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‘बीवी का बिना पर्दे का बाहर जाना और लोगों से मिलना पति के खिलाफ क्रूरता नहीं’: तलाक के एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी, 23 साल से अलग रह रहे थे पति-पत्नी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पत्नी का अपनी मर्जी से घर से बाहर निकलना, पर्दा ना करना और लोगों से दोस्ती रखना पति के खिलाफ क्रूरता नहीं मानी जा सकती। ऐसे में यह कारण तलाक का आधार नहीं बन सकते। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी लगभग 23 साल से अलग रह रहे दंपती के तलाक के मामले में की। कोर्ट ने हालाँकि दोनों का रिश्ता खत्म कर दिया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ महेंद्र प्रसाद नाम के व्यक्ति द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान की हैं। महेंद्र प्रसाद ने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी पिछले लगभग 30 वर्षों से साथ नहीं रह रही और वह बाहर जाकर लोगों से मिलती है तथा साथ ही पर्दा नहीं करती। महेंद्र का आरोप था कि उनकी पत्नी विवाहित होने के बावजूद दूसरे व्यक्ति के साथ संबंध रखती है।

महेंद्र प्रसाद ने कहा था कि उनकी शादी 1990 में हुई थी और 1995 में उन्हें एक बेटा भी हुआ था। महेंद्र प्रसाद ने बताया था कि वह और उनकी पत्नी बमुश्किल 8 महीने साथ रहे हैं। उन्होंने कहा था कि 30 वर्ष अलग रहने के बावजूद उनकी पत्नी उसने तलाक के लिए राजी नहीं हो रही।

हाई कोर्ट में इस याचिका की सुनवाई जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस दोनाडी रमेश ने की। हाई कोर्ट ने कहा, “पत्नी का आजाद मर्जी वाला काम ऐसा करने वाली इंसान होना जो किसी अवैध संबंध को बनाए बिना अकेले यात्रा करे या समाज के अन्य सदस्यों से मिले, इसे क्रूरता का काम नहीं कहा जा सकता।”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पति द्वारा लगाए गए उन आरोप को भी मानने से इनकार कर दिया जिनमें उसने कहा था कि उसकी पत्नी उसे गालियाँ देती थी और उसकी आर्थिक स्थिति को लेकर मजाक उड़ाती थी। हाई कोर्ट ने कहा कि दोनों की शादी परिवार ने की थी और एक दूसरे की आर्थिक स्थिति जानते थे, तथा अलग होने से पहले कुछ दिन तक वह साथ भी रहे।

हाई कोर्ट ने कहा कि पति ने यह भी नहीं बताया है कि यह गालियाँ या अपमान कब किया गया, इनकी जगह और तारीख भी नहीं बताई गई, ऐसे में यह आरोप नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने पत्नी के किसी ‘पंजाबी बाबा’ नाम के व्यक्ति के साथ सम्बन्धों के आरोप भी मानने से इनकार कर दिया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पाया कि कम से कम 23 वर्षों तक अलग रहने और अब भी एक साथ रहने को राजी नहीं हो रही पत्नी तलाक नहीं चाहती। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि दोनों का 23 साल तक अलग रहना और अब भी पत्नी का साथ रहने का राजी नहीं होना शादी को अपने आप खत्म कर देता है।

इन्हीं कारणों को देखते हुए हाई कोर्ट ने दोनों की शादी का रिश्ता भंग कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी, दोनों ही नौकरी करते हैं और आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनका बेटा भी 29 वर्ष का हो गया है, ऐसे में कोई भी गुजारा भत्ता नहीं दिया जाएगा।

मणिपुर हिंसा पर CM बीरेन सिंह ने माँगी माफी, कहा- पिछली गलतियों को भूल नई शुरुआत करनी होगी: बताया- इस साल 200 लोगों की मौत, 12247 FIR दर्ज

मणिपुर के लिए साल 2024 बेहद अशांत और दर्दनाक साल साबित हुआ। पूरे साल राज्य हिंसा और अस्थिरता की चपेट में रहा। मेइती और कुकी समुदायों के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव ने इस साल खतरनाक रूप ले लिया। इस दौरान सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों घर उजड़ गए, और लाखों लोग अपने ही घरों में असुरक्षित महसूस करने लगे। साल 2024 के अंत में मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने राज्य में हिंसा और अस्थिरता के लिए माफी माँगी और 2025 में शांति और स्थिरता की उम्मीद जताई।

मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने मंगलवार (31 दिसंबर) को कहा कि यह साल मणिपुर के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण रहा। उन्होंने कहा, “मैं इस पूरे साल की घटनाओं पर गहरा खेद व्यक्त करता हूँ। 3 मई से जो कुछ हो रहा है, उसने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया है। बहुत से लोगों ने अपने प्रियजनों को खो दिया, कई ने अपने घर। मैं इस स्थिति के लिए राज्य के लोगों से माफी माँगता हूँ।”

मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने आगे कहा कि राज्य में पिछले तीन-चार महीनों में शांति स्थापित करने के प्रयासों में प्रगति हुई है। उन्होंने उम्मीद जताई कि 2025 में मणिपुर में सामान्य स्थिति और शांति वापस लौटेगी। उन्होंने कहा, “मैं सभी समुदायों से अपील करता हूँ कि जो कुछ हुआ, उसे पीछे छोड़ दें और एक नई शुरुआत करें। हमें एक शांतिपूर्ण और समृद्ध मणिपुर बनाने के लिए एकजुट होकर काम करना होगा।”

मुख्यमंत्री ने हिंसा और इसके बाद की स्थिति की जानकारी देते हुए कहा कि इस साल लगभग 200 लोगों की जान गई। राज्य में 12,247 एफआईआर दर्ज की गईं और 625 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा सुरक्षा बलों ने अब तक 5,600 हथियार, भारी मात्रा में विस्फोटक और 35,000 गोलियाँ बरामद की हैं। मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार की मदद का भी जिक्र करते हुए कहा कि केंद्र ने पर्याप्त सुरक्षा बल, विस्थापित परिवारों के लिए सहायता राशि और उनके लिए नए घर बनाने के लिए धन उपलब्ध कराया है।

विभाजन और हिंसा का केंद्र बना मणिपुर

कभी सांस्कृतिक और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक माना जाने वाला मणिपुर आज विभाजन और हिंसा का केंद्र बन गया है। इस साल मेइती और कुकी समुदायों के बीच का तनाव और गहरा गया। साल 2024 की शुरुआत ही हिंसा के साथ हुई, जब 1 जनवरी को थौबल जिले में प्रतिबंधित पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के हमले में चार ग्रामीण मारे गए। यह घटना अवैध ड्रग व्यापार के पैसे से जुड़े विवाद से जुड़ी बताई गई। इस घटना के बाद राज्य सरकार को पाँच घाटी जिलों में निषेधाज्ञा लगानी पड़ी। हिंसा में 1,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए और सैकड़ों परिवारों को अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा।

पहले यह हिंसा इंफाल घाटी और इसके आसपास के जिलों तक सीमित थी, लेकिन इस साल यह जिरीबाम और अन्य इलाकों तक फैल गई। इसने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को गहरी चोट पहुँचाया। मुख्यमंत्री ने इस हिंसा को पीछे छोड़ने और एक नई शुरुआत करने की अपील की। उन्होंने कहा, “जो कुछ हुआ, उसे हम बदल नहीं सकते। लेकिन हमें अपनी गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ना होगा। हमें शांतिपूर्ण और समृद्ध मणिपुर के निर्माण के लिए मिलजुल कर रहना होगा।”

मौत, कुव्यवस्था, घपला… सपा के लिए यही था कुंभ, प्रबंधन की नई परिभाषा गढ़ रहे CM योगी: 10 करोड़ श्रद्धालुओं के लिए अखिलेश ने लगाए थे 5 गोताखोर और 1 आजम खान

मकर संक्रांति (14 जनवरी, 2024) से प्रयागराज में महाकुंभ चालू हो रहा है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इसके लिए तैयारियों में जुटी हुई है। इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर भीड़ प्रबन्धन तक के काम तेजी से चल रहे हैं। योगी सरकार का कहना है कि 2025 का महाकुंभ सबसे दिव्य होगा।

अब इस आयोजन से भी उत्तर विपक्ष को समस्या हो गई है। सपा से फैजाबाद के सांसद अवधेश कुमार ने कहा है कि महाकुंभ का आयोजन करना कोई नई बात नहीं है और उनकी सरकार में भी यह हुआ था। अवधेश कुमार ने दावा किया है कि इस बार के महाकुंभ में बंदरबाँट हो रही है।

उनके नेता अखिलेश यादव भी इस बीच महाकुंभ की तैयारियों पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। कहीं वह खम्भों की फोटो डालते हैं तो कहीं अधूरी पुलिस चौकी दिखाते हैं। उनका दावा होता है कि महाकुंभ का काम अधूरा है। हालाँकि, अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के नेता यह भूल जाते हैं कि अब से ठीक 12 वर्ष पहले प्रयागराज में उन्हीं की सरकार में कुंभ का आयोजन हुआ था और उसके कुप्रबंधन की दुनिया भर में आलोचना हुई थी।

अखिलेश यादव आलोचना करने के बजाय अपने मुख्यमंत्री रहते हुए एक मॉडल सेट कर सकते थे लेकिन तब उन्होंने कुंभ में कोई रूचि नहीं दिखाई थी। महाकुंभ के दौरान हुई भगदड़ से लेकर पैसा ना खर्चने और भीड़ के प्रबन्धन तक में सैकड़ों गड़बड़ियाँ उनकी सरकार में हुई थीं। इसको लेकर CAG ने एक रिपोर्ट बनाई थी, जिसमें पूरी सच्चाई बाहर आई थी।

आजम खान को मंत्री बनाया, 42 की भगदड़ में मौत

2013 के कुंभ के लिए अखिलेश यादव को आजम खान के अलावा और कोई शख्स नहीं मिल सका था। आजम खान को इस मेले की समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। आजम खान को हिन्दुओं के सबसे बड़े जुटान कुंभ में संभवत: कोई रुचि नहीं थी और वह उस दौरान रामपुर में अपनी समानांतर सरकार चलाने और जौहर यूनिवर्सिटी बनाने में लगे हुए थे।

आजम खान के मंत्री रहते हुए इस कुंभ के दौरान प्रयागराज के रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ में 42 लोग मारे गए थे। यह हादसा 10 फरवरी, 2013 को हुआ था। इस दिन मौनी अमावस्या थी और लाखों श्रद्धालु उस दिन प्रयागराज में गंगा में स्नान करने आए थे।

इस हादसे को लेकर रिपोर्ट भी बाद में सामने आई थी। इस हादसे के कारणों में से एक यह भी था कि राज्य सरकार ने पर्याप्त बसों की व्यवस्था नहीं की थी। इस हादसे के बाद आजम खान ने दिखावे के तौर पर अपने इस्तीफे की पेशकश की थी लेकिन अखिलेश यादव ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

हादसे के 2 दिन बाद अखिलेश यादव प्रयागराज गए थे और गाड़ी लेकर अंदर घूम कर वापस चले गए थे। उन्होंने यहाँ स्नान करना तक जरूरी नहीं समझा था। वर्तमान में खम्भों पर तार ना लगने को लेकर राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे अखिलेश यादव तब हादसे को लेकर राजनीति ना करने की अपील कर रहे थे।

कुंभ चालू, 60% काम अधूरा

गड़बड़ी सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी। इस कुम्भ को लेकर जब CAG ने ऑडिट किया तो असल सच्चाई खुली थी। CAG की रिपोर्ट में सामने आया था कि 2013 के कुंभ के लिए सारे काम पूरे करने की तिथि सबसे पहले 30 नवम्बर, 2012 रखी गई थी लेकिन इनमें से कई काम मेला चालू होने तक भी पूरे नहीं हुए। इनकी तिथि इस बीच तीन बार बढ़ाई गई।

CAG रिपोर्ट के अनुसार, अखिलेश यादव की सरकार मेले की शुरूआत यानी 14 जनवरी, 2013 तक इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े 59% काम नहीं पूरे पाई थी। यानी वर्तमान में खम्भों पर तार ना लगने को मुद्दा बना रहे अखिलेश यादव अपनी सरकार में मेला शुरू होने तक 60% काम नहीं पूरा करवा पाए थे।

यहाँ तक सड़क निर्माण से जुड़े 111 कामों में से 65 मेला खत्म होने के तक भी पूरे नहीं हुए थे। और तो और, ₹26 करोड़ के 4 प्रोजेक्ट जड़ से ही शुरू नहीं हो पाए थे। इन सब के बावजूद अखिलेश सरकार ने CAG को जनवरी, 2013 में यह सूचना दी थी कि सारे काम पूरे हो गए। इसको लेकर CAG ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया था।

CAG ने अपनी जाँच में यह भी पाया कि कुंभ के ली लिए जिन दवाइयों, गाड़ियों समेत बाकी चीजों की सप्लाई की जानी थी, उसमें भी ₹2 करोड़ से ज्यादा का सामान मेला चालू होने तक भी नहीं पहुँचा था। कई ऐसे कामों को कुंभ के पैसे से करवा लिया गया था, जो उससे जुड़े थे ही नहीं।

केंद्र सरकार से मिला पैसा डकार गए, अपना भी पूरा नहीं लगाया

2013 के महाकुम्भ के लिए ₹1152 करोड़ का बजट बना था और यह रिलीज किए गए थे। इस धनराशि में से ₹341 करोड़ केंद्र सरकार के दिए हुए थे। यह खर्च कुंभ के दौरान बनने वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर और बाक़ी खरीद के लिए होना था। लेकिन यह पैसा पूरा खर्च तक नहीं किया गया। इस धनराशि में से ₹1017 करोड़ खर्च हुआ। यानी ₹134 करोड़ की धनराशि पड़ी रह गई।

इसके अलावा समाजवादी पार्टी को केंद्र सरकार ने ₹800 करोड़ अलग से कुंभ के लिए दिए थे। इस धनराशि में से एक पैसा अखिलेश यादव की सरकार ने कुंभ के कामों के लिए नहीं लगाया। इस पैसे को राज्य सरकार ने अपने काम में लगा लिया।

CAG की रिपोर्ट कहती है कि यदि इस हिसाब देखा जाए तो सपा सरकार ने मात्र ₹10 करोड़ या बजट का 1% ही अपने पास से लगाया। क्योंकि ₹1141 करोड़ तो केंद्र सरकार ही दे चुकी थी। इन सब के बाद भी जो पैसा खर्च भी हुआ, उसमे भी खूब गड़बड़ी हुई। गड़बड़ी का स्तर यह था कि बस और मोटरसाइकिल के नम्बर मेले में काम करने वाले ट्रैक्टर के लिए दिए गए थे।

CAG रिपोर्ट बताती है कि 30 मजदूरों को एक ही समय में दो जगह पर काम करते हुए दिखा दिया गया था। इनको पैसा भी दे दिया गया था। कहीं पुल के मरम्मत के नाम पर करोड़ों का फालतू खर्च किया गया तो कहीं बैरीकेडिंग में पैसा उड़ाया गया। कुल मिलाकर खूब भ्रष्टाचार भी हुआ।

12 करोड़ लोगों की सुरक्षा के लिए लगाए केवल 5 गोताखोर

अखिलेश सरकार ने केवल इन्फ्रा बनाने या पैसा खर्चने में ही कोताही 2013 कुंभ में नहीं बरती, बल्कि यहाँ श्रद्धालुओं के प्रबन्धन में भी भारी लापरवाही बरती थी। एक अनुमान के अनुसार, इस कुंभ में लगभग 12 करोड़ लोग देश विदेश से शामिल हुए थे। CAG की ही रिपोर्ट बताती है कि यहाँ इन 12 करोड़ श्रद्धालुओं को संभालने के लिए मात्र 5 गोताखोर की नियुक्ति हुई थी। इतने बड़े आयोजन में लोगों की सुरक्षा को गंभीरता से ना लेना कुंभ के प्रति अखिलेश सरकार की उदासीनता को दर्शाता है।

योगी सरकार आयोजित करने जा रही डिजिटल कुंभ

जहाँ 2013 का कुंभ अखिलेश यादव ने विफलताओं का स्मारक बना दिया था, वहीं 2025 के कुंभ को योगी सरकार ने डिजिटल कुंभ के तौर पर आयोजित करने की तैयारी कर ली है। इस महाकुंभ के लिए योगी सरकार ने विशेष एप बनाया है। यह एप 11 भाषाओं में चलेगा। महाकुंभ में हर सेवा के लिए QR कोड लगाए गए हैं।

महाकुंभ की सुरक्षा के लिए पूरे मेला क्षेत्र में हजारों कैमरा लगाए गए हैं। इनका एक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम बनाया गया है। इस सिस्टम में AI का भरपूर उपयोग हुआ है। इसके अलावा ड्रोन भी निगरानी यहाँ की जाएगी। महाकुंभ मेला क्षेत्र को 25 कमांड सेंटर में बाँट दिया गया है।

महाकुंभ का मेला क्षेत्र कई किलोमीटर में विस्तृत होता है। इसके कारण श्रद्धालुओं को काफी पैदल चलना पड़ता था। अब यह स्थिति योगी सरकार बदल देगी। योगी सरकार ने इस महाकुंभ में मेला क्षेत्र के भीतर शटल बस, ई ऑटो और ई रिक्शा की व्यवस्था की है। यह श्रद्धालुओं की सहूलियत के 24 घंटे उपलब्ध रहेंगे। हजारों पुलिसकर्मियों की नियुक्ति भी की गई है।

अफगानिस्तान में किए ह​वाई हमले, अब घर में घुसकर मार रहा है तालिबान: डूरंड लाइन पर भीषण संघर्ष, पाकिस्तान की कई फौजी चौकियों पर कब्जे का दावा

पाकिस्तान और अफगानिस्तान बॉर्डर यानी डूरंड लाइन पर हालात बेहद खराब हो गए हैं। तालिबानी लड़ाके डूरंड लाइन पार कर पाकिस्तान में घुसकर चौकियों पर हमला कर रहे हैं, तो जवाब में पाकिस्तानी सेना भी अफगानिस्तान के भीतर हमले कर रही है। इस बीच, पाकिस्तान-अफगानिस्तान (तालिबान) की लड़ाई के बीच, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने पाकिस्तान की कई सैन्य चौकियों पर कब्जे कर लिए हैं। पाकिस्तानी फौजी चौकियों पर तालिबान लड़ाकों के कब्जे के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं।

ये वीडियो पाकिस्तानी सीमा के अंदर बाजौर का है, जहाँ की सैनिक चौकी पर टीटीपी लड़ाकों ने कब्जा कर लिया और उस पर अपना झंडा लहरा दिया। यहाँ से पाकिस्तानी फौजी भाग खड़े हुए, वो टीटीपी हमले के सामने टिक नहीं सके। ऐसे हालात सिर्फ बाजौर की सैन्य चौकी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उत्तरी और दक्षिणी वजीरिस्तान की सैनिक चौकियों से भी पाकिस्तानी फौजियों के भागने की खबरें हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में टीटीपी लड़ाके पाकिस्तानी सेना की बाजौर पोस्ट से झंडा हटाकर अपना झंडा फहराते दिख रहे हैं।

पत्रकार ताहा सिद्दीकी ने पाकिस्तानी फौजियों की चौकियों पर पाकिस्तानी तालिबानी कब्जे का वीडियो शेयर करते हुए कहा कि पाकिस्तानी फौज देश के अंदर जुल्म ढाने और राजनीति करने में व्यस्त है, इसीलिए उसे बार-बार मुँह की खानी पड़ रही है।

हालाँकि, पाकिस्तानी सेना ने सफाई देते हुए कहा कि चौकी पहले ही खाली कर दी गई थी। वो तो यह भी कह रही है कि उसके हमले में बॉर्डर पार अफगानिस्तान की तरफ 8 लोगों की मौत हो गई। ये अलग बात है कि उसने फ्रंटियर फोर्स के एक फौजी के मारे जाने की बात स्वीकारी है।

दरअसल, ये हमले तब से शुरू हुए, जब पाकिस्तानी एयरफोर्स ने अफगानी सीमा के अंदर घुसपर एयर स्ट्राइक की थी और कई लड़ाकों को मार दिया था, जिसके बाद तालिबानी लड़ाकों ने पाकिस्तानी चौकियों पर हमले बोल दिए। इसके बाद वापस पाकिस्तान ने हमले किए, जिसमें 8 लोगों की मौत हुई। इसी बीच ये वीडियो सामने आए हैं, जिसमें टीटीपी लड़ाके पाकिस्तानी फौजी चौकियों पर हमले कर रहे हैं। उनका साथ अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालीबानी लड़ाके दे रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, तालिबान के पास एक लाख पचास हजार सक्रिय लड़ाके हैं और वह आधुनिक हथियारों से लैस हैं। पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में छिपकर हमला करने की उनकी क्षमता पाकिस्तानी सेना को चकमा दे रही है। पाकिस्तान की सेना न केवल तालिबान के साथ संघर्ष में असफल हो रही है, बल्कि आंतरिक समस्याओं से भी जूझ रही है। बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन, आर्थिक संकट और चीन के सीपैक प्रोजेक्ट में देरी ने सेना और सरकार की स्थिति और कमजोर कर दी है। बता दें कि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने लंबे समय तक तालिबान को समर्थन दिया, लेकिन अब वो पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन चुका है।

विवाद की वजह अंग्रेजों की खींची सीमा रेखा

1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच खींची गई डूरंड लाइन आज भी विवाद का कारण बनी हुई है। डूरंड लाइन 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा है जो पश्तून इलाकों को विभाजित करती है। ब्रिटिश राज के समय, इसे भारत और अफगानिस्तान के बीच एक बफर जोन के रूप में बनाया गया था। लेकिन अफगान जनता और तालिबान ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया।

तालिबान इसे ‘काल्पनिक सीमा’ कहता है और दावा करता है कि यह इलाका अफगानिस्तान का हिस्सा है। इतना ही नहीं, तालिबान ने पाकिस्तान के कई इलाकों को अपना बताया है, जिसमें पेशावर तक शामिल है। यही नहीं, तालिबान ने पाकिस्तान पर इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) के आतंकवादियों को शरण देने का भी आरोप लगाया है। यह विवाद पाकिस्तानी सेना और तालिबान के बीच तनाव को और बढ़ा रहा है।

जीजा-साली के बीच सेक्स वाला रिलेशन ‘अनैतिक’, लेकिन यह बलात्कार नहीं: हाई कोर्ट, ‘उम्र और सहमति से संबंध’ बना फैसले का आधार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जीजा और साली के बीच संबंधों से जुड़े एक विवादित मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यह रिश्ता समाज और नैतिक दृष्टि से गलत हो सकता है, लेकिन अगर महिला बालिग है और सहमति से संबंध बनाए गए हैं, तो इसे बलात्कार नहीं माना जा सकता।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस समीर जैन की पीठ ने आरोपित की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए पाया कि साली बालिग थी और उसने पहले धारा 161 के तहत अपने बयान में आरोपित पर लगाए गए आरोपों से इनकार किया था। हालाँकि बाद में उसने धारा 164 के तहत अपना बयान बदलते हुए अभियोजन पक्ष का समर्थन किया।

यह मामला जुलाई 2024 का है, जब आरोपित जीजा पर अपनी साली के साथ बलात्कार का आरोप लगाया गया था। परिवार को जीजा और साली के बीच अवैध संबंधों की जानकारी मिली, जिसके बाद एफआईआर दर्ज की गई। आरोपित के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 366 (बहला-फुसलाकर भगाना), 376 (बलात्कार), और 506 (धमकी देना) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

हाई कोर्ट में आरोपित के वकील ने तर्क दिया कि जीजा और साली के बीच अवैध संबंधों की जानकारी मिलने के बाद परिवार ने यह मामला दर्ज कराया। उन्होंने यह भी कहा कि आरोप झूठे हो सकते हैं, क्योंकि दोनों के बीच सहमति से संबंध बने थे। दूसरी ओर एजीए (सरकारी अधिवक्ता) ने जमानत का विरोध किया, लेकिन इस तथ्य को नकार नहीं सके कि साली बालिग थी।

हाई कोर्ट ने माना कि यह रिश्ता समाज और नैतिकता के दृष्टिकोण से गलत हो सकता है, लेकिन कानूनी रूप से इसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता। उसके खिलाफ धारा 366, 376 और 506 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया गया था, लेकिन कोर्ट ने आरोपी की कोई आपराधिक पृष्ठभूमि न होने और जुलाई 2024 से हिरासत में होने के कारण उसे जमानत दे दी।

कहलाती थी ‘जम्मू की धड़कन’, गुरुग्राम के फ्लैट में फंदे से लटकी मिली: डिप्रेशन या वर्क प्रेशर… सिमरन सिंह को किसने मारा? आखिरी पोस्ट में लिखा था- सिर्फ एक लड़की

गुरुग्राम के फ्लैट में आत्महत्या करने वाली पूर्व आरजे और इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर सिमरन सिंह के परिजनों ने किसी साजिश की आशंका से इनकार किया है। उन्होंने कहा है कि उनके बेटी काम के दबाव में थी। वह इस मामले में कोई विशेष जाँच नहीं चाहते। उन्होंने बताया है सिमरन उनसे रोज बात करती थी और आत्महत्या से एक दिन पहले वह दुखी दिख रही थी। सिमरन मूल रूप से जम्मू की रहने वाली थीं। उनके परिजन वहीं रहते हैं। उनके माता-पिता ने मीडिया से बात की है। सिमरन आरजे के तौर पर जम्मू में काफी मशहूर थीं और ‘जम्मू की धड़कन’ से प्रसिद्ध थीं।

इंडियन एक्सप्रेस के साथ हुई बातचीत में उनके पिता जसविंदर सिंह ने बताया है कि उनकी बेटी कुछ समय से काम से जुड़े दबाव के चलते परेशान थी। उन्होंने बताया था कि सिमरन ने उसने और अपनी माँ से भी यह बात साझा की थी। सिमरन की माँ सोनी सिंह ने बताया है कि उनकी बेटी का कुछ वर्षों से डिप्रेशन का इलाज चल रहा था। सिमरन के पिता ने उनकी मौत में कोई साजिश या अन्य कारण होने की बात नकारते हुए जाँच की माँग से इनकार किया है।

जसविंदर ने कहा, “उसका किसी से कोई झगड़ा नहीं था और उसने हमें ऐसी बात नहीं बताई। वह हमेशा काम के दबाव के बारे बात करती थी… इसलिए हमने किसी जाँच की माँग नहीं की है। लेकिन हमें बताया गया है कि पुलिस उसकी मौत की जाँच करेगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद सब साफ हो जाएगा।” उन्होंने सोशल मीडिया में चल रही सिमरन की मौत को लेकर थ्योरी को नकार दिया। उन्होंने कहा, “सोशल मीडिया पर तरह-तरह की कहानियाँ बनाई जाती हैं, यह गलत रिपोर्टिंग है, यही कारण है कि हमने जम्मू में किसी से बात करने से परहेज किया है।”

जसविंदर ने बताया कि वह घर आने वाली थी। सिमरन की माँ ने बताया है कि उनकी फोन पर बात हुई थी, उसमें सिमरन दुखी दिख रही थी। उन्होंने बताया कि सिमरन साफ़ बोलने वाली महिला थी और वह काम को लेकर बताया करती थी। उन्होने बताया कि वह कंटेंट भी लिखती थी लेकिन बस गुस्से को नियंत्रित नहीं कर पाती थी। सिरमन की माँ ने बताया कि वह कुछ दिनों में फिल्मों के लिए भी ऑडिशन देने वाली थीं। वह एक पंजाबी फिल्म की शूटिंग भी करने वाली थीं।

इस बीच उनकी मौत को लेकर एक और थ्योरी चलाई जा रही है। सोशल मीडिया पर काफी फेमस पूरव झा के साथ उनका नाम जोड़ा जा रहा है। दावा किया गया है कि दोनों का आपस में प्रेम संबंध था और हाल ही में उनकी लड़ाई हुई थी जिसके चलते सिमरन ने यह कदम उठाया। वहीं एक और मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि काम में अपने पार्टनर हिमांशु के साथ शादी करने वाली थीं। पूरव से जुड़ी अफवाहों को लेकर सिमरन के परिजनों ने इनकार किया है। वहीं हिमांशु से शादी वाली बात पर भी कोई पुष्टि नहीं हुई है।

सिमरन सिंह के इंस्टाग्राम पर 7.6 लाख फॉलोवर थे। वह काफी फेमस थीं। उनकी रील्स को लाखों लोग देखते थे। उन्होंने हाल ही में कई पोस्ट भी डाली थीं। उनकी अंतिम पोस्ट 13 दिसम्बर की थी। इसी रील पर उन्होंने लिखा था, “एक लड़की, उसकी कभी न खत्म होने वाली हँसी और उसका गाउन, अब समुद्र को अपने कब्जे में ले रहे हैं।”

गौरतलब है कि सिमरन ने गुरुग्राम में 25 दिसम्बर, 2024 को अपने फ़्लैट में आत्महत्या कर ली थी। वह रात को अपने कमरे में गई थीं लेकिन जब बाहर वापस नहीं आई तो लोगों को शक हुआ। इसके बाद उनके साथ रहने वाले हिमांशु और बाकी लोगों ने दरवाजा खोला तो वह पंखे से लटकी हुई मिलीं। उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन उनकी पहले ही मौत हो चुकी थी। पुलिस ने इस मामले में किसी गड़बड़ी की आशंका से इनकार किया है। उन्होंने जाँच भी चालू कर दी है।

बांग्लादेश से भारत में घुसा जाहिदुल इस्लाम, बंगाल-असम के मुस्लिमों को दी आतंकी ट्रेनिंग: वर्धबान ब्लास्ट की साजिश रची, JMB के ‘अमीर’ को 7 साल की सजा

बेंगलुरु में एनआईए की विशेष अदालत ने सोमवार (30 दिसंबर) को बांग्लादेशी नागरिक जाहिदुल इस्लाम उर्फ कौसर को भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही उस पर 57,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। जाहिदुल को जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) का ‘अमीर’ कहा जाता है, जो भारत में आतंकी नेटवर्क का संचालन कर रहा था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जाहिदुल इस्लाम 2014 में अवैध रूप से भारत में घुसा था। वह 2005 में बांग्लादेश में हुए सीरियल बम धमाकों के मामले में पुलिस की हिरासत से भागने के बाद भारत आया। यहाँ उसने जेएमबी प्रमुख सलाउद्दीन सालेहिन के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल के वर्धबान जिले में अक्टूबर 2014 में बम धमाके की साजिश रची। बर्दवान के खागरागढ़ इलाके में हुए इस विस्फोट में दो लोगों की मौत हो गई थी, जबकि एक व्यक्ति घायल हुआ था। विस्फोट के बाद जाहिदुल और उसके साथी बेंगलुरु भाग गए।

बेंगलुरु में छिपते हुए जाहिदुल ने पश्चिम बंगाल और असम के मुस्लिम युवकों को कट्टरपंथी बनाना शुरू किया। उसने उन्हें जेएमबी की भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। एनआईए की जाँच में सामने आया कि 2018 में बोधगया में हुए विस्फोट के पीछे भी जाहिदुल और उसके साथियों का हाथ था। यह विस्फोट बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा की यात्रा के दौरान किया गया था, जिसे जेएमबी ने साजिश के तहत अंजाम दिया।

जाहिदुल और उसके साथियों ने आतंकी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के मकसद से बेंगलुरु में चार डकैतियाँ भी कीं। इन डकैतियों से मिले धन का इस्तेमाल गोला-बारूद खरीदने, ठिकानों की व्यवस्था करने और आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने के लिए किया गया। एनआईए ने 2019 में इस मामले को अपने हाथ में लिया और आतंकी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। जाँच के दौरान एनआईए को जाहिदुल और उसके साथियों के ठिकानों से हथगोले, टाइमर डिवाइस, इलेक्ट्रिक सर्किट और आईईडी बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले विस्फोटक पदार्थ बरामद हुए।

एनआईए ने इस मामले में 11 आरोपितों को दोषी ठहराया है, जिनमें से जाहिदुल को साजिश, डकैती, धन उगाही और गोला-बारूद की खरीद जैसे गंभीर आरोपों में दोषी पाया गया। एनआईए ने कहा कि जाहिदुल और उसका नेटवर्क भारत में जेएमबी के एजेंडे को आगे बढ़ाने में सक्रिय था।

इस मामले से जुड़े, फरार जेएमबी प्रमुख सलाउद्दीन सालेहिन जैसे अन्य आतंकियों को पकड़ने की चुनौती अब भी बनी हुई है। यह घटना दिखाती है कि कैसे आतंकी संगठन भोले-भाले युवाओं को कट्टरपंथी बनाकर अपने मंसूबों को अंजाम देते हैं और उनके खिलाफ सतर्क रहने की जरूरत है।

ISRO ने लॉन्च किया SpaDex मिशन, स्पेस डॉकिंग के लिए छोड़े दो सैटेलाइट: अंतरिक्ष में ही जोड़े जाएँगे, ऐसा करने वाला चौथा देश होगा भारत

ISRO ने सोमवार (30 दिसम्बर, 2024) को SpaDex मिशन लॉन्च किया। इसके लिए PSLV C-60 रॉकेट छोड़ा गया, जिसने कई सैटेलाईट अंतरिक्ष पहुँचाए। अब इनमें से SpaDex मिशन के दो सैटेलाईट जोड़ने का काम अंतरिक्ष में ही किया जाएगा। यह मिशन हमारे एस्ट्रोनॉट को अंतरिक्ष भेजने के साथ ही आगे कई अभियानों के लिए अहम कड़ी साबित होगा। जो मिशन अब चालू हुआ है, उसे स्पेस डॉकिंग कहा जाता है। यह काम अगले कुछ दिन तक चलेगा। यदि भारत इसमें सफल होता है, तो वह इस क्षमता वाला दुनिया का चौथा देश होगा।

ISRO ने क्या किया, क्या होती है स्पेस डॉकिंग?

ISRO ने सोमवार को रात 10 बजे श्रीहरिकोटा में स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV C-60 रॉकेट लॉन्च किया। इस रॉकेट पर कुल 24 सैटेलाईट लदे हुए थे। इनमें से सबसे प्रमुख दो सैटेलाईट थे। ISRO ने इन सैटेलाईट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की निचली कक्षा में स्थापित किया।

इनका नाम SDX-01 और SDX-02 था। इन दोनों का वजन 220 किलो है। यह दोनों सैटेलाईट अंतरिक्ष में पृथ्वी से 470 किलोमीटर की ऊँचाई और 55 अंश के कोण पर छोड़े गए हैं। अब इन दोनों की डॉकिंग की जाएगी।

डॉकिंग को सरल भाषा में समझा जाए, तो यह दो सैटेलाईट (मॉड्यूल) को अंतरिक्ष में जोड़ने की प्रक्रिया को कहते हैं। यह कुछ-कुछ जमीन पर कोई पुल बनाने जैसा है। जिस तरह पुल के अलग-अलग हिस्से आपस में जोड़े जाते हैं, उसी तरह डॉकिंग में भी दो या उससे अधिक सैटेलाईट आपस में जोड़े जाते हैं। यह पूरी सरंचना किसी विशेष काम के लिए उपयोग होती है।

डॉकिंग का उपयोग वर्तमान में दो सैटेलाईट के बीच किन्हीं वस्तुओं के आदान प्रदान समेत बाक़ी काम के लिए होता है। अंतरिक्ष में स्थापित अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन भी इसी सिद्धांत पर काम करता है। इसका निर्माण भी डॉकिंग के जरिए हुआ था। इसमें सामान की आपूर्ति भी डॉकिंग के जरिए ही होती है।

दरअसल, कई ऐसे सैटेलाईट या फिर मॉड्यूल होते हैं, जिन्हें एक बार में रॉकेट नहीं ले जा सकते। ऐसे में उन्हें अलग-अलग हिस्से में भेज कर अंतरिक्ष में जोड़ा जाता है। इसी तकनीक को हासिल करने का प्रयास अब ISRO इस SpaDeX मिशन के जरिए कर रहा है।

कैसे होगी डॉकिंग?

ISRO द्वारा लॉन्च किए गए मिशन में से SDX-01 चेसर सैटेलाईट है जबकि SDX-02 टार्गेट सैटेलाईट है। इसका मतलब है कि SDX-01 कक्षा में स्थापित किए जाने के बाद SDX-02 की तरफ बढ़ेगा और अंत में दोनों जुड़ जाएँगे। PSLV C-60 रॉकेट ने इन्हें आपस में लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर छोड़ा है। अब इन्हें जोड़ने की प्रक्रिया चालू की जाएगी।

ISRO के मुखिया S सोमनाथ ने बताया है कि दोनों सैटेलाईट को जोड़ने की प्रक्रिया यानि डॉकिंग संभवतः 7 जनवरी, 2025 को चालू होगी। इसके लिए सबसे पहले दोनों को 20 किलोमीटर की दूरी पर रोका जाएगा। इसके बाद टार्गेट सैटेलाईट SDX-01 को स्टार्ट किया जाएगा।

इससे यह SDX-02 सैटेलाईट अंतरिक्ष में अपनी जगह से हटेगा नहीं। इसके बाद चेसर सैटेलाईट SDX-01 को SDX-02 की तरफ बढ़ाया जाएगा। इसके लिए SDX-01 धीमे-धीमे पहले 5 किलोमीटर, फिर 3 किलोमीटर, फिर 1.5 किलोमीटर अंत में लगभग 100 मीटर पास आ जाएगा।

इसके बाद यह दोनों सैटेलाईट पास में जुड़ जाएँगे। इससे डॉकिंग पूरी हो जाएगी। इसके बाद इनके बीच बिजली सप्लाई भी कर के देखी जाएगी। यह सारे प्रयोग पूरे होने के बाद दोनों सैटेलाईट को अनडॉक यानी एक-दूसरे से अलग भी किया जाएगा। यह दोनों इसके बाद लगभग 2 साल तक अलग-अलग प्रयोग में काम आएँगे।

SDX-01 सैटेलाईट पर छोटे कैमरे भी लगे हुए हैं। यह कैमरे इसके बाद तस्वीरें और वीडियो लेंगे। इसके अलावा भी इस पर कई सेंसर लगे हैं। यह सेंसर अंतरिक्ष में होने वाली गतिविधियों का पता लगाएँगे। इनमें से एक सेंसर रेडियेशन का स्तर भी मापेगा। इन सैटेलाईट को भारत में स्थित सैटेलाईट नियंत्रण सेंटर से नियंत्रित किया जाएगा।

कितनी बड़ी छलाँग?

अब तक विश्व के तीन देश ही यह डॉकिंग की तकनीक हासिल कर सके हैं। यह देश अमेरिका, रूस और चीन हैं। 7 जनवरी, 2025 को भारत भी इस लीग में शामिल हो जाएगा। इस तकनीकी तरक्की का फायदा ISRO को आगे के मिशन में मिलेगा। भारत ने अंतरिक्ष में अपना भी स्पेस स्टेशन बनाने का ऐलान किया है।

डॉकिंग में सफलता इसके रास्ते खोलेगी। भारत को 2035 तक अपना स्पेस स्टेशन बनाना है, इसके लिए 2028 से काम चालू होगा। एक-एक कर इसके हिस्से अंतरिक्ष पहुँचाए जाते रहेंगे। इसके पूरे होने पर इसमें भारतीय एस्ट्रोनॉट जा सकेंगे। इसके अलावा यह प्रक्रिया चंद्रमा पर भारतीय भेजने, वहाँ से सैंपल वापस लाने समेत बाकी मिशन के लिए मील का पत्थर होगी।

कौन हैं केरल की नर्स निमिषा प्रिया, यमन के राष्ट्रपति ने क्यों नहीं माफ की फाँसी; ब्लड मनी पर क्यों नहीं बनी बात: जानिए सब कुछ, भारत सरकार ने कहा- हर संभव मदद करेंगे

यमन में रह रही केरल की नर्स निमिषा प्रिया को मौत की सजा देने का फैसला राष्ट्रपति राशद अल-अलीमी ने मंजूर कर लिया है। निमिषा को 2017 में यमनी नागरिक तलाल अब्दो मेहदी की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। यमन की अदालत ने उन्हें 2020 में मौत की सजा सुनाई थी, और उनकी अपील को नवंबर 2023 में खारिज कर दिया गया। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद उनकी सजा पर अमल अगले एक महीने के भीतर हो सकता है।

यह खबर निमिषा के परिवार के लिए किसी झटके से कम नहीं है। उनकी माँ प्रेमा कुमारी ने कहा है कि अगर किसी की जान लेनी है तो उनकी ले ली जाए। उन्होंने अपनी बेटी को बचाने के लिए पिछले कई सालों से हरसंभव कोशिश की। प्रेमा कुमारी ने यमन जाकर मृतक के परिवार से बात करने और ‘ब्लड मनी’ (मुआवजा) के जरिए समझौता करने की कोशिश की, लेकिन बातचीत विफल रही।

जानकारी के मुताबिक, निमिषा प्रिया पर आरोप लगे थे कि उन्होंने साल 2017 में एक यमनी नागरिक तलाल अब्दो महदी को ड्रग्स का ओवरडोज दे दिया था, जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई। वहीं, निमिषा ने अपने बचाव में कहा था कि मृतक ने उनका पासपोर्ट छीन लिया था, जिसे वो वापस पाना चाहती थी। निमिषा ने दावा किया था कि उन्होंने महदी को बेहोशी की दवा दी थी। उसकी हत्या करने का इरादा नहीं था।

भारत सरकार ने इस मामले में बयान दिया है कि वे सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने कहा कि सरकार निमिषा प्रिया और उनके परिवार को हरसंभव सहायता प्रदान कर रही है।

बता दें कि निमिषा शादीशुदा हैं। केरल के पलक्कड़ की रहने वाली निमिषा अपने पति और बेटी के साथ पिछले लगभग एक दशक से यमन में काम कर रही थीं। इस बीच यमन में गृहयुद्ध शुरु हो गया तो उनका परिवार भारत आ गया था। हालाँकि, यमनी नागरिक द्वारा पासपोर्ट ले लेने के कारण निमिषा वापस नहीं लौट पाईं। हालाँकि निमिषा का परिवार अभी भी उम्मीद लगाए बैठा है कि कुछ चमत्कार होगा और उनकी बेटी की जान बचाई जा सकेगी।

पुजारी को मारकर आग में फेंका, दीवार से चुनवा दिया गर्भगृह… 44 साल बाद मुरादाबाद में प्रकट हुआ गौरी शंकर मंदिर, प्रतिमाएँ खंडित: दंगों के बाद हिंदू आराध्यों को किया दफन

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक मुस्लिम बहुल इलाके में हिन्दू मंदिर मिला है। यह मंदिर पिछले लगभग 4 दशक से बंद पड़ा था। इस मंदिर में शिवलिंग कई खंडित मूर्तियाँ भी मिली हैं। इसमें कोई जा ना पाए, इसके लिए दीवाल भी बना दी गई थी। प्रशासन ने अब दीवाल तोड़कर मंदिर का जीर्णोद्धार चालू कर दिया है। मंदिर 1980 में हुए भीषण दंगों के बाद बंद कर दिया गया था। तब यहाँ के पुजारी की हत्या कर उन्हें आग में झोंक दिया गया था।

परदादा ने बनवाया, पोते ने हटवाया कब्जा

मुरादाबाद में यह मंदिर झब्बू का नाला इलाके में मिला है। यहाँ अधिकांश आबादी मुस्लिमों की है। इस मंदिर को लेकर पुजारी के परपोते सेवाराम ने डीएम से शिकायत की थी। उन्होंने शिकायत में बताया था कि मंदिर को उनके परदादा भीमसेन ने बनवाया था और इसके बाद उनका ही परिवार इसमें पूजा करता था। उन्होंने कहा था कि 1980 के दंगे में इस मंदिर को बंद करके प्रवेश द्वार पर दीवाल बनवा दी गई थी और अब यहाँ लोग नहीं जाते। उन्होंने मंदिर को खोलने की माँग करते हुए स्थानीय लोगों के साथ प्रदर्शन भी किया था।

खंडित मूर्तियाँ, बनवा दी पार्किंग

इसके बाद सोमवार (30 दिसम्बर, 2024) को यहाँ मुरादाबाद नगर निगम और प्रशासन की टीम दल-बल के साथ पहुँची। उसने मंदिर की दीवाल तोड़ी। इसके बाद यहाँ इकट्ठा हुई मिट्टी को हटाया गया। मंदिर का स्वरूप इसके बाद दिखा। यहाँ दीवाल पर बनाई हुई बजरंग बली की प्रतिमा मिली। यहाँ से शिवलिंग भी है जिसके पास लेकिन नंदी की मूर्ति थी। माँ दुर्गा और काली की प्रतिमाएँ खंडित थी। जो मूर्तियाँ दीवाल में बनवाई गई थीं उनको भी तोड़ दिया गया था। मंदिर में तीन फीट का पक्का फर्श बनवा दिया गया था। यहाँ की जमीन पर अब पार्किंग चलती थी।

प्रशासन ने मंदिर की खुदाई करवाई है और फर्श तुड़वाया है। अंदर से काफी बड़ा मंदिर सामने आया है। प्रशासन अब मंदिर का जीर्णोद्धार करवा रहा है। यहाँ जल्द ही काम पूरा कर पूजा चालू करवा दी जाएगी। स्थानीय हिन्दुओं को अपना मंदिर वापस पाकर प्रसन्नता है लेकिन इससे कड़वी यादें भी ताजा हो गई हैं। मंदिर के निर्माण को लेकर शिकायत देने वाले सेवाराम इसके वापस मिलने और बुरी हालत देख कर रो पड़े। उन्होंने बताया कि उनके परदादा भीमसेन ने इस मंदिर के निर्माण के जमीन दी थी।

किन्नर ने उठा रखा था पूजा का बीड़ा

तब इस झब्बू का नाला इलाके में हिन्दू आबादी बसा करती थी। सेवाराम ने बताया कि उनके दादा गंगासरन यहाँ पूजा करते थे। 1980 में जब मुरादाबाद में ईद के बाद भीषण दंगा भड़का तो यह इलाका हिन्दुओं से खाली हो गया। सेवाराम ने आरोप लगाया कि दंगाइयों ने उनके दादा गंगासरन को मार दिया और उनकी लाश आग में झोंक दी। इससे उनका शव तक नहीं मिला। इसी के साथ मंदिर बंद हो गया और यहाँ दीवाल बना दी गई। इलाके से धीमे-धीमे सारे हिन्दू चले गए। तब से यह मंदिर बंद था।

यहाँ कुछ समय पहले एक हिन्दू किन्नर आकर बसी थीं। उनका नाम मोहिनी किन्नर है। मोहिनी किन्नर ने बताया कि उनसे मंदिर की यह हालत देखी नहीं गई और उन्होंने बाहर के हिस्से में रंगाई पुताई करवाई। इसके लिए भी पुलिस की मदद लेनी पड़ी थी। मोहिनी किन्नर ने बताया कि वह यहाँ रोज दिया बाती करती थीं और साथ ही दिवाली पर मंदिर की दीवाल कि सजावट करवाती थीं। अब वह और सेवाराम का परिवार अपने मंदिर को वापस पाकर काफी प्रसन्न हैं।

1980 के दंगे में मरे थे 83 लोग

यह मंदिर जिस 1980 के दंगे के बाद बंद किया गया था। उसमें 83 लोग मारे गए थे। 13 अगस्त 1980 को यह दंगा हुआ था। इसको लेकर 2023 में जाँच रिपोर्ट योगी सरकार ने सार्वजनिक की थी। इससे पहले तक दंगे की रिपोर्ट को इसलिए दबा कर रखा गया था क्योंकि इससे असल जिम्मेदार लोगों की पहचान हो जाती। मुरादाबाद में कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग दो बड़े खिलाड़ी थे। मुस्लिम लीग की जमात का नेतृत्व शमीम अहमद और हामिद हुसैन उर्फ अज्जी और उनके समर्थक कर रहे थे, जो उत्तर प्रदेश में मुस्लिम लीग को फिर से खड़ा करना चाहते थे।

वहीं, कॉन्ग्रेसी हाफिज मोहम्मद सिद्दीकी की अगुवाई में काम कर रहे थे। इस रिपोर्ट में हिंदू पक्ष के 6 लोगों के लिखित बयान दर्ज हैं, जिसमें साफ-साफ लिखा है कि ये हिंसा अचानक नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित थी।मुरादाबाद में भाजपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष हरिओम शर्मा का भी बयान इस रिपोर्ट में दर्ज है, जिन्होंने कहा था कि ये हिंसा बहुत बड़ी साजिश का महज एक हिस्सा भर ही थी। इस हिंसा के लिए मुस्लिम पक्ष को बाहरी देशों, इस्लामी संगठनों जैसे मुस्लिम लीग, जमीयत उलेमा-ए-हिंसा और तबलीगी-ए-इस्लाम ने फंडिंग की थी।

इसके दंगे से तीन महीने पहले से ही कई हिंसक घटनाएँ हो रही थीं। गहराए तनाव का फायदा मुस्लिम लीग और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने 13 अगस्त 1980 को ईद के दिन उठाया। उन्होंने अपने समर्थकों के माध्यम से सुअरों वाली घटना को अंजाम दिया और पूरे मुरादाबाद को दंगों की चपेट में धकेल दिया। भाजपा नेता हरिओम शर्मा ने उस दिन को याद करते हुए बयान में बताया है कि ईद के मौके पर ईदगाह के पास लगाए गए शिविरों में मुस्लिमों की भीड़ ने आग लगा दी।

इसमें उन 2 शिविरों को छोड़ दिया गया, जिन्हें मुस्लिम लीग चला रही थी। उस दौरान मुस्लिम लीग के नेता अपने शिविरों (कैंप) के पास ही थे, जबकि उन्हें नमाज में शामिल होना था। इस बात से साफ है कि वो दंगों के प्रति पहले से जानते थे और सारी साजिश उनकी रची हुई थी। हालाँकि, इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि ईदगाह में सुअर गए थे। इतना नहीं, इसके अलावा एक और अफवाह फैलाई गई कि पुलिस ने सैकड़ों मुस्लिमों को ईदगाह के अंदर मार दिया है।