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नल में आता है नाले का पानी, दिल्ली निवासी ने सबूतों के साथ खोली केजरीवाल के दावों की पोल

दिल्ली शहर आजकल प्रदूषण का ऐसा पर्याय बन चुका है जिसमें कि साफ़ हवा और साफ़ पानी दोनों ही मिलना आज के समय में नसीब होना हद से ज्यादा कठिन हो गया है। हाल ही में एक जाँच रिपोर्ट में सामने आया था कि राजधानी का पानी देश में सबसे गन्दा पानी है।

इस जाँच में 21 शहरों के पानी के सैम्पल लिए गए थे। इसमें राजधानी दिल्ली का भी सैंपल शामिल था जहाँ से करीब 11 सैम्पल उठाए गए थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के जिन इलाकों से सैम्पल लिए गए, उनमें लुटियंस ज़ोन से लेकर पीतमपुरा, बुराड़ी, अशोक नगर, सोनिया विहार और नन्दनगरी जैसे इलाके शामिल हैं।

साल 2015 में केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री की शपथ लेने के साथ ही दिल्ली में पानी को लेकर बड़े बदलाव करने की बात कही थी मगर इसका कोई असर धरातल पर दिखाई नहीं पड़ता। यह हाल तब है जब केजरीवाल खुद जल बोर्ड के अध्यक्ष हैं। दिल्ली में साफ़ पानी को लेकर हालात इस कदर बुरे हैं कि घर के नलों में भी नालों और सीवर का पानी आ जाता है। एक ट्विटर यूजर ने इस मसले पर अपनी लिखकर बताया कि कैसे दिल्ली के घरों में नल से साफ़ पानी की बजाय नालों और सीवर का गन्दा पानी आता है। @proudkannadiga नामक ट्विटर हैंडल के इस शख्स ने इस मामले में काफी तथ्य भी सामने रखे।

यह एक ऐसी समस्या है जिसे सुनकर कोई भी इंसान अचरज में पड़ जाए। इसे झेलने वाले यूज़र ने अपने खुद के अनुभव से बताया कि कैसे नाले और सीवर का यह पानी घरों में पानी पहुँचाने वाले पाइप के ज़रिए टंकी तक में भर जाता है। यह पानी एकदम गन्दा, दुर्गन्ध वाला और काला होता है। इसके लिए टंकी साफ़ करने से लेकर सारे उपाय करने पड़ते।

यह एक ऐसी समस्या है जिसे सुनकर कोई भी इंसान अचरज में पड़ जाए। इसे झेलने वाले यूज़र ने अपने खुदके अनुभव से बताया कि कैसे नाले और सीवर का यह पानी घरों में पानी पहुँचाने वाले पाइप के ज़रिए टंकी तक में भर जाता है। यह पानी एकदम गन्दा, दुर्गन्ध वाला और काला होता है। इसके लिए टंकी साफ़ करने से लेकर सारे उपाय करने पड़ते। अपने एक ट्वीट में उन्होंने लिखा कि यह ज़रूरी नहीं कि दुर्गन्ध न आए तो पानी साफ़ ही आ रहा हो। क्योंकि जिस पाइप के ज़रिये पानी घरों में आता है वह खुद सीवर के जर्जर हो चुके पाइप के साथ समनान्तर हैं। कई-कई जगहों पर तो पानी के यह पाइप खुद सीवर के जल-जमाव से होकर आते हैं।

अधिकतर पाइप जिनसे सीवर और पानी अपने-अपने गंतव्य के लिए भेजे जाते हैं, वह पुराने हैं और सही रखरखाव न होने के चलते लीक कर जाते हैं। इसके बाद ही सप्लाई वाले पाइप में भी सीवर और नाले के जल-जमाव का पानी खिंच कर घरों में चला जाता है।

दरअसल मोटर चलने के बाद सक्शन के चलते पानी पाइप में खिंचकर घरों में आता है। मगर इस दौरान अगर सप्लाई वाला पाइप सीवर के दलदल या नाले या किसी अन्य तरह के जल जमाव के करीब से होकर गुज़रता है तो वह गन्दा पानी उस जर्जर पाइपलाइन के ज़रिये खुद-ब-खुद घर के नलों तक खिंचा चला आता है।

सोशल मीडिया पर अपना अनुभव शेयर करते हुए इस यूजर ने बताया कि कई बार बुलाने के बाद जाकर किसी तरह दिल्ली जल बोर्ड से एक कर्मचारी उसके घर पहुँचा। नलों में सीवर के पानी की बात पर खोजबीन शुरू हुई तो पता चला कि पास मे ही सीवर की एक पाइपलाइन फट गई, जिसके चलते लीकेज हुआ और इस जल-जमाव से आती घरों में पानी पहुँचाने वाली पाइपलाइन में सीवर का पानी भी आ गया।

उसने बताया कि कैसे अस्थायी जुगाड़ के तौर पर उस कर्मचारी ने सीवर पाइप का एक 2 से 3 फीट का हिस्सा काटकर बदल दिया। जब कर्मचारी से पूछा गया कि इस समस्या का उपाय क्या है तो उसने बताया कि सीवर के 400 मीटर लम्बे पाइप को बदले बगैर यह समस्या नहीं सुधरेगी, मगर इलाके के सीवर को ढोने वाली 40 इंच डायमीटर वाली मुख्य पाइपलाइन को तबतक नहीं बदला जा सकता जब तक कि ऊपर से (यानी जल बोर्ड से) इस सम्बन्ध में फण्ड नहीं दिया जाता।

अपनी समस्या को लेकर विस्तार से लिखने के बाद गंदे पानी की इस समस्या से पीड़ित यूजर ने अपनी शिकायत में कॉन्ग्रेस को जमकर कोसा और कहा कि इस पार्टी ने कभी जनता की लड़ाई में साथ ही नहीं दिया। उन्होंने यह भी कहा कि टैक्स देने वाले इंसान के साथ यह एक बहुत बड़ा छलावा है।

अपने एक अन्य ट्वीट में उस यूजर ने यह भी लिखा कि वह खुद 15 साल से दिल्ली में रह रहते आ रहे हैं। 2018 में पश्चिमी दिल्ली में शिफ्ट हुए हैं मगर गंदे पानी की ऐसी समस्या उन्होंने 2015 से पहले कभी नहीं देखी थी।

…जब OpIndia की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में रखी गई और झूठ का किया गया पर्दाफाश

सुप्रीम कोर्ट, अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और जम्मू-कश्मीर के दो संघ शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजन के बाद कश्मीर में तथाकथित संचार शट डाउन से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रहा है। इसी दौरान एक दिलचस्प वाकया हुआ। सुनवाई के दौरान, IndiaSpend के झूठ का पर्दाफ़ाश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया।

सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उन आरोपों के मुद्दे को उठाया कि कश्मीर के लोग राज्य में स्वास्थ्य सेवा तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।

तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सरकार की एक योजना (आयुष्मान भारत) है, इसमें स्वास्थ्य सुविधा का लाभ कैशलेस भी उठाया जा सकता है। इस योजना के तहत इस साल 5 अगस्त से कुल 11468 मामले दर्ज किए गए हैं।

इसके अलावा, तुषार मेहता ने एक IndiaSpend की एक रिपोर्ट की बात की, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कश्मीर में कई लोग स्वास्थ्य सेवा तक नहीं पहुँच पा रहे। इसके बाद तुषार मेहता ने ऑपइंडिया रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें IndiaSpend द्वारा फैलाए जा रहे झूठ का पर्दाफ़ाश किया गया।

दरअसल, सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में जिस रिपोर्ट का ज़िक्र किया, वो एक लेख था। उस लेख में अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद IndiaSpend और द वायर द्वारा फैलाए गए झूठे दावों का कच्चा-चिट्ठा था। लेख में, IndiaSpend ने आँकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और यह दावा किया कि अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद कश्मीर में स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं।

“रोगी अनिच्छुक, स्वास्थ्य सेवा तक पहुँचने में असमर्थ” इस सब-हेडिंग के साथ, द वायर ने फ़ेक न्यूज़ IndiaSpend का यह कहते हुए उल्लेख किया कि जम्मू-कश्मीर में मरीज 5 अगस्त 2019 से स्वास्थ्य सेवा तक नहीं पहुँच पाए हैं, जिससे यह धारणा बनाई जा सके कि कश्मीर के लोग मानसिक समस्याओं का सामना कर रहे हों। ताज्जुब इस बात पर होता है कि वे इसी सब-हेडिंग में यह भी बताते हैं, “यहाँ तक कि एक सामान्य स्थिति में, कुछ लोग विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँचते हैं।” लिहाज़ा यह बड़ा अटपटा सा लगता है कि इस मामले में, द वायर और IndiaSpend ने इसे अनुच्छेद-370 के उन्मूलन से कैसे जोड़ दिया, यह अभी तक समझ से परे है।

लेख में कहा गया है कि अगस्त में अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद, जुलाई की तुलना में 44.5% कम रोगियों ने IMHANS का दौरा किया। हालाँकि, वे यह भी कहते हैं कि यह डेटा अनिर्णायक है क्योंकि रोगियों की संख्या मई में भी कम थी। वहीं, दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर में रिपोर्ट किए गए सबसे अधिक मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों को अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के एक महीने पहले जुलाई में था। सबसे कम मई में था।

पूरे लेख ने अनिवार्य रूप से पाठकों को यह बताने के लिए भ्रमित करने की कोशिश की गई थी कि सबसे पहले, मरीज स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँचने में असमर्थ हैं और दूसरी बात यह है कि इसके कारण, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद बढ़ रहे हैं। ऑपइंडिया ने अपने लेख के माध्यम से इन दोनों ही दावों की पोल खोल कर रख दी थी।

IndiaSpend फ़र्ज़ी ख़बरे प्रचारित-प्रसारित करने का आदी है। फ़िलहाल, अब यह अपनी फर्ज़ी ख़बरों की दुकान बंद कर चुका है। अपने बड़े एजेंडे और संदिग्ध ट्रैक रिकॉर्ड के साथ, IndiaSpend, Factchecker.in ने चुनिंदा रिपोर्टिंग द्वारा हिंदूफोबिक प्रचार को आगे बढ़ाने का प्रयास किया था। इसके लिए वे ऐसे अपराध चुनते थे, जिसमें अभियुक्त कथित रूप से हिन्दू थे और इसे ‘घृणित अपराध’ के रूप में संदर्भित किया जाता था। जबकि उन अपराधों को जानबूझकर अनदेखा किया गया था, जिसमें अपराधी समुदाय विशेष के होते थे और पीड़ित पक्ष के तौर पर हिन्दू होते थे।

Factchecker.in की ‘हेट क्राइम वॉच’ पहल, देश भर में घृणित अपराधों के एक कथित ट्रैकिंग टूल के रूप में शुरू हुई थी। इसके बाद जल्द ही इसने न केवल हिन्दूफोबिक सामग्री को अपनी रिपोर्टिंग को सीमित करके, बल्कि मजहब विशेष द्वारा किए गए अपराधों को भी पाक-साफ़ करने और हिन्दुओं के ख़िलाफ़ अपने असली रंग को उजागर करना शुरू कर दिया। एक बार तो IndiaSpend के ‘फैक्टचैकर’ पत्रकार को बेगूसराय की एक नाबालिग दलित पीड़िता से छेड़छाड़ करने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया था।

फैक्टचैकर ने भारत के कुछ हिस्सों में कश्मीरियों पर कथित हमलों के साथ आतंकवादी हमले की तुलना पुलवामा आतंकी हमले से की। उसने दावा किया कि उन्होंने ऐसे हमलों को ‘घृणित अपराध’ के रूप में शामिल नहीं किया है क्योंकि यह धार्मिक पहचान के मानदंडों से प्रेरित नहीं है, क्योंकि इस तरह के हमले धार्मिक पहचान से नहीं बल्कि पीड़ितों की क्षेत्रीय पहचान से प्रेरित दिखाई देते हैं।

नोट: कार्यवाही की पूरी जानकारी का इंतज़ार है और नई जानकारी सामने आने पर यह ख़बर अपडेट की जाएगी।

हरेन पांड्या मर्डर: SC ने ख़ारिज की 10 कट्टरपंथी इस्लामी की पुनर्विचार याचिका, सभी ने ली थी ISI से ट्रेनिंग

गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की मार्च 2003 में उनकी हत्या के लिए 10 लोगों को दोषी ठहराए जाने के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिकाओं को ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज (21 नवंबर) अपना फ़ैसला सुनाया।

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस विनीत सरन की पीठ ने पाँच जुलाई के अपने फ़ैसले के ख़िलाफ़ 12 में से 10 दोषियों की पुनर्विचार याचिकाएँ निरस्त कर दी। पीठ ने अपने फ़ैसले में कहा, “हमने पुनर्विचार याचिकाओं को देखा और हम मानते हैं कि जिस आदेश की समीक्षा की अपील की गई थी, उसमें किसी तरह की ग़लती नहीं है जिसके लिए पुनर्विचार किया जाए। इसलिए पुनर्विचार याचिका ख़ारिज की जाती है।”

दरअसल, वर्ष 2003 के हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए आरोपितों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी। गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2003 के हरेन पांड्या हत्याकांड के सभी 12 आरोपितों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया था। गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार के समय तत्कालीन गृह मंत्री हरेन पांड्या की 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद के लॉ गार्डन इलाके में उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वे सुबह की सैर कर रहे थे। इस हत्या का आरोप 12 लोगों पर था।

हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई में कहा था कि सीबीआई की जाँच की दिशा स्पष्ट नहीं है। इसके अलावा यह भी कहा था कि जाँच के दौरान कुछ तथ्यों की अनदेखी की गई और बहुत कुछ छूट गया। हाईकोर्ट में मामला जाने से पहले सेशन कोर्ट ने आरोपितों को हत्या करने और आपराधिक साज़िश रचने का दोषी माना था।

ग़ौरतलब है कि हरेन पांड्या की हत्या उस वक्त हुई थी गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार थी। उस समय आतंकवाद निरोधक क़ानून के तहत विशेष पोटा कोर्ट ने सभी आरोपितों को दोषी ठहराते हुए उम्र क़ैद की सजा सुनाई थी। आरोपितों ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 

वर्ष 2011 में 29 अगस्त को गुजरात हाईकोर्ट ने सत्र अदालत के फ़ैसले को पलट दिया और सभी आरोपितों को बरी कर दिया। हाईकोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई ने 2012 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।

जानकारी के अनुसार, इस मर्डर केस में दोषी करार दिए गए 12 आरोपितों में से 10 ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। इन 12 दोषियों में मोहम्मद रउफ़, कयूम शेख, परवेज़ ख़ान पठान उर्फ़ अतहर परवेज़, मोहम्मद परवेज़ अब्दुल, मोहम्मद फ़ारूक, शाहनवाज़ गाँधी, मोहम्मद सैफ़ुद्दीन, मोहम्मद यूनुस सरेसवाला, कलीम अहमदा, रेहान पुथवाला, अनीज़ माचिस वाला, मोहम्मद रियाज़ सरेसवाला शामिल हैं। CBI ने आरोप लगाया था कि ये सारे दोषी पाकिस्तान के ISI द्वारा ट्रेनिंग लेकर आए थे।

Pak में दूध, अंडे, मुर्गी, भैंस-बकरी से आएगा इंकलाब: आर्थिक परेशानियों का इमरान खान ने दिए 5 समाधान

पाकिस्तान को ‘नया पाकिस्तान’ बनाने का सपना दिखाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने वाले इमरान खान इन दिनों अपने ही बयानों के कारण पूरे विश्व में हँसी का पात्र बने हुए हैं। उनके अपने मुल्क में ही लोग उनकी आभासी नीतियों का खुलकर विरोध कर रहे हैं।

इसी कड़ी में आज वहाँ की जानी-मानी पत्रकार नायला इनायत ने भी इमरान खान के लिए कुछ ट्वीट किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा है कि भैंस से लेकर बकरी तक इमरान खान के पास पाकिस्तान की हर आर्थिक परेशानी का बहुत साधारण सा हल है। नायला का ये ट्वीट इमरान खान के उस बयान को इंगित करते हुए आया है, जिसमें उन्होंने कहा था- “अगर हम एक गाय से 12 लीटर दूध निकाल पाए तो हम पाकिस्तान में इंकलाब ला सकते हैं।”

इस ट्वीट के साथ उन्होंने ‘द प्रिंट’ पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट भी ट्वीट की हैं। जिसमें उन्होंने इमरान खान द्वारा दिए 5 समाधानों यानी दूध, अंडा, मुर्गा, भैंस-बकरी, नीलामी और गैस-तेल की खोज को नए पाकिस्तान के लिए 5 स्तंभ बताया है। और इनसे जुड़े इमरान खान के बयानों का जिक्र करते हुए उनकी ख़िल्ली उड़ाई हैं। इनमें से गाय के दूध, और अंडे पर दिए बयान सबसे हास्यास्पद हैं। जिनपर नायला ने तंज कसा है।

नायला के मुताबिक इमरान खान ने उनके मुल्क की आवाम से कहा था, “एक गाय औसतन 6 लीटर दूध देती हैं और हम अगर इसे दुगना कर दें। यानी हम अगर एक गाय से 12 लीटर निकालना शुरू कर दें तो पाकिस्तान की आर्थिक क्रांति आ जाएगी।”

इसके बाद अंडों से नए पाकिस्तान का निर्मित करने का आइडिया भी इमरान खान पाकिस्तान की आवाम को दे चुके हैं। जिसमें उन्होंने सुझाया था कि ग्रामीण महिलाओं को अंडे और देशी मुर्गियाँ मुहैया कराई जाएँ और फिर उन्हें प्रोटीन का इंजेक्शन लगाकर वे उनसे प्राप्त उत्पाद (अंडे) को बाजार में बेचकर पैसे कमाएँ।

गौरतलब है कि इसके अलावा नायला ने अपने आर्टिकल में इमरान खान द्वारा नवाज शरीफ की 8 गायों की नीलामी का भी जिक्र किया है, जिसे उन्होंने 23 लाख में बेच दिया था और ही 61 कारों का भी। उन्होंने बताया है कि कैसे इमरान खान उन लोगों को बताते हैं कि नए पाकिस्तान की पहचान इनोवेटिव आइडिया से होगा और फिर भैंस-बकरी पर अपने बयान भी देते हैं। वो कहते हैं कि पाकिस्तान की हर परेशानी का हल हो जाएगा अगर पाकिस्तान हर तेल और गैस की खोज करे । जिसके लिए वे उम्मीद भी देते हैं कि पाकिस्तान अरेबियन समुद्र में सभी गैसों को खोजेंगा, जिससे आने वाले 50 सालों के लिए मुल्क की हर परेशानी का समाधान हो जाएगा।

सनातन हिन्दू धर्म को ईसाई या इस्लामी चश्मे से देखना अनुचित: नितिन श्रीधर की ऑपइंडिया से बात

लेखक, indiafacts.org और अद्वैत एकेडमी के सम्पादक व धर्मशास्त्रों के जाने-माने टिप्पणीकार नितिन श्रीधर ने ऑपइंडिया से हाल ही में बात की। इस बातचीत में उन्होंने धर्म से जुड़े कई पक्षों पर बात की, जिसमें राजनीति, लोकतंत्र के बारे में दृष्टिकोण, हाल ही में आए सबरीमाला और राम मंदिर के फैसले, धर्म की व्यवहारिक परिभाषा आदि शामिल थे। पेश है इस साक्षात्कार के मुख्य हिस्सों का सारांश:

धारयति इति धर्मः

धर्म की परिभाषा पर नितिन का कहना है कि इसकी न ही कोई एक लकीर के फकीर वाली परिभाषा है, और न ही संस्कृत के अलावा किसी और भाषा में इसका सटीक अनुवाद हो सकता है या समानार्थी शब्द मिल सकता है। उनके अनुसार ‘धारयति इति धर्मः’ यानि ‘वह, जो पूरी दुनिया को ही धारण करता है’ यही धर्म की परिभाषा है। साथ ही कुछ हिन्दू धर्मशास्त्रों में यह कहा गया है कि धर्म वह है जो सबको ‘अभ्युदय’ (आध्यात्मिक वृद्धि) और ‘निःश्रेयस’ (भौतिक सुख) देता है।

इतने गूढ़ दर्शन से इसे आम जीवन के यथार्थ में लाएँ तो मोटा-मोटी समझ सकते हैं (हालाँकि यह कोई अंतिम, अकाट्य परिभाषा नहीं है) कि धर्म वह है जो अव्यवस्था कम करे, प्राकृतिक/नैसर्गिक व्यवस्था को स्थिरता दे और सबके लिए लाभकारी हो। और जो अव्यवस्था फैलाए, कृत्रिमता बढ़ाए और नुकसानदेह हो, उसे आम तौर पर अधर्म मान सकते हैं।

नितिन ने धर्म को कर्म ले सिद्धांत पर आधारित भी बताया। साथ ही एक महत्वपूर्ण बात पर ज़ोर दिया कि ऐसा नहीं धर्म के सिद्धांत में सभी कुछ जबरिया सबके लिए करना ज़रूरी है (जो कि अब्राहमी पंथों, विशेषतः ईसाईयत और इस्लाम, से काफ़ी अलग है)। ऐसी चीज़ों में वह यज्ञ-हवन आदि का उदाहरण देते हैं- इन्हें करने के अलग-अलग फायदे अलग-अलग शास्त्रों में हैं, लेकिन किसी के गले में हाथ डालकर इन्हें करना ज़रूरी भी नहीं कहा गया है। जिसे इन्हें करने से वर्णित लाभ चाहिए, वह कर सकता है, जिसे नहीं चाहिए, वह न करे।

हिन्दू धर्म संदर्भ के हिसाब से कितना उदार और लचीला है, इसके उदाहरण में नितिन बताते हैं कि एक तरफ़ “सत्यं वद्, प्रियं वद्” हमारे यहाँ सिखाया जाता है, वहीं दूसरी ओर इस एक छड़ी से सबको नहीं हाँका जा सकता। इसके अपवाद का उदाहरण वे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर काम कर रहे लोगों का देते हैं, जिनके लिए झूठ के बीच जीना ही उनका ‘विशेष धर्म’ होगा, और वे अगर गला फाड़ कर हर चीज़ का सच हर जगह गाने लगेंगे तो यह अधर्म होगा। (किसी को यह चीज़ नए-नए जनेऊधारी ब्राह्मण बने राहुल गाँधी और कोट के ऊपर जनेऊ पहन रही कॉन्ग्रेस को भी बतानी चाहिए थी।)

व्यक्तिवादी हिंदुत्व/हिन्दू धर्म भी है- लेकिन…

नितिन का कहना है कि आज के समय में हिंदुत्व/हिन्दू धर्म और धार्मिक समाज के बारे में कही जाने वाली यह बात कि हिन्दू व्यक्तिवादी नहीं हैं, परिवार-समाज आदि का महत्वपूर्ण स्थान होता है धर्म के निर्धारण में- यह सब आधा सच हैं। हिन्दू धर्म में व्यक्ति का, इंडिविजुअल का बहुत महत्व है- अंतर यह है कि आधुनिक व्यक्तिवाद जहाँ हर समय केवल हक माँगने व खुद को बेचारा और पीड़ित दिखाने पर आधारित है, वहीं धार्मिक रूपरेखा में व्यक्ति, इंडिविजुअल अपने कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों के निर्वहन को प्राथमिक मानता है।

सामान्य, सनातन, स्व-धर्म

‘सनातन धर्म’ के बारे में नितिन का कहना है कि यह धर्म का पूरे ब्रह्माण्ड को ही ‘धारण’ करने वाला, व्यवस्थित करने वाला पहलू है। व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो आम इंसान के लिए, आम हिन्दू के लिए जिस ‘धर्म’ की बात होती है, वह भी सनातन धर्म का एक पक्ष है, उससे अलग नहीं है- लेकिन पूरी तरह से, केवल उसी को ही सनातन धर्म भी नहीं कह सकते।

व्यवाहरिक धर्म के दो हिस्से नितिन बताते हैं- सामान्य धर्म और विशेष धर्म। वे बताते हैं कि सामान्य धर्म (जोकि नितिन की इसी विषय पर लिखी और हाल ही में प्रकाशित किताब का नाम भी है) में वे चीज़ें आतीं हैं जिनकी अपेक्षा हर इंसान से की जा सकती है। नितिन की किताब के कवर पर धर्म को एक बैल के रूप में दिखाया गया है जिसके चार पैर सामान्य धर्म के चार सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं- सत्य, दया, तपस् (सामान्य भाषा में हम इसे अपने कार्य में परिश्रम समझ सकते हैं) और शौच (योग्यता, न कि साफ़-सफ़ाई; स्वच्छता शौच-अशौच का एक अंग है, पूरी परिभाषा नहीं)। सामान्य धर्म के बारे में नितिन एक दिलचस्प बात यह भी बताते हैं कि यदि वे इच्छुक हों तो इसका पालन मुस्लिम और ईसाई भी कर सकते हैं बिना अपनी आस्था के खिलाफ गए।

विशेष धर्म, नितिन श्रीधर के मुताबिक, व्यक्ति की पहचान, कार्य और स्थिति (देश, समय आदि) पर निर्भर करता है। विशेष धर्म के एक उदाहरण का उल्लेख ऊपर हमने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े लोगों के संदर्भ में किया है। एक दूसरे उदाहरण में मान लीजिए एक कसाई है तो वैसे तो उसका धर्म अपने सामने रखे पशु की हत्या करना ही होगा। लेकिन अगर वह जानवर बीमार है, या आस-पास स्वाइन फ्लू फैला है और पशु की डॉक्टरी जाँच नहीं हुई है, तो उसके लिए धार्मिक कार्य पशु की हत्या न करना होगा।

विशेष धर्म के निर्धारण में व्यक्ति के वर्ण (जिसका संबंध स्वभाव से अधिक होता है, न कि केवल जाति या परिवार से निर्धारित) और आश्रम (जीवन की किस स्थिति या किस पड़ाव पर आप हैं- विद्यार्थी, युवा गृहस्थ, वृद्ध गृहस्थ या फिर जीवन के अंतिम वर्षों में) की अहम भूमिका होती है।

हर व्यक्ति से अपेक्षित सामान्य धर्म और हर व्यक्ति के लिए विशिष्ट और समय के साथ परिवर्तनशील विशेष धर्म को मिलाकर बनता है स्वधर्म, जिसके बारे में श्री कृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं, “स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मो भयावहः”।

धर्म बनाम पंथ, “धर्म एक जीवनशैली है”

नितिन के अनुसार धर्म का अनुवाद पंथ या रिलीजियन के रूप में करना और फिर इससे निकली ‘धर्मनिर्पेक्षता’ (जिसका सीधा मतलब अ-धर्म होगा) को नीति बना लेना एक ऐतिहासिक भूल थी, जिसके मूल में हिन्दू धर्म को ‘(महज़) एक जीवनशैली’ तक सीमित कर देना और अब्राहमी पंथों के रीति-रिवाजों को ही आस्था, रिलीजियन या पंथ का एकमात्र पैमाना बना देना है। धर्म एक सीमित संदर्भ में भारतोय उद्गम वाली/हिन्दू उपासना पद्धतियों के लिए बेशक प्रयुक्त हो सकता है। वहीं ‘जीवनशैली’ के तर्क को वह इस आधार पर ख़ारिज करते हैं कि हिन्दुओं में ही नहीं, मुस्लिमों और ईसाईयों में भी खुद की एक ‘जीवनशैली’ होती है- इसलिए ‘जीवनशैली’ का तमगा खुद को देकर हिन्दुओं को आत्ममुग्ध नहीं हो जाना चाहिए।

नितिन आगे यह भी जोड़ते हैं कि जब एक ओर अब्राहमी पंथ इस्लाम और ईसाईयत धड़ल्ले से मतांतरण कर रहे हैं तो ऐसी परिस्थति में ‘हम तो कोई आस्था या पंथ नहीं, रिलीजियन नहीं, केवल एक जीवन शैली हैं’ का चोगा ओढ़ कर बैठ जाना एक सभ्यता के तौर पर हमें निराश्रय और कमज़ोर छोड़ देता है। राजनीतिक रूप से, अल्पकालिक और व्यवहारिक तौर पर, हिन्दूइज़्म/हिंदुत्व/हिन्दू धर्म को एक रिलीजियन के तौर पर मान्यता दिए जाने की बेहद ज़रूरत है, भले ही दीर्घकालिक लक्ष्य इसे महज़ एक रिलीजियन से बहुत अधिक वृहद तौर पर स्थापित करने का हो।

धर्म किसी ‘विंग’ के पास गिरवी नहीं है

इस सवाल के जवाब में कि क्या धर्म केवल ‘राइट विंग’ के काम की चीज़ है, या इसमें ‘लेफ्ट विंग’ के पक्ष भी होते हैं, नितिन का कहना था कि धर्म में कोई ‘विंग’ होता ही नहीं है। धर्म अंततः व्यक्तिवादी सिद्धांत है, हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग रूप से व्याख्या होती है, न कि समूह या गुट के लिए। लेकिन समय-समय पर, परिस्थितियों के अनुरूप कभी लेफ़्ट तो कभी राइट विंग के मुद्दे एक धार्मिक शासक का धर्म बन जाते हैं- यानि अगर कोई भूखा है तो उसकी भूख मिटाना (जिसे गरीबों की हिमायत के रूप में लेफ्टविंग नीति के पालन के तौर पर देखा जा सकता है) शासक का धर्म हो सकता है (और अगर किसी समय देश पर हमला हो रहा हो तो उसके ख़िलाफ़ अपनी ताकत का भरपूर इस्तेमाल शासक का धर्म हो सकता है, जिसे ‘राइट विंग’ नीति के रूप में देखा जाएगा)।

नितिन यह भी साफ करते हैं कि हालाँकि धर्म लेफ्ट विंग (या राइट विंग भी) के उठाए मुद्दों से सहमत हो सकता है, उसकी चिंताओं से इत्तेफ़ाक़ रख सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके सुझाए समाजवादी या कम्युनिस्ट उपायों को भी धर्म की स्वीकृति मिल ही जाए। (मसलन धर्म यह तो स्वीकार कर सकता है कि गरीबों को आर्थिक सहायता दिए जाने की ज़रूरत है, लेकिन इसके लिए वह कम्युनिस्टों के अमीरों से जबरन पैसा छीनने या समाजवादियों के उच्च टैक्स दर के उपाय से भी सहमत हो जाए, यह ज़रूरी नहीं)।

बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के सवाल पर उन्होंने कहा कि धार्मिक दृष्टि से कोई एक व्यक्ति हर परिस्थिति में बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक होगा ही नहीं, अतः इस सवाल को ही धार्मिक तौर पर परिभषित व्यक्ति और परिस्थिति के संदर्भ में किया जाएगा। साथ ही, जब धर्म के लिए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की ही कोई जड़ परिभाषा नहीं है, कोई एक फॉर्मूला नहीं है, तो इसमें किसी भी एक वर्ग के प्रति दुर्भावना या पूर्वाग्रह का सवाल ही नहीं है।

इस धार्मिक सिद्धांत की वैधता और स्वीकार्यता का उदाहरण वे भारत में पारसी, यहूदी आदि दुनिया के हर हिस्से में प्रताड़ित समुदायों की आवक का देते हैं। इन सबने शरण भारत में इसी लिए ली क्योंकि इन्हें पता था कि यहाँ के शासकों का धर्म और राजधर्म उन समुदायों के लोगों की प्रताड़ना और हिंसा से रक्षा करेगा।

मंदिर सामुदायिक केंद्र नहीं, देवता का घर है

नितिन का मानना है कि अयोध्या और सबरीमाला, दोनों ही जगह विवाद की जड़ में हिन्दू धर्म को ईसाई-मुस्लिम पंथ के बराबर में खड़ा कर देना, और मंदिर को मस्जिद-चर्च जैसा ही मान लेना है। जबकि ऐसा है नहीं। मंदिर बनाने के पीछे यह आस्था होती है कि मंदिर में देवता (जोकि ‘टेक्निकली’ ईश्वर नहीं होते) को सशरीर रखा जा सकता है- मूर्ति, प्रतिमा या विग्रह को उन्हीं का, उनके ‘शरीर’ का एक अंश माना जाता है, और इसमें देवता की स्थापना की बाकायदा एक विधि होती है, जिसे ‘प्राण प्रतिष्ठा’ कहते हैं। मंदिर का दूसरा नाम ही ‘देवालय’ है- देवता का घर।

मंदिर के उलट चर्च या मस्जिद को स्पष्ट रूप से उस पंथ के लोगों के आस्था से जुड़े कार्यों के लिए इकठ्ठा होने की जगह माना गया है। इस अंतर के मूल में इन दोनों मज़हबों में ईश्वर की जो परिकल्पना है, उसका हमारे यहाँ के देवताओं से अलग होना है। एक ईश्वर की सत्ता को सर्वोपरि हमारे यहाँ भी माना गया है, लेकिन हमारे यहाँ देवता भी हैं, जो ईश्वर का विशिष्ट अंश या रूप हैं- और मंदिर उन्हीं देवताओं की उपासना उस देवता विशेष के या उनसे जुड़े विशेष संदर्भों में करने की परम्परा है।

अय्यप्पा के मामले में वह विशेष संदर्भ उनका सबरीमाला स्थित प्रतिमा विशेष में नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में स्थापित होना है, वहीं श्री राम जन्मभूमि के मामले में देवता का जन्म उसी स्थान पर हुआ माना गया था- और बाबर के उस स्थान विशेष पर मस्जिद बनाने का भी कारण उस स्थान के, उससे जुड़े देवता की महत्ता को नकारने का प्रयास ही था

सबरीमाला के बारे में विवाद के चर्चा में आने के समय से नितिन श्रीधर लम्बे समय से कहते आ रहे हैं कि यह पीरियड्स का नहीं, रजस् नामक आध्यात्मिक गुण का मुद्दा है और इसे उसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की ज़रूरत है। इस बातचीत में भी उन्होंने इसे दोहराया। उन्होंने बताया कि पीरियड्स रजस्वला उम्र की स्त्रियों में रजस् गुण की उपस्थिति का नतीजा हैं, अपने आप में उन्हें मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित किए जाने का कारण नहीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात बताई। कोई श्रद्धालु स्त्री जब अय्यप्पा स्वामी के पिछले दर्शन बहुत छोटी उम्र में (10 साल से कम) की होती है, और अपना समूचा यौवन उनसे ‘विरह’ में बिताने के बाद 50 से ऊपर की उम्र में यानि 40 साल बाद करती है तो उसे अलग ही आनंद की अनुभूति होती है। ऐसा न केवल माना जाता है बल्कि कई सारे मामलों में देखा भी गया है। सबरीमाला का मुद्दा असल में था अयप्पा स्वामी के नैष्ठिक ब्रह्मचारी होने और इस कारण रजस् गुण से ही दूर रहने का, और इसे मीडिया ने पीरियड्स का मुद्दा बनाकर हिन्दुओं और हिन्दू धर्म पर जम का कीचड़ उछाला। इसी दुष्प्रचार को तोड़ने के लिए पीरियड्स पर हिन्दू मत को विस्तार से समझते हुए नितिन ने “The Sabarimala Confusion – Menstruation Across Cultures: A Historical Perspective” नामक एक किताब भी लिखी है।

धर्म में लोकतंत्र को मान्यता है, लेकिन ‘होली काऊ’ नहीं

समकालीन राजनीति और लोकतंत्र के ऊपर धार्मिक दृष्टिकोण के बारे में नितिन का कहना है कि धर्मशास्त्रों हालाँकि लोकतंत्र की खूबियों का बखान सम्मान अवश्य किया है, लेकिन उसकी कमज़ोरियाँ पुरातन हिन्दू समाज को अधिक गंभीर लगीं। इसको समझाने के लिए वे दुनिया पहले गणतंत्रों में एक माने जाने वाले महाजनपदों का उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक इनमें एक ओर अगर यह खूबी थी कि लोकतंत्र और स्थानीय जवाबदेही के चलते उनमें स्थानीय समस्याओं का प्रभावी निवारण होता था, तो यह बड़ी खामी भी रही कि महाजनपद कभी व्यक्तिगत तौर पर या महाजनपद-समूह बनकर भी एक सशक्त राजनीतिक शक्ति बनकर नहीं उभर पाए इसी लोकतंत्र के चलते- जिसमें मतभेद सुलझाने और आम सहमति बनाने में ही सारी ऊर्जा खप जाती थी। यही नहीं, उनके अनुसार धर्मशास्त्रों में इस बात की भी आलोचना की गई है कि एक महाजनपद के खुद के अंदर भी इसी लोकतंत्र और ज़बरदस्ती की असहमति के चलते केंद्रीय सत्ता कमज़ोर रही।

उन्होंने कहा कि वे वर्तमान लोकतंत्र का सम्मान अवश्य करते हैं, लेकिन निजी तौर पर उनके लिए यह कोई दिव्य, अंतिम सत्य, आलोचना के परे व्यवस्था नहीं है- कल को बहुत सम्भव है धार्मिक रूपरेखा में लोकतंत्र से अधिक प्रभावी, जनकल्याणकारी, सबको ‘धारण’ कर सकने वाली व्यवस्था विकसित हो जाए।

वे उदाहरण मैसूर राज्य का देते हैं, जहाँ का राजपरिवार अंग्रेजों के समय में भी और बाद में भारतीय राष्ट्र-राज्य में विलय के चलते राजनीतिक ताकत खो देने के बाद भी जनकल्याण और राजधर्म के यथासम्भव पालन के लिए सक्रिय रहा। इसी कारण आज भी मैसूर शहर में राजपरिवार का सम्मान लोग अपने आप, बिना किसी क़ानूनी ज़बरदस्ती के करते हैं।

धार्मिक मूल्यों पर चलने वाली राजनीति को वह ‘क्षात्रत्व’ के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसके अंतर्गत न केवल ‘हर स्थिति में अहिंसा’ को नकारा जाता है, बल्कि एक राष्ट्र राज्य अपना प्रभाव-क्षेत्र लगातार बढ़ाते रहने के लिए इच्छुक भी होता है। इस प्रभाव क्षेत्र में वे आर्थिक, सांस्कृतिक, कूटनीतिक जैसे ‘सॉफ़्ट पावर’ क्षेत्र ही नहीं बल्कि सैन्य, रणनीतिक जैसे ‘हार्ड पावर’ क्षेत्रों को भी रखते हैं।

व्यक्तिगत रूप से हिन्दू क्या कर सकते हैं?

इसके जवाब में नितिन ’3-P मॉडल’ समझाते हैं- यानि Preserve(संरक्षण), Protect (सुरक्षा), Promote(प्रचार/प्रोत्साहन)। इसके अंतर्गत उनका मानना है कि हिन्दू सभ्यता की सुरक्षा तभी की जा सकती है जब हिन्दू अपनी कलाओं, आध्यात्म, धर्म, परम्पराओं का एक ही साथ संरक्षण (अभ्यास और अनुपालन द्वारा), सुरक्षा (उनसे जो इन्हें खत्म कर देना चाहते हैं, और उनसे भी जो इनकी जड़ें हिन्दू सभ्यता से काट देना चाहते हैं- जैसे कभी योग तो कभी भरतनाट्यम तो कभी आयुर्वेद के साथ हम देखते रहते हैं, और जो BHU में अभी चल रहा है।), और प्रचार/प्रोत्साहन (जो इनके बारे में नहीं जानते, उन तक इन सभी को ले जाना, बशर्ते वे इसकी हिन्दू जड़ों को इसमें से काटे नहीं।) इस विषय पर उनकी एक पुस्तक, सामान्य धर्म, भी उपलब्ध है।

NCP नेता ने ‘तानाजी’ के मेकर्स को दी धमकी, कहा- अगर इसे नहीं बदला, तो ले लूँगा एक्शन

राष्‍ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने बुधवार (नवंबर 20,2019) को ‘तानाजी: द अनसंग वॉरियर’ के मेकर्स को धमकी दी है। उन्‍होंने कहा है कि मेकर्स फिल्‍म से जुड़े मूल तथ्यों को सही करें और इतिहास या उसके किरदारों को गलत तरीके से न दिखाएँ, नहीं तो वे इसपर कार्रवाई करेंगे।

‘तानाजी’ का किरदार निभाने वाले अजय देवगन की 100वीं फिल्म पर आव्हाड ने कहा है कि मेकर्स को फिल्म में कई बदलाव करने की आवश्यकता हैं। उन्होंने फिल्म निर्देशक ओम राउत पर आरोप लगाया है कि उन्होंने फिल्म के इतिहास को गलत तरह से और अनैतिक रूप से पेश किया हैं। इतना ही नहीं, उनका दावा है कि मराठा योद्धा तान्हाजी मालुसरे को भी गलत तरीके से दिखाया गया हैं।

अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा, “ओम राउत, मैंने ट्रेलर देखा और आपको इसमें कुछ बदलाव करने जी जरूरत है। अगर ये बदलाव तुरंत नहीं किए गए तो मैं फिल्‍म के खिलाफ ऐक्‍शन लूँगा। अगर मेकर्स मेरी डिमांड को धमकी के रूप में लेते हैं तो ले सकते हैं।”

गौरतलब है कि इससे पहले संभाजी ब्रिगेड ने भी ट्रेलर में दिखाए गए कुछ सीन्स पर डायरेक्टर से स्पष्टीकरण माँगा हैं। ब्रिगेड ने अपने पत्र में कहा है कि फिल्म में भगवा झंडे पर ओम का चिह्न दिखाकर जानबूझकर शिवाजी की धर्मनिरपेक्ष छवि को खत्म करने की कोशिश की गई है। इसके अलावा बता दें कुछ लोगों द्वारा काजोल के डायलॉग्‍स पर भी आपत्ति जताई गई है जो फिल्‍म में सावित्रीबाई मालुसरे का किरदार निभा रही हैं।

इसके अतिरिक्त संभाजी ब्रिगेड ने फिल्म रिलीज से पहल पहले अपने लिए इसकी स्पेशल स्क्रीनिंग की माँग की हैं। यहाँ बता दें कि ‘तानाजी: द अनसंग वॉरियर’ बड़े पर्दे पर 10 जनवरी 2020 को 3डी में रिलीज होगी। लेकिन इससे पहले इसे काफी आलोचनाओं को सामना करना पड़ा है। अभी ट्रेलर के बाद द क्विंट ने इसपर अपना लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने तानाजी का उदाहरण देते हुए कहा है कि जानिए कैसे बॉलीवुड हिंदुत्व को इतिहास बताकर धकेल रहा है।

कव्वाली सुनते-सुनते लोग एक-दूसरे पर बजाने लगे कुर्सियाँ, Viral Video पर पूछा – ‘संजय राउत आए थे क्या’

हरिद्वार में एक कव्वाली आयोजन के दौरान एक अजीब वाकया हुआ, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि लोग सीट पाने के लिए एक दूसरे को बेहरमी से कुर्सियाँ मार रहे हैं और चोट लगने पर भी रुकने का नाम नहीं ले रहे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये वीडियो 19 नवंबर का है और घटना कैथवार मोहल्ले की है। इस वाकये में किसी शख्स को कोई नुकसान नहीं होने की सूचना है, लेकिन फिर भी वीडियो देखकर ऐसा नहीं लग रहा कि किसी को कोई चोट न आई हो। वायरल वीडियो में हम देख सकते हैं कि आयोजन में मौजूद कुछ लोग इतने उग्र हो गए थे कि उन्हें रोकने के लिए पुलिस को बीच में आना पड़ा और समझाकर सबको शांत करवाना पड़ा।

हालाँकि, ये वीडियो देखकर आप उस स्थिति की कल्पना जरूर करने लगें होंगे, लेकिन सोशल मीडिया यूजर्स इसे देखते ही चुटकी लेने लगे। वीडियो में लड़ रहे लोगों को देखकर किसी यूजर्स ने कहा, “संजय राउत को बुला लिया था क्या कव्वाली में”, तो किसी ने कहा ‘ये जेएनयू वाले थे’।

आरोही त्रिपाठी नाम की यूजर्स ने इस वीडियो पर चुटकी लेते हुए लिखा कि ये सभी लोग संसद वाली फीलिंग ले रहे हैं। जिस पर दूसरे यूजर ने कहा ये सब लॉयर बन सकते हैं।

इसके बाद कुछ लोगों ने इस पूरे वाकये के लिए उस इलाके में रहने वाले 30 प्रतिशत समुदाय विशेष के लोगों को जिम्मेदार बताया, जो कि बहुत ही गलत है। बैठने की लड़ाई का किसी के मजहब से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सोशल मीडिया पर किसका बस चलता है भला!

Google ने प्ले स्टोर से ‘भारत-विरोधी’ ऐप हटाया, पंजाब को ‘भारत के क़ब्जे’ से मुक्त कराने के लिए कर रहा था काम

Google ने अपने Play Store पर मौजूद भारत-विरोधी ऐप ‘2020 Sikh Referendum’ को हटा दिया है। पंजाब सरकार ने इस ऐप को हटाने की माँग की थी। इसके परिणामस्वरूप अब भारत में यूज़र्स के लिए यह उपलब्ध नहीं है।

पंजाब सरकार द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ऐप ने “आम जनता को RE PUNJAB REFERENDUM 2020 KHALISTAN’ में मतदान करने के लिए ख़ुद को पंजीकृत करने के लिए कहा।”

रिलीज़ में कहा गया है कि आवेदन के विश्लेषण से पता चला है कि ऐप पर पंजीकृत मतदाताओं का डेटा ‘est yestoKhalistan.org’ नामक वेबसाइट के वेब सर्वर पर संग्रहीत किया गया था।

ऐसा माना जाता है कि इस वेबसाइट को एक यूएस-आधारित अलगाववादी समूह ‘Sikhs for Justice’ द्वारा बनाया और प्रबंधित किया गया है। इस समूह को भारत सरकार द्वारा इस साल जुलाई में अलगाववाद के आधार पर प्रतिबंधित कर दिया गया था।

प्रतिबंध के बाद, सिंह ने कहा

“यह ISI समर्थित संगठन के भारत-विरोधी अलगाववादियों से राष्ट्र की रक्षा करने की दिशा में पहला क़दम था”

पंजाब के डिजिटल जाँच, प्रशिक्षण और विश्लेषण केंद्र (DITAC) साइबर लैब ने नवंबर की शुरुआत में भारत में Google की क़ानूनी टीम से इस मुद्दे को उठाया था, क्योंकि उनका मानना ​​था कि ‘Sikhs for Justice’ नामक प्रतिबंधित संगठन द्वारा ग़ैर-क़ानूनी और देश-विरोधी गतिविधियों के लिए इस ऐप का दुरुपयोग किया गया था।

वेबसाइट के अनुसार, पंजाब रेफरेंडम 2020 एक अनौपचारिक ऑनलाइन रेफरेंडम है, जो दावा करता है कि यह अभियान पंजाब को मुक्त करने के लिए काम कर रहा है, जो ‘वर्तमान में भारत के क़ब्जे’ में है।

यह अभियान, SFJ द्वारा आयोजित किया जा रहा था। यह एक ऐसा संगठन है जो 2007 में गठित किया गया था, जो सिखों के लिए एक अलग मातृभूमि चाहता है। SFJ का कहना है कि यह नवंबर 2020 में पंजाब और उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, केन्या और मध्य पूर्वी देशों के प्रमुख शहरों में इस तथाकथित रेफरेंडम को आयोजित करने की योजना बना रहा है।

वेबसाइट में कहा गया है कि एक बार जब पंजाबी लोगों के बीच यह सहमति बन जाती है कि उन्हें भारत से आज़ादी चाहिए, तो हम पंजाब को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लक्ष्य के साथ संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय रूपों और निकायों से भी संपर्क करेंगे।

रेफरेंडम के माध्यम से, यह अभियान पंजाब के लिए स्वतंत्रता के समर्थन में कम से कम 5 मिलियन वोट प्राप्त करना चाहता है, जिसके बाद वह संयुक्त राष्ट्र से सम्पर्क करने की योजना बना रहा है। पंजाब पुलिस का कहना है कि SFJ और रेफरेंडम 2020 दोनों ही पाकिस्तान द्वारा समर्थित हैं।

SFJ का चेहरा गुरपतवंत सिंह पन्नुन नाम का एक शख़् है, जो भारतीय राजनेताओं के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर करने के लिए जाना जाता है। अमेरिका में स्थित पन्नून ने 2002 के गुजरात दंगों और 1984 के सिख विरोधी दंगों के मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए हैं।

2016 में, अमरिंदर सिंह को SFJ द्वारा दायर एक मामले के कारण कनाडा की यात्रा रद्द करनी पड़ी थी। 2018 में, शिरोमणि अकाली दल अमृतसर (मान) के अध्यक्ष, सिमरनजीत सिंह मान, और सबसे दूर के समूह दल खालसा ने पन्नून को लिखा है कि एक ऑनलाइन रेफरेंडम के लिए SFJ का आह्वान ‘दूर की कौड़ी’ और ‘असाध्य’ था।

चाँद से सब कुछ देखने वाले, मूर्तिपूजा को हराम कहने वाले सूर्य सिद्धांत पढ़ाएँगे: BHU के प्रोफ़ेसरों का प्रश्न

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों द्वारा संकाय में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर लगातार विरोध जारी है। मीडिया के एक बड़े धड़े ने इसे सिर्फ ‘संस्कृत भाषा’ और ‘मुस्लिम टीचर का विरोध’ का प्रश्न बनाकर जनता को मूल मुद्दे से भटका दिया है। इस मुद्दे पर मीडिया और सोशल मीडिया के कूपमंडूकों द्वारा हद से ज़्यादा भ्रम पैदा किया किया गया है। जबकि ऑपइंडिया ने इस पूरे मुद्दे पर पहले भी स्पष्ट और विस्तार से छात्रों की बात रखी है।

अब इसी कड़ी में हम आपको उसी संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के साहित्य, ज्योतिष और वेद सहित कई विभागों के वर्तमान प्रोफ़ेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष, काशी के आचार्यों का बयान आपके सामने रख रहे हैं कि उनका फिरोज खान की नियुक्ति और धर्म विज्ञान के विषय में क्या कहना है? क्यों वे इस नियुक्ति के विरोध में हैं?

SVDV के प्रोफेसर्स का कहना है

फिरोज खान की नियुक्ति से पैदा हुए विवाद के कारण SVDV पूरी तरह से ठप्प है। नौकरी में होने के बावजूद वहाँ के कुछ प्रोफ़ेसर खुल कर इस मुद्दे पर छात्रों के साथ है। कुछ ऐसे प्रोफेसरों से भी हमारी बात हुई जो नौकरी में होने की जटिलता के कारण खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं लेकिन छात्रों को उनका नैतिक समर्थन मिला हुआ है।

संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग के सहायक प्रोफ़ेसर रजनीश पाण्डेय का कहना है कि मैं छात्रों के साथ हूँ, तकनीकि रूप से भले ही कानून उनके पक्ष में नहीं हो लेकिन उनके माँग मालवीय जी के इस संकाय की स्थापना के उद्देश्यों के अनुसार ही है। चूँकि, अभी तक SVDV संकाय में किसी अन्य मजहब के व्यक्ति की नियुक्ति नहीं हुई तो पहले ऐसे विवाद की जरुरत ही नहीं पड़ी। पिछले 100 साल से अधिक समय के बाद ऐसा पहली बार हुआ है। इसलिए परीक्षा नजदीक होने के बावजूद भी छात्र धरना-प्रदर्शन को मजबूर हैं।

साहित्य विभाग के प्रोफ़ेसर रजनीश पांडेय जी कहते हैं, “कल मैं फिरोज खान और उनके पिता के वक्तव्य को ‘दैनिक जागरण’ में पढ़ रहा था जिसका लब्बोलुआब यह था कि उनके साथ मुस्लिम होने के कारण यह सब हो रहा है। उनके अनुसार आज तक उनके साथ कभी मुस्लिम होने से कोई भेद भाव नहीं हुआ पर आज मुस्लिम होने के कारण ये सब हो रहा। उनके अनुसार उन्होंने बचपन से संस्कृत पढ़ा और उनके घर में कृष्ण की फोटो है आदि आदि बहुत सी बातें संस्कृत प्रेम को सिद्ध करने के लिए कहा है।”

सहायक प्रोफ़ेसर ने कहा, “मैं उनसे सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि क्या इस देश में कहीं मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा रहे और यदि हाँ तो उनके साथ ये भेद भाव क्यों नहीं हुआ। अरे ये वो देश है, जिसमें हजारों मन्दिरों को इस्लाम के नाम पर लूटा गया, तोड़ा गया, रूह कपा देने वाले अत्याचार किए गए। जननी-जन्मभूमिश्च के लिए स्वर्ग का भी परित्याग कर देना चाहिए, ऐसा विश्वास करने वाले हिन्दू जनमानस के सामने ही उसकी माँ से भी प्रिय मातृभूमि के इस्लाम के नाम पर टुकड़े कर दिए गए। राम के ही देश में हमें राम के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए न्यायालयों में वर्षों तक चक्कर लगाने पडे़। कौन सा ऐसा ईसाई देश है, जहाँ ईसा मसीह के अस्तित्व के लिए केस चला हो कौन सा ऐसा मुस्लिम देश जहाँ मुहम्मद साहब के अस्तित्व के लिए केस चला हो। लेकिन फिर भी इस देश ने मुस्लिम को अपना हिस्सा समझकर बराबरी का व्यवहार किया, जानते हैं क्यों? क्योंकि संस्कृत भाषा के रूप में भले ही आमभाषा न रह गई हो पर संस्कार के रूप में आज भी इस देश के हर हिन्दू के नस-नस में जिन्दा है।”

रजनीश पांडेय कहते हैं, “आप ने सही कहा कि आपने बचपन से संस्कृत पढ़ी लेकिन उसको ग्रहण केवल भाषा के रूप में किया पर संस्कृत के संस्कार को आत्मसात नहीं कर पाए वरना ये भेदभाव वाली दृष्टि केवल शान्तिपूर्ण विरोध के कारण कभी पैदा ही नहीं होती। इतिहास पढ़िए तब समझ में आएगा कि इतने पद-दलन अपमान अत्याचार को धैर्यपूर्वक सहते हुए भी हिन्दू जनमानस ने कभी मुस्लिमों को अपने से अलग नहीं समझा ये है संस्कृत के संस्कार का चमत्कार। जो केवल पढ़ने से नहीं आ सकता, जिसका आप दावा कर रहे हैं।”

इतनी बातचीत के बाद रजनीश जी SVDV में छात्रों के विरोध पर बात करते हुए कहते हैं, “अब आइए विरोध के कारणों पर। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जिसके नाम में ही महामना के द्वारा ‘हिन्दू’ शब्द जुड़ा हुआ है जिसे हटाने के लिए 60 के दशक में नेहरू के समय शिक्षामंत्री MC छागला (मुहम्मदअली करीम छागला) द्वारा अभियान चलाया गया। बाकायदा बिल पेश किया गया और जब उस समय के जनमानस का विरोध झेलना पड़ा तब जाके उसे वापस लिया गया और वहीं से छागला के ही कारण JNU के स्थापना की भूमिका बनी। महामना, गाँधी जी के विरोध के बावजूद भी विश्विद्यालय के नाम में ‘हिन्दू’ शब्द पर अड़े रहे तो वहीं उन्होंने हिन्दू धर्म और सनातन मूल्यों के प्रति अपनी दृढ़ता और आग्रह प्रदर्शित कर दी थी।

रजनीश जी थोड़ा तल्ख़ होते हुए कहते हैं कि महामना कोई भंगेड़ी या नशेड़ी नहीं थे जो नशे में विश्वविद्यालय के नाम में हिन्दू शब्द जोड़ दिया और विश्विद्यालय में संस्कृत विभाग के साथ ही वैदिक विद्यालय जिसे बाद में नाम बदलकर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय किया गया। मालवीय जी एक युग द्रष्टा तपस्वी त्यागी महापुरुष थे जिनको अच्छी तरह से मालूम था कि इस शब्द का क्या अर्थ है। जिन्होंने बीएचयू के बीचो-बीच काशी विश्वनाथ का मन्दिर स्थापित किया, वो यह प्रमाण है कि हिन्दू पूजा पद्धति और सनातन मूल्यों के प्रति उनका क्या लगाव था। और उसी लगाव के चलते उन्होंनें हिन्दू धर्म के अध्ययन और उसकी अस्मिता को बचाए और बनाए रखने के लिए ‘धर्म विज्ञान’ संकाय की स्थापना की न कि संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए जिसके लिए संस्कृत विभाग कला संकाय में है और उसका दरवाजा सभी के लिए खुला है।

रजनीश जी कहते हैं कि अब सवाल यह है कि हिन्दू धर्मशास्त्र कौन पढ़ाएगा? उस धर्म का व्यक्ति जो बुतपरस्ती कहकर मूर्ति और मन्दिर के प्रति उपहासात्मक दृष्टि रखता हो और वो ये सिखाएगा कि पूजन का विधान क्या होगा? क्या जिस धर्म के हर गणना का आधार चन्द्रमा हो वो सूर्य सिद्धान्त पढ़ाएगा, जो धर्म साकार स्वरूप को मानता ही न हो वो साकार और निराकार के सबन्ध को समझाएगा? जहाँ साहित्य का अर्थ केवल संस्कृत नृत्य और गायन मात्र हो वो ‘व्यक्तिविवेक’ और ‘रसगंगाधर’ जैसे हिन्दू धार्मिक चिन्तन से ओतप्रोत ग्रंथों की शिक्षा देगा, जो धर्म तीन बार तलाक तलाक कहकर नारी को घर से बाहर निकाल देने की इजाजत देता हो उस धर्म का व्यक्ति सप्तपदी और जन्म जन्मातर के विवाह संस्कार की व्याख्या करेगा? जो किसी गुण में ही विश्वास न करता हो वो सृष्टि की त्रिगुणात्मक व्याख्या करेगा? जिस धर्म में ‘मजहबी’ होने का प्रमाण गुप्तांग विच्छेदन से हो वो उपनयन संस्कार और ब्रह्मचर्य का उपदेश देगा? ऐसे एक नहीं हजारों यक्ष प्रश्न विरोध का कारण हैं जिसको आपने अपनी तुच्छ हिन्दू मुस्लिम दृष्टि से तौल दिया।

रजनीश जी स्पष्ट तौर पर कहते हैं, “आपकी हताशा का कारण मात्र आर्थिक, मानसिक और व्यक्तिगत है और विरोध का व्यक्तिगत आर्थिक स्वार्थ से दूर-दूर तक लेना देना नहीं है। हमारे यहाँ साफ कहा गया है ‘धर्मो रक्षति रक्षितः। हो सकता है आप बहुत अच्छे इन्सान हो पर एक सत्य यह भी है कि दूध का जला मठ्ठा भी फूँक-फूँक कर पीता है। आपने संस्कृत पढ़ा और पढ़ाया इसके लिए मेरी नजर में आप अत्यंत सम्मान और स्नेह के पात्र हैं। लेकिन फिरोज खान महोदय धर्म और बेडरूम की अपनी मर्यादा व निजता होती है। भारतीय संविधान भी इसकी इजाजत देता है। कितना भी मैं उर्दू और कुरान पढ़ लूँ पर मै मौलवी नहीं बन जाऊँगा, नहीं मैं ऐसा किसी आर्थिक कारण लिए करना चाहूँगा।”

उन्होंने कहा, “ये कहना कि ‘अच्छा होता कि संस्कृत पढ़ाने की जगह मुर्गे की दुकान खुलवा देता’ ऐसा आक्रोशपूर्ण वक्तव्य देना और संस्कृत प्रेमी का दावा करना निःसंदेह विचित्र विरोधाभास है। अरे आपके ही राजस्थान की बहु रही मीराबाई ने प्रेम के लिए हंसते हुए जहर पी लिया और आपका संस्कृत प्रेम कुछ छात्रों के विरोध मात्र से मुर्गे की दुकान पर पहुँच गया। ये प्रेम का कौन सा रुप है, मैं समझ नहीं सका। यह विश्वविद्यालय जेएनयू सरीखे विश्वविद्यालयों से अलग है जहाँ देश विरोधी नारे लगते हैं लानत है ऐसी शिक्षा को। इस विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल में हिन्दू संस्कृति थी, है और रहेगी। जिसको इसमें आपत्ति है वो आपत्ति रख सकता है पर आपत्ति से ऐतिहासिक सत्य नहीं बदल जाता।”

एक ही विश्वविद्यालय में दो संस्कृत विभाग क्यों?

संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर गिरिजाशंकर शास्त्री ने भी अपने बयान में इस बात को समझाने पर जोर दिया कि धर्मप्राण भारतरत्न महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी ने विशेष उद्देश्य से धर्म, ज्ञान-विज्ञान एवं मोक्ष की नगरी वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की संस्थापना की। धर्म अत्यन्त व्यापक शब्द है, इसकी गति भी अत्यन्त सूक्ष्म है, धर्म और धर्म का तत्व भी बड़े-बड़े महापुरुषों महामनीषियों के बुद्धिरुपी गुहा में स्थित है, समग्र धर्म तो परमात्मा ही है, जिसे सनातन परम्परा द्वारा जानने की चेष्टा सर्वदा से होती रही है, सनातन धर्म शाश्वत है, यह किसी महापुरुष या व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं चलाया गया है।

प्रोफ़ेसर शास्त्री इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं, “सनातन धर्म को छोड़कर अन्य धर्म किसी न किसी व्यक्ति के द्वारा प्रवर्तित किए गए हैं। यही कारण है कि इन धर्मों को सम्प्रदाय कहा गया है। सनातन धर्म की रक्षा हेतु परमात्मा का भी समय-समय पर अवतरण होता रहा है। सनातन संस्कृति के रक्षक वेद एवं वेदांग ही हैं, इसी की रक्षा हेतु भगवान केे विशेष अंश से अवतरित दूरदर्शी महामना मालवीय ने सर्वप्रथम संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय की स्थापना की। कालान्तर में संस्कृत भाषा एवं संस्कृत ज्ञान के प्रचार प्रसार हेतु बीएचयू के कला संकाय में एक अन्य संस्कृत विभाग की भी स्थापना की। संस्कृत के दोनो विभागों का उद्देश्य पृथक-पृथक है।

ज्योतिष विभाग के प्रोफ़ेसर गिरिजाशंकर शास्त्री बताते हैं कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के प्राध्यापकगण मालवीय भवन में होने वाले कृष्णजन्माष्टमी, गीताप्रवचन, ऋषिपूजन, श्रावणीकर्म, सरस्वती पूजा, विश्वविद्यालय स्थित विश्वनाथ मंदिर में पूजन-अर्चन प्रत्येक वर्ष समयानुसार करते हुए वेद-वेदांग की शिक्षा प्रदान करते हुए सनातन धर्म की रक्षा करते हैं। जबकि संस्कृत विभाग का सम्बन्ध अन्य विषयों की भाँति केवल पठन-पाठन, शोधकार्य तथा अन्य संस्कृत से सम्बन्धित गतिविधियों में सीमित हैं। अतएव मालवीय जी का दो विभाग स्थापित करने का उद्देश्य भी यही था। अतएव महामना ने नियम निर्देश करते हुए शिलापट्ट में ‘नैष्ठिक हिन्दू’ के अतिरिक्त अन्य किसी भी धर्मावलंबी के लिए संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय में अनुमति नही प्रदान की होगी।

SVDV के साहित्य विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष श्यामानन्द मिश्रा का कहना है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की स्थापना के पीछे महामना मालवीय जी की संकल्पना सनातन धर्म एवं संस्कृति में निहीत उदात्त मूल्यों की रक्षा तथा उनके प्रचार-प्रसार की थी। अन्यथा संस्कृत का सामान्य अध्ययन ही उद्देश्य होता तो एक ही विश्वविद्यालय में धर्म विज्ञान संकाय से पृथक कला संकाय में भी संस्कृत विभाग की स्थापना मालवीय जी द्वारा क्यों होती? पूर्व विभागाध्यक्ष ने लोगों से अपील भी की कि जिनको भी धर्म-विज्ञान (Theology) संकाय का वास्तविक ज्ञान नहीं है, वे इस विषय में अनावश्यक टिप्पणी करने का दुस्साहस न करें। उन्होंने भी इस बात को दोहराया और कहा- विशेष ज्ञान के लिए संकाय-भवन में लगा शिलापट्ट पढ़ें।

SVDV शिलापट्ट

SVDV के ही वेद विभाग के प्रोफ़ेसर दीक्षित ने भी फिरोज खान के नियुक्ति के सम्बन्ध में अपने बयान में उस किताब के तरफ ही ध्यान आकर्षित किया कि ‘वैदिक महाविद्यालय’ का पूरा उद्देश्य उसी किताब में लिखा है जिसका लोकार्पण माननीय कुलपति जी ने ही किया है। वर्णाश्रम धर्म और उसके रीति से प्रवेश की वकालत की। उन्होंने जो कुछ कहा उसका जिक्र हम पहले भी अपनी रिपोर्ट में कर चुके हैं जिसे यहाँ पढ़ा जा सकता है।

SVDV के प्रोफेसरों के अलावा काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने भी छात्रों के आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि महामना ने जब BHU की स्थापना कि थी तो ‘धर्म विज्ञान संकाय’ की स्थापना के साथ उन्होंने भविष्य में इस विभाग में नियुक्ति के लिए एक पत्थर भी लगवाया था जिस पर लिखा है कि सनातन धर्म में आस्था रखने वाला हिन्दू ही यहाँ अध्ययन-अध्यापन करेगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा जिस तरह विश्वनाथ मंदिर में गैर सनातनी दर्शन पूजन के लिए नहीं जा सकता है उसी तरह BHU के धर्म विज्ञान संकाय में भी शिक्षक सनातन धर्म का होना चाहिए। इसी से धार्मिक शुद्धता बची रहेगी।

इसके अलावा विश्वविद्यालय के कई अन्य प्रोफेसरों के साथ ही काशी के पंडितो और आचार्यों का भी कहना है कि उस संकाय में सनातन धर्म पढ़ाया जाता है दूसरा कोई और धर्म नहीं जो किसी भी धर्म का शिक्षक आकर पढ़ाए। उन सभी ने छात्रों की माँगों का समर्थन किया।

इस समय मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा जो बिना इस मुद्दे को समझे ही इसे सिर्फ भाषा का मुद्दा समझकर और ब्राह्मणवाद के विरोध के नाम पर अपनी कुंठा को कई अन्य रूपों में प्रकट करने में लगा है। जिससे अब ये मुद्दा राजनीतिक और धार्मिक रूप ले चुका है। एक तरह जहाँ विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी नियुक्ति को सही ठहरा रहा है तो वहीं छात्रों की माँग भी अगर हिन्दू धर्म और उसके मूल्यों के सन्दर्भ में देखें तो सही लग रहा है। इस पूरे परिपेक्ष्य में जरुरत लोगों को सही मुद्दे से परिचित कराने की भी है।

ये पूरा मुद्दा न भाषा का है और न ही BHU में मुस्लिम अध्यापक के प्रवेश के विरोध का क्योंकि BHU की स्थापना के समय से ही वहाँ लगभग सभी धर्मों के शिक्षक स्वतंत्रता पूर्वक पढ़ा रहे हैं। सवाल सिर्फ एक विशिष्ट संकाय संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय का है। जहाँ पर नियुक्ति के अभी तक अघोषित नियम थे जिनका पालन पिछले 100 सालों से होता आया और जब पहली बार किसी ने उससे अलग जाने की कोशिश की तो आज विश्वविद्यालय को उन छात्रों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है जिनके लिए संस्कृत भाषा नहीं बल्कि माध्यम है, सनातन धर्म और उसके मूल्यों की रक्षा और उसके संवर्धन करने का। SVDV के छात्र सिर्फ आज की नहीं बल्कि आने वाले समय को भी ध्यान में रखकर चल रहे हैं वो नहीं चाहते जिसे वो मन से स्वीकार ही नहीं कर पाएँगे कि वो उनका गुरु है वो उन्हें शिक्षा दे।

‘JNU को दिल्ली से बाहर ले जाएँ, यहाँ प्रदूषित हवा के कारण 40-45 साल तक ‘बच्चों’ को करनी पड़ती है पढ़ाई’

JNU में छात्रों का प्रदर्शन अराजकता के स्तर पर पहुँच गया है जिससे न सिर्फ प्रशासन बल्कि आम जनता भी तंग आ चुकी है। सोशल मीडिया पर पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ से कई तरह के बयान सामने आ रहे हैं। इसी बीच रहमान मलिक ने HRD मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को पत्र लिखकर JNU के स्थान्तरण की ही माँग रख दी है। अपने पत्र में उन्होंने उन्होंने इसके कई कारण बताए हैं।

रहमान मलिक लिखते हैं, “मान्यवर मैं आपका ध्यान ऐसे विषय के तरफ केंद्रित करना चाहता हूँ जो देश में शैक्षणिक स्तर और देश की राजधानी दिल्ली के सुनहरे भविष्य के लिए हितकारी होगा। देश की राजधानी में 1019.32 एकड़ में बनी जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पढाई कर रहे देश के छात्र और छात्राओं को के लिए अलग से दिल्ली एनसीआर में भूमि अधिग्रहण कर यूनिवर्सिटी बनाई जाए जहाँ एकांत व खुला स्वच्छ वातावरण हों।

राजधानी दिल्ली में JNU के छात्र एकाग्रता से पढाई नहीं कर पाते। दिल्ली बहुत भीड़ भाड़ वाला इलाका है जहाँ छात्रों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दिल्ली का वातावरण भी अच्छा नहीं है उन्हें कच्ची आयु में दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है। देखने में आया है कि कुछ छात्र 40-45 की उम्र में भी अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाते। यह चिंताजनक है। पूरा पत्र आप नीचे पढ़ सकते हैं।

बता दें कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हॉस्टल मैन्युअल अपडेट किए जाने को लेकर विवाद चल रहा है। इस यूनिवर्सिटी में सबसे ज्यादा छात्र आर्ट्स, सोशल स्टडीज, लैंग्वेज कोर्स और इंटरनेशनल स्टडीज पढ़ते हैं। जेएनयू में लगभग 8,000 छात्र हैं। इनमें से आधे से ज्यादा आर्ट्स, लैंगवेज, लिटरेचर और सोशल साइंस के हैं। 57% छात्र इन्हीं चार विषयों की पढ़ाई करते हैं। बाकी बचे छात्रों में से 15% इंटरनेशनल स्टडीज में हैं। कुल छात्रों में से 55% एमफिल और पीएचडी कर रहे हैं। जो सालों तक वहीं पड़े रहकर राजनीतिक गतिविधियाँ चला रहे हैं।