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हम भी देखेंगे: शाहीन बाग़ में CAA विरोध प्रदर्शन के दौरान हुआ प्‍यार, प्रेमी जोड़ा करेगा ‘माह-ए-फरवरी’ में निकाह

मशहूर शायर मिर्जा ग़ालिब ने लिखा था- “ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता।” शाहीन बाग़ से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिससे पता चलता है कि नागरिकता विरोध के लिए इकट्ठे हुए लोगों के बीच फैज़ ही नहीं बल्कि मिर्जा ग़ालिब के शेर भी प्रासंगिक होते नजर आ रहे हैं।

यानी, शाहीन बाग़ के जरिए नागरिकता संशोधन कानून को सरकार वापस ले या ना ले लेकिन, कम से कम दीवाने तो इस विरोध प्रदर्शन से घर खली हाथ नहीं लौटने वाले। शाहीन बाग़ में चल रहे नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शन को एक महीने से ज्यादा समय हो गया है, और अब वहाँ बिरियानी बँटने के साथ-साथ कुछ प्रेम प्रसंग भी खबरों में सुनाई दे रहे हैं।

नवभारत टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, शाहीन बाग आंदोलन एक युगल प्रेमी जोड़े की मोहब्बत का गवाह बनने जा रहा है। महीने भर से हो रहे इस आंदोलन के दौरान एक लड़की की नजर एक लड़के से मिली, दोनों में बातचीत हुई और बातों ही बातों में इन दोनों को एक दूसरे से प्रेम भी हो गया। बताया जा रहा है कि अब दोनों प्रेमी जोड़े इसी माह शादी करने जा रहे हैं।

शाहीन बाग़ में मिले इस प्रेमी युगल के परिवार वाले एक-दूसरे को जानते हैं लेकिन मुहब्बत का फूल इन दोनों के बीच विरोध प्रदर्शन के दौरान ही खिला। मेडिकल की पढ़ाई कर रहे इस जोड़े जुनैद और समर के बीच प्रदर्शन के दौरान बातचीत शुरू हुई और अब ये प्‍यार में बदल गई। विरोध प्रदर्शन के दौरान ही उन्‍होंने इस बात की जानकारी अपने परिवार को दी।

जुनैद और समर Rose Day पर पढ़ेंगे निकाह

परिवार वालों की रजामंदी के बाद अब जुनैद और समर 7 फरवरी को निकाह करने जा रहे हैं। बता दें कि फरवरी के महीने में वेलेंटाइंस डे को लेकर भी युवाओं में ख़ास उत्साह रहता है। आज यानी फरवरी 07 को देशभर के युवा ‘गुलाब दिवस’ मना रहे हैं।

एक अन्य खबर में बताया जा रहा है कि जुनैद और समर के अलावा एक और प्रेमी जोड़ा, जीशान-आयशा भी 8 फरवरी को शादी करने जा रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि जीशान और आयशा का परिवार पहले से एक-दूसरे को जानता था लेकिन युवा जोड़े ने कभी शादी के बारे में नहीं सोचा था। प्रदर्शन के दौरान दोनों ने एक-दूसरे से बात की और धीरे-धीरे उनकी बातचीत इश्‍क में बदल गई। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शन के दौरान ही जीशान ने आयशा को शादी के लिए प्रपोज किया।  

‘ला इलाहा… पढ़कर हम जैसी हो जाओ’ – गुंजा कपूर के साथ शाहीन बाग में जो हुआ, वो TV पर दिखाया नहीं गया

शाहीन बाग़ में इस्लामी कट्टरपंथी PFI के पैसों का खेल: ED की छापेमारी से कॉन्ग्रेस-AAP का भी पर्दाफाश

राजनीतिक विश्लेषक गुंजा कपूर के साथ शाहीन बाग में बदसलूकी, Video वायरल 

महबूबा और अब्दुल्ला पर PSA लगा दिया, कश्मीर भावनात्मक रूप से हमारे साथ नहीं: अधीर रंजन

विवादों में रहने के लिए कुख्यात कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी फिर एक बार कश्मीर पर दिए अपने बयान के कारण सुर्खियाँ बटोर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ़्ती तथा उमर अब्दुल्ला के खिलाफ जन सुरक्षा कानून (PSA) लगाए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए, अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि कश्मीर सिर्फ भौगोलिक तौर पर भारत के साथ है न कि भावनात्मक तौर पर भी।

समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता, बरहमपुर से कॉन्ग्रेस सांसद चौधरी ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल ही संसद में उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के बारे में टिप्पणी की और रात में उन पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) लगा दिया गया। आप कश्मीर पर इस तरह राज नहीं कर सकते हैं। कश्मीर भौगोलिक तौर पर तो हमारा है लेकिन भावनात्मक रूप से नहीं।”

ज्ञात हो कि महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला पिछले साल 5 अगस्त से ही नज़रबंद हैं। गुरुवार को पुलिस की मौजूदगी में मजिस्ट्रेट ने उस बंगले में जाकर महबूबा को PSA लगाए जाने का आदेश सौंपा जहाँ उन्हें नजरबंद रखा गया है। बाद में अधिकारियों ने यह भी बताया कि उमर अब्दुल्ला के खिलाफ भी पीएसए के तहत मामला दर्ज किया गया है।

आखिर क्या है PSA ?
इस कानून के तहत किसी भी आरोपी को बिना किसी अन्य आरोप या फिर ट्रायल के 2 साल तक हिरासत में रखा जा सकता है। इस कानून के तहत आरोपी व्यक्ति को बिना वारंट, किसी विशेष जुर्म के किए आरोपी होने के बिना भी बिना किसी समयसीमा के अरेस्ट या डिटेन कर रखा जा सकता है। बताते चलें कि उमर अब्दुल के पिता फारूक अब्दुल्ला को पहले ही इस कानून के तहत नज़रबंद करके रखा गया है।

‘एक टापू राष्ट्र के रूप में उभर रहा है शाहीन बाग, जहाँ जाने के लिए अब दिखाना पड़ेगा आपको VISA’

बीते दिनों पॉलिटिकल एनालिस्ट और पत्रकार गुंजा कपूर के साथ शाहीन बाग में हुई बदसलूकी ने वहाँ बैठी महिला प्रदर्शनकारियों का असली चेहरा सबके सामने पेश कर दिया। अब तक जो लोग इस प्रोटेस्ट को मात्र वॉलिंटियर प्रोटेस्ट बता रहे थे। उनके अजेंडे का खुलासा भी इस घटना के बाद स्पष्ट हो गया। गुंजा के मुताबिक प्रदर्शनकारी महिलाओं के सामने उनकी हकीकत से पर्दा उठने के बाद उन्हें पूरे एक घंटे तक उन महिलाओं ने घेरे रखा और उनके कहने पर भी पुलिस को नहीं बुलाया। अपने असुरक्षा को भाँपते हुए जब भी उन्होंने पुलिस को बुलाने की बात पर जोर दिया, तो वहाँ मौजूद सभी प्रदर्शनकारियों ने उन्हें जवाब दिया कि वे पुलिस को नहीं बुलाएँगे, क्योंकि उन्हें पुलिस पर यकीन नहीं हैं।

गुंजा ने इस घटना के बाद कल यूट्यूब पर अपने चैनल राइट नैरेटिव के जरिए पूरे वाकए पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। गुंजा ने बताया कि जो लोग अब तक देश में रहने के लिए कागज न दिखाने की बात कर रहे थे, वो अब शाहीन बाग में जाने के लिए लोगों से कागज़ माँग रहे हैं। उस शाहीन बाग में जो भारत का एक हिस्सा हैं।

जामिया और शाहीन बाग जा चुकी गुंजा कपूर अपने कटु अनुभवों के आधार पर बताती हैं कि दोनों जगहों पर उनके साथ प्रदर्शनों में जो शारीरिक दुर्व्यवहार हुआ, उसका एक ही कारण हो सकता है कि उनके पास इन दोनों जगहों पर जाने का वीजा नहीं था। वो वीजा जो देशद्रोही भाषण देने के बावजूद शरजील पर था, तिरंगे की आड़ में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वालों के पास था, जिन्ना वाली आजादी की माँग करने वालों के पास था। लेकिन उनके पास नहीं था, क्योंकि उन्होंने इन सब में से ऐसा कुछ नहीं किया।

गुंजा शाहीन बाग के हालातों को देख-समझकर अपनी वीडियो में उसे एक टापू राष्ट्र की तरह बताती है। वे कहती है कि शाहीन बाग एक टापू राष्ट्र की तरह उभर रहा है, जिसका अपना संविधान है, अपने नागरिकता देने के नियम हैं, अपनी सुरक्षा करने की व्यवस्था है और अपनी अर्थव्यवस्थता है। जिसके जरिए उनका सुबह का नाश्ता, शाम की चाय और दिन-रात का खाना आता है।

अपनी इस वीडियो में गुंजा प्रदर्शन में बुर्का पहनकर जाने पर उठ रहे सवालों का जवाब भी देती हैं। वे कहती हैं कि कुछ ही दिन पहले रिपब्लिक की महिला पत्रकार को प्रदर्शनस्थल से खदेड़ दिया गया था। इसके अलावा दो दिन पहले खुद जब वह वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे के साथ जामिया में एक डिबेट के लिए गई थीं, तो उन्हें वहाँ से भी खदेड़ा गया था। वहाँ पर भी उनसे सवाल हुए थे कि वो कौन हैं? और उन्हें किसने भेजा है? इसलिए इस बार वे बुर्के में गईं।

गुंजा के अनुसार, इन प्रदर्शनों में उन्हीं लोगों को जाने की आजादी है। जिन्हें प्रदर्शनकारियों के विश्वसनीय सूत्रों ने भेजा हो। और अगर कोई अन्य शख्स इन प्रदर्शनों में शामिल हो जाए तो वहाँ बैठी महिलाएँ उसकी बातों का भरोसा नहीं करती हैं और उन्हें तुरंत घुसपैठिया करार दे दिया जाता है।

अपनी वीडियो में गुंजा उक्त सभी बातों का उल्लेख करके इसे शाहीन बाग का सच बताती हैं। वे कहती हैं कि जो शाहीन बाग संविधान की कसम लेता है, भारत के संविधान को सर्वोच्च बताता है, वही शाहीन बाग खुलकर कहता है कि उन्हें पुलिस पर भरोसा नहीं है।

गुंजा पूरी घटना पर अपना पक्ष और विचार रखते हुए विपक्ष में बैठे नेताओं से सवाल करती हैं। साथ ही पूछती हैं कि क्या भारतीय होने के बावजूद वे अब अपने देश में भी खुलकर कही नहीं आ जा सकती है? क्या उनके लिए बुर्के में पत्रकारिता करना मना है?

अरविन्द केजरीवाल ने भगवद्गीता का किया अपमान, श्रीकृष्ण को लेकर बोला झूठ

अरविन्द केजरीवाल ने भगवद्गीता का अपमान किया है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बातों को भी ग़लत तरीके से झूठ बोल कर पेश किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने अमित शाह पर निशाना साधने के लिए भगवद्गीता के नाम पर आरोप-प्रत्यारोप का बाण तो चलाया लेकिन इससे उनकी पोल भी खुल गई। उन्होंने जो बातें भगवान श्रीकृष्ण के हवाले से कहा, वो बातें उन्होंने अर्जुन से कही ही नहीं थी। जहाँ एक तरफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवद्गीता के एक श्लोक का शब्दशः जिक्र कर असम के लोगों का दिल जीत लिया, केजरीवाल का चुनावी प्रोपेगंडा लोगों को रास नहीं आया।

दरअसल, अरविन्द केजरीवाल ने अमित शाह को बहस के लिए चुनौती दी थी। अब उन्होंने दावा किया है कि केंद्रीय गृहमंत्री ने उनकी चुनौती को स्वीकार नहीं किया है। केजरीवाल ने दावा किया कि अमित शाह डर कर भाग गए हैं। ये अलग बात है कि भाजपा के कई नेता केजरीवाल को बहस की चुनौती देते हैं लेकिन इसका उनके या उनकी पार्टी की तरफ़ से कोई जवाब नहीं आता। केजरीवाल ने कहा:

“गीता में लिखा है कि एक सच्चा हिन्दू बहादुर होता है वो कभी मैदान छोड़कर भागता नहीं। मैंने अमित शाह को खुली बहस की चुनौती दी लेकिन वो मैदान छोड़कर भाग गए।”

सोशल मीडिया पर इतिहास विशेषज्ञ ‘ट्रू इंडोलॉजी’ ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के झूठ की पोल खोल दी। दरअसल, श्रीकृष्ण ने पूरे भगवद्गीता में कहीं भी ‘हिन्दू’ शब्द का जिक्र ही नहीं है। इस बारे में कई विशेषज्ञों ने बताया है कि भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहीं नहीं कहा है कि वो हिन्दुओं के देवता हैं। अव्वल तो ये कि उस समय ‘धर्म’ का प्रयोग उस अर्थ में नहीं होता था, जैसे आज किया जाता है। जैसे- हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई वगैरह। इसीलिए, श्रीकृष्ण ने ‘एक सच्चा हिन्दू’ कहीं कहा ही नहीं।

उधर असम के कोकराझार में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवद्गीता का उदाहरण देते हुए लोगों को समझाया कि भगवान श्रीकृष्ण ने बीच युद्ध में पाण्डवों से कहा था कि किसी भी प्राणी से बैर न रखने वाला प्राणी भी मेरा है। उन्होंने निम्लिखित श्लोक का जिक्र किया:

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।।11.55।।
हे पाण्डव! जो पुरुष मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, और मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, जो मेरा भक्त है तथा संगरहित है, जो भूतमात्र के प्रति निर्वैर है, वह मुझे प्राप्त होता है।

अरविन्द केजरीवाल इससे पहले भी हिन्दुओं की भावनाएँ भड़काने का काम कर चुके हैं। उन्होंने हनुमानजी को लेकर आपत्तिजनक कार्टून शेयर किया था। साथ ही उन्होंने पवित्र चिह्न स्वस्तिक को लेकर भी आपत्तिजनक चित्र ट्वीट किया था।

हम 70 नहीं, 700 साल से मौजूद हैं, PM मोदी संविधान पढ़ें: राहत इंदौरी

सीएए के ख़िलाफ़ मुखर होकर मोदी सरकार की आलोचना करने वालों में एक नाम मशहूर शायर राहत इंदौरी का भी है। यूँ तो राहत इंदौरी समय दर समय अपनी शायरियों के जरिए सत्ता पर सवाल उठाते रहते हैं। लेकिन, इस बार उन्होंने संशोधित नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ बड़वाली चौकी इलाके में चल रहे प्रदर्शन में शामिल होकर मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसी ‘शिक्षित व्यक्ति से’ संविधान समझने की सलाह दी है। 70 वर्षीय राहत इंदौरी ने कहा, मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दरख्वास्त करना चाहूँगा कि अगर वह संविधान पढ़ नहीं पाए हैं, तो किसी पढ़े-लिखे आदमी को बुला लें और उससे संविधान पढ़वाकर समझने की कोशिश करें कि इसमें क्या लिखा है और क्या नहीं।

इस प्रदर्शन में सीएए, एनपीआर और एनआरसी के मुद्दों पर दिल्ली के शाहीन बाग और इंदौर के अलग-अलग इलाकों में जारी विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए राहत इंदौरी ने कहा, “यह लड़ाई भारत के हर हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई की लड़ाई है। हम सबको मिलकर यह लड़ाई लड़नी है।” इसके बाद फैज अहमद फैज की नज्म “हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे” को एक धर्मविशेष के खिलाफ बताए जाने वाली बात की ओर सीधा इशारा करते हुए इंदौरी ने कहा कि कुछ लोगों ने फैज की इस कृति का मतलब ही बदल दिया।

इंदौरी के अनुसार, कुछ लोगों ने फैज की नज्म को गलत समझा, लेकिन इससे उन्हें कोई अचंभा नहीं हुआ। उनका मानना है कि ऐसा करने वाले लोग कम पढ़े लिखे हैं। और ऐसे लोग न तो हिंदी जानते हैं और न ही उर्दू।

राहत इंदौरी ने प्रदर्शन में केरल के नेता की वायरल वीडियो का भी मुद्दा उठाया और कहा “मैं 70 साल का हो गया हूँ, मुझे अभी तक मालूम नहीं पड़ा कि मैं जेहादी हो गया हूँ।”

उन्होंने कहा- मैं मर जाऊँ तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना। वे बोले- उठा शमशीर, दिखा अपना हुनर, क्या लेगा, ये रही जान, ये गर्दन है, ये सर, क्या लेगा…एक ही शेर उड़ा देगा परखच्चे तेरे, तू समझता है ये शायर है, कर क्या लेगा।

एक के बाद एक शायरियों को सुनाकर इंदौरी ने इस प्रदर्शन में सरकार के प्रति अपनी कुँठा निकाली। उन्होंने सुनाया- आँखों में पानी रखों, होंठो पे चिंगारी रखो, जिंदा रहना है तो तरकीबे बहुत सारी रखो…मैं वहीं कागज हूँ, जिसकी हुकूमात को हैं तलब, दोस्तों मुझ पर कोई पत्थर जरा भारी रखो।

यहाँ राहत इंदौरी नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज दिखाने पर तंज कसने से भी नहीं चूके। उन्होंने सुनाया कि- घरों के धंसते हुए मंजरों में रक्खे हैं, बहुत से लोग यहाँ मकबरों में रक्खे हैं…हमारे सर की फटी टोपियों पे तंज न कर, ये डाक्युमेंट हमारे अजायबघरों में रक्खे हैं।

लंबे समय से चल रहे बड़वाली के इस प्रदर्शन में राहत इंदौरी ने कई शायरियाँ सुनाने के बाद ये भी कहा, “मैं समझता हूँ कि नरेन्द्र मोदी को इससे बड़ा डाक्युमेंट कोई नहीं दे पाएगा, जो हमारे पास मौजूद है। और सिर्फ 70 साल के नही बल्कि 700 साल के मौजूद है।”

कन्हैया कुमार पर फेंके गए जूते-चप्पल, 30 घंटे में तीसरी बार हमला: बिहार के लोगों को समझाने निकले हैं CAA और NRC

जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और CPI नेता कन्हैया कुमार के काफिले पर बिहार में फिर से हमला हुआ है। घटना कटिहार की है, जहाँ कन्हैया के काफिले पर जूते-चप्पल से हमला किया गया। कन्हैया के काफिले पर यह हमला उस वक्त हुआ, जब वो कटिहार के राजेंद्र स्टेडियम में सभा करने के बाद भागलपुर जा रहे थे। शहीद चौक के पास लोगों ने कन्हैया कुमार के विरोध में पेस्टर दिखाए और फिर आगे बढ़ने पर काफिल पर जूते-चप्पल फेंके गए।

हालाँकि कन्हैया के साथ चल रहे प्रशासन ने मामले में तत्परता दिखाते हुए गाड़ियों के काफिले को आगे बढ़ा दिया। बता दें कि कि एनआरसी और सीएए के खिलाफ कन्हैया पूरे बिहार के कई जिलों में जनसभाओं को संबोधित कर रहे हैं। इसी क्रम में आज प्रदर्शन के लिए कन्हैया कटिहार के राजेंद्र स्टेडियम पहुँचे थे जहाँ उन्होंने जनसभा की और सीएए और एनआरसी को लेकर केंद्र सरकार की खिलाफत की। 

गौरतलब है कि बिहार में हाल के दिनों में कन्हैया कुमार और उनके काफिले पर हमला करने की कई वारदातें सामने आई हैं। इससे पहले कन्हैया कुमार के काफिले पर बिहार के मधेपुरा जिले के पास गुरुवार (फरवरी 6, 2020) को अज्ञात उपद्रवियों द्वारा पथराव किया गया। यह 24 घंटों में कन्हैया के साथ दूसरी बार इस तरह की घटना हुई थी और अब लगभग 30 घंटे के भीतर इस तरह तीसरी घटना हुई है। 

उल्लेखनीय है कि इससे पहले बिहार के सुपौल में काफिले पर हुए पथराव में कन्हैया कुमार घायल हो गए थे। घटना के वक्त सुपौल में एक रैली को संबोधित करने के बाद कन्हैया सहरसा की ओर जा रहे थे। इस हमले में कन्हैया कुमार के ड्राइवर भी घायल हो गए थे। उन्हें नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

सीएए और एनआरसी के खिलाफ बिहार में चल रहे प्रोपेगेंडा के तहत गाँव-गाँव घूम रहे सीपीआई के नेताओं को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इससे पहले झंझारपुर में CPI नेता कन्‍हैया के काफिले को काला झंडा दिखाया गया था। वहीं अपने कार्यक्रम के लिए शिवहर से सीतामढ़ी जाते समय कुछ लोगों ने उनकी गाड़ी रोककर काले झंडे दिखाए और साथ ही कॉमरेड मुर्दाबाद के नारे लगाए थे।

कन्हैया कुमार पर फिर हमला, 24 घंटे में दूसरी बार: भारी पथराव के बीच बाल-बाल बचे

भूमिहार कन्हैया! मज़हब, जाति को धंधा बना कर दलाली करने वाले वामपंथी लम्पटों के सरगना हो तुम

‘कॉमरेड कन्हैया मुर्दाबाद’ के नारों से हुआ स्वागत, बिहार के लोगों को समझाने गए थे CAA और NRC

ममता की पुलिस ने कैलाश विजयवर्गीय को लिया हिरासत में, CAA के समर्थन में भाजपा की कोलकाता रैली को रोका

पश्चिम बंगाल में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के समर्थन में रैली निकाल रहे भारतीय जनता पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को हिरासत में लिया गया है। इस रैली की शुरुआत कोलकाता के टॉलीगंज फेरी से होने वाली थी। मगर जैसे ही बीजेपी नेताओं ने रैली की शुरुआत की, तभी कोलकाता पुलिस ने सभी नेताओं को हिरासत में ले लिया।

बताया जा रहा है कि कैलाश विजयवर्गीय के साथ ही कई अन्य बीजेपी नेताओं को भी हिरासत में लिया गया है। बता दें कि कोलकाता में CAA के समर्थन में बीजेपी द्वारा कैलाश विजयवर्गीय और मुकुल राय के नेतृत्व में रैली निकाली जा रही थी। लेकिन राज्य की ममता बनर्जी सरकार की पुलिस ने रैली को रुकवाया और उन्हें हिरासत में ले लिया।

पुलिस का कहना है कि भाजपा नेता पुलिस की अनुमति के बिना कथित रूप से मार्च आयोजित करना चाहते थे जिसके बाद उन्हें पुलिस वैन में हिरासत में लिया गया और स्थान से दूर ले जाया गया।

उल्लेखनीय है कि एक तरफ जहाँ विपक्षी पार्टियाँ CAA के विरोध में जमकर रैलियाँ कर रही हैं तो वहीं भारतीय जनता पार्टी CAA के समर्थन में रैली कर रही है। लेकिन भाजपा की रैली करने से रोका जा रहा है। जबकि विपक्षी पार्टियाँ भाजपा शासित राज्य में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। लेकिन भाजपा को अपने राज्य में CAA के समर्थन में रैली नहीं करने दे रही हैं।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लोकतंत्र की खूब दुहाई देती हैं। लेकिन यही ममता बनर्जी अपने राज्य में विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश कर रही हैं और तब उन्हें लोकतंत्र मजबूत नजर आता है।

बता दें कि पश्चिम बंगाल में CAA के खिलाफ जमकर हिंसा हुई थी। कैलाश विजयवर्गीय ने एक घटना का जिक्र करते हुए दावा किया था कि मजहबी भीड़ ने उनकी गाड़ी को घेर रखा था। उन्होंने ट्वीट किया है, “मुर्शिदाबाद जाते हुए मुझे नवग्राम के पास मुस्लिमों की बड़ी भीड़ ने घेर लिया है। मेरी गाड़ी के दोनों तरफ भीड़ जमा है। प्रशासन कोई सुनवाई नहीं कर रहा। SP और DG भी फ़ोन नहीं उठा रहे। पश्चिम बंगाल में अराजक सरकार के रहते कुछ भी हो सकता है। यहाँ किसी की जान सुरक्षित नहीं है।”

इससे पहले डीसीपी पर दंगाइयों ने बम फेंका था। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से हिस्सा की खबरें लगातार आ रही थी। सबसे ज्यादा नुकसान रेलवे की संपत्तियों को पहुॅंचाया गया। मालदा, उत्तर दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद, हावड़ा, उत्तर 24 परगना, बीरभूम, नदिया और हावड़ा जिलों से हिंसा, लूट और आगजनी की कई घटनाएँ सामने आई हैं।

केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने अपने बजट दस्तावेज पर छापी महात्मा गाँधी की हत्या वाली तस्वीर, मचा हंगामा

केरल की पी विजयन सरकार, बजट सत्र 2020-21 के लिए जारी बजट दस्तावेज के कवर पर महात्मा गाँधी की हत्या वाली तस्वीर छाप, विवादों के केंद्र में है। राज्य के बजट दस्तावेज के कवर पर महात्मा गाँधी की हत्या वाली तस्वीर छापने का बचाव करते हुए वित्त मंत्री थॉमस ईसाक ने इसे एक पॉलिटिकल स्टेटमेंट करार दिया।

रिपोर्ट्स के अनुसार ईसाक ने बजट कवर पर गाँधी की तस्वीर छापने का बचाव करते हुआ कहा कि उनकी सरकार ने एक संदेश देने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि यह एक मलयालम आर्टिस्ट की पेंटिंग है, जिसकी जरूरत इसलिए आन पड़ी क्योंकि आज नागरिकता कानून में संशोधन तथा एनआरसी के कारण देशभर में एक डर का माहौल है, युवा सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहा है।

ईसाक ने कहा, “हम उन लोगों को कभी नहीं भूल सकते जिन्होंने महात्मा गाँधी की हत्या की थी। यह बात आज के समय याद रखना और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है जब कि इतिहास को तोड़ मरोड़ कर दुबारा लिखने की कोशिशें हो रहीं हैं।”

केरल सरकार की बजट पर यही है वो कवर इमेज, जिस पर मचा बवाल

हालाँकि गाँधी के नाम राजनीति करती आई कॉन्ग्रेस को वामपंथी सरकार की यह कोशिश कतई नागवार गुजरी है। केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने कहा,”हम भी आरएसएस बीजेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं पर बजट दस्तावेज एक अलग विषय है, इसके कवर पर महात्मा गाँधी की हत्या वाली तस्वीर छापने की बिल्कुल जरूरत नहीं थी।”

कॉन्ग्रेस के सुर में सुर मिलाते हुए IUML नेता और विपक्ष के उपनेता एम के मुनीर ने कहा, “गाँधी जी का स्थान हमारे दिलों में है, उनको इस तरह राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना गलत है। यह नहीं होना चाहिए था।”

दिल्ली चुनाव 2020: बीजेपी ने 20-20 मैच की तरह बदली हवा पर कितनी सीटों पर खिलेगा कमल?

शिवमंगल सिंह सुमन की लिखी एक कविता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर सुनाते थे;

क्‍या हार में क्‍या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले
यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूँगा नहीं

मोदी-शाह की बीजेपी जिस तरह चुनाव लड़ती है आप उपरोक्त पंक्तियों को प्रेरक मान सकते हैं। नतीजे कैसे भी हो पार्टी लोकसभा से लेकर पंचायत तक के चुनाव किसी युद्ध की तरह लड़ती है। पार्टी संगठन किसी सेना की तरह नजर आती है जो एक लड़ाई खत्म होते ही दूसरे मोर्चे पर उसी स्फूर्ति, उसी ताजगी के साथ लग जाती है।

70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा का 2020 का चुनाव भी बीजेपी कुछ इसी तरह लड़ी है। एकतरफा लग रहे चुनाव को क्रिकेट के 20-20 मैच की तरह रोमांचक बना दिया है। जिस तरह 20-20 मैच जब क्लाइमेक्स की ओर बढ़ता है तो हर गेंद के साथ तेजी से समीकरण बदलने लगते हैं, कुछ इसी तरह जैसे-जैसे मतदान का वक्त करीब आते जा रहा है हर घंटे दिल्ली के समीकरण बदल रहे हैं।

बीजेपी की रणनीतियों पर गौर करने से पहले इस बात को समझते हैं कि 2019 के आम चुनावों में दिल्ली में तीसरे नंबर पर पहुॅंच गई आप ने कैसे मुकाबले को एकतरफा बनाया? इन चुनावों में दिल्ली की सभी सातों सीटें भाजपा को मिली थी। उसे 57 फीसदी वोट मिले थे। 22.5 फीसदी के साथ वह कॉन्ग्रेस दूसरे नंबर पर थी जो इस बार की चुनावी चर्चा से करीब-करीब गायब है। आप को महज 18 फीसदी वोट मिले थे।

इसी तरह 2017 में हुए निगम चुनावों में बीजेपी को 36.1 फीसदी, कॉन्ग्रेस को 21.1 फीसदी और आप को 26.2 फीसदी वोट मिले थे। अब 2015 के विधानसभा चुनाव के आँकड़ों पर गौर करें, जिसमें 70 में से 67 सीटें आप को मिली थी। उस चुनाव में आप को 54.3 फीसदी वोट मिले थे। बीजेपी को भले 3 सीटें मिली थी, लेकिन वोट 32.7 फीसदी मिले थे। कॉन्ग्रेस का खाता भी नहीं खुला था और वोट 9.7 फीसदी मिले थे। जाहिर है कॉन्ग्रेस को वोट करने वाला एक बड़ा तबका उस चुनाव में आप की तरफ झुक गया था। इसके कारण करीब 33 फीसदी वोट लाकर भी भाजपा 3 सीटों पर सिमट गई। लेकिन, 2017 के निगम चुनाव और 2019 के आम चुनाव बताते हैं कि परंपरागत वोटरों का एक तबका आप को छोड़ कॉन्ग्रेस की ओर लौट रहा था। फिर ऐसा क्या हुआ कि जब 6 जनवरी 2020 को दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान किया गया तो आप जबर्दस्त बहुमत के साथ सत्ता में लौटती नजर आ रही थी?

असल में, कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन में सुधार शीला दीक्षित के नेतृत्व में हो रहा था। वह 15 सालों तक राज्य की मुख्यमंत्री रही थीं। जब केजरीवाल हर दिन उपराज्यपाल और हर दूसरे दिन मोदी सरकार से लड़ रहे थे और ऐसा लग रहा था कि दिल्ली का पूरा प्रशासनिक अमला ठप पड़ा है तो एक वर्ग दीक्षित को याद करने लगा था। यही तबका निगम और लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस की ओर लौटा भी। लेकिन, जुलाई 2019 में दीक्षित के निधन के साथ ही कॉन्ग्रेस का संगठन फिर से पस्त पड़ गया। इससे आप को छोड़ कॉन्ग्रेस की ओर लौटने का सिलसिला न केवल रुका, बल्कि 2019 के आखिर में फिर से यह वर्ग आप के पक्ष में लामबंद भी दिखने लगा। जब एक पार्टी 50 फीसदी के करीब वोट लाती दिख रही हो तो नतीजों में करिश्मा ही होता है। जैसा कि दिल्ली के 2014 और 2019 के आम चुनावों और 2015 के विधानसभा चुनावों में हुआ था। इसके अलावा, फ्री बिजली-पानी और सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने का शिगूफा भी आप के लिए जादू करता दिख रहा था।

ऐसे माहौल में दिल्ली में 15 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में जामिया में हिंसा हुई। फिर सीलमपुर में। लेकिन, बीजेपी के लिए चीजें बदलनी शुरू हुई 5 जनवरी को जेएनयू में हिंसा के बाद से। शाहीन बाग में धरना उससे पहले ही शुरू हो चुका था। विपक्षी दलों को उम्मीद थी कि इनसे न केवल दिल्ली में भाजपा की कब्र खुदेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी वह इससे उबर नहीं पाएगी। लेकिन, जेएनयू और शाहीन बाग की घटनाओं ने जैसे-जैसे मोड़ लेना शुरू किया चीजें बदलती गईं। जेएनयू की घटना के करीब एक हफ्ते बाद महसूस किया जाने लगा कि शाहीन बाग और जेएनयू से जो हवा चल रही है वह दिल्ली के मतदाताओं के मूड पर असर कर रही है। बीजेपी ने भी समय रहते इस भाँप अपनी रणनीति बनानी शुरू की।

एक तरफ केंद्रीय राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर और सांसद प्रवेश वर्मा अपने बयानों से बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं के मन में शाहीन बाग की अराजकता से पैदा हुए भाव को गहरा कर रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि सोचा-समझा प्रयोग है” और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने “8 फरवरी को कमल के फूल का बटन इतनी जोर से दबाना के बटन यहॉं दबे लेकिन करंट शाहीन बाग में लगे” जैसे बयानों से इसे धार दी। दूसरी ओर, पार्टी मोहल्ला क्लीनिकों और सरकारी स्कूलों की पोल भी खोल रही थी। इससे यह धारणा टूटी कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायाकल्प हो चुका है।

19 जनवरी को रात अमित शाह ने एक बैठक ली। इस बैठक में चुनिंदा विधायकों, सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों के अलावा 300 से ज्यादा ऐसे बीजेपी कार्यकर्ता मौजूद थे, जिन्हें सांगठनिक कामों में महारत है। इन्हें देशभर से चुनकर बुलाया गया था। इन सभी को शाह ने माइक्रोमैनेजमेंट के काम पर लगाया। हर लोकसभा की 10 विधानसभा सीटों पर दो-दो नेताओं को लगाया गया। भाषण, व्यवस्था और चुनाव संचालन की जिम्मेदारी इन्हें दी गई। किस इलाके में कौन सा नेता जाएगा, किस मुद्दे पर बात करेगा, घर-घर संपर्क किस तरह किया जाएगा… जमीन पर तमाम रणनीति यही लोग तय कर रहे थे।

उम्मीदवारों का चुनाव बेहद सावधानी से किया गया। जमे-जमाए और कद्दावरों को बेटिकट करने से भी पार्टी नहीं हिचकिचाई। पालम, बृजवासन, विकासपुरी, दिल्ली कैंट, हरि नगर, जनकपुरी, द्वारका जैसी सीटों पर चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी को इसका फायदा होता साफ-साफ दिख रहा था। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग जो आप के सबसे मजबूत वोट बैंक माने जाते हैं, उन्हें लुभाने के लिए रामलीला मैदान में मोदी ने एक रैली की। ‘जहॉं झुग्गी वहीं पक्का मकान’ का वादा किया। फिर 300 सांसदों की फौज उतार उन्हें झुग्गी-झोपड़ी में समय बिताने को कहा। सांसदों की फौज बीजेपी ने 2015 के विधानसभा चुनाव में भी उतारी थी। लेकिन उस वक्त इसे आज की तरह न तो आक्रामक और न खुले तरीके से अंजाम दिया गया था।

20 जनवरी को जेपी नड्डा के लिए बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी खाली करने के बावजूद शाह ने इस चुनाव के सारे सूत्र अपने हाथ में रखे। प्रचार के दौरान वे खुद सभी 70 विधानसभा सीटों पर पहुॅंचे। रोड शो किए या फिर सभाएँ की। इस बात को लेकर शाह का मजाक भी बनाया गया कि ‘चाणक्य’ गली-गली पर्चे बाँट रहे हैं। कथित गोदी मीडिया ने भी इसे खूब हवा दी और गलियों में शाह के जनसंपर्क को केजरीवाल के काम और लोकप्रियता से जोड़ा। लेकिन, जमीन पर शाह की इस रणनीति का बीजेपी को दोहरा फायदा हुआ। इससे उन नेताओं ने प्रचार में पूरी ताकत झोंकी जिन्होंने टिकट नहीं मिलने पर खुद को प्रचार से अलग कर रखा था।

दूसरे, जनसंघ के जमाने के बुजुर्ग समर्थक भी कई चुनावों के बाद दिल्ली की गलियों में भाजपा के लिए सक्रिय हुए। ऐसे ही एक समर्थक एके टांगरी से मेरी मुलाकात हरि नगर में हुई। स्टेट बैंक के वरिष्ठ अधिकारी रहे टांगरी ने बताया, “जब देश का गृह मंत्री घर आकर पर्चे दे जाता है तो आप भी बिना कुछ कहे घर से निकल पार्टी के लिए काम करने लगते हैं। अमित शाह ने खुद सड़क पर उतर कर उन लोगों में भी जोश भर दिया है जो मान बैठे थे कि कुछ नहीं हो सकता। आप दोबारा जीतेगी।” बकौल टांगरी, हर चुनाव में नाम और चेहरे से वोट नहीं मिलते। बीजेपी ने इस बात को समझा और उसका पूरा नेतृत्व जमीन पर उतरा। वे कहते हैं, “कॉन्ग्रेस का नेतृत्व जमीन से कटा है इसलिए उसकी ऐसी दुर्दशा है।”

जमीन पर हुए इसी बदलाव ने आप को आखिर में बीजेपी के पिच पर आकर खेलने को मजबूर कर दिया। उसने शाहीन बाग से पिंड छुड़ाने की कोशिश की लेकिन कपिल गुर्जर के मामले में हुए खुलासे से वह इसमें और धॅंस गई। हिंदुओं की हितैषी साबित करने की जुगत में खुद केजरीवाल ने हनुमान चालीसा पढ़ा। इसके अलावा चुनावों में कहीं दिख नहीं रही कॉन्ग्रेस का करीब दर्जनभर सीटों पर मजबूती से लड़ना भी आप के गले की फॉंस बन गया है। इनमें वे मुस्लिम बहुल सीटें भी हैं जिनका एकमुश्त वोट पहले आप को मिलने का अनुमान लगाया जा रहा था।

ऐसे में हवा बदलने की बीजेपी की रणनीति वोटों में कितना बदल पाई, यह 11 फरवरी को नतीजे आने के बाद ही पता चलेंगे। लेकिन, मतदान से ठीक पहले बीजेपी ने खुद को उस स्थिति में तो जरूर ला खड़ा किया है कि अब धुर विरोधी भी दिल्ली में मुकाबले की बात मानने लगे हैं।

करिश्मे का गणित

2017 के अंत में गुजरात में विधानसभा के चुनाव हुए थे। उस चुनाव में बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच कॉंटे का मुकाबला बताया जा रहा था। यह भी कहा जा रहा था कि बीजेपी हार सकती है। खुद मोदी को पूरी ताकत झोंकनी पड़ी थी। भारत कैसे हुआ मोदीमय के लेखक वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार बताते हैं, “उस चुनाव के दौरान बीजेपी की एक इंटरनल मीटिंग में अमित शाह ने कहा हमारे 1.25 करोड़ मिस्ड कॉल कार्यकर्ता हैं। इनमें 60 लाख वेरिफाइड हैं। यदि ये कार्यकर्ता दो-दो अतिरिक्त वोट भी ले आएँ तो बीजेपी को 1.80 करोड़ वोट मिलेंगे। गुजरात में करीब पौने तीन करोड़ वोट पड़ते हैं। यानी हमें जीतने के लिए 1.40 करोड़ वोट चाहिए।” बकौल कुमार उस चुनाव में बीजेपी को करीब 1.49 करोड़ वोट मिले थे।

इस कसौटी पर दिल्ली को परखते हैं। दिल्ली में करीब डेढ़ करोड़ वोटर हैं। 2015 के विधानसभा में करीब 67 फीसदी मतदान हुआ था। यदि इस बार भी ऐसा हुआ तो एक करोड़ के करीब वोट पड़ेंगे। दिल्ली में इस वक्त भाजपा के सदस्यों की संख्या 62 लाख के करीब है। यदि इन सभी ने बीजेपी के लिए वोट डाले तो 11 फरवरी को करिश्मा तय है।

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मारा गया अलकायदा का डेप्युटी लीडर कासिम अल-रिमी: जिस इस्लामी देश में छिपा था, वहीं मार गिराया

अमेरिका ने यमन में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान AQAP (अल-कायदा इन अरब पेनिनसुला) के संस्थापक और अल-कायदा के दूसरे नंबर के नेता कासिम अल-रिमी को यमन में मार गिराया। कासिम अल-रिमी के साथ ही इस अमेरिकी हमले में अल-कायदा नेता अयमान अल-जवाहिरी भी मारा गया।

स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कासिम अल-रिमी को ढेर किए जाने का दावा किया है। कासिम अल-रिमी को अलकायदा ने अरब देशों में आतंक की कमान संभालने की जिम्मेदारी दे रखी थी। उसे आतंकी सरगना अयमान-अल जवाहिरी के बाद अलकायदा में दूसरे नंबर पर माना जाता था।

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक बयान में कहा, “रिमी के नेतृत्व में ‘अल-कायदा इन अरब पेनिनसुला’ (एक्यूएपी) ने यमन में नागरिकों के खिलाफ अनुचित हिंसा की, अमेरिका और हमारी सेना के खिलाफ कई हमलों को अंजाम दिया।” अपने बयान में ट्रंप ने आगे कहा, “उसकी मौत से एक्यूएपी और कमजोर होगा, साथ ही विश्व स्तर पर अल कायदा भी कमजोर पड़ेगा। यह हमें हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले ऐसे संगठनों का अंत करने के हमारे लक्ष्य के और करीब लाता है।”

ट्रंप ने कहा है कि उनके निर्देश पर अमेरिकी ने आतंक रोधी ऑपरेशन को अंजाम दिया है। ज्ञात हो कि कासिम अल-रिमी ने ही पिछले साल अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित पेंसकोला नौसैनिक बेस पर एक सऊदी ट्रेनी ने फायरिंग कर तीन अमेरिकी नौसैनिकों की हत्या कर दी थी। ट्रंप ने बयान में कहा रिमी की मौत के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी अब और ज्यादा सुरक्षित हैं।

अलकायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी के सहयोगी कासिम अल-रिमी (46) को 2015 में अमेरिका के सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों की सूची में शामिल किया था। अमेरिका ने रिमी की सूचना देने वाले को एक करोड़ डॉलर का पुरस्कार देने की घोषणा की थी।

अमेरिका एक्यूएपी को ओसामा बिन लादेन द्वारा स्थापित अल कायदा की सबसे खूंखार शाखाओं में से एक मानता आया है। यमन में ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि मरिब इलाके में रिमी ड्रोन हमले में मारा गया है।