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मौकापरस्त गठजोड़ों का दागदार इतिहास: वीपी सिंह से लेकर शिवसेना तक, जोड़-तोड़ में पिसती है जनता ही

महाराष्ट्र में शिवसेना ने अपने घमंड को दर्शाते हुए सत्ता पाने की लालसा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा से गठबन्ध तोड़ दिया। इसके बाद शिवसेना ने उद्धव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एनसीपी और कॉन्ग्रेस की स्तुति में क्या कुछ नहीं किया? मगर अंत में जो हुआ वह यह बताने के लिए काफी है कि चुनाव बाद बनी कई दलों की मिली-जुली सरकार हमेशा ही जनता को ठगने में लग जाती है। ऐसी सरकार में जितने भी दल होते हैं सभी अपने-अपने मुनाफाखोरी धंधे में जुट जाते हैं।

देश ने आपातकाल के बाद पहली गठबंधन सरकार देखी, मगर कुछ ही समय में यह साफ हो गया कि इस सरकार में शामिल सभी दलों के ज़्यादातर लोग आपस में ही एक दूसरे की टाँग खींचने में लगे हैं। इतिहास गवाह है कि भारतीय राजनीति में गठबंधन के घटक दलों का उद्देश्य सत्ता होता है। यही वजह है कि 1977 की मोरारजी देसाई सरकार में अहम पद पर रहने के बावजूद चरण सिंह ने पीएम पद की लालसा के लिए 1979 में इस गठबंधन को तहस-नहस कर दिया, मगर पूर्ववर्ती सरकार की तरह यह भी उसी तरीके से ढह गई। बल्कि उससे भी कम।

इसके बाद साल 1989-91 के दौर में आई गठबंधन सरकारों का भी वही हाल हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर चंद्रशेखर की अगुवाई वाली सरकारों में भी कोई खास स्थिरता नहीं दिखी। देवेगौड़ा और गुजराल जैसे प्रधानमंत्रियों की सरकार गिराने में भी दलगत मतभेदों का बड़ा हाथ रहा। कालांतर में भी कॉन्ग्रेसी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में भी डीएमके के नेताओं पर भ्रष्टाचार के कई आरोप सामने आए। यह तमाम उदाहरण इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि सरकार की व्यवस्था को चलाने के लिए गठबंधन की सरकारें जनहित से ज्यादा कुर्सी बचाए रखने के लिए समर्पित होती हैं। जनहित ही नहीं ,प्रशासन के मोर्चे पर भी अनेक दलों के गठबंधन की सरकार अक्सर विफल रहती हैं। ऐसे में कुर्सी की जोड़-तोड़ करने वाली पार्टियों के शासन में जनता ही पिसती है।

यह सच है कि एक समय महाराष्ट्र में बाला साहेब की तूती बोलती थी। एक इशारे पर मुंबई थम जाया करती थी। उनकी अगुवाई में शिवसेना का मानो एक छत्रराज चलता था। उनके न रहने के बाद ही इस मामले को लेकर शक गहरा गया था कि उनकी इस विरासत को सहेजने में उनकी अगली पीढ़ी और उसके कार्यकर्ता कितने सक्षम साबित होंगे। यह सच है कि शिवसेना ने अब वह हनक ही खो दी जिसके चलते वह सत्ता में बैठे को भी आँख दिखाने की ताकत रखती थी।

विचारधारा में अंतर न होते हुए भी जब 50-50 के फॉर्मूले पर शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन तोड़कर एनसीपी और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों संग विलय की जो उत्सुकता दिखाई, उसने जनता के सामने उसके सत्तालोलुप चरित्र को सामने लाकर रख दिया। ट्विटर पर #ShivsenaCheatsMaharashtra जैसे ट्रेंड किसी राजनीतिक दल नहीं बल्कि आम लोगों की भावनाएँ दर्शा रहे थे। महाराष्ट्र के लोगों के लिए यह उनके द्वारा शिवसेना को भरोसे पर दिए गए वोट का सौदा करने जैसा था।

जिस शिवसेना से जनता उम्मीदें लगाए बैठी थी, वही शिवसेना अगर एनसीपी जैसे दलों से अपनी पार्टी लाइन और विचारधारा को लेकर समझौता कर सकती है, सत्ता में बैठने के लिए अपने ही वोटरों के भरोसे का सौदा कर सकती है तो क्या इस बात का क्या भरोसा कि वह सत्ता में बैठकर जनहित का काम करे? स्वाभाविक है कि जिसके रहमोकरम पर सरकार चलेगी, उसके प्रति नतमस्तक रहना उसकी (शिवसेना की) अघोषित ज़िम्मेदारी रहेगी। देश और देश के राज्यों में मिली-जुली सरकारें राजनीतिक दलों के पेट भरने का एक ऐसा जरिया होती हैं जहाँ जनता के कष्टों की सुनवाई अनिश्चितकाल तक टल जाती है। महाराष्ट्र के सन्दर्भ में यह सोचना बहुत ज़रूरी झो जाता है कि तीन ऐसी पार्टियाँ (जो एक दूसरे की हमेशा से धुर-विरोधी रहीं) – एनसीपी, शिवसेना और कॉन्ग्रेस यदि एक साथ गठबंधन में शामिल होतीं तो राज्य सरकार और उसके लोगों का क्या ही हश्र होता।

1999 में विदेश मूल के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी के अन्दर से सोनिया गाँधी का विरोध करने वालों में सबसे अग्रणी नेता शरद पवार खुद थे। दरअसल पवार सोनिया को इस मुद्दे पर पीछे करके पार्टी की और से पीएम पद पर अपनी दावेदारी पेश करना चाहते थे। मगर इसके उलट उनका यह दाँव उन्हें ही भारी पड़ गया। उनकी हरकतों की भनक लगने पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने उन्हें ही निष्कासित कर दिया। 20 साल बाद, वही शरद पवार महाराष्ट्र में सरकार बनाने और शिवसेना को समर्थन देने के लिए सोनिया की सलाह लेने पहुँच गए थे। यहाँ तक कि उसके तुरंत बाद हुए 1999 के विधानसभा चुनावों के बाद वो फिर उसी कॉन्ग्रेस को समर्थन दे बैठे।

बालासाहेब ठाकरे की राजनीति ही हिंदुत्व से शुरू हुई। उन्होंने राजनीतिक संगठन के रूप में शिवसेना बनाई। भारतीय राजनीति के इतिहास में हिन्दू ह्रदय सम्राट’ शब्द उन्ही के लिए संबोधन में इस्तेमाल होता था। उनकी लड़ाई सिर्फ हिंदुत्व के लिए ही नहीं बल्कि छद्म सेकुलरिज्म पर भी थी। वही छद्म सेकुलरिज्म, जिसे कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने समाज के वर्ग विशेष का वोट लेने का जरिया बना लिया था। तीनों पार्टियों की विचारधारा, उनमे मौजूद भिन्नता खुद यह बताती है कि अगर यह गठबंधन सफल भी होता तो इस त्रिशंकु से जनहित की उम्मीद करना एक भूल होती।

भारत में जोड़-तोड़ की राजनीति नई नहीं है, मगर भारतीय राजनीति में ऐसी सरकारों की स्थिरता हमेशा सवालों के घेरे में रही है। दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी तक, अगर बहुमत न हो, तो त्रिशंकु सरकारों ने देश की प्रगति अपने फैसलों और नीतियों के ज़रिए कितना ध्यान दिया यह एक प्रश्न चिन्ह है।

बढ़ती महँगाई का विरोध करने निकले कॉन्ग्रेसी: नीतीश की पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर लाठियों से पीटा

बिहार के पटना में बढ़ती महँगाई, आर्थिक मंदी और बेरोजगारी समेत अन्य मुद्दों को लेकर आज बिहार कॉन्ग्रेस ने ‘जन वेदना मार्च’ निकाला।  इस दौरान कॉन्ग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने आँसू गैस के गोले दागे, लाठीचार्ज और वाटर कैनन से पानी की बौछार भी की।

पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किए जाने से क़रीब एक दर्जन से अधिक पार्टी कार्यकर्ताओं के घायल होने की ख़बर है। इस दौरान लाठीचार्ज और पानी की बौछार से कॉन्ग्रेस नेता व कार्यकर्ता गिरते-पड़ते इधर-उधर भागने लगे। बता दें कि इस विरोध-प्रदर्शन रैली का नेतृत्व अधिकार पार्टी के अध्यक्ष पप्पू यादव ख़ुद कर रहे थे।

दरअसल, बिहार में भ्रष्टाचार और क़ानून-व्यवस्था के मुद्दे को लेकर कॉन्ग्रेस ने पटना में प्रदेश मुख्यालय सदाकत आश्रम से जन वेदना मार्च निकाला। यह विरोध मार्च शहर के विभिन्न मार्गों से होता हुआ प्रतिबंधित क्षेत्र हड़ताली मोड़ जैसे ही पहुँचा वहाँ पहले से दंडाधिकारी के नेतृत्व में मौजूद पुलिस के जवानों ने मार्च को आगे बढ़ने से रोक दिया।

इसके बाद कार्यकर्ता उग्र हो गए और पुलिस एवं कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच तीखी नोक-झोंक हुई। कार्यकर्ता आगे बढ़ने की कोशिश में लगे थे तभी पुलिस की ओर से वाटर कैनन के बाद लाठीचार्ज किया गया।

ख़बर के अनुसार, इस विरोध प्रदर्शन में कॉन्ग्रेस के विधायक रामदेव घायल हो गए, उनके हाथ और सिर में चोटें आई हैं। घायल होने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान उन्होंने पुलिस पर आरोप लगाया। पुलिस ने इस घटना के बाद कॉन्ग्रेस के कई नेताओं को हिरासत में ले लिया। इनमें सांसद अखिलेश सिंह, एमएलसी प्रेमचंद मिश्रा, प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा शामिल हैं, जिन्हें पुलिस कोतवाली थाना ले गई।

कॉन्ग्रेस नेताओं के हिरासत में लिए जाने की सूचना मिलते ही RLSP प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी कोतवाली थाना पहुँचे, जहाँ उन्होंने कॉन्ग्रेस के मॉर्च में हुए लाठीचार्ज की कड़ी निंदा की और कहा कि नीतीश सरकार, विरोधियों की आवाज़ को दबाना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार नहीं चाहती कि विपक्ष कोई किसी मुद्दे का विरोध करे और आंदोलन करे। आंदोलन करने पर नीतीश सरकार आँसू गैस के गोले छोड़ती है। लोगों पर पानी की बौछार और लाठियाँ बरसाती है। 

कुशवाहा ने इस घटना पर नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा कि अब यह लड़ाई केवल कॉन्ग्रेस की नहीं बल्कि महागठबन्धन की भी है। हम शांत नहीं बैठेंगे और सरकार पर ज़ोरदार प्रहार होगा। उन्होंने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि हम लोग तेजस्वी यादव से बात करेंगे और पुलिस की लाठीचार्ज का मुद्दा सदन में भी उठाएँगे।

अजित पवार ने दिया PM मोदी को धन्यवाद: कहा- वो महाराष्ट्र में स्थिर सरकार सुनिश्चित करेंगे

महाराष्ट्र में सरकार गठन के बाद से ही राजनीतिक गलियारे में काफ़ी तेज़ हलचल देखने को मिल रही है। जहाँ एक तरफ़ राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) ने 51 विधायकों के समर्थन का दावा किया है, वहीं अजित पवार भाजपा का साथ छोड़ने को तैयार नहीं है। इस कड़ी में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्याद देते हुए कहा कि वो महाराष्ट्र में स्थिर सरकार सुनिश्चित करेंगे और जनता के कल्याण के लिए मेहनत करेंगे। इस बात का ज़िक्र उन्होंने सेशल मीडिया पर पीएम मोदी के ट्वीट के जवाब में किया।

इसी के साथ अजित पवार ने अपने बायो को अपडेट करते हुए महाराष्ट्र का उप-मुख्यमंत्री मेंशन कर दिया।

उधर, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने NCP के विधायकों को संबोधित करते हुए कहा, “चिंता मत करो, यह रिश्ता लंबा चलेगा, हमारा गठबंधन लंबा चलेगा।”

NCP नेता और महाराष्ट्र के नव नियुक्त उप-मुख्यमंत्री अजित पवार को पार्टी द्वारा मनाने की सारी कोशिशें फेल होती नज़र आ रही हैं। लाख मनाए जाने के बावजूद वो अपने फ़ैसले पर अटल हैं। NCP के विधायक दल के नेता जयंत पाटिल ने अजित पवार से मुलाक़ात कर उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।

वहीं, NCP नेता नवाब मलिक ने कहा था कि सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया कि पार्टी अजित पवार के फ़ैसले का समर्थन नहीं करती और उन्हें NCP विधायक दल के नेता के रूप में हटा दिया गया। नए नेता जयंत पाटिल को इस पद की ज़िम्मेदारी दी गई है। वहीं, अजित पवार का कहना है कि NCP का हित भाजपा के साथ महाराष्ट्र में सरकार बने रहने में है।

जनेऊ पहने तिरुपति दर्शन करने पहुँचे CJI बोबड़े: कहा- 40 साल से आ रहा हूँ, आज अपने आप में नया अनुभव

भारत के मुख्य न्यायाधीश के अरविन्द बोबड़े शनिवार को तिरुपति में भगवान वेंकटेश के दर्शन करने पहुँचे। इससे पहले सोमवार को बोबड़े ने देश के 47वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली थी। तिरुपति मंदिर के एक अधिकारी ने बताया कि सीजेआई बोबड़े यहाँ दर्शन करने शनिवार को आए थे। उन्होंने यहाँ पवित्र सहस्र दीपलंकर पूजा में भी भाग लिया और मंडप में भगवान वेंकटेश की प्रतिमा की पूजा की।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सीजेआई यहाँ जाने के लिए रेनीगुंटा हवाई अड्डे से आए थे। इस दौरान उन्हें रिसीव करने आन्ध्र प्रद्रेश उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश जीतेंद्र कुमार कई अन्य अधिकारियों सहित पहुँचे थे। मंदिर प्रशासन के अधिकारी ने बताया कि मंदिर में पवित्र कुंड के किनारे बने श्री वराह स्वामी मंदिर और आसपास के पवित्र स्थलों के भी दर्शन किए। बोबड़े ने इस दौरान शनिवार रात तिरुमला में ही ठहर कर विश्राम किया और रविवार सुबह भगवान वेंकटेश के दर्शन किए।

इस दौरान न्यायमूर्ति बोबड़े ने कहा कि “मैं वेंकटेश मंदिर के दर्शन करने चालीस साल से आ रहा हूँ लेकिन इस बार दर्शन करने का अनुभव अपने आप में नया है।” इस दौरान उन्होंने मंदिर के गर्भ-गृह में अपने बेटे श्रीनिवास बोबड़े के साथ पूजा अर्चना की थी। मंदिर के रखरखाव को लेकर उन्होंने अधिकारियों की सराहना भी की।

बता दें कि यह मंदिर तिरुमला की पहाड़ियों पर स्थित है जोकि भगवान वेंकटेश को समर्पित है। दक्षिण भारत में स्थित इस मंदिर को पूरे भारत में हिन्दू आस्था का एक अहम केंद्र माना जाता है। बता दें कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब न्यायपालिका के सर्वोच्च पर पर बैठे व्यक्ति ने हिन्दू मंदिर जाकर उसके प्रति अपनी आस्था व्यक्त की हो। बोबड़े से पूर्व तकरीबन साढ़े 13 महीनों तक मुख्य न्यायधीश रह चुके भारत के सीजेआई रंजन गोगोई भी अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले पत्नी सहित इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने पहुँचे थे।

‘हमारे 4 MLA को बीजेपी ने छिपा रखा है, वो लगातार सम्पर्क में हैं, जल्द लौटेंगे’

महाराष्ट्र में भले ही नई सरकार का गठन हो गया हो, लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल का दौर अब भी जारी है। अजित पवार के उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही NCP, शिवसेना की तीखी प्रतिक्रियाएँ लगातार सामने आ रही हैं। कहीं, विधायकों के लापता होने की ख़बरें हैं, तो कहीं बीजेपी पर विधायकों को बरगलाने का आरोप लग रहा है। NCP नेता नवाब मलिक ने अपने हालिया बयान में दावा किया है कि उनके चार विधायकों को बीजेपी ने कहीं छिपा रखा है।

मीडिया से मुख़ातिब होते हुए उन्होंने कहा, “50 विधायक हमारे साथ हैं, लेकिन हर कोई होटल में नहीं है, 4 विधायक जो भाजपा के लोगों द्वारा कहीं छिपाए गए हैं, लगातार हमारे सम्पर्क में हैं और निश्चित रूप से वे वापस आएँगे।” इससे पहले उन्होंने दावा किया था कि हमारे पास नंबर है और फ्लोर टेस्ट में फडणवीस सरकार गिर जाएगी। साथ ही उन्होंने फडणवीस के इस्तीफ़े की माँग भी की।

इसके अलावा, नवाब मलिक उस टीम का हिस्सा थे, जिसने न्यूनतम साझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) की चर्चा की और राज्य में सरकार बनाने के लिए NCP-शिवसेना और कॉन्ग्रेस को एक साथ लाने में अहम भूमिका निभाई थी। मलिक ने अजित पवार पर आरोप लगाया था कि उन्होंने हाज़िरी के लिए विधायकों के लिए गए हस्ताक्षरों का दुरुपयोग किया है।  

बता दें कि महाराष्ट्र में जारी सियासी उठापठक के बीच एनसीपी के वे दो विधायक सामने आ गए हैं जो गुमशुदा बताए जा रहे थे। विधायक दौलत दारोगा और नितिन पवार की गुमशुदगी को लेकर शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। दोनों ने सामने आने के बाद एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और शनिवार को राज्य के उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले अजित पवार, दोनों के प्रति निष्ठा जताई।

यह बेहद दिलचस्प है क्योंकि अजित पवार के भाजपा को समर्थन देने के बाद शरद पवार ने उन्हें विधायक दल के नेता पद से हटा दिया था। उन्होंने यह भी कहा था कि बीजेपी को समर्थन अजित का व्यक्तिगत फैसला है न कि पार्टी का। इसके बाद एनसीपी विधायकों की बैठक भी हुई थी। बैठक के बाद पार्टी प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा था कि केवल चार-पॉंच विधायक ही नेतृत्व के साथ नहीं हैं।

ग़ौरतलब है कि फडणवीस और अजित पवार के शपथ ग्रहण को शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दे रखी है। सोमवार को इस मामले में तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई करते हुए तत्काल बहुमत परीक्षण की मॉंग नहीं मानी। अदालत ने राज्यपाल का आदेश और फडणवीस की तरफ से उन्हें सौंपे गए समर्थन पत्र की कॉपी मंगलवार को पेश करने का निर्देश दिया है।

अजित के घर में देखे गए शिवसेना नेता: शरद पवार ने कहा- NCP भाजपा के साथ नहीं, भतीजा ग़लत बोल रहा

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अजित पवार के ट्विटर पर फॉलोवर्स की संख्या बढ़ गई है। उन्होंने एक-एक कर सभी की बधाई का धन्यवाद दिया। उनके घर पर भी हलचल बढ़ गई है और वो एक-एक कर अपने गुट के नेताओं से मिल रहे हैं। इस दौरान शिवसेना नेता नरेंद्र पाटिल अजित पवार के घर उनसे मिलने पहुँचे। भाजपा नेता निरंजन डावखरे भी अजित पवार के आवास पर पहुँचे। पवार लगातार बैठक कर रहे हैं और अपने गुट के नेताओं के साथ विचार-विमर्श कर रहे हैं। हालाँकि, शिवसेना नेता अजित पवार के घर क्यों पहुँचे हैं, इस बारे में अभी कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया है।’

अजित पवार ने कहा कि एनसीपी उनकी पार्टी है और उन्होंने न तो पार्टी छोड़ी है और न ही भविष्य में ऐसा करेंगे। उन्होंने कहा कि शरद पवार उनके नेता हैं और भाजपा-एनसीपी का गठबंधन हो चुका है। शरद पवार ने अपने भतीजे के इस बयान का खंडन करते हुए कहा है कि ये भ्रामक और ग़लत है। सीनियर पवार ने आरोप लगाया कि अजित जनता के बीच ग़लत सन्देश देने और असमंजस की स्थिति पैदा करने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं। चाचा-भतीजा के बीच इस ‘ट्विटर वॉर’ के कारण महाराष्ट्र की लड़ाई और दिलचस्प हो गई है। शरद पवार ने कहा कि एनसीपी शिवसेना और कॉन्ग्रेस के साथ है। जबकि अजित ने कहा था कि एनसीपी भाजपा के साथ है।

उधर भाजपा विधायकों की भी बैठक ख़त्म हो गई है। बैठक के बाद भाजपा नेता आशीष शेलार ने कहा कि भाजपा आराम से बहुमत साबित कर देगी। उन्होंने बताया कि भाजपा का समर्थन कर रहे अन्य निर्दलीय विधायकों की बैठक किसी अन्य स्थल पर होगी। उधर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने आरोप लगाया कि भाजपा सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा समय चाहती है ताकि कॉन्ग्रेस विधायकों को प्रलोभन देकर खरीद सके। चव्हाण ने कहा कि विधानसभा के सबसे वरिष्ठ नेता को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाना चाहिए।

शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी, तीनों दलों के विधायक अलग-अलग होटलों में रुके हुए हैं। उद्धव ठाकरे ने इन विधयकों से मुलाक़ात की। उन्होंने और शरद पवार ने एनसीपी विधायकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि उनका ये गठबंधन लम्बे समय तक चलेगा। पवार ने अपने विधायकों को ढाँढस बंधाते हुए कहा कि घबराने की बात नहीं है क्योंकि विपक्षी दलों के पास संख्याबल है।

उद्धव के CM बनने का सपना टूटा: शिवसेना समर्थक ने नस काटकर की आत्महत्या की कोशिश

महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही सूबे की राजनीति में कोहराम मचा हुआ है। शिवसेना ने भाजपा के साथ अपना चुनाव पूर्व गठबंधन तोड़ दिया। शनिवार को जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में देवेन्द्र फडणवीस ने शपथ ली। उस शपथ के साथ ही उद्धव ठाकरे के हाथ से सीएम पद की कुर्सी चली गई।

सियासी उठापटक में शिवसेना की हालत ने उसके समर्थकों को काफी हतोत्साहित कर दिया है। उद्धव ठाकरे के सीएम न बन पाने से आहत होकर पार्टी के ही एक व्यक्ति ने आत्महत्या की कोशिश की।

मीडिया में आ रहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक मुंबई से 580 किलोमीटर दूर उमरी गाँव के रहने वाले रमेश जाधव ने फडणवीस के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की खबर सुनते ही ब्लेड से अपना हाथ काट लिया। मामले की ज्यादा जानकारी देते हुए दिग्रास पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने बताया कि यह घटना वाशिम जिले के मानोरा चौक की है।

उन्होंने बताया कि जैसे ही चौराहे पर खड़े ट्रैफिक पुलिस के पुलिसकर्मी ने उसे (जाधव को) अपना हाथ काटते देखा तो वह फ़ौरन उसके पास दौड़कर चले गए। इसके बाद शिवसेना के उस समर्थक को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उसका इलाज किया गया। मामले की जाँच करने वाले एक अधिकारी के अनुसार रमेश ने शराब पी हुई थी, उसने यह हरकत भी शराब के नशे में की।

बता दें कि महाराष्ट्र में चल रहे सियासी ड्रामे के बीच बीजेपी और एनसीपी के नेता अजीत पवार ने शनिवार सुबह आपस में गठबंधन कर लिया था। इसके बाद देवेन्द्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजीत पवार ने उप-मुख्यमंत्री की शपथ ली थी। हालाँकि इससे एक रात पहले शिवसेना के नेता संजय राउत ने एलान किया था कि उद्धव ठाकरे अगले मुख्यमंत्री होंगे मगर इससे पहले कि वह अपना अगला दाँव खेल पाते। भाजपा ने पहले ही खेल पलट कर अपनी सरकार बना ली।

अली मियाँ से ओवैसी तक केवल चेहरे बदले, नहीं मिटा रामलला पर मन का खोट

हॉं, हमने कह दिया अकीदा और मस्जिद बेची नहीं जा सकती, न ही कहीं और ले जाई जा सकती है। मस्जिद में जब एक बार नमाज अदा कर दी जाती है, तब से वह खुदा की हो जाती है। खुदा की चीज को हम कैसे किसी को दे सकते हैं।

अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढॉंचा गिराए जाने से भी पहले यह बात ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना सैयद अबुल हसन नदवी उर्फ़ अली मियॉं ने कही थी। सितंबर 1992 में जनसत्ता को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने यह बात तब कही जब उनसे पूछा गया- क्या आप इस विवाद के सिलसिले में अंतिम बार 18 अगस्त को प्रधानमंत्री से मिले थे?

27 साल पुराना ये बयान आपको इसलिए याद दिलाया ताकि आप राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से मुस्लिम पक्ष खासकर, एआईएमपीएलबी और जमीयत-उलेमा-ए-हिंद जैसे मुस्लिम संगठनों तथा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी जैसों के स्वघोषित नुमाइंदों के बयानों पीछे छिपी मंशा को समझ सकें। एआईएमपीएलबी के मौजूदा सचिव जफरयाब जिलानी ने न्यूज एजेंसी आईएनएस को दिए हालिया इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शरीयत के खिलाफ बताया है। उनसे फैसले की ज्यादातर तबकों में सराहना होने और इस मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पु​नर्विचार याचिका दायर नहीं करने को लेकर सवाल पूछा गया था। जिलानी ने यह भी कहा कि चाहे समुदाय विशेष की जितने लोग इस फैसले का समर्थन करे कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही सभी के विचारों पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान जिलानी ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पैरवी की थी। एआईएमपीएलबी जहॉं इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला कर चुका है, वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इससे इनकार किया है। पुनर्विचार याचिका दायर करना कानूनी हक है और इस फैसले को लेकर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। लेकिन, इसकी पीछे की मंशा की चुगली खुद इनके वो बयान करते हैं, जो इन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट में 16 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई पूरी होने के अगले दिन जिलानी ने कहा था- अयोध्या मसले पर किसी तरह की मध्यस्थता का अब कोई मतलब नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का जो भी निर्णय आएगा मानेंगे। बोर्ड के ही एक अन्य सदस्य सैयद अतहर अली ने कहा था- यह एक भूमि विवाद है। हमने कोर्ट में पर्याप्त साक्ष्य पेश किए हैं। कोर्ट का जो भी फैसला होगा हम उसका सम्मान करेंगे। लेकिन नौ नवंबर फैसला आते ही जिलानी के सुर बदलने लगे। फैसले के तत्काल बाद उन्होंने कहा- हम फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। फैसले में कई विरोध हैं, इसलिए हम पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। इसके बाद एआईएमपीएलबी ने पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला कर लिए तो 17 नवंबर को जिलानी ने कहा- हमें अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मँजूर नहीं है। हम पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे। मस्जिद के बदले हम कोई और जमीन कबूल नहीं कर सकते।

फैसला का सम्मान करने की बात कहने वाले जिलानी पहले पुनर्विचार याचिका और फिर शरीयत पर कैसे आए यह उसका नमूना भर है। उनकी तरह ही सुर जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के भी बदले। उन्होंने 17 अक्टूबर को कहा- हम सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था का बेहद सम्मान करते हैं। जो फैसला आएगा उसका सम्मान करेंगे। फैसले से ठीक पहले 6 नवंबर को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में पत्रकारों से बात करते हुए मदनी ने कहा- कानून हमारा है। सुप्रीम कोर्ट हमारी है। जो भी फैसला होगा हम उसका एहतराम करेंगे। लेकिन, उसी दिन शरीयत का हवाला देते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा, “बाबरी मस्जिद, कानून और न्याय की नजर में एक मस्जिद थी। करीब 400 साल तक मस्जिद थी। लिहाजा शरीयत के हिसाब से वो आज भी मस्जिद है। सत्ता और ताकत के दम पर उसे कोई भी रूप दे दिया जाए कयामत तक वह मस्जिद ही रहेगी।” इसके बाद 17 नवंबर को मदनी ने कहा- सुप्रीम कोर्ट का फैसला समझ से परे है। हमारी पुनर्विचार याचिका 100 फीसद खारिज हो जाएगी, इसके बावजूद हम याचिका दाखिल करेंगे। यह हमारा हक है। अगर मस्जिद न तोड़ी गई होती तो क्या सुप्रीम कोर्ट मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाने के लिए कहता? दो दिन बाद 19 नवंबर को इकोनॉमिक टाइम्स में उनका एक इंटरव्यू प्रकाशित हुआ। इसमें और आगे बढ़ते हुए उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले में, सभी सबूत बाईं ओर इशारा करते हैं, जबकि फैसला दाईं ओर जाता है।” इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुओं को मंदिर बनाने के लिए जगह राम जन्मभूमि से अलग दी जानी चाहिए थे। ओवैसी ने तो फैसला आते ही कह दिया था कि उनके मजहब को खैरात नहीं चाहिए और उसके बाद से लगातार इस मसले पर भड़काऊ बयानबाजी कर रहे हैं।

राम जन्मभूमि को लेकर ये सारे जहर तब उगले गए जब इस मामले के दो मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने की बात कही है। लेकिन, इस मामले में मुस्लिम पक्ष अपना स्टैंड शुरू से ही बार-बार बदलते रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में बताया है कि अली मियॉं के अब्बा मौलाना हकीम अब्दुल हई ने अरबी में ‘हिंदुस्तान इस्लामी अहमदे’ नाम से एक किताब लिखी थी। अली मियॉं ने इस किताब का उर्दू अनुवाद किया। इस किताब में सात मंदिरों का जिक्र था, जिन्हें तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। इनमें से एक बाबरी मस्जिद भी थी। इस किताब के ‘हिंदुस्तान की मस्जिदें’ अध्याय में बाबरी मस्जिद बनाने का पूरा ब्योरा दर्ज था।

शर्मा लिखते हैं कि जब यह विवाद चल रहा था कि बाबरी मस्जिद मंदिर को तोड़कर बनाई गई है या नहीं, तो उस समय इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे अरुण शौरी के कहने पर उन्होंने इस किताब की खोज की। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में यह किताब थी पर शर्मा को नहीं दिखाई गई। उस समय शर्मा जनसत्ता के लखनऊ ब्यूरो में काम करते थे। उन्होंने अली मियॉं से अपने संपर्कों के आधार पर उस अध्याय की फोटो कॉपी लेकर अरुण शौरी को भेजी। शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में इसका हवाला दे लेख लिखा। कहा कि अब क्या सबूत चाहिए। यह तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पिता का ही लिखा है। आप जानकर हैरत में रह जाएंगे कि शौरी का वह लेख छपते ही वह किताब दारुल उलूम नदवदुल उलेमा और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी सहित सभी इस्लामी संस्थानों के पुस्तकालय से गायब हो गई।

जाहिर है, इस मसले को विवाद का मुद्दा बनाने वाले मुस्लिम नुमाइंदे और संगठन पहले दिन से जानते हैं कि सच क्या है। कल भी रामलला को लेकर उनके मन में जहर भरा था और आज भी है। वे बस बहरुपिए हैं जो बीच-बीच में झाँसा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने जैसी बातें करते हैं। अदालत से जब उनके हक़ में फैसला नहीं आता तो वो धार्मिक भावनाओं को भड़काने के लिए शरीयत का हवाला देने लगते हैं।

इसमें रत्ती भी संदेह नहीं कि राम जन्मभूमि आस्था से जुड़ा मसला है और इसे वापस पाने के लिए हिंदू करीब 500 साल से संघर्ष कर रहे थे। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि उसके निर्णय का आधार आस्था नहीं है। कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार एएसआई की रिपोर्ट थी जिसके अनुसार बाबरी मस्जिद के नीचे हिंदू ढॉंचा होने के प्रमाण मिले थे। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी साफ़ कर दिया था कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड इस जमीन पर अपना दावा होने के सबूत पेश करने में नाकाम रहा था।

ऐसे में वो वक़्त आ गया है जब मजहब के आम लोगों को आगे आकर स्पष्ट करना चाहिए कि ओवैसी जैसे नेता या फिर जमीयत और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाएँ उनकी ठेकेदार नहीं हैं। उनके लिए राम असल मायनों में ‘इमाम-ए-हिन्द’ हैं। वरना लोग तो पूछेंगे ही कि अली मियाँ से ओवैसी तक आते-आते उनकी नीयत का खोट क्यों नहीं मिटा? आज जिस भाषा मैं ओवैसी बोल रहे उसी जुबान में 90 के दशक की शुरुआत में अली मियाँ ने कहा था- यह झगड़ा अदालत के दायरे से बाहर है। अदालत का फैसला शायद ही माना जाए।

मैं NCP में ही हूँ और रहूँगा, शरद पवार हमारे नेता: अजित पवार ने कहा- BJP और NCP का हो चुका है गठबंधन

महाराष्ट्र के नव-निर्वाचित उप-मुख्यमंत्री अजित पवार ने साफ़ कर दिया है कि उन्होंने एनसीपी नहीं छोड़ी है। अपने ताज़ा ट्वीट में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि उन्होंने न तो पार्टी छोड़ी है और न ही उनका ऐसा कोई इरादा है। अजित ने लिखा कि वो भविष्य में भी एनसीपी में बने रहेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि उनके चाचा शरद पवार उनके नेता है। बता दें कि शरद पवार एनसीपी के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। अजित पवार ने लिखा कि महाराष्ट्र में भाजपा और एनसीपी गठबंधन की सरकार पाँच साल चलेगी।

इससे पहले उन्होंने अपने ट्विटर बायो में ‘डिप्टी सीएम’ लिख कर अपडेट किया। इससे पता चलता है कि भाजपा और अजित सदन में बहुमत साबित करने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। जबकि विरोधी खेमों में अच्छी-ख़ासी हलचल देखने को मिल रही है। उद्धव ठाकरे अपने विधायकों को ढाँढस बँधा रहे हैं कि सरकार शिवसेना की ही बनेगी। उद्धव एनसीपी के विधायकों के होटल में जाकर उन्हें भी आश्वासन दे रहे हैं कि ये गठबंधन लम्बा चलेगा। शरद पवार का कहना है कि उनकी पार्टी के 54 में से लगभग 50 विधायक उनके साथ हैं। वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि 43 एनसीपी विधायक अजित पवार के साथ हैं।

अजित पवार कह रहे हैं कि शरद पवार उनके नेता हैं और राज्य में भाजपा-एनसीपी की सरकार बनेगी। ऐसे में, अब ये समझना कठिन हो गया है कि एनसीपी का गठबंधन कॉन्ग्रेस और शिवसेना के साथ है या फिर भाजपा के साथ। अजित पवार की मानें तो भाजपा के साथ और शरद पवार की मानें तो कॉन्ग्रेस के साथ। अजित पवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी धन्यवाद देते हुए कहा है कि अगले 5 सालों तक देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार चलेगी। अजित ने ट्विटर पर केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले और अन्य नेताओं सहित सभी की शुभकामनाओं का जवाब दिया।

उधर शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे और शायद पवार के भाई के पोते रोहित पवार के साथ फोटो डाल कर दिखाया कि दोनों दलों के पास अगली लाइन की लीडरशिप तैयार है। रोहित और आदित्य पहले से ही दोस्त हैं। शरद पवार के भाई के पोते पार्थ हैं, जो अजित पवार के बेटे हैं। उनके दूसरे भाई के पोते रोहित हैं, जिन्होंने हाल ही में विधानसभा चुनाव जीता है। पार्थ लोकसभा चुनाव हार गए थे।

अजित की बगावत के बाद रोहित ने अपने फेसबुक पर प्रोफाइल व कवर फोटो में शरद पवार के साथ वाली तस्वीर लगाई थी। उन्होंने अजित सहित पूरे परिवार की तस्वीर लगा कर उन्हें लौट आने की अपील भी की। रोहित पवार ‘ऑल इंडिया शुगर मिल्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष हैं।

बाबरी वर्षगाँठ पर CM योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में सुरक्षा तंत्र को दुरुस्त करने का दिया निर्देश

योगी आदित्यनाथ ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की वर्षगाँठ से पहले पर्याप्त सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने के लिए सभी नागरिकों और पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है।

इस महीने की 9 तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवादित भूमि पर ऐतिहासिक फ़ैसला दिया था। इसके तहत मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं को पूरी विवादित ज़मीन देने का फ़ैसला सुनाते हुए मस्जिद के लिए अयोध्या में ही विवादित स्थल से अलग पाँच एकड़ ज़मीन देने के आदेश दिया था।

अधिकतर मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने मस्जिद के लिए पाँच एकड़ ज़मीन के आदेश को खारिज कर दिया था और शीर्ष अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उन्होंने एक समीक्षा याचिका दायर करने की योजना बनाई।

ख़बर के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने वाले सीएम योगी ने कहा कि सभी सुरक्षा व्यवस्था 15 दिसंबर तक लागू रहेगी। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, सीएम ने गश्त, यूपी-112 पेट्रोलिंग के साथ पीस कमिटियों, धर्मगुरुओं और समाज के प्रमुख लोगों से लगातार संवाद कायम रखने पर ज़ोर दिया।

सीएम योगी ने धार्मिक स्थलों, वाणिज्यिक और औद्योगिक प्रतिष्ठानों, एटीएम और बैंकों समेत अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है।

ख़बर के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार की देर शाम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए ज़िला, रेंज और मंडल के पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के साथ क़ानून-व्यवस्था सहित महत्वपूर्ण मुद्दों की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अधिकारी मुख्यालय से लेकर प्रत्येक स्तर पर कम से कम एक घंटा जनसुनवाई के लिए सुनिश्चित करें। महिला अपराधों पर तेजी से कार्रवाई करने के निर्देश देते हुए सीएम ने पॉक्सो ऐक्ट से जुड़े मामलों में प्रगति पर संतोष जताया। सीएम ने प्लास्टिक, थर्मोकोल, पॉलीथीन के प्रयोग को प्रभावी तरीके से रोकने को कहा।

इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए कि प्राथमिक विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को हर हाल में 30 नवंबर तक स्वेटर उपलब्ध कराए जाएँ। इस लापरवाही बरतने वाले संबंधित डीएम और बीएसए के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई की जाएगी। जनगणना कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को जनगणना के साथ पारदर्शिता व ईमानदारी से कार्य करते हुए शौचालय निर्माण और अन्य योजनाओं से जुड़े आंकड़ों पर नज़र रखने के निर्देश भी दिए गए।

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