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‘जोकर’ के ऑस्कर विजेता अभिनेता ने गाय व बछड़े को कटने से बचाया, कहा- इन्हें कोई छू भी नहीं सकता

अभी हाल ही में आई अवॉर्ड विनिंग फ़िल्म ‘जोकर’ का नाम तो आपने सुना ही होगा। इसमें टाइटल किरदार अदा करने वाले अभिनेता वॉकीन फीनिक्स हॉलीवुड के जाने-माने नाम हैं। फीनिक्स को इस किरदार के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर अवॉर्ड दिया गया। अब फीनिक्स फिर से चर्चा में हैं लेकिन अपनी फ़िल्म की वजह से नहीं, वास्तविक जीवन में एक कारनामा करने के कारण। अपने फ़िल्मी किरदार के लिए इस साल के लगभग सारे अवॉर्ड्स जीतने वाले 45 वर्षीय अभिनेता ने एक गाय और उसके बच्चे की जान बचाई। फीनिक्स ने माँ-बच्चे को मौत के मुँह से बचाया।

हुआ यूँ कि गुरुवार (फरवरी 20, 2020) को फीनिक्स ने कैलिफोर्निया पहुँच कर वहाँ के एक बूचड़खाने से एक ऐसे गाय की जान बचाई, जिसने तीन दिन पहले ही एक बछड़े को जन्म दिया था। ‘लिबर्टी’ नामक गाय के मालिक से मिले और उनसे गाय को कटने से बचाने को कहा। ऑस्कर विजेता अपनी माँ, मंगेतर और लॉस एंजेल्स के ‘एनिमल सेव’ नामक पशु अधिकार संस्था के लोगों के साथ पहुँचे थे। फीनिक्स ने बूचड़खाने के सीईओ एंथोनी डी मरिया से बातचीत की, जिन्होंने बताया कि वो अपने कसाईखाने में वो ऐसे गायों को नहीं मारते, जिन्होंने बच्चों को जन्म दिया हो। साथ ही एंथोनी ने बच्चों को भी नहीं काटे जाने की बात कही।

हालाँकि, फीनिक्स और एंथोनी के बीच तीखी बहस भी हुई। फीनिक्स का कहना था कि पशुओं को काटना ‘हत्या’ है, जबकि एंथोनी इसे ‘फसल काटने’ जैसा बता रहे थे। फीनिक्स ने गाय के बच्चे का नाम ‘इंडिगो’ रखा है। ‘लिबर्टी’ और ‘इंडिगो’ को एक ट्रक में डाला गया और बूचड़खाने से ले जाया गया। इस घटना के बारे में फीनिक्स ने कहा:

“मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे एक कसाईखाने में एक अच्छा दोस्त मिलेंगे। लेकिन, एंथोनी से दिल खोल कर मिलने के बाद ऐसा लगा कि हम दोनों की सोच में काफ़ी समानताएँ हैं, भले ही कई मुद्दों पर हम अलग राय रखते हों। अगर एंथोनी ने दलालुता नहीं दिखाई होती तो शायद लिबर्टी और इंडिगो एक भयानक मौत मारे जाते। मैं वादा करता हूँ कि लिबर्टी और इंडिगो अब जीवन में कभी क्रूरता का सामना नहीं करेंगे, यहाँ तक कि किसी कसाई का हाथ तक उन्हें नहीं छू पाएगा। लिबर्टी और इंडिगो की देखरेख एक फार्म में की जाएगी। वो जैसे-जैसे बड़े होंगे, हमें याद आता रहेगा कि कुछ दोस्तियाँ अचानक से कहीं भी हो जाती हैं। भले ही कितनी भी असमानताएँ हों, दया और क्षमा का ही वातावरण रहना चाहिए।

वॉकीन फीनिक्स ने कैसे गाय और बछड़े को बचाया: पूरा वीडियो यहाँ देखें

फीनिक्स इससे पहले सूअरों को भी कसाईखाने जाने से बचाने के लिए अभियान चला चुके हैं। अवॉर्ड्स मिलने के बाद उन्होंने अपने कई सम्बोधनों को लोगों को शाकाहारी बनने की अपील की थी और यहाँ तक कि गाय का दूध तक न पीने की सलाह दी थी, ताकि बच्चों का पूरा भरण-पोषण हो सके। पर्यावरण और पशु अधिकार को लेकर फीनिक्स ख़ासे संजीदा हैं।

कौन हैं ये 4000 साल पुराने योद्धा: उत्तर प्रदेश में मिली भारत की सबसे बड़ी कब्रगाह!

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित कब्रिस्तान भारत का सबसे चर्चित और पुराना कब्रिस्तान बन गया है। इस बात की पुष्टि कार्बन डेटिंग के बाद एएसआई की टीम ने की है। टीम के मुताबिक सिनौली स्थित कब्रिस्तान में अब तक 126 कब्रें मिली हैं, जोकि 3800 वर्ष पुरानी है।

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सिनौली स्थित कब्रिस्तान में एएसआई की टीम लंबे वक्त से खोजबीन में लगी हुई है। उसे यहाँ से कई अवशेष मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक, कब्रिस्तान में जो अवशेष मिले हैं, उनमें अंडरग्राउंड चेंबर्स, सुसज्जित ताबूत और शवों के साथ दफनाए गए चावल से भरे बर्तन हैं। ये कब्रें किसी स्वदेशी योद्धा जनजाति की हैं, जो कभी इस क्षेत्र में रहा करते थे।

सिनौली कब्रिस्तान खोजबीन में यहाँ पर कई कब्रें, चार पैर वाले लकड़ी के ताबूत, मिट्टी के बर्तन, युद्ध के वक्त इस्तेमाल की जाने वाली ढालें भी मिलीं। यहाँ पर एक ताबूत ऐसा भी मिला है, जिसे आठ मानव आकृतियों के जरिए सजाया गया था। एएसआई जॉइंट डायरेक्टर एसके मंजुल कहते हैं कि कार्बन डेटिंग में इस बात की पुष्टि हुई है कि 300 वर्षों के अंतर के साथ इन्हें तकरीबन 1900 ईसा पूर्व दफनाया गया था।

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित संबंधित खबर की कटिंग

वहीं मंजुल कहते हैं, ‘वर्ष 2005-2006 के बीच यहाँ 116 कब्रें मिली थीं जबकि पिछले दो वर्षों में यहाँ 10 और कब्रें मिली हैं, जो कि 3,800 वर्ष पुरानी हैं। इसके साथ ही यह भारत के सबसे बड़े और चर्चित कब्रिस्तान की फेहरिस्त में आ जाता है।’

दरअसल सिनौली में वर्ष 2005 में एएसआइ के अधिकारी डॉ. डीबी शर्मा खुदाई शुरू कराई थी। इसके बाद वर्ष 2018 फरवरी माह में गाँव के सत्येंद्र सिंह मान को अपने खेत में काम करते समय ताँबे के कुछ टुकड़े मिले थे, जिस पर उन्होंने एएसआइ से संपर्क किया था। इसके बाद मार्च 2018 से यहाँ खोदाई जारी है ।

साभार – NBT

गौरतलब है कि बागपत जनपद में महाभारतकालीन सादिकपुर, सिनौली गाँव को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित किया जा रहा है। एएसआई आगरा सर्किल पहले ही सादिकपुर को राष्ट्रीय महत्व का पुरातत्वीय स्थल घोषित करने की प्रारंभिक अधिसूचना जारी कर चुका है। इसी के साथ यह आगरा सर्किल का 267वाँ संरक्षित स्मारक बन गया है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय में ‘शाहीन बाग नाईट’ का आयोजन करने वाले तीन छात्रों पर 15 हज़ार का जुर्माना

हैदराबाद विश्वविद्यालय में कॉलेज छात्रों द्वारा ‘शाहीन बाग नाईट’ आयोजन करने पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने तीन छात्रों पर 15 हज़ार रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही आरोप लगाया है कि छात्रों ने नियमों का उल्लंघन किया है और कॉलेज की दीवारों को भी गंदा किया है। प्रशासन ने नोटिस जारी करते हुए कहा है कि छात्र अपनी पढ़ाई पर ही ध्यान दें। वहीं कॉलेज प्रशासन द्वारा की गई इस कार्रवाई को लेकर छात्रसंघ ने कड़ी आपत्ति जताई है।

विश्वविद्यालय प्रशासन के मुताबिक आरोपित छात्रों ने 31 जनवरी को रात नौ बजे के बाद नॉर्थ शॉपिंग कॉम्पलेक्स में सीएए के विरोध में ‘शाहीन बाग नाईट’ का आयोजन बिना किसी अमुमति के किया था। इस दौरान छात्रों ने कैंपस की दीवारों को भी गंदा किया था। विश्वविद्यालय ने छात्रों द्वारा की गई इस अनुशासनहीनता को गंभीरता से लिया और 18 फरवरी को इस संबंध में छात्रों को एक नोटिस जारी कर दिया, जिसके तहत विश्वविद्यालय ने छात्र फसीह अहमद, सहाना प्रदीप और एएस एडिस्फो पर 5-5 हज़ार रुपए का यह जुर्माना लगाया है। इन तीनों छात्रों को 10 दिनों के अंदर यह जुर्माना भरना होगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने आदेश में आगे छात्रों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वह सचेत रहें और भविष्य में अपनी शिक्षा पर ध्यान दें। ऐसी घटनाओं को फिर से बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं छात्र संघ ने विश्वविद्यालय द्वारा छात्रों पर की गई दंडात्मक कार्रवाई पर अपनी नाराजगी जताई है और विश्वविद्यालय प्रशासन से माँग की है कि वह छात्रों पर लगे जुर्माने को बिना शर्त वापस ले।

वहीं विश्वविद्यालय के एक प्रवक्ता का कहना है कि यह जुर्माना उन तीन छात्रों पर लगाया गया है, जिन्होंने यूनिवर्सिटी के नियमों का उल्लंघन किया, जिसके तहत रात 9 बजे के बाद कैंपस में पब्लिक स्पेस पर किसी भी तरह की मीटिंग और प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं है। इसके उलट यह आयोजन रात 9 बजे शुरू होकर देर रात 2.30 बजे तक चलता रहा।

आपको बता दें कि पिछले करीब दो महीने से दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के ख़िलाफ महिलाओं का विरोध प्रदर्शन जारी है। वहीं इस धरने की तरह ही देश के कई हिस्सों में सीएए को लेकर लोगों का विरोध प्रदर्शन चल रहा है, जिसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और अलीगढ़ के शाहजमाल में चल रहा महिलाओं का धरना भी कुछ इसी तरह है।

‘100 करोड़ हिंदू की वजह से अल्पसंख्यक स्वतंत्र और सुरक्षित, हिंदुओं की सहिष्णुता को कमजोरी न समझें’

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने शुक्रवार (फरवरी 21, 2020) को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता वारिस पठान के विवादित बयान की निंदा की, जिसमें वारिस ने कहा था कि 15 करोड़ मु***न देश के 100 करोड़ हिंदुओं पर भारी हैं। फडणवीस ने कहा कि बहुसंख्यक समुदाय की सहिष्णुता को उसकी कमजोरी न समझा जाए।

बता दें कि पिछले दिनों CAA के ख़िलाफ गुलबर्ग में रैली आयोजित करते हुए वारिस पठान के भाषण का एक वीडियो सामना आया था। भाषण में वारिस पठान ने सीएए के ख़िलाफ़ बोलते हुए कहा था, “उनकी संख्या अभी 15 करोड़ है, लेकिन ये 15 करोड़ 100 करोड़ पर भारी है। अगर ये 15 करोड़ साथ में आ गए, तो सोच लो उन 100 करोड़ हिंदुओं का क्या होगा?”

इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए फडणवीस ने कहा, “वारिस पठान ने जिस प्रकार का वक्तव्य दिया है, हम उसकी कड़ी निंदा करते हैं। उन्हें ये ध्यान में रखना चाहिए कि 100 करोड़ से भी ज्यादा हिंदू इस देश में रहते हैं इसलिए देश में अल्पसंख्यंक सुरक्षित और स्वतंत्र हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “मुस्लिम देशों में अल्पसंख्यक इस तरह की बदज़ुबानी नहीं कर सकते। हिंदू समाज सहिष्णु है, सबको साथ लेकर चलता है लेकिन हिंदू समाज की सहिष्णुता को उसकी कमजोरी न मानें। उन्हें हिंदुओं और पूरे समाज से माफी माँगनी चाहिए।” फडणवीस ने वारिस पठान के बयान की निंदा करते हुए कहा कि अगर वह माफी नहीं माँगते हैं तो राज्य सरकार को उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। 

बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी वारिस पठान के बयान के खिलाफ हल्ला बोला। पात्रा का कहना है कि नागरिकता के विरोध में पूरे देश में ओवैसी की पार्टी नफरत की राजनीति को बढ़ावा दे रही है। संबित पात्रा ने नफरत की राजनीति का आरोप लगाते हुए असदुद्दीन ओवैसी को भी कठघरे में खड़ा किया। पात्रा ने पूछा कि आखिर जब वारिस पठान बोल रहे थे तो ओवैसी मंच पर बैठे थे लेकिन उन्होंने वारिस पठान से माइक क्यों नहीं छीन लिया।

उन्होंने कहा, “ये सारे लोग हमारे मुस्लिम भाइयों को बरगला रहे हैं, भ्रमित कर रहे हैं। इन सभी लोगों के हाथ में संविधान और दिल में वारिस पठान है, ये साबित कर दिया है।”

अगर भाजपा के नेता ने ऐसा कोई बयान दे दिया होता तो आज सारे तथाकथित लिबरल सड़क पर उतर जाते, पूरे देश में कोहराम मचा देते। लेकिन आज एक भी सामने नहीं आ रहा है, एक भी सवाल नहीं पूछ रहा है।”

वारिस पठान का सिर कलम करो, 11 लाख रुपए का ईनाम पाओ: मुस्लिम संगठन ने की घोषणा

5 साल की बच्ची का प्राइवेट पार्ट छूने के लिए बड़े बच्चों को वैन से उतार देता था शबीब मोमिन, हुई सजा

मुंबई की एक स्पेशल कोर्ट ने शुक्रवार (फरवरी 21, 2020) को एक स्कूल वैन ड्राइवर को पाँच साल की बच्ची के साथ छेड़-छाड़ करने के मामले में दोषी ठहराया और पाँच साल की सजा सुनाई। इसके साथ ही कोर्ट ने दोषी शबीब मोमिन के ऊपर 15,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है, जो कि उसे पीड़ित बच्ची के परिवार को देना है।

यह घटना 2017 की है। शबीब मोमिन ने तब मुंबई के बांद्रा में बच्ची के साथ छेड़-छाड़ की थी। स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए शबीब को पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 10 और भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के तहत दोषी पाया। जिसके बाद उसे यह सजा सुनाई गई।

सरकारी वकील गीता शर्मा ने पीड़िता का पक्ष रखते हुए कहा कि बच्ची अमूमन 5 बजे तक घर आ जाया करती थी। उसकी माँ ने बताया कि मगर 27 मार्च 2017 को बच्ची ने उन्हें बताया कि मोमिन ने बस के सारे बड़े बच्चों को स्कूल के पास उतार दिया और फिर वैन में आकर उसके प्राइवेट पार्ट्स को छुआ।

पीड़िता ने अपनी माँ को बताया कि ऐसा मोमिन ने उसके साथ कई दफा किया। वह अक्सर पीछे वाली सीट पर आकर बैठ जाता था और बच्चों को दूसरी तरफ देखने के लिए कह कर उसे गलत तरीके से छूता था। इसके साथ ही वो बच्ची को धमकी भी देता था कि अगर उसने ये बात किसी को बताई तो वो उसकी माँ और दादी माँ को मार डालेगा। ये सुनकर बच्ची सहम जाती थी और इसी डर की वजह से उसने चुप्पी साध रखी थी। 

पीड़िता की माँ ने बताया कि एक दिन उसकी बेटी रोते हुए स्कूल से आई। कारण पूछने पर उसने बताया कि मोमिन ने उसके साथ फिर से वही हरकत और मार-पीट की। इसके बाद पीड़िता की माँ मोमिन से इस बारे में बात करने गई तो वो वैन से भाग गया। इसके बाद उन्होंने ब्रांदा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई।

इसके बाद मोमिन ने खुद को दिल का मरीज बताते हुए जमानत की अर्जी लगाई थी। उसने 2017 में स्पेशल कोर्ट में कहा था कि स्कूल की फीस जमा न करने को लेकर उसे झूठे केस में फँसाया जा रहा है। हालाँकि स्पेशल कोर्ट ने मोमिन की जमानत याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मोमिन ने हाईकोर्ट का रुख किया। मगर हाईकोर्ट ने भी यह कहकर उसकी याचिका खारिज कर दी कि उसने एक नाबालिग के साथ छेड़-छाड़ करके उसके पेरेंट्स के विश्वास का फायदा उठाया है। बच्ची के पेरेंट्स ने वैन ड्राइवर पर भरोसा करके बच्ची को स्कूल भेजा था, लेकिन उसने उसका गलत फायदा उठाया।

POJK पर जब पाकिस्तान आक्रामक ढंग से आगे बढ़ रहा था, तब हम कान में तेल डाले सो रहे थे

प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का कार्यकाल जम्मू और कश्मीर के लिए अनेक उतार-चढ़ावों वाला था। एक तरफ कश्मीर घाटी से हिन्दुओं का नरसंहार और निष्कासन लगातार जारी था। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में भारत के खिलाफ आतंकवादियों के प्रशिक्षण की शुरुआत हो चुकी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान की भाषा को समर्थन मिलने लगा था। साल 1993 में अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट में उप-सहायक सचिव (दक्षिण एशिया) जॉन मैलोट भारत के दौरे पर थे। उन्होंने कश्मीर में भारतीय सेना पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का झूठा आरोप लगा दिया।

यह सोची-समझी साजिशें थीं, जिनकी भूमिका पाकिस्तान के तत्कालीन दो प्रधानमंत्रियों ने लिखी थी। साल 1990 में बेनजीर भुट्टो और फिर 1991-93 के बीच नवाज शरीफ ने पीओजेके के लगातार कई दौरे किए। भुट्टो ने 13 मार्च, 1990 में मुज़फ्फराबाद की एक सभा में भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों का सार्वजनिक समर्थन किया। शरीफ भी पीछे नहीं थे और पीओजेके से ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ जैसे युद्धक नारे लगाने शुरू कर दिए।

अब इस मामले पर तुरंत प्रभावी कार्यवाही की जरूरत थी। इसलिए भाजपा ने प्रमुख विपक्षी दल के नाते केंद्र सरकार पर दवाब बनाना शुरू कर दिया। इसमें कोई दोराय नहीं है कि प्रधानमंत्री राव एक सुलझे हुए व्यक्ति थे। उन्होंने भी समस्या की गंभीरता को समझा और पहला कदम 22 फरवरी, 1994 को उठाया। उस दिन संसद ने पीओजेके पर एक संकल्प पारित किया था। लोकसभा के अध्यक्ष शिवराज पाटिल और राज्यसभा के सभापति केआर नारायणन (भारत के उपराष्ट्रपति) ने जम्मू-कश्मीर राज्य सम्बन्धी इस प्रस्ताव को दोनों सदनों के समक्ष रखा। जिसमें सर्वसम्मति से जोर दिया गया कि पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर के कब्जे वाले इलाकों को खाली करना होगा।

लगभग साल भर बाद केंद्र सरकार ने पीओजेके को लेकर दूसरा कदम उठाया। साल 1995 में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (जम्मू सहित) और उत्तरी इलाकों (गिलगित-बाल्टिस्तान) पर विदेश मंत्रालय की स्टैंडिंग कमिटी ने संसद में एक रिपोर्ट पेश की। भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी इसकी अध्यक्षता कर रहे थे। इस सर्वदलीय कमिटी में लोकसभा और राज्यसभा से 45 सदस्यों को शामिल किया गया था, जिन्होंने दोहराया कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। साथ ही कमिटी ने सुझाव दिया कि पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान में मानवाधिकारों के हनन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष आवाज़ उठाई जानी चाहिए।

यह दोनों अभूतपूर्व कदम थे, जोकि सालों पहले ही उठा लिए जाने चाहिए थे। दरअसल पिछले तीन दशकों से यह मुद्दा केंद्र सरकारों की प्राथमिकता में शामिल नहीं था। इस बीच पाकिस्तान ने मनगढ़ंत कहानियाँ बनानी शुरू कर दीं। इसके जिम्मेदार पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे। इस दास्ताँ की शुरुआत 30 अप्रैल, 1962 को होती है। राज्यसभा में अटल बिहारी वाजपेयी (उन दिनों जनसंघ) ने पीओजेके पर प्रधानमंत्री से जवाब माँगा। हालाँकि, जवाब विदेश राज्य मंत्री लक्ष्मी मेनन ने दिया। वाजपेयी ने फिर से प्रधानमंत्री की तरफ इशारा किया और तब प्रधानमंत्री नेहरू खड़े हुए। आखिरकार, उन्होंने पाकिस्तान के साथ बातचीत करने की बात कहकर मुद्दे को टाल दिया।

जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया ने भारतीय हितों को नुकसान पहुँचाया है। जबकि जम्मू-कश्मीर भारत का एक आंतरिक मामला है, जिस पर भारत की संसद ही फैसला कर सकती है। प्रधानमंत्री नेहरू अपनी ‘बातचीत’ की नीति पर काबिज रहे और साल 1964 में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान भेजा। उनकी मुलाकात पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान से हुई। इस पूरे दौरे में उनेक साथ गुलाम अब्बास भी मौजूद थे। अब्बास को ही पाकिस्तान ने ‘आजाद कश्मीर सरकार’ का मुखिया घोषित किया था। इन बातचीतों का कोई ठोस फायदा हुआ नहीं और होना भी नहीं था। इसी बीच प्रधानमंत्री नेहरू का निधन हो गया और शेख दिल्ली लौट आए।

यही एक ‘बातचीत’ असफल नहीं हुई, इसके बाद कई दौर की मुलाकातें भी बेनतीजा रहीं। फिर भी अगली सरकारों ने इस टालमटोल को जारी रखा। इसका एक उदाहरण प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के समय विदेश राज्य मंत्री बीआर भगत ने पेश किया। साल 1968 में जनसंघ के राज्यसभा सदस्य निरंजन वर्मा (मध्य प्रदेश) ने प्रधानमंत्री से सवाल किया, “जम्मू तथा कश्मीर के जिस भाग पर पाकिस्तान ने बलात कब्जा कर लिया था और जिसे पाकिस्तान सरकार ने आजाद कश्मीर की संज्ञा दी थी, उस भाग को वापस लेने के लिए भारत सरकार ने अब तक क्या कार्यवाही की है?” भगत ने जवाब दिया, “सरकार को उससे अधिक और कुछ नहीं कहना है जो स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राज्य सभा में 30 अप्रैल, 1962 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा पूछे गए प्रश्न संख्या 129 के पूरक प्रश्नों के दौरान कहा था।”

हालाँकि, इस दौर में एक बार ऐसा मौका आया जब महसूस किया गया कि भारत ने पीओजेके के मुद्दे पर प्रभावी तरीके से अपनी बात रखी है। यह बात 1975 की है, जब शेख अब्दुल्ला श्रीनगर के लालचौक पर एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। चमत्कारिक तौर पर उनके भाषण का केंद्रबिंदु पीओजेके था। आमतौर पर शेख की नीतियों में कोई प्रभाव नज़र नहीं आता है और हमेशा वे पीओजेके पर बात करने से बचते रहे हैं। लेकिन इस बार उनका यह भाषण मात्र एक कारण से महत्वपूर्ण बन गया, क्योंकि 28 सालों (1947 से) बाद उन्होंने पहली बार सार्वजानिक मंच से पीओजेके पर चर्चा की थी।

शुरुआत से ही अगर भारत सरकार ने पीओजेके पर गंभीरता से रुख किया होता, तो आज इतिहास कुछ अलग ही होता। जिस दिन कश्मीर रियासत का भारत के साथ अधिमिलन हुआ, उसी दिन महात्मा गाँधी ने पीओजेके पर एक बात कही, वह इस प्रकार थी, “जो कुछ भी कश्मीर में हो रहा है, मुझे उसकी जानकारी है। पाकिस्तान कश्मीर को अपने मुल्क में मिलाने का दवाब बना रहा है। ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी से जबरदस्ती कुछ भी लेना संभव नहीं है।” यह उन्होंने तब कहा जब पाकिस्तान की सेना जम्मू-कश्मीर पर हमला कर चुकी थी। गाँधी जी ने आगे कहा, “लोगों पर हमला नहीं किया जा सकता और उनके गाँवों को जलाकर उन्हें विवश नहीं किया जा सकता। अगर कश्मीर के लोग, चाहे वे मुस्लिम बहुसंख्यक ही क्यों न हो, अगर भारत के साथ अधिमिलन चाहते हैं तो कोई उन्हें नहीं रोक सकता।”

महात्मा गाँधी की सलाह को प्रधानमंत्री नेहरू ने अनदेखा किया। शेख ने भी अपनी बात रखने में बहुत वक्त लगा दिया। वास्तव में तो प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से पहले ही पीओजेके को वापस लेने के लिए भारत सरकार को अपनी नीतियाँ स्पष्ट कर देनी थीं। हालाँकि कुछ भरपाई प्रधानमंत्री नरसिम्हा ने की, लेकिन अभी बहुत कुछ होना बाकी है। अंत में, हमें महात्मा गाँधी द्वारा एक प्रार्थना सभा में दिया गया कथन हमेशा याद रखना चाहिए। उन्होंने 16 जुलाई, 1947 को कहा था कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी के मध्य रहने वाले सभी भारतीय नागरिक हैं।

महेश भट्ट को पहले से थी गुलशन कुमार की हत्या की सूचना, शिव मंदिर वाली बात भी निकली थी सच!

पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया की हाल ही में चर्चा में आई किताब ‘लेट मी से इट नाउ’ हर रोज एक के बाद एक नए खुलासे कर रही है। इस किताब में किए गए खुलासों ने एक तरफ जहाँ मुंबई जैसे महानगर के आईएसआई और आतंकवाद से सीधे सम्बन्ध पर कई बड़े रहस्यों से पर्दा उठाया है, तो दूसरी ओर कुछ बड़े साजिशकर्ताओं को भी बैचेन कर दिया है।

राकेश मारिया ने महेश भट्ट से ली थी गुलशन कुमार की जानकारी

राकेश मारिया ने ‘लेट मी से इट नाउ’ नाम की पुस्तक में खुलासा किया है कि क्राइम ब्राँच को पहले से ही गुलशन कुमार के हत्या के प्लान की जानकारी थी, लेकिन इसके बाद भी वे ‘कैसेट किंग’ के नाम से मशहूर टी-सीरीज कंपनी के मालिक गुलशन कुमार की हत्या को टाल नहीं सके। इतना ही नहीं उन्होंने दावा किया है कि इस हत्या की साजिश का पता चलने के बाद उन्होंने तुरंत बॉलीवुड फ़िल्म निर्माता महेश भट्ट से जानकारी ली थी।

मारिया का कहना है कि खबरी से जानकारी मिलने के दूसरे दिन उन्होंने महेश भट्ट को फोन किया और उनसे पूछा कि क्या वो गुलशन कुमार को पहचानते हैं? मारिया ने किताबी में लिखा है- “पहले तो सुबह-सुबह मेरा फोन आने से महेश भट्ट चौंक गए थे, लेकिन उन्होंने जवाब दिया कि ‘हाँ, गुलशन कुमार को पहचानता हूँ। मैं उनकी एक फिल्म का निर्देशन कर रहा हूँ।’ भट्ट ने इसकी भी पुष्टि की कि गुलशन कुमार सुबह शिव मंदिर जाते हैं।”

महेश भट्ट से बात होने के बाद राकेश मारिया ने उनसे कहा था कि वो क्राइम ब्राँच को आगाह कर रहे हैं। उन्होंने महेश भट्ट से यह भी कहा कि वो गुलशन कुमार से कह दें कि तब तक घर से बाहर ना निकलें जब तक क्राइम ब्राँच उनसे सम्पर्क नहीं कर लेती है।

राकेश मारिया अपनी किताब ‘लेट मी से इट नाउ’ में लिखते हैं, “22 अप्रैल, 1997 को मेरे पास एक खबरी का फोन आया, उसने मुझसे कहा ‘सर, गुलशन कुमार का विकेट गिरने वाला है।” मैंने उसे उसी समय पूछा कि विकेट लेने वाला कौन है? तो उसने जवाब में अबू सलेम का नाम लिया। खबरी ने आगे बताया कि अबू सलेम अपने शूटरों के साथ गुलशन कुमार को मारने की योजना बना चुका है। गुमनाम व्यक्ति (मुखबिर) ने यह भी बताया कि घर से निकलने के बाद गुलशन कुमार हर सुबह सबसे पहले पास के ही शिव मंदिर में दर्शन करने जाते हैं। यही वह जगह होगी जहाँ उनका टकराव होगा।”

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया अपनी किताब में आगे लिखते हैं, “मैंने तुरंत फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट को फोन किया और उनसे पूछताछ की कि क्या वह गुलशन कुमार को जानते हैं? भट्ट ने कहा हाँ, मैं उनके साथ एक फिल्म के निर्देशन में भी काम कर रहा हूँ।” इस पर जब राकेश मारिया ने भट्ट से यह पूछा कि क्या गुलशन कुमार हर सुबह एक शिव मंदिर जाते हैं? तो यह बात भी सही निकली।

मारिया ने गुलशन कुमार की हत्या की साजिश के बारे में भी महेश भट्ट को अवगत कराया था। मारिया ने महेश भट्ट से कहा, “मैं क्राइम ब्राँच को ब्रीफ करूँगा और वह गुलशन कुमार को घर से बाहर नहीं निकलने देंगे।” इसके बाद राकेश मारिया ने क्राइम ब्राँच से संपर्क कर गुलशन कुमार की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए।

यूपी पुलिस ने दी थी गुलशन कुमार को कमांडो सिक्योरिटी 

मारिया ने अपनी पुस्तक में लिखा है, “मेरे पास अगस्त 12, 1997 को एक फोन आया जिसने गुलशन कुमार की हत्या की खबर मुझे दी और आश्चर्य की बात ये कि हत्या उसी तरह से की गई, जिस तरह से साजिश के बारे में हमें पहले से जानकारी थी। इस घटना को सुनकर मुझे बहुत बड़ा झटका लगा, क्योंकि जानकारी के बाद भी हम इस हत्या को रोक नहीं सके।” मारिया बताते हैं कि बाद में हुई जाँच में पता चला कि गुलशन कुमार की सुरक्षा में उत्तर प्रदेश पुलिस की एक टुकड़ी लगी हुई थी, क्योंकि वह नोएडा में अपनी टी-सीरीज नाम से एक कैसेट कंपनी के मालिक थे। इसलिए मुंबई पुलिस द्वारा दी गई सुरक्षा को वापस ले लिया गया था।

बता दें कि अगस्त 12, 1997 को मुंबई के अंधेरी इलाके में एक शिव मंदिर से बाहर आते ही गुलशन कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। कहा जाता है कि गुलशन कुमार से अंडरवर्ल्ड ने फिरौती माँगी थी, जिसे देने से गुलशन कुमार ने इंकार कर दिया था। इसी कारण डॉन अबू सलेम ने गुलशन कुमार की हत्या कर दी थी। इस मामले में बाद में पुलिस ने नदीम सैफी को आरोपित बनाया था। पुलिस के मुताबिक नदीम को डर था कि कहीं गुलशन उसके म्यूजिक करियर को तबाह न कर दे।

पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने अपनी किताब ‘लेट मी से इट नाउ’ में कई बातों को सामने लाया है। उन्होंने मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब को लेकर भी खुलासा किया है कि कसाब को पाकिस्तानी आकाओं की ओर से हिंदू बनाकर भेजा गया था और मुंबई हमले को हिंदू आतंकी हमले की तरह पेश किए जाने की योजना थी।

इसके लिए कसाब को बेंगलुरु के हिंदू निवासी के तौर पर पेश करने की योजना थी और समीर दिनेश चौधरी नाम का आईडी कार्ड देकर भारत भेजा गया था। इतना ही नहीं, उसके एक हाथ में कलावा भी बाँधा गया था, जिससे साफ हो सके कि हमला करने वाले आतंकी हिंदू हैं। लेकिन यह सभी योजना काम नहीं आ सकी और आख़िर में उसकी पहचान पाकिस्तान के फरीदकोट के रहने वाले अजमल आमिर कसाब के तौर पर उजागर हो गई। यहाँ तक कि उसने खुद अपना गुनाह भी कबूल कर लिया था।

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‍‍कुख्यात नक्सली नेता अरविंद यादव पर कसा ED का शिकंजा, 1.15 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क

बिहार और झारखंड के दो माओवादियों की संपत्ति जब्त करने के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शुक्रवार (फरवरी 21, 2020) को एक और कुख्यात नक्सली पर शिकंजा कसा। ED ने शुक्रवार को बिहार के कुख्यात नक्सली की 1.15 करोड़ की संपत्ति कुर्क कर ली। प्रवर्तन निदेशालय ने बताया कि उसने यह कार्रवाई नक्सली नेता के खिलाफ दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में की है।

बता दें कि मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत अरविन्द यादव और उसके परिवार के सदस्यों की संपत्ति कुर्क करने का अस्थायी आदेश जारी हुआ था। इसके तहत एक ट्रक और लगभग 14 एकड़ जमीन कुर्क किए गए हैं। ट्रक की कीमत 11 लाख रुपए बताई गई है, वहीं जमीन की कीमत 11 करोड़ रुपए से ज्यादा है। निवेश की पूरी अवधि के दौरान यादव परिवार के किसी सदस्य ने इनकम टैक्स नहीं भरा है। ED ने कहा कि मामले की जाँच की जा रही है।

ED की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया है कि यादव एक कुख्यात नक्सली है। वो प्रतिबंधित वामपंथी चरमपंथी के साथ उग्रवादी माओवादी संगठन CPI (माओवादी) का सक्रिय सदस्य और नेता है। रंगदारी और जबरन वसूली को लेकर बिहार पुलिस ने यादव के खिलाफ 61 केस दर्ज किए हैं। पुलिस की ओर से दायर चार्जशीट में यादव को भगोड़ा बताया गया है। जाँच में पता चला कि यादव और उसके परिवार के सदस्यों ने काफी मात्रा में नकदी बैंक खातों में जमा कराई। साथ ही परिवार के सदस्यों की आय का कोई ज्ञात स्रोत भी नहीं है। उन्होंने अवैध तरीके से कमाए गए धन से चल-अचल संपत्तियाँ खरीदीं।

जाँच एजेंसी ने बताया कि अरविंद ने अपने परिवार के दूसरे सदस्यों हमिया देवी, विनोद यादव, वीरेंद्र यादव, नूनवती देवी, कुसुम देवी, गायत्री देवी, मंजू कुमारी और मधुमिता कुमारी के नाम पर भी ढेर सारी जमीनें खरीद रखी थीं, जिसे जब्त कर लिया गया है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले गुरुवार (फरवरी 20, 2020) को ED ने बिहार और झारखंड के दो नक्सलियों अभिजीत यादव और पिंटू राणा के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले के सिलसिले में 26 लाख रुपए से अधिक की संपत्ति को कुर्क किया था।

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‘पहले UP को नर्क बना रहे, फिर मंदिर बना के ठीक करेंगे’ – हिन्दू बीवी वाले एक्टर जीशान अयूब के ट्वीट पर बवाल

बॉलीवुड एक्टर जीशान अयूब ने हाल ही में एक विवादास्पद ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा, “पहले उत्तर प्रदेश को नर्क बना रहे हैं, फिर मंदिर बना के ठीक करेंगे।” जीशान का यह ट्वीट अवधी और भोजपुरी लोकगायिका को नागवार गुजरा और एक्टर के विचार, भाषा को लेकर उन्होंने पलटवार किया। मालिनी अवस्थी ने ट्वीट कर लिखा, “इनके मन में दबी बैठी नफरत और असहिष्णुता इनके ट्वीट पर उतर आई है। भाषा देखिए, विचार देखिए, और ये एक कलाकार हैं।”

बता दें कि जीशान अपने ट्वीट को लेकर ट्रोल तो हो ही रहे थे, लेकिन मालिनी के पलटवार के बाद उनके धर्म और पेशे को लेकर यूजर्स काफी लताड़ लगा रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “जब बहुसंख्यक हिंदुओं पर ‘मंदिर’ का नाम लेकर ये अपरोक्ष हमला करें तब ये कट्टर नहीं लेकिन अगर कोई CAA विरुद्ध प्रदर्शनों पर हुई हिंसा की वसूली करे, जेल भेजे और चेतावनी दे तो वो इनकी नजर में हिंदुत्ववादी, कट्टर, साम्प्रदायिक और जाने क्या-क्या हो जाता है। ये केवल ‘मजहबी कलाकार’ हैं।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “भले ही तू बॉलीबुड में कुछ बन गया हो, लेकिन तेरे अंदर भी वही नफरत का वायरस है, जो एक पंक्चर जोड़ने वाले के अंदर है। तुम लोग कभी नहीं सुधरोगे। तुम्हारा इलाज चीन के पास है।”

एक ने लिखा, “दीदी आप शायद इन लोगो के शब्द भूल जाती हैं। ये सब खुले आम कहते हैं कि हम पहले मुस्लिम हैं उसके बाद कुछ और। इसके बाद भी अगर आप इन लोगों से कुछ उम्मीद लगाए बैठी हैं, तो बहुत भोली हैं आप।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “एक जिहादी हमेशा ही जिहादी रहता है चाहे वो मुखौटा कलाकार का पहने या किसी और का। नसीरुद्दीन शाह को ही देख लो। सरकार को इन पर लगाम लगाना ही पड़ेगा, नहीं तो वायरस की तरह फैल जाएँगे पूरे देश में।”

राहुल नाम के एक यूजर ने लिखा, “ये वही है ना जो सोशल मीडिया पर पोस्ट करके दिल्ली में दंगाइयों को इक्ट्ठा करता है? बाद में जब सब की पुलिस द्वारा सुताई होती है तो टीवी पर आकर एक विज्ञापन में कहता है कि 5 लाख का इंश्योरेंस करवा लो।”

अरविन्द गर्ग ने लिखा, “प्रत्येक मुसलमान के दिल में गज़वा-ए-हिन्द का ख्वाब है। एक तबका जिहाद कर रहा है और दूसरा विक्टिम कार्ड का रोना शुरू कर देता है। और हिन्दू… जातियों में विभक्त शुतुरमुर्ग बना रहता है या फिर कटोरा लेकर #भंडारा (delhi election) छकने में मशगूल हो जाता है।”

एक यूजर ने लिखा, “कलाकार नहीं दीदी, बेरोजगार कलाकार हैं। जिनके पास काम होता है वो काम करते हैं, चिल्लम पी के ट्वीट नहीं करते।”

गौरतलब है कि हाल ही में जीशान की बीवी ने भी हिंदू होने पर शर्मिंदा होने की बात कही थी। बुधवार (फरवरी 19, 2020) की रात कोलकाता के पार्क सर्कस मैदान में हो रहे CAA के विरोध में जीशान की बीवी रसिका अगाशे भी शामिल हुईं थीं, जहाँ उन्होंने कहा था, “मैं जीशान अयूब की बीवी हूँ, मैं हिन्दू हूँ और शर्मिंदा हूँ।”

राम मंदिर के नाम पर दान! ठगी से बचें, रहें सावधान: सरकार ने लगाई रोक, सिर्फ एक ट्रस्ट को मिला अधिकार

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अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और विश्व हिंदू परिषद (VHP) एक साथ कदमताल करते नजर आएँगे। बुधवार (फरवरी 19, 2020) को ट्रस्ट की हुई पहली बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले लेते हुए महंत नृत्य गोपाल दास को ट्रस्ट का अध्यक्ष और विहिप के चंपत राय को महासचिव चुना गया। वहीं पीएम मोदी के प्रधान सचिव रहे नृपेंद्र मिश्रा को मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।

महंत नृत्य गोपाल दास ने शुक्रवार (फरवरी 21, 2020) को कहा कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण वहीं होगा, जहाँ रामलला विराजमान हैं और यह मंदिर उसी मॉडल पर बनेगा, जो पहले से दिखाया गया है। इसमें थोड़ा बहुत परिवर्तन हो सकता है। दास ने पत्रकारों से कहा, “अयोध्या में जल्दी ही भव्य और दिव्य राम मंदिर का निर्माण होगा। इसके लिए दिल्ली में धर्माचार्यों की बैठक हो चुकी है और जल्दी ही एक बैठक अयोध्या में होगी, जिसमें मंदिर निर्माण की तिथि तय की जाएगी। यह काम 6 महीने के भीतर शुरू हो जाएगा।”

इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक एडवाइजरी जारी की है। इसके मुताबिक राम मंदिर निर्माण के नाम पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अलावा कोई और ट्रस्ट चंदा या दान-अनुदान नहीं ले सकता है। इसकी जानकारी ट्रस्ट में गृह मंत्रालय के अफसर ज्ञानेश कुमार ने दी है। ट्रस्ट में बैंकिग कामकाज के लिए अधिकृत डॉ अनिल मिश्र ने बताया कि जो भी अन्य ट्रस्ट/संस्था या व्यक्ति रामलला के नाम पर धन आदि का संग्रह कर रहे हैं, उन पर रोक लगाने की माँग की गई थी। जिसके बाद अब गृह मंत्रालय ने एडवाइजरी जारी कर चंदा लेने पर रोक लगा दिया है। बता दें कि चंदा इकट्ठा करने वालों में ट्रस्ट बनने के बाद अप्रसंगिक हो चुके रामालय की ओर से स्वर्ण संग्रह अभियान भी शामिल है। 

सरकार द्वारा एडवाइजरी जारी करने के बाद रामालय ट्रस्ट के सचिव स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अमर उजाला से बातचीत में कहा कि देश के 7 हजार गाँवों से एक हजार किलोग्राम सोना दान लेने का लक्ष्य है। यह अभियान वाराणसी से शुरू किया गया है। उनका कहना है, “हम सोना जुटाकर अधिकृत ट्रस्ट हो ही देंगे, दानी एफिडेविट के जरिए सोना दे रहे हैं कि हम रामालय के माध्यम से ही दान करना चाहते हैं। ऐसे में सरकार या कोई ट्रस्ट हमें दान लेने से नहीं रोक सकता।”

नवगठित ट्रस्ट के संयोजक ट्रस्टी एवं डीएम अनुज कुमार झा के साथ ही अन्य सदस्यों ने भी इस पर आपत्ति जताई थी कि कोई भी व्यक्ति या संगठन कैसे राम मंदिर निर्माण को लेकर लोगों से चंदा ले सकता है? उसके हिसाब-किताब की जिम्मेदारी किसके पास होगी? एडवाइजरी जारी होने के बाद अनुज कुमार झा ने बताया कि दान लेने का स्वरूप पूरी तरह से पारदर्शी व हाईटेक बनाया जा रहा है। इसके लिए एक वेबसाइट बन रही है, जहाँ दान-अनुदान समेत भक्तों को अयोध्या के महात्म्य, आगमन से लेकर पूजा-पाठ व ठहरने-घूमने की सभी जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाएगी। पूरी प्रक्रिया संपन्न होते ही अयोध्या में खोले जा रहे बैंक खाते को सार्वजनिक किया जाएगा।

ऐसा देखा गया कि लोग राम मंंदिर निर्माण के नाम पर आस्था के नाम पर ठगी करने लगे थे। जिसके बाद ये एडवाइजरी किया गया। ऐसे में आपको भी काफी सावधान रहने की जरूरत है, ताकि आपके साथ कोई भी ट्रस्ट या व्यक्ति धार्मिक आस्था के नाम पर पैसे न ऐंंठ सकें। अगर आप अपनी आस्था से दान देना चाहते हैं तो राम मंदिर निर्माण के लिए बनाए गए अधिकृत ट्रस्ट को ही दें। लेकिन उसके लिए डीएम ने जिस वेबसाइट के बनने की बात कही है, उसके बनने का इंतजार करें। क्योंकि 2-3 दिन पहले राम मंदिर के नाम पर 2 करोड़ रुपए का चेक ट्रस्ट को लौटाना पड़ा था।