ट्वीट कर रहा है, “वे नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने वाले लोग हैं, जो मजहब/समाज की सेवा के लिए दुनियादारी, यहॉं तक कि अपने परिवार से भी दूर रहते हैं।” आगे आरफा ने जोर देकर कहा है कि प्रोपेगेंडा अब बंद होना चाहिए।

आरफा ने चिर-परिचित विक्टिम कार्ड से भी तबलीगी जमात के करतूतों पर पर्दा डालने की कोशिश की है। उसके मुताबिक तबलीगी जमात को जिस तरह मीडिया निशाना बना रहा है वह सही नहीं है। इसके बहाने पूरे समुदाय को नीचा दिखाया जा रहा है। उसने कहा, “खुदा न करे लेकिन जमात के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की वजह से यदि मुस्लिमों पर हमला होता है तो मीडिया का प्रोपेगेंडा और अधिकारियों की चुप्पी इसके लिए जिम्मेदार होगी।”

आरफा भले तबलीगी जमात के सदस्यों की बदसलूकी पर यकीन न करें लेकिन सच्चाई यही है कि नर्सों ने इसकी शिकायत की थी। नर्सों ने उनके आपत्तिजनक व्यवहार की लिखित शिकायत की है। नर्सों ने शिकायत में कहा है कि वार्ड में जमात के सदस्य नंगा होकर घूमते हैं। उन पर फब्तियॉं कसते हैं। अश्लील गाने सुनते हैं। दवा लेने से इनकार करते हैं। शिकायत में यह भी कहा गया है कि जमाती सफाई कर्मचारियों से बीड़ी-सिगरेट भी मॉंगते हैं और उनको परेशान करते हैं। उनसे एक-दूसरे से दूर रहने को कहा जाता है तो वे साथ में बैठकर बात करते हैं।

नर्सों की लिखित शिकायत

एएमजी अस्पताल के सीएमओ ने पुलिस से की गई शिकायत में भी यही बातें कही है। उन्होंने शिकायत में कहा है कि इस तरह की स्थिति के कारण हॉस्पिटल में उनका इलाज करना संभव नहीं हो पा रहा है। पुलिस से उन्होंने उचित कार्यवाही करने की गुहार लगाई थी ताकि उपचार में परेशानी न हो।

एमएमजी अस्पताल के सीएमओ द्वारा की गई शिकायत

जॉंच में ये आरोप सही पाए गए हैं। एडीएम और एसपी ने जॉंच के दौरान पाया कि जमात के लोग हॉस्पिटल में न तो दवा खा रहे थे और न ही अपने बिस्तर पर रह रहे थे। वो नर्सों को देख कर अश्लील गाने भी गए रहे थे। वो स्टाफ से बीड़ी-सिगरेट और पान मसाले की माँग कर रहे थे। जाँच के दौरान नर्सों ने अधिकारियों को बताया कि जमाती उनकी तरफ देख कर अश्लील इशारे कर रहे थे और हँस रहे थे। उन्हें समझाने की कोशिश भी की गई लेकिन वो नहीं माने। इसके बाद सीएमओ से शिकायत की गई।

आरफा जिन लोगों का बचाव कर रही हैं उनकी करतूतें केवल एक अस्पताल तक ही सीमित नहीं है। यूपी के अलग-अलग जिलों से जमातियों द्वारा हॉस्पिटल में बदतमीजी किए जाने की ख़बरें आ रही हैं। बिजनौर में 8 इंडोनेशियाई जमातियों ने अंडा-करी और बिरयानी की माँग की थी। साथ ही उन्होंने सफाई कर्मचारियों के साथ भी अभद्रता की थी। बस्ती और आगरा में भी बिरयानी माँग कर हॉस्पिटल कर्मचारियों को परेशान किया। मुरादाबाद में जमातियों ने दाल-रोटी खाने से इनकार कर दिया। दिल्ली के एलएनजेपी हॉस्पिटल और हैदराबाद के गॉंधी हॉस्पिटल में इनके उपद्रव के बाद पुलिस की तैनाती करनी पड़ी। इनलोगों ने सड़कों पर, अस्पतालों में, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों पर थूक कर संक्रमण तक फैलाने की कोशिश की है। देश में जो नए मामले सामने आए हैं उनमें आधे से अधिक तबलीगी जमात के निजामुद्दीन स्थित मरकज से जुड़े हैं।

ऐसे में आरफा की प्रतिक्रिया से साफ है कि उम्माह के आगे उनके लिए कुछ भी मायने नहीं रखता। महिलाओं का सम्मान भी नहीं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नारी अधिकारों की कथित पैरोकार वामपंथी और मीडिया गिरोह के दूसरे सदस्य महिलाओं के इस उत्पीड़न और तबलीगी जमात की करतूतों का किस तरह बचाव करते हैं।

प्रार्थना में कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं: और शशि थरूर जी… Covid-19 की लड़ाई राम भरोसे नहीं छोड़ी गई है

प्रकाश मानव सभ्यता की पहली सभ्य खोज और आशा की अंतिम किरण है। मोदी जी ने पाँच अप्रैल को शाम नौ बजे इसी प्रकाश से सामाजिक समरसता को ज्योतित करने का आह्वान किया है। इसे सुनकर बहुत-से लोग बहुत खुश हुए और बहुतों को ये रास नहीं आया। शायद उन्हें ये कम वैज्ञानिक लगा।

दरअसल बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक सोच के दावेदार जब छोटे-छोटे निजी आग्रहों से ग्रस्त हो जाते हैं तो सबसे पहले वो अपनी सामान्य समझ (Common Sense) को खो देते हैं। समस्या की प्रकृति को समझना और उसका विवेकपूर्ण विश्लेषण करना सभी वैज्ञानिक अनुसंधानों के प्रारम्भिक चरणों में से एक है, किन्तु शायद हमें इन्हें प्रयोगशाला में ही बंद कर ताला लगा देना होता है, उनका वहाँ से बाहर आना और बाक़ी जगहों पर लागू होना शायद मना है।

बड़ा वैज्ञानिक दकियानूसीपन है? प्रधानमंत्री ने कहा कि जब सभी एक साथ घरों की बालकनियों से दीपक जलाएँगे तो उनको लगेगा कि वो अकेले नहीं हैं, सबका हौसला बढ़ेगा, निराशा कुछ कम हो जाएगी। निश्चित रूप से किसी भी सकारात्मक सामूहिक गतिविधि का ऐसा परिणाम होता ही है, सभी पर्वों-त्यौहारों का यही मकसद है। लेकिन कुछ अति वैज्ञानिक विचारकों को उम्मीद थी कि दीपक में से अलग-अलग स्कीमें निकलेंगी या योजनाओं की फुलझड़ियाँ फूटेंगी। यानी जब LEO Satellite प्रक्षेपित की जाती है तो आप उससे GEO के परिणामों की उम्मीद करते हैं।

ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है। शशि थरूर जैसे अति-शिक्षित व्यक्ति ट्वीट कर आरोप लगाते हैं कि प्रधानमंत्री ने Covid-19 की लड़ाई को राम भरोसे छोड़ दिया है। आदरणीय शशि थरूर जी! मोदी जी ने घर में खाली बैठे लोगों को मोमबत्तियाँ जलाकर एकता प्रकट करने के लिए प्रेरित किया है, डॉक्टर्स या सुरक्षाकर्मियों को नहीं। वो अपना काम करते रहेंगे। रही राम भरोसे की बात, तो जब हम कठिन लड़ाइयाँ लड़ते हैं, विशेषरूप से ऐसी लड़ाइयाँ जिनके परिणाम के बारे में हम सुनिश्चित नहीं हैं, तब हम अपना प्रयास नहीं छोड़ देते बल्कि छोड़ते हैं सिर्फ फल की कामना को। अब चाहे इसे राम भरोसे छोड़ना कहें या नैतिकतापूर्ण समझदारी।

नैतिकतापूर्ण इसलिए क्योंकि कम उम्मीद होने पर भी व्यक्ति उसे अपना कर्त्तव्य मानकर करता रहता है। भारतीय दर्शन की सबसे प्रसिद्ध सूक्ति है- ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ सभी वैज्ञानिक परीक्षण इसी जुझारूपन का परिणाम हैं। जब एक वैज्ञानिक किसी फल की अथवा सफलता-असफलता की परवाह न करता हुआ अपने प्रयोगों में लगा रहता है तब वो गीता के इसी आदर्श का पालन कर रहा होता है।

कुछ लोग इस फैसले पर ऐसे हैरान हैं मानो सरकार ताली और थाली के अलावा कुछ कर ही नहीं रही हो। बहुत-से ऐसे कदम हैं, जो सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए उठा रही है। यहाँ उनका जिक्र करने का तुक नहीं है, आप स्वयं उनकी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। निजामुद्दीन मरकज की दुर्घटना को छोड़ दें तो भारत इस दिशा में सही प्रगति कर रहा था।

जाहिर है कि हमारे देश में कोरोना के इलाज़ को ताबीज पहनने जैसे टोने-टोटकों के भरोसे नहीं छोड़ा गया है, अपितु व्यावहारिक स्तर पर ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। भारत के चिकित्सक रोगियों का इलाज़ और चिकित्सा विज्ञानी औषधियों का अनुसंधान अद्यतनीन वैज्ञानिक विधियों से ही कर रहे हैं। लेकिन वो भी इंसान हैं और दिन-रात की परवाह किए बिना अपने काम पर लगे हैं। उनके इंसानी सामर्थ्य की सीमाओं को और भी विस्तृत करने के लिए यानी उनका उत्साहवर्द्धन करने के लिए इस तरह के कदम उठाए जाते हैं।

जो लोग घरों में अकेलापन और भय महसूस कर रहे हैं, उनके सूनेपन को दूर करने के लिए ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं। मोदी एक राजनेता हैं। लोकतंत्र में राजनेता जननेता होता है, तो स्पष्ट है कि जनता के मनोबल को ऊँचा रखना उनका मुख्य काम है, चाहे वो ताली से हो, थाली से हो या मोमबत्ती से। काश विज्ञान की दुहाई देने वालों में ज़रा भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता।

जनभावनाओं की अवहेलना करके बड़े-बड़े राजनेता अपनी राजनैतिक जमीन खो चुके हैं क्या इसे जारी रखकर अब वो अपनी व्यक्तिगत स्वीकार्यता को भी दाँव पर लगाना चाहते हैं? वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी जन-मन का भरपूर ख़याल रखते हैं और उनके मन की बात करने की कोशिश करते हैं। क्या आप जानते हैं किसी के मन की बात पहचानने को क्या कहते हैं? मन:पाखण्ड? नहीं, ऐसा कोई शब्द नहीं होता। इसे मनोविज्ञान कहते हैं। मतलब ये भी एक विज्ञान है।

जहाँ तक दिया-बाती, प्रार्थनाओं और दुआओं का प्रश्न है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो यही कहता है कि सब काम पुरुषार्थ से ही होते हैं। प्रार्थना तो पुरुषार्थ को बल और प्रेरणा देती है। ये पुरुषार्थी व्यक्ति के मनोबल को ऊँचा रखने में सहायता प्रदान करती है और हम जानते हैं कि सहायता मुख्य क्रिया नहीं होती, चाहे कितनी भी आवश्यक क्यों ना हो, वो तो सहायक क्रिया ही है।

इसलिए प्रार्थना पुरुषार्थ का स्थगन नहीं है और यही वजह है कि प्रार्थना में कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं है। Covid-19 को रोकने के सभी प्रयास हमारी शुभकामनाओं से बल पाएँगे और हमें निर्धारित निर्देशों का पालन करने की प्रेरणा देंगे। दवा हमारे शरीर की और दुआ हमारे मन की इम्यूनिटी को बढ़ाती है।

इस प्रसंग में ऋग्वेद की एक ऋचा बहुत ही अनुकूल है- ‘इच्छन्ति देवा: सुन्वंतं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति’, जिसे हम आम भाषा में कहते हैं- ‘ईश्वर भी उसी की सहायता करता है, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। इसलिए लॉकडाउन और अन्य सभी निर्देशों का पालन करना हमारा कर्त्तव्य है, जिसे पूरी तरह से निभाना है। प्रार्थना की भूमिका इतनी है कि ये आपको कठिन समय में निराश होने से बचाती है, सामान्य स्थितियों में अकर्मण्य होने से रोकती है, खुशी-खुशी अपने कर्त्तव्य के पालन के लिए उत्साह देती है।

सबसे बड़ी बात ये है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना अपनी इस भूमिका को सौ प्रतिशत निभाती है, आजमा कर देखिए आपको आश्चर्य तो होगा लेकिन इस आश्चर्य में प्रबल प्रेरणा छुपी होगी, जो आपके काम आएगी।

प्रधानमंत्री ने सभी धर्मगुरुओं से अपने अनुयायियों को समझाने और उन्हें परामर्श देने की अपील की है। साम्प्रदायिक उन्माद में जिस तरह तबलीगी जमात ने कोरोना का आतंक फैलाया है, ऐसे में ये अपील बहुत मायने रखती है। आशा है सभी धर्मगुरु अपना कर्त्तव्य सक्रियता से निभाएँगे लेकिन मैं आपके साथ कुछ ऐसी प्रार्थनाएँ साझा करना चाहती हूँ, जो पूर्णत: पंथनिरपेक्ष हैं, जिनमें किसी मत-पंथ के लोगों के लिए नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए हितकामना की गई है।

ये प्रार्थनाएँ विश्व साहित्य के आदिग्रंथ वेदों में उद्धृत हैं। वेद अथाह ज्ञान की राशि हैं किन्तु आइए हम आज की परिस्थिति में जरूरी कुछ प्रार्थनाओं पर गौर करें। निरंतर उत्साह और जिजीविषापूर्वक परिश्रम करने की कामना से युक्त ऋग्वेद का यह मंत्र देखें- ‘मा भेम मा श्रमिष्म’ अर्थात् हम किसी भी परिस्थिति में डरें नहीं, थकें नहीं।

सभी के स्वस्थ एवं निरोगी होने की शुभकामना लिए यजुर्वेद की प्रार्थना का एक स्वर सुनिए- ‘विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्’ अर्थात् इस गाँव में सब पुष्ट और निरोग रहें। हम वेद के इन शब्दों से प्रेरणा लेकर अपने-अपने परिवेश के स्वस्थ वातावरण के लिए कामना करते हुए उसके लिए प्रयास कर सकते हैं।

इन्द्रियों के सम्पूर्ण स्वास्थ्य के साथ कम से कम सौ वर्ष और उससे भी अधिक आयु की प्रार्थना से ओतप्रोत एक वेदमंत्र- ‘पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद: शतं शृणुयाम शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्च शरद: शातात्।’

एक और बहुत ही समावेशी प्रार्थना, मानो इंसान की सभी यथासंभव खुराफातों का शिकार होने वाली वस्तुओं का परिगणन कराती हुई सर्वत्र शान्ति की कामना करती है – ‘द्यौ: शान्तिरंतरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वं शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि।’

इसका भावानुवाद कुछ इस तरह से है-

“शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में , जल में स्थल में और गगन में
अंतरिक्ष में अग्नि पवन में, औषधि वनस्पति वन-उपवन में
और जगत के हो कण-कण में, शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में।

अंत में ऋग्वेद की सबसे अंतिम वो ऋचाएँ, जो पाँच अप्रैल के इस आयोजन की प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा की गई व्याख्या को संबल देती हैं। यानी एकत्व, सामंजस्य और संगठन की प्रार्थना- ‘संगच्छद्ध्वं सम्वदद्ध्वं सं वो मनांसि जानताम्।’

हे प्रभो! व्यापक संकट की इस घड़ी में हमें मिलकर चलने, मिलकर बोलने और मिलकर सोचने की शक्ति प्रदान कीजिए।

क्योंकि एक छोटे से अवयव-संस्थान शरीर में भी अगर सामंजस्य समाप्त हो जाए तो व्यक्ति रोगी हो जाता है, राष्ट्र और मानवता तो एक बड़ी इकाई है। इसमें यदि समरसता ख़त्म हो गई तो आशा की किरण जाती रहेगी। वैश्विक आपदा के इस अंधकारमय वातावरण में आशाओं, विश्वासों और समभावों के दीपक ही विजय के प्रकाशस्तंभ बन सकते हैं।

‘लॉकडाउन लगाना मोदी सरकार का साहसिक फैसला, वरना तेजी से फैलती महामारी, भुगतने पड़ते गंभीर परिणाम’

मोदी सरकार द्वारा कोरोना के खिलाफ जंग लड़ने के लिए देश में लागू किए गए 21 दिनों के लॉकडाउन के फैसले पर भले ही विपक्षी पार्टियाँ तरह-तरह के सवाल खड़े कर रही हों, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के विशेष दूत डॉक्टर डेविड नाबरो ने सरकार के इस कदम की सराहना की है। साथ ही डॉक्टर डेविड ने कहा है कि सरकार का यह कदम दूरगामी सोच का परिणाम है, जो कि कोरोना के खिलाफ जंग लड़ने में सहायक सिद्ध होगा।

हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक WHO के विशेष दूत डॉक्टर डेविड नाबरो ने कहा कि भारत में लॉकडाउन को उस समय पूरी तरह से लागू कर दिया गया था, जब भारत में बहुत कम कोरोना के मामले सामने आए थे। इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि निश्चित तौर पर यह भारत सरकार का दूरगामी फैसला था। यही कारण है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में यह महामारी तेजी से नहीं फैल सकी। वहीं समय से इस कठोर फैसले को लेने के कारण देशवासियों को इसके खतरे का ठीक से पता चल जाएगा।

डॉक्टर डेविड ने आगे कहा कि सरकार का यह एक साहसिक फैसला है। इससे महामारी को स्थानीय स्तर पर रोकने में काफी मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर देश में इसे देरी से लागू किया होता तो शायद भारत जैसे देश में को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते। तीन हफ्ते का लॉकडाउन भारत की बिल्कुल सही रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने अमेरिका जैसे देश की ओर इशारा करते हुए कहा कि कुछ देशों में लॉकडाउन का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।

आपको बता दें कि चीन से निकले कोरोना वायरस के भारत में पहुँचने से पहले ही मोदी सरकार ने इसके बचाव के लिए तमाम तरह की तैयारियाँ कर लीं थी। इतना ही नहीं, देश में हुई कुछ मौत के बाद सरकार ने देशवासियों से एक दिन के लिए जनता कर्फ्यू का आह्वान करके लोगों के मन को भी टटोल लिया था और इसके बाद 24 मार्च को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में 21दिनों के लिए पूरे देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया था।

सरकार के इस फैसले का आम लोगों ने तो खूब सराहा, लेकिन विपक्षी दलों ने इसकी अपने-अपने तरीके से आलोचना भी की थी। हालांकि देश में लॉकडाउन घोषित होने के बाद गरीब-मजदूरों को तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए इस सभी समस्याओं को राज्य सरकारों के साथ मिलकर समय रहते ही निपटा लिया। एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से 5 अप्रैल को रात 9 बजे घर सभी लाइटें बंद करके 9 मिनट दीपक, मोमबत्ती जलाने की अपील की है।

वैष्णो देवी गए 145 को हुआ कोरोना: पत्रकार अली ने फैलाया झूठ, कमलेश तिवारी की हत्या का मनाया था जश्न

पत्रकार अली सोहराब इससे पहले भी आपत्तिनजक ट्वीट करने के आरोप में यूपी पुलिस की कार्रवाई का सामना कर चुका है। अब उसने फिर से अफवाहें फैलाने और झूठे ट्वीट व पोस्ट करने का सिलसिला चालू कर दिया है। अली सोहराब ने माता वैष्णो देवी मंदिर में 400 लोगों के फँसे होने की झूठी ख़बर पोस्ट की है। इसके बाद उसने फेसबुक पर ही अगली पोस्ट में यह भी दावा किया कि उनमें से 145 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। अली सोहराब ने लिखा कि बाकियों का टेस्ट जारी है और नए मामले भी सामने आ सकते हैं।

अली सोहराब ने ये सब तबलीगी जमात की हरकतों को ढकने के लिए किया। वो झूठी ख़बर फैला कर ये साबित करना चाहता था कि जैसे दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ में हज़ारों जमाती इकट्ठे होकर पुलिस-प्रशासन की अवहेलना कर रहे थे, उसी तरह माता वैष्णो देवी मंदिर में भी श्रद्धालुओं ने ऐसी ही हरकत की है। जमातियों के कारण भारत में कोरोना वायरस के मामलों में अचानक से तेज वृद्धि हुई है और इसीलिए सेक्युलर गिरोह के कई पत्रकार मजहब और कौम को जिम्मेदार न ठहराने की बात करते हुए घूम रहे हैं।

बता दें कि माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने पहले ही ऐसी किसी भी ख़बर को नकार दिया है, जिसमें मंदिर में श्रद्धालुओं के फँसे होने की बात कही गई है। कटरा में भी कोई श्रद्धालु नहीं फँसा हुआ है। यात्रा पहले ही रोकी जा चुकी है। कई लोग मीडिया पर आरोप लगा रहे थे कि जब किसी हिन्दू धार्मिक स्थल में श्रद्धालु होते हैं तो उन्हें ‘फँसा हुआ’ बताया जाता है जबकि मस्जिद के मामले में ‘छिपा हुआ’ कहा जाता है। इसके बाद फेक न्यूज़ का दौर शुरू हुआ, जिसे अली सोहराब जैसों ने हज़ारों तक फैलाया।

इससे पहले जब लखनऊ में कमलेश तिवारी की हत्या कर दी गई थी, तब अली सोहराब ने दिवाली कह कर सोशल मीडिया पर जश्न मनाया था। तब अली सोहराब को दिल्ली पुलिस और यूपी पुलिस की संयुक्त ऑपरेशन के दौरान गिरफ़्तार किया गया था। उस पर आईपीसी की धारा 295 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए दुर्भावना से ग्रसित होकर और जानबूझ कर किया गया कृत्य) और 66, 67 आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।

तबलीगी जमात पर कसा शिकंजा, बताने होंगे फंडिंग के स्रोत और विदेशियों की डिटेल

देश में कोरोना के नए मामलों में आधे के लिए जिम्मेदार तबलीगी जमात के ऊपर अब जाँच एजेंसियों ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। जाँच एजेंसियों ने देश को कोरोना संकट में डालने वाले रुढ़िवादी इस्लामी संगठन तबलीगी जमात के फंडिंग के स्त्रोत की जाँच शुरू कर दी है। इंडिया टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, फंडिंग का लाभ उठाने वाले अधिकतर जमात खाड़ी देशों से संबंधित हैं।

इसके साथ ही पुलिस ने भी फंडिंग के स्त्रोत और विदेशियों की डिटेल माँगी है। जानकारी के मुताबिक जमात ने पिछले तीन सालों में कितना टैक्स भरा है, उसके बैंक खातों में कहाँ-कहाँ से कितने पैसे आए हैं, इन सब डिटेल्स के साथ पैन नंबर का विवरण भी माँगा है। इसके अलावा मरकज प्रमुख मौलाना साद और 6 अन्य सदस्यों से उन विदेशियों और भारतीय जमातियों की लिस्ट भी माँगी गई है, जिन्होंने 12 मार्च के बाद मरकज में शिरकत की थी।

यह भी पूछा गया है कि क्या उन्होंने इस आयोजन के लिए प्रशासन से अनुमति ली थी। इस बाबत कोई लिखित सूचना दी गई थी। मरकज ने प्रशासन से किसी और मामले में संपर्क किया था। इतना ही नहीं जाँच एजेंसियों ने कमिटी मेंबर्स और मरकज कर्मचारियों की पूरी लिस्ट देने के लिए भी कहा है।

जाँच एजेंसी ने मरकज से बीते एक जनवरी से लेकर एक अप्रैल तक हुए सारे कार्यक्रमों की लिस्ट माँगी है। आयोजनों में शामिल लोगों की संख्या, नक्शा या साइट प्लान और परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की संख्या की डिटेल भी माँगी गई है। यह भी बताना होगा कि अगर यहाँ कोई बीमार पड़ा था उसे बाहर लेने जाने के लिए क्या-क्या किए गए थे। अगर किसी को हॉस्पिटल ले जाया गया , या फिर किसी की मौत हुई है तो उसकी भी डिटेल माँगी गई है। 

बता दें कि दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में आयोजित मजहबी धर्मसभा में 1700 से 3000 के आस-पास लोग शामिल हुए थे। अब तक मरकज में शामिल हुए तबलीगी जमात के 400 से अधिक लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए है और कई संदिग्धों को क्वारंटाइन किया गया है। तबलीगी जमात में शामिल होने वाले 10 लोगों की मौत भी हो चुकी है। 

तबलीगी जमात की लापरवाही ने भारत की बड़ी आबादी को कोरोना वायरस से बचाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के स्वास्थ्य सैनिकों की कोशिशों पर काफी हद तक पानी फेर दिया है। देशव्यापी लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के जरिए कोरोना वायरस संक्रमण पर काफी हद तक लगाम लगाने की उम्मीद थी, मगर अब आलम यह है कि तबलीगी जमात से जुड़े कोरोना वायरस मामले में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है।

कोरोना संक्रमण से मरने वाले मुस्लिम जलाए जा रहे, कट्टरपंथियों ने श्रीलंका में काटा बवाल

कोरोना महामारी से लड़ने के लिए श्रीलंका ने मुस्लिमों के शवों को दफनाने की जगह जलाने का फैसला लिया है। इसको लेकर कट्टरपंथियों ने विवाद शुरू कर दिया है। अब तक COVID-19 संक्रमण से मरने वाले दो मुस्लिमों को उनके परिवार की इच्छा के विरुद्ध इस्लामिक तरीके से दफन करने की बजाए जला दिया गया। कोलंबो के 73 साल के बिशरुफ हाफी मोहम्मद दूसरे मुस्लिम हैं, जिन्हें कोरोना के चलते हुई मृत्यु के बाद जला दिया गया। श्रीलंका में अब तक कोरोना के 151 मामले सामने आ चुके हैं।

बिशरुफ के बेटे 46 साल के फ़याज़ जूनुस ने बताया कि उनके पिता को किडनी की समस्या थी। लगभग दो हफ्ते पहले उनमें कोरोना संक्रमण पाया गया था। इसके बाद 1 अप्रैल को उनकी मौत हो गई और अगले दिन उन्हें जला दिया गया। फ़याज़ ने बताया कि उसके पिता के शव को पुलिस की देखरेख में एक गाड़ी में ले जाया गया जहाँ उन्हें जलाया गया। कोरोना संक्रमण के डर से हम उनका जनाजा नहीं निकाल पाए। अल जजीरा से उसने कहा कि सरकार को मुस्लिमों के लिए कुछ व्यवस्था करनी चाहिए जिससे हम अपने चहेतों का अंतिम संस्कार इस्लामिक तौर-तरीकों के अनुसार कर सकें।

याद रहे कि कोरोना संक्रमण के खतरों को देखते हुए श्रीलंका के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मंगलवार को COVID-19 गाइडलाइन्स जारी करते हुए कहा था कि कोरोना संक्रमण के कारण हुई मौतों के बाद शवों को जलाना ही मानक प्रक्रिया होगी। इससे पहले मुस्लिमों को अपने मज़हबी रिवाज के अनुसार शवों को दफन करने की छूट थी। गाइडलाइन्स में यह भी स्पष्ट किया गया कहा गया है कि शवों को नहलाना नहीं है जो कि इस्लामिक परम्परा के खिलाफ है।

श्रीलंका की मुस्लिम कॉउन्सिल के वाइस प्रेसिडेंट हिलमी अहमद ने अल जजीरा से कहा कि मुस्लिम समुदाय इस घटनाक्रम को चरमपंथी बौद्ध शक्तियों के एक नस्ली एजेंडा के तौर पर देखता है। उसने कहा कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन द्वारा जारी की गईं गाइडलाइन्स का ब्रिटेन, ज्यादातर यूरोपीय देशों, सिंगापुर, हांगकांग और सभी मुस्लिम देशों में (सिवाय श्रीलंका) में पालन किया जा रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी श्रीलंकाई प्रशासन से अंतिम संस्कार के संबंध में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करने की अपील की है।

लॉकडाउन का उल्लंघन कर पढ़वा रहा था नमाज, पुलिस ने मस्जिद के इमाम को ही कर लिया गिरफ्तार

केरल के कासरगोड जिले के एक मस्जिद में लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करके नमाज अता करवाने वाले इमाम और एक अन्य व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया है। पूरे देश में तेजी से पाँव पसार रही कोरोना महामारी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार हर तरह के जतन कर रही है, लेकिन कुछ लोग इन प्रयासों पर पानी फेरने पर आमादा हैं।

बता दें कि कासरगोड जिले के मडिक्की गाँव की अरई जुमा-मस्जिद में इमाम लॉकडाउन के बावजूद लोगों को नमाज पढ़वा रहा था। जिसकी सूचना मिलने पर नीलेश्वरम पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मस्जिद के इमाम व एक अन्य को गिरफ्तार कर लिया। जिला कलेक्टर ने आईपीसी की धारा 269 के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दिया है।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों केरल में चर्च के पादरी को गिरफ्तार किया गया था। चलाकुडी निथ्या सह्या मठ चर्च के पादरी ने सरकार के आदेश की अवहेलना करते हुए एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया था, जिसमें कम से कम 100 लोगों ने हिस्सा लिया था।

पुलिस ने बताया कि पादरी ने चर्च में सुबह 6:30 बजे प्रार्थना सभा का आयोजन किया था। इसकी जानकारी मिलते ही पुलिस वहाँ पर पहुँची और पादरी को गिरफ्तार कर लिया। पहले पुलिस ने सुरक्षा का पूरा ध्यान रखते हुए पादरी को पुलिस स्टेशन ले जाने से पहले उसे सैनिटाइजर से हाथ धोने के लिए कहा।

हालाँकि, बाद में पादरी को जमानत पर छोड़ दिया गया। पुलिस ने कहा कि पादरी और प्रार्थना सभा में भाग लेने वाले 100 लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 269 और केरल पुलिस अधिनियम की धारा 118 के तहत केस दर्ज किया गया।

चीन से पूरी दुनिया में फैल गए इस वायरस ने हाहाकार मची रखी है। हर दिन लोगों की मौत हो रही है। कई देशों में लॉकडाउन लागू है। भारत में भी हालत खराब हो चुके हैं। भारत में कोरोना वायरस का पहला मामला जनवरी में केरल से सामने आया था। चीन के वुहान शहर से तीन छात्र लौटे थे जो कोरोना वायरस से संक्रमित थे। 

हालाँकि वह तीनों ही ठीक हो गए हैं। इसके बाद से केरल में संक्रमित मरीजों की संख्या में इजाफा होने लगा। महाराष्ट्र के बाद केरल ही ऐसा राज्य है, जहाँ कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या सबसे अधिक है। कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने लॉकडाउन कर दिया है। ताकि लोग इधर से उधर ना जा सकें और इसे संक्रमण पर काबू पाया जा सके।

जाँच में भी नंगे हुए जमाती: नर्सों के सामने उतारे थे कपड़े, गाए थे अश्लील गाने

गाजियाबाद के एमएमजी अस्पताल में क्वारंटाइन किए गए तबलीगी जमात के सदस्यों द्वारा नर्सों के साथ बदसलूकी करने का मामला सामने आया था। एडीएम सिटी और एसपी ने इसकी जॉंच की। जॉंच में नर्सों के आरोप सही पाए गए हैं। तबलीगी जमात के 5 लोगों के ख़िलाफ़ अश्लील व्यवहार करने का आरोप लगाया गया है। जाँच रिपोर्ट डीएम को सौंप दी गई है जो आगे की कार्रवाई तय करेंगे। अस्पताल में इस्लामी संगठन के लोगों ने नर्सों पर ओछी टिप्पणी की थी। उनके सामने कपड़े उतार कर घूम रहे थे।

मामला सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इन सभी के ख़िलाफ़ ‘नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA)’ के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। सभी आरोपितों को डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल से एक प्राइवेट शैक्षिक संस्थान में बने आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। ये सभी जमाती उन हज़ारों लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ में हुए मजहबी कार्यक्रमों में शिरकत की थी। इनमें से कई काफ़ी दिनों तक लॉकडाउन को धता बताते हुए छिपे हुए थे।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन सभी को ‘मानवता का दुश्मन’ करार दिया था। उन्होंने कहा था कि ऐसे लोग न तो क़ानून का पालन करते हैं और ही व्यवस्था का अनुसरण करते हैं। उन्होंने कहा था कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा क्योंकि महिलाओं के साथ उन्होंने जो भी किया है, वो घृणित अपराध की श्रेणी में आता है। चीफ मेडिकल ऑफिसर द्वारा लिखित में शिकायत दाखिल किए जाने के बाद जीटी रोड कोतवाली थाना में इन सभी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया। एसपी कलानिधि नैथानी ने आश्वासन दिया है कि उन सभी के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

जमात के ये सभी लोग हॉस्पिटल में न तो दवा खा रहे थे और न ही अपने बिस्तर पर रह रहे थे। वो नर्सों को देख कर अश्लील गाने भी गए रहे थे। वो स्टाफ से बीड़ी-सिगरेट और पान मसाले की माँग कर रहे थे। ये सभी जमाती मसूरी के रहने वाले हैं। जाँच के दौरान नर्सों ने अधिकारियों को बताया कि जमाती उनकी तरफ देख कर अश्लील इशारे कर रहे थे और हँस रहे थे। उन्हें समझाने की कोशिश भी की गई लेकिन वो नहीं माने। इसके बाद सीएमओ से शिकायत की गई।

यूपी के अलग-अलग जिलों में जमातियों द्वारा हॉस्पिटल में बदतमीजी किए जाने की ख़बरें आ रही हैं। बिजनौर में 8 इंडोनेशियाई जमातियों ने अंडा-करी और बिरयानी की माँग की थी। साथ ही उन्होंने सफाई कर्मचारियों के साथ भी अभद्रता की थी। बस्ती और आगरा में भी बिरयानी माँग कर हॉस्पिटल कर्मचारियों को परेशान किया। मुरादाबाद में जमातियों ने दाल-रोटी खाने से इनकार कर दिया।

MP: अब खरगोन में पुलिस पर पथराव, इंदौर में स्वास्थ्यकर्मियों को बनाया था निशाना

हाल ही में उपद्रवियों ने मध्य प्रदेश के इंदौर में डॉक्टरों पर पथराव कर उन्हें घायल कर दिया था। अब मध्य प्रदेश के खरगोन में पुलिस पर हमले की ख़बर आई है। इलाक़े में पुलिस लोगों को जागरूक करने में लगी हुई थी और उनसे अपील कर रही थी कि वे घरों में रहें। लॉकडाउन का पालन करने की सलाह दे रही पुलिस पर अचानक से हमला बोल दिया गया। इस हमले में पुलिसकर्मियों को चोटें आईं और नगर निरीक्षक कोतवाली का एक वाहन भी क्षतिग्रस्त हो गया। ये घटना खसखस वाड़ी क्षेत्र में हुई।

देश भर में पुलिसकर्मी और स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान की बाजी लगा कर ड्यूटी कर रहे हैं लेकिन मुस्लिम बहुल इलाक़ों में उन पर हमले का सिलसिला थम नहीं रहा है। ये घटना शुक्रवार (अप्रैल 3, 2020) को हुई, जब पुलिस लोगों को समझाने के लिए सड़कों पर निकली हुई थी। इस दौरान जैसे ही पुलिस इलाक़े में पहुँची, लोगों ने विवाद किया और उपद्रव शुरू कर दिया। इसके बाद अतिरिक्त पुलिस बल बुला सर्चिंग अभियान शुरू किया गया। ड्रोन कैमरे से इलाके की निगरानी भी की जा रही है। एसपी ने भी घटना की पुष्टि की है। साथ ही बताया है कि स्थिति अब नियंत्रण में है।

ये घटना रात के साढ़े 9 बजे हुई। शाम 5 बजे भी पुलिस ने आकर लोगों को चेताया था और घर के अंदर रहने को कहा था। पुलिस अब पूरे शहर में घूम कर स्थिति को सामान्य करने में जुटी है। नगर निरीक्षक का कहना है कि उस इलाक़े के लोग बार-बार घर के बाहर निकल रहे थे, इसीलिए उन्हें पहले भी चेताया गया था। बता दें कि हाल ही में खरगोन में एक 62 वर्षीय बुजुर्ग की मौत के बाद कोरोना पॉजिटिव होने की रिपोर्ट सामने आई थी। यह जिले में कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला था।

इससे पहले इंदौर में टाट पट्टी बाखल इलाक़े में डॉक्टरों पर पथराव किया गया था, जिसमें 2 डॉक्टर घायल हो गए थे। दरअसल, स्वास्थ्यकर्मियों की टीम वहाँ एक बुजुर्ग महिला के चेकअप के लिए गई थी, जिसमें डॉक्टर, नर्स और आशाकर्मी शामिल थीं। तभी वहाँ के लोगों ने लाठी-डंडे से हमला कर दिया। खदेड़ते हुए उनका काफ़ी दूर तक पीछा किया गया।

जहाँ हुआ डॉक्टरों पर पथराव, वहाँ 2 कोरोना पॉजिटिव: 6 को पुलिस ने दबोचा, अब तक कुल 13 गिरफ्तार

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के टाटपट्‌टी बाखल में संक्रमितों की स्क्रीनिंग करने पहुँची डाॅक्टरों की टीम पर पथराव कर जानलेवा हमला करने वाले 6 और आरोपितों को छत्रीपुरा पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इसे मिलाकर कुल 13 आरोपित अब तक पकड़े जा चुके हैं। वहीं अब भी पुलिस कई आरोपितों की तलाश में जुटी है। देर रात पुलिस की एक टीम ने टाटपट्‌टी बाखल में जाकर वीडियो के आधार पर पथराव करने वाले आरोपितों को चिन्हित किया और उनका इलाके में जुलूस भी निकाला।

यहाँ पर 17 और 55 साल की दो महिलाएँ कोरोना पॉजिटिव भी मिली हैं। सीएसपी डीके तिवारी ने बताया कि गुरुवार को हुई गिरफ्तारी के अलावा 6 और आरोपितों को उनकी टीम ने पकड़ा है। इनमें मोहम्मद नावेद, मोहम्मद साजिद, मोहम्मद युसूफ, मोहम्मद सावेज, मोहम्मद अनस और नफीस का नाम शामिल है। ये भी टाटपट्‌टी बाखल के निवासी हैं। 

दैनिक भास्कर के इंदौर संस्करण में प्रकाशित खबर

बता दें कि कोरोना संक्रमितों की जाँच करने के लिए बुधवार को टाटपट्‌टी बाखल में पहुँची स्वास्थ्य विभाग की टीम पर हमला करने के मामले में पुलिस ने पहले जिन 7 लोगों को गिरफ्तार किया था, उनके नाम हैं- मज्जू उर्फ मजीद खान, शाहरुख अंसारी, मोहम्मद गुलरेज हाजी अब्दुल गनी, मुबारिक उर्फ मोहम्मद इसार, शोएब उर्फ शोभी, नौशाद कादरी और मोहम्मद मुस्तफा हसन। इनमें से मजीद, मोहम्मद गुलरेज, सोयब और मोहम्मद मुुस्तफा पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की गई। इनके ऊपर रासुका लगाकर रीवा सेंट्रल जेल भेज दिया गया है। 

गिरफ्तार आरोपितों ने अपने बयान में कहा है कि उन्होंने समोसे वाली चाची के उकसाने पर पथराव किया था। आरोपितों ने पूछताछ में कुबूला कि मुबारिक की अम्मी (समोसेवाली चाची) के घर में स्वास्थ्यकर्मी स्क्रीनिंग कर रहे थे, तभी चाची ने आवाज लगाई। इस पर भीड़ जुट गई। इसके बाद चाची ने डॉक्टरों को धमकाया और हमें उकसाया। इसके बाद हमने पथराव शुरू कर दिया।

गौरतलब है कि बुधवार (1 अप्रैल, 2020) को इंदौर के टाटपट्टी बाखल और सिलावट पुरा में कोरोना वायरस की जाँच के लिए गई डॉक्टरों की टीम पर गली में पहले से मौजूद लोगों ने पथराव किया था, जिसके बाद डॉक्टरों की टीम को वहाँ से जान बचाकर भागना पड़ा। इतना ही नहीं, जब सूचना पर पुलिस फोर्स मौके पर पहुँची तो आरोपितों ने महिलाओं को आगे कर दिया और फिर घरों की छतों से पुलिस और डॉक्टरों की टीम पर फिर से पथराव शुरू कर दिया। इस दौरान वहाँ लगी बैरिकेडिंग को भी उपद्रवियों ने तोड़ दिया। इसके बाद पुलिस फोर्स ने तत्काल पूरे इलाके को सील कर दिया।