Home Blog Page 5307

Tanhaji से आहत वामपंथी मीडिया हिंदू शासकों की शौर्य-कथा पर बिलबिलाया

सिनेमा का सफर शुरुआती दौर से लेकर अब तक अविस्मरणीय रहा है। एक ऐसा माध्यम जिसने चलचित्रों के माध्यम से अनेकों कहानियाँ हम तक पहुँचाई और हमारी उसमें रुचि पैदा की। इस माध्यम का प्रभाव इतना ज्यादा रहा कि शुरुआती समय में तो दर्शक यही भूल गया कि उसे क्या ग्रहण करना है और क्या दरकिनार। बस, जो भी पर्दे पर आया वहीं अंतिम सत्य…। दर्शकों की इसी प्रतिबद्धता का फायदा उठाकर इस पर खूब राजनीति हुई। अपनी विचारधारा के ओट में दर्शकों की मानसिकता तय की जाने लगी। एक समय ये भी आया जब हिन्दी सिनेमा ने हिंदू सम्राटों के इतिहास को हाशिए पर रख दिया और भारतीय संस्कृति को एकमात्र गंगा-जमुनी तहजीब की धरातल पर परोसने लगे।

इस दौरान मुगल शासकों पर अलग-अलग तरीकों से फिल्में बनीं, अलग-अलग कहानियों के साथ। इनमें जहाँगीर को चाहते-न चाहते हुए भी कुरीतियों पर लगाम लगाने वाला बताया गया। हिंदुओं की बहन-बेटियों का अपहरण कर उन्हें दरबार में प्रदर्शनी बनाने वाले अकबर की कहानी कुछ ऐसे पेश की गई कि उसे हिंदू तक अपना नायक मानने लगे। इस काल में महान मराठा सम्राट शिवाजी की वीरगाथा मौन रही, दिल्ली सम्राट पृथ्वीराज चौहान को छोटे पर्दे कर सीमित कर दिया गया और बाकी हिंदू शासकों को बिना शोध के जान पाना असंभव हो गया।

लंबे समय बाद कुछ सालों पहले ये स्थिति बदली और कुछ समय से मुगल शासकों के अलावा विस्मृत हिंदू सम्राटों पर भी फिल्में बननी लगीं। हालाँकि इन फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी, डॉयलॉग डिलीवरी, कलाकारों की एक्टिंग आदि यहाँ चर्चा का विषय नहीं हैं। यहाँ विषय है इतिहास के उन नायकों का, जो एक समय तक दबे रहे और अब उन्हें सिनेमाई पर्दे पर जगह दी जा रही है। अब दर्शकों को इतिहास के उन नामों से परिचित कराया जा रहा है, जिनकी गाथा शोधार्थियों के शोध में है, लेकिन इतिहास की किताबों में वे एक पंक्ति या पैराग्राफ में समेट दिए गए।

समय बदला, नदरिया बदला, कुछ डायरेक्टर-प्रॉड्यूसर आए, कुछ नए लेखकों ने अलग कहानियाँ लिखीं। तब जाकर बड़े पर्दे पर हिंदुस्तान का इतिहास भी दिखने लगा। बॉलिवुड प्रेमियों को पिछले कुछ वर्षों से यह लगने लगा कि हिंदू नायकों को भी उतनी ही महत्ता दी जा रही है, जितनी की कभी किसी मुगल शासक को दी जाती थी। लेकिन प्रोपेगेंडा फैलाने में माहिर मीडिया हाउस द क्विंट जैसे संस्थान को यह भला रास क्यों आता। दर्शक को ‘आधा पहलू या अलग पहलू’ दिखाने का चलन आदि उन्हीं जैसे लोगों ने तो बनाया है। ऐसे में अगर दूसरा पक्ष भी सिनेमा पर उतरने लगा तो उनके विचारों का क्या होगा? उन्हें तो डर है कि लोग जानने-समझने के इच्छुक हो जाएँगे और उनके बताए ‘सच’ को कोई नहीं सुनेगा। इसलिए जैसे ही तानाजी का ट्रेलर रिलीज हुआ, और उससे पहले पानीपत का ट्रेलर को भी लोग देख चुके है… तो क्विंट ने इस पर एक लेख लिख मारा। माफ कीजिए, लेख नहीं – जहर लिखा है, जहर!

हालाँकि ये पूरा लेख किसी तथाकथित सेकुलर के लिए एक आदर्श लेख हो सकता है। लेकिन एक आम नागरिक और सेकुलरिज्म की उचित परिभाषा समझने वाले के लिए ये लेख केवल हिंदुओं के इतिहास और उसके पर्दे पर दिखाए जाने को लेकर पैदा हुई कुंठा का प्रतिबिंब ही है।

तानाजी फिल्म पर लेख में लिखे मुख्य बिंदु

लेख की शुरुआत में ही ये साफ कर दिया जाता है कि किसी भी प्रकार का सिनेमा अपने समय की राजनीति को दर्शाता है। इसलिए नेहरू के समय ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और ‘2 बीघा जमीन’ जैसी फिल्मों का निर्माण होता है। जबकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘बेबी’ और ‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी फिल्मों की झड़ी लग जाती है।

इसके अलावा इस लेख में ये भी बताया जाता है कि मोदी सरकार के नेतृत्व में सिनेमा सिर्फ़ हिंदू राष्ट्रवाद के नैरेटिव को बढ़ावा दे रहा है। जिसके सबूत संजय लीला बंसाली की फिल्म ‘पदमावत’,’बाजीराव मस्तानी’ जैसे फिल्में हैं और अब ‘पानीपत-द ग्रेट बिट्रेयल’ और ‘तानाजी’ भी इसके ही उदाहरण हैं। लेकिन उस समय का क्या जब नेहरू काल में ‘अनारकली’ और ‘ताजमहल’ जैसी फिल्में बन रहीं थी और उससे पहले हुमायूँ जैसी फिल्में तैयार हो चुकीं थीं… क्या उस समय वो फिल्में राजनेताओं के चरित्र का उल्लेख नहीं करती थीं? अगर इस समय हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है तो कॉन्ग्रेस काल में बनी अकबर जैसी फिल्में दर्शकों को इतिहास का कौन सा चेहरा दिखाना चाहती थी?

मोदी सरकार को घेरने की आड़ में लेख लिखने वाले पत्रकार हिंदु राष्ट्रवाद को किस नीचता से समझाते हैं, ये लेख को आगे पढ़ने पर समझा जा सकता है। ‘तानाजी’ फिल्म कुल मिलाकर छत्रपति शिवाजी द्वारा मुगल शासक पर कूच की एक कहानी है। जिसमें तानाजी मालूसोर (छत्रपति शिवाजी की ओर से उनके कोली जनरल होते हैं, और राजपूत उदयभान सिंह राठौड़ मुगलों की ओर से कमांडर। अब चूँकि इस फिल्म में तानाजी का किरदार अजय देवगन द्वारा निभाया गया है और उदयभान सिंह का सैफ अली खान द्वारा तो द क्विंट इसमें हिंदू-मुस्लिम ढूँढने से गुरेज नहीं करता और बताता है कि आखिर कैसे एक मराठा और राजपूत के बीच की लड़ाई साम्प्रादायिक बनी।

लेख में जोर देकर बताया जाता है कि फिल्म के तानाजी और उदयभान सिंह दोनों हिंदू थे, लेकिन ट्रेलर में अजय देवगन के माथे पर तिलक है, जबकि सैफ अली खान के माथे पर नहीं। अब ये बात इतिहास को थोड़ा-बहुत भी जानने वाला हर शख्स जानता है कि जिस समय मुगलों ने राज किया उस दौरान आम जनता समेत हिंदू राजाओं को उनके अधीन होना पड़ा था, और उनके तौर-तरीकों से हिंदुओं के जीवन-बसर पर भी असर पड़ा था। कई हिंदू मुगलों की ओर से लड़ते थे, क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं था। अब अगर 5000 मुगल सैनिकों का प्रतिनिधि करने वाले ‘उदयभान राठौड़’ तिलक लगाकर मैदान में आते तो क्या मुगल उनके ऊपर यकीन कर पाते या फिर वो 5,000 सैनिक

तथ्यों को अपनी कल्पना की जमीन पर परोसने वाले लोगों को अगर तानाजी का रोल कर रहे अजय देवगन के माथे पर लगे तिलक में ‘अच्छा-बुरा’, ‘हिंदू-मुस्लिम’ एंगल दिखता है, तो इसमें दर्शकों या पाठकों की क्या गलती है, उन्हें क्यों बरगलाया जा रहा है? पूरी कहानी मराठाओं औऱ मुगलों के बीच लड़ी गई, लड़ाई का प्रतिनिधित्व मराठाओं की ओर से तानाजी ने किया, इसलिए उनकी वीरगाथा पर आज फिल्म बनी है। अगर उनकी जगह उदयभान सिंह होता और उस वीरता से वो लड़ता तो शायद उस पर भी फिल्म बनती। हम चाहे कितने भी तर्क-कुतर्क कर लें, लेकिन इस बात को नहीं झुठलाया जा सकता है कि मुगलों ने भारत पर कब्जा किया था और मराठा इस देश की धरती को माँ की तरह पूजते थे। ऐसे में तानाजी के पक्ष को न दिखाकर उदयभान (जो मुगलों की ओर था, कारण चाहे जो भी हो) का पक्ष दिखाना कौन सा सेकुलरिज्म कायम करता है?

लेख में इस बात को भी बताया जाता है कि ट्रेलर में तानाजी कि माँ कहती हैं कि -“जब तक कोनढ़ाना में फिर से भगवा नहीं लहरेगा, हम जूते नहीं पहनेंगे।” और तानाजी कहते हैं “हर मराठा पागल है स्वराज का, शिवाजी राजे का, भगवे का।”

लेख लिखने वाले पत्रकार और उनकी मानसिकता वाले अन्य लोगों को समझने की जरूरत है कि जिन बिंदुओं को गलत-सही ठहराकर वो हिंदू राष्ट्रवाद को और इतिहास के नायकों की छवि धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं- वो किसी धर्म का प्रतीक है और ‘भगवा’ उसी भाव का एक रूप। क्या कभी किसी मुस्लिम शासक को आपने सुना है जंग के लिए संस्कृत में दहाड़ते हुए या फिर ‘जय श्री राम’ बोलते हुए जंग का आगाज करते – नहीं। वो वही बोलते हैं, जो उनके मजहब ने उन्हें सिखाया होता है। इसी तरह भगवा प्रतीक है भारतीय पृष्ठभूमि के एक पूरे काल का। अगर मराठाओं ने भगवा रंग पर अपने भाव जाहिर किए, तो इसमें साम्प्रादायिकता कहाँ से आ गई। क्या सिर्फ़ इसलिए की उदयभान राजपूत होने के बाद ऐसा नहीं कर पाया और तानाजी ने अपने धर्म का मान रखा! मतलब हद नहीं है मानसिक दिवालिएपन की!

इसके बाद हिंदू बनाम मुस्लिम करते हुए जब पत्रकार महोदय थक गए तो उन्होंने इसे केवल हिंदुओं का मसला नहीं बताया। बल्कि उन्हें तो इस फिल्म में ऊँची जाति वालों का वर्चस्व भी दिखने लगा। उन्होंने काजोल के एक डॉयलॉग पर अपना जहर उगलना शुरु किया। जहाँ काजोल ट्रेलर में कहती सुनी जा सकती हैं कि जब शिवाजी राजे की तलवार चलती है तब औरतों का घूँघट और ब्राहम्णों के जनेऊ सलामत रहते हैं।

हालाँकि, बौद्धिक स्तर पर पत्रकार महोदय का कितना विकास हुआ है ये कुछ ज्यादा पता नहीं, लेकिन ये साफ है कि ये डायलॉग उस समय ऊँची जाति वालों के वर्चस्व वाली स्थिति को दिखाने के लिए नहीं बोला गया। भारतीय संस्कृति में औरतों के घूँघट को इज्जत से जोड़ के देखा जाता है और ब्राह्मणों के जनेऊ को धर्म से। इसलिए जाहिर है यहाँ बात औरतों की इज्जत और सनातन धर्म की रक्षा के लिए हुई थी न कि ब्राहम्णों और पितृसत्ता के वर्चस्व के लिए। इसलिए हे पत्रकार महोदय! कृपया आँखें खोल कर सिनेमा देखें। और हाँ, प्रोपेगेंडा वाला चश्मा तो बिल्कुल ही उतार दें सिनेमा घर में।

अलीगढ़ की लड़की ने बदला नाम, ‘मीरा’ बन हिन्दू रीति-रिवाज़ से किया कान्हा से विवाह, परिवार ने दिया साथ

‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई…’ मीराबाई के इस भजन को आज के युग में सार्थक कर दिखाया है यूपी में अलीगढ़ की रहने वाली यमुना ने। भक्ति रस में सराबोर यमुना बचपन से ही भगवान कृष्ण की पूजा में तल्लीन थीं। समय के साथ-साथ उनका कृष्ण प्रेम इस क़दर बढ़ गया कि उन्होंने सांसारिक मोह से दूरी बनाते हुए भगवान कृष्ण की मूर्ति से शादी कर ली।

कृष्णमय हुईं यमुना ने बक़ायदा पूरे हिन्दू रीति-रिवाज़ से भगवान कृष्ण के साथ सात फेरे लिए। यमुना के इस निर्णय से उनकी माँ लज्जावती समेत घर के अन्य सदस्य बेहद ख़ुश हैं और उन्होंने इस विवाह में सभी आयोजनों में यमुना का पूरा साथ दिया। पुराणों के अनुसार, यमुना कृष्ण की प्रेयसी हैं, तो यह यमुना भी बचपन से ही कृष्ण भक्ति में तल्लीन रहती हैं। 

यमुना का कहना है कि वो जीवनभर भगवान श्री कृष्ण (विग्रह) के साथ रहेंगी। बता दें कि बनारस निवासी उनके बहनोई उमेश शर्मा ने सारी व्यवस्थाओं का संचालन किया, देर रात फेरों की रस्म हुई। वहीं, इस अनूठे विवाह में वर पक्ष बांके बिहारी मंदिर को बनाया गया। इसके लिए मंदिर समिति को विवाह का कार्ड भी दिया गया। इस विवाह के कार्ड पर दूल्हे का पता वृंदावन लिखवाया गया। वहीं, लड़की पक्ष की सारी ज़िम्मेदारियाँ दुल्हन के जीजा ने निभाई। इस विवाह में किसी प्रकार का कोई विघ्न उत्पन्न न हो, इसके लिए नज़दीकी गाँधीपार्क पुलिस को अवगत कराया गया और उन्हें भी विवाह में शामिल होने का न्यौता दिया। 

विवाह सम्पन्न होने के बाद मीरा बनीं यमुना ने अपना पारिवारिक जीवन त्यागकर वृंदावन जाने का फ़ैसला किया है। जानकारी के अनुसार, यमुना चार बहनों में सबसे छोटी हैं। उनकी तीनों बहनों की शादी हो चुकी है। और वो ख़ुद पेशे से एक प्राइवेट कंपनी में सहायक मैनेजर के पद पर हैं। लेकिन, अब यमुना ने सब कुछ छोड़कर वृंदावन में कृष्ण भक्ति में जीवन बिताने का संकल्प ले लिया है। 

यमुना ने बताया कि कृष्ण भक्त मीराबाई से उन्हें काफ़ी प्रेरणा मिली है। भगवत गीता के अलावा उन्होंने गरुण पुराण का भी अध्ययन किया है। जब वो बचपन में अपने परिवार के साथ वृंदावन जाया करती थीं, तभी से उनके मन यह प्रबल इच्छा उठती थी कि वो भगवान कृष्ण से विवाह करें। जैसे-जैसे वो बड़ी हुईं, उनकी यह इच्छा और प्रबल होती गई, जिसे अब उन्होंने साकार कर दिखाया। 

बता दें कि इस अनोखे विवाह के दौरान जिस किसी ने भी दूल्हे के रूप में भगवान कृष्ण की मूर्ति को विराजमान देखा, उसने भक्ति-भाव के साथ उन्हें नमन किया और आगे चला गया।

‘उद्धव ठाकरे ने मेरे और मेरे परिवार के साथ धोखाधड़ी की’ – थाने में शिकायत लेकर पहुँचा यह शख्स

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद यह स्थिति साफ़ हो गई कि सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत किसी भी दल के पास नहीं है। भाजपा 105 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी मगर शिवसेना के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन के बावजूद राज्य में सरकार बनाने को लेकर दोनों दलों में एक राय नहीं बन पाई। दरअसल उद्धव ठाकरे और उनकी शिवसेना राज्य की होने वाली सरकार में 50-50 प्लान के तहत अपनी पार्टी की हिस्सेदारी माँग रहे थे। वहीं उद्धव ने अपनी पार्टी के लिए मुख्यमंत्री पद की भी माँग रखी थी जिसे भाजपा ने ख़ारिज कर दिया था।

इसके बाद से ही राज्य में सरकार बनाने के लिए शिवसेना उन पार्टियों से संपर्क साधने में जुट गई, जिन्होंने अपना चुनाव ही शिवसेना के खिलाफ लड़ा था। इसी बात को लेकर एक शख्स ने पुलिस थाने में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार औरंगाबाद के रहने वाले इस शख्स का नाम रत्नाकर चौरे है। इस व्यक्ति ने शिवसेना पर आरोप लगाया है कि शिवसेना ने उनके और उनके परिवार के साथ छल किया है। पुलिस को दी गई इस शिकायत में रत्नाकर ने तीन लोगों के नाम लिखवाए हैं। वोट के साथ चीटिंग को लेकर की गई इस कंप्लेंट में रत्नाकर ने विधायक प्रदीप जैसवाल, चंद्रकान्त खैरे और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का नाम डाला है।

बता दें कि यह शिकायत बेगमपुरा पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है। प्रदीप जैसवाल, चंद्रकान्त खैरे और उद्धव ठाकरे पर की गई इस शिकायत में चौरे ने आरोप लगाया है कि शिवसेना ने हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर वोट माँगा था। इसके उलट नतीजे आने के बाद शिवसेना अपने खिलाफ चुनाव लड़ने वाली पार्टियों के साथ सरकार बनाने की कोशिश कर रही है जबकि उसने भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार बनाने के नाम पर वोट माँगा था। चौरे के मुताबिक यह उनके और उनके परिवार के साथ चीटिंग का मामला है, उन्होंने तीनों पर मामला दर्ज करने की तहरीर दी है।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका था। यही वजह है कि गठबंधन के बगैर कोई भी राजनीतिक दल सूबे में सरकार नहीं बना सकता। यही वजह है कि भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद शिवसेना ने शरद पवार की एनसीपी और कॉन्ग्रेस पार्टी का मुँह ताकना शुरू कर दिया था। कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि एनसीपी और कॉन्ग्रेस के समर्थन देने से महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार बन सकती है। दरअसल महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भाजपा को सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद सरकार बनाने के लिए न्योता भेजा था। भाजपा के बाद उन्होंने शिवसेना और एनसीपी को भी न्योता भेजा था मगर पर्याप्त बहुमत और आपसी मतभेद के चलते दलों में एक राय नहीं बन पाई थी। इसके बाद से ही महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।

मिशनरी स्कूल ने लड़कियों के उतरवाए लेगिंग्स, कहा – ड्रेस कोड का हिस्सा नहीं

पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में एक मिशनरी स्कूल में पढ़ने वाली छात्राओं की जबरन लेगिंग्स उतरवाने का मामला सामने आया है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि लेगिंग्स का रंग स्कूल की ड्रेस से मेल नहीं खाता था। यह घटना सोमवार (18 नवंबर) की है, लेकिन मामला सामने तब आया जब अगले दिन मंगलवार को छात्राओं के माता-पिता ने इस घटना के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि वह अपने बच्चों को ठंड से बचाने के लिए लेगिंग्स पहनाते हैं, ऐसे में स्कूल का ऐसा करना बेहद शर्मनाक है। बता दें कि यह स्कूल बोलपुर में स्थित है, जहाँ का तापमान काफ़ी कम रहता है।

आश्चर्य तो इस बात पर है कि इस शर्मनाक घटना की माफ़ी माँगने की बजाय स्कूल प्रशासन ने तर्क दिया कि कई बार माता-पिता को कहा गया था कि लेगिंग्स स्कूल ड्रेस कोड का हिस्सा नहीं है। स्कूल की प्रधानाचार्या अर्चना फ़र्नांडिज ने इस बात का बचाव करते हुए कहा कि यह घटना छात्राओं को अपनी लेगिंग्स उतारने के लिए मज़बूर करने की घटना नहीं थी, बल्कि “छात्राओं को केवल लेगिंग्स देने को कहा था क्योंकि वे स्कूल की वर्दी से मेल नहीं खा रही थी।”

ख़बर के अनुसार, स्कूल के एक वरिष्ठ शिक्षक, जहीर अली मोंडल ने मीडियाकर्मियों से कहा,

“कुछ स्टूडेंट्स ने लेगिंग्स पहनी हुई थी। हमारे स्कूल में एक ड्रेस कोड है और कुछ स्टूडेंट्स ने ऐसे कपड़े पहने जो स्कूल ड्रेस कोड का उल्लंघन करते हैं। लेकिन किसी को भी अपनी लेगिंग्स उतारने के लिए मजबूर नहीं किया गया। हमने बच्चों से कहा है कि वे इन लेगिंग्स को दोबारा न पहनें।”

वहीं, कुछ अभिभावकों ने शिक़ायत की है कि उनके बच्चों ने लेगिंग्स के नीचे अंडरवियर नहीं पहना था और स्कूल ने उन्हें शर्मिंदा करने का काम किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सोमवार को पाँच से नौ वर्ष की बच्चियाँ सुबह ठंड होने के कारण लेगिंग्स पहनकर स्कूल गईं थी, लेकिन प्रधानाचार्या और अन्य शिक्षकों ने उनकी ड्रेस से मेल न खाने के कारण लेगिंग्स उतरवा दी। इस घटना पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए अभिभावकों ने स्कूल के ख़िलाफ़ शांतिनिकेतन पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज करवाया।

सोशल मीडिया पर भी इस घटना को लेकर रोष प्रकट किया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (WBCPCR) की अध्यक्ष अनन्या चटर्जी चक्रवर्ती ने कहा, “हमने स्कूल को लिखा है और स्पष्टीकरण माँगा है।” वहीं, स्कूल की एक अध्यापिका का कहना है,

“माता-पिता को पहले कई बार चेतावनी दी गई थी जब बच्चे ऐसे कपड़े पहन रहे थे, जो हमारे ड्रेस कोड में नहीं है। लेकिन बच्चों के कपड़े उतारने के जो आरोप लगाए गए, वह ग़लत हैं। मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि माता-पिता अभी भी क्यों विरोध कर रहे हैं।”

जानकारी के अनुसार, बोलपुर के पुलिस अधिकारी अभिषेक रॉय ने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें अभिभावकों की ओर से शिक़ायत मिली है। इस सन्दर्भ में वो माता-पिता और अध्यापक दोनों से बात करेंगे। एक बच्ची के पिता का कहना है, “मैं अपनी बच्ची को उसकी लेगिंग्स के बिना स्कूल से बाहर आते हुए देखकर चौंक गया। उसके पास अंडरवियर नहीं था। यह अपमानजनक है। हेड मिस्ट्रेस को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।”

पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री ने इस घटना के सन्दर्भ में कहा, “हमने कथित घटना को गंभीरता से लिया है।” इसके अलावा, ज़िला शिक्षा विभाग से भी स्कूल अधिकारियों से इस पर रिपोर्ट माँगने को कहा है। चटर्जी ने कहा, “रिपोर्ट मिलने के बाद मैं सुनिश्चित करूँगा कि उचित कार्रवाई की जाए। हम आईसीएसई बोर्ड से भी इस संबंध में बात करेंगे।”

शिक्षा मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार इस मामले को देखेगी, क्योंकि निजी स्कूल उनके दायरे में नहीं आते हैं। शिक्षाविद् पाबित्रा सरकार ने कहा, “अगर इस तरह की घटना हुई है, तो इसका बच्चों के दिमाग पर बुरा असर पड़ेगा।”

‘सेक्युलरिज़्म’ शब्द पर अटकी महाराष्ट्र की राजनीति! NCP-कॉन्ग्रेस ने डाला CMP में, अब शिवसेना की बारी

महाराष्ट्र में किसकी सरकार, किसके साथ सरकार? महाराष्ट्र में कौन मुख्यमंत्री, किसके बनेंगे कितने मंत्री? राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद अब तक यह गुत्थी सुलझी नहीं है। इसी क्रम में शरद पवार के दिल्ली स्थित बंगले पर कल देर रात (20 नवंबर 2019 को) तक बैठकों का सिलसिला जारी रहा। इसमें कॉन्ग्रेस के अहमद पटेल और NCP सुप्रीमो पवार समेत अन्य नेताओं हिस्सा लिया लेकिन बात एक शब्द पर अटक गई।

इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि इस बैठक में ‘सेक्युलरिज़्म’ एक कांटे का मुद्दा बना रहा, बाद में इसे कॉमन मिनिमम प्रोग्राम (CMP) में शामिल किया गया।

बैठक में मौजूद एक शीर्ष सूत्र ने पुष्टि की है कि कॉन्ग्रेस शिवसेना की कट्टर हिन्दुत्व की छवि से संशय में है और वो चाहती है कि इस सन्दर्भ में CMP में एक स्पष्ट संदेश शामिल किया जा सके, जिससे नई सरकार के गठन में किसी तरह की समस्या का सामना न करना पड़े। नेताओं ने बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की। इसके बाद अहमद पटेल, कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पास वापस चले गए।

सूत्रों के मुताबिक़, इस मामले पर शिवसेना तक पहुँचने और उन्हें समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलरिज़्म’ शब्द निहित है। लेकिन शिवसेना अगर शब्द पर सहमत होती है तभी महाराष्ट्र में सरकार के गठन पर गतिरोध कुछ दिनों में समाप्त होने की संभावना है। क्योंकि कॉन्ग्रेस-NCP ने बुधवार को घोषणा की थी कि वे जल्द ही शिवसेना के साथ साझेदारी की शर्तों को अंतिम रूप देने के बाद राज्य में एक स्थिर सरकार का गठन करेंगे।

ख़बर तो यह भी आई थी कि कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने सोमवार (18 नवंबर) को NCP प्रमुख शरद पवार के साथ अपनी बैठक के दौरान शिवसेना के साथ गठबंधन का संकेत दिया था। ऐसे में इस बैठक पर सभी की नज़र टिकी हुई थी, क्योंकि इस बैठक के तहत नेताओं को कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के खाके पर चर्चा करने के लिए बुलाया गया था।

आज फिर से (21 नवंबर) कॉन्ग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि राज्य में एक स्थिर सरकार बनेगी। उन्होंने यह भी कहा कि NCP के साथ बातचीत गुरुवार को भी जारी रहेगी। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस-NCP के बीच आज लंबी और सकारात्मक चर्चा हुई है। चर्चा जारी रहेगी। मुझे यक़ीन है कि हम बहुत जल्द महाराष्ट्र को एक स्थिर सरकार दे पाएँगे।”

मीडिया को संबोधित करते हुए, चव्हाण ने यह भी कहा कि NCP और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच एक और बैठक होगी, जिसमें सरकार गठन से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।

दरअसल, NCP, ढाई साल के कार्यकाल के साथ रोटेशनल मुख्यमंत्री की माँग पर ज़ोर दे रही है, जबकि उसने कॉन्ग्रेस के लिए डिप्टी सीएम पर अपना मत दिया है। सूत्रों के मुताबिक़, विधायकों के कोटे के हिसाब से 16-15-12 के फॉर्मूले के हिसाब से मंत्री पद बाँटे जाने की संभावना है।

वहीं दूसरी ओर शिवसेना सांसद संजय राउत ने प्रेस वार्ता में कहा कि एक दिसंबर से पहले सरकार का गठन हो जाएगा।

इससे पहले, शिवसेना ने बुधवार (20 नवंबर) को कहा था कि महाराष्ट्र में एक स्थिर सरकार बनाने की राह में सभी मुश्किलों को दूर कर लिया गया है और इसकी घोषणा आज दोपहर तक की जाएगी। शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि सरकार के बारे में सभी विवरणों को 4-5 दिनों में अंतिम रूप दिया जाएगा और सभी मुश्किलों को हटा दिया जाएगा। साथ ही यह संभावना जताई जा रही है कि NCP और कॉन्ग्रेस के बीच गुरुवार को अपने स्तर पर बातचीत के बाद तीनों पार्टियाँ शुक्रवार (22 नवंबर) को बैठकों का दौर करेंगी।


कॉन्ग्रेस लेकर आई थी भाड़े की भीड़! गाँधी परिवार के सुरक्षा के नाम पर भी नहीं जुटे कार्यकर्ता, Video Viral

इन दिनों विपक्ष की हकीकत को जनता के सामने लेकर आने वाले हर मीडिया हाउस को विपक्ष द्वारा ‘मोदी मीडिया’ कहा जाता है। अब ऐसे में अगर कोई मीडिया हाउस किसी पार्टी के कारनामों की पोल खोल दे तो ‘मोदी मीडिया मुर्दाबाद’ के नारे लगाने से भी विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ता गुरेज नहीं करते। कुछ ऐसा ही बुधवार को भी हुआ।

हुआ यह कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गाँधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने को लेकर दिल्ली की सड़कों पर यूथ कॉन्ग्रेस द्वारा विरोध-प्रदर्शन किया जा रहा था। इस विरोध में बहुत से युवा छात्र भी शामिल थे। ये प्रदर्शन के दौरान काफी उत्तेजित दिखाई दिए। इस प्रदर्शन की कवरेज लगभग हर मीडिया चैनल पर जोर-शोर से चली और मोदी सरकार की खूब आलोचना हुई। लेकिन tv9 भारतवर्ष द्वारा इस प्रदर्शन के कवरेज की कुछ वीडियो अचानक सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं।

ऐसा इसलिए क्योंकि जहाँ अन्य मीडिया हाउस इस प्रदर्शन को गाँधी परिवार के समर्थन में ‘युवाओं का आक्रोश’ वाला एंगल दिखाने की कोशिश कर रहे थे वहीं, TV9 भारतवर्ष के संवादादाता विपिन चौबे ने प्रदर्शनकारियों से बात करने की कोशिश की। इस दौरान उन्होंने जानना चाहा कि आखिर जिस प्रदर्शन में युवा चेहरे इतना बढ़-चढ़ कर अपनी भागीदारी दे रहे हैं, वे मामले की गंभीरता को लेकर कितने सचेत हैं। बस इसीलिए उन्होंने वहाँ मौजूद युवाओं से पूछना शुरू किया कि वो यहाँ क्यों आए हैं? अब ये सवाल इतना भी कठिन नहीं था, क्योंकि अगर आप वहाँ प्रदर्शन के लिए आए हैं तो उसके बारे में तो पता होना ही चाहिए। लेकिन हैरानी तो तब हुई जब वहाँ मौजूद कॉलेज छात्र ये ही नहीं बता पाए कि वो प्रदर्शन कर रहे हैं तो किस चीज के लिए!

हडबड़ाते-सकपकाते वहाँ मौजूद कॉलेज छात्र-छात्राएँ सिर्फ़ यही कहती नजर आईं कि नरेंद्र मोदी ने राहुल गाँधी के साथ बहुत गलत किया है और वो तानाशाही कर रहे हैं। लेकिन जब छात्र-छात्राओं से पूछा गया कि तानाशाही क्या है, तो वे जवाब देते भी हिचकते नजर आए और तानाशाही को छेड़खानी बताने लगे। इसके बाद एक-दूसरे को कैमरे के आगे खींचती छात्राओं से जब पूछा गया कि एसपीजी की फुल फॉर्म क्या है तो वह उसे भी बता नहीं पाईं और कैमरे के सामने से भागने लगीं। इतना ही नहीं, वहाँ कुछ प्रदर्शनकारियों को ये तक नहीं पता था कि राहुल गाँधी की SPG सुरक्षा हटाई गई है। जिसके कारण वह SPG की जगह CPG सुरक्षा कहती नजर आई। जब संवादादाता ने छात्रा से इसकी फुलफॉर्म पूछी तो भीड़ से निकलकर कुछ कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता रिपोर्टर के सामने आ गए और उनके बदसलूकी करने लगे।

रिपोर्टर से चिल्ला-चिल्ला के पूछा जाने लगा कि वो यहाँ क्या कर रहे हैं। जब उन्होंने कहा कि वो सिर्फ़ सवाल ही तो कर रहे हैं तो उन्हें एक कार्यकर्ता कहता नजर आया कि कॉन्ग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी हैं, जबकि अन्य कार्यकर्ता उसी बीच तेज-तेज आवाज में मोदी मीडिया मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे और रिपोर्टर का विरोध होने लगा। जिस पर रिपोर्टर ने साफ कहा कि सवाल पूछने पर मिर्ची लग रही है।

इसके अलावा बता दें कि इस कवरेज की एक और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। जिसमें कुछ कॉलेज छात्र उग्र होते नजर आ रहे हैं और बैरिकेडिंग को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में विपिन चौबे जब इनके पास जाते हैं और बैरिकेट पर चढ़े एक छात्र से पूछते हैं कि वो प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं, तो वो पहले सिर्फ़ चिल्लाता है- तानाशाही नहीं चलेगी… लेकिन जब उससे पूछा जाता है कि तानाशाही कौन कर रहा है? तो वो कहता नजर आता है कि तानाशाही सब कर रहे हैं और जब पूछा जाता है कि ये प्रदर्शन क्यों हो रहा है तो उसके शब्द होते हैं- “हमें ये सब कुछ नहीं पता हमें बस अपनी टीम के साथ रहना है।” इसके अलावा वीडियों में अन्य छात्रों को ये भी कहते सुना जा सकता है कि ये प्रदर्शन उनकी सुरक्षा के लिए किया जा रहा है और उन्हें सरकारी नौकरियाँ दिलाने के लिए हो रहा है।

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है, जब कॉन्ग्रेस के लिए इकट्ठा हुई भीड़ की हकीकत का खुलासा हुआ हो। इससे पहले चुनाव के दौरान भी कई वीडियो के कारण कॉन्ग्रेस पार्टी के समर्थकों पर और उनके प्रदर्शनों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग चुके हैं।

गाँधी परिवार को दिलाने चले थे SPG कवर, हाई कोर्ट ने वकील पर ही लगाया ₹25000 का जुर्माना

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अधिवक्ता उमेश बोहरे द्वारा दायर एक याचिका को ख़ारिज कर दिया है। इस याचिका में गाँधी परिवार को SPG सुरक्षा देने की तत्काल माँग इस आधार पर की गई थी कि परिवार के दो सदस्य, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री (इंदिरा गाँधी और राजीव) के तौर पर देश सेवा की थी, उनकी हत्या कर दी गई थी।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर यह कहते हुए 25,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया कि याचिकाकर्ता ‘सस्ती लोकप्रियता’ हासिल करने की कोशिश में था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने हाल ही में कॉन्ग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा के लिए विशेष सुरक्षा दल (SPG) कवर वापस ले लिया था।

गाँधी परिवार और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के SPG सुरक्षा कवर को वापस लेने के केंद्र के क़दम का विरोध करते हुए, कॉन्ग्रेस ने राज्यसभा में यह मुद्दा उठाते हुए सरकार से विशेष सुरक्षा बहाल करने का आग्रह किया, सदन का वॉक आउट भी किया।

पार्टी नेता आनंद शर्मा ने कहा कि गाँधी परिवार को SPG कवर की बहाली राष्ट्रीय हित में थी। उन्होंने कहा कि चार नेताओं की व्यक्तिगत सुरक्षा और जीवन पर ख़तरा था और इसलिए केंद्र को ‘पक्षपातपूर्ण राजनीति’ से ऊपर उठना चाहिए।

समाचार एजेंसी ANI ने कॉन्ग्रेस नेता के हवाले से कहा,

“कृपया इससे ऊपर उठें और समीक्षा करें और बहाल करें। यह राष्ट्रीय हित में होगा, अन्यथा आज, कल और भविष्य में भी इस पर सवाल उठाया जाएगा।”

हालाँकि, मोदी सरकार ने यह कहते हुए सुरक्षा कवर को बहाल करने से इनकार कर दिया कि इस तरह के फ़ैसले गृह मंत्रालय के पैनल द्वारा ख़तरों की गहन समीक्षा के आधार पर लिए जाते हैं। इसके अलावा, इस बात का भी उल्लेख किया गया कि इस तरह के फ़ैसलों में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता।

केंद्र के फ़ैसले का समर्थन करते हुए, वरिष्ठ भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि जिन लोगों को इस पर आपत्ति है, वे कोर्ट में जा सकते हैं और इसे चुनौती दे सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि जब यूपीए सत्ता में थी, तब कुछ राजनेताओं का सुरक्षा घेरा डाउनग्रेड कर दिया गया था।

राज्यसभा सांसद ने यह भी कहा कि लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (LTTE) द्वारा राजीव गाँधी की हत्या के बाद परिवार को ख़तरा पैदा हो गया था। लेकिन, अब लिट्टे ख़त्म हो गया है और पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए लोगों के प्रति, सोनिया गाँधी और परिवार के अन्य सदस्यों का रवैया भी बदल गया है।

बता दें कि इससे पहले भी अधिवक्ता उमेश बोहरे ने कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसका संबंध लोकसभा चुनाव 2019 में इलेक्ट्रॉनिक वोटर मशीन (EVM) मशीन को लेकर था। इसमें उन्होंने EVM मशीन को लेकर कई सवाल खड़े किए थे, तब भी उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि उमेश बोहरे जैसे अधिवक्ता के पास बेवजह के मुद्दे उठाने की आदत है, फिर भले ही उनकी बेबुनियादी याचिकाओं के लिए उन्हें कोर्ट से फ़टकार ही क्यों न लगे।

29 बंदूक, 2 राइफल, 1 रिवॉल्वर और 519 कारतूस के साथ कॉन्ग्रेस नेता अरेस्ट, टीपू सुल्तान भी गैंग में शामिल

बिहार के मुंगेर ज़िले के क़ासिम बाज़ार थाना अंतर्गत मशसपुर मुहल्ला स्थित एक गोदाम से पुलिस ने बुधवार (20 नवंबर) को 29 दोनाली बंदूक, दो राइफल, वेबलीस्कॉट का एक रिवॉल्वर और 519 कारतूस बरामद किए हैं। इसके अलावा भारी मात्रा में हथियार के उपकरण और सामान ज़ब्त किया गया है। इस सिलसिले में हथियार तस्करों को भी गिरफ़्तार किया गया। इनमें युवा कॉन्ग्रेस के मुंगेर विधानसभा अध्यक्ष यतीन्द्रनाथ सिंह भवानी कुमार, टीपू सुल्तान, आर्म्स डीलर मनोज शर्मा समेत चार तस्करों को गिरफ़्तार किया गया है।

भारी मात्रा में हथियार के उपकरण और सामान ज़ब्त (तस्वीर साभार: दैनिक दागरण)

ख़बर के अनुसार, पुलिस उपमहानिरीक्षक मनु महाराज ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में हथियार और कारतूस के साथ अपराधियों को गिरफ़्तार किया गया था। इसी के मद्देनज़र पुलिस लगातार हथियार तस्करों की तलाश में जुटी हुई थी। इसी कड़ी में कासिम बाज़ार थाना क्षेत्र के मकससपुर निवासी रविन्द्र शर्मा के पुत्र मनोज शर्मा के घर पर छापे मारी की गई, जहाँ अवैध हथियारों का जखीरा बरामद किया गया है। इसमें 29 दोनाली बंदूक, दो राइफ़ल, वेबलीस्काट का एक रिवॉल्वर, 519 कारतूस और हथियार बनाने के अन्य उपकरण बरामद किए गए और चारों तस्करों को गिरफ़्तार किया गया।

उन्होंने बताया कि मनोज शर्मा मुंगेर बंदूक फ़ैक्ट्री का निर्माता था और एक साल पहले उसका लाइसेंस रद्द हो गया था। इसके बावजूद वो अपने घर में न सिर्फ़ अवैध रूप से बंदूक रखे हुआ था बल्कि उनकी बिक्री भी कर रहा था। पुलिस उपमहानिरीक्षक ने बताया कि 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र अपराधियों व नक्सलियों से सांठगांठ कर हथियार सप्लाई करने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि गिरफ़्तार किए गए आरोपितों ने पूछताछ के दौरान अपना जुर्म क़बूल करते हुए इस अवैध धंधे में काफी समय से संलग्न रहने की बात स्वीकार की है। उन्होंने कहा कि ये लोग माँग के अनुसार अपराधियों एवं नक्सलियों को हथियार की सप्लाई करते हैं। उन्हें एक हथियार की कीमत 50 हज़ार रुपए से एक लाख रुपए तक मिलती थी और वे दो से तीन गुणा दाम पर कारतूस बेचते थे। वे बरामद वेबलीस्कॉट रिवॉल्वर को पाँच लाख रुपए में नक्सलियों से सौदा करने जा रहे थे।

एक गोदाम से पुलिस ने हथियारों का जखीरा बरामद किया(तस्वीर साभार: दैनिक दागरण)

इसके अलावा, पुलिस आरोपितों की निशानदेही पर लगातार छापेमारी कर रही है। पुलिस उपमहानिरीक्षक मनु महाराज की विशेष टीम द्वारा जिन आरोपितों की गिरफ़्तारी की गई है, उनमें मुफ़स्सिल थाना क्षेत्र के मुबारचक निवासी मोहम्मद कमरुद्दीन का बेटा टीपू सुल्तान उर्फ़ मोहम्मद शबीर हसन, क़ासिम बाज़ार थाना क्षेत्र के मकससपुर चुआबाग निवसी अनिल मंडल का पुत्र किशन कुमार, मकससपुर निवासी रविंद्र शर्मा का पुत्र मनोज शर्मा एवं वासुदेवपुर ओपी क्षेत्र के दलहट्टा निवासी सह युवा कॉन्ग्रेस के मुंगेर विधानसभा अध्यक्ष यतींद्रनाथ उर्फ़ भवानी कुमार शामिल है।

ख़बर के अनुसार, पिछले साल मुंगेर में AK-47 का जखीरा बरामद किया गया था। उस समय रेलवे स्टेशन से लेकर गाँव तक AK-47 राफ़ल्स बरामद हुई थी। इसके अलावा, एक कुएँ से भी प्रतिबंधित राइफल AK-47 के कल-पुर्ज़े मिले थे।

350 को बुलाया, आए सिर्फ 40… बहुत नाइंसाफी: प्रियंका गाँधी के ‘स्टाइल’ से परेशान UP के कॉन्ग्रेसी नेता?

उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस पार्टी को दोबारा से खड़ा करने का प्लान बनाने वाली पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी इन दिनों अपनी ही पार्टी के पुराने नेताओं का विरोध झेल रही हैं। दरअसल, हाल ही में एक बैठक के लिए प्रियंका गाँधी की ओर से पार्टी के 350 पूर्व सांसद, विधायक, एमएलसी, 2019 के लोकसभा उम्मीदवार और 2017 के विधानसभा उम्मीदवारों को बुलावा भेजा गया था। लेकिन इंदिरा गाँधी की छवि वाली प्रियंका के बुलावे के बावजूद आए कितने? सिर्फ 40! मतलब 350 में से सिर्फ 40… बहुत नाइंसाफी हो गया ये तो!

कहाँ तो प्रियंका गाँधी को भारतीय राजनीति की दूसरी इंदिरा कह कर प्रोजेक्ट किया जा रहा था, और कहाँ वो कार्यकर्ता तो छोड़िए, कॉन्ग्रेस के नाम पर टिकट मिल चुके, जीत चुके नेताओं का नेता बनने तक का क्षमता प्रदर्शन करने में चूक रही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की शैलवी शारदा की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के पुराने कॉन्ग्रेसी नेताओं ने पिछले 15 दिनों में दो बैठकें की हैं। यह बैठकें इसलिए हुईं क्योंकि इन नेताओं को लगता है कि UPCC (उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी) से इन्हें दरकिनार कर दिया गया है। साथ ही पार्टी के इन पुराने निष्ठावान नेताओं पर नए नेतृत्व (प्रियंका गाँधी और उनके आस-पास के नेता) अपनी मर्जी की चीजें थोप देते हैं।

इस संबंध में पहली मीटिंग नवंबर के पहले हफ्ते में पार्टी नेता सिराज मेहंदी के आवास पर हुई। मेहंदी ने अक्टूबर में सोनिया गाँधी को यह कहकर अपना इस्तीफा दिया था कि नई टीम में एक भी शिया नहीं है। दूसरी मीटिंग पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की जयंती पर आयोजित की गई। इस मीटिंग में तो हद हो गई थी। एक नेता ने प्रियंका वाड्रा की ओर इशारा करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि कॉन्ग्रेस कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं है।

अब ताजा जानकारी के मुताबिक इस संबंध में तीसरी बैठक भी जल्दी ही पूर्व विधायक रंजन सिंह सोलंकी के निवास स्थान नोएडा में होने वाली है। अनुमान लगाया जा रहा है कि सोनिया गाँधी से मिलने के लिए प्रतिनिधि मंडल का चुनाव इसी मीटिंग में किया जाना है।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस महासचिव को अपनी नीतियों के कारण अपने पार्टी नेताओं का प्रत्यक्ष विरोध झेलना पड़ रहा है। वहीं, वे पार्टी में पड़ी फूट को सुलझाने की बजाए सत्ताधारी पार्टी पर हमला बोलने में जुटी हुई हैं। अभी बीते दिनों उन्नाव के किसान की एक वायरल वीडियो को शेयर कर प्रियंका ने केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास किया था। उन्होंने वीडियो में नजर आ रहे किसान को ‘अधमरा’ बताया था, लेकिन उन्नाव पुलिस द्वारा पूरी वीडियो शेयर करने के बाद पता चला था कि वो किसान अधमरा नहीं था बल्कि अपनी जिद में वहीं पड़ा था और पुलिस के हटाने के बावजूद भी नहीं हट रहा था।

NRC का असर: बंगाल से वापस बांग्लादेश लौटने लगे घुसपैठिए, कन्हैया सहित वामपंथी नेताओं ने सरकार को कोसा

भारत-बांग्लादेश की सीमा से सटे इलाकों में एनआरसी का असर साफ़ दिखाने लगा है। सरकार ने जब से एनआरसी को लेकर अपनी नीति स्पष्ट की है। तब से ही देश में बाहर से आकर अवैध रूपसे बसने वालों के बीच खलबली मच गई है।

अख़बार में छपी एक खबर के मुताबिक जो लोग कभी सीमा पर तैनात सुरक्षाबालों की निगरानी से बचते-बचाते भारत में घुस आए थे आज वे सभी वापस सीमा पर जाने लगे हैं। यही कारण है कि बंगाल के सीमावर्ती गाँवों में एकदम सन्नाटा पसर गया है। बता दें कि बांग्लादेश से आए यह लोग चाय-पत्ती तोड़ने से लेकर रुई धुनने और घर बनाने का काम किया करते थे।

एनआरसी के बाद अवैध शरणार्थियों के गाँव को छोड़कर चले जाने के बाद स्थानीय विधायक ने इसपर राजनीति शुरू कर दी। इस सम्बन्ध स्थानीय विधायक अली इमरान ने एक सभा बुलाई थी। इस सभा में वामपंथी नेता कन्हैया कुमार भी शामिल हुए थे। सभी ने एक सुर में एनआरसी और बीजेपी सरकार को खूब कोसा।

दरअसल बीएसएफ का कोकरौदा कैम्प बंगलादेश सीमा के बेहद नज़दीक है। इसके करीब दर्जनों ऐसे गाँव हैं जो एनआरसी के फैसले के बाद सूने हो गए हैं। पास के ही एक गाँव पंडितपारा के रहने वाले मोहम्मद शमशाद आलम ने बताया कि अधिकतर गाँव पूरी तरह से खाली हो गए हैं। इन गाँव में रहने वाले लोग अब सीमा पार करके वापस जाने लगे हैं।