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गायब धर्मेन्द्र की खोज में 7 दिन से भटकता पिता और रोती माँ: दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा, बृजपुरी से ग्राउंड रिपोर्ट

दिल्ली में सीएए विरोध के नाम पर हुई हिंदू विरोधी दंगे की आग सातवें दिन ठंडी तो पड़ गई, लेकिन इस हिंसा में पीड़ित लोगों की आँखों के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे। कोई अपनों के अंतिम दर्शन करने के इंतजार में आँसू बहा रहा है तो कोई अपनों के न मिलने के गम में। कुछ ऐसी ही कहानी है हिंदू विरोधी दंगों के बीच गायब हुए धर्मेंन्द्र वर्मा की। सात दिन से धर्मेंद्र के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।

दिल्ली में चाँद बाग से शुरू हुई हिंदू विरोधी हिंसा के सात दिन बाद ऑपइंडिया की टीम दंगा पीड़ितों से मुलाकात करती हुई बृजपुरी पहुँची। कुछ हिंदू पीड़ित अपने घरों पर ताला लटकाकर जा चुके हैं तो शेष हिंदू पीड़ित अपने घरों में पिछले सात दिनों से डर के मारे कैद हैं। कुछ ऐसा ही देखने को मिला सात दिन पहले दंगों के बीच गायब हुए धर्मेन्द्र के यहाँ। हिंदू बहुल इस इलाके की गली में सन्नाटा पसरा हुआ था। कुछ लोग जरूरी काम से ही घरों से निकलते दिखाई दे रहे थे। हम पूछताछ करते हुए दंगों के बीच गायब हुए धर्मेद्र वर्मा के यहाँ पहुँच गए। दरवाजे से आवाज देने के बाद ऊपर परिवार के कुछ सदस्य एक के बाद एक नीचे की ओर झाँके तो हमने उन्हें अपना परिचय देते हुए बात करने और घटना के संबंध में अधिक जानकारी लेने की इच्छा जताई।

परिवार के मौजूद सदस्य बेटे की चिंता में बदहवास माँ को पकड़कर सीढ़ियों से नीचे लेकर आते हैं, लेकिन वह कुछ भी बोलने में असमर्थ थीं। इसके बाद मौजूद बड़े भाई धीरेन्द्र वर्मा ने बताया, “मुस्लिम महिलाओं का सीएए के विरोध में बीते रविवार को ही धरना शुरू हो गया था। उसी दिन शाम करीब पाँच बजे छोटा भाई धर्मेन्द्र वर्मा बाहर घूमने की बात कहकर घर से निकल गया। देर शाम को जानकारी मिली कि जाफराबाद की ओर हिंसा शुरू हो गई है। रात के करीब आठ बज चुके थे, लेकिन ध्यान में आया कि छोटा भाई अभी तक घर नहीं लौटा है। इसके बाद हम परिवार के लोग परेशान उसे ढूँढने के लिए निकल पड़े। देर रात तक हमें उसका कोई सुराग नहीं लग सका।”

बड़े भाई धीरेन्द्र के मुताबिक अगले दिन सुबह से ही वो धर्मेन्द्र को खोजने निकड़ पड़े। इसी बीच सोमवार को इलाके में हालात इतने बेकाबू हो गए थे कि उन्हें मजबूरन खाली हाथ अपने घरों को वापस लौटना पड़ा। इसके बाद उन्होंने अपने आस-पास जानने वाले और दूर रह रहे सगे-संबंधियों मे फोन करके पता किया। यहाँ तक कि उन्होंने जीटीबी अस्पताल में जाकर वहाँ घायल लोगों में और वहाँ रखे शवों में भी धर्मेन्द्र की पहचान की, लेकिन कोई सुराग नहीं लग सका। घर में धर्मेंद्र की माँ और छोटे भाई का रो-रोकर बुरा हाल है।

धीरेंद्र आगे बताते हैं, “सोमवार को बाहर का माहौल इतना खराब हो चुका था कि हम चाहकर भी नहीं निकल सकते थे। इतना ही नहीं हम तीन दिनों तक सभी भूखे-प्यासे, रोते-बिलखते अपने घरों में कैद रहे। थोड़ा माहौल शांत हुआ तो हमने पुलिस को लिखित में धर्मेन्द्र के ग़ायब होने की जानकारी दी। पुलिस ने हमें हर संभव मदद का भरोसा दिया, लेकिन आज सात दिन हो गए और धर्मेन्द्र का अभी तक कोई अता-पता नहीं चला है।”

वहीं आस-पास में खड़े लोगों ने बताया कि धर्मेन्द्र के ग़ायब होने के बाद उसकी माँ ने चार दिनों तक खाना नहीं खाया। तबियत ज्यादा खराब होने पर लोगों ने उनको जबरदस्ती खाना खिलाया है। इतना ही नहीं, धर्मेन्द्र की माँ को देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। धीरेन्द्र ने बताया कि वो पूरे दिन माँ की देखभाल करते हैं, उनको संभालते हैं। जबकि धर्मेंद्र के पिता वीरसहाय हर रोज सुबह बिना कुछ खाए-पिए अपने बेटे को खोजने निकलते हैं, लेकिन देर रात हताश होकर खाली हाथ घर लौट आते हैं।

दरअसल बृजपुरी इलाके में रहने वाला 15 वर्षीय धर्मेन्द्र वर्मा (पुत्र वीरसहाय) अपने तीन भाइयों में दूसरे नंबर का था। परिवार की माली हालत खराब होने के कारण वो एक फैक्ट्री में पिछले कुछ दिनों से पढ़ाई छोड़कर काम सीखने के लिए जाता था। धर्मेन्द्र के पिता और उसके बड़े भाई धीरेन्द्र एक फैक्ट्री में मजदूर का काम करके अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं।

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‘कभी 100% हिन्दू राज्य था कश्मीर, वहाँ के म्यूजियम में जरूर जाइए, स्पष्ट तस्वीर दिखेगी’ – फारूक खान

जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल गिरिश चंद्र मुर्मू के सलाहकार फारूक खान ने शनिवार (फरवरी 29, 2020) को गुजरात में ‘इंडिया आइडिया कॉन्क्लेव’ में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने कश्मीर को लेकर बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि एक समय में कश्मीर 100 फीसदी हिंदू राज्य हुआ करता था। इसके साथ ही उन्होंने कश्मीरी पंडितों को सम्मानपूर्वक घर वापसी कराने को अपने मुख्य उद्देश्य बताया।

उन्होंने कहा, “हम में से बहुत ही कम लोगों को पता है कि कश्मीर कभी 100 फीसदी हिंदू राज्य था। जो लोग भी वहाँ जाते हैं, उन्हें कश्मीर म्यूजियम जरूर जाना चाहिए और देखना चाहिए कि वहाँ क्या है, वो आपको प्राचीन कश्मीर के इतिहास की स्पष्ट तस्वीर दिखाता है। इससे आपको प्राचीन कश्मीर को समझने में मदद मिलेगी।”

कॉन्क्लेव में बोलते हुए आगे खान ने कहा, “हमारे लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण लक्ष्य अपने उन सभी कश्मीरी पंडित भाई-बहनों को पूरे सम्मान के साथ वापस लाना है, जिन्हें बंदूक की नोंक पर धमकी के तहत राज्य छोड़ना पड़ा था। हम उन्हें पूरे सम्मान के साथ वापस लेकर आएँगे और वह बिना किसी डर और खतरे के कश्मीर में खुशहाल जीवन जी सकेंगे।”

बता दें कि फारुक खान ने साल 1984 में एक सब-इंस्पेक्टर के तौर में जम्मू-कश्मीर में अपना करियर शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने पुलिस महानिरीक्षक के पद पर अपनी सेवाएँ दीं। पिछले साल ही उन्होंने तत्कालीन राज्यपाल सत्य पाल मलिक के सलाहकार के रूप में पदभार सँभाला था। फिलहाल वो जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल के सलाहकार हैं।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटा दिया था। साथ ही जम्मू-कश्मीर के 2 हिस्से कर दिए थे। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख 2 अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिए गए थे। इसी के तहत जम्मू-कश्मीर में उपराज्यपाल की नियुक्ति हुई।

वहीं जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू ने शनिवार को कठुआ जिले में शहरी स्थानीय निकायों और पंचायती राज्य संस्थाओं के विभिन्न प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के दौरान कहा कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति से नौकरियों और जमीन से संबंधित कोई नुकसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि दूरदराज के और सीमावर्ती क्षेत्रों के हर घर तक पानी, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएगी।

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दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों की वीभत्स तस्वीरें अभी तक सामने आ रही हैं और न जाने कितनी अभी आनी बाकी हैं। 24 फ़रवरी की शाम जब दिल्ली में हिंसा भड़की थी, उसी शाम इन दंगों की क्रूर वास्तविकता का शिकार 20 साल के दिलबर सिंह नेगी को होना पड़ा था। दिलबर सिंह नेगी को दंगाइयों की भीड़ ने तलवार से काटने के बाद जलते हुए घर में आग के हवाले कर दिया था।

दंगाइयों ने दिलबर सिंह नेगी के हाथ और पैर काटने के बाद उनके शरीर के बाकी हिस्से को जलती आग में फेंक दिया था। इस घटना का पता सबसे पहले ऑपइंडिया के माध्यम से लग पाया था, जब मृतक दलबीर के परिजनों ने हमसे संपर्क स्थापित कर इस भयावह हादसे की सूचना दी थी। दिलबर उत्तराखंड से सिर्फ 6 महीने पहले ही दिल्ली आए थे। वो शिव विहार स्थित एक मिठाई की दुकान पर काम करते थे।

संलग्न किए गए इस ट्वीट में आप मृतक दिलबर सिंह के जले हुए शरीर को देख सकते हैं। इसमें स्पष्ट दिख रहा है कि शरीर से हाथ और पैर गायब हैं, जबकि शरीर का बाकी हिस्सा राख के ढेर में मौजूद है। यानी जलने से पहले उनके शरीर के इन भागों को काट दिया गया था।

Note: विडियो बहुत ही खौफनाक है। इसलिए संपादकीय नीति के तहत हम इसका ट्वीट यहाँ डायरेक्ट एम्बेड नहीं कर रहे हैं। अगर फिर भी आप देखना चाहते हैं तो इसे यहाँ क्लिक कर देख सकते हैं।

दिलबर सिंह उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के निवासी थे। फिलहाल उत्तराखंड सरकार ने मृतक के परिजनों को पाँच लाख रुपए की आर्थिक सहायता राशि देने की घोषणा की है।

दिलबर सिंह नेगी उत्तराखंड के पौड़ी जिले स्थित थलीसैण ब्लॉक से सम्बन्ध रखते थे। उनके करीबी श्याम सिंह ने ऑपइंडिया को बताया कि 23 फ़रवरी की शाम कुछ दंगाई शाहदरा इलाके में शोर मचाते हुए घुसे। दंगाइयों ने नेगी को अपना पहला निशाना बनाया। उनके हाथ-पैर काट दिए। फिर पास की दुकान में लगी आग में झोंक दिया। उनके साथ बिल्डिंग में उनके दो अन्य साथी भी मौजूद थे लेकिन वो वहाँ से भाग निकलने में कामयाब रहे।

26 फरवरी को जब दुकान मालिक अनिल पाल पुलिस के साथ अपनी दुकान का हाल जानने वहाँ पहुँचे तो उन्हें मृतक नेगी का शरीर दूसरी मंजिल पर सीढ़ी के पास मिला, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो दंगाइयों को देखकर बिल्डिंग से कूदने की कोशिश कर रहे थे।

उत्तरपूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर, चाँदबाग, शिव विहार, भजनपुरा, यमुना विहार इलाकों में हिंसा में कम से कम 42 लोगों की मौत हो गई और 200 से अधिक लोग घायल हो गए। इन दंगों में व्यक्तिगत से लेकर सार्वजनिक संपत्ति को काफी नुकसान पहुँचा है। उग्र भीड़ ने मकानों, दुकानों, वाहनों, एक पेट्रोल पम्प को फूँक दिया और स्थानीय लोगों तथा पुलिस कर्मियों पर गोलीबारी, पेट्रोल बम से हमले किए।

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दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में 42 मौतों की पुष्टि हो चुकी है। 250 से भी अधिक लोग घायल हुए हैं। इन मुस्लिम दंगाइयों की भयावहता और पूर्व नियोजित साजिश की पोल एक-एक कर खुलती जा रही है। इन्होंने हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए पहले से ही तैयारी कर रखी थी और इसी के तहत इस खूनी दंगे को अंजाम दिया गया। विरोध-प्रदर्शन के नाम पर हिंदुओं के घरों को जलाया गया, उनकी दुकानों में तोड़-फोड़ की गई, तो कहीं ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘नारा-ए-तकबीर’ के साथ मुस्लिम भीड़ ने विनोद नाम के हिंदू शख्स की जान ले ली। इसी तरह शिव विहार की छतों पर पत्थर और बम दूर तक फेंकने के लिए गुलेल का इस्तेमाल किया गया।

शिव विहार के स्थानीय निवासी बताते हैं कि इस हिंसक दंगे को अंजाम देने से एक घंटा पहले यहाँ के वर्तमान AAP विधायक हाजी युनूस ने हिंदू बहुल इलाके में शांति मार्च निकाला था। हिंदू बहुल इलाके में इस शांति मार्च के जरिए ये कहा गया कि शांति बनाए रखें। लेकिन इसके बाद क्या हुआ और क्या किया गया, असल खबर वही है। हिन्दुओं के इलाकों से शांति मार्च निकालने के बाद विधायक हाजी युनूस बगल की एक मस्जिद में जाते हैं, वहाँ मीटिंग करते हैं… और फिर हिंदुओं के ऊपर 400 लीटर पेट्रोल के साथ हमला किया जाता है।

इसके बाद पूर्व विधायक भीष्म शर्मा के स्कूल को तहस-नहस कर दिया जाता है। स्कूल के 30 साल का रिकॉर्ड सब राख हो चुका है। इसी तरह शिव विहार तिराहे के पास के डीआरपी स्कूल को जला दिया गया, जो एक हिन्दू का था। उसके बगल में एक मुस्लिम का स्कूल था, उसको कुछ भी नुकसान नहीं हुआ है, जबकि हिन्दू के स्कूल को पूरी तरह से जलाकर खाक कर दिया गया।

इन खूनी दंगों से यहाँ के हिन्दू इतने ज्यादा दहशत में हैं कि उनका कहना है कि ऐसे माहौल में वो यहाँ नहीं रह सकते हैं। पीड़ितों में से एक ने कहा, “अगर यही माहौल रहा तो हम यहाँ नहीं रहेंगे, गाँव से जमीन बेचकर यहाँ आए थे, अब यहाँ से बेचकर कहीं और चले जाएँगे। मेरी बेटी गार्गी कॉलेज में पढ़ती है। वह 5 दिन से घर लौटकर नहीं आई है। वो अपनी दोस्त के साथ पीजी में रूकी हुई है।”

उन्होंने आगे कहा, “यहाँ बीच में एक गंदा नाला है। यहाँ पर एक पुलिया बनाया गया है, जहाँ से वो लोग इधर आए। हमारे हिंदू बेल्ट के एक भी भाई उस तरफ नहीं गए। वो हमारी कॉलोनी में आकर घुसे हैं। हिंदू उधर नहीं गए। उन्होंने हम पर हमला किया है। हमने नहीं किया है। पिछले 5 साल यहाँ पर बीजेपी का विधायक रहा, एक पत्ता तक नहीं हिला। चुनाव तक माहौल बिल्कुल ठीक था। मगर इसके बाद जैसे ही मुस्लिम विधायक जीतकर आया है, परिस्थितियाँ अचानक से बदल गईं। मुस्लिम विधायक ने हमारे ऊपर अत्याचार करने शुरू कर दिए।”

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दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की प्लानिंग: एक सप्ताह पहले आ गई थीं ईंटें, ताहिर हुसैन के घर के पास 7 ट्रक पत्थर

ग्राउंड रिपोर्ट: बृजपुरी मस्जिद की तरफ से आए दंगाई और राहुल को मार दी गोली…

दिल्ली दंगों की ग्राउंड रिपोर्टिंग: अजीत भारती का विश्लेषण | Ground Reporting in Delhi Riots and Ajeet Bharti Analysis

पिछले दिनों दिल्ली में हुए दंगों में इस्लामिक कट्टरता का घिनौना रूप देखने को मिला। दिलवर सिंह नेगी के हाथ-पैर काटकर उसे जलती हुई दुकान में फेंक दिया गया। कॉन्स्टेबल रतन लाल को इरादतन घेर कर मार डाला गया। एक बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से हिन्दुओं का नरसंहार करने की कोशिश की गई, जिसमें कितने ही मासूम हिन्दुओं को धार्मिक घृणा का शिकार बनाया गया।  

ऊपर से एक फर्जी नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है कि मरने वाले दोनों तरफ के हैं। दोनों तरफ के लोगों की जानें गईं। लेकिन हकीकत तो ये है हिन्दुओं की नृशंस हत्या करने और उनके घरों-दुकानों को जलाने के लिए कई दिन पहले ही सात ट्रकों में भरकर पत्थर ताहिर हुसैन की छत पर जमा हो गए थे। वहीं शिव विहार के लोगों का कहना है कि हाजी युनुस ने पास की मस्जिद में जाकर एक लंबी मीटिंग की और उसके बाद लगभग 400 लीटर पेट्रोल से हिन्दुओं और उनके घरों-दुकानों पर हमला किया गया।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की प्लानिंग: एक सप्ताह पहले आ गई थीं ईंटें, ताहिर हुसैन के घर के पास 7 ट्रक पत्थर

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगे कोई अकस्मात घटने वाली घटना नहीं थी, बल्कि यह एक पूर्व नियोजित और पूरी तैयारी के साथ रची गई साजिश थी। दंगे के बाद से ही सबके मन में यही सवाल उठ रहा था कि अचानक उपद्रवियों के हाथ में तेजाब की थैलियाँ, पेट्रोल बम, ड्रम, ईंट-पत्थर और गुलेल आदि कहाँ से आए। अब धीरे-धीरे इस पर से पर्दा उठता जा रहा है और कई खुलासे हो रहे हैं।

ताजा खुलासे में पता चला है कि खौफ और खून से सने इन दंगों को अंजाम देने के लिए ये ईंट-पत्थर एक सप्ताह पहले से ही इकट्ठा करना शुरू कर दिया गया था। बताया जा रहा है कि इस हिंसा के लिए ट्रैक्टरों की मदद से एक हफ्ते पहले ही भट्ठों से ईंटे मँगवा ली गई थीं। सात ट्रक पत्थर तो करावल नगर के AAP पार्षद ताहिर हुसैन के घर के पास ही उठाए गए। बता दें कि इस दंगे के पीछे ताहिर हुसैन का बड़ा हाथ बताया जा रहा है। ताहिर पर आईबी ऑफिसर अंकित शर्मा की मौत का भी आरोप है।

ताहिर के घर के आगे लगे पत्थरों के ढेर को देखकर साफ लग रहा था कि इस दंगे के लिए जबरदस्त तैयारी की गई थी। उसके घर के आगे पत्थरों के इतने ढेर को देखकर निगमकर्मी भी सन्न रह गए, क्योंकि वहाँ पर इतना ज्यादा पत्थर था कि उससे एक मंजिला मकान बन सकता था। बता दें कि हिंसाग्रस्त इलाके मुस्तफाबाद, करावल नगर, चमन पार्क, शिव विहार सहित अन्य इलाकों में हिंसा के एक सप्ताह पहले से ही ट्रैक्टरों में भरकर ईंट मँगवाए गए और फिर इसके टुकड़े-टुकड़े किए गए ताकि इसे बोरियों में भरकर छतों पर रखा जा सके।

जानकारी के मुताबिक जो लोग अपने घरों पर ईंटों को एकत्र कर रहे थे, उनका कहना था कि उन्होंने अपने मकान निर्माण कार्यों के उद्देश्य से बड़ी संख्या में ईंटों का ऑर्डर दिया था। हालाँकि, जाँच से पता चला है कि इन्हीं ईंटों को टुकड़ों में तोड़ा गया था और हिंसा के दौरान इस्तेमाल किया गया।

इसके साथ ही बताया जा रहा है कि जहाँं ईंटे रखी गई थीं, उन घरों में कोई निर्माण कार्य नहीं हो रहा है और जिन बोरियों को निर्माण कार्य के तथाकथित उद्देश्य के लिए वितरित किया गया था वे कई घरों की छतों पर खाली पाए गए। अब ऐसे में सवाल उठता है कि अचानक से ये ईंट के ढेर आधे कैसे हो गए ? जिसका जवाब जाँच के बाद ही मिल सकेगा। पुलिस यह पता लगाने में जुट गई है कि आखिर क्यों इन ईंटों के हफ्ते भर पहले एकत्र किया गया था। पुलिस गाजियाबाद में स्थित उन ईंट भट्टों के मालिकों के संपर्क में है, जिनके पास हिंसा से एक हफ्ते पहले इन ईंटों का ऑर्डर मिला था।

वहीं ताहिर हुसैन के घर के पास की बात करें तो यहाँ पर पत्थरों की कई इंच मोटी परत बन चुकी थी। बताया जा रहा है कि नजारा कुछ ऐसा था, मानो नई सड़क के निर्माण से पहले पत्थरों को तोड़कर बिछाया गया हो। जिसकी वजह से सफाईकर्मियों को भी पत्थरों को हटाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। ताहिर के घर के पास से ही निगमकर्मियों ने कई ट्रक रेत भी उठाया है। अधिकारी ने कहा कि दिल्ली में इससे पहले कभी इस तरह एक ही स्थान पर इतने पत्थरों का जखीरा देखने को नहीं मिला। जिन पत्थरों को उठाया गया, वे बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में मिले हैं। पत्थरों को देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो किसी ने इन्हें मशीन से काटा हो।

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इस्लामी कट्टरपंथी PFI ने किया ताहिर हुसैन का बचाव, कहा- ‘हुआ गंदी राजनीति का शिकार’

दिल्ली में हिंदू-विरोधी दंगे और अलीगढ़ में हुए हालिया दंगों के पीछे पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और भीम आर्मी का हाथ होने की बात सामने आने के बाद अब यह इस्लामी कट्टरपंथी संगठन आम आदमी पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन की बचाव में आया है। पीएफआई का कहना है कि ताहिर ‘गंदी राजनीति’ का शिकार हो गया है। इसके साथ ही पीएफआई ने ताहिर को पार्टी से निलंबित करने को लेकर दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भी जमकर निशाना साधा।

बता दें कि पूर्वोत्तर दिल्ली में हिंसा के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या कर दी गई थी। इसका आरोप AAP के पार्षद ताहिर हुसैन पर लगा था, जिसके बाद केजरीवाल ने पीछा छुड़ाने के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया था। अंकित शर्मा का शव 26 फरवरी को चाँद बाग के एक नाले से मिला था। अंकित शर्मा के पिता राजिंदर कुमार का आरोप है कि उनके बेटे की हत्या के पीछे ताहिर हुसैन का हाथ है। 

उन्होंने दिल्ली के दयालपुर थाने में एफआईआर दर्ज कराते हुए AAP के निलंबित नेता और नगर पार्षद ताहिर हुसैन के अलावे कई अन्य लोगों को भी आरोपित बनाया है। अंकित के पिता रविन्द्र शर्मा की तहरीर पर दिल्ली पुलिस ने हिंसा को बढ़ावा देने, आगजनी और अंकित की हत्या सहित कई मामलों नगर पार्षद ताहिर हुसैन के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। साथ ही दिल्ली पुलिस ने ताहिर हुसैन के घर को सील कर उसके ख़िलाफ़ जाँच शुरू कर दी है।

राजिंदर कुमार ने एफआईआर में बताया कि अंकित मंगलवार (फरवरी 25, 2020) को लगभग 4.30 बजे काम से लौटने के बाद लापता हो गया था। उनके भाई अंकुर ने आरोप लगाया कि ताहिर हुसैन के लोगों ने उन्हें उनके दो दोस्तों के साथ पकड़ा और घसीटकर ले गए। बाद में उनका शव बुधवार (फरवरी 26, 2020) को पूर्वोत्तर दिल्ली में एक नाले में पाया गया।

अंकित के पिता ने बताया, “25 फरवरी को मेरा बेटा अंकित कुछ खरीदने के लिए घर से निकला। जब वह नहीं लौटा, तो हमने उसकी तलाश शुरू की। सबसे पहले हम खजुरी खास, दयालपुर क्षेत्रों के नजदीकी पुलिस स्टेशनों में गए और आसपास के अस्पतालों में पूछताछ की। रात भर उसकी तलाश करने के बाद हमने 26 फरवरी को पुलिस में एक गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज कराई।”

हालाँकि, ताहिर ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों से इनकार किया है और कहा कि उसे फँसाया जा रहा है। उसने कहा, “मैं वहाँ मौजूद नहीं था। मैं खुद अपने बच्चों और परिवार को बचाने की कोशिश कर रहा था। यह बहुत दुख की बात है कि उन्होंने (अंकित के माता-पिता) अपने बच्चे को खो दिया, लेकिन वे जो चाहें कह सकते हैं। मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं है। ये आरोप झूठे हैं और इसके लिए मुझे फ्रेम करना गलत है।”

गौरतलब है कि पिछले साल साल भी यूपी और CAA के विरोध में हुई हिंसा के पीछे पीएफआई का हाथ सामने आया था। इसके अलावा शाहीन बाग फंडिंग मामले में भी ईडी ने इसकी संदिग्ध भूमिका बताई थी। ED की रिपोर्ट में पाया गया था कि PFI के एक्टिविस्ट और कार्यकर्ता देश भर से लोगों से रुपए इकट्ठा करते हैं और इस रुपए को उस क्षेत्र के ही किसी आदमी को सौंप देते हैं, जो कि फिर दिल्ली आकर इस कैश को PFI के हेडऑफिस में छोड़ जाते हैं, जो कि शाहीन बाग़ के ही पास है।

ईडी के मुताबिक नागरिकता संशोधन विधेयक संसद में पेश होने के बाद कुल 15 खातों में 1.04 करोड़ रुपए जमा किए गए, जिसमें 10 खाते पीएफआई और 5 खाते रिहैब इंडिया फाउंडेशन के हैं। ये जमा राशियाँ 5 हजार से लेकर 49 हजार रुपए तक थीं और इन्हें नकद अथवा मोबाइल का इस्तेमाल कर तत्काल भुगतान सेवा द्वारा जमा कराया गया था। जमाकर्ता की पहचान छुपाने के लिए धनराशि 50 हजार से कम रखी गई थी। इन 15 बैंक खातों से 4 दिसंबर 2019 से 6 जनवरी 2020 के दौरान 1.34 करोड़ रुपए निकाले गए। इस धन का नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों में इस्तेमाल किया गया।

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गोली से ज्यादा घातक गुलेल: मैक्सिमम तबाही के लिए हर 10-15 घरों के बाद एक छत पर लगा था यह हथियार

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दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर हुई हिंदू विरोधी हिंसा अब भले ही थम गई है, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर अभी भी दहशत का माहौल है, हिंसा के बाद का मंजर दिल्ली वालों को डरा रहा है। हिंसा की आग दिल्‍ली को कभी न भूलने वाले गम और सदमे में छोड़ गई।

दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की दिल्ली दंगों की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे बेहद चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। हिंसाग्रस्त इलाकों की जो तस्वीरें सामने आई हैं, वो चकित करने वाली हैं। उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे में उपद्रवियों ने तरह-तरह के हथियारों का इस्तेमाल किया था, जिनमें सबसे बड़ा हथियार गुलेल रहा। कई इलाकों में भड़की हिंसा के दौरान गोली-बम से ज्यादा घातक गुलेल साबित हुई है। ये गुलेल छत, रिक्शे और अन्य जगहों पर रखकर इस्तेमाल किए गए। कई इलाकों की छतों पर गुलेल मिल रही है। 

हिंसा की जाँच कर रही दिल्ली पुलिस अपराध शाखा की एसआईटी को हर 10-15 घरों के बाद एक घर की ऊँची छत पर गुलेल मिली है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जाँच के दौरान सैकड़ों की संख्या में गुलेल बरामद किया गया। सबसे ज्यादा गुलेल ओल्ड मुस्तफाबाद के घरों की छतों से बरामद किया गया। पुलिस का कहना है कि इन्हीं गुलेल की मदद से सबसे ज्यादा तबाही मचाई गई।

हिंसा फैलाने के लिए बड़े पैमाने पर गुलेल का इस्तेमाल किया गया है। इससे लोहे, पत्थरों, पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया गया। दिल्ली के शिव विहार इलाके में मिली गुलेल एक रिक्शे पर लोहे के एंगल को वेल्डिंग कर के बनाई गई थी। जिस तरह छोटी गुलेल से मामूली गिट्टियाँ चलाई जाती हैं, ठीक वैसे ही इस बड़ी गुलेल से पेट्रोल बम की बोतलें, बड़े-बड़े पत्थर या और भी चीजें फेंकी जा सकती हैं। यानी किसी भारी चीज को दूर तक फेंकने के लिए ये गुलेल बनाई गई, वो भी रिक्शे के ऊपर। इसे मोबाइल गुलेल कहा जाता है, जिसे जहाँ चाहे, वहाँ ले जाया जा सके और घटना को अंजाम दिया जा सके। इस बड़ी गुलेल से पेट्रोल बम की बोतलें, बड़े-बड़े पत्थर फेंके गए थे।

इसके अलावा आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या के आरोपित आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन के घर की छत पर भी ये गुलेल पाए गए गए हैं। इतना नहीं वहाँ गुलेल के अलावा छोटी-छोटी पॉलीथिन में कुछ केमिकल पदार्थ भी पाए गए हैं, जिन्हें तेजाब बताया जा रहा है। AAP के ताहिर हुसैन का नाम हिंसा में आने के बाद पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम ताहिर हुसैन के घर पहुँची है। डीसीपी क्राइम की अगुवाई में फॉरेंसिक की टीम ताहिर हुसैन के घर पहुँचकर जाँच कर रही है।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली में हुई हिंसा में अब तक 42 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि करीब 200 लोग घायल हैं। घायलों में सुरक्षा बलों के करीब 70 लोग शामिल हैं। मृतकों में दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल और आईबी के अधिकारी अंकित शर्मा भी शामिल हैं। दिल्ली पुलिस के मुताबिक, अभी तक इस हिंसा में 48 एफआईआर दर्ज की गई हैं।

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अपने 2 बच्चों के लिए दूध लेने निकले थे दलित दिनेश: मुस्लिम दंगाइयों ने सिर में मारी गोली, मौत

दिल्ली में भड़के हिन्दू-विरोधी दंगे में दंगाई मुस्लिम भीड़ की करतूतें और पीड़ितों की दास्तान जैसे-जैसे सामने आ रही है, वैसे-वैसे इसकी वीभत्सता से पर्दा भी उठता जा रहा है। इन दंगों में जान गँवाने वालों में एक दिनेश कुमार खटिक भी शामिल हैं, जो अपने पीछे पत्नी और छोटे-छोटे बच्चों को छोड़ गए हैं। दिनेश को दंगाइयों ने मार डाला। वकील मोनिका अरोड़ा ने जानकारी देते हुए बताया कि खटिक दलित हैं।

नीचे संलग्न की गई ट्वीट में आप देख सकते हैं कि किस तरह दिनेश की पत्नी अपने पति की मौत के बाद अपने दोनों बच्चों के साथ बैठी हुई हैं। इनकी चिंता है कि अब बच्चों का पालन-पोषण कैसे होगा। मोनिका अरोड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से पीड़ित परिवार की मदद करने की गुहार लगाई है। देखें ट्वीट:

गोली दिनेश के सीधे सिर में लगी है। मोनिका अरोड़ा ने पूछा है कि अब ‘जय भीम, जय मीम’ का नारा लगाने वाले कहाँ छिपे हैं और दिनेश के हत्यारों को सज़ा दिलाने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठा रहे हैं? दिनेश की हत्या तब की गई, जब वो अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए दूध लेने निकले थे। एक बेटा 7 साल का है, वहीं दूसरा मात्र 1.5 साल का है।

बता दें कि दिनेश को गोली राजधानी स्कूल के छत पर जमा दंगाइयों ने मारी। राजधानी स्कूल का मालिक फैसल फ़ारूक़ है। उसने आरोप लगाया है कि उसके स्कूल पर दंगाइयों ने कब्जा कर लिया था। स्थानीय लोगों के अनुसार वहाँ कई दिनों से पत्थर, बम, गुलेल वगैरह जमा किए जा रहे थे। इस स्कूल की छत 250 दंगाइयों ने आसपास के हिन्दुओं पर तबाही बरपाई थी।

खाना खा घर से निकले आलोक तिवारी फिर लौटे नहीं, चंदा इकट्ठा कर हुआ अंतिम संस्कार: ग्राउंड रिपोर्ट

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों ने न जाने कितनी माँ की गोद को सूना कर दिया। न जाने कितनी सुहागिनों की माँग उजाड़ दी। न जाने कितनी बहनों के हाथ से उनका प्यारा भाई छीन लिया। दिल्ली दंगों की आग भले ही बुझ सी गई हो, लेकिन हिंदुओं को मिले जख्म शायद ही कभी भर पाएँ। कुछ ऐसा ही हुआ प्रेम विहार में रहने वाले आलोक तिवारी के साथ।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे रविवार को शुरू हुए थे। शनिवार को भी दंगा प्रभावित इलाकों में बाजार पूरी तरह से बंद थे। सड़कों पर अब थोड़ी बहुत चहलकदमी दिखती है। पुलिस फोर्स बड़ी संख्या में तैनात है। ऐसे ही माहौल में हम शिव विहार पहुँचे। हम उस परिवार के पास पहुँचे जिसने दंगों में अपनों को खोया है। हमने देखा कि दंगों में मारे गए आलोक तिवारी की पत्नी बदहवास अवस्था में माथे पर हाथ लगाकर जमीन पर पैर फैलाए बैठी थी। पास में बैठी कुछ आस-पास की महिलाएँ आलोक की पत्नी को सांत्वना देने में लगी हुई थीं। हमें देखते ही पत्नी ने खुद को संभाला। कुछ देर तक तो हम आस-पास के लोगों से ही बात कर जानकारी लेते रहे इस बीच आलोक की पत्नी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुई।

हमारे अनुरोध के बाद आलोक तिवारी की पत्नी कविता तिवारी ने बताया, “बुधवार (26 फरवरी) सुबह के करीब दस बजे थे वह घर से खाना खाकर बाहर घूमने की बात कहकर निकले। हम निश्चिंत थे क्योंकि बाहर के माहौल के बारे में जरा भी खबर नहीं थी। करीब आधा घंटे बाद ही उनके नंबर से मेरे पास फोन आया और उधर से कोई और बोला और हमसे पूछा कि यह किसका नंबर है? जिस पर मैंने बताया कि ये नंबर मेरे पति का है। तो उधर से उन्होंने बताया कि आप यहाँ आ जाओ इनके सिर में चोट लगी है। मैं कुछ लोगों को लेकर घटनास्थल की ओर दौड़ी तो देखा कि एक दुकान के सामने वह घायल पड़े हुए हैं मैं देखते ही बेहोश हो गई।”

इसके बाद पास में खड़े चश्मदीद आगे का घटनाक्रम बताते हैं, “आलोक के सिर में चोट लगी थी, जिससे लगातार खून बह रहा था। हम लोगों की मदद से आलोक को घर ले आए। इसके बाद एम्बुलेंस को फोन किया, लेकिन 1:30 बजे जाकर एम्बुलेंस घर पर आई तब तक घायल आलोक के सिर से खून बहुत ज्यादा बह चुका था। GTB में भर्ती कराया गया, लेकिन देर रात आलोक को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।” इसकी जानकारी मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया। कड़ी मशक्कत और थाने चौकी के सैकड़ों चक्कर काटने के बाद पुलिस ने बीते दिन (28 फरवरी) आलोक का शव परिजनों को सौंप दिया। परिवार की हालत इतनी दयनीय है कि मोहल्ले के लोगों ने चंदा इकट्ठा कर आलोक तिवारी का अंतिम संस्कार किया, जिसे 4 साल के आरुष तिवारी ने मुखाग्नि दी।

हिंदू विरोधी दंगों के शिकार हुए आलोक तिवारी

घटना के बाद से एक तरफ पत्नी कविता का रो-रोकर बुरा हाल है तो वहीं दूसरी और आलोक के दो बच्चे सोनाक्षी और आरुष तिवारी अपने पिता की मौत से अनजान हैं और अपने खेल में लगे हुए हैं। यूपी के हरदोई जिले के गांव बनमऊ के मूल निवासी आलोक करीब आठ साल से अपने बीबी-बच्चों को लेकर दिल्ली के शिव विहार में रह रहे थे। आलोक एक गत्ते की फैक्ट्री में मजदूरी करते थे। घर में इकलौते कमाने वाले आलोक तिवारी के चले जाने के बाद परिवार के सामने रोटी का संकट पैदा हो गया है। सिर झुकाए कविता बस एक ही बात बोलती है- पता नहीं अब मेरा और मेरे बच्चों का क्या होगा।

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