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गुंडे होते हैं भारत माता की जय बोलने वाले? शेखर गुप्ता के The Print में काम करने वाली ‘पत्रकार’ ने तो यही कहा

अतिवादी रेडिकल वामियों में हिन्दुओं से घृणा किस कदर समाई हुई है उसका एक और उदाहरण आज रविवार को फिर एक बार तब देखने को मिला जब शेखर गुप्ता के द प्रिंट में काम करने वाली एक “पत्रकार” ने ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वालों को ‘गुंडा’ का सर्टिफिकेट थमा दिया।

रविवार को मालवीय नगर में कुछ लोगों ने दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में मारे गए 40 से ज्यादा लोगों के साथ अपनी संवेदना प्रदर्शित करने के लिए एक शांति मार्च का आयोजन किया था। इस मार्च में कुछ लोग तिरंगा लिए हुए ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते देखे जा सकते हैं।

हालाँकि द प्रिंट में काम करने वाली इस महिला ‘पत्रकार’ नीरा मजूमदार ने इस पर प्रतिक्रिया जताने के लिए ट्विटर का सहारा लिया और न केवल भारत माता की जय बोलने वालों को गुंडा करार दिया बल्कि पुलिस से भी जवाब तलब कर लिया कि आखिर ऐसे लोगों को इस तरह की रैली निकालने की अनुमति दे कैसे दी?

साइकल की सवारी से ताजमहल की सैर: दुनिया की सबसे ‘ताकतवर बेटी’ ने शेयर किया भारतीय शैली के Meme

हाल ही के कुछ सालों में विश्व कि सबसे बड़ी शक्ति माने जाने वाले देश संयुक्त राज्य अमेरिका का भारत के प्रति दोस्ताना रवैया कई लोगों के लिए ख़ुशी का विषय बना हुआ है तो कुछ के लिए यह चिंता का भी विषय है। इसमें कोई शक नहीं है कि इसके पीछे भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दोस्ताना और मिलनसार व्यक्तित्व काफी हद तक जिम्मेदार है। इस बार के भारत दौरे में ट्रम्प ही नहीं बल्कि उनकी बेटी इवांका ट्रम्प भी भारत से आत्मीयता जोड़ते हुए देखी गई हैं। इसीलिए जब उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी ताजमहल के साथ फोटो पर बने MEME देखे, तो वो इसे शेयर करते हुए अपने दिल की बात लिखना नहीं भूलीं।

ताजमहल की सुंदरता की कई बार तारीफ कर चुकीं इवांका ट्रम्प ने रविवार को उन पर बने कुछ मीम्स ट्वीट किए, जो लोगों ने सिर्फ आपसी हंसी-मजाक के उद्देश्य से फोटोशॉप के जरिए तैयार किए थे। एक ओर जहाँ डोनाल्ड ट्रम्प अपने परिवार के साथ भारत दौरे पर थे, उसी समय सोशल मीडिया पर इवांका ट्रम्प की दीवानगी में लोग उनके पास अपनी फोटो जोड़कर ट्वीट करते देखे जा रहे थे। ऐसा करने वालों में एक नाम मशहूर पंजाबी सिंगर दिलजीत दोसाँझ का भी है। इवांका ने उनके ट्वीट का भी उन्हीं के अंदाज में जवाब दिया है।

इवांका ट्रम्प ने ताजमहल के आगे बैठकर यह फोटो अपने पिता डोनाल्ड ट्रंप और पति जेरेड कुशनर के साथ 24 फरवरी को क्लिक की थीं। इस पर पंजाबी सिंगर दिलजीत दोसाँझ ने इवांका के साथ फोटोशॉप की हुई एक तस्वीर शेयर की, तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा, “मैं और इवांका, पीछे ही पड़ गई, कहती है कि ताज महल जाना है, ताज महल जाना है। मैं ले गया और क्या करता।”

दोसांझ का यह ट्वीट वायरल होते हुए इवांका तक पहुँचा, तो उन्होंने भी उसी अंदाज में जवाब दिया और लिखा, “शानदार, ताजमहल तक मुझे ले जाने के लिए आपका शुक्रिया दिलजीत दोसाँझ। यह ऐसा अनुभव था जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती हूँ।” इसके साथ ही उन्होंने आँख मारते हुए इमोजी भी लगाई।

इस ट्वीट पर लोग रह नहीं पाए और उन्होंने बिहार के नेता और चारा घोटाले के अभियुक्त लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव के नाम भी एक फोटो शेयर कर दी।

इसके बाद इवांका ट्रम्प ने एक और ट्वीट शेयर किया जिसमें भारतीय युवाओं ने फोटोशॉप कर के उन्हें ताजमहल ही नहीं बल्कि साइकिल की सवारी भी करवाई है। मीम शेयर करते हुए इवांका ने लिखा, “मैं भारतीय लोगों के गर्मजोशी की तारीफ करती हूँ। मैंने कई नए दोस्त बनाए हैं।”

वहीं, कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने इवांका ट्रम्प के साथ कोई फोटोशॉप की हुई तस्वीर तो शेयर नहीं की लेकिन अन्य लोगों को इवांका ट्रम्प के साथ देखकर शायद भावनाओं में बहकर अपने मन की बात रखने से खुद को नहीं रोक पाए। इवांका के प्रेम में डूबे इस युवक ने लिखा- “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ इवांका”

चश्मदीद प्रदीप वर्मा का बयान जिन्होंने चाकू से गोदकर मारे गए IB अधिकारी को आखिरी बार देखा था

आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा को ताहिर हुसैन के गुंडों ने मिल कर मार डाला। उन्हें काफ़ी भयावह मौत दी गई। ताहिर हुसैन फ़िलहाल फरार है। अंकित के साथ-साथ उसके गुंडों ने 3 अन्य लोगों को भी उठाया था, जिनकी लाशें उसके घर के पास स्थित गंदे नाले से मिली। अंकित ड्यूटी से लौट कर अपनी गाड़ी पार्क करने के बाद दोनों पक्षों को समझाने गए थे लेकिन मुस्लिम दंगाई भीड़ ने उनकी एक न सुनी और उन्हें घसीटते हुए ताहिर हुसैन की 4 मंजिला इमारत में ले गए। वहीं उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। अब एक चश्मदीद का बयान आया है, जिन्होंने अंकित को आख़िरी बार देखा था।

ऑपइंडिया ने प्रदीप वर्मा से बातचीत की और जाना कि उन्होंने अंकित शर्मा को आखिरी बार कब देखा था? प्रदीप ने बताया कि आम आदमी पार्टी के निगम पार्षद ताहिर हुसैन के घर के पीछे उसके कई गुंडे जमा थे। अंकित उनसे हाथ-पाँव जोड़ कर विनती कर रहे थे कि वो पत्थरबाजी न करें। तभी दंगाई भीड़ अचानक से आगे बढ़ी और उन्होंने मिल कर अंकित की पिटाई शुरू कर दी। इसके बाद उन्हें पकड़ के घसीटते हुए ताहिर हुसैन की इमारत के भीतर ले जाया गया।

प्रदीप ने कहा कि अंकित शर्मा का उसके बाद कुछ अता-पता नहीं चला और सीधा नाली से उनकी लाश ही बरामद हुई। प्रदीप के साथ भी काफ़ी ज़्यादतियाँ की गईं। उन्हें मारा-पीटा गया और उनकी गाड़ी के शीशे फोड़ डाले गए। उन्होंने बताया कि ताहिर हुसैन के गुंडों के सामने हिन्दुओं की बहुत बुरी स्थिति थी। बकौल प्रदीप वर्मा, अंकित को पीट कर घसीटते हुए ले जाते समय उन्हें 8 लोग जबरन पकड़े हुए थे। बता दें कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला है कि अंकित शर्मा पर 400 बार चाकुओं से वार किया गया था। उनके साथ 6 घंटे तक ये सब किया जाता रहा।

चश्मदीद प्रदीप वर्मा ने बताया कि उन पर भी लोहे की रॉड से वार किया गया। उन्होंने बताया कि अब तक पुलिस ने उन्हें गवाह बनाने की कोई कोशिश नहीं की है। हालाँकि, उन्होंने पुलिस को दिए गए बयान में भी अपना अनुभव दर्ज करा दिया है।

आँतें फाड़कर निकाल दी गई, 6 लोगों ने 400 से ज़्यादा बार चाकू भोंका: IB के अंकित शर्मा की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट

‘गंगाजल’ लिखा हुआ तेजाब, मुस्लिम इलाके में सप्लाई: दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों में फिरोज की फैक्ट्री बेनकाब

‘मस्जिद से फेंकी गई थी अंकित शर्मा की लाश’ – पिता ने FIR में ताहिर हुसैन को बताया हत्या का आरोपी

हाथ काटा, पैर काटा, माँस के टुकड़े की तरह आग में फेंक दिया: मृतक दिलबर नेगी का विडियो वायरल

‘हिंदू इलाके में शांति मार्च… फिर मस्जिद में मीटिंग और 400 लीटर पेट्रोल से हमला’ – बुरे फँसे AAP विधायक हाजी युनूस

गोली से ज्यादा घातक गुलेल: मैक्सिमम तबाही के लिए हर 10-15 घरों के बाद एक छत पर लगा था यह हथियार

पालतू कुत्ते को आग से बचाने की कोशिश में सेना के अधिकारी ने गँवाई जान

जम्मू-कश्मीर में आग से अपने पालतू कुत्ते को बचाने की कोशिश में सेना के एक अधिकारी ने अपनी जान दाँव पर लगा दी। दरअसल, बारामूला जिले के गुलमर्ग क्षेत्र में अपने पालतू कुत्ते को आग से बचाते वक्त मेजर अंकित बुद्धराज बुरी तरह जल गए। मेजर अंकित ने अपनी पत्नी और कुत्ते को तो सुरक्षित बचा लिया लेकिन दुर्भाग्यवश इसके बाद मेजर की घटनास्थल पर ही मौत हो गई।

एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, शनिवार (फरवरी 29, 2020) करीब 2 बजे अचानक ही मेजर अंकित बुद्धराज के घर में आग लग गई थी। घटना के समय घर के अंदर ही मौजूद मेजर अंकित ने साहस का परिचय देते हुए तुरंत अपनी पत्नी और एक कुत्ते को आग से बचाते हुए सफलता पूर्वक बाहर निकाल लिया।

इसके बाद वह फिर आग से घिरे अपने घर के दूसरे कुत्ते को बचाने के लिए चले गए। तब तक आग पूरे घर में तेजी से फैल गई थी। दूसरे कुत्ते को बचाने की कोशिश में मेजर अंकित का शरीर 90% आग से झुलस गया। जिसके कारण मौके पर ही उनकी मौत हो गई। बता दें कि उनकी पत्नी और दोनों कुत्ते सुरक्षित हैं। मेजर अंकित गुलमर्ग के एसएसटीसी में अटैच थे।

सूचना पाकर मौके पर पहुँची फायर ब्रिगेड की टीम ने आग पर काबू पा लिया था। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मेजर अंकित के शव को चिकित्सकीय-कानूनी औपचारिकताओं के लिए उप-जिला अस्पताल में भेजा। पुलिस अभी आग लगने की वजह शॉर्ट-सर्किट बता रही है।

कपिल मिश्रा के बयान से पहले ही दंगाई भीड़ ने शुरू कर दिए थे दंगे: ‘Live Video’ से खुलासा

दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में कई हिन्दुओं ने अपनी जानें गँवाई। हिन्दू समाज की बहू-बेटियों के साथ अश्लील हरकतें की गईं। आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा को बहुत ही दर्दनाक मौत दी गई। मीडिया के एक बड़े वर्ग और लिबरलों के गिरोह ने इन सब के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया? कपिल मिश्रा को। दंगे भड़काने और कई हत्याओं के आरोप लगे हैं आम आदमी पार्टी के नेता ताहिर हुसैन पर। शरजील इमाम ने भड़काऊ बयान देकर शहीन बाग़ उपद्रव का कुचक्र रचा, जिसने 3 महीने तक दिल्ली वालों को परेशान किया। लेकिन, आरोपित कौन? कपिल मिश्रा!

अब तक ये स्पष्ट हो चुका है कि इन दंगों में इस्लामी आतताइयों और उनका नेतृत्व करने वालों का हाथ है लेकिन यहाँ हम आपको एक ऐसा सबूत दिखाने जा रहे हैं, जिससे साफ़ हो जाएगा कि कपिल मिश्रा के बयान से पहले दंगे शुरू हो गए थे। हालाँकि, फैसल फ़ारूक़ के राजधानी स्कूल और ताहिर हुसैन की इमारत से हुई पत्थरबाजी और बमबारी की बात करें तो वहाँ कई दिनों की तैयारी और साजिश के बाद ये सब संभव हुआ, ये साफ़ है। अब हम एक ऐसा लाइव वीडियो लेकर आए हैं, जो कपिल मिश्रा के बयान के पहले का है और उसमें देखा जा सकता है कि पत्थरबाजी शुरू हो गई है।

ये वीडियो बनाया है दिल्ली स्थित शाहदरा के निवासी मोहित ठाकुर ने। मोहित ठाकुर फ़रवरी 23, 2020 (सोमवार) को शाम के 4:33 में अपने फेसबुक प्रोफाइल से लाइव हुए और उनके कैमरे में जो भी चीजें क़ैद हुईं, वो आपको सच्चाई बयाँ कर देगी। उस वीडियो की तहकीकात करते हुए हमने मोहित से बातचीत भी की। उन्होंने ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए सब कुछ बताया। वो वीडियो भी हम आपको दिखाएँगे, लेकिन पहले बात मोहित ठाकुर के उस लाइव वीडियो की।

कपिल मिश्रा का वो ट्वीट अभी सोशल मीडिया पर उपलब्ध नहीं है क्योंकि उसे डिलीट कर दिया गया है। लेकिन, उस ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट्स हैं, जो दिखाते हैं कि उनका बयान शाम 5:11 में सोशल मीडिया पर पहली बार उनके अकाउंट से गया था। यानी, अन्य न्यूज़ पोर्टलों पर भी ये ख़बर सवा 5 के बाद ही आनी शुरू हुई। कपिल मिश्रा ने दिल्ली पुलिस को विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी थी, अगर उपद्रवियों पर नकेल नहीं कसी गई तो। नीचे कपिल मिश्रा के आधिकारिक हैंडल से हुए ट्वीट और उसका समय देखें:

कपिल मिश्रा का वो बयान, जिसे लेकर बात का बतंगड़ बनाया गया और इसे लेकर झूठे आरोप लगाए गए

अब बात मोहित के वीडियो की, जो इससे 28 मिनट पहले का है। इस वीडियो में वो मौजपुर मेट्रो स्टेशन के पास से लाइव हुए थे। जब वो लाइव हुए, तब उन्होंने बताया कि यहाँ इतनी भीषण पत्थरबाजी हो रही है कि लोग इधर से गुजर ही नहीं पा रहे हैं। वो पत्थरबाजी का दृश्य दिखाते हुए हिन्दुओं को चेतावनी देते हैं कि समय रहते एक्शन नहीं लिया गया तो वो उनके घरों तक पहुँच सकते हैं। जब वो सड़क पर चल रहे हैं, तब वहाँ रोड़े-पत्थर बिखरे पड़े हैं। उस समय मोहित की गाड़ी भी वहाँ फँसी हुई थी। समुदाय विशेष के लोगों के डंडे-पत्थरों से लैस होने की बात भी इस वीडियो में कही गई है, जिससे पता चलता है कि कपिल मिश्रा के बयान से पहले ही हथियार उठा लिए गए थे।

स्थिति इतनी भयावह थी कि मोहित ने उस वीडियो में कहा था कि उन्हें आज अपने ही देश में खड़े होने में डर लग रहा है। उन्होंने कई राहगीरों को वहाँ से वापस भी लौटाया, ताकि वो आगे लाठी-डंडे और पत्थर खाने से बच जाएँ। कई लोग वहाँ से वापस लौट गए। उसी समय उस वीडियो में एक रिक्शा वाला भी भागा-भागा आता दिखता है, जो बताता है कि काफ़ी पत्थरबाजी हो रही है और लोगों को मारा जा रहा है। इसके बाद मोहित ने लोगों को चेताया था कि ये डंडे उन तक भी पहुँच सकते हैं।

मौजपुर मेट्रो स्टेशन के नीचे का वीडियो: मिश्रा के बयान से पहले ही दंगे भड़कने हो गए थे शुरू

इसके बाद हमने मोहित ठाकुर से संपर्क किया और उनसे उनकी राय जानी। उन्होंने इस वीडियो की पुष्टि की और बताया कि वो दंगों के समय रात भर जाग कर दंगाई भीड़ को रोकने में लगे हुए थे और आत्मरक्षा के लिए ज़रूरी क़दम उठा रहे थे। मोहित मजहबी दंगाई भीड़ की हिंसा को प्रत्यक्ष देख चुके हैं। जब उन्हें पता चला कि शिव विहार स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर के पास दंगाई भीड़ पहुँच गई, तब आत्मरक्षा के लिए कुछेक डंडे लेकर हिन्दुओं ने मोर्चा सम्भाला। राजधानी स्कूल से लगातार फायरिंग की जा रही थी।

मोहित ने बताया कि वो इस बात के भी गवाह हैं कि कपिल मिश्रा के बयान से पहले दंगे शुरू हो गए थे। उन्होंने कहा कि अगर 4 व्यक्ति सामने में इस तरीके से मारे जाएँ तो ये पाकिस्तान वाला मंजर बन जाता है। मोहित ने बताया कि मजहबी दंगाई भीड़ ने एक तरह से पूरे क्षेत्र में हिंदुस्तान-पाकिस्तान सीमा बना दिया था। लगातार 48 घंटों तक हमले होते रहे और हिन्दू अपनी जान बचाने के लिए लगे रहे। एक अन्य व्यक्ति नन्हें लाल ने भी कहा कि मजहबी भीड़ के सामने पुलिस भी बेबस नज़र आ रही थी।

मोहित मीडिया पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि मीडिया भी हिन्दुओं की हत्याओं को कवर नहीं कर रहा है और समुदाय विशेष के किसी व्यक्ति को थप्पड़ भी लग जाए तो उसे बड़ा मुद्दा बनाया जाता है। उन्होंने मीडिया को भी इस्लामी कट्टरवादियों के कुत्सित ‘गजवा-ए-हिन्द’ मिशन का हिस्सा बताया। बकौल मोहित, अगर दंगों का इल्जाम कपिल मिश्रा पर मढ़ने की बजाए सही दोषियों के ख़िलाफ़ शुरू में ही आवाज़ उठाई जाती तो आज ये नौबत ही नहीं आती। हालाँकि, जावेद अख्तर, सबा नकवी, अभिसार शर्मा, स्वरा भास्कर सहित लिबरल गिरोह के लोग अभी भी कपिल मिश्रा पर दोषारोपण में लगे हुए हैं।

इस लाइव वीडियो को देख कर आप भी अंदाज़ा लगाइए कि जब कपिल मिश्रा के बयान से पहले ही लोगों को मारा जाने लगा था, लोग भाग रहे थे, पत्थरबाजी शुरू हो गई थी, डंडे भाँजे जा रहे थे और हमले शुरू हो गए थे- तो क्यों न इस पूरे प्रकरण का दोष शाहीन बाग़ और जाफराबाद में बैठे उपद्रवियों के साथ-साथ उन्हें भड़काने वाले इस्लामी नेताओं और मीडिया के वर्ग को दिया जाए। कपिल मिश्रा को मुद्दा बना दिया गया, वारिस पठान, शरजील इमाम और ताहिर हुसैन जैसों को बचाने के लिए। कपिल मिश्रा को मुद्दा बनाया गया, पुलिस पर गोलीबारी करने वाले मोहम्मद शाहरुख़ को परिदृश्य से गायब करने के लिए।

बन्दूकबाज शाहरुख को अनुराग बताने वाले रवीश ने NDTV की फोटो को बताया फोटोशॉप्ड

जब इंसान का जीवन प्रपंच रचने और विरोधी विचारधारा को आईटी सेल साबित करने तक सीमित हो जाए तो वह रवीश कुमार हो जाता है। इसका एक ताजा उदाहरण स्वयं रवीश कुमार ने ही आज फिर दिया है। कल ऑपइंडिया ने NDTV के एक पत्रकार विष्णु सोम के डेस्क पर रखी आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की प्रतिमा पर एक रिपोर्ट की थी। इस रिपोर्ट ने रवीश कुमार को परेशान कर दिया, बहुत परेशान! इतना कि उन्हें इस पर साहित्य लिखने पर विवश कर दिया।

इसके बाद रवीश कुमार आदतन अपने फेसबुक पेज, जिस पर अक्सर वो ‘प्राइम टाइम लोकपत्र सम्भाग’ में मिली चिट्ठियों के व्हाट्सएप स्क्रीनशॉट लगाया करते हैं, पर इस घटना पर साहित्य लिखते देखे गए। लेकिन जल्द ही यह आभास होने पर कि वह प्रतिमा वास्तव में ओसामा बिन लादेन की ही थी, ‘हमेशा सही होने’ की आदत वाले रवीश अपने पोस्ट को फ़टाफ़ट एडिट कर के अपने प्रोपेगेंडा के जरिए सही साबित करते नजर आए।

रवीश कुमार ने पोस्ट की सबसे पहली कॉपी में लिखा था कि आईटी सेल ओसामा बिन लादेन की फोटो को फोटोशोप कर के NDTV की छवि ख़राब करने का प्रयास करता है। तब तक भी शायद रवीश कुमार सतर्क नहीं थे कि यह फोटोशोप नहीं बल्कि वास्तव में उन्हीं के समाचार चैनल के एक पत्रकार की डेस्क पर रखी हुई प्रतिमा है।

रवीश के पोस्ट से पहले विष्णु सोम ने खुद दिया था स्पष्टीकरण

विष्णु सोम करीब दो दशक से एनडीटीवी में बतौर डिफेंस जर्नलिस्ट काम कर रहे हैं। ट्विटर पर विष्णु सोम ने ऑपइंडिया को जवाब देते हुए बताया कि यह रूसी गुड़िया मात्र्योष्का (Russian Matryoshka doll) है जो कि ऑनलाइन भी उपलब्ध है। उन्होंने ट्वीट के जरिए बताया कि कुछ साल पहले ही उन्होंने मॉस्को की ही एक रोड स्क्वायर पर इसे खरीदा था। साथ ही बताया कि उन्हें यह पूरी तरह विचित्र लगा कि विश्व के नंबर वन दुश्मन का खिलौना क्रेमिलन के बाहर बेचा रहा है। विष्णु सोम अपने ट्वीट में ऑनलाइन लिंक भी दिया, जहाँ विश्व के तानाशाहों के खिलौने बेचे जाते हैं।

हालाँकि, विष्णु सोम के स्पष्टीकरण पर कुछ लोगों ने यह भी जवाब दिया कि हर किसी के अपने नायक और भगवान होते हैं और वो भी अपनी डेस्क पर अपने भगवान की मूर्ती रखते हैं।

रवीश कुमार ने देर से ही सही लेकिन मामले को समझते हुए तुरंत अपने पोस्ट को अपडेट कर के सारा दोष आईटी सेल के उपर आरोपित करते हुए विष्णु सोम के बचाव में लिखा कि अमेरिका ने भी तो तालिबान से समझौता किया है। लेकिन यह नहीं बताया कि यह कहकर वो साबित क्या करना चाहते थे। पोस्ट की समाप्ति से पहले रवीश कुमार ने लिखा कि आपको ही तय करना है कि आप किसके द्वारा मूर्ख बनाए जाते हैं। अभी तक भी रवीश अस्पष्ट ही नजर आए। हालाँकि, पोस्ट में पहले रवीश कुमार लादेन कि फोटो को फोटोशोप बता रहे थे। अंत में रवीश कुमार ने पाठकों के लिए नोट में लिखा कि यह पोस्ट अब अपडेट कर ली गई है।

स्पष्ट दिखता है कि सिर्फ सही होने के लिए रवीश कुमार के लिए शब्दों में उचित हेर-फेर कर के अपने पूर्वग्रहों को ही सही साबित कर देना कितना आसान है। अक्सर ऐसे ही अस्वीकरण और नोट रवीश कुमार अपने ब्लॉग के आखिर में नेता और अन्य राजनीतिक हस्तियों पर आरोप लगाने के बाद लगाते देखे जाते हैं, जिसमें लिखा होता है कि इस लेख कि प्रमाणिकता कुछ नहीं है और मात्र व्यक्तिगत राय है।

रवीश कुमार द्वारा किए गए मूल पोस्ट और गलती का आभास होने पर किए गए एडिट्स की क्रोनोलॉजी आप इन स्क्रीनशॉट्स में देख सकते हैं। आखिरकार पाँचवीं बार में इस पोस्ट को फाइनल कर लिया गया। स्क्रीनशॉट की क्रोनोलॉजी में आप देख सकते हैं कि हर दूसरे ‘एडिट’ के बाद पोस्ट में ‘ज्ञान’ की मात्रा बढ़ते हुए, यानी आरोही क्रम में है –

हाल ही में रवीश कुमार एनडीटीवी में अपने प्राइम टाइम में दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में आठ राउंड फायरिंग करने वाले शाहरुख की पहचान पर लोगों को गुमराह करने किए लिए उसे अनुराग मिश्र बताते भी पकड़े गए थे। उसके ठीक बाद अनुराग मिश्रा नाम के उस युवक को अपनी फेसबुक आईडी से पोस्ट कर के यह साबित करना पड़ा कि लोग बेवजह उसकी फोटो इस्तेमाल कर रहे हैं और वह शाहरुख़ नहीं है। अनुराग मिश्रा ने उस पर बेवजह आरोप लगाने वालों पर FIR करने की भी धमकी दी थी।

रवीश कुमार का प्राइम टाइम प्रोपेगेंडा: गोली चलाने वाला मोहम्मद शाहरुख नहीं, अनुराग मिश्रा है

‘कहते रवीश के चैनल से हूँ, तो ये हाल न होता’: NDTV के पत्रकार पर मुस्लिम भीड़ ने किया पथराव

रवीश कुमार नहीं समझ पा रहे जामिया की लाइब्रेरी में क्यों भागे ‘छात्र’: बताने की कृपा करें

‘1 लाख 10 हजार रुपए लेकर दिल्ली दंगों को सांप्रदायिक रंग दो’ – सीनियर जर्नलिस्ट ने किया खुलासा

अगर आप भी विदेशी मीडिया में भारत विरोधी हिन्दूफोबिक फेक खबरों को देख-देख माथा पकड़ कर बैठ जाया करते हैं और समझ नहीं पाते कि भारत विरोधी ऐसी फेक खबरें लिखने/प्लांट करने वालों का मंतव्य होता क्या है, कौन है इस सबके पीछे? और, सोचते रह जाते हैं कि क्या ये लोग सिर्फ भारत विरोधी-हिन्दूफ़ोबिक मानसिकता के कारण ऐसा करते हैं या इन्हें इस नफरत के कारोबार को चलाने-फैलाने के एवज में प्रत्यक्ष-परोक्ष लाभों की भी बड़ी भूमिका होती है? तो दरअसल आप की सोच सही दिशा में काम कर रही है।

इन भारत विरोधी खबरों को किस कदर प्लांट किया जाता है विदेशी मीडिया में, उसके मोडस ऑपरेंडी को कल यानी शनिवार को द पायनियर के वरिष्ठ पत्रकार जे गोपीकृष्णन ने एक ट्वीट कर सबके सामने नंगा कर दिया। सीनियर जर्नलिस्ट ने अपने ट्वीट में खुलासा किया कि किस तरह एक अमेरिकी अखबार ने उन्हें दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में हुई मौतों को सांप्रदायिक आधार पर रिपोर्ट करता एक 1000 शब्द का आर्टिकल लिखने के लिए 1500 अमेरिकी डॉलर (लगभग 1 लाख 10 हजार रुपए) का ऑफर किया। ध्यान रहे कि यह दंगा ठीक उसी समय भड़काया गया था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के दौरे पर थे।

अपने ट्वीट में जे गोपीकृष्णन ने हिन्दू विरोधी/भारत द्रोही एजेंडे की कलई खोलते हुए इन अमेरिकी बेस्ड लेफ्टिस्ट मीडिया संगठनों को ‘रास्कल्स’, ‘क्रुक्स’ कहा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इन मीडिया संगठनों को ‘प्रेस्टिट्यूट्स’ कहना भी जायज ठहराया।

गोपीकृष्णन यहीं नहीं रुके। उन्होंने उन भारतीय पत्रकारों को भी लताड़ लगाई, जो कुछ सौ डॉलर्स के लिए अपनी आत्मा बेचते घूमते हैं।

उन्होंने आगे एक और घटना का जिक्र करते हुए कहा कि मार्च 2012 में जब 2-जी स्कैम सामने आया था, उस वक्त भी एक नॉर्वे बेस्ड अखबार ने उन्हें uninor के पक्ष में रिपोर्ट लिखने के लिए 25000 अमेरिकी डॉलर (लगभग 18 लाख रुपए) की पेशकश की थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था।

गोपीकृष्णन इस मामले पर से और पर्दा हटाते हुए कहते हैं कि जब उन्होंने अपनी कलम गिरवी रखने से मना कर दिया तो देखते हैं कि ठीक उसी ब्रीफ के साथ जिस पर उन्हें लिखने को कहा गया था, वह स्टोरी इकॉनमिक टाइम्स में छपती है, और उसी के हवाले से नॉर्वे के तत्कालीन नेता प्रधानमंत्री को लिखते हैं कि भारत का सिस्टम विदेशी कंपनियों को सुचारु रूप से काम करने में किस तरह से अवरोध पैदा करता है।

गोपीकृष्णन की बात को सामने रखते हुए जरा उन सारी रिपोर्ट्स को याद करिए, जो मौके-बेमौके भारतीय पत्रकारों द्वारा विदेशी मीडिया के लिए लिखी जाती रही हैं। वो चाहे बरखा दत्त की रिपोर्टिंग हो या राणा अय्यूब नामक प्रोपोगैंडिस्ट का लेख, जो दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों को मुस्लिम नरसंहार कहती है या वॉल स्ट्रीट जर्नल की वह रिपोर्ट, जिसमें मुस्लिम आतंकी भीड़ द्वारा आईबी के अंकित शर्मा की 400 बार चाकू गोद कर की गई हत्या और शव नाले में फेंक देने की जगह, हिन्दू भीड़ को ही अंकित शर्मा की हत्या का दोषी ठहरा दिया जाता है। और जिसकी वजह से वॉल स्ट्रीट जर्नल के खिलाफ कंप्लेंट भी दर्ज की जाती है।

दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों को pogrom कहती राणा अयूब:

दिल्ली में नाले से बरामद हुए 3 और शव: 2 भागीरथी विहार, 1 गोकुलपुरी से – इलाके में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात

दिल्ली में दंगे के बाद शवों के मिलने का सिलसिला अभी भी जारी है। इसी के साथ मौत का आँकड़ा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। रविवार  (मार्च 1, 2020) को भी तीन शव बरामद हुए हैं, जिसमें एक शव गोकुलपुरी नाले से, जबकि दो शव भागीरथी विहार के नाले से बरामद हुए हैं। इसी के साथ दिल्ली हिंसा में अब तक मरने वालों की संख्या 45 पहुँच गई है। हालाँकि दिल्ली पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है कि रविवार को जो तीन शव नालों से मिले हैं, उनका संबंध दिल्ली दंगों से है या नहीं। पुलिस ने शव को नाले से बाहर निकाल लिया है और मामले की जाँच में जुटी है।

बता दें कि आईबी अफसर अंकित वर्मा का शव भी नाले से मिला था। दंगों के दौरान 87 लोग गोलियों का शिकार बने थे। इनमें मृतक और घायल शामिल हैं। वहीं 300 के करीब लोग ईंट-पत्थर, लाठी-डंडों, चाकू-तलवार और अन्य धारदार हथियारों से किए गए हमले में जख्मी हुए थे। पुलिस ने मृतकों और घायलों की अस्पतालों द्वारा तैयार मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर यह आँकड़ा जारी किया है। नाले से तीन शव बरामद होने के बाद आसपास के इलाके में सनसनी फैल गई है। इलाके में पहले ही भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है।

पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है। फिलहाल शव की पहचान नहीं हो सकी है। बता दें कि हिंसा फैलाने के आरोप में पुलिस ने हथियारों के साथ करीब 40 लोगों को दबोचा है, जबकि आर्म्स एक्ट के तहत 36 मामले दर्ज किए हैं।

पुलिस अब तक 39 हथियार भी बरामद कर चुकी है। इनमें 36 तमंचे और तीन पिस्टल शामिल हैं। वहीं, मौके से कारतूसों के करीब 75 खोखे बरामद हुए हैं। पुलिस ने अभी तक दर्जनभर जगहों पर छापेमारी कर पेट्रोल बम और बम बनाने का सामान बरामद किया हैं। AAP के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन की छतों पर से भी भारी-मात्रा में ईंट-पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब आदि बरामद हुए हैं। ताहिर हुसैन पर अंकित वर्मा की हत्या का गंभीर आरोप है।

‘गंगाजल’ लिखा हुआ तेजाब, मुस्लिम इलाके में सप्लाई: दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों में फिरोज की फैक्ट्री बेनकाब

दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में पत्थरबाजी, पेट्रोल बम फेंकने के अलावा काफी मात्रा में तेजाब का भी इस्तेमाल किया गया था। करावल नगर के AAP पार्षद ताहिर हुसैन की छत पर से भी काफी मात्रा में तेजाब बरामद हुए थे। रिपब्लिक वर्ल्ड ने हाल ही में एक वीडियो के जरिए खुलासा किया कि दंगों के लिए फिरोज खान की फैक्ट्री से एसिड सप्लाई की गई थी।

यह वीडियो शिव विहार का है। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि बड़े-बड़े कंटेनर्स हैं, जिसमें तेजाब, सल्फ्यूरिक एसिड, सल्फर वगैरह भरे हुए हैं। और 500-500 लीटर वाले तमाम कंटेनर के ऊपर लिखा गया है ‘गंगाजल’। जिस तरह से गंगाजल मूवी में तेजाब को गंगाजल कहकर संबोधित किया जाता है, ठीक उसी तरह से फिरोज खान ने अपनी फैक्ट्री में एसिड को गंगाजल का नाम दिया। यहाँ पर भारी मात्रा में तेजाब स्टोर किया गया है। बता दें कि फिरोज खान काफी शातिर तरीके से यह फैक्ट्री चलाता था। अगर तकनीकी वजहों से नीचे संलग्न विडियो नहीं चल रहा हो तो इस लिंक पर क्लिक कर देख सकते हैं।

फिरोज यह फैक्ट्री, दीपक बैंड दुकान की आड़ में चलाता था। सड़क पर से आप देखेंगे तो आपको दीपक बैंड की दुकान दिखाई देगी, लेकिन जैसे ही आप आगे बढ़ेंगे तो देखेंगे कि इसके अंदर तो बड़ी सी एसिड और केमिकल की फैक्ट्री चल रही है। पूछने पर वहाँ काम करने वाले ने दीपू नाम के एक शख्स ने बताया कि फैक्ट्री का मालिक फिरोज खान है। उसने इसका लाइसेंस भी बनवा लिया है। जब उनसे पूछा गया कि बगल में बच्चों का स्कूल है और रिहाईशी इलाका है, आस-पास लोग रहते हैं तो फिर उसे यहाँ पर केमिकल फैक्ट्री चलाने का लाइसेंस कैसे मिल गया? तो वो कहते हैं कि फिरोज का बाप नईम खान पुलिस में है। फिरोज ने अपनी दुकान के आगे दिल्ली पुलिस की बोर्ड लगा रखी है और उसी का डर दिखाकर फैक्ट्री चला रहा है।

जब भी पुलिस वाले या एमसीडी वाले फैक्ट्री में बिकने वाले तेजाब को लेकर सवाल करता था तो फिरोज उसे ये कहता था कि उसका बाप पुलिस में है, इसलिए वो उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। यानी कि लोगों को डरा-धमकाकर, खुले आम गुंडागर्दी करते फिरोज यह फैक्ट्री चलाता था। फिलहाल वो फरार है। इसी के साथ ही वहाँ के लोगों ने यह भी बताया कि मुस्तफाबाद, चाँदबाग, करावल नगर और यमुना विहार जैसे हिंसाग्रस्त इलाके में भर-भर कर सप्लाई किया गया। ज्यादातर सप्लाई मुस्लिम इलाके में किया गया।

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Thappad से सीख: हर बार थप्पड़ हिन्दुओं के ही गाल पर क्यों? सेक्युलरिज़्म सिर्फ हिंदुओं की जिम्मेदारी नहीं

करीब तीन महीने से दिल्ली फैज़ और मिर्ज़ा ग़ालिब को समर्पित रही। अब तीन महीने बाद मुझे भी कुछ लेखक याद आ रहे हैं। दिल्ली का वर्णन करते हुए रामशंकर विद्रोही ने लिखा था –

“दिल्ली ऐबको की है
ये दिल्ली इल्तुतमिश की है
ये दिल्ली लगती है जैसे
ये रज़िया सुल्ताना दिल्ली है
ये दिल्ली बलबनो की है
वफादारों की दिल्ली है “

दंगा साहित्यकारों की ‘ऐबकों’ की इस दिल्ली में आज फिर हिंदुओं को घर की महिलाओं को छुपाना पड़ा, तलवारें लिए ‘बलबनों’ के आगे लोगों को जिंदा रहने के लिए अपने नाम बदलने पड़े, घरों को चिन्हित होने से बचाने के लिए आक्रान्ताओं की हाँ में हाँ मिलानी पड़ी, माथे से तिलक और हाथों से कलावा उतारने पड़े… मंदिरों को ‘खिलजियों’ ने जलाकर राख कर दिया। इस तरह एक बार फिर भारत की धर्म निरपेक्षता हिंदुओं के साथ होने वाला सबसे भद्दा मजाक बनकर रह गया है।

देश का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को अभी तक सेक्युलर चश्मे से देख रहा है और इसकी सच्चाई देखकर चाहता है कि और लोग भी इस हिन्दू-विरोधी दंगों को उसी चश्मे से देखें। उनके पास ऐसा करने की कुछ व्यक्तिगत वजह हैं, जैसे अपने विचारक वर्ग की स्वीकृति का पात्र बने रहना, अपने पियर ग्रुप्स के बीच हिंदुओं को मुस्लिमों के प्रति असहिष्णु बताकर अपनी सभ्यता का परिचय देना… सोशल मीडिया पर सेक्युलर टेस्ट में अच्छे नम्बर लाकर सोशल मीडिया के लेफ्ट-लिबरल गिरोह के परीक्षण में पास होना इत्यादि।

ऑपइंडिया ने फैसला किया कि वह दंगों में पीड़ितों के परिवारों से जाकर सम्पर्क स्थापित करेंगे और जानने की कोशिश की कि क्या समाज के ढाँचे में वास्तव में वह गैप मौजूद है, जो लोगों को इतनी निर्ममता से मारने पर मजबूर कर देता है? हमारी ग्राउंड रिपोर्ट्स में पता चला कि यह खाई तो वाकई में बहुत बड़ी थी, और इस खाई को और बड़ा करने की कोशिशें दूसरी तरफ से बहुत पहले से की जा रहीं थीं।

हम उस देश मे रहते हैं जहाँ सेक्युलरिज़्म की परिभाषा एक मजहब के लोगों के सुबह चार बजे स्पीकर्स पर ‘अलार्म’ बजाने से दूसरे धर्म के लोगों को उठाया जाना है और दिन में मिलकर इसे गंगा-जमुनी तहजीब नाम दे दिया जाता है ताकि उस धर्म के लोगों को आपत्ति करने अधिकार उनकी असहिष्णुता साबित कर दी जा सके। लेकिन अगर हमारे मुल्क में कोई इस तरह की तहजीब वास्तव में मौजूद है तो फिर हिंदुओं के घरों को चिन्हित करने वाले लोग कौन थे?

क्या उत्तर पूर्वी दिल्ली में सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं के मन्दिर, घरों, दुकानों और स्कूलों निशाना लगाकर उन पर हमला करने वाले कोई विदेशी नागरिक थे? अगर वो भारत के ही थे तो क्या उनकी शिक्षा में गाँधी का अहिंसावादी मॉडल शामिल नहीं है? या गाँधी भी सिर्फ हिन्दुओं के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं? ‘कुदरती गुलेलों‘ के लिए कई महीनों से ट्रैक्टर में पत्थर भरकर लाने वाले, पेट्रोल बम की आपूर्ति कराने वाली ताहिर हुसैन जैसे नेताओं की ‘सेक्युलर छतें’ इस दूसरे ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ की तैयारियाँ किस कारण से कर रहीं थीं? गंगा-जमुनी तहजीब की कहानी आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की निर्मम हत्या से लेकर उत्तराखंड के दिलबर सिंह नेगी की जली हुई लाश खूब बता रही है।

दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की हकीकत रवीश कुमार जैसे सभ्य प्रपंचकारियों से लेकर सोशल मीडिया पर दिन-रात हिंदुओं को कोसने वाले जानते हैं। जिस गैस चेम्बर से लेकर भारत मे फासीवाद के उदय पर देश का एक विशेष गिरोह दंगा-साहित्य लिखता रहा, दिल्ली के दंगे उन्हीं अफवाहों की परिणति हैं। आज सुबह ही दंगों में मृतक दिलबर सिंह नेगी के जलकर राख हुए शरीर का वीडियो सामने आया है। क्रूरता की हद देखिए कि उनके दोनों हाथ-पैर काटकर, जिंदा शरीर के बाकी हिस्से को जलती दुकान में फेंक दिया गया। इस बर्बरता को याद रखें, यह सब हिन्दू विरोध के नाम पर शुरू हुआ था।

दूसरी ओर इसी देश में मुस्लिमों के विशेषाधिकारों को भी देखिए, वो आज भी शरीयत के आगे संविधान को हीन मानते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पहले तीन तलाक बिल पर बना कानून था और अब हिंदुओं को नागरिकता देने की बात पर करीब तीन महीने से चल रहा शाहीन बाग का बिरियानी महोत्सव है। सेक्युलरिज़्म का नाम मैंने कुछ गिने-चुने मुस्लिम लोगों के मुँह से भी सिर्फ गत 2-3 सालों में ही सुना होगा, वो भी सिर्फ तब-तब इस्तेमाल किया जाता है, जब धर्म निरपेक्षों के अपने दाँव उल्टे पड़ जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर कुछ दिन पहले ही ‘हम जिंदा कौमें हैं ..‘ और ‘सब बुत उठवाए जाएँगे, सब तख्त गिराए जाएँगे‘ जैसी सेक्युलर शायरी पढ़ने वाले गालिब-वादी भी पुलिस की प्रतिक्रिया पर ‘सेक्युलरिज़्म’ और अल्पसंख्यक शब्द का विक्टिम कार्ड खेलते देखे गए हैं।

शाहीनबाग से शुरू हुए ‘फ़क हिंदुत्व’ और इस्लामिक नारे इन विभत्स घटनाओं के जिम्मेदार हैं। याद रखें, और भूलें नहीं कि यह हिन्दू विरोधी दंगे थे। आईबी अधिकारी अंकित शर्मा का 400 बार शरीर चाकू से गोदा गया, एक अन्य हिन्दू का शरीर काटकर आग के हवाले कर दिया गया। 19 साल के विवेक के सिर में ड्रिल मशीन घोंपी गई। हिंदुओं को दंगाइयों से अपनी जान बचाने के लिए अपने नाम इमरान बताने पड़े, हाथों से कलावा खोलना पड़ा।

ध्यान दें, ये सब इसी सेक्युलर राष्ट्र में उन हिंदुओं के साथ हुआ है, जिन्हें प्राइम टाइम में बेहद सभ्य भाषा में फासिस्ट बताते हुए उनके खिलाफ निरंतर घृणा भरी जाती है। देश का लेफ्ट लिबरल ‘वॉक प्रोग्रेसिव’ युवा बॉलीवुड की फिल्मों से बहुत प्रभावित होता है, तो फ़िल्म का ही उदाहरण देता हूँ। जिस तरह थप्पड़ फ़िल्म से उदारवादियों ने सीखा होगा कि रिश्ता बचाना सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं होती, ठीक उसी तरह सेक्युलरिज़्म की पहरेदारी भी अकेली हिंदुओं की जिम्मेदारी नहीं है। और हर बार यह थप्पड़ हिन्दुओं के ही गाल पर ही मारा जाता रहा है। इसमें यह संभव नहीं है कि एक समुदाय विशेष हिन्दुओं के घरों को जलाने के लिए उन्हें चिन्हित कर जला दे और बदले में हिन्दू जाकर उसे गले लगा आए। यह दंगा-साहित्य कुछ पुरस्कार जीतने के लिए लिखी गई किताबों तक सीमित रहे, मानवता के लिए उनका योगदान उतना ही काफी माना जाएगा।

2014 से ही देश का यही विचारक वर्ग आज एकदम नग्न नजर आ रहा है। रवीश कुमार जैसे धूर्त जिस तरह लोकसभा चुनाव की शाम की आखिरी पेटी खुलने तक नरेंद्र मोदी सरकार के हारने के ख्वाब देखता रहा, उसी तरह वो आठ राउंड फायरिंग करने काले शाहरुख को अनुराग मिश्रा साबित करने की कोशिश करते हुए देखा गया है।

देश का छोड़िए, धर्म निरपेक्षता की हक़ीक़त उस दिल्ली से पूछिए जिसकी मिट्टी में जिहाद और तख़्त-ए-ताऊस की खातिर बाबर से लेकर अकबर और औरंगजेब जैसों के रक्तपात से सींचा गया। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि पाँच सौ सालों में भी कुछ खास नहीं बदला है, दिल्ली की जमीन पर तब भी हिंदुओं का खून गिरता था, आज भी हिन्दुओं का खून गिरा है। उसी ‘बलबन’ और ‘ऐबकों’ की दिल्ली में, जिस की धर्म निरपेक्षता पर इतिहास से ज्यादा ‘लिबरल साहित्य’ लिखा गया है।

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