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प्यार के लिए खतना तक कराया, दर्द सहे: ईसाई युवक को मुस्लिम प्रेमिका के अब्बा ने पीट कर भगाया

बोब्बिली भास्कर ने इस्लाम अपनाया क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था। लड़की के पिता ने वादा किया था कि अगर भास्कर ने इस्लाम अपना लिया तो दोनों का निकाह कर दिया जाएगा लेकिन वो बाद में मुकर गया। बोब्बिली ने अपनी कहानी ‘स्वराज्य मैग’ के स्वाति गोयल शर्मा के साथ शेयर की। लड़की के अब्बा ने भास्कर ने कहा कि अगर उसने खतना करा लिया तो वो उसे अपना लेगा। ईसाई समुदाय में जन्मे भास्कर ने लड़की के पिता को ‘अल्लाह की क़सम’ दी और धन्यवाद दिया, लेकिन उसे क्या पता था कि ये सब करने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिलेगा।

उसने एक स्थानीय इस्लामी संगठन से ‘धर्मान्तरण सर्टिफिकेट’ भी प्राप्त किया। उसके बाद वो सर्जिकल प्रक्रिया से गुजरा। 25 वर्षीय भास्कर तेलंगाना के विकाराबाद जिले का रहने वाला है। हैदराबाद से वाकिराबाद लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। उसे जून 10, 2019 को ‘मुस्लिम वेलफेयर आर्गेनाईजेशन तन्दुर’ से धर्मान्तरण सम्बन्धी प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ था। उसका इस्लामी नाम मोहम्मद अब्दुल हुनैन रखा गया। उसके खतने की प्रक्रिया भी वाकिराबाद के ही एक हॉस्पिटल में हुई। ये सर्जिकल प्रक्रिया एक मुस्लिम डॉक्टर ने पूरी की।

इस प्रक्रिया के कारण न सिर्फ़ उसे लगातार दर्द रहता है, बल्कि शरीर के साथ-साथ उसके मन पर भी इसका गहरा आघात पड़ा है। उसने कहा कि अगर उसकी गर्लफ्रेंड के परिवार ने उसे बाध्य नहीं किया होता तो वो इस प्रक्रिया से कभी नहीं गुजरता। उसे अपना खतना कराने का काफ़ी पछतावा भी है। उसने कहा कि उसे अभी भी दर्द रहता है। हालाँकि, इसके बाद भी लड़की के अब्बा ने भास्कर से कहा कि वो इस्लामी रहन-सहन अपनाए क्योंकि केवल खतना कराने से कुछ नहीं होगा।

भास्कर पहले शुद्ध शाकाहारी था लेकिन अपनी गर्लफ्रेंड को पाने के लिए उसने माँसाहार शुरू किया। ईसाई होने के कारण पहले वो चर्च जाता था लेकिन फिर वो दिन भर में 5 बार नमाज़ पढ़ने लगा। वो अपनी गर्लफ्रेंड को पाने के लिए इतना बेताब था कि उसने नमाज पढ़ते हुए और इस्लामी आयतें पढ़ते हुए कई वीडियो बनाए और लड़की के परिवार वालों को संतुष्ट करने के लिए उन्हें भेजे। इसके बाद जब वो लड़की के अब्बा के पास पहुँचा और बताया कि वो कैसे एक मुस्लिम बन गया है, उसकी गर्लफ्रेंड के अब्बा ने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वो उसे जानते ही न हों।

लड़की के परिजनों व रिश्तेदारों ने मिल कर भास्कर की जम के पिटाई की। उसने लड़की के परिजनों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई लेकिन उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई। उसने अपनी गर्लफ्रेंड निकत सुल्ताना, उसके पिता सलीमुद्दीन के अलावा आसिफ, सिराज और लतीफ़ के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया, जिन्होंने उसकी पिटाई की थी। भास्कर और निकत एक-दूसरे को 11 सालों से जानते हैं और एक ही स्कूल से पढ़े हैं। उसने बताया कि निकत कुछ दिनों पहले ही उसके पास आई थी और निकाह के लिए गुहार लगा रही थी। उसने बताया कि उसकी गर्लफ्रेंड के परिजनों ने निकत को घर में ही नज़रबंद कर दिया था।

भास्कर ने जब मुस्लिम समाज के स्थानीय प्रबुद्ध जनों को हस्तक्षेप करने को कहा और अपना दुखड़ा सुनाया तो उन्होंने दोनों पक्षों की बैठक कराई। बैठक में ही उसकी पिटाई की गई। उसने बताया कि तब से निकत के परिवार वालों ने उसकी ग्रलफ्रेंड से उसकी बात नहीं कराई है। अब इस मामले में सुनवाई होनी है। उसने बताया कि उसके खतने में हज़ारों खर्च हो गए और अब वह वकील को रुपए दे रहा है ताकि केस लड़ सके। इस चक्कर में उसके कितने ही रुपए उड़ गए हैं। उसे अब बस निकत के निर्णय का इन्तजार है।

क्या है कॉन्ग्रेस का भविष्य: सीट शून्य, वोट शेयर 4%, 63 की जमानत जब्त, दूसरों की हार पर ख़ुशी

इस बात में कोई दो राय नहीं कि देश की आजादी के बाद से सबसे अधिक समय तक दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज किया है। लेकिन आज आए दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम में देश की एक बड़ी पार्टी को लगातार दूसरी बार शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है।

एक तो हार हुई। ऊपर से 66 उम्मीदवार में से 63 कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों की जमानत जब्त होना इस बात की गवाही देता है कि, यह हार से भी बड़ी शर्मनाक हार तो है। साथ ही यह चुनावी परिणाम दर्शाते हैं कि, कॉन्ग्रेस पतन की ओर जा रही है। यही कारण है कि दिल्ली चुनाव परिणामों के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं ने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। दिल्ली कॉन्ग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेत्री और पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्टा मुखर्जी ने में दिल्ली हार के लिए पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है।

इससे भी बड़ी बात यह कि पार्टी के वरिष्ठ नेता इस बाद से दुखी नहीं हैं कि, दिल्ली चुनावों में कॉन्ग्रेस पार्टी की हार हुई है, बल्कि इस बात से ज़्यादा खुश हैं कि दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में नहीं आ सकी। इस पर भी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने चुटकी ली।

दिल्ली में बीजेपी के सत्ता में न आने और अरविंद केजरीवाल के दिल्ली की सत्ता में एक बार फिर से वापसी करने पर कॉन्ग्रेस की खुशी इस बात का इशारा करती है कि, पार्टी दिल्ली पहले ही हार मानकर खुलकर न सही, लेकिन अंदर खाने बीजेपी को किसी भी तरह से दिल्ली की सत्ता में न आने देने के लिए केजरीवाल को जरूर समर्थन दिया होगा।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि देश की एक बड़ी पार्टी का चुनावी मैदान में बिना उतरे ही एक राज्य की छोटी सी पार्टी के सामने अपने सारे हथियार डाल देना। यह प्रदर्शित करता है कि राहुल गाँधी किसी भी रूप में अपने आपको मोदी के सामने खड़ा होने की हिम्मत नहीं रखते। इतना ही नहीं राहुल गाँधी की नर्वसता उस दिन साफ़ देखी गई कि, जब राहुल गाँधी दिल्ली की इकलौती अपनी जनसभा में बोल बैठे, “6 महीने बाद मोदी को देश के युवा डंडा मारेंगे।” दिल्ली में कॉन्ग्रेस की इकलौती जनसभा में दिया राहुल गाँधी का यह बयान पार्टी के गले की फाँस बन गया, जिसे लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के कई बड़े नेताओं को सफाई तक देनी पड़ी।

इसके बाद तो समझो कॉन्ग्रेस चुनाव प्रचार से गायब ही हो गई, लेकिन अच्छी बात यह रही कि कॉन्ग्रेस के नीरस चुनाव प्रचार का दिल्ली का जनता ने भी उसी तरह से सम्मान किया, जिस तरह से राहुल ने अपने भाषणों में देश के प्रधानमत्री नरेन्द्र मोदी का सम्मान किया था। हालाँकि, राहुल गाँधी के साथ पार्टी के पदाधिकारी पिछले साल महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बनी अपनी सरकार से जागी उम्मीदें भी अब समाप्त हो चुकी है।

दिल्ली हार के बाद पार्टी नेतृत्व को सदमा लगना लाज़िमी है, क्योंकि दिल्ली में शीला युग की शुरूआत 1998 से मंहगाई के बीच हुए दिल्ली चुनावों में विजय हासिल करने के साथ हुई थी। तब कॉन्ग्रेस पार्टी शीला दीक्षित के नेतृत्व में 70 में से 54 सीटों पर जीतकर आई और सरकार बनाई और वहीं सुषमा स्वराज के नेतृत्व वाली बीजेपी पार्टी को मात्र 15 सीटें लेकर करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 2003 में हुए विधानसभा चुनावों में एक बार फिर कॉन्ग्रेस को 70 में से 47 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी कुछ बढ़त के साथ 20 पर ही सिमट गई।

आश्चर्य तो तब हो गया कि जब 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में शीला ने 43 सीटों के साथ दिल्ली में हैट्रिक लगा दी। कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी को दिल्ली में लगातार तीसरी बार मिली जीत, शीला दीक्षित की नेतृत्व क्षमता और दिल्ली में कराए विकास कार्यों का ही परिणाम था, लेकिन इसे पार्टी ने अपने हाथों से मिटा दिया।

इसके साथ ही देश में चल रही मनमोहन सिंह सरकार में मंत्रियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार और घोटाले एक के बाद एक उजागर होने लगे और देश में तत्कालीन केन्द्र सरकार के ख़िलाफ लोगों में उबाल पैदा होने लगा। इस आक्रोश को हवा तब मिली कि जब अन्ना ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और लोकपाल की माँग को लेकर दिल्ली में आंदोलन शुरू कर दिया। इस आंदोलन का असर लोगों पर कुछ इस तरह से हुआ कि दशकों से केन्द्र की सत्ता में काबिज कॉन्ग्रेस सरकार को एक झटके में उखाड़ के फेंका और विकल्प के रूप में जनता ने नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बना दिया।

इसी बीच अन्ना के आंदोलन से एक ऐसा चेहरा लोगों के सामने आया जिसने भ्रष्टाचार की लड़ाई अन्ना के साथ लड़ी और इसी के साथ अन्ना के आंदोलन में अन्ना के सहतयोगी रहे अरविंद केजरीवाल ने अपनी नई पार्टी बनाकर दिल्ली विधासभा का चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया और पहली बार में ही यानि कि, 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में केजरीवाल ने कॉन्ग्रेस से मिलकर सरकार तो बना ली, लेकिन आप का कॉन्ग्रेस से गठबंधन अधिक समय नहीं चला और आप ने अपने हाथ खींचते हुए ऐलान किया कि दिल्ली में काम करने के लिए जनता का पूर्ण समर्थन चाहिए।

2015 में फिर से हुए दिल्ली चुनावों में कुछ ऐसा ही परिणाम आया जैसा कि केजरीवाल को अपेक्षा थी। केजरीवाल ने 70 में से 67 सीटों पर अपनी जीत हासिल कर सरकार बना ली। कुछ ऐसा ही हुआ आज आए परिणाम में कि, आप सरकार ने सभी को पछाड़ते हुए दिल्ली में दोबारा पूर्ण बहुमत से अधिक सीटें हासिल की है। वहीं बीजेपी ने जरूर पिछले वर्ष की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन करते हुए सीटों में बढ़ोत्तरी की है।

यह परिणाम कॉन्ग्रेस के लिए बेहद शर्मनाक हैं, क्यों दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी की 0 सीटें आना तो उतना शर्मनाक न भी हो, लेकिन 66 में से 63 सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाना ये ज़्यादा शर्मनाक है। इसलिए पार्टी को पतन की ओर जाते देख पार्टी के नेताओं को सदमा लगना लाज़िमी है।

अपनी ‘दीदी’ स्मृति ईरानी की राह पर चले बग्गा, हारने के बावजूद निभाएँगे क्षेत्र की बच्चियों से किया वादा

भाजपा के समर्थक हमेशा कहते हैं कि उनकी पार्टी ‘Party With Difference’ और इसके लिए वो तरह-तरह की दलीलें भी देते हैं। जैसे आम आदमी पार्टी ने चीजें मुफ्त कर दी लेकिन भाजपा ने कभी इस मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ा क्योंकि अन्य राज्यों में ये संभव नहीं है। भाजपा ने राष्ट्रवाद के मुद्दे को नहीं छोड़ा और दुष्प्रचार के बावजूद सीएए, एनआरसी, तीन तलाक़, अनुच्छेद 370 और राम मंदिर पर अपने स्टैंड पर कायम रही। ये सभी चीजें मैनिफेस्टो में थीं और पार्टी ने पूरा किया। तेजिंदर पाल सिंह बग्गा अपनी पार्टी की इसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तेजिंदर सिंह बग्गा को पार्टी ने हरि नगर विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा था। उन्होंने अपने क्षेत्र के लिए अलग से मैनिफेस्टो जारी किया था, कई वादे किए थे। हालाँकि, तेजिंदर सिंह बग्गा जीत नहीं पाए। उन्हें आम आदमी पार्टी के राजकुमारी ढिल्लों ने 20,220 वोटों से मात दे दी। AAP उम्मीदवार ढिल्लों को जहाँ 57,892 मत मिले, बग्गा को 37,672 वोटों से संतोष करना पड़ा। अन्य सीटों की तरह ही यहाँ भी कॉन्ग्रेस की जमानत जब्त हो गई।

राजकुमारी को 53.67% वोट मिले, वहीं तेजिंदर को 35.07% वोट प्राप्त हुए। दोनों के बीच मतों का अंतर 18.6% का रहा। ट्विटर पर विरोधियों ने बग्गा को ट्रोल करना शुरू कर दिया। उनका मजाक बनाया जाने लगा। लोकतंत्र में जीत-हार होती रहती है लेकिन तेजिंदर सिंह बग्गा को जबरदस्ती व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया जाए। वो समय-समय पर देश के सशस्त्र बलों के लिए धनराशि दान करते रहते हैं लेकिन उन्हें इसके लिए भी विरोधी निशाना बनाते हैं।

इसी बीच उन्होंने एक ऐसा फ़ैसला लिया, जिससे केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की यादें ताज़ा हो जाती हैं। उन्हें 2014 लोकसभा चुनाव में अमेठी में हार मिली थी लेकिन उन्होंने ज़मीन पर ऐसा काम किया कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को 2019 में पटखनी देकर ‘The Giant Slayer’ का खिताब पाया। इसी तरह बग्गा ने भी वादा किया था कि अगर वो चुनाव जीत जाते हैं तो लड़कियों के लिए ‘सेल्फ डिफेंस कोचिंग सेंटर’ की स्थापना करेंगे। दिल्ली में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों को देखते हुए ये एक बेहतर क़दम है।

अब जब तेजिंदर पाल सिंह बग्गा चुनाव हार गए हैं, फिर भी उन्होंने अपना वादा पूरा करने की ओर क़दम बढ़ा दिए हैं। उन्होंने कहा कि वो बच्चियों से किया वादा पूरा करेंगे और हरि नगर में उनके लिए ‘आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देने वाला कोचिंग सेंटर’ खुलेगा। उन्होंने कहा कि भले ही वो हार गए हों, वो अपने क्षेत्र की जनता से किया गया वादा व्यक्तिगत रूप से पूरा करेंगे। अब देखना होगा कि अपनी ‘दीदी’ स्मृति की राह पर चलने वाले बग्गा के इस क़दम का जनता पर क्या असर होता है।

फिर उफान मारने लगा केजरीवाल के PM बनने का सपना, फिर मोदी से तुलना करने में जुटा मीडिया

अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी एक बार फिर से राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा लेकर आगे बढ़ रही है। दोपहर तक जैसे ही दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम की तस्वीरें पूरी तरह साफ़ हुई, केजरीवाल की पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से अपने नेशनल एम्बिशन को जाहिर कर दिया। सीएम केजरीवाल के भीतर पीएम बनने का सपना बार-बार उफान मारता रहता है, ये किसी से छिपा नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में वो वाराणसी में नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ लड़ने पहुँच गए थे, जहाँ उन्हें बुरी हार मिली थी। इसके साथ ही AAP की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पर भी ताले लग गए थे।

हालाँकि, गोवा से लेकर हरियाणा तक पार्टी ने दाँव-पेंच आजमाए लेकिन सफलता कहीं नहीं मिली। आम आदमी पार्टी हर जगह नोटा और वामपंथियों से ही मुक़ाबला करती रही। ये भी जानने वाली बात है कि राजस्थान और पंजाब में पार्टी ने बेहतर परिणाम की उम्मीद की थी, लेकिन दोनों ही राज्यों में उन्हें जनता का प्यार नहीं मिला। अब आते हैं AAP के ताज़ा ट्वीट पर, जिनमें पार्टी ने लिखा है- “हम राजनीति करने नहीं, राजनीति बदलने आए हैं। क्रांति का हिस्सा बनिए, AAP ज्वाइन कीजिए।“

उधर जदयू से निष्काषित किए गए नेता पवन वर्मा ने भी केजरीवाल की तारीफ की है। कहा जा रहा है कि आगामी बिहार चुनावों में पार्टी पूरी ताकत लगाएगी। आम आदमी पार्टी के भीतर राष्ट्रीय पार्टी बनने का भूत फिर से सवार हो गया है। लेकिन, जिस तरह से विपक्षी एकता की रैलियों में केजरीवाल को नज़रन्दाज़ किया जाता है और कुछ में तो वो हिस्सा ही नहीं लेते क्योंकि उन्हें ‘उचित सम्मान’ नहीं मिलता। हमने देखा था जब हाल ही में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में हुई सीएए विरोधी बैठक में केजरीवाल ने हिस्सा नहीं लिया था।

अब फिर से पत्रकार अरविन्द केजरीवाल को पीएम मोदी के टक्कर का चेहरा बना कर पेश करेंगे। उनका महिमामंडन किया जाएगा, बावजूद इसके कि क्षेत्र और जनसंख्या के हिसाब से देखें तो दिल्ली की उनकी जीत का ये अर्थ कतई नहीं निकलता कि यूपी और बिहार जैसे बड़े राज्यों में भी AAP पाँव पसार ही लेगी। लेकिन, पत्रकारों के एक विशेष वर्ग की कोशिश जारी रहेगी।

‘हम एक बार फिर नकारे गए, आत्ममंथन बहुत हो चुका, अब कार्रवाई का वक्त, शीर्ष पर निर्णय लेने में देरी भी वजह’

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार की तीसरी बार वापसी होने वाली है। रुझानों में AAP को 62 सीटें मिलती दिख रही है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी 12 सीटों पर आगे है, लेकिन कॉन्ग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई। कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन पर अब उनके नेता ही सवाल उठाने लगे हैं।

चुनाव परिणाम आने के बाद कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने ट्वीट किया, “दिल्ली में हम एक बार फिर नकार दिए गए। आत्ममंथन बहुत हो चुका, अब कार्रवाई का वक्त है। शीर्ष पर निर्णय लेने में देरी, रणनीति और राज्य स्तर पर एकता में कमी, हतोत्साहित कार्यकर्ता, जमीनी स्तर पर जुड़ाव में कमी- ये सभी कारक रहे हैं। सिस्टम का हिस्सा होने के नाते, मैं अपने हिस्से की जिम्मेदारी लेती हूँ।”

चुनाव नतीजों में अब तक पार्टी का एक भी जगह पर खाता नहीं खुला है। इस बीच पार्टी के भीतर की अंदरूनी कलह भी सामने आने लगी है। शर्मिष्ठा मुखर्जी ने इस ट्वीट के जरिए दिल्ली की हार पर जमकर सवाल खड़े किए। शर्मिष्ठा ने इसके लिए पार्टी आला कमान को भी जिम्मेदार ठहराया है।

इसके साथ ही कॉन्ग्रेस सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के लिए पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन को दोषी ठहराया है। प्रताप सिंह बाजवा ने मंगलवार (फरवरी 11, 2020) को दिल्ली चुनाव में हार के लिए दिल्ली कॉन्ग्रेस इकाई को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि स्थानीय कॉन्ग्रेस इकाई के बीच मतभेद और आधा-अधूरा प्रचार की वजह से पार्टी की ये हालत हुई है। बाजवा ने कहा कि कॉन्ग्रेस आलाकमान ने दिल्ली की जमीनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ होने के बावजूद उन्होंने कोई काम नहीं किया और AAP को आसानी से वॉकओवर दे दिया। 

बता दें कि कॉन्ग्रेस पहले से ही हार के लिए आश्वस्त थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा था, “ये तो हम पहले से ही जानते थे, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि भाजपा का क्या परिणाम हुआ? जो इतनी लम्बी-लम्बी बातें करते हैं।” वहीं कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी तो पहले से ही अपनी हार से आश्वस्त नजर आए। उन्होंने कहा, “दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी ने सत्ता पर कब्ज़ा करने का कभी नहीं सोचा, हमने सोचा था कि कॉन्ग्रेस कुछ सीटें जीते और दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी का अस्तित्व बना रहे।”

मुजफ्फरपुर बालिका गृहकांड के दोषी ब्रजेश ठाकुर को उम्र कैद

मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस मामले में दिल्ली के साकेत कोर्ट ने आरोपित ब्रजेश ठाकुर को उम्रकैद की सजा सुनाई है। दिल्ली स्थित साकेत कोर्ट ने 4 फरवरी को सजा पर बहस पूरी कर ली थी। इसके बाद 11 फरवरी सजा की तारीख तय की गई थी। मुजफ्फरपुर बालिका गृहकांड देश के चर्चित यौन उत्पीड़न कांडों में से एक होने के कारण पूरे देश की नजर आरोपितों की सजा पर टिकी हुई थी।

दिल्ली साकेत कोर्ट ने इस मामले के ‘किंगपिन’ और दोषी करार दिए गए ब्रजेश ठाकुर को उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह प्रकरण मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस (TISS) की रिपोर्ट के बाद सामने आया था। इस मामले में साकेत कोर्ट ने ब्रजेश ठाकुर समेत 21 आरोपितों के खिलाफ पॉक्सो (POCSO), बलात्कार, आपराधिक साजिश और अन्य धाराओं में आरोप तय किया था।

ब्रजेश ठाकुर के अलावा बालिका गृह की अधीक्षक इंदु कुमारी, बालिकागृह की गृह माता मीनू देवी, चंदा देवी, काउंसलर मंजू देवी, नर्स नेहा कुमारी, केस वर्कर हेमा मसीह, सहायक किरण कुमारी, तत्कालीन सीपीओ रवि कुमार, सीडब्लूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार, सीडब्लूसी के सदस्य विकास कुमार, ब्रजेश ठाकुर का ड्राइवर विजय तिवारी, कर्मचारी गुड्डू पटेल, कृष्णा राम, बाल संरक्षण इकाई की तत्कालीन सहायक निदेशक रोजी रानी, रामानुज ठाकुर, रामाशंकर सिंह, बालिकागृह के डॉक्टर अश्विनी, साइस्ता परवीन उर्फ मधु को अदालत ने दोषी करार दिया था।

मुजफ्फरपुर शेल्‍टर होम केस को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्‍ली ट्रांसफर किया गया था। तब से इस मामले की सुनवाई साकेत कोर्ट में चल रही थी और अब जाकर आखिरकार इसमें फैसला सुनाया गया। अदालत ने इस मामले में मार्च 20, 2018 को आरोप तय किए थे।

रोहिंग्या समुदाय के 16 लोगों की मौत, 40 लापता: बंगाल की खाड़ी में खचा-खच भरी नाव डूबी

मंगलवार (फरवरी 11, 2020) को बंगाल की खाड़ी में लगभग 125 रोहिंग्या शरणार्थियों को भरकर ले जा रही एक नाव के डूब जाने की घटना सामने आई है, जिसमें कम से कम 16 लोग मारे गए हैं। बांग्लादेशी अधिकारियों ने इसकी सूचना दी है। इस हादसे में करीब 40 लोग अभी भी लापता हैं।

क्षमता से ज्यादा भरी हुई लकड़ी की नाव में रोहिंग्या समुदाय के लोग बांग्लादेश के तटवर्ती इलाके कॉक्स बाजार से मलेशिया की ओर जा रहे थे, जब नाव बंगाल की खाड़ी में डूब गई है। तटरक्षक बल, नौसेना के गोताखोरों और अन्य बचाव दल ने सेंट मार्टिन द्वीप से लकड़ी की नाव के बरामद होने के बाद 14 महिलाओं, एक बच्चे और एक आदमी के शव को बरामद किया।

यह हादसा सोमवार देर रात उस समय हुआ, जब नौका बंगाल की खाड़ी के चेरादीप में सेंट मार्टिन द्वीप के नजदीक डूब गई। इस हादसे में रोहिंग्या समुदाय के 62 लोगों को बचा लिया गया है।

JNU वाले इलाके से वामपंथ गायब: लेफ्ट को नोटा से भी कम मिले वोट, आँकड़ों में भारी अंतर

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के नतीजें लगभग साफ है। चुनाव आयोग के आँकड़ों के मुताबिक दिल्ली की 70 सीटों में आम आदमी पार्टी 63 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। बीजेपी 7 सीटों पर आगे चल रही है। इसी बीच महरौली सीट के रुझान हैरान कर देने वाले हैं।

बता दें कि महरौली जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) विधानसभा इलाके में आता है और राजनीतिक गलियारों के मुताबिक यहाँ लेफ्ट पार्टियों का बोलबाला रहा है। इसके बावजूद इस बार यहाँ के आँकड़े काफी चौंकाने वाले हैं। यहाँ लेफ्ट पार्टी को नोटा से भी कम वोट मिले हैं।

महरौली असेंबली सीट पर बीजेपी की ओर से कुसुम खत्री मैदान में हैं। कॉन्ग्रेस ने यहाँ से महेंदर चौधरी को अपना उम्मीदवार बनाया है, तो वहीं आम आदमी पार्टी ने नरेश यादव को फिर से मौका दिया है। यहाँ साल 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार नरेश यादव को जीत मिली थी। इस बार भी AAP उम्मीदवार नरेश यादव ही आगे चल रहे हैं। चुनाव आयोग के आँकड़ों के मुताबिक इस सीट से नोटा को अब तक 231 वोट मिले हैं, जबकि ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक नाम की लेफ्ट पार्टी को महज 58 वोट मिले हैं।

उल्लेखनीय है कि इस बार करीब 62.59 प्रतिशत मतदान हुआ है। चुनाव आयोग ने मतदान के करीब 24 घंटे बाद ये आँकड़े जारी किए, जिस पर आम आदमी पार्टी ने सवाल उठाए थे। इस बार दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों पर कुल 672 प्रत्याशी मैदान में थे। इससे पहले एग्जिट पोल्स में आम आदमी पार्टी की बंपर जीत का अनुमान लगाया गया था।

NOTA से 15 गुना पीछे वामपंथ: दिल्ली चुनाव में लेफ्ट का सूपड़ा साफ़, JNU तक सिमटे

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जहाँ भाजपा की लगातार आलोचना की जा रही है, वामपंथियों को लेकर कोई चर्चा नहीं चल रही। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, आम आदमी पार्टी 53.54% मतों के साथ नंबर एक पर चल रही है और पार्टी के खाते में 61 सीटें जाती हुई दिख रही हैं, भारतीय जनता पार्टी 38.78% वोट शेयर और 9 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर चल रही है। हालाँकि, पहले और दूसरे स्थानों पर चल रही पार्टियों के बीच काफ़ी बड़ा फासला है।

इस बड़ी टक्कर के बीच लोगों ने कॉन्ग्रेस को तो थोड़ा-बहुत याद भी किया लेकिन वामपंथियों को पूरी तरह भुला दिया। कॉन्ग्रेस 4.29% वोट शेयर के साथ तीसरे नंबर पर ज़रूर चल रही है लेकिन पार्टी का वोटिंग प्रतिशत पिछले चुनाव के मुकाबले गिरा है और मुस्लिम वोटर भी AAP के पाले में जाते दिख रहे हैं। कॉन्ग्रेस के वोट्स केजरीवाल की पार्टी को ट्रांसफर हुए हैं। अब आते हैं लेफ्ट पर।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में वामपंथियों और नोटा के बीच कड़ी टक्कर चल रही है। ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, नोटा वामपंथियों से 15 गुना वोटों से आगे चल रहा है। जहाँ नोटा पर अब तक कुल 0.47% वोटरों ने भरोसा जताया है, सीपीआई और सीपीएम को मिला दें तो वो 0.03% वोटरों की पसंद बने हैं। इससे पता चलता है कि वामपंथी अब सिर्फ़ जेएनयू तक ही सीमित रह गए हैं। दिल्ली में उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं बचा है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में उनका आधार खिसक चुका है। एक केरल में वो किसी तरह टिके हुए हैं।

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम: ख़बर लिखे जाने तक के आँकड़े

कन्हैया कुमार के रूप में वामपंथ को एक चेहरा मिला है, जिसे वो बिहार में भुनाना चाह रहे हैं। कन्हैया बिहार में जहाँ भी रैली करने जा रहे हैं, जनता उन्हें मारने दौड़ रही है। कहीं अंडे-मोबिल तो कहीं जूते-चप्पलों से उनका स्वागत किया जा रहा है। वामपंथी भले ही भाजपा की हार से ख़ुश हो जाएँ, उनकी ख़ुद की पार्टी का क्या हाल है- इस पर कोई सवाल नहीं कर रहा। स्पष्ट है, वामपंथी विचारधारा को पूरी तरह, सिरे से नकार दिया गया है।

‘मुस्लिम पूरा पोलराइज हुआ, हिन्दू घंटा हुआ’

दिल्ली की राजनीति में कॉन्ग्रेस की ‘दमदार’ वापसी, EVM पर दिग्विजय सिंह ने सवाल उठा किया एकमात्र काम

मतगणना के साथ ही खाली हुआ शाहीन बाग, नजर आए इक्के-दुक्के प्रदर्शनकारी

मतगणना के साथ ही खाली हुआ शाहीन बाग, नजर आए इक्के-दुक्के प्रदर्शनकारी

दिल्ली चुनावों से पहले सीएए विरोध के नाम पर शाहीन बाग में बैठे प्रदर्शनकारी अब बीच रोड पर लगे टेंट में दिखाई नहीं दे रहे। खाली पड़े टेंट को देखकर ऐसा लग रहा है मानो प्रदर्शनकारी संविधान को भूलकर केजरीवाल का गुणगान करने में लगे हुए हैं, जोकि एक तरह से शाहीन बाग की ख़िलाफत के बराबर है।

आज मतगणना के दिन शाहीन बाग में सन्नाटा है, जहाँ सुबह से ही प्रदर्शनकारी जुटने लगते थे, वहीं मंगलवार को शाहीन बाग पूरी तरह खाली नज़र आया, दोपहर के समय में मात्र इक्का-दुक्का लोग दिखाई दिए। क्या शाहीन बाग दिल्ली विधान सभा चुनाव स्टंट का एक हिस्सा था? अब जब उन्हें कोई हटा नहीं रहा है तो वे खुद ही शाहीन बाग छोड़ के क्यों चले गए हैं?

दरअसल शाहीन बाग इलाका ओखला विधानसभा क्षेत्र में आता है। यही कारण रहा कि वोटिंग वाले दिन मतदान स्थल पर वोटरों की खासी भीड़ नज़र आई। भीड़ भी इस कदर कि करीब पाँच सौ मीटर लंबी वोटरों की लाइन लग गई। हालाँकि, क्षेत्र से आप उम्मीदवार अमानतुल्ला ख़ान के जीतने पर लोगों में खुशी भी देखी जा रही है।

पिछले करीब दो महीनों से दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ धरना चल रहा है, जिसमें लगातार पहुँच रही प्रदर्शनकारियों की भीड़ दिल्ली चुनावों से पहले संविधान को बचाने की दुहाई दे रही थी। इतना ही नहीं यह प्रदर्शनकारी दिन रात बीच रोड पर लगे टेंट में डटे हुए थे, लेकिन जैसे ही दिल्ली विधानसभा चुनावों के वोट पड़े वैसे ही प्रदर्शनकारी शाहीन बाग से गायब होने लगे। वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों के बीच यह अफवाह फैली हुई है कि दिल्ली में सरकार बनते ही शाहीन बाग को जबरन खाली करा दिया जाएगा।

आपको बता दें कि शाहीन बाग में करीब दो महीने से सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ लोगों का धरना प्रदर्शन चल रहा है। वहीं शाहीन बाग रोड बंद होने के कारण आम लोगों को भारी जाम से जूझना पड़ रहा है। गौरतलब है कि पिछले दिनों शाहीन बाग धरने के ख़िलाफ आम लोगों ने मार्च निकाला था, जिसमें उन्होंने चेतावनी दी थी कि जहाँ जाना है वहाँ जाएँ, लेकिन रोड को खाली करें।