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देखें VIDEO: JNU छात्र ने दी पत्रकार को धमकी, कहा- ‘खरीद सकता हूँ AK-47’

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इन दिनों फीस वृद्धि को लेकर हो रहे प्रदर्शन और हंगामे के बीच हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है। जेएनयू में एक प्रदर्शनकारी छात्र ने सवाल पूछने वाली एक महिला पत्रकार को ही धमकी दे डाली।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रिपब्लिक भारत की एक पत्रकार ने JNU के प्रदर्शनकारियों के चलते अन्य लोगों को हुई समस्या पर सवाल किया तो वह छात्र इस पर भड़क गया। इस दौरान उसने हिंसा को जायज़ ठहराते हुए सीधे एके-47 खरीद कर मीडिया और पुलिस को ही गोली मारने की बात कह डाली।

बता दें कि जेएनयू के प्रदर्शन के चलते कई लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। इस दौरान आम आदमी से लेकर मरीज को अस्पताल ले जा रही एम्बुलेंस तक को दिक्कत का सामना करना पड़ा था। फीस में बढ़ोतरी को लेकर तीन हफ्ते से चले आ रहे इस विरोध प्रदर्शन में JNU के छात्रों ने संसद तक पैदल मार्च निकालने का निर्णय किया था।

वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि जब छात्र से अवैध प्रदर्शन को लेकर सवाल पूछा गया तो वह भड़क गया और बोला, “मैं फिजिकली हैंडीकैप्ड हूँ, मुझे जानवरों की तरह मारा गया। क्या मैं एके-47 नहीं खरीद सकता, मेरी इतनी औकात नहीं है क्या?” इशारा साफ़ था, हमारी हैसियत बन्दूक खरीदने की है, हमने चाहा तो पत्रकारों को मारेंगे”

बता दें कि इससे पहले भी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने वाले जेएनयू के छात्रों ने रिपब्लिक भारत के मीडियाकर्मियों से काफी बदतमीजी की थी।

दरअसल बीते कई दिनों से JNU के छात्र यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा लगाए गए नए नियमों का विरोध कर रहे हैं। इन नियमों के तहत छात्रावासों की फीस से लेकर ड्रेस कोड और गेट के टाइमिंग आदि कड़े किए दिए गए हैं। बता दें कि कुछ ही दिन पहले इस विश्वविद्यालय के प्रांगण स्वामी विवेकानंद की मूर्ति का अनावरण किया गया था, हालाँकि नए-नियमों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे इन उपद्रवियों ने उस प्रतिमा को भी तहस-नहस कर दिया।

लव-जिहाद: मोहम्मद रियाज़ ने सोनू बनकर की शादी, भेद खुलने पर दिया तीन-तलाक, 15 लाख लेकर फरार

छत्तीसगढ़ के भिलाई से लव-जिहाद की घटना सामने आई है। घटना को लेकर पुलिस में शिकायत करने वाली हिन्दू लड़की का आरोप है कि मोहम्मद रियाज़ के नाम के लड़के ने उसके साथ धोखा-धड़ी से शादी कर उसकी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी।

लड़की ने मोहम्मद पर आरोप लगाया है कि उसने अपना नाम बदलकर उसे शादी करने के लिए राज़ी किया। कुछ समय बाद जब लड़की ने बच्चे को जन्म दिया तो उसे रियाज़ की सच्चाई पता चली। दरअसल मोहम्मद रियाज़ खुदको हिन्दू बताकर धीरे-धीरे लड़की के परिवार से करीबी बढ़ाने लगा। पीड़ित लड़की के मुताबिक शादी से पहले उसने अपना नाम रियाज़ नहीं सोनू ताजानी बताया था।

रियाज़ ने पीड़िता के पिता से कहा था कि उसके बाप ने दूसरी शादी कर ली और उसकी सौतेली माँ ने उसे घर से निकाल दिया है। पीड़ित लड़की के परिवार ने रियाज़ पर भरोसा किया, इसके बाद रियाज़ ने 6 जुलाई 2014 को लड़की से हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार शादी की।

लड़के का भेद तब खुला जब साल भर बाद लड़की ने बच्चे को जन्म दिया। नवजात के सर्टिफिकेट में आरोपित लड़के ने अपना असली नाम मोहम्मद रियाज़ ताजानी (पिता कादर ताजानी) लिखा। समुदाय विशेष का नाम देखते ही लड़की के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। इसके बाद रियाज़ उसे ओडिशा के उमरकोट जिला स्थित नवरंगपुर के अपने घर ले गया जहाँ पर रियाज़ और उसके परिवार वालों ने जबरन लड़की का धर्म परिवर्तन करवाया। उन्होंने उसका नाम शिरिन बानो रख दिया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक लड़की का यह भी आरोप है कि उसका पति रियाज़ अक्सर उसके साथ मारपीट करता था। इस सबके बावजूद लड़की ने अपना परिवार बनाए रखने के लिए सब कुछ सहन किया। धीरे-धीरे रियाज़ के तेवर बढ़े तो वह लड़की के परिवार वालों पर भी इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डालने लगा।

मोहम्मद रियाज़ ने पीड़िता के परिवार की मजबूरी का फायदा उठाने की भी पूरी कोशिश की। उसने लड़की के पिता से 15 लाख रुपए की माँग रख दी। बहाना दिया कि इस पैसे वह एक मकान खरीदेगा और उसे एक बिजनेस शुरू करना है। जब पीड़िता का परिवार उसकी यह माँग पूरी नहीं कर सका तो उसने 12 अक्टूबर 2019 को दूसरी शादी करने का हवाला देकर पीड़ित हिन्दू लड़की को तीन-तलाक दे दिया।

इस सम्बन्ध में पीड़ित महिला ने स्थानीय पुलिस और परिवार परामर्श केंद्र में अपनी शिकायत दर्ज कराई। पीड़िता का आरोप है कि इस मामले में रियाज़ के अलावा उसके परिवार के अन्य लोगों की भी अहम भूमिका थी। अपनी इस शिकायत में पीड़िता ने सभी परिवार वालों का ज़िक्र किया है। इनमें मोहम्मद रियाज़, उसके बाप अब्दुल कादर ताजानी, उसकी माँ ज़रीना ताजानी, भाभी शहनाज़, बहन फरजाना व रुबना के नाम शामिल हैं।

राहुल गाँधी ने आँख मारी तो उनके विधायक जी ने भरी सभा में दे दी फ्लाइंग किस

संसद सत्र के दौरान 2018 में राहुल गाँधी ने भरे सदन के बीच पीएम की ओर देखकर आँख मारी थी तो राहुल की इस हरकत से उनकी काफी बदनामी हुई थी। इस घटना का वीडियो इतना वायरल हुआ कि इसकी चर्चा आजतक होती है। इसपर राहुल को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद उनकी पार्टी के नेता घटना से सबक लेने की बजाय उन्ही के पदचिन्हों पर चलने में लगे हैं। राहुल के बाद अब उन्ही की पार्टी के एक विधायक ने विधानसभा में अजीब हरकत कर दी है।

घटना ओडिशा विधानसभा की है जहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी के एक विधायक ने सदन में बोलते हुए अचानक विधानसभा स्पीकर के सामने उसे फ्लाइंग किस दे डाली। इस हरकत को अंजाम देने वाले कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक का नाम ताराप्रसाद बाहिनीपति है जोकि जेपोर क्षेत्र से आते हैं। ताराप्रसाद ने यह हरकत सदन में स्पीकर एसएन पात्रो के सामने उन्ही से कर डाली। उनकी इस घटना के बाद पूरे सदन का माहौल एकएक मजाकिया हो गया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विधायक ने इस घटना का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि वह बस अपनी खुशी का इज़हार कर रहे थे। उन्होंने बताया कि उनकी ख़ुशी इस बात को लेकर थी कि स्पीकर ने 147 सदस्यों वाली विधानसभा में बोलने के लिए सबसे पहला मौका उन्हें दिया। साथ ही ताराप्रसाद ने कहा कि इस फ़्लाइंग किस देने के बहाने उनका इरादा किसी को भी ठेस पहुँचाने का नहीं था। अपने स्पष्टीकरण में कॉन्ग्रेस विधायक ने कहा कि वह स्पीकर से पिछड़े क्षेत्रों के प्रति उनके समर्पण के चलते और भी ज्यादा खुश हैं।

आमतौर पर माना जाता है कि संसद और विधानसभा में निर्वाचित होने वाले जनप्रतिनिधि अपने व्यवहार से शालीनता और शिष्टाचार का परिचय देते हैं मगर जब पार्टी अध्यक्ष खुद ही संसद में सारी मर्यादा को तार-तार कर दे तो ओडिशा में इस कॉन्ग्रेसी विधायक की ऐसी हरकत पर ज्यादा आश्चर्य नहीं होता।

BHU: लिबरलो, वामपंथियो, मीठे हिन्दुओ, धिम्मियो… यज्ञ की विधि गैर हिन्दू नहीं सिखाएगा

समय में थोड़ा पीछे चलते हैं। गुलामी के उस दौर में चलिए जब अंग्रेज़ विलियम जोन्स जैसे उपन्सासकारों की प्रपंची कल्पना को भारत के इतिहास के नाम पर दर्ज कर रहे थे। मैक्स मूलर जैसे लोग किसी कपोल-कल्पना को आधार मान कर भारत के इतिहास ही नहीं, वेद-पुराण आदि पर ‘शोध’ करके दुनिया को आने वाले समय की सबसे प्रचलित भाषा में हिन्दू धर्म साहित्य उपलब्ध करा रहे थे।

फिर जो हुआ, वो तो होना ही था। मैक्स मूलर को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ‘बोडन प्रोफेसर ऑफ संस्कृत’ का चेयर बनाया गया। मैक्स मूलर वेद-पुराण का अनुवाद करते हुए, अपने अब्राहमिक रिलीजन के रंगीन चश्मे से लिखने लगे कि वेद गड़रियों के गीतों का संग्रह था। आगे यह भी बताया कि ब्रह्म और ब्राह्मण एक ही बात है।

आप यह समझिए कि जिस व्यक्ति की समझ इतनी कम हो, जिसे संदर्भ का पता न हो, वो किस स्तर पर एक छोटी गलती करता है, और आगे पूरे विश्व में उसके अनुवाद, और फिर उसके अनुवादों के अनुवाद प्रचलन में आते हैं। फिर, इन अनुवादों पर रिसर्च होता है, तब बताया जाता है कि हिन्दू धर्म तो ये है, कान में सीसा डाल देते थे… एक पूरे धर्म को कलुषित और प्रदूषित किया जाता है, और इसके आधार में एक व्यक्ति द्वारा किया गया वह अनुवाद होता है जो उसकी अनभिज्ञता से उपजा है।

कालांतर में भारत उस विद्वान को आँखों का तारा बनाता है, दिल्ली में उसके नाम पर भवन का नामकरण होता है, भारत-जर्मनी वार्ताओं में उसकी चर्चा होती है। यही वो बीज था जो सनातन धर्म के धार्मिक साहित्य की जड़ों को खोखला करने के लिए करीब दो सौ साल पहले बोया गया था। तब, फेसबुक पर चंद्र प्रकाश जी लिखते हैं, महर्षि दयानंद ने मैक्स मूलर द्वारा अनुवाद करने की खबर का विरोध करते हुए कहा – “यस्मिन् देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरण्डोऽपि द्रुमायते” यानी जिन देशों में विशाल वृक्ष नहीं होते, वहाँ के लोग अरंड (Castor) की झाड़ियों को ही पेड़ समझते हैं।

ऐसे लोग शब्दों को समझते हैं, संदर्भ को नहीं:
यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य।
एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीपत्य चार्थेषु मूढाः खरवत् वहन्ति॥

भावार्थ यह है कि किसी गधे के ऊपर आपने चंदन की लकड़ियों की गठरी रख दी हो, तो वो गधा सिर्फ उसके भार को ही जानता है, न कि चंदन की विशिष्टता को। उसी प्रकार मूर्ख लोग, कई शास्त्रों के अभ्यास करके भी गधे के भार वहन करने के समान उसके स्थूलार्थ को ही जानते है, गूढ़ार्थ या तत्वार्थ को नहीं।

तब के विरोध का कोई असर नहीं हुआ और आज भारतीय लोग स्वयं, देवदत्त पटनायक जैसे कुबुद्धि के रूप में उसी अनुवाद को आधार मान कर धर्म की विवेचना करते हैं और जो परिणाम है वो आपके सामने है। कभी महिषासुर को मूलनिवासी बताया जाता है, कभी व्यभिचारी, बलात्कारी रावण को महान बनाया जाता है, कभी राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा की आधी बात बता कर पूरे रामायण को नारीविरोधी बता दिया जाता है…

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस मुद्दे की, जिस ज्ञान की व्याख्या करने आप बैठे हैं, उसके समाज की, उसके संचित ज्ञान की, उससे जुड़े अंग-प्रत्यंग की समझ आपको होनी चाहिए। वरना ईसाई धर्म का पादरी जो स्त्रियों के पीरियड्स को ईव के पतन से जोड़ कर एक पाप की तरह देखता है, उसे यह समझ में नहीं आएगा कि कामख्या में किस देवी की, किस स्थिति में पूजा होती है। उनका समाज अलग है, अतः व्याख्या अलग होगी।

अब बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की

महामना मदन मोहन मालवीय ने जब बनारस में इस विश्वविद्यालय की नींव रखी थी, तो पूरा विश्वविद्यालय भारतीय छात्र-छात्राओं, अनुसंधानकर्ताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों से ले कर अकादमिक क्षेत्र के हर कार्य के लिए, बिना किसी मनाही के, किसी सीमा के सब के लिए समान रूप से उपलब्ध था। हालाँकि, पंडित जी ने मैक्स मूलर और ब्रिटेन के अन्य कलाकारों को हिन्दू धर्म की थातियों को, इसके ग्रंथों की व्याख्या को समझा होगा, अतः उन्होंने इस संस्थान में एक जगह ऐसी भी बनाई जहाँ स्पष्ट रूप से किसी भी गैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित था।

यह जगह थी ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’, जिसका पूर्व नाम ‘वैदिक महाविद्यालय’ था। इसका लक्ष्य यह नहीं था कि यह संकाय किसी को अपमानित कर रहा है, किसी के ऊपर सवाल उठा रहा है कि उसको हिन्दू धर्म में आने से मनाही है, या वो संस्कृत पढ़ या पढ़ा ही नहीं सकता। बिलकुल नहीं, क्योंकि इसी विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य के पठन-पाठन हेतु कला संकाय, यानी आर्ट्स फैकल्टी के अंतर्गत संस्कृत विभाग है। अतः यह कहना कि समुदाय विशेष को संस्कृत पढ़ाने से रोका जा रहा है, न सिर्फ गलत है बल्कि अपने स्तर पर आलस्यजनित धूर्तता भी है।

ऑपइंडिया ने बार-बार यह बताया है कि डॉक्टर फिरोज खान की विद्वता, उनके संस्कृत ज्ञान, और यहाँ तक कि उनके हिन्दू धर्म से स्नेह पर किसी ने सवाल नहीं उठाए हैं। न ही विश्वविद्यालय के धरनारत छात्रों को उस पर आपत्ति है। वो जहाँ से आते हैं, उनके बारे में कुछ छात्रों ने मुझे भी ईमेल के जरिए बताया कि वो प्रतिभावान हैं। इसलिए, इस पर विवाद नहीं है कि उन्हें संस्कृत आती है कि नहीं, और उनकी डिग्रियाँ किस भाषा में हैं, कहाँ से हैं।

अगर विश्वविद्यालय प्रशासन, या वीसी प्रोफेसर राकेश भटनागर, इसे सम्मान का मुद्दा बना कर डॉ फिरोज खान को इसी संकाय में रखवा लेते हैं, और इस पर विद्यार्थी उनकी कक्षा में जाने से इनकार करने लगें, जाएँ ही नहीं, तो प्रशासन क्या करेगा? उन्हें जबरदस्ती क्लास में बिठाएगा? डॉ फिरोज खान को ये बच्चे अगर आज नहीं स्वीकार रहे, तो जाहिर है कि उनसे वो कर्मकांड तो पढ़ेंगे नहीं। इसलिए भी, वामपंथी वीसी भटनागर जी को, जो विश्वविद्यालय परिसर के धार्मिक आयोजनों का हिस्सा बनने से हमेशा कतराते हैं, या वहाँ अनुपस्थिति रहते हैं, डॉ फिरोज खान को भविष्य में होने वाले नए तरह के विरोध से बचाना चाहिए।

भाषा और धर्मशास्त्रों की भाषा

विश्वविद्यालय के शिल्पकार मालवीय जी ने इस एक संकाय को हिन्दू धर्म विधान, मीमांसा, वेद-वेदांग, कर्मकांड, यज्ञ, अनुष्ठान आदि के लिए सिर्फ हिन्दुओं के लिए सीमित कर दिया था क्योंकि यहाँ अगर कोई विधर्मी आएगा, तो जाहिर है कि वो इसे अपने पूर्वग्रहों और अपने मजहबी संदर्भों से ही देखेगा। यहाँ पठन-पाठन के लिए आप, चाहे किसी भी जाति/वर्ग आदि के हों, पहले जनेऊ संस्कार कराते हैं (अगर न हुआ हो तो), फिर शास्त्रोचित तरीके से वेदाध्ययन हेतु ब्राह्मण बनते हैं, तब इसमें उतरते हैं।

मैं नहीं समझता कि डॉक्टर फिरोज खान जनेऊ पहनेंगे और फिर किसी के अंतिम संस्कार के कर्मकांड हेतु आवश्यक धार्मिक अनुष्ठानादि के लिए मार्गदर्शन दे पाएँगे। दे भी दें, तो मेरा प्रश्न है कि आवश्यकता क्या है? क्या हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठानों में संस्कृत भाषा के प्रयोग होने मात्र से वो सांस्कृतिक या धार्मिक अनुष्ठान न हो कर मात्र भाषाई बात हो जाएगी? क्या ‘कयामत के दिन सारे मुर्दे कब्र से बाहर निकलेंगे’ की बात मानने वाले अंतिम संस्कार के कर्मकांड में मृतक के अगले जन्म की बात पर सहजता से समझा सकेंगे?

अधिकतर लोग, जो आज बीएचयू के इस संकाय के छात्रों के विरोध में खड़े हो कर दूसरों को बिगट, या धर्मांध, साम्प्रदायिक और पता नहीं किन-किन विशेषणों से नवाज रहे हैं, वो संस्कृत को महज एक भाषा की तरह देख रहे हैं जिसका ज्ञान अगर फिरोज खान को है तो वो क्यों नहीं पढ़ा सकते। यहाँ ये तर्क लेने की भी आवश्यकता नहीं है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सुन्नी थियोलॉजी विभाग में कितने हिन्दू हैं।

तर्क यह है कि संस्कृत भाषा अलग बात है और हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों और धर्मविज्ञान से संबंधित साहित्य, जो कि धार्मिक प्रकृति के हैं, वो भी संस्कृत में हैं। जैसे कि आपको नमाज याद है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप बिना मुस्लिम बने, जामा मस्जिद के माइक पर अजान देने लगेंगे! भाषा का ज्ञान आपको भाषा सीखने, समझने, उसके साहित्य को समझने के लिए मददगार है, लेकिन जहाँ बात धर्म की है, मान्यताओं की है, आस्था की है, वहाँ ये तर्क बेकार हो जाता है कि ‘पढ़ाने दो न, क्या हो जाएगा’।

यहाँ से जो छात्र बाहर जाते हैं, वो किसी के जनेऊ संस्कार में मंत्र पढ़ते हैं, किसी के विवाह में अग्निदेव के सात फेरे लगवाते हैं। ये वही अग्नि है जिससे समुदाय विशेष वाले कट्टरपंथी बचते हैं। यहाँ के छात्र यज्ञ में हवनकुंड के सामने बैठते हैं और अभीष्ट की प्राप्ति के लिए एक तय तरीके से, शारीरिक और आत्मशुद्धि के बाद, आचरण करते हुए अनुष्ठान करते हैं। चूँकि इसकी भाषा संस्कृत है तो फिरोज या डेनियल को बिना यज्ञोपवीत पहनाए, वहाँ नहीं बिठाया जा सकता।

जब कुतर्क ही करना है तो यही कह दिया जाए कि जनेऊ क्या है, धागा ही तो है, पहना दो। जवाब यह है कि चूँकि आपकी समझ में कुछ चीजें नहीं आतीं तो शिवलिंग आपके लिए पत्थर हो जाएगा, मंगलसूत्र एक बंधन हो जाएगा, और मृतक को चिता पर जलाना एक क्रूर कृत्य। इसलिए एक भाषा को अकारण केन्द्र में मत रखिए क्योंकि संयोगवश उसी भाषा में हिन्दुओं के धर्मग्रंथ भी हैं।

कोई हिन्दू धर्म को प्रेम करता है उसे मत रोको…

अब बात उन लोगों की आती है जो डॉ कलाम, मोहम्मद रफी, परमवीर अब्दुल हमीद, बलिदान अशफाक आदि का नाम ले आते हैं कि उन्होंने हिन्दुओं के साथ मिल कर काम किया, कभी भेदभाव नहीं किया। ये तर्क भी लचड़ है और अनभिज्ञता से उपजा हुआ है। किसी ने इन लोगों की उपलब्धियों पर प्रशन्चिह्न लगाए क्या? किसी ने कहा कि मोहम्मद रफी को भजन नहीं गाने देंगे? किसी ने कहा कि महाभारत के संवाद डॉ राही मासूम रजा से नहीं लिखवाएँगे?

वो इसलिए नहीं कहा गया क्योंकि भारत की सर्वसमावेशी विरासत हैं आज के भारतीय। हिन्दुओं को इससे कभी समस्या नहीं रही कि उनके भजन कौन लिख रहा है और बिस्मिल्ला खाँ शहनाई पर क्या बजा रहे हैं। हमने उन्हें सम्मान दिया क्योंकि उन्होंने भारत की विरासत का मान बढ़ाया। डॉ फिरोज खान और बीएचयू के धर्म विज्ञान संकाय पर यह तर्क लागू नहीं होता। वहाँ भजन या मनोरंजन के लिए धारावाहिक नहीं बनाए जा रहे।

वहाँ हिन्दू धर्म के मूल विषयों की पढ़ाई ही नहीं होती बल्कि उनके तंत्र-मंत्र, यज्ञ-अनुष्ठान की विधियाँ बताई जाती हैं ताकि वहाँ से बाहर निकल कर वो विद्यार्थी वृहद समाज में पुरोहितों का भी कार्य कर सकें। अगर किसी बच्चे को सत्यनारायण भगवान के बनने वाले प्रसाद को पूजा से पहले खाने नहीं दिया जाता, तो वहाँ आपके वाले तर्क सही लगने लगेंगे कि ‘खा ही लेगा तो क्या होगा’।

यज्ञ करते BHU SVDV के छात्र

बात यह है कि बच्चे के जूठे हाथों से छूने से प्रसाद की शुद्धता प्रभावित होती है, इसलिए बेहतर है कि उसे प्रसाद से दूर रखा जाए। यह बच्चे के साथ भेदभाव नहीं है, यह एक तय विधि से चलना है ताकि अभीष्ट की प्राप्ति उसकी पूर्णता में हो। कल को दुर्गा की मूर्ति के आठ हाथ हटवा दिए जाएँ क्योंकि बहुतों को दस हाथ के होने का औचित्य समझ में नहीं आता?

फिरोज खान हिन्दू धर्म से प्रेम करते हैं, करते रहें। उनका स्वागत है। हम उनके गाए भजनों को सुनेंगे और अपने मंदिरों में भी बजाएँगे, इस बात को ले कर चर्चा हो ही नहीं रही। समस्या तो यही है कि किसी को यह भी नहीं पता कि संस्कृत विभाग अलग है और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय अलग है। चूँकि, दोनों में संस्कृत शब्द है, डॉ फिरोज के पास संस्कृत भाषा की डिग्री है, तो बवाल काट दो कि हिन्दू धर्मांध हो गए हैं, ये हमारी संस्कृति नहीं है, हमें ऐसे लोगों का स्वागत करना चाहिए!

क्या इसी स्वागत के नाम पर मंदिरों में क़व्वालियों का आयोजन कराया जाए कि ‘काली-काली जुल्फों के फंदे न डालो, हमें जिंदा रहने दो ऐ हुस्नवालों’? मंदिरों के रंगभवनों में भरतनाट्यम की जगह ‘शीला की जवानी’ पर टू-पीस बिकिनी में नृत्य का आयोजन हो क्योंकि दोनों तो नृत्य ही हैं और सुश्री कटरीना जी ने भरतनाट्यम की शिक्षा भी ली है! मैं ये तो कह ही नहीं रहा हूँ कि मस्जिदों के प्रांगण में बहुत सारी जगह होती है, वहाँ दशहरे में रामलीला का आयोजन होना चाहिए, और होली में होलिका दहन।

क्या ये सेकुलर होना है? या ये बेहूदगी है? आप धर्म को अपने नजरिए से मत देखिए, खास कर तब जब आप उस धर्म से वास्ता नहीं रखते, उसमें आपकी श्रद्धा या गहन आस्था नहीं हो। जब तक हम उसके मूल्यों को, उसके तत्वों को, उसके दर्शन को, उसके विज्ञान को नहीं समझते, उसे उनके पास ही रहने देना चाहिए जो समझते हैं। ये ‘क्या हो जाएगा’ वाली पीढ़ी अनभिज्ञता और अज्ञान में नहाई हुई है इसलिए उसके चश्में में बस संस्कृत ही नाच रहा है और सिर्फ मुझे गलत साबित करने के लिए वेदों के कुछ मंत्र, गोमांस खाते हुए सुना कर, बोल देगी कि ‘देखो तो, क्या हो गया, मैंने तो पढ़ दिया’।

हर जगह, हर दलील लागू नहीं होती। अचानक से ‘नारीविरोधी’ कहा जाने वाला रामायण, जिससे हिन्दू समाज प्रभावित है, और पितृसत्तात्मक हो गया है, संस्कृत भाषा का एक ग्रंथ नहीं हो जाता क्योंकि अभी आपके नैरेटिव को हिन्दू वाला एंगल सूट कर रहा है। उसे अभी आप ये नहीं कह सकते कि इसमें हिन्दुओं का क्या है, ये तो संस्कृत में लिखी हुई एक किताब है। कल तक वो हिन्दुओं की ही किताब थी। जैसे कि ‘योग’ करना कभी विशुद्ध हिन्दू चीज हो जाती है जिसे पाठ्यक्रम में शामिल करने का जेएनयू में ‘भगवाकरण’ के नाम पर विरोध होता है लेकिन जब आपकी इच्छा हो, तो कहेंगे ये तो व्यायाम है, इसको हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धर्म से क्यों जोड़ रहे हैं कि हिन्दुओं ने दुनिया को योग दिया।

प्रदर्शनकारी छात्रों को अपनी घृणा का पात्र न बनाएँ

हिन्दुओं ने ‘भक्ति आंदोलन’ के बाद से सनातन परंपराओं को सबसे ज्यादा बिगाड़ा है। किसी के घर में धर्म चर्चा नहीं होती, बच्चों को अपनी ही धार्मिक पुस्तकों का ज्ञान नहीं, सीता को महाभारत में पांडवों की पत्नी बताते हैं, और कुरुक्षेत्र में राम-रावण युद्ध देखते हैं। ये हुआ कैसे? इसके बीज मैक्स मूलर जैसों ने बो दिए थे जिसने वेदों को ज्ञान की निधि समझने की जगह गड़रियों का गीत कह दिया क्योंकि गड़रियों से ही भगवान आए हैं उनके, तो सब कुछ भेड़ चराते हुए ही प्राप्त हो जाता होगा!

सर्वसमावेशन और प्लूरलिज्म क्या है, इसके नाम पर भी लोग खेल जाते हैं। सर्वसमावेशन का मतलब यह नहीं है कि आपने किसी को अपने पास बुलाया और अपने मूल को भुला कर उसके तरीकों से रहने लगे। प्लूरलिस्ट होने का मतलब यह नहीं होता कि कई तरह के लोगों के साथ रहने के चक्कर में चर्च के पादरी हिन्दू हो जाएँ जिससे सारे ईसाई रिलीजन के लोगों को समस्या होने लगे। दूसरे मतों के सम्मान का कतई मतलब नहीं होता कि हम उन्हें अपने मतों को छेड़ने को लिए आमंत्रित करें।

मेल्टिंग पॉट, सहिष्णुता, प्लूरलिज्म आदि अपने मूल को बचाते हुए, दूसरों को ससम्मान उनके मूल को बचाने में सहयोग देना है। इसका मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि चूँकि उसे पता है कि मंदिर में घंटी बजाना होता है तो वो मंदिर की घंटी तक न पहुँचे तो हम उसे अपने सामने शिवलिंग पर लात रख कर घंटी तक पहुँचते देखते रहें, और कुछ न करें। साथ ही, ये प्लूरलिज्म म्यूचुअल होता है, एकमार्गी नहीं।

इसलिए, इन प्रदर्शनकारी छात्रों का समर्थन कीजिए अगर आपकी हिन्दू धर्म में आस्था है। इन्हें जो धर्मांध और विभाजनकारी कह रहे हैं, वो वही लोग हैं जिन्हें फर्क नहीं पड़ता कि अयोध्या में मंदिर बने या मस्जिद। ये वही लोग हैं जिन्हें माँ दुर्गा को वेश्या कहना अभिव्यक्ति आजादी लगती है। इन्होंने माँ सरस्वती की नग्न पेंटिंग करने वाले को महान बनाया है। इसलिए इन्हें इस बात में अंतर नहीं पता चल रहा संस्कृत भाषा और यज्ञ के संस्कृत श्लोकों में क्या अंतर है।

आप दरवाजे खोलिए, दीवाली में दीये जलाइए, होली में रंग खेलिए उनके साथ, ईद की सेवइयाँ खाइए, किसी को कई समस्या नहीं। ये उत्सव है। लेकिन अगर आप कह रहे हैं कि मेरे घर के कलश स्थापन में, कलश के नीचे की मिट्टी में छींटे जौ को कोई समुदाय विशेष वाला सिर्फ इसलिए छू देगा क्योंकि वो तो एक पौधा है, तो उसमें मुझे समस्या है। वो मेरे और मेरे आराध्य के बीच की शुद्धता और उस ऊर्जा के प्रवाह को प्रदूषित करने जैसा है। ऐसा मेरी अनुपस्थिति में हो, और मुझे पता न चले तो मैं कुछ नहीं कर सकता, लेकिन मेरे सामने ऐसा हो, तो वो मैं होने नहीं दूँगा।

पाकिस्तान के नदीम खान के जाल में फॅंस दुबई भागी मेरठ की युवती, पिता ने लव जिहाद बता लगाई गुहार

उत्तरप्रदेश के मेरठ के कंकरखेड़ा निवासी कपिल गुप्ता नामक एक शख्स ने ट्विटर पर अपनी बेटी को पाकिस्तानी युवक के चंगुल से छुड़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री, विदेश मंत्रालय और प्रदेश के मुख्यमंत्री को संदेश लिखा है।

उन्होंने ट्वीट किया है, “मैं एक 18 वर्षीय बेटी का लाचार पिता हूँ। मेरी मासूम बेटी को लव जिहाद के जाल में फँसा लिया गया है। वह लड़का पाकिस्तान से है, जो मेरी बेटी से पिछले कुछ समय से रोमियो बनकर बात कर रहा था। मेरी बेटी को बहला फुसलाकर दुबई ले गया है। न जाने मेरी बेटी किस हाल में होगी।”

कपिल गुप्ता नामक इस शख्स ने अपनी पीड़ा को बयान करते हुए एक और ट्वीट किया है। जिसमें उन्होंने गृह मंत्रालय, दुबई पुलिस, प्रधानमंत्री मोदी आदि से मदद माँगी है। उन्होंने बताया है कि वे इस संबंध में एसएसपी के दफ्तर कंकरखेड़ा में रिपोर्ट करवा चुके हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी बेटी का पासपोर्ट नंबर और लड़के की फोटो भी शेयर की है।

जिसके बाद दुबई स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने युवती के पिता को कॉल करके पूरे प्रकरण की जानकारी माँगी है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि जैसे ही उन्हें भारत से रिपोर्ट मिलेगी, वे आगे की प्रक्रिया के लिए त्वरित कार्रवाई करेंगे। बता दें कि दूतावास के अधिकारियों ने फेसबुक और इंस्टाग्राम मुख्यालय से भी रिपोर्ट माँगने की बात की है।

लड़की के पिता का कहना है कि उन्होंने कंकरखेड़ा में जहाँ इस मामले पर रिपोर्ट लिखवाई है वहाँ की पुलिस ने उनकी बेटी को ढूँढने के लिए हाथ खड़े कर दिए हैं। इसलिए उन्हें सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा और सिर्फ़ इसी काम के लिए उन्होंने ट्विटर अकाउंट खोला।

जानकारी के मुताबिक 18 नवंबर की रात कांसुलेट जनरल ऑफ इंडिया (सीजीआई) दुबई की तरफ से युवती के पिता को ट्वीट कर कहा गया,” आपकी बेटी को ढूँढने के लिए हमने दुबई की एजेंसियों से बात की है। लेकिन किसी संपर्क नंबर या पते के बगैर सूचना मिलना काफी कठिन रहेगा। हम हरसंभव प्रयास करेंगे।”

लड़की के पिता ने बताया, “हमारे पास बेटी का कोई फोन नंबर नहीं है, क्योंकि वह उस पाकिस्तानी युवक के साथ दुबई जा चुकी है। लेकिन हम आपको लड़के की इंस्टा और एफबी आईडी दे सकते हैं।” इसके बाद सीजीआई ने अपनी आईडी देते हुए उनसे लड़के की एफबी और इंस्टाग्राम आईडी की जानकारी माँगी।

बता दें पेशे से व्यापारी कपिल गुप्ता के इस ट्वीट को अब तक सोशल मीडिया पर ढाई हजार से ज्यादा बार रीट्वीट किया जा चुका है। लोग इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ का कहना है कि उन्होंने अपनी बेटी का पासपोर्ट बनवाया ही क्यों, तो कुछ का कहना है कि विदेश जाने से पहले घरवालों को इसकी जानकारी नहीं हुई ये आश्चर्यजनक है। बता दें अधिकांश लोग उनके ट्वीट पर कमेंट करके उनको हिम्मत दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उनकी बेटी मिल जाएगी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कपिल गुप्ता की बेटी फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए पाकिस्तानी युवक नदीम खान से मिली थी और 4 नवंबर को ही उसका पासपोर्ट बना था। इसके बाद 8 नवंबर की सुबह लड़की पासपोर्ट, शैक्षिक प्रमाण-पत्र और सात हजार रुपए के साथ लापता हो गई। खोजबीन शुरू हुई तो 10 नवंबर को लड़की के पिता ने सांसद राजेंद्र अग्रवाल से मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई। जिससे मेरठ पुलिस सक्रिय हुई और विदेशी क्षेत्रीय पंजीयन कार्यालय (एफआरआरओ) दिल्ली से संपर्क किया। 15 नवंबर को FRRO ने अपनी रिपोर्ट दी कि 8 नवंबर की रात युवती दिल्ली एयरपोर्ट से दुबई गई है। जिसके बाद परिवार ने कयास लगाया कि इसके पीछे नदीम ही है, जो पाक के एक पाँच सितारा होटल का मैनेजर है। उसने अपने प्रोफाइल में आई लव पाकिस्तान लिख रखा है।

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जम्मू-कश्मीर: छह महीने में पत्थरबाजी की 190 घटनाएँ, 765 की हुई गिरफ़्तारी

5 अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को मिलने वाला विशेष राज्य का दर्जा रद्द कर दिया। इसके बाद जम्मू-कश्मीर राज्य में शांति व्यवस्था की स्थिति को लेकर सरकार ने इस सम्बन्ध में आँकड़े पेश किए हैं। जम्मू-कश्मीर राज्य की शांति और स्थिरता के बारे में बात करते हुए लोकसभा में गृह-राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने मंगलवार को इसकी जानकारी दी।

संसद के निचले सदन में एक सवाल के जवाब में बोलते हुए रेड्डी ने बताया कि घाटी में 15 नवम्बर तक पत्थरबाज़ी के करीब 190 मामले दर्ज किए हैं। पत्थरबाज़ी की इन घटनाओं में 765 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने बताया कि राज्य में शांति बनाए रखने और पत्थरबाजी की घटनाओं पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए सरकार कई मोर्चों पर सक्रिय है। उन्होंने कहा कि माहौल बिगाड़ने वालों में एक बड़ी तादाद दंगाइयों और भीड़ उकसाने वालों की है। इसके लिए सरकार एहतियातन गिरफ़्तारी से लेकर पीएसए के तहत गिरफ़्तारी जैसे कदम उठा रही है।

रेड्डी ने हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठनों पर घाटी के लोगों को पत्थरबाज़ी के लिए उकसाने का आरोप लगाया। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ रेड्डी न बताया कि एनआईए ने टेरर फंडिंग के मामले में अभी तक 18 लोगों पर चार्जशीट तैयार की है।

घाटी में शांति और स्थिरता पर बोलते हुए रेड्डी ने बताया कि सरकार द्वारा कश्मीर पर फैसला लेने के कुछ महीने तक स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति कम थी मगर सरकार द्वारा लिए गए एहतियात के चलते कश्मीर में एग्ज़ाम देने वाले छात्रों का आँकड़ा अब 99.7 प्रतिशत है।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में गृह-राज्यमंत्री ने जानकारी देते हुए बताया कि कश्मीर प्रशासन के मुताबिक पिछले छह महीने में राज्य में 34 लाख, 10 हज़ार 219 सैलानी घूमने आए जिसमें कि 12 हज़ार 934 विदेशी पर्यटक भी शामिल थे। इसके ज़रिए राज्य को करीब 25.12 करोड़ रुपए की आमदनी हुई। उन्होंने यह भी बताया कि राज्य में हिंसा और उपद्रव के दौरान पम्प एक्शन गन का इस्तेमाल उन परिस्थितयों में किया गया जब नागरिकों की जान बचाने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं था।

संसद में बोलते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि घाटी में इन्टरनेट सेवाओं पर लगे प्रतिबन्ध उसी वक़्त हटाया जाएगा जब स्थानीय प्रशासन को लगेगा कि घाटी की स्थितियाँ सामान्य हैं। वर्तमान समय में इन्टरनेट की महत्ता को स्वीकार करते हुए अमित शाह ने इस बैन को सही ठहराते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में सभी अखबार और टीवी चैनल सुचारू रूपसे काम कर रहे हैं और अख़बारों के सर्कुलेशन में कोई कमी नहीं आई है।

मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के स्थानीय प्रशासन ने कहा था कि घाटी में लगाए गए प्रतिबन्ध धीरे-धीरे हटाए जाएँगे। बता दें कि हाल ही में घाटी में लगे प्रतिबंधों को लेकर मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि सरकार ने करीब 90 फीसदी प्रतिबन्ध हटा लिए हैं।

हिन्दू संस्थानों में सिर्फ़ हिन्दुओं की नियुक्ति क्यों नहीं: जीसस एंड मेरी कॉलेज के एड पर वरिष्ठ पत्रकार का सवाल

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में फ़िरोज़ ख़ान को ‘धर्म विज्ञान संकाय’ में कर्मकांड पढ़ाने के लिए भेजा गया है, जिसे लोग संस्कृत भाषा समझ कर उनका विरोध कर रहे छात्रों को ही भला-बुरा कह रहे हैं। कई लिबरल्स व अन्य लोग समझ रहे हैं कि बीएचयू में भेदभाव के तहत एक ‘मुस्लिम शिक्षक का विरोध’ हो रहा है। जबकि, ऐसा नहीं है। इस विभाग में यज्ञ और ज्योतिष जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। यह नियुक्ति बीएचयू के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय के मूल्यों एवं उनके द्वारा बनाए गए नियमों के भी ख़िलाफ़ है। छात्रों का आरोप है कि कुलपति मनमानी कर रहे हैं।

इसी क्रम में वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने एक अख़बार का एड शेयर कर के दिखाया कि किस तरह मुस्लिमों व ईसाइयों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में उसी ख़ास महजब के लोगों को विभिन्न पदों पर न सिर्फ़ नियुक्त किया जाता है, बल्कि इसके लिए सार्वजनिक आवेदन भी निकाले जाते हैं। यह सब खुल्लम-खुल्ला होता है और कोई मुँह नहीं खोलता। आखिर कथित अल्पसंख्यकों को कोई नाराज़ क्यों करे? प्रभु चावला ने अख़बार में छपे जिस एड की तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट कराया, वो ‘जीसस एंड मेरी’ का है। इसमें प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन आमंत्रित किया गया है।

लेकिन, सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है कि आवेदक के पास पादरी का ‘अनुशंसा पत्र’ होना चाहिए और उसके पास ‘बैप्टिज्म सर्टिफिकेट’ भी होना चाहिए। यानी पादरी की अनुशंसा और आपका ईसाई होना, ये दोनों ही ज़रूरी है। ऐसा किसी चर्च के नियम-क़ानून या कर्मकांड वाले विषय के लिए नहीं किया जा रहा, बल्कि कॉलेज के प्रधानाध्यापक के पद पर नियुक्ति के लिए किया जा रहा। फ़िरोज़ ख़ान वाले मामले में ग़लत तरीके से छात्रों पर आरोप लगाने वाले ऐसे अनगिनत घटनाओं पर चुप रहते हैं, जबकि, बीएचयू वाला मामला इससे एकदम अलग है।

‘द न्यूज़ इंडियन एक्सप्रेस’ के एडिटोरियल डायरेक्टर प्रभु चावला ने पूछा कि क्यों न हिन्दुओं द्वारा संचालित शिक्षण संस्थान अपने यहाँ विभिन्न पदों पर नियुक्ति के लिए शर्त रख दें कि केवल हिन्दू ही आवेदन करने के योग्य होंगे? उन्होंने लिबरलों से पूछा कि क्या तुमलोगों के पास इसका जवाब है कि हिन्दुओं को ऐसा करने का अधिकार क्यों नहीं है? इसके जवाब में अभिजीत मित्रा ने बताया कि ऐसी मजहबी चीजें ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के तहत आती हैं और कोई आवाज़ नहीं उठा पाता। उन्होंने कहा कि स्टीफेंस, जामिया और लोयला में हिन्दू छात्रों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, ये किसी से छिपा नहीं है।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के पूर्व एडिटोरियल डायरेक्टर प्रभु चावला के प्रश्नों से सहमति जताई है। इनका कहना है कि हिन्दुओं द्वारा संचालित संस्थानों को भी अब केवल हिन्दुओं की ही नियुक्ति करनी चाहिए।

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जब वामपंथियों और कॉन्ग्रेसियों ने महामना के BHU संविधान को मोलेस्ट कर ‘सेक्युलर’ बनाया

काशी हिन्दू विश्विद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों द्वारा संकाय में मुस्लिम सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है। डॉ.फिरोज खान की नियुक्ति को महज ‘संस्कृत भाषा’ का मुद्दा बनाकर मीडिया और सोशल मीडिया के कई वामपंथी क्रन्तिकारी अभी भी भ्रम फ़ैलाने में लगे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी और अधिकारों की लड़ाई के नाम पर इस पूरे मुद्दे को इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे ‘अधिकार’ और ‘संवैधानिक सुरक्षा’ केवल फिरोज खान को प्राप्त है। वही संविधान धर्म और उसके मूल्यों की रक्षा की भी गारंटी देता है। लेकिन, मीडिया गिरोह इस लाइन पर अड़ा है कि भजन गायक पिता रमजान के पुत्र फिरोज खान को संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने से रोका जा रहा है। उसे उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा जिससे फिरोज खान की भावनाएँ आहत हो रही हैं।

यहाँ यही मीडिया ‘गिरोह’ ये भूल जा रहा है कि क्यों वैदिक ग्रंथों, सनातन मूल्यों और धर्म विज्ञान की शिक्षा लेने गए एक विशेषीकृत संकाय के छात्रों को, जो आज भी विद्या अर्जन विधिवत गुरु-शिष्य परम्परा और उनके सारभूत मूल्यों के आधार पर ही करते आए हैं, एक मुस्लिम धर्मावलम्बी फिरोज खान को संस्कृत भाषा जानने और कुछ शास्त्र कंठस्थ होने के कारण अपना गुरु मान लें? क्या ऐसा करने से उन छात्रों की भावनाएँ आहत नहीं होंगी? क्या उन्हें अपने धर्म और शास्त्रों की शिक्षा उन्हीं से लेने का अधिकार नहीं है जो उस धर्म के हों और उस सनातन परंपरा और उसके अनुष्ठानों को जीते हों?

आज ऐसे कई मुद्दों पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिस पर आमतौर पर मुख्यधारा की मीडिया मौन है। आपको उन उद्देश्यों और उस दृष्टिकोण से भी परिचित कराऊँगा जिसे ध्यान में रखकर एक ही संस्थान में एक ही विषय के लिए एक अलग से विभाग, संस्कृत विभाग (कला संकाय में) बनाया गया और एक पूरा संकाय (संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय)। यही नहीं SVDV जिसका पूर्व नाम वैदिक महाविद्यालय था, के लिए निर्दिष्ट नियम मालवीय जी ने खुद एक शिलालेख पर अंकित करवा दिया ताकि इससे यहाँ प्रवेश करने वाला हर इंसान परिचित हो। कागजों पर लिखी बातें समय के ‘छद्म’ सेक्युलरिज्म के नाम पर बदली जा सकती हैं। शायद ऐसा उन्हें भी भान रहा हो कि मेरे जाने के बाद जिस उद्देश्य से BHU जैसा बड़ा संस्थान और उसमें भी हिन्दू धर्म और उसकी वैज्ञानिक व्याख्याओं के लिए अलग से एक संकाय संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान उन्होंने खड़ा किया ताकि उसकी मूल भावना सुरक्षित रहे। यह महाविद्यालय (संकाय) सनातन हिन्दू धर्म और वेद, व्याकरण, ज्योतिष, वैदिक दर्शन, धर्मागम, धर्मशास्त्र मीमांसा, जैन-बौद्ध दर्शन के साथ-साथ इन सबसे जुड़े साहित्य के निरंतर उन्नयन और संवर्धन में लगा रहे।


शिलालेख SVDV BHU

किसी भी संस्था की स्थापना के पीछे उसके संस्थापक का एक उद्देश्य होता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू’ शब्द और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ‘धर्म’ शब्द में संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय की बहुत सारी अवधारणाएँ समाहित हैं। आज भी SVDV के वेबसाइट पर उस संकाय की स्थापना का उद्देश्य साफ़ लिखा है:

SVDV की स्थापना 1918 में महामना द्वारा इस उद्देश्य से की गई थी कि प्राचीन भारतीय शास्त्रों, संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए, इस संकाय का प्रमुख उद्देश्य समाज में धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष और तंत्र के बारे में व्याप्त भ्रान्तियों को दूर करना है और विशेष रूप से समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए नैतिकता और धर्म के सर्वोपरि मूल्यों को बहाल करना है। यहाँ परंपरागत तरीकों के साथ-साथ मौखिक-सह-लिखित परंपरा को ध्यान में रखते हुए शास्त्रीय ग्रंथों की ‘स्ट्रिक्टली’ पढ़ाई होती है।”

संकाय की खुद उद्घोषणा है कि हम ग्रंथों के प्रत्येक शब्द की व्याख्या पर जोर देते हैं ताकि उनके ‘आवश्यक’ निहितार्थ को समझा जा सके। यही फ़िरोज़ खान की नियुक्ति के विरोध का आधार भी है। जिसे आप हमारे इस रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं।

अब आप उन तथ्यों को जानिए जो इस विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल में हैं। मालवीय जी के उन्हीं सिद्धांतों, विश्वविद्यालय के विज़न को खुद हाल ही में BHU के वर्तमान वाइसचांसलर JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर ने रीलिज किया। पहले देखिए उसमें क्या लिखा है। किताब के पहले पन्ने पर VC राकेश भटनागर का सन्देश भी है।

प्रस्तावना और BHU की स्थापना का उद्देश्य

विश्वविद्यालय की स्थापना के समय की प्रस्तावना में भी BHU के निर्माण का उद्देश्य साफ है। एक उद्धरण प्रस्तुत है, “जब दिसंबर में काशी में राष्ट्रीय महासभा हुई और उसी अवसर पर 31 दिसंबर 1905 को बरार के श्री वीएन महाजनी एमए के सभापतित्व में काशी के टाउन हॉल में एक बड़ी भारी सभा हुई थी। सब धर्मों के प्रतिनिधि देशभर के प्रसिद्ध शिक्षा प्रेमियों के सामने आज की यह योजना रखी गई। यहाँ भी हिंदू विश्वविद्यालय की योजना का सबने स्वागत किया। 1 जनवरी सन 1906 को वहीं कॉन्ग्रेस के पंडाल में हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा हुई थी।”

BHU का प्रस्ताव

अगले ही वर्ष 1907 में 20 से 26 जनवरी तक प्रयाग में परमहंस परिव्राजकाचार्य जगद्गुरु श्री स्वामी शंकराचार्य जी के सभापतित्व में सुप्रसिद्ध साधुओं तथा विद्वानों की सनातन धर्म महासभा में यह प्रस्ताव स्वीकार हो गया कि-

भारतीय विश्वविद्यालय के नाम से काशी में एक हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए, जिसके निम्नांकित उद्देश्य हों-

  • श्रुतियों तथा स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रम धर्म के पोषक, सनातन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए धर्म के शिक्षक तैयार करना।
  • संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन की अभिवृद्धि।
  • भारतीय भाषाओं तथा संस्कृत के द्वारा वैज्ञानिक तथा शिल्प-कला से संबंधित शिक्षा के प्रचार में योगदान देना।

विश्वविद्यालय में निम्नांकित संस्थाएँ होंगी-

वैदिक विद्यालय (वर्तमान में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय)- जहाँ वेद, वेदांग, स्मृति, इतिहास तथा पुराणों की शिक्षा दी जाएगी। ज्योतिष विभाग में एक ज्योतिष संबंधित तथा अंतरिक्ष विद्या संबंधित वेधशाला भी निर्मित की जाएगी।

वैदिक कॉलेज का कार्य उन हिंदुओं के अधिकार में होगा जो श्रुति, स्मृति तथा पुराणों द्वारा प्रतिपादित सनातन धर्म के सिद्धांतों को मानने वाले होंगे।

  • इस विश्वविद्यालय में वर्णाश्रम धर्म के नियमानुसार ही प्रवेश होगा।
  • इस विद्यालय (संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) के अतिरिक्त अन्य सभी विद्यालयों में सब धर्मावलंबियों तथा सब जातियों का प्रवेश हो सकेगा तथा संस्कृत भाषा के अन्य शाखाओं की शिक्षा जाति और सम्प्रदाय का भेदभाव किए बिना सबको दी जाएगी।

इतने से ही आपको इस विश्विद्यालय की स्थापना का उद्देश्य और इसके संस्थापक का दृष्टिकोण स्पष्ट हो गया होगा। आज इन्हीं मालवीय मूल्यों और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के उद्देश्यों के लिए SVDV के छात्र लड़ रहे हैं।

VC ने जिस किताब को लॉन्च किया, उसी में लिखी बातें शायद पढ़ी नहीं या पढ़कर भी ‘सेक्युलर’ होने के नाम पर उस निर्णय को मंजूरी दी, जिसे अभी तक संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के किसी अधिकारी या पूर्व के किसी भी वाईसचांसलर ने लाँघने की कोशिश नहीं की। या तो पहले के सभी रूढ़िवादी रहे होंगे या उनकी मालवीय जी के मूल्यों, उद्देश्यों और आदर्शों में श्रद्धा और आस्था रही होगी। उनके लिए मालवीय जी ‘एक सामान्य व्यक्ति’ नहीं थे। उन्होंने उस वक़्त हिन्दू धर्म और सनातन मूल्यों की सम्पूर्ण शिक्षा का दूरदर्शी सपना देखा जब देश गुलाम था। न केवल सपना देखा बल्कि उसके आदर्श स्थापित करने वाले महामानव रहे।

SVDV BHU

मालवीय जी के सेक्युलर होने पर कभी प्रश्न नहीं उठा, विश्विद्यालय में उन्होंने सभी धर्मों के प्रवेश को सुनिश्चित किया सिर्फ एक संकाय को छोड़कर जो हिन्दू धर्म और इसके वैज्ञानिक व्याख्या के लिए विशेषीकृत था। कहा जाता है कि बिरला के दान दिए पैसे से मंदिरनुमा बने इस संस्थान को वैदिक साहित्य, हिन्दू धर्म और सनातन मूल्यों के सतत प्रवाह को बनाए रखने के लिए ऐसा विशेष प्रावधान बनाया गया कि वहाँ सिर्फ वर्णाश्रम धर्म के अनुसार हिन्दुओं (बौद्ध, जैन, सिख क्योंकि ये भी अपने आप को मूलरूप से सनातनी ही मानते हैं) का प्रवेश होगा। अब तो विश्विद्यालय के ही छात्र कह रहे हैं कि यदि आज की तरह मालवीय जी ‘छद्म’ सेक्युलर होने के चक्कर में पड़े होते तो न आज BHU में विश्वनाथ मंदिर होता, जिसे अपने मृत्यु से पहले बिरला से उन्होंने वचन लिया था कि वो इसे पूरा कराएँगे और आज भी सत्र का आरम्भ वहाँ परिसर में स्थित विश्वनाथ मंदिर में रुद्राभिषेक से ही होता है। न मालवीय भवन में गीता पाठ होता, जिसमें वाईसचांसलर की अनुपस्थिति उनकी मालवीय मूल्यों के प्रति भावना को पहले ही प्रदर्शित कर स्थानीय मीडिया में चर्चा का विषय बन चुकी है।

स्थानीय मीडिया में ऐसी कई खबरें हैं

एक और बात आज जिस संविधान और BHU एक्ट पर VC अड़े हैं। उसे धीरे-धीरे मालवीय जी के न रहने पर कार्यकारिणी और BHU कोर्ट में बाहरी लोगों को घुसाकर बदला गया। उसमें भी सबसे अधिक संशोधन तब हुए जब कॉन्ग्रेस के शासन में वामपंथी प्रभाव से BHU ग्रसित हो चुका था। यहाँ BHU एक्ट का 1951 और अंतिम संशोधन 1999 का एक क्लॉज प्रस्तुत है। देखिए कैसे धीरे-धीरे विश्विद्यालय के मूल स्वरुप और भावना से खिलवाड़ किया गया।

BHU ACT -1951
संशोधन के बाद (अंतिम संशोधन -1999)

ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे विश्विद्यालय ‘सेक्युलर’ होने की राह पर बढ़ चला है। आज VC कह रहे कि मैं SVDV के शिलालेख को नहीं मानता। मेरे लिए देश का संविधान ही सब कुछ है और BHU एक्ट में कहीं नहीं लिखा है कि SVDV में मुस्लिम की नियुक्ति नहीं होगी। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि कल कोई वाइसचांसलर ये भी कह सकता है कि जब विश्विद्यालय में विश्वनाथ मंदिर है तो उसके बगल में मस्जिद या चर्च क्यों नहीं हो सकता। मालवीय भवन में सिर्फ गीता पाठ क्यों, वहाँ अजान और प्रेयर भी होंगे। क्योंकि लिखा तो ये भी कहीं नहीं है।

बावजूद इसके यह विश्विद्यालय सभी धर्मों को समाहित करने के साथ भी सनातन हिन्दू धर्म के मूल्यों और अपने संस्थापक महामना के आदर्शों को आत्मसात कर आगे बढ़ता रहा, किसी टकराव की नौबत नहीं आई। आज टकराव भी तब उत्पन्न हुआ है जब कहीं न कहीं मालवीय जी की मूल भावना और मूल्यों से खिलवाड़ हो रहा है। एक अदूरदर्शी कदम को नियमों का हवाला देकर सही ठहराया जा रहा है। जो आने वाले समय में हिन्दू धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षार्थ देश में एकमात्र बचे संकाय को भी अपने दूषण के आगोश में ले लेगा। फिर आज के SVDV के छात्रों की आशंका सही साबित होगी, जब मुस्लिम और ईसाई एक तरफ अल्पसंख्यक होने के नाम पर अपना मजहब और उसकी शुद्धता बनाए रखेंगे और दूसरी तरफ भजन, गीत, संगीत के आभूषणों के साथ संस्कृत भाषा सीखकर आपके हिन्दू धर्म, सनातन मूल्यों, वैदिक साहित्य और अनुष्ठानों की अपने तरह की व्याख्या करेंगे। तब आप सर्वधर्म समभाव का झुनझुना बजाते रहिएगा।

एशिया के सबसे बड़े फ़िल्म फेस्टिवल में ‘पर्रिकर’ को देख भावुक हुए लोग: देखें Video

अखंड एक निश्चय
प्रतिभा का संचय
कुछ यूँ हो एक योद्धा का परिचय
संस्कृति की धरोहर
सादगी का सरोवर
अनंत एक गूँज
अपना भाई मनोहर

गोवा की राजधानी में आयोजित एक मौके पर जैसे ही ये पंक्तियाँ गूँजी, वहाँ उपस्थित एक-एक व्यक्ति भावुक हो उठा। राज्यपाल सत्यपाल मलिक, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और श्रीपद नाइक सहित कई वरिष्ठ जन इस मौके पर मौजूद थे। आइए, जानते हैं कि आज गोवा में क्यों याद किए गए मनोहर पर्रिकर? दरअसल, ये मौक़ा एशिया के सबसे बड़े फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजन का था।

गोवा की राजधानी पणजी में 50वें ‘इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI)’ के दौरान गोवा के लोग पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को याद कर भावुक हो उठे। पर्रिकर के प्रयासों के कारण ही आईएफएफआई का आयोजन पणजी में हो पाया और ये फेस्टिवल गोवा की पहचान बन गया। इस वर्ष महानायक अमिताभ बच्चन और सुपरस्टार रजनीकांत जैसे वरिष्ठ अभिनेता इसका हिस्सा बने और उन्हें सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर पीआईबी ने पर्रिकर पर बनी फ़िल्म का एक वीडियो शेयर किया, जिसे देख कर न सिर्फ़ गोवा बल्कि पूरे भारत के लोगों के जेहन में मनोहर पर्रिकर की यादें ताज़ा हो गईं।

इस वीडियो में बताया गया है कि मनोहर पर्रिकर ने अपनी पत्नी से वादा किया था कि वो सार्वजनिक जीवन से विदा लेकर कभी न कभी निजी जीवन में वापस लौटेंगे और परिवार को पूरा समय देंगे। अफसोस ऐसा हो नहीं पाया, लेकिन अपने दोनों बेटों के लिए उन्होंने माँ और पिता, दोनों की ही भूमिका निभाई। उनकी पत्नी का निधन सन 2000 में ही हो गया था।

भारत के पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर पर बनी इस फ़िल्म को बॉलीवुड के फ़िल्म निर्माता करण जौहर ने पेश किया। इस फ़िल्म की शुरुआत में पर्रिकर की आवाज़ गूँजती है, जिसमें वह पद एवं गोपनीय की शपथ लेते दिखते हैं। इस फ़िल्म में बताया गया कि पर्रिकर ने कैसे इंजीनियरिंग का करियर छोड़ कर सार्वजनिक जीवन में क़दम रखा और सारी जिम्मेदारियाँ निभाई। इस फ़िल्म में बताया गया है:

“पर्रिकर जी के सार्वजनिक जीवन से औपचारिकताएँ शून्य हो गईं और उनके निजी जीवन की जिम्मेदारियाँ भी उनका हिस्सा बन गईं। अपने दोनों बेटों को माता और पिता का प्यार देते, वो गोवा के लिए भी एक पिता की छवि बन चुके थे। उनका जीवन सिर्फ़ अपने प्रदेश और वहाँ के लोगों से ही प्रभावित होता था। वो अक्सर मुलाकातियों से घिरे रहते थे और शायद ही उन्हें कोई ख़बर अख़बारों से पता चलती थीं। अपनी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने स्वयं को ही माध्यम चुना। इन योजनाओं में वैज्ञानिक सोच और सोशल इंजीनियरिंग का एक मिश्रण था। इनमें युवाओं के लिए स्टार्ट-अप योजनाएँ थीं तो बुजुर्गों के लिए पेंशन योजनाएँ। उनका व्यवहार विनम्र था और व्यक्तित्व सुलझा हुआ था।”

ऊपर संलग्न किए गए वीडियो में आप उस फ़िल्म को देख सकते हैं। इसमें मनोहर पर्रिकर के जीवन के कई महत्वपूर्ण पलों की झलकियाँ भी दिखाई गई हैं, जिन्हें देख कर आप भी पुराने दिनों में खो जाएँगे।

अमेरिका में बैठ भारतीय युवाओं को भड़काने वाले रवीश जी, मॉलिक्यूल नाक की जगह कहीं और भी धँस सकता है

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का अंतिम सहारा अब सड़क पर उतर कर होने वाला विरोध-प्रदर्शन ही रह गया है। अगर आप सोच रहे हैं कि रवीश डफली बजाते हुए सड़क पर लाल झंडा लिए उतरने की योजना बना रहे हैं, तो शायद आप उनकी घाघ-बुद्धि से परिचित नहीं हैं। वो भला ख़ुद क्यों सड़क पर आएँ? इसमें उनका घाटा है। सरकार का क्या जाता है? इसलिए, उनके धूर्त दिमाग ने नई योजना तैयार की है। क्यों न युवाओं, ख़ासकर छात्रों को ही भड़का कर सड़क पर उतार दिया जाए। साँप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। एनडीटीवी की टीआरपी पाताल में धँसते जा रही है और रवीश नाक में धँसने वाला मॉलिक्यूल बनाने की बात कर रहे हैं। उनका मीडिया संस्थान कंगाल होने की ओर अग्रसर है और वो युवाओं को बौद्धिक रूप से कंगाल बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

अफवाह ऐसे फैलाई जा रही है, जैसे लगता हो कि जेएनयू की फी काफ़ी महँगी है। जबकि देखा जाए तो विश्वविद्यालय ने सालाना 240 रुपए के ट्यूशन या 9 रुपए के लाइब्रेरी फी में कोई बदलाव नहीं किया है। बस हॉस्टल मैनुअल अपडेट हुआ है। जिन सेवाओं का छात्र इस्तेमाल करेंगे, उनका शुल्क देना होगा। शुल्क कम देना है, कम बिजली पानी यूज कीजिए। 10 रुपए से 300 रुपए हुए मासिक हॉस्टल फी को 3000% की वृद्धि बता कर प्रचारित किया जा रहा है। क्या ये भ्रामक नहीं? इससे जेएनयू महँगा तो नहीं हो जाता। उसकी तुलना उसके इर्द-गिर्द स्थित आईआईटी और आईआईएमसी से न ही करें तो बेहतर।

मुफ्त शिक्षा के लिए बजट कहाँ से आएगा? सरकार ने 12वीं तक की शिक्षा पहले ही मुफ़्त कर रखी है। जर्मनी और नॉर्वे जैसे देशों में उच्च-शिक्षा काफ़ी सस्ती है, लेकिन उसकी जनसंख्या से ज्यादा लोग तो बिहार के कई जिलों में रहते हैं। 130 करोड़ लोगों के देश में सभी के लिए मुफ्त शिक्षा की बात ही बेमानी है, जहाँ की जीडीपी अपना राजस्व घाटा कम करने के लिए संघर्ष कर रही हो। जेएनयू के आंदोलन के पीछे राजनीति हो रही है, इसमें कोई शक नहीं। सत्ता में अस्थिरता फैलाने की मंशा रखने वाले वामपंथी इस पर जवाब देंगे कि चीन की वामपंथी सरकार ने हॉन्गकॉन्ग के छात्रों के साथ कैसा व्यवहार किया है?

दरअसल, रवीश ने एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने युवाओं को सड़क पर उतर कर अराजकता फैलाने की अपील की। भले ही उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा किया लेकिन उनकी मोदी-विरोधी मंशा हिलोरे मारते हुए अपना प्रत्यक्ष परिचय दे रही थी। रवीश ने हिंदी पट्टी के नौजवानों को अभिशप्त करार दिया। उन्होंने हिंदी बेल्ट के युवाओं की राजनीतिक समझ पर सवाल खड़े किए। रवीश ने कहा कि यहाँ के युवाओं की राजनीतिक समझ थर्ड क्लास की है। वो कहते हैं कि थर्ड क्लास न होती तो वो भी जेएनयू वालों की तरह ही सड़क पर होते।

क्या रवीश चाहते हैं कि यूपी-बिहार के युवा भी अपने कॉलेज के किसी डीन को घेर कर दुर्व्यवहार करें, जिससे वो वहीं अचेत होकर गिर पड़े? उसकी बीवी और बच्ची गिड़गिड़ाते रहें, क्योंकि बीमार डीन को जल्दी अस्पताल पहुँचाना है और छात्र नारेबाजी करते हुए एम्बुलेंस को घेर कर खड़े हो जाएँ? जी हाँ, ऐसा जेएनयू में हुआ, जब प्रोफेसर उमेश कदम मरते-मरते बचे। क्या रवीश चाहते हैं कि हिंदी पट्टी की छात्राएँ भी अपने कॉलेज की किसी महिला प्रोफेसर के कपड़े फाड़ने का प्रयास करे? ऐसा जेएनयू में हुआ। उन्हीं छात्रों ने किया, एक हाथ में जो महिलाधिकार का झंडा और दूसरे हाथ में कैंडल लिए आए दिन सड़कों पर निकलती हैं।

युवाओं को भड़काते हुए रवीश कुमार का फेसबुक पोस्ट

कहीं रवीश की इच्छा ये तो नहीं कि बिहार के छात्र संगठनों में वामपंथ काबिज हो जाए और नेता झूठी अफवाह फैलाएँ कि कैम्पस में सीआरपीएफ तैनात कर छात्रों को पिटवाया जा रहा है। जेएनयू के छात्र नेता साकेत मून ने कुछ ऐसा ही किया। आवाज़ उठाने और सड़क पर उतरने के लिए युवाओं को जेएनयू से सीखने की सलाह देने वाले रवीश कहीं ऐसा तो नहीं चाहते कि यूपी-बिहार के कॉलेजों में भी महिला पत्रकारों के साथ बदतमीजी की जाए और उनके ‘मजे लेने’ की बात कही जाए। महिला मीडियाकर्मियों को घेर कर गुंडागर्दी करने का काम जेएनयू के उपद्रवी कर चुके हैं।

आखिर पढ़ने के लिए राजनीति करना अनिवार्य क्यों है? राजनीति की समझ होना, राजनीतिक चर्चा करना और सड़क पर उतर कर राजनीति करना अलग-अलग चीजें हैं। जब रवीश कहते हैं कि हिन्दू पट्टी के युवा चुप हैं, तब क्या वो उन्हें अराजकता फैलाते हुए जेएनयू के उपद्रवियों की तरह पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ कर क़ानून-व्यवस्था की ऐसी-तैसे करने को नहीं भड़का रहे? क्या रवीश कुमार जवाब देंगे कि सोमवार (नवंबर 18, 2019) को दिल्ली में उद्योग भवन, लोक कल्याण मार्ग, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और पटेल चौक मेट्रो स्टेशनों पर सेवाओं को ठप्प क्यों किया गया था? इससे कितने लोगों को परेशानी हुई, इसका कोई हिसाब नहीं। उस दिल्ली में ऐसा हुआ, जहाँ मेट्रो को सिटी की लाइफलाइन कहा जाता है।

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी भी तो इसी देश का हिस्सा है। वहाँ के छात्र भी तो युवा ही हैं। वो अपने ही विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके बारे में रवीश ने कभी लिखा क्या? बीएचयू में महमना का नियम चलेगा या फिर किसी वामपंथी वीसी की मनमानी? अगर ऐसा है तो वहाँ शिलापट्टों पर लिखे महामना के विचारों को उसी स्प्रे पेंट्स से मिटा देना चाहिए, जिसका प्रयोग कर के विवेकानंद को अपमानित किया गया था। और हाँ, उस स्प्रे पेंट की कीमत जेएनयू के कई छात्रों के हॉस्टल फी से ज्यादा होती है।

लेकिन, रवीश कुमार बीएचयू पर नहीं लिखेंगे। वे कैलिफोर्निया से अराजकता भड़काने की मीठी गोली फेंकेंगे। उन्होंने मंगलवार को ख़ुद बताया कि वो फ़िलहाल कैलिफोर्निया के कॉलेज ऑफ केमिस्ट्री में घूम रहे हैं। मज़ाकिया अंदाज़ में उन्होंने लिखा कि वो एक ऐसा मॉलिक्यूल बना रहे हैं, जो कम्युनल/ फेक टेक्स्ट के साथ अपने आप चिपक जाएगा। हालाँकि, उन्होंने ये नहीं बताया कि ये मॉलिक्यूल झूठ बोल कर और भ्रामक बातें कर के युवाओं को अराजकता फैलाने के लिए भड़काने वालों के कहाँ जाकर चिपकेगा? रवीश ने लिखा कि जैसे ही कोई कम्युनल टेक्स्ट पढ़ेगा, उसकी नाक से होते हुए मॉलिक्यूल दिमाग़ में अलार्म बजाने लगेगा।

अगर सच में ऐसा है तो रवीश को इस मॉलिक्यूल का प्रयोग ख़ुद पर तो कभी नहीं करना चाहिए। वरना वो डूबते चैनल एनडीटीवी के लो-टीआरपी शो ‘प्राइम टाइम’ में बैठेंगे तो उनके रुदन की जगह जनता को एक घंटे तक अलार्म की आवाज़ ही सुनने मिलेगी। दावा तो उन्होंने ये किया है कि ये अलार्म दिमाग में बजेगा लेकिन रवीश के मामले में कहाँ से आवाज़ निकलेगी, इस पर वो फ़िलहाल चुप हैं। राज्यसभा का 250वाँ सत्र चल रहा है। ऐसे में रवीश चाहते हैं कि इस ऐतिहासिक मौके पर कुछ ऐसा हो, जिससे जनता का ध्यान वहाँ से हट कर कहीं और चला जाए। सड़कों पर ख़ून बहे और अराजकता फैले।

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