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24 गाँव पूरी तरह सील, 26000 लोगों को किया गया क्वारन्टाइन: एक अकेले ‘सुपर स्प्रेडर’ से संक्रमण का खतरा

पंजाब के 24 गाँवों के लगभग 26,000 लोगों को उनके घरों के भीतर क्वारन्टाइन किया गया है, क्योंकि संदेह है कि ये सभी उस 70 वर्षीय बलदेव सिंह नामक व्यक्ति के सम्पर्क में आए थे, जिनके नाम पंजाब के पहले कोरोना संक्रमण के चलते हुई मौत दर्ज है।

बलदेव सिंह नवांशहर जिले के पथलावा नामक गाँव में स्थित गुरूद्वारे में ग्रन्थी थे, जो एक धार्मिक समारोह में भाग लेने के लिए, पड़ोस के गाँव के रहने वाले अपने दो सहयोगियों के साथ, जर्मनी और इटली की यात्रा पर गए थे। सिंह 7 मार्च को कोरोना वायरस से संक्रमित होकर भारत वापस आए। इसके बाद 18 मार्च को उनकी बंगा स्थित सिविल हॉस्पिटल में कोरोना संक्रमण के चलते मौत हो गई।

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में अब तक सामने आए 38 कोरोना पॉजिटिव मामलों में से 28 सीधे तौर पर इसी “सुपर स्प्रेडर” (ऐसा संक्रमित व्यक्ति, जो वायरस के बहुत तेजी से फैलने में सहायक होता है) बलदेव सिंह से जुड़े हुए हैं। अब तक सिंह के परिवार के 14 सदस्य कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं, जिनमें उनके तीनों बेटे, बेटी, बहू और 6 नाती/पोते शामिल हैं। बलदेव सिंह के साथ विदेश गए बाकी दोनों आदमियों के भी पारिवारिक सदस्य कोरोना संक्रमित निकले हैं।

इन तीनों आदमियों को भारत लौटने पर सेल्फ आइसोलेशन में रहने की सलाह दी गई थी, जिसकी धज्जियाँ उड़ाते हुए ये आम दिनों की तरह छुट्टा सांड बन घूमते रहे। यहाँ तक कि बलदेव सिंह ने आनंदपुर साहिब में 10-12 मार्च के बीच आयोजित हुए होला मोहल्ला पर्व में भी शिरकत की, जिसमें इस साल तकरीबन 20 लाख लोगों के शामिल होने का अनुमान है।

वह लोगों के घरों में अरदास करवाने भी जाते रहे थे। कुल मिलाकर नवांशहर जिले के 18 गाँवों और होशियारपुर जिले के 6 गाँवों को पूरी तरह सील कर दिया गया है। नवांशहर नगर के डिप्टी कमिश्नर विनय बबलानी ने बताया कि वे एक-एक कर के गाँवों को सील कर रहे हैं और सभी प्रोटोकॉल का पालन करते हुए गाँवों में बिजली, पानी और दूसरी जरूरत के सामानों की आपूर्ति सुनिश्चित किए हुए हैं।

होशियारपुर जिले के एक अधिकारी के अनुसार जिले के जिन 6 गाँवों को सील किया गया है, उनमें 250 परिवारों के लगभग 1200 लोग रहते हैं। एक स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया कि सिंह के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने वाले 700 लोग इन टोटल क्वारन्टाइन किए गए लोगों में शामिल हैं। इन सील किए गए गाँवों में से लगभग 333 लोगों के स्वैब नमूने भी लिए गए है कोरोना जाँच के लिए, क्योंकि इनमें कोरोना के लक्षण पाए जाने का शक है।

सस्ते सौदे में कोरोना से जंग… लेकिन देर करेंगे तो समस्या विकराल होती जाएगी

बच्चों की परीक्षाएँ स्थगित हो गईं क्योंकि हमें इससे भी बड़ी परीक्षा देने के लिए बाध्य होना पड़ा। पाठशालाएँ बंद हो गईं क्योंकि ज़िंदगी की पाठशाला कुछ ऐसा पाठ लेकर हमारे सम्मुख उपस्थित है, जिसे पढ़ना उनके लिए भी बाक़ी था, जो अब तक दूसरों को पढ़ाते या अनुशासित करते आए थे। ऐसा पहली बार हुआ है। हो सकता है कि ऐसी विकट स्थितियाँ तब भी आई हों जब दुनिया ने दो विश्वयुद्ध देखे, लेकिन तब विश्व दो खेमों में बँटा हुआ था और हर एक खेमे के अन्दर अपने-अपने फायदों को देखने वाले कुछ छोटे-छोटे समूह भी थे लेकिन इस बार सम्पूर्ण मानवता एक गुट का हिस्सा है और शत्रु है एक विश्वव्यापी महामारी, जिससे किसी की संधि तब तक संभव नहीं जब तक वो स्वयं उसका प्रवर्तक न हो। यानी जैविक हथियार की सुगबुगाहट के अलावा सम्पूर्ण मानवता इसके खिलाफ एकजुट है। सचमुच एक बड़ी परीक्षा है, जिसमें कुछ छोटे-छोटे सवाल पूछे गए हैं जैसे- अपने हाथों को अच्छी प्रकार कैसे धोएँ? कैसे किफायत से चीजों का प्रयोग करें? क्या मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है? खुश और संतुष्ट रहने के लिए हम खुद के अतिरिक्त और किन-किन चीजों पर निर्भर करते हैं? अच्छे विद्यार्थी सदा परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं और कुछ असावधान विद्यार्थी असफल रह जाते हैं, लेकिन कई मामलों में ये परीक्षा आम परीक्षाओं से अलग है- यहाँ अपेक्षाकृत छोटे सवालों में ही हम मात खा जाते हैं और जो परीक्षार्थी अनुत्तीर्ण होने वाले हैं, उनकी असफलता आम परीक्षाओं की तरह मात्र उनका व्यक्तिगत नुकसान नहीं करेगी बल्कि उसका असर बाक़ी लोगों तक भी जाएगा।

हममें से प्रत्येक ने कितनी ही बार ये चाहा होगा कि काश हम फिर से बच्चे बन जाएँ। अब वो समय आ गया है कि हम बच्चों की तरह ही छोटी-छोटी बातें मानें, छोटी-छोटी चीजों में अपनी खुशियाँ ढूँढें, खुद को एंजॉय करें, परिवार के साथ समय बिताएँ। इस समय एक आज्ञाकारी बच्चा ही इस गंभीर समस्या का समझदारी भरा समाधान कर सकता है। अतिरिक्त होशियारी या तिकड़म जो बाल-मन के खिलाफ है, उससे काम नहीं चलने वाला बल्कि वो हम पर उलटा पड़ सकता है।

अपेक्षित चीजें करने में अक्सर कठिन होती हैं लेकिन जब वो आसान होती हैं, क्या तब हम उन्हें ठीक से करते हैं? नहीं। मतलब जागरूकता सबसे कठिन चीज़ है चाहे वो बिल्कुल छोटी-छोटी चीजों के बारे में ही क्यों न हो। मन के हिसाब से नहीं बल्कि ज़रूरत के हिसाब से काम या विश्राम करना कठिन है। और अगर हम इसे कठिन मान भी लें तो क्या कठिन कार्यों को करने की अनुमति सिर्फ सीमाओं-अस्पतालों में ही है? घर पर नहीं? सच बात तो ये है कि आसान या कठिन मानना इसे न करने का बहाना नहीं हो सकता। घर पर बने रहकर खुद को सुरक्षित रखना अगर आसान है तो करें, अगर कठिन है तो अवश्य करें क्योंकि इससे न केवल कोरोना से बचाव होगा बल्कि कठिन कार्यों को करने से उत्साह और खुशी भी मिलती है। इस समय सामाजिक दूरी बनाए रखना ही सामाजिक प्राणी मनुष्य का सबसे बड़ा कर्त्तव्य है। जब हमें तन से दूर रहने के लिए कहा गया तब हम मन से निकट आए, जनता कर्फ्यू के दिन शाम पाँच बजे हममें से न जाने कितने लोगों ने पहली बार अपने पड़ोसियों को उनकी बालकनी में देखा होगा। स्पष्ट है कि ये दूरी हमें समीप लाने के लिए है और ये निष्क्रियता हमें फिर से सबल बनाने के लिए ज़रूरी है। इसलिए खुद को घर पर ही बनाए रखें और अपने हाथों को स्वच्छ रखें। इस छोटी-सी बात को समझने में हम जीतनी देर लगाएँगे, ये समस्या उतनी ही विकराल होती जाएगी।

ये तो हुई परीक्षा की बात, लेकिन ये परिस्थितियाँ न केवल हमारी परीक्षा ले रही हैं बल्कि हमें बहुत कुछ सिखा भी रही हैं। अक्सर यही होता है कि जब हम किसी चीज़ को औपचारिक तरीकों से नहीं सीखते तो फिर लगती है परिस्थिति मैडम की आपातकालीन क्लास। परिस्थिति मैडम बड़ी सख्त हैं, जो उनकी बात नहीं मानता वो नुकसान भी उठाता है। तो हमें बस इतना करना है कि परिस्थितियाँ हमें जो कुछ सिखा रही हैं, उन शिक्षाओं को हमें जाया नहीं होने देना है। बाक़ी पाठशालाओं की तरह ही जीवन की पाठशाला में भी हमें सभी विषयों में चयन की सुविधा उपलब्ध नहीं है। कुछ विषय अनिवार्य होते हैं चाहे आप उन्हें पढ़ना चाहें या नहीं लेकिन ज़िंदगी अपना पाठ पढ़ाती है। आम भाषा में इसे सबक कहते हैं। यद्यपि अधिकतर लोग लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं लेकिन इसका सबके द्वारा एक साथ पालन न किया जाना इसे कहीं नहीं पहुँचाएगा और निश्चित रूप से इसकी अवधि को बढ़ाएगा। अगर ये स्थिति लम्बी खिंची तो समस्या हो जाएगी। इस बात को ध्यान में रखते हुए अब हमें किफायत बरतना भी सीखना होगा, चाहे आर्थिक दृष्टि से हम कितने ही सबल क्यों न हों। लाखों की संख्या में मजदूरों का संक्रमित क्षेत्रों से असंक्रमित क्षेत्रों की ओर पलायन और इसके संभावित परिणाम इसे कितना भयावह बनाने वाले हैं ये देखना अभी बाक़ी है। ऐसी हालत में यथास्थिति स्थायी नहीं है। बर्फ के पिघलने के दौरान यानी उसकी अवस्था परिवर्तन के समय तो तापमान स्थिर ही रहता है जबकि ऊष्मा लगातार दी जाती है, लेकिन ऐसा सिर्फ उसके गलनांक तक पहुँचने से पहले तक ही संभव है। इसलिए हमें लगातार बदलती परिस्थितियों की गुप्त ऊष्मा को पहचानना होगा।

इंसानों की जान के अलावा दुनिया भर के समृद्धिशाली देशों की अर्थव्यवस्था को करारा झटका मारने वाली यह परिस्थिति, हमें कुछ अन्य शाश्वत नियमों की सीख भी देती है जैसे कि शक्तिशाली देश जब संसाधनहीनता की स्थिति में पहुँचते हैं तो दूसरों के लिए खतरा बन जाते हैं, क्योंकि अंतत: भैंस तो लाठी वाला ही हाँक कर ले जाता है। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के आगे वैश्विक हित, अन्तरराष्ट्रीय सद्भाव-सामंजस्य और यहाँ तक कि शक्ति संतुलन की कवायदें भी धराशाई हो जाती हैं क्योंकि भूखे पेट का एकमात्र तर्क रोटी ही है, येन केनापि प्रकारेण। आज भले ही हमें ये बातें दूर लगती हों लेकिन कुछ महीनों का लॉकडाउन (अगर हमारी लापरवाही इसे इतना लंबा खींच दे तो) सब कुछ स्पष्ट दिखा देगा। इसलिए ज़रूरी है कि हम कम से कम समय में सोशल डिस्टेंसिंग की ज़रूरी अवधि को पूर्ण सफल बनाएँ क्योंकि आगे की कठिनाइयाँ दोनों दृष्टियों से बहुत खराब हैं- एक तो ये कि जिन लोगों को वर्त्तमान के शिथिल कर्फ्यू का पालन करना भी भारी पड़ रहा है, क्या उन्हें भविष्य में आपातकाल जैसा प्रतिबन्ध झेलना आसान लगेगा? और दूसरा कोरोना का जंगल की आग की तरह फ़ैलने का रिकॉर्ड। इन दोनों स्थितियों में से किसी का भी सामना करने की बजाय हमारा अभी सँभल जाना बहुत ही सस्ता सौदा है। सस्ती कीमतों पर ही महँगा सुकून खरीद लें वर्ना बाद में जान को दाँव पर लगाकर भी कुछ हासिल नहीं हो पाएगा। आखिर अपनी गलती पर आहें भरने के लिए भी साँसों की ज़रूरत होती है और आप जानते हैं कोरोना इसकी इजाजत नहीं देता। इसलिए हमें एक सनकी इंसान की तरह सभी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए खुद को, अपने परिवार को और देश-दुनिया को सुरक्षित रखना होगा।

संभलिए, मान जाइए, घर पर रह कर जंग लड़ने के इस आसान से अवसर को गँवा कर बड़ी जंग मत हारिए। सारा विश्व इस साझी समस्या का शिकार है और इस रूप में ही सही, सम्पूर्ण मानवता अब एक परिवार की तरह नज़र आ रही है। यानी मजबूरियाँ हमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तक ले आई हैं, अब हमें अपने प्रयासों से इसे ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:’ की ओर ले जाना है।

लेखिका: डॉ. अमिता

‘4 समोसा भिजवा दो’ – लॉकडाउन में UP पुलिस से मँगवाए समोसे, खा तो लिया लेकिन करवाया गया नाली साफ

21 दिन के लॉकडाउन के दौरान पुलिस और प्रशासन किस तत्परता से लोगों की मदद के लिए हर समय तैयार हैं, यह हम सोशल मीडिया और समाचारों में निरंतर देख और सुन रहे हैं। लेकिन महामारी के समय भी कुछ लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हैं और बिना किसी बात की परवाह किए अपने पागलपन का उदाहरण देते नजर आते हैं।

ऐसा ही एक वाकया आज ट्विटर पर रामपुर, उत्तर प्रदेश के डीएम ने शेयर किया है। दरअसल, एक व्यक्ति ने पुलिस कण्ट्रोल रूम में अनावश्यक कॉल कर के पुलिस को बुलाकर चार समोसे भिजवाने की माँग की। लेकिन शायद वो यह बात भूल गया कि यह उत्तर प्रदेश पुलिस है।

रामपुर के डीएम ने ट्वीट करते हुए लिखा है- “4 समोसा भिजवा दो… चेतावनी के बाद आखिर भिजवाना ही पड़ा। अनावश्यक माँग कर कंट्रोल रूम को परेशान करने वाले व्यक्ति से सामाजिक कार्य के तहत नाली सफाई का कार्य कराया गया।”

पुलिस ने कॉल कर रहे शख्स को समोसे तो दी ही लेकिन इसके बदले में उससे सामाजिक कार्य के तहत नाली साफ़ करवाई गई। ताकि कम से कम उसे आगे से इस बात का ध्यान रहे कि उसे पुलिस कण्ट्रोल रूम में अनावश्यक रूप से कॉल नहीं करना है – कम से कम चार समोसे मँगवाने के लिए तो फोन नहीं ही करना है 🙂

उल्लेखनीय है कि देश में कोरोना वायरस के प्रकोप से बचाव के लेकर 21 दिन तक चलने वाले लॉकडाउन का सबसे अधिक असर गरीबों और बेसहारा लोगों पर पड़ा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात पुलिस का मानवीय चेहरा सबके सामने आया है। पुलिस सिर्फ गरीबों के लिए खाना ही उपलब्ध नहीं करवा रही है बल्कि व्हाट्सएप पर जरुरतमंदों को दवाई और राशन भी उपलब्ध करवा रही है। कानून व्यवस्था का ध्यान रखने के साथ-साथ पुलिस बेसहारा लोगों की मदद को भी सामने आई है और गरीबों को भोजन और सूखा राशन उपलब्ध करा रही है। ऐसे में कुछ शरारती तत्व अगर पुलिस कण्ट्रोल रूम फोन कर के चार समोसे मँगवाता है तो शायद उसके लिए नाले साफ़ करवाने से बेहतर कोई सजा नहीं हो सकती है।

दिल्ली के शाहीन बाग में फर्नीचर की दुकान में लगी भीषण आग, आसपास अफरा-तफरी का माहौल

दिल्ली स्थित शाहीन बाग इलाके में एक फर्नीचर की दुकान में भीषण आग लगी है। आग बुझाने के लिए दमकल कर्मियों की चार गाड़ियाँ मौके पर पहुँच चुकी हैं और काम जारी है। इस मामले में अधिक जानकारी की प्रतीक्षा है।

अग्निशमन विभाग के कर्मचारी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि शाहीन बाग में सात नंबर ठोकर पर यह आग लगी है। आग लगने से आसपास अफरा-तफरी का माहौल है। हालाँकि, अभी तक आग लगने के कारणों का पता नहीं चल पाया है।

पलायन या षड्यंत्र? ये देश को तबाह करने की साजिश नहीं तो और क्या है? दो लाख लोग इकट्ठा कैसे हो गए?

हम लोगों के जॉब की प्रकृति ही है कि हमें लोगों के पास जाकर पूछना होता है। हालात चाहे कैसे भी क्यों न हों, हमें उनका हाल बयान करना होता है चाहे वो कैसा भी क्यों न महसूस कर रहे हों। जब 2 लाख लोग अपने घरों से निकले तो बातें होने लगीं कि केंद्र सरकार लॉकडाउन को कम्युनिकेट नहीं कर पाई और सरकार ने ढील दी है। मैं यह नहीं मानता। अगर झुग्गी में बैठी महिला पीएम मोदी के जनता-कर्फ्यू के सन्देश से घण्टी-थाली बजाती है, तो मैं नहीं मानता कि सरकार लॉकडाउन का सन्देश उन तक पहुँचाने में नाकामयाब रही हो।

आदमी अफवाह के कारण पैदल चलना शुरू कर देता है। दिल्ली सरकार की हेल्पलाइन काम नहीं कर रही थी, लोगों के पास भागने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। 2 लाख में से अगर गिने-चुने लोग भी ऐसे हैं, जिनके लक्षण दिख नहीं रहे, लेकिन सम्भावना है कि वो संक्रमित हों, तो सोचिए कि अरविन्द केजरीवाल का यह कारनामा कितनी बड़ी आपदा पैदा करने जा रहा है।

दिल्ली में रह रहे 15 लाख लोग इस दौरान एयरपोर्ट से आए हैं। ये लोग बस, मेट्रो, एयरपोर्ट, रेल, सब जगह पहुँचे होंगे। आनंद विहार में लोग लाइन लगाकर खड़े हैं, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग कहाँ है? यह वायरस हर दूसरे संक्रामक वायरस की तरह ही फैलता है। और इसके अन्य क्या लक्षण हो सकते हैं, उनके बारे में कोई जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं है।

ऐसे में दिल्ली का सीएम लोगों को जाने दे रहा है। रवीश कुमार जैसे लोग प्रपंच किए जा रहे हैं। एक ओर नोएडा का डीएम कहता है कि गरीबों से किराया ना लें, दूसरी तरफ दिल्ली में डीटीसी बसें भर-भरकर लोगों को बॉर्डर पहुँचाती रही।

अरविन्द केजरीवाल को जिन गरीबों ने सत्ता दिलाई, उन्हें ही इस्तेमाल किए गए कंडोम की तरह फेंक दिया गया। यह राय अरविंद केजरीवाल को कौन दे रहा है? 2 लाख मजदूर अफवाहों से घबराकर सड़क पर आ गए। दिल्ली सरकार ने उनकी खाने-रहने जैसी व्यवस्थाओं को लेकर कोई आश्वसन नहीं दिया।

क्या दिल्ली सरकार के पास कोई जानकारी नहीं है कि गरीब लोग किस जगह रहते हैं? वहीं यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ 26 तारीख को दो-दो प्रेस रिलीज जारी करते हैं। उन्होंने रात में जगाकर अपने अधिकारियों को कहा कि इन लोगों के स्वास्थ्य और ठहरने की व्यवस्था की जाए और उसके बाद कहा कि स्वास्थ्य संबंधी जाँच के बाद ही इनके जाने की व्यवस्था की जाए। केजरीवाल दिल्ली को न्यू यॉर्क और लन्दन बनाने की बात करता है और आपदा के आते ही सबसे पहले दो लाख लोगों को वापस अपने घर जाने को मजबूर कर देता है।

आरएसएस के अभियान जारी हैं, एक महिला विधायक हैं जो मशीन से मास्क बना रही हैं, और अरविन्द केजरीवाल तब अफवाहें फैला रहे थे कि UP सरकार बसें भेज रही हैं। वो तो पढ़ा-लिखा था, 2012 में किस तरह के लोग इसके समर्थन में थे, हमें याद है। खुद को IIT से पासआउट कहने वाला यह आदमी किस तरह के निर्णय लेता है? अगर 2 लाख में से 5 आदमी भी संक्रमित हैं तो आप परमाणु बम के समान विस्फोटक तैयार कर रहे हैं।

कुछ आँकड़े हैं, जिन्हें जानने के बाद आप खुद इसका विश्लेषण देख सकेंगे। दिल्ली सरकार ने कहा कि दिल्ली के पास विश्वस्तरीय सुविधाएँ हैं, और कहा कि यहाँ लोगों के आने की गति बढ़ी है। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि हर शेल्टर होम में यह गति नहीं बढ़ी।

शेल्टर होम के जो आँकड़े दिए गए वो झूठे थे, केजरीवाल को अंदाजा था कि उनके पास इस जनता को हैंडल करने की क्षमता नहीं है। बिहार का दुर्भाग्य यह है कि वह छाती ठोककर कहता है कि बिहार के लोग हर जगह जाकर कूड़ा बीनते हैं। जो घण्टा हम पहले लालू राज में बजाते रहे, वही अब हम नीतीश राज में बजा रहे हैं।

इस पर विस्तृत चर्चा देखिए इस लिंक पर –

वृन्दावन-कन्याकुमारी बोल के निकले… और मजे किए थाईलैंड में! कोरोना के कारण पकड़े गए, 42 घरों में झोटम-झोटी

कोरोना महामारी भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की समस्या ले कर आई है। इन लॉकडाउन और क्वारन्टाइन जैसे शब्दों और प्रक्रियाओं ने जहाँ कुछ लोगों के सामने जीवन की आधारभूत जरूरतों जैसे रोजी-रोटी और छत का संकट पैदा किया है तो कुछ की रंगीन मिजाजी को सरेआम कर दिया है।

इसका सटीक उदाहरण हिंदुस्तान दैनिक के कानपुर संस्करण की एक खबर है, जो सोशल मीडिया में वायरल हो रखी है। इस रिपोर्ट के अनुसार जब स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने विदेश घूम कर आए लोगों की लिस्ट बना उनका चेकअप और होम क्वारन्टाइन करने की प्रक्रिया शुरू की तो कई घरों में हड़कंप मच गया। असल में बहुत सारे लोगों ने घर वालों से, अपनी पत्नियों से छुपा कर थाईलैंड में मौज-मस्ती की, फुकेट, पटाया और बैंकॉक में कइयों की शामें रंगीन हुईं। अब जब उनकी ट्रेवल हिस्ट्री इस कोरोना के कारण बाहर आ गई है तो घरों में क्लेश चालू है।

कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग अब तक ऐसे 827 लोगों की ट्रेवल हिस्ट्री निकाल चुका है, जो 14 फरवरी के बाद विदेश घूमने गए थे। इनमें से भी आधे होली के दौरान विदेश जा मौज मस्ती कर के आने वाले हैं। 42 लोग ऐसे हैं, जो मुम्बई और कन्याकुमारी के बहाने थाईलैंड घूम कर चुपचाप घर आए थे, अब तक बात छुपा रखे थे। इन छुपे रुस्तमों के ये रंगीन कारनामे देख घरों में अब सिर फुटौव्वल की नौबत आनी ही थी।

हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर

कुछ का ‘बिजनेस टूर’ जहाँ बैंकॉक पटाया और मकाऊ में पूरा हुआ तो कुछ वृन्दावन को दिल में याद करते फुकेट उड़ लिए। रिपोर्ट के अनुसार कानपुर शहर के बिरहाना रोड और जनरलगंज के तीन व्यापारी कृष्ण जन्मस्थली व लीला स्थली के दर्शन का बहाना कर खुद ही फुकेट में लीला करते पकड़े गए हैं। अब घरों में कोरोना से ज्यादा उनके कारनामों की चर्चा है। ऐसा ही एक किस्सा निकल कर आया है सिविल लाइन्स क्षेत्र के 55 वर्षीय एक व्यापारी का। ‘एज इज जस्ट अ नंबर’ को चरितार्थ ऐसे ही लोग करते हैं शायद! इन सज्जन ने 14 फरवरी की शाम बैंकॉक में गुजारी, जबकि घर से 5 दिन के कोच्चि बिजनस टूर के साथ कन्याकुमारी के दर्शन कह कर निकले थे। अब मालुम पड़ा कि दर्शन कहीं और ही कर रहे थे शायद! सुनने में आ रहा है कि अब ये महाशय अपने सिर के बचे खुचे बाल पत्नी से बचाने में व्यस्त हैं, जो इनके बाल नोंच लेने पर आमादा हैं!

किराना बाजार के दो व्यापारी तो और ही गुरु निकलें हैं, जो पिछले सालों में थाईलैंड के साथ-साथ कजाखस्तान के भी दो राउंड लेकर बैठे हैं। बताते चलें कि कजाखस्तान पूर्व के सोवियत संघ के टूटने से बना एक देश है, जो अपनी खूबसूरत स्त्रियों और रोमांटिक माहौल के लिए विख्यात है। कोरोना के चक्कर में ट्रेवल हिस्ट्री खुलने से, अब तक मौनी बाबा बने घूमते इन लोगों की भी शामत आ रखी है। शादी टूटने और तलाक की नौबत सिर पर है।

रिपोर्ट के अनुसार घरवालों का गुस्सा इनके ट्रेवल ऑपरेटर्स पर भी निकल रहा है, जो बेचारे कहते घूम रहे हैं कि हमारा क्या दोष है इसमें जब आपके पति को ही भजन-कीर्तन करने थाईलैंड जाना था!

दिल्ली को और झटके मत दीजिए केजरीवाल जी! ताहिर, शाहरुख़ और शरजील अभी भी लोगों के जेहन में हैं

सबसे पहले तो जानते हैं कि दिल्ली में क्या हुआ। जैसा कि आरोप है, अरविन्द केजरीवाल ने कई बसों में मजदूरों को भर के उन्हें दिल्ली बॉर्डर तक छोड़ दिया। वहाँ उन्हें भगवान भरोसे ढाह दिया गया। कपिल मिश्रा ने एक वीडियो शेयर किया, जिसमें अनाउंस किया जा रहा है कि मजदूरों को बसों से आनंद विहार छोड़ा जाएगा। यहाँ हमारा सवाल ये है कि अगर 23-24 मार्च को ही मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने घोषणा की थी कि दिल्ली में बसें नहीं चलेंगी, फिर रातोंरात उन्हें क्यों चलाया गया? आख़िर बिना किसी सार्वजनिक घोषणा किए बसों को अचानक से सक्रिय कर दिया गया, किसके आदेश पर?

घटना का दूसरा पहलू सामने आता है राजेंद्र नगर के आम आदमी पार्टी विधायक राघव चड्ढा के बयान से। चड्ढा ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दिल्ली से लौटे मजदूरों को दौड़ा-दौड़ा कर पिटवा रहे हैं और उनसे पूछा जा रहा है कि वो दिल्ली क्यों गए थे? क्या बिना किसी सबूत के ये आरोप मानने लायक है? योगी छोड़िए, किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री मजदूरों पर बिना मतलब लाठी क्यों चलवाएगा, वो भी इस विकट परिस्थिति में? चड्ढा ने ये भी आरोप लगाया कि सीएम योगी उन मजदूरों को धमका रहे हैं कि वो दोबारा दिल्ली न जाएँ।

हम सबने देखा है कि योगी आदित्यनाथ किस तरह लगातार जनता के लिए समुचित व्यवस्थाएँ करने में प्रयासरत हैं, ताकि लॉकडाउन के दौरान किसी को कोई परेशानी न हो। वो रात में जाग कर ज़रूरी सामग्रियों के वितरण का निरीक्षण कर रहे हैं और लोगों के घरों तक चीजें पहुँचाई जा रही हैं। कमजोर आय वर्ग के श्रमजीवी जनों के भोजन के लिए ‘कम्युनिटी किचन’ प्रारंभ किए गए हैं। लखनऊ में हॉस्पिटलों का दौरा कर उन्होंने ख़ुद तैयारियों का निरीक्षण किया। 12 राज्यों में नोडल अधिकारी तैनात किए गए, ताकि यूपी के लोगों को अन्य राज्यों में कोई समस्या न हो।

ऐसे में क्या मजदूरों को दिल्ली-यूपी सीमा पर छोड़ने वाले अरविन्द केजरीवाल ने यूपी सीएम से बात की? संकट के इस माहौल में जब सभी दलों को मिलजुल कर और सभी राज्यों को समन्वय बना कर काम करना चाहिए (जैसा कि अधिकांश मामलों में हो ही रहा है), केजरीवाल की पार्टी के नेताओं द्वारा आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू कर देना भारत में इटली जैसा माहौल पैदा कर सकता है। मनीष सिसोदिया का बयान भी काफ़ी विरोधाभाषी है। एक तरफ़ उन्होंने कहा कि जो जहाँ है वहीं रहे, दूसरी तरफ उन्होंने बसों का इंतजाम करने की भी बात कही। आख़िर केजरीवाल सरकार अपने ही लॉकडाउन के आदेश पर अमल क्यों नहीं कर रही?

विपक्षी राजनीति के स्तर का इस तरह गिरने के पीछे एक और कारण ये हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संकट की परिस्थिति में देश के एक कमांडर की तरह नेतृत्व कर रहे हैं। सार्क देशों ने भी उन्हें ध्यान से सुना। ‘वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाईजेशन’ उनसे प्रभावित है। कई देशों के अध्यक्ष उनकी नेतृत्व क्षमता की तारीफ कर चुके हैं। उनके एक इशारे पर लोगों ने जनता कर्फ्यू’ के दौरान ख़ुद को घरों में बंद रखा। उन्होंने जिस सम्बोधन में लॉकडाउन की घोषणा की, वो सबसे ज्यादा देखे जाने वाले कार्यक्रमों में से एक बन गया। इसका अर्थ है कि लोग उन्हें सुनते हैं और उनका कहा मानते हैं। फिर मजदूरों को किसने भड़काया?

आरोप लगाया गया है कि दिल्ली सरकार ने इन मजदूरों के घरों का बिजली-पानी कनेक्शन काट लिया, जिससे वो दिल्ली छोड़ने को विवश हुए। दिल्ली में राजस्थान के भी मजदूर रहते हैं। उत्तर प्रदेश के ईंट-भट्ठे के कारोबार में छत्तीसगढ़ के न जाने कितने ही मजदूर हैं। इन सबका पलायन क्यों नहीं हुआ? सिर्फ़ यूपी-बिहार के मजदूर ही क्यों घर से निकलने को विवश हुए? जिस तरह सीएम योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाया गया, उससे तो यही लगता है कि इस घड़ी में भी हिटजॉब की राजनीति चल रही है, जो देश के लिए सही नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में जनसमर्थन देख कर विपक्ष अब उन पर सीधा हमला करने से बच रहा है। इसीलिए दूसरे नेताओं को चुन कर निशाना बनाया जा रहा है। इसी क्रम में राघव चड्ढा जैसे नेताओं ने सीएम योगी पर वार किया लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ क्योंकि यूपी में मजदूरों के रहने और खाने-पीने के साथ उनके मेडिकल टेस्ट व स्क्रीनिंग की भी समुचित व्यवस्था कराई गई। मनीष सिसोदिया मजदूरों से मिलने पहुँचे थे लेकिन उन्होंने इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा कि क्या उनके मेडिकल स्क्रीनिंग के बाद ही राज्य से बाहर भेजा जा रहा है या सब कुछ यूपी सरकार पर ही छोड़ दिया गया है?

भारत में अब तक कोरोना वायरस का प्रकोप तुलनात्मक रूप से नियंत्रण में है। अब तक 1050 लोगों को इसका संक्रमण हुआ है, जिनमें से 86 ठीक हो गए हैं और 27 की मृत्यु हो गई है। अभी कुल 937 सक्रिय मामले हैं, जिनका इलाज जारी है। पीएम मोदी ने भी ‘मन की बात’ में कोरोना मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों और इस संक्रमण से उबरे लोगों से बातचीत कर उनका अनुभव दुनिया के सामने रखा। ऐसे समय में सभी नेताओं को अपने-अपने प्रदेशों में कुछ ऐसा ही करना चाहिए, जिससे सकारात्मकता से चीजे आगे बढ़े, नकारात्मकता न फैले। लेकिन, कुछ नेता इसके उलट काम कर रहे हैं।

दिल्ली अभी-अभी हिन्दू-विरोधी दंगों से उबरी है। सड़क पर पिस्टल लहरा कर गोलीबारी करते शाहरुख़ को देश भुला नहीं है। शरजील इमाम और वारिस पठान जैसे नेताओं के बयान अभी भी जेहन में हैं। फैसल फ़ारूक़ के स्कूल को दंगाइयों द्वारा अटैक बेस बनाया जाना याद ही होगा। ताहिर हुसैन ने अपने हजारों लोगों के साथ मिल कर जो कत्लेआम मचाया, उसकी जाँच जारी है। अमानतुल्लाह ख़ान ने जिस तरह दंगाइयों का बचाव किया, वो सभी को पता ही है। ऐसे माहौल में कोरोना के आने से जनता पर क्या बीत रही है, ये सोचा जा सकता है। अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप्प है। दिल्ली को लगातार दो बड़े झटके लगे हैं, शाहीन बाग़ के बाद।

अभी ज़रूरत है संवेदनशीलता से काम करने की। तब भी कुछ नेता पीएम मोदी पर हमले से बचते हुए भाजपा के अन्य नेताओं पर किसी न किसी तरह निशाना साध रहे हैं। भाजयुमो और संघ के कर्मठ कार्यकर्ता लोगों तक राशन-पानी और राहत पहुँचाने में लगे हुए हैं। हो सकता है सरकार की कुछ कमियाँ हों लेकिन इसे लेकर सार्वजनिक रूप से आपत्तिजनक आरोप-प्रत्यारोप करने का समय अभी नहीं है। अभी समय है जनता की समस्याओं को सुनने का, लॉकडाउन में जिन्हें परेशानी हो रही है उनकी समस्याएँ दूर करने का। हारे हुए नेता तजिंदर बग्गा और कपिल मिश्रा से काफ़ी कुछ सीखा जा सकता है।

जिन्हें नहीं मिला दिल्ली में आसरा, उनके रहने-खाने के लिए योगी सरकार द्वारा यमुना एक्सप्रेस वे टाउनशिप का अधिग्रहण

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोरोना वायरस के कारण घोषित लॉकडाउन के दौरान जिस नेतृत्व का उदाहरण दिया है, वह आने वाले समय के लिए और समकालीन नेताओं के लिए उदाहरण बनने जा रहा है। आज ही योगी सरकार ने जेपी स्पोर्ट्स सिटी यमुना एक्सप्रेस वे टाउनशीप का अधिग्रहण करते हुए फैसला लिया है कि इसे प्रवासियों के शेल्टर होम के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ ही रहने-खाने और चिकित्सकीय सुविधाओं का भी इंतजाम किया जाएगा। इस विकराल समस्या को देखते हुए यमुना एक्सप्रेस-वे को टोल फ्री कर दिया गया है।

योगी सरकार ने यह फैसला ऐसे समय में लिया है, जब दिल्ली में रहने वाले उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के लोग बड़ी संख्या में अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं। कुछ लोगों ने अपने घर पहुँचने के बाद यह भी खुलासा किया कि किस प्रकार से 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद दिल्ली में उनके घरों में बिजली-पानी की सप्लाई बंद कर दी गई। इसके बाद केजरीवाल सरकार को लगातार घेरा जा रहा है।

दरअसल, दिल्ली में डीटीसी बसों में बिठा कर भारी संख्या में लोगों को यह कहकर बॉर्डर पर छोड़ दिया गया कि वहाँ से उन्हें घर ले जाने के प्रबंध किए गए हैं जबकि ऐसा कुछ भी प्रबंध दिल्ली सरकार द्वारा नहीं किया गया था। इसका नतीजा यह हुआ कि लॉकडाउन के बावजूद बड़ा जनसैलाब दिल्ली के आनंद विहार में इकट्ठा हो गया, जिसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फैसला लिया कि बॉर्डर इलाकों में एक लाख प्रवासी लोगों के रहने की व्यवस्था की जाएगी।

कोरोना वायरस को लेकर देशभर में घोषित लॉकडाउन में कामगारों और मजदूरों के सामने बेरोजगारी की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इन मजदूरों के लिए एक के बाद एक बड़े और त्वरित फैसले ले रही है।

एक अन्य आदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने आदेश दिया है कि प्रदेश भर में अब कोई भी मकान मालिक किसी भी कामगार या मजदूर से किराया (लॉकडाउन की अवधि तक किराए की माँग नहीं करनी है) नहीं लेगा। गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी ने इस बात की जानकारी दी है।

वहीं, लॉकडाउन के दौरान यमुना एक्सप्रेसवे को टोल फ्री कर दिया गया है। यमुना अथॉरिटी के अधिकारियों का कहना है कि यमुना एक्सप्रेसवे के टोल फ्री रहने से आवश्यक वस्तुएँ और आपातकालीन सुविधा मिलने में आसानी होगी। फल, सब्जी, दूध और अन्य खाद्य सामग्री की ढुलाई करने वाले वाहनों से टोल नहीं वसूले जाने पर जरूरी चीजों की कीमतों को नियंत्रित करने में आसानी होगी।

कोरोना के शक में परिवार के नाम चिट्ठी लिखकर खुद को लगाई फाँसी, पोस्टमॉर्टम में निकला निगेटिव

कोरोना को लेकर लोगों के मन में डर किस हद तक घर कर सकता है, ये कर्नाटक में उडुपी जिले में हुई एक घटना से समझ सकते हैं। यहाँ एक शख्स ने कोरोना संक्रमण होने की आशंका के चलते खुदकुशी कर ली। हालाँकि बाद में यह बात सामने आई कि वह संक्रमित नहीं था, उसकी रिपोर्ट निगेटिव आई है। 

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, उडुपी में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने कहा कि पोस्टमॉर्टम टेस्ट रिपोर्ट से पता चला है कि शख्स कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं था। साथ ही उस इलाके में रह रहे लोगों से कहा है कि उन्हें घबराने की जरुरत नहीं है। गोपालकृष्ण मड़ीवाला (56) ने खुद को फाँसी लगा ली थी क्योंकि उन्हें यह शक था कि वह कोरोना वायरस की चपेट में आ गए हैं। मरने से पहले उन्होंने एक चिट्ठी भी लिखी है, जिसमें उन्होंने अपने परिवार से सुरक्षित रहने के लिए कहा है।

गौरतलब है कि दुनिया भर में अब तक छह लाख से ज़्यादा लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं जबकी मरने वालों की संख्या 30,000 के पार हो चुकी है। वहीं, भारत में कोविड-19 के मामलों की संख्या 979 से अधिक हो चुकी है और वायरस के संक्रमण के कारण अब तक 25 लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी है।

भारत में 22 राज्यों के 75 ज़िलों में कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि हुई है, जिनमें से महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, दिल्ली-एनसीआर और उत्तर प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित हैं। फिलहाल कोरोवा वायरस के प्रसार को कम करने के लिए सरकार ने पूरे देश में लॉकडाउन कर दिया है ताकि, ये राज्यों में तेजी से ना फैल सके। 

संवेदनशील इलाके में जाँच करने गए डॉक्टर्स पर थूकने के साथ गाली-गलौच, लोगों ने कहा- ‘अब थूक जिहाद शुरू’

कोरोना COVID-19 की लड़ाई में डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ सहित चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कर्मचारी दिन-रात इस वायरस से संक्रमित मरीजों का इलाज करने में जुटे हैं। लेकिन समाज के एक वर्ग ने मानो ठान रखी है कि वो मुश्किल से मुश्किल समय में भी व्यवस्था और सरकार के खिलाफ ही रहेगा। ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे एक वीडियो को देखने के बाद काफी लोगों की यही राय सामने आ रही है।

सोशल मीडिया पर जो वीडियो शेयर किया जा रहा है, उसमें डॉक्टर्स को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वहाँ के लोग उनका सहयोग नहीं कर रहे हैं और उन पर थूक रहे हैं।

संयम जैन ने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “इंदौर के रानीपुरा इलाके में जहाँ से सबसे ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं, वहाँ पर ‘मुसलमान’ लोग बिल्कुल भी सहयोग नहीं कर रहे हैं। सहयोग करने की बजाय चेक करने गए डॉक्टर की टीम के साथ गली गलौच और उन पर थूक रहे है… अब इन्होंने ‘थूक जिहाद’ फैलाना शुरू कर दिया है।”

विडियो में डॉक्टर को पुलिस से कहते हुए सुना जा सकता है कि वहाँ एक लेडी है, जिसका बेटा फैजान थूक रहा है। जब डॉक्टर ने उसे मना किया तो ऊपर से गाली देने लगी और कहा कि वो डॉक्टर की वर्दी उतरवा देंगे। हालाँकि ऑपइंडिया इस ट्वीट में किए गए दावों की पुष्टि नहीं करता है लेकिन इस वीडियो में डॉक्टर द्वारा कही जा रही बातों को आप सुन सकते हैं।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, रानीपुरा, निपानिया, खातीवाला टैंक, चंदननगर और खजराना के तीन किलोमीटर के हिस्से को पुलिस-प्रशासन ने पूरी तरह सील कर दिया है और वहाँ रहने वालों की जाँच के साथ ही सेनिटाइजर्स का छिड़काव किया जा रहा है। लेकिन रविवार को स्क्रीनिंग के लिए रानीपुरा इलाके में पहुँची एक टीम के साथ स्थानीय लोगों ने बदसलूकी की और टीम के सामने ही मुँह में पानी भरकर उनके ऊपर जूठा पानी फेंका गया और थूका गया। यही नहीं, जाँच टीम द्वारा उन्हें समझाने पर उनके साथ गाली-गलौज भी की गई। विडियो में देखा जा सकता है कि डॉक्टर्स की टीम वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों से इसकी शिकायत कर रही है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के रानीपुरा और इससे लगे इलाकों में कोरोना वायरस से संक्रमित ज्यादा मरीज मिलने से प्रशासन चिंतित है। जिस कारण रानीपुरा को लेकर प्रशासन ने सख्त निर्णय लेते हुए वहाँ आने-जाने के सभी रास्ते बंद करने का फैसला लिया है। हालाँकि, लोगों की सुविधा के लिए अत्यावश्यक चीजों की होम डिलिवरी किए जाने का भी फैसला लिया गया है और जिन इलाकों में कोरोना संक्रमित मरीज मिले हैं, शहर के ऐसे 11 इलाकों को प्रशासन ने कंटेनमेंट जोन बनाया है। इनमें रानीपुरा भी शामिल है। शहर में पॉजिटिव मरीजों की संख्या 24 हो गई है, इनमें से इंदौर और उज्जैन के एक-एक मरीज की मौत हो चुकी है।

देशभर में कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें लोगों को लॉकडाउन के ऐलान के बाद भी मनमर्जी करते हुए और शासन-व्यवस्था के साथ सहयोग ना करते हुए देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज, रविवार को ही अपने ‘मन की बात’ रेडियो प्रसारण में कहा कि लोगों को अव्यवस्था जरूर हो रही है, लेकिन यह हम सबके लिए है और हमें सहयोग करना चाहिए।