Homeदेश-समाजपहले से जमा कर रखे थे पत्थर, हिंदुओं पर हमले के लिए बहू-बेटियों को...

पहले से जमा कर रखे थे पत्थर, हिंदुओं पर हमले के लिए बहू-बेटियों को भी दे रहे थे लाठी: महिला चश्मदीद

"सभी ने अपने घरों के अंदर और छतों पर पहले से ही ईंट-पत्थर रखे हुए थे। वहाँ से लोग लगातार ईंट-पत्थरों को बाहर निकाल रहे थे। यह सब देख मेरे अंदर इतना डर पैदा हो गया कि मैं पूरी रात सो भी नहीं सकी, क्योंकि वह पूरा मोहल्ला मुस्लिमों का है और जहाँ में रहती हूँ वह एक मात्र हिंदू परिवार का घर है।"

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सीएए विरोध के अचानक से हिंदू विरोधी दंगों में तब्दील होने से हर कोई सकते में है। हर कोई यह जानना चाहता है कि इस साजिश के पीछे कौन लोग थे। इसे कैसी रची गई। अभी तक जो तथ्य सामने आए हैं उसमें ताहिर हुसैन की भूमिका मुख्य संदिग्ध के तौर पर उभरी है। उसकी इमारत से जो पत्थर और पेट्रोल बम का जखीरा मिला है उससे लगता है कि साजिशें लंबे समय से रची जा रही थी। ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान हमारी जिन लोगों से बात हुई उससे भी ऐसा लगता है। एक चश्मदीद ने हमें दंगाइयों की हर उस तैयारी के बारे में बताया जो सीएए विरोध की आड़ में पिछले काफी समय से रची जा रही थी।

ग्राउंड रिपोर्ट के लिए हम अपने दफ्तर से निकलकर मेट्रो से शास्त्री पार्क पहुँचे। यहाँ से हिंसा प्रभावित क्षेत्र जाने के लिए हमने एक ऑटो लिया। ऑटो में बैठते ही हमने चालक से इलाके के हालात के बारे में पूछना शुरू कर दिया। इसी बीच रास्ते से कुछ महिला सवारी बैठीं, जिनमें से एक महिला ने ऑटो में बैठते ही अपनी आँखों देखी बतानी शुरू कर दी। ऑटो से उतरने के बाद हमने अपना परिचय देते हुए महिला से पूरी बात बयाँ करने का अनुरोध किया। महिला हमसे बात करने के लिए तो राजी हो गई, लेकिन एक शर्त के साथ वह ये कि उनका नाम नहीं आना चाहिए।

सोनिया विहार में किराए के मकान पर रहने वाली उस महिला ने ऑपइंडिया को बताया, “देर रात का समय था। मैं दूसरी मंजिल पर कमरे में डर के मारे सो भी नहीं पा रही थी। इसी बीच पड़ोस से भीड़-भाड़ के साथ लोगों की जोरों से आवाज आ रही थी। मैंने देखा कि इस्लामी भीड़ हाथों में लाठी-डंडे, ईंट-पत्थर, सरिया, रॉड, तमंचे आदि हथियार लेकर गली से मेन रोड की तरफ जा रही है। इस भीड़ में बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। मैंने देखा कि परिवार के बड़े लोग हिंदुओं पर हमला करने के लिए अपने बच्चों और महिलाओं को घरों से बाहर निकाल रहे थे। इसे देखकर मैं दंग रह गई।”

महिला आगे बताती है, “इतना ही नहीं सभी ने अपने घरों के अंदर और छतों पर पहले से ही ईंट-पत्थर रखे हुए थे। वहाँ से लोग लगातार ईंट-पत्थरों को बाहर निकाल रहे थे। यह सब देख मेरे अंदर इतना डर पैदा हो गया कि मैं पूरी रात सो भी नहीं सकी, क्योंकि वह पूरा मोहल्ला दूसरे मजहब का है और जहाँ में रहती हूँ वह एक मात्र हिंदू परिवार का घर है।” महिला बार-बार एक ही बात पर आश्चर्य जता रही थी कि हम (हिंदू) लड़ाई होने पर अपने बच्चों को घर के अंदर करते हैं, लेकिन वह अपने बच्चों और महिलाओं को लाठी डंडे देकर लड़ाई करने के लिए बाहर कर रहे थे।

मूल रूप के बिहार की रहने वाली महिला सोनिया विहार के मुस्लिम बाहुल्य इलाके में एक किराए के मकान में रहती है। सात साल पहले पति की मौत के बाद वह बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए घरों में काम करती है। हिंसा के बाद से वह इतनी डरी हुई है कि पिछले तीन दिनों से अपने काम पर नहीं गई और सोचने के लिए मजबूर है कि दिल्ली में अब रहा जाए कि नहीं। हिंसा से डरी सहमी वह महिला बार-बार एक ही बात कहती रही, “मेरा नाम नहीं लेना, नहीं तो वे लोग मुझे मार डालेंगे।”

33 सालों में नहीं देखा ऐसा भयानक मंजर, हमारा सब कुछ बर्बाद कर दिया: ‘श्याम चाय वाले’ की आपबीती

ग्राउंड रिपोर्ट: ताहिर हुसैन की छत से चली गोली अनूप सिंह की गर्दन में लगी, आर-पार निकल गई

ग्राउंड रिपोर्ट: चुन-चुन कर जलाई हिन्दुओं की दुकानें, ताहिर हुसैन के तहखाने वाली इमारत में थे 3000 गुंडे

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

‘यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी’: संभल दंगे की न्यायिक जाँच आयोग रिपोर्ट में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का जिक्र 100+ बार, 199 साक्षियों...

संभल दंगों की न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट में सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का 100 बार से भी अधिक बार जिक्र। वो भी सबूतों के साथ।

100 नाराज़ ≠ 100 वोट: भारतीय राजनीति में सिर्फ़ ‘नाराज़गी’ का फ़ैक्टर कभी निर्णायक क्यों नहीं रहा

SC/ST Act, आरक्षण, Caste census, सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति जैसे मुद्दे निश्चित रूप से सवर्णों में असंतोष पैदा कर सकते हैं। इन प्रश्नों को खारिज करना भी राजनीतिक मूर्खता होगी।
- विज्ञापन -