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हरम की 20 लड़कियों के साथ थाईलैंड के रंगीन मिजाज राजा ‘सेल्फ आइसोलेशन’ में, 4 बीवियों का पता नहीं

जहाँ एक तरफ ज्यादातर दुनिया सेल्फ आइसोलेशन में पड़े-पड़े बोर हो रही है, तो कहीं किसी के लिए यह जीवन को और रंगीन कर देने का एक सही अवसर लाया है। सेल्फ आइसोलेशन हो तो ऐसा हो, जिसमें आप अपने देश से दूर कहीं किसी शानदार होटेल को बुक कर अपनी सहवासनियों (ऐसी स्त्रियाँ जिनका आपके साथ शारीरिक संबध तो होता है लेकिन वैवाहिक नहीं) को ले सेल्फ आइसोलेशन में चले जाएँ। जहाँ कोई आपको नाहक परेशान करने वाला न हो, फिजूल की धमाचौकड़ी न हो, कोई स्ट्रेस न हो, इससे बेहतर जीवन रस कहाँ होगा किसी रसिक मिजाज के लिए!

पढ़ते हुए आपको लग सकता है कि लिखने वाला शायद अपने घर में बंद पड़े-पड़े, अपनी अधूरी फंतासियों के महल बनाने में लगा है। तो आपको बता दूँ कि आखिर सबकी जिंदगी में सेल्फ आइसोलेशन का मतलब घर में घुसे-घुसे दाल रोटी सब्जी खाना, बर्तन धोना, लैपटॉप में किटपिट-किटपिट करते रहने तक ही सीमित नहीं होता। दुनिया में आज भी राजे महाराजे जिन्दा हैं, ख़ुशहाल हैं और बाकायदा हरम रखने वाले हैं।

मैं बात कर रहा हूँ थाईलैंड के किंग की, जो न्यूज़ रिपोर्ट्स के अनुसार दक्षिणी जर्मनी के शानदार व भव्य होटेल में अपनी 20 सहवासनियों के साथ सेल्फ आइसोलेट हैं। माना जा रहा है कि थाईलैंड के राजा महा वजीरालोंगकोरन जिन्हें रामा ‘दशम’ के नाम से भी जाना जाता है, ने अपने हरम के साथ सेल्फ आइसोलेशन में जाने के लिए बवेरिया के शानदार होटेल सोनेनबिचल को पूरा बुक किया हुआ है।

जर्मन टेबलायड बिल्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 67 साल के थाई राजा ने स्थानीय डिस्ट्रिक्ट कॉउन्सिल की आज्ञा लेने के बाद इस पूरे होटेल को बुक कर लिया है। अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी है कि थाई राजा की चारों पत्नियाँ उनके साथ इस आइसोलेशन में हैं या नहीं।

बताते चलें कि थाई किंग के लिए जर्मनी दूसरे घर की तरह है, जहाँ वह अपना अधिकतर समय बिताते हैं। थाई किंग फरवरी के बाद से अपने मूल देश में पब्लिक के बीच नहीं देखे गए हैं। हालाँकि थाई किंग का यह “आइसोलेशन” उनकी साधारण प्रजा को बिल्कुल नहीं सुहाया, जिसने राजा की आलोचना करने पर तयशुदा 15 सालों की कैद को भी नजरअंदाज कर ऑनलाइन माध्यमों के जरिए लगातार अपना गुस्सा जाहिर किया। जिस कारण 24 घंटे के भीतर “व्हाई वी नीड अ किंग” 12 लाख बार ट्ववीट किया गया।

थाई किंग के इस सेल्फ आइसोलेशन की खबर से पहले मलेशिया के राजा और रानी के सेल्फ क्वारन्टाइन में जाने की रिपोर्ट आई थी। रिपोर्ट के अनुसार मलेशिया के राजमहल के 7 सदस्यों के कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद, राजा और रानी को सेल्फ क्वारन्टाइन में रखा गया है। हालाँकि दोनों के टेस्ट्स निगेटिव आए हैं, पर सावधानी बरतते हुए उन्हें 14 दिनों के लिए आयसोलेट किया गया है।

सनकी शासकों से अभिशप्त रही ढिल्लिका: ‘तुगलक’ केजरीवाल के कारण लंदन की जगह वुहान बनने के कगार पर

दिल्ली की हवाओं और पानी की तासीर में ऐसी जरूर कोई बेग़ैरती है कि उसके हिस्से अक्सर धूर्त, बर्बर और विखंडनकारी शासक आए। एक बड़े समय तक यह ढिल्लिका इस्लामिक आक्रांताओं और औपनिवेशिक राज का गवाह बनी, लेकिन इसके बाद भी इसके भाग्य में सुकून नहीं था। जब तक इतिहासकार अपनी राय बदलते, 2013 में एक ऐसा समय आया जब दोबारा दिल्ली में धूर्त और कपट से लोगों की भावनाओं से छल कर के एक इंसान ने सत्ता को हथिया लिया और यह क्रम जारी रखा।

दिल्ली इस बार इस अति महत्वाकांक्षी शासक के हाथों बर्बाद होने के कगार पर खड़ी है। कल शाम दिल्ली के आनंद विहार की जो तस्वीरें सामने आई हैं, कम से कम उन्हें देखने के बाद तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तुलना मध्यकालीन भारत के इतिहास के बर्बर मुस्लिम आक्रांताओं से करने में कोई झिझक नहीं हो सकती है। लेकिन केजरीवाल ने गरीब लोगों को बिना व्यवस्था के बॉर्डर पर छोड़ आने का जो ऐतिहासिक कांड इस बार किया है, उससे उनकी तुलनाओं का दायरा और बड़ हो जाता है।

कारण यह है कि पूरे विश्व के मानचित्र पर अपने पैर पसार चुके जिस चाइनीज कोरोना वायरस की महामारी के लिए चीन के शी जिनपिंग को कई लोग अपराधी मान रहे हैं तो वहीं दिल्ली में रोजगार के लिए गए हुए UP-बिहार के कामगारों के साथ धोखा कर उनकी जिंदगी को खतरे में डालने के लिए अरविंद केरजीवाल और उनकी ही सरकार के विधायक राघव चड्ढा जैसे लोग अपराधी हैं।

मुफ्त बिजली और पानी का सपना दिखाकर दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतने वाली अरविंद केजरीवाल सरकार की संवेदनहीनता और उनकी जनता के प्रति जवाबदेही की हकीकत कोरोना की महामारी के दौरान सामने आ गई है।

चुनाव जीतने के समय अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली को लंदन बनाने की बात कही थी लेकिन प्रतीत होता है कि लंदन से पहले केजरीवाल पूरे भारत को ही चीन के वुहान प्रान्त में तब्दील करने की योजना बना चुके हैं। खास बात यह है कि पहले जहाँ वो अपनी नाकामयाबी के लिए केंद्र सरकार को दोषी ठहराया करते थे, इस बार उन्होंने कोरोना वायरस में दिल्ली सरकार के इंतजाम के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को दोषी ठहराने का फैसला कर लिया है।

आनंद विहार में अपने घर जाने के लिए उमड़ी इस भीड़ से किस स्तर की त्रासदी जन्म ले सकती है, इसका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं, और उससे भी बड़ी बात यह है कि घर जाने की उम्मीद लगाए बैठे ये लोग किस मानसिक तनाव से गुजर रहे होंगे।

केजरीवाल की इस योजना में उनका साथ देने के लिए देश की मीडिया का वह ‘आदर्श लिबरल’ गिरोह तो हमेशा से ही उनके साथ खड़ा रहा है। दी क्विंट जैसे प्रपंचकारियों ने कल रात केजरीवाल सरकार के MLA राघव चड्ढा का धूर्त चेहरा सामने आते ही यह कोशिशें शुरू भी कर दी और निरंतर यह साबित करने का प्रयास कर रहा है कि दिल्ली के आनंद विहार में जमा UP-बिहार के कामगारों की यह भीड़, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कहने पर वहाँ जमा हुई थी।

वास्तव में हक़ीक़त यह है कि लॉकडाउन के दौरान जिस विराट स्वरूप का प्रदर्शन योगी आदित्यनाथ ने किया है, वह पूरे देश के नेताओं और नीति निर्माताओं के लिए आदर्श है। 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद सबसे पहले योगी आदित्यनाथ ने ही गरीबों के लिए सरकारी खजाने खोले। यहाँ तक कि कल रात ही दिल्ली से UP की ओर पलायन कर रहे लोगों को कोई समस्या न हो, इसके लिए 1 लाख लोगों के आइसोलेशन का बॉर्डर पर ही इंतजाम की घोषणा कर दी है। योगी आदित्यनाथ की तत्परता और सेवाभाव के सामने अरविंद केजरीवाल कितने बौने साबित हो चुके हैं!

21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद दिल्ली और नजदीकी इलाकों से लोग उत्तर प्रदेश और अपने गृह राज्य की तरफ पैदल निकलने लगे हैं। दिल्ली से उत्तर प्रदेश पहुँचे इन लोगों ने बताया कि दिल्ली सरकार ने बिजली-पानी के कनेक्शन काट दिए, और लॉकडाउन के दौरान उन्हें भोजन, दूध नहीं मिला। भूखे लोग सड़कों पर उतरे। यहाँ तक कि दिल्ली सरकार के अधिकारी बक़ायदा एनाउंसमेंट कर अफ़वाह फैलाते रहे कि यूपी बार्डर पर बसें खड़ी हैं, जो उन्हें यूपी और बिहार ले जाएँगी।

यह अरविंद केजरीवाल बाबा भारती और खड़ग सिंह की कहानी वाला खड़ग सिंह ही है, यह बात देर से ही सही लेकिन खुद केजरीवाल साबित करते जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी देखा जा रहा है कि जब सभी बड़े और छोटे समूह गरीब लोगों को होने वाली अव्यवस्थाओं में उनकी मदद करने का प्रयास कर रहे हैं, उस समय केजरीवाल सरकार के मंत्री और वो मीडिया, जिसने केजरीवाल को गोद में बिठाकर पाला है, सिर्फ और सिर्फ दिल्ली में केजरीवाल सरकार को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे हैं।

ध्यान देने की बात यह है कि जिन लोगों को मुफ्त बिजली-पानी का सपना दिखाकर अरविंद केजरीवाल तीसरी बार सत्ता में लौटे हैं, कोरोना की आपदा में सबसे पहले उन्हीं को बिजली-पानी से वंचित कर उन्हें यह सोचने पर विवश किया गया कि ऐसे में उनके पास अब सिर्फ दिल्ली छोड़कर अपने मूल को लौटना ही एकमात्र विकल्प शेष रह गया है।

उम्मीद है कि कोरोना के कहर पर समस्त देशवासी मिल जुलकर लगाम लगा देंगे, लेकिन कम से कम यह तय है कि अभिशप्त दिल्ली अभी और कई वर्षों तक केजरीवाल जैसे निरंकुश विखंडनकारियों के कपट का शिकार बनती रहेगी।

केरल में भी दिल्ली सा हाल: सड़क पर उतरे हजारों मजदूरों ने कहा- घर जाना है, 3 दिन से भूखे हैं

कोरोना वायरस संकट के बीच लॉकडाउन के चलते केंद्र और राज्य सरकारों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। प्रवासी मजदूरों का पलायन और कोरोना वायरस को फैलने से रोकना इस समय सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। देश भर से ऐसी कई तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं जिसमें देखा जा सकता है कि प्रवासी मजदूर लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करते हुए कोरोना वायरस संक्रमण के फैलने का खतरा बढ़ा रहे हैं। ऐसा ही एक मामला केरल के कोट्टयम जिले से सामने आया है। यहाँ सैंकड़ों की संख्या में उत्तर भारत के प्रवासी मजदूर सड़क पर धरना दे रहे हैं। मजदूरों की माँग है कि सरकार उन्हें उनके घर भेजने का पुख्ता इंतजाम करे।

पत्रकार पद्मजा जोशी के मुताबिक यहाँ के प्रवासी मजदूर पिछले 2-3 दिनों से भूखे हैं। उन्हें पिछले 2-3 दिनों से खाना नहीं मिल रहा है। ये मजदूर मूल रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार और छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। यह दिल्ली के बाद दूसरा राज्य है जहाँ राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर एकत्रित हुए हैं। 

जानकारी के मुताबिक केरल के प्रवासी मजदूर दिल्ली सरकार द्वारा राज्य के प्रवासी मजदूरों के लिए बसों की व्यवस्था करते हुए देखने के बाद यहाँ पर एकत्रित हुए। बताया जा रहा है कि दिल्ली सरकार ने प्रवासी मजदूरों को बसों से सीमा के पास ले जाती है और फिर वहाँ उन्हें उनके हाल पर छोड़ देती है। इसके बाद इनमें से अधिकांश मजदूर सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गाँवों की तरफ पैदल ही निकल पड़े। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अब केरल के प्रवासी मजदूर भी अपने गाँवों की तरफ पैदल ही जाने का फैसला किया है।

बता दें कि देश भर में कोरोना वायरस का संक्रमण लगातार बढ़ता ही जा रहा है और अगर स्थितियाँ इसी तरह बनीं रहीं, लॉकडाउन का पालन नहीं हुआ तो परिणाम और भी गंभीर होने की आशंका है। केरल कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला दूसरा राज्य है। यहाँ पर कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 174 है। वहीं सबसे अधिक कोरोना के केस महाराष्ट्र से सामने आए हैं। यहाँ पर कोरोना मरीजों की संख्या 183 है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (मार्च 24, 2020) को देशभर में 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की। लॉकडाउन का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से घरों में ही रहने की अपील की थी। पीएम मोदी ने कहा था कि इस खतरनाक वायरस का अभी तक कोई इलाज नहीं खोजा गया है। इसलिए लॉकडाउन और एक-दूसरे से दूरी ही इससे बचाव का उपाय है।

‘चूहा-चमगादड़ हजारों साल से खा रहे चाइनीज, फिर अचानक से यह वायरस कैसे? US-UK-इजरायल की साजिश है यह’

एक देश है। देश क्या, देश के नाम पर मजाक है। नाम है पाकिस्तान। वहाँ के पूर्व विदेश मंत्री कोरोना वायरस संक्रमण पर कुछ अनोखा लेकर आए हैं। वो इसके पीछे एक मूर्खतापूर्ण, हास्यास्पद लेकिन षड्यंत्र भरी थ्योरी लेकर सामने आए हैं। अपनी इस षड्यंत्र थ्योरी में वो अमेरिका पर आरोप लगाते हुए कोरोना वायरस को अमेरिकी लैब में बना हुआ घोषित करते हैं और दुनिया भर में इसे फ़ैलाने के दोषी चीन को इस मामले में क्लीन चिट देते हैं।

पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्लाह हुसैन हरुन, ऐसा लगता है जैसे किसी लम्बे व्हाट्सअप मैसेज को पढ़ते हुए, अपनी फंतासी थ्योरी साझा करते हुए दावा करते हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण प्राकृतिक न होकर अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और इजरायल की एक सोची-समझी चाल है, जिन्होंने उभरते हुए चीन को थामने के लिए इसे लैब में ईजाद किया है।

पागलों की तरह एक ही बात की रट लगाए हुए यह आदमी अपनी षड्यंत्र थ्योरी में आगे कहता है कि अमेरिका ने इस वायरस को सीरिया में रसायनिक हथियारों के रूप में प्रयोग करने के लिए ईजाद किया था। वह कहते हैं कि इस वायरस को पैदा करने का उद्देश्य ऐसी बीमारी पैदा करना था, जो विश्व भर में लोगों के दिलों में खौफ भर दे।

हरुन अपने इस दावे की क्रोनोलॉजी समझाते हुए कहते हैं- इस वायरस का पेटेंट एक अमेरिकी कम्पनी शिरॉन ने अमेरिकी सरकार से 2006 में प्राप्त किया था। 2014 में इसकी वैक्सीन के पेटेंट के लिए उन्होंने यूरोप में अप्लाई किया था। इसका पेटेंट कुछ वर्षों में दे देना चाहिए था जो कि नवंबर 2019 तक नहीं दिया गया।

संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत रह चुके हरुन अपने अनर्गल प्रलाप को जारी रखते हुए आगे कहते हैं कि इस वायरस की वैक्सीन को इजरायल में बना लिया गया है, जो सिर्फ उन्हीं देशों को यह वैक्सीन देगा जो इजरायल को संप्रभु देश की मान्यता देंगे। हरून इस वायरस के पीछे के कारण पर जोर देते हुआ कहते हैं कि अमेरिका चीन के शक्तिशाली होते जाने से कई वर्षों से बेहद चिंतित था और उसने चीन को रोकने के लिए सारे तरीके आजमा लिए थे, जो अब तक नाकाम ही सिद्ध हुए। अपनी मूर्खतापूर्ण फंतासी को आगे घसीटते हुए वह कहते हैं कि इस वायरस को मेलिंडा और गेट्स फाउंडेशन से फंडेड एक ब्रिटिश लैब में बनाया गया था, जहाँ से इसको अमेरिका के जॉन हॉपकिंस और ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ ने एयर कनाडा के जरिए वुहान पहुँचाया।

हरुन अपनी मनगढ़ंत कहानी में आगे जोड़ते हैं कि इस वायरस को बनाने में मेलिंडा फाउंडेशन, जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के साथ-साथ वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम तक ने वित्तीय मदद की थी, जिसका सबसे बड़ा फायदा इजरायल को हुआ क्योंकि इसकी वैक्सीन उसी ने बनाई थी।

मजेदार बात यह है कि इनकी बातों को कुछ पाकिस्तानी गंभीरता से लेते देखे गए, जो कहते हैं कि अगर हरुन ने कोई बात कही है तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए। तो वहीं कुछ का मानना है कि अल्लाह इस ‘कुफ़्र’ पर भारी पड़ेगा।

हालाँकि कुछ पाकिस्तानियों ने इस अजीबोगरीब फंतासी पर सवाल भी उठाए हैं। इसके बाद हरुन ने एक नया वीडियो पोस्ट किया और अपने दावों को दोहराया। हरुन ने कहा कि यह वायरस चूहा और चमगादड़ खाने से आया है, से ज्यादा तार्किक है यह स्वीकारना कि यह वायरस लैब में पैदा किया गया है। वह पूछते हैं कि चूहा और चमगादड़ तो चीनी हजारों साल से खा रहे हैं फिर अचानक से यह वायरस कहाँ से आ गया?

इसके अलावा हरुन अपने दूसरे वीडियो में यह भी स्वीकारते हैं कि उन्होंने जो पेटेंट नंबर पहले वीडियो में साझा किया था, वह अमेरिकी रिकॉर्ड में नहीं मिलता और इस तरह खुद ही अपने दावे को झुठलाते नजर आते हैं। हालाँकि वह अपने झूठे प्रोपेगेंडा से तनिक भी पीछे न हटते हुए दावा करते हैं कि पेटेंट नंबर को नवंबर 2019 में कैंसिल कर दिया गया था।

हरुन को लगता था कि उनके इस दावे (यह वायरस चीन की देन नहीं बल्कि पश्चिमी देशों की घृणात्मक करतूत है) को, पाकिस्तान में गंभीरता से लिया जाएगा, लेकिन कुछ मूर्ख और कट्टरपंथी पाकिस्तानियों के अलावा वहाँ की बाकी जनता ने ही उन पर विश्वास नहीं किया। बेचारे हरुन अब अपने देश पाकिस्तान में एक हास्यास्पद वस्तु बनाकर रह गए हैं।

याद रहे कि अब तक पाकिस्तान में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 1500 से ऊपर पहुँच गई है। जबकि अमेरिका में कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या सवा लाख के लगभग है और जो दुनिया में इस वायरस से संक्रमित लोगों में सबसे ज्यादा है। अमेरिका में अब तक कोरोना से मरने वालों की संख्या 2200 का आँकड़ा पार कर चुकी है तो वहीं ब्रिटेन में उसके प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन समेत 17000 पॉजिटिव मामले सामने आ चुके हैं, वहाँ अब तक मरने वालों की संख्या 1000 पार कर गई है।

वायनाड में पादरी, नन समेत 9 गिरफ्तार, लॉकडाउन के बावजूद रविवार की प्रार्थना करने गए थे चर्च

केरल में वायनाड के समीप एक गिरजाघर पादरी को गिरफ्तार किया गया है। लॉकडाउन के बावजूद रविवार को सामूहिक प्रार्थना सभा आयोजित करने को लेकर यह कार्रवाई की गई। पादरी के अलावा दो नन सहित आठ अन्य भी गिरफ्तार किए गए हैं।

कोरोना वायरस के संक्रमण पर काबू पाने के लिए देशभर में 21 दिनों का लॉकडाउन घोषित किया गया है। लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग इसकी गंभीरता को नकारते हुए मनमर्जी से दैनिक क्रियाकलाप में व्यस्त हैं। ऐसा ही एक मामला केरल की चर्च से सामने आया है।

केरल में वायनाड के समीप एक गिरजाघर (चर्च) के एक पादरी और दो नन समेत नौ अन्य लोगों को लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करते हुए प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए रविवार (मार्च 29, 2020) को गिरफ्तार कर लिया गया। मनंथवाडी पुलिस थाने से प्राप्त सूचना के अनुसार, नजदीक के वेमाम के ही मिशनरीज ऑफ फेथ माइनर चर्च के पादरी टॉम जोसेफ, दो नन और सात अन्य पर IPC की धारा 269 (किसी बीमारी को फैलाने के लिए किया गया लापरवाही भरा काम जिससे किसी अन्य व्यक्ति की जान को खतरा हो सकता है) और 188 (महामारी के संबंध में सरकारी आदेश न मानना) के तहत मामला दर्ज किया गया है। इन लोगों ने आज सुबह धार्मिक सभा में भाग लिया था। उन्हें बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया।

गौरतलब है कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए लगाए गए 21 दिनों के लॉकडाउन के बावजूद पलायन को लेकर भी केंद्र सरकार ने सख्ती दिखाई है। केंद्र सरकार ने कहा है कि लॉकडाउन का पालन करवाना जिला मजिस्ट्रेट और एसपी की जिम्मेदारी है। केंद्र सरकार की तरफ से आदेश दिया गया है कि सभी राज्यों और जिलों की सीमाएँ सील कर दी जाएँ और बाहर से आने वाले लोगों को राज्य की सीमाओं पर ही कैंपों में रखा जाए।

बता दें कि आज, रविवार को कोरोना से जम्मू-कश्मीर, गुजरात और महाराष्ट्र में एक-एक लोगों की मौत हो गई। इसी के साथ देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या 25 हो गई है।

बिना काम पूरी मजदूरी, रहने-खाने की सुविधा, मकान किराया भी नहीं – DM/SP होंगे जिम्मेदार: सख्ती में मोदी सरकार

कोरोना वायरस के प्रकोप की मार झेल रहे भारत के सामने इस समय पलायन एक गंभीर संकट बनकर खड़ा हो गया है। लॉकडाउन के बावजूद सैंकड़ों की संख्या में मजदूर अपने गाँवों की तरफ भाग रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकारों को निर्देश जारी किए हैं। केंद्र ने राज्यों से लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की आवाजाही को रोकने के लिए राज्य और जिलों की सीमा को प्रभावी तरीके से सील करने को कहा है। 

इसके साथ ही केंद्र ने राज्यों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि प्रवासी मजदूरों के लिए उनके काम करने की जगह पर ही सभी तरह की सुविधाएँ मुहैया कराई जाए। इतना ही नहीं, मजदूरों को समय पर उनके वेतन का भुगतान हो। इसके लिए भी राज्यों को निर्देश जारी किए गए हैं। केंद्रीय कैबिनेट सचिव और केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने इस विषय पर शनिवार की देर शाम और आज सुबह राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशक के साथ लगातार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग भी की और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। दिशा-निर्देशों में कहा गया कि जिले के डीएम और एसपी को इन निर्देशों के पालन के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए, जो आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जारी किए गए हैं।

केंद्र का कहना है कि इस बारे में शनिवार को यह दिशा-निर्देश दे दिया गया था कि सरकार इस काम के लिए आपदा प्रबंधन के लिए दी गई राशि का प्रयोग भी कर सकती हैं। इसके अलावा यह निर्देश दिया गया कि इस अवधि के लिए मजदूरों से किसी भी तरह के किराए (मकान/घर किराया) की माँग नहीं की जानी चाहिए। साथ ही उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए, जो मजदूरों या छात्रों को किराया ना देने पर परिसर या मकान खाली करने को कह रहे हैं।

देश के कुछ हिस्सों में प्रवासी श्रमिकों की आवाजाही को लेकर भी केंद्र ने राज्यों को उचित कदम उठाने को कहा है। राज्यों को बताया गया कि यह निर्देश जारी किए गए थे कि जिला और राज्य की सीमाओं को प्रभावी रूप से सील किया जाएगा और केवल माल की आवाजाही की अनुमति दी जाएगी। ये संदेश भी दिया गया है कि जिन लोगों ने लॉकडाउन का उल्लंघन किया है और लॉकडाउन की अवधि के दौरान यात्रा की है, उन्हें सरकारी नियम के मुताबिक सरकारी सुविधाओं में न्यूनतम 14 दिनों के लिए रहना होगा।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (मार्च 24, 2020) को देशभर में 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की। लॉकडाउन का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से जहां हैं वहीं रहने की अपील की थी। पीएम मोदी ने कहा था कि इस खतरान वायरस का अभी तक कोई इलाज नहीं खोजा गया है। इसलिए लॉकडाउन और एक दूसरे से दूरी ही सबसे सफल उपाय है। मगर शनिवार (मार्च 28, 2020) को शहरों से लोगों के पलायन के चलते लॉकडाउन फेल होता दिखा। दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में भारी भीड़ देखी गई। इस दौरान सोशल डिस्टेंस नहीं होने से कोरोना का खतरा भी और बढ़ गया है। दिल्ली के सभी बार्डर पर शनिवार को अफरा-तफरी का माहौल दिखा।

हॉस्पिटल भरे पड़े हैं, जाकर कत्लेआम मचा दो: दिल्ली में बड़े हमले की साजिश, J&K से चल चुके ISIS के 2 आतंकी

जहाँ एक तरफ़ देश वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ आतंकी फिर से अपना सिर उठाने की कोशिश में लगे हुए हैं। भारत कोरोना वायरस से निपटने में लगा हुआ है और पूरा प्रशासनिक तंत्र भी इसी में व्यस्त है, ऐसे में आतंकी इस अवधि का फायदा उठा कर किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की फ़िराक में हैं। जम्मू कश्मीर के शोपियाँ में अपनी गतिविधि संचालित करने वाले दो आतंकियों ने दिल्ली का रुख किया है, जिससे ख़ुफ़िया एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं।

ये दोनों पाकिस्तानी आतंकवादी हैं, जो टेलीग्राम के माध्यम से खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस से लगातार संपर्क में थे। आईएसआईएस की मैगजीन्स ‘अल नबा’ और ‘वॉइस ऑफ हिन्द’ में भारत को लेकर आतंकियों को भड़काते हुए लिखा गया था कि कोरोना वायरस आपदा का फायदा उठा कर कश्मीर को ‘कब्जे’ से मुक्त कराया जाए। मैगजीन में लिखा गया था कि भारत सरकार फिलहाल लोगों को ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध कराने और मेडिकल व्यवस्था करने में लगी हुई है, ऐसे में मौके का फायदा उठा कर हमला कर देना चाहिए।

आईएसआईएस का मानना है कि आतंकवाद से निपटने की भारत की शक्ति घटी है क्योंकि देश पूरी ऊर्जा कोरोना वायरस से लड़ने में ख़र्च कर रहा है। आईएसआईएस का कहना है कि भारत में हॉस्पिटलों पर पहले से ही अतिरिक्त बोझ लदा हुआ है, ऐसे में कत्लेआम मचाने के लिए ये सबसे सही समय है। बता दें कि अनुच्छेद 370 निरस्त होने और अयोध्या राम मंदिर के पक्ष में फ़ैसला आने के बाद से लगातार आतंकी किसी न किसी मौके की तलाश में लगे हुए हैं।

दिल्ली में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और मुंबई व पंजाब पुलिस को भी अलर्ट रहने कहा गया है। सुरक्षा एजेंसियाँ इस धमकी को काफ़ी गम्भीरता से ले रही हैं। हाल ही में अफ़ग़निस्तान में गुरुद्वारे पर हुए हमले में आईएसआईएस का ही हाथ सामने आया है। केरल के मोहम्मद साजिद ने इस हमले को अंजाम देने में मुख्य भूमिका निभाई थी। अब शोपियाँ से सड़क मार्ग से निकले आतंकियों को ट्रैक करने में जुटी पुलिस और सतर्कता से काम ले रही है।

‘दिल्ली ही नहीं रही तो कहॉं बेचोगे अपना झूठ’: लॉकडाउन में पलायन पर चौतरफा घिरे CM केजरीवाल

कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए देशभर में 21 दिन का लॉकडाउन है। बावजूद इसके दिल्ली-यूपी बॉर्डर से हैरान करने वाली तस्वीरें आ रही है। यूपी-बिहार के अपने गॉंवों की ओर लौटने के लिए जुटे लोगों की भारी भीड़ से लॉकडाउन की सार्थकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस​ स्थिति के लिए अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि मजदूरों को गुमराह कर बॉर्डर पर भेजा गया।

इस मामले को लेकर केजरीवाल चौतरफा घिरते जा रहे हैं। न केवल विपक्षी दल बीजेपी के कपिल मिश्रा, मनोज तिवारी, गौतम गंभीर प्रवेश वर्मा जैसे नेताओं ने मुख्यमंत्री पर सवाल उठाए हैं, बल्कि आशुतोष जैसे पत्रकार जो आप में रह चुके हैं ने भी केजरीवाल सरकार को घेरा है।

पूर्व क्रिकेटर और बीजेपी सांसद गौतम गंभीर ने इसे शर्मनाक कृत्य करार देते हुए ट्विटर पर लिखा, “दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल को औरों पर आरोप लगाने के लिए चुना है क्या? इस स्थिति में भी सारी जवाबदेही PM और बाकी राज्यों के CM पे डाल दी! 500 करोड़ के advertisement budget में 2 लाख लोगों का खाना आ जाएगा। अगर दिल्ली ही नहीं रहेगी तो कहाँ बेचोगे अपने झूठ को?”

वहीं दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने लिखा, “अरविंद केजरीवाल जी DTC बसों में लोगों को भर दिल्ली बॉर्डर पर इकट्ठा तो करवा दिए आप। CM साहेब हाथ जोड़ कर विनम्र निवेदन है कि 15 दिनों का राशन हर परिवार को दें और उन्हीं बसों में इनको वापिस दिल्ली में जहाँ रहते हैं वहाँ छुड़वा दें, नहीं तो ये गंभीर समस्या का रूप ले लेगा।”

भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने इसको लेकर केजरीवाल से एक के बाद एक कई सवाल दागे। उन्होंने एक ट्वीट में लिखा, “दिल्ली के गरीबों में भगदड़ क्यूँ? क्योंकि ग्राउंड पे सरकार गायब है। दिल्ली सरकार सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस, विज्ञापनों में बिजी है। लेबर्स गए तो राशन और दवाई की सप्लाई भी ठप्प होगी।”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने दिल्ली-यूपी बॉर्डर के कौशाम्बी की तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा कि ये तस्वीरें देखकर रोना भी आ रहा है और गुस्सा भी। एक फेल दिल्ली सरकार जो गरीबों को भरोसा ही नहीं दे पाई। चंद एजेंडा पत्रकार जिन्होंने 24 घंटे हौवा खड़ा किया और इन गरीबों में दहशत पैदा की। देश की कोरोना के खिलाफ लड़ाई कहीं यहीं से फेल ना हो जाए। उन्होंने एक ट्वीट में लिखा कि अभी इस समय आनंद विहार दिल्ली में 2 लाख से ज्यादा की भीड़ है। दिल्ली की निकम्मी राज्य सरकार और चंद एजेंडा पत्रकारों ने पूरे देश को इस आग में झोंक दिया है। इसी तरह एक ट्वीट में कपिल मिश्रा ने पूछा कि आखिर केजरीवाल चाहते क्या हैं?

कपिल मिश्रा ने कई विडियो जारी कर केजरीवाल सरकार की पोल खोली है। एक वीडियो में दिख रहा है कि दिल्ली की गलियों में माइक से अनाउंसमेंट किए जा रहे हैं। इस अनाउंसमेंट में कहा जा रहा है कि आनंद विहार के लिए बसें जा रही हैं, उससे आगे यूपी-बिहार के लिए बसें मिलेंगी। सोते हुए लोगों को उठा-उठा कर बसों से उप्र बॉर्डर पर भेजा गया। कपिल मिश्रा ने इसे सोची-समझी साजिश करार दिया। इसी के साथ उन्होंने केजरीवाल को डीटीसी बसें बन्द करने, झूठी प्रेस कॉन्फ्रेंस और विज्ञापन बन्द करने के साथ ही बेसिक सुविधाओं को मैनेज करने की सलाह देते हुए कहा कि लोगों को खाना, राशन सच में बँटवाएँ।

वहीं पत्रकार आशुतोष ने केजरीवाल पर निशाना साधते हुए हुए ट्वीट किया, “क्या आपने आनंद विहार पर दिल्ली सरकार के किसी नुमाइंदे को देखा? कहाँ है दिल्ली के मुख्यमंत्री? ये सारे वही लोग वहाँ इकट्ठा हैं, जिन्होंने एक महीना पहले केजरीवाल को वोट दिया। आज ये अपने को अनाथ महसूस कर रहे हैं! ये पार्टी कहती है कि ये आम आदमी की बात करती है।”

बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने भी सीएम पर सवाल खड़े करते हुए कहा, 22 मार्च को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया कि 31मार्च तक दिल्ली के बॉर्डर सील रहेंगे। किसने अफवाह फैलाई और कौन बसें भर-भर के लोगों को बॉर्डर पर छुड़वा रहा है? दिल्ली में अलग ही आपातकालीन स्थिति उत्पन्न कर करोड़ों लोगों की ज़िन्दगियों से खेलने का क्या मतलब है?

प्रवासी मजदूरों का दिल्ली छोड़ना: पलायन या षड्यंत्र? 5 आँकड़े और 3 स्क्रीनशॉट से समझें हकीकत

बीते 4 दिनों से दिल्ली से बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिकों का पलायन हो रहा है। हालत ये है कि दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर लोगों की भीड़ जमा हो गई। ऐसी हालत तब है, जब देश में लॉकडाउन है। लोगों को घरों में रखने के लिए देश में अघोषित कर्फ्यू जैसे हालात हैं।

फिर सवाल उठता है, आखिर दिल्ली से इतनी बड़ी भीड़ पैदल ही सौ-हजार या हजार से ज्यादा किलोमीटर की यात्रा कर घर जाने को क्यों मजबूर हुई? उन दावों का क्या हुआ, जिसमें कहा जा रहा था कि दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने कोरोना वायरस की स्थिति सँभालने के लिए बढ़िया काम किया है? 

इन प्रश्नों को जानने-समझने की जरूरत है।

खाने-रुकने की बेहाल व्यवस्था

दिल्ली सरकार द्वारा कहा गया कि दिल्ली पूरी तरह तैयार है। बीते एक सप्ताह से यह कहा जा रहा है कि दिल्ली के विश्वस्तरीय शेल्टर होम में खाने-रहने की व्यवस्था की गई है। लेकिन आँकड़े इसकी गवाही नहीं देते।

शेल्टर होम के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली सरकार के पास 223 शेल्टर होम हैं। यहाँ जाने वाले कुल लोगों की संख्या में 4 दिनों में 2 से 3 गुना इजाफ़ा हुआ है। लेकिन रोचक बात ये है कि लोगों की संख्या सभी शेल्टर होम में नहीं बढ़ी है। 223 में से 30 से भी कम शेल्टर होम में लोगों की आवाजाही ज्यादा बढ़ी, बाकी जगहों पर आज भी जाने वाले लोगों की संख्या 20 से 50 ही है।

यही नहीं, बीते 4 दिनों में शेल्टर होम में भीड़ में खाना खिलाने और खाने की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे थे। स्थिति ये थी कि जब आलोचना अधिक होने लगी तो केजरीवाल के मीडिया सलाहकार रहे नागेन्द्र शर्मा ने कहा कि यमुना विहार में अभी तक 2000 लोगों को खाना खिलाने की व्यवस्था थी लेकिन उस दिन अचानक से 7000 लोग आ पहुँचे। इसलिए ऐसी नौबत आई।

जबकि आँकड़े बताते हैं कि यमुना पुश्ता नाम के शेल्टर होम में सबसे अधिक लोग पहुँचे, लेकिन वहाँ भी आँकड़ा एक समय में 7000 का नहीं हुआ, जैसा बताया गया। कई शेल्टर होम में तो खाने की व्यवस्था भी नहीं थी, जहाँ दिल्ली पुलिस की मदद से भोजन के पैकेट पहुँचाए गए।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केजरीवाल सरकार को अंदाजा हो गया था कि उसे लोगों को खिलाने की व्यवस्था करनी पड़ेगी, इसलिए शुरुआती 4 दिनों में कम लोगों की व्यवस्था की और लोगों को दिल्ली से भागने दिया गया?

यहाँ पर गौर करने वाली बात ये भी है कि जब 223 शेल्टर होम में महज 20000 लोगों की ही व्यवस्था हो सकती है तो सरकार कैसे यह दावा कर रही है कि 235 स्कूलों में 2 लाख लोगों तक उसने खाना पहुँचाया! कहा यह भी गया कि लंच और डिनर दोनों दिए जा रहे है लेकिन भीड़ में खिचड़ी परोसते विडियो वायरल हुए।

अब ऐसे में दिल्ली के लाखों दिहाड़ी मजदूर क्या करते, जब राज्य सरकार की ओर से कोई इंतजाम ही नहीं किया गया!

गैर-निवासियों के साथ भेदभाव 

राज्य सरकार द्वारा जितनी भी घोषणाएँ की गईं, वे सब दिल्ली के नागरिकों के लिए थे। कंस्ट्रक्शन क्षेत्र के मजदूरों के लिए सहायता राशि की घोषणा में वे दिहाड़ी मजदूर शामिल नहीं थे, जो बड़ी संख्या में गैर पंजीकृत थे लेकिन कंस्ट्रक्शन कंपनी अथवा ठेकेदारों के साथ कार्य करते थे। दिल्ली छोड़कर जा रहे मजदूरों ने यह इल्जाम भी लगाया कि हेल्पलाइन नंबरों पर उन्हें न तो कोई मदद मिली, न कोई आश्वासन। यहाँ तक कि आवासीय प्रमाण पत्रों की माँग की गई और जो दिल्ली के नहीं थे, उनके साथ भेदभाव किया गया, उन्हें खाने को नहीं मिला।

बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था से मुँह छिपाने की कोशिश

कोरोना वायरस जहाँ से शुरू हुआ, उस वुहान (चीन) में हुए एक अध्ययन से ये बात सामने आई कि वायरस की चपेट में आए लोगों में साँस लेने की दिक्कत होती है। कोरोना पॉजिटिव मरीजों में से 5 प्रतिशत मरीजों को ICU अर्थात इंटेंसिव केयर यूनिट की आवश्यकता पड़ती है। वही 2.3 प्रतिशत मरीजों को वेंटिलेटर की नितांत जरूरत पड़ती है। नार्मल साँस लेने की दर प्रति मिनट 15 होती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति 28 साँस/मिनट के आँकड़े को छू ले तो उसकी स्थिति सँभालने के लिए वेंटिलेटर अवश्य चाहिए होता है।

बात अगर दिल्ली के पास उपलब्ध वेंटिलेटर की करें तो 2 दिसंबर 2019 को दिल्ली विधानसभा में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि केवल 466 वेंटिलेटर हैं दिल्ली में, जिनमें से 23 काम नहीं कर रहे, वहीं 11 को ठीक करवाने की प्रक्रिया चल रही थी। यानी केवल 432 वेंटीलेटर काम के हैं। बीते तीन महीनों में इजाफ़ा नहीं हुआ, क्योंकि इसी जबाब में यह कहा गया कि कोई माँग लंबित नहीं है।

बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। दिल्ली के किन-किन अस्पतालों में ICU की सुविधा उपलब्ध है, इस प्रश्न के जबाब में दिल्ली सरकार के दिए आँकड़े और अचंभित करते हैं। दिसंबर, 2019 में ही विधानसभा के पटल पर दिए जबाब के मुताबिक दिल्ली के 28 अस्पतालों की सूची दी गई, जिनमें से 12 में ICU ही नहीं हैं। वही 6 अस्पतालों में वेंटिलेटर की कोई सुविधा नहीं है। 28 में से एक अस्पताल के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

आज न्यू यॉर्क जैसे बेहतरीन हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर वाले शहर की कमर टूट चुकी है। वहाँ हालत ये है कि वेंटिलेटर की आवश्यकता पूरी करने के लिए अमेरिकी सरकार को निजी कंपनियों से मदद लेनी पड़ रही है। ऐसे में कोरोना वायरस से लड़ने की तैयारी को दिल्ली की आबादी के साथ जोड़कर देखें तो भले ही मुख्यमंत्री केजरीवाल बड़े-बड़े दावे कर रहे हों, 434 वेंटिलेटर और 16 ICU वाले अस्पतालों से कोरोना की जंग कितना लड़ पाएँगे, कहना मुश्किल नहीं है।

ICU और वेंटिलेटर तक ही बात सीमित नहीं है। दिल्ली सरकार ने कोरोना की जाँच के बाद अच्छी सुविधाएँ मुहैया न होने से झल्लाए मिडल क्लास के लिए तो 3100 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से प्राइवेट आलिशान होटल मुहैया करवा कर उनका मुँह बंद करवा दिया लेकिन अगर गरीब लोग बड़ी संख्या में कोरोना के मरीज बने या मरीजों के चपेट में आ गए तो उन्हें रखेंगे कहाँ, यह समस्या भी दिल्ली सरकार के सामने खड़ी है।

हाल में जारी दिल्ली सरकार के इकॉनमिक सर्वे (2019-20) की मानें तो वर्तमान में यहाँ के सरकारी अस्पतालों में केवल 11770 बेड हैं। दिल्ली के सभी अस्पतालों में उपलब्ध बेड की बात करें तो कुल 57709 बेड मरीजों के लिए उपलब्ध है। प्रतिशत में देखें तो 52 प्रतिशत बेड प्राइवेट अस्पतालों में है, वहीं केंद्र सरकार, MCD के अस्पतालों में 28 प्रतिशत। महज 20 प्रतिशत हिस्सा दिल्ली सरकार के अस्पतालों में है।

सभी तरह के अस्पतालों में उपलब्ध बेड को दिल्ली की आबादी के हिसाब से देखें तो 2011 में प्रति हजार लोगों पर 2.50 बेड उपलब्ध थे, यह संख्या 2018 तक आते-आते 2.94 हुआ। यानी एक हजार लोगों के ऊपर अस्पतालों में आज भी 3 ही बेड उपलब्ध है। इसलिए दो करोड़ की आबादी में 11770 बेड वाले अस्पतालों के मालिक प्रवासी लोगों से भयभीत हों तो स्थिति समझना कठिन नहीं है।

यही नहीं। दिसंबर 2019 तक दिल्ली में चल रहे जिन 315 मोहल्ला क्लिनिक को वर्ल्ड क्लास कहा गया, वहाँ न तो कोरोना का टेस्ट हो सकता है, न ही वहाँ कोरोना के मरीजों के इलाज अथवा रुकने की व्यवस्था है। अफ़सोस, जब पूरा देश कोरोना से जंग लड़ रहा है, मोहल्ला क्लिनिक से कोरोना के मरीज ही निकले, वे कोरोना से लड़ने की जगह नहीं बन पाए। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो आज हालत यह है कि जबसे यह पता चला है एक डॉक्टर कोरोना पॉजिटिव निकला है, कई मोहल्ला क्लिनिकों में डॉक्टर ही नहीं आ रहे। अधिकांश मोहल्ला क्लिनिक न साफ़-सुथरे हैं, न ही कोरोना वायरस से बचने के वहाँ कोई उपाय!

बिहार विरोधी राजनीतिक षड्यंत्र

24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा के बाद जहाँ देश एकतरफ लोगों को घरों में रखने के लिए प्रेरित करने में जुटा था, उपलब्ध संसाधनों के साथ वायरस को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा था, केजरीवाल के सलाहकार प्रशांत किशोर और आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया के बड़े चेहरे अंकित लाल #ShameOnNitishKumar का ट्रेंड चलाने और आपदा के समय बिहार की सर्वविदित कमियों को उजागर करने में व्यस्त थे। यहाँ तक कि 27 मार्च को अंकित लाल गाज़ियाबाद के पास जाकर प्रवासी मजदूरों के पलायन का लाइव स्ट्रीमिंग करने और प्रशासनिक विफलता की बात कर रहा था। यह समझना कठिन नहीं है कि सोशल मीडिया ट्रेंड और लाइव स्ट्रीमिंग क्यों और किसके कहने पर चलाए गए होंगे।

जब बड़ी संख्या में पलायन की ख़बरें 24 मार्च से ही आने शुरू हुए, तबसे लेकर अगले 4 दिनों तक किसी भी तरह के उपाय की घोषणा दिल्ली सरकार द्वारा नहीं की गई, जो प्रवासी श्रमिकों के भले के लिए हो, उन्हें राहत पहुँचाए। पलायन रोकने के लिए भी कोई पहल नहीं की गई। जब स्थिति आउट ऑफ़ कंट्रोल होने लगी तो पहले स्कूलों में लंगर चलाने के आँकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का काम हुआ, फिर पब्लिसिटी बटोरने के लिए सिसोदिया प्रवासी मजदूरों के साथ विडियो शेयर करके अपने कर्तव्यों से इतिश्री कर रफू-चक्कर हो गए। दिल्ली सरकार चलाने वाले इस बात को भी समझते हैं कि जिस तरीके से दुनिया के बड़े शहरों जैसे न्यू यॉर्क, न्यूजर्सी में कोरोना का दहशत पैदा हुआ है, अस्पताल परेशान है, संसाधन नहीं है, वैसी स्थिति दिल्ली में बनी तो केजरीवाल की बनी बनाई छवि बर्बाद हो जाएगी। इसलिए गरीबों की मौत का ठीकरा किसी और पर फूटे, इसलिए भी लोगों को दिल्ली से भगाने की कोशिशों को अंजाम दिया गया।

14 दिन बॉर्डर पर रखे जाएँगे बिहार लौट रहे लोग, UP लौटे 1 लाख लोग भी होंगे क्वारंटाइन

देश भर के सभी शहरों में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने 14 अप्रैल तक पूरे देश में लॉकडाउन घोषित कर रखा है। लेकिन फिर भी लोग खासकर दिल्ली से बिहार और उत्तर प्रदेश के अपने गाँवों की ओर लौट रहे हैं। इनके समूह में निकलने के कारण संक्रमित होने का खतरा बढ़ गया है। ऐसे में ये अगर अपने घर पहुॅंचे तो संक्रमण गॉंवों में भी फैल सकता है। इसे देखते हुए बिहार सरकार ने बाहरी राज्यों से आने वाले सभी लोगों को राज्य की सीमा पर ही 14 दिन के लिए क्वारंटाइन करने का फैसला किया है।

यानी कि अब शहरों से पलायन करने वाले प्रवासी मजदूर बिहार पहुँचने पर सीधे अपने गाँव नहीं जा सकेंगे। बिहार के मंत्री संजय कुमार झा ने बताया कि दूसरे राज्यों से पहुँचने वाले सभी प्रवासी मजदूरों को 14 दिन तक बॉर्डर पर राहत केंद्रों में क्वारंटाइन किया जाएगा। क्वारंटाइन सेंटर में सभी को खाने-पीने के साथ जरूरी सुविधाएँ दी जाएँगी।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दूसरे राज्यों से बिहार आ रहे प्रवासी मजदूरों के रहने के लिए कैंप बनाने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि ये कैंप बिहार के सीमावर्ती जिलों में बनाए जाएँगे। यहाँ दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों को रखा जाएगा। इस कैंप में भोजन-कपड़े और डॉक्टरी जाँच की सुविधा होगी। सीएम नीतीश कुमार ने मुख्य सचिव दीपक कुमार को ‘आपदा सीमा राहत शिविर’ बनाने के निर्देश दिए है। ये शिविर नेपाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से सटे जिलों में बनाए जाएँगे।

सीएम नीतीश कुमार ने कहा, “लोग यदि अपने घर तक पहुँच गए तो लॉकडाउन का उद्देश्‍य निरर्थक साबित हो जाएगा। अगले कुछ दिन में इससे वायरस ज्‍यादा तेजी से फैलेगा। लोगों को वापस घर भेजने की बजाय, बेहतर यही होगा कि लोकल लेवल पर कैम्‍प लगाएँ जाएँ। राज्‍य सरकार उन कैम्‍पों का खर्च वहन करेगी।”

इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार (मार्च 28, 2020) को अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि दूसरे राज्यों से प्रदेश में आ रहे करीब 1 लाख लोगों को क्वारंटाइन में रखा जाए। योगी सरकार ने बयान जारी कर कहा है कि जो भी लोग पिछले तीन दिनों में दूसरे राज्यों से यूपी में आए हैं, उनके नाम, पते और फोन नंबर अलग-अलग जिलों के डीएम को मुहैया करा दिए गए हैं। उनकी निगरानी का काम भी शुरू हो गया है। खुद मुख्यमंत्री ने आदेश दिया है कि जिन्हें भी क्वारंटाइन में रखा जाएगा, उनके लिए खाने और रोज की जरूरतों पर भी ध्यान दिया जाएगा। सीएम योगी ने कहा कि राज्य में लॉकडाउन के दौरान किसी को भी भूखा नहीं रहना पड़ेगा। उन्होंने अफसरों को जल्द से जल्द सप्लाई चेन मजबूत करने के भी आदेश दिए हैं।