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नशे में धुत हो धार्मिक समारोह में गा रहा था गाना, लोगों ने स्टेज पर चढ़कर की पिटाई: Video वायरल

धार्मिक समारोह में शराब पीकर लोकसंगीत गाना एक गायक को महंगा पड़ गया। सोशल मीडिया में वायरल हुए एक वीडियो में देखा जा सकता है कि धार्मिक समारोह के दौरान वहाँ मौजूद एक व्यक्ति ने नशे में धुत गायक को स्टेज पर चढ़कर चांटा जड़ दिया। उसके बाद भी उस व्यक्ति का गुस्सा शांत नहीं हुआ और वह दोबारा गायक को मारने के लिए आगे बढ़ा। मामले को वहीं रोकने के लिहाज से दूसरे युवक को स्टेज पर चढ़ दखल देना पड़ा।

सोशल मीडिया पर इस वीडियो को गुजरात के पत्रकार जनक दवे ने शेयर करते हुए पूरे मामले की जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि समारोह में गायक शराब पीकर गाना गा रहा था। इस दौरान उसका न सुर मिल रहा था और न ताल। वहाँ मौजूद लोगों ने उसकी धुनाई कर दी। पत्रकार दवे के अनुसार कार्यक्रम धार्मिक था। लिहाजा लोगों को गायक की यह हरकत और नागवार गुजरी।

बता दें ये वीडियो गुजरात के बोताड का है। जिसमें मात्र 13 सेकेंड में ही गायक की आवाज सुनकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वो अपने होश में नहीं था और जनता को बरगलाने के लिए कुछ भी गा रहा था। ऐसे में उसके सुर लगातर बिगड़ रहे थे, जिससे वहाँ मौजूद जनता निराश तो हो रही थी, लेकिन कुछ बोल नहीं पा रही थी। तभी एक युवक से ये सब बर्दाशत नहीं हुआ और वह स्टेज पर चढ़ गया। पहले उसने गायक को एक चांटा मारा और फिर दूसरा। इसके बाद वहाँ बैठे अन्य लोग भी गायक का विरोध करने लगे। कुछ लोग स्टेज पर भी आए, ताकि गुस्साए युवक से गायक को बचाया जा सके।

गौरतलब है कि गुजरात एक ऐसा प्रदेश है जहाँ शराब खरीदना और शराब बेचना दोनों निषेध है।

दिल्ली प्राइड परेड: ‘कश्मीर माँगे आज़ादी’, ‘भारत माता को चाहिए गर्लफ्रेंड’ के लगे नारे

दिल्ली में रविवार (24 नवंबर) को समलैंगिकों ने प्राइड परेड का आयोजन किया। इस दौरान कई आपत्तिजनक और देश विरोधी नारे लगे।

इस प्राइड परेड की एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर पत्रकार बोधिसत्व सेन रॉय ने शेयर की। इसमें आप देख सकते हैं कि परेड में शामिल लोगों ने किस तरह भड़काऊ और देशविरोधी नारे लगाए। उन्होंने कश्मीर का मुद्दा उठाते हुए नारे लगाए, इनमें ‘कश्मीर माँगे आज़ादी’, ‘तुम पुलिस बुआओ’, ‘तुम गोलो चालाओ’, ‘लाठी मारो’ जैसे भड़काऊ नारे शामिल हैं।

दिल्ली प्राइड परेड के दौरान ‘भारत माता को चाहिए गर्लफ्रेंड’ लिखित प्लेकार्ड भी देखे गए।

इसके अलावा कुछ ने राजनीतिक नारे लगाकर प्रधानमंत्री को निशाना बनाया।

समलैंगिकों ने अपनी इस प्राइड परेड के दौरान हाथों में प्रधानमंत्री मोदी पोस्टर लेकर उनका मज़ाक उड़ाया।  

और हाँ, ‘भगवा’ नफ़रत का रंग है।

दरअसल, समलैंगिक (LGBTQ) समुदाय ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भारत सरकार द्वारा लाए जा रहे बिल में कुछ प्रावधानों का विरोध किया है। इनका आरोप है कि सरकार ने क़ानून के प्रारूप में पहले ट्रांसजेंडर के तौर पर पंजीयन कराने और फिर सर्जरी का सबूत देने की बाध्यता रखी है।

समलैंगिक समुदाय की माँग है कि सरकार इस तरह के किसी प्रावधान को क़ानून में शामिल न करे। समुदाय अपनी पहचान किसी भी जेंडर में कराने को तैयार हैं। पदयात्रा के दौरान जारी एक वक्तव्य में समुदाय ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ख़ुश तो हैं, लेकिन अभी तक उनकी स्वीकार्यता समाज में नहीं बन पाई है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल समलैंगिक संबंधो पर फ़ैसला देते हुए अंग्रेजों के ज़माने के क़ानून को निरस्त करने का आदेश दिया था। इस पुराने क़ानून में समलैंगिक संबंधो के आरोप सही पाए जाने पर दस साल की सज़ा का प्रावधान था।

अयोध्या में राम मंदिर: 75 साल बाद वक्फ बोर्ड के दस्तावेजों से हटेगा बाबरी मस्जिद का नाम

राम जन्मभूमि मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब सुन्नी वक्फ बोर्ड के दस्तावेजों से बाबरी मस्जिद का नाम हटाने की कवायद शुरू हो गई है। यूपी सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड में 26-फैजाबाद’ नाम से दर्ज वक्फ सम्पत्ति ‘‘बाबरी मस्जिद’ को जल्द ही वक्फ बोर्ड के राजस्व अभिलेख से हटाया जा सकता है। बताया जा रहा है कि वक्फ बोर्ड की 26 नवंबर की बैठक में इस पर फैसला लिया जाएगा। इसी बैठक में बोर्ड यह भी फैसला करेगा कि मस्जिद के लिए पॉंच एकड़ जमीन ली जाए या नहीं। 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि से अलग मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए पॉंच एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश केंद्र सरकार को दिया था। इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने की बात बोर्ड पहले ही कह चुका है।

जानकारी के मुताबिक बोर्ड के दस्तावेज में 1 लाख 23 हजार से ज्यादा संपत्तियाँ दर्ज हैं। बता दें कि 75 साल पहले 1944 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद का नाम दर्ज कराया था। ये वक्फ नंबर 26 पर बाबरी मस्जिद अयोध्या जिला फैजाबाद नाम से दर्ज है। जिसे अब हमेशा के लिए हटाया जा सकता है।

मंगलवार (26 नवंबर, 2019) को लखनऊ में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की अहम बैठक होगी। माल एवेन्यू स्थित बोर्ड के कार्यालय में 11 बजे से होने वाली बैठक में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के बाबरी मस्जिद से जुड़े मुकदमे पर गौर किया जाएगा। बोर्ड की बैठक में कुल 8 सदस्य शामिल होंगे। इनमें चेयरमैन जुफर फारुकी के अलावा अदनान फरूखशर, अबरार अहमद, मोहम्मद जुनैद सिद्दीकी, सैय्यद अहमद अली, मोहम्मद जुनीद, इमरान माबूद खां और अब्दुल रज्जाक खां शामिल होंगे।

बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारुकी ने हिन्दुस्तान से कहा कि बैठक में हम लोग इस बात पर फैसला लेंगे कि उच्च्तम न्यायालय के आदेश के अनुपालन में बोर्ड को क्या करना है? अपनी बैठक में बोर्ड यह फैसला करेगा कि 5 एकड़ जमीन उसे कुबूल है अथवा नहीं। अगर कुबूल है तो उस जमीन पर मस्जिद के अलावा और क्या-क्या निर्माण होगा।

इस मामले में कानून के जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दस्तावेज से बाबरी मस्जिद का नाम हटाना एक प्रक्रिया है, जिसे वक्फ बोर्ड को पूरा करना है। इस बीच कुछ मुस्लिम पक्षों के द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात भी सामने आई है। मगर कानून के जानकारों के मुताबिक यदि मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से पुनर्विचार याचिका दाखिल की भी जाती है तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के दस्तावेज से बाबरी मस्जिद का नाम हटाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

पंजाब में 16 साल के किशोर को दलितों ने खँभे से बाँधा, पेट्रोल छिड़क जिंदा जलाया, 3 गिरफ्तार

कॉन्ग्रेस शासित पंजाब के मनसा से एक दिल दहला देने वाली खबर आई है। जानकारी के अनुसार शनिवार (नवंबर 23, 2019) को तीन युवकों ने एक 16 साल के किशोर को खँभे में बाँधकर जिंदा जला दिया। दोनों पक्ष दलित समुदाय के बताए जा रहे हैं। पुलिस ने मृतक बच्चे का शव रविवार (नवंबर 24, 2019) को बरामद कर लिया।

मनसा नगर पुलिस थाने के एसएचओ सुखजीत सिंह ने बताया कि जसप्रीत सिंह (मृतक) को पहले खँंभे से बाँधा गया और फिर पेट्रोल छिड़क कर उसे आग लगा दी गई। उसकी मौक़े पर ही मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इनकी पहचान जश्न सिंह, गुरजीत सिंह और राजू सिंह के रूप में हुई है।

एचएचओ सुखजीत के अनुसार, जसप्रीत के बड़े भाई, कुलविंदर सिंह ने करीब ढाई साल पहले जश्न सिंह की बहन को भगाकर उससे शादी कर ली थी और फिर दोनों शहर से 30 किमी दूर बुधलाढा में बस गए थे। इस घटना के बाद दोनों लोग एक बार भी अपने परिवारजनों से मिलने के लिए वापस नहीं लौटे। अब उनका एक साल का बेटा भी है। कथित तौर पर इस संबंध को लेकर जश्न और उसके परिवारवालों को जसप्रीत चिढ़ाता था। वह कहता था कि कुलविंदर जल्द घर लौटेगा और उनके साथ ही रहेगा। जिससे लड़की के घरवाले बहुत तंग हो गए थे।

दरअसल, जश्न के परिवार वालों के मुताबिक वे इस शादी से खुश नहीं थे और वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी दोबारा इस इलाके में लौटे। लेकिन जसप्रीत के लगातार चिढ़ाने से वो परेशान हो गए और इस घटना को अंजाम दिया।

मृतक के पिता के अनुसार शुक्रवार (नवंबर 22, 2019) की रात जश्न और उसके रिश्ते का भाई गुरजीत, अपने दोस्त राजू के साथ उनके घर आए और जसप्रीत को साथ ले गए। जब बहुत देर बाद भी उनका बेटा घर नहीं लौटा तो उन्होंने पुलिस थाने में मामले की रिपोर्ट लिखवाई। पुलिस ने लड़के की खोजबीन शुरू की और रविवार को उसका शव बरामद किया।

बता दें इस मामले पर पंजाब राज्य के अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष तेजिंदर कौर ने संज्ञान लेने से मना किया है। उन्होंने कहा है कि उनका आयोग दलित बनाम अन्य जाति वाले मामलों पर काम करता है, न कि दलित बनाम दलित। लेकिन इस घटना को बर्बर बताते हुए उन्होंने आरोपितों के लिए कानून के अनुसार सजा दी जाने की माँग की है। इसके अलावा जमीन प्राप्ति संघर्ष कमेटी के अध्यक्ष मुकेश मालौद ने भी कहा है कि वे केवल अपराध और भेदभाव (स्वर्ण बनाम दलित) से जुड़े मामलों में कदम उठाते हैं। लेकिन ये मानते है कि ये एक शर्मनाक घटना है और इसके लिए आरोपितों को अवश्य ही सजा मिलनी चाहिए।

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समुदाय विशेष के किशोरों ने धर्मस्थल में घुस शिवलिंग को किया अपवित्र, 2 को लोगों ने दबोचा

उत्तर प्रदेश के बदायूं में धर्मिक स्थल को अपवित्र करने को लेकर दो समुदायों के बीच तनाव उत्पन्न हो गया है। बदायूं के फैजगंज बेहटा क्षेत्र में दूसरे समुदाय के तीन किशोर एक धर्मस्थल में घुसकर शिवलिंग को अपवित्र कर रहे थे। वहाँ गंदगी फैला रहे थे। लोगों को जब इसकी जानकारी मिली तो आक्रोश फैल गया।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दो आरोपित को पकड़कर पुलिस को लोगों ने सौंपा दिया। तीसरा भीड़ का फायदा उठाकर भागने में कामयाब रहा। घटना के बाद से इलाके में तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है। एफआईआर दर्ज कर
पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है।

रिपोर्टों के मुताबिक कस्बे के श्मशान भूमि वाली सड़क पर ग्राम समाज की जमीन पर काफी पुराना एक धर्मिक स्थल है। आसपास के इलाके से लोग यहाँ पूजा-अर्चना करने आते हैं। रविवार (नवंबर 24, 2019) शाम तकरीबन साढ़े चार बजे कस्बा निवासी आशीष तिवारी, रमाकांत व संतराम मिश्रा खेत की ओर जा रहे थे। इस दौरान उनकी नजर धार्मिक स्थल पर पड़ी तो देखा कि दूसरे समुदाय के तीन किशोर उसे अपवित्र कर रहे हैं।

शोर मचाने पर आसपास के लोग मौके पर पहुँचे और तीनों को दबोच लिया गया। हालाँकि एक आरोपित भीड़ को चकमा देकर फरार हो गया। मामले की जानकारी पर पुलिस भी घटनास्थल पर पहुँची और आरोपितों को अपने साथ थाने ले गई। पूछताछ के दौरान ही आरोपितों के बचाव में उनके परिजनों के पहुँचने पर लोग भड़क गए।

हालात तनावपूर्ण होते देख बिसौली के सीओ राघवेंद्र सिंह भी फोर्स लेकर घटनास्थल पर आ गए। वार्ड संख्या चार निवासी आशीष तिवारी ने पुलिस को घटना की तहरीर दी। साथ ही स्थानीय लोगों से पूरा मामला गंभीरता से सुनने के बाद सीओ ने पुलिस को घटना का मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया। पुलिस ने तीनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। सीओ ने बताया कि इलाके में पुलिस तैनात कर दी गई है और पकड़े गए लड़कों को सोमवार (नवंबर 25, 2019) को बाल गृह बरेली भेजा जाएगा। 

आसिफ ने लड़की को प्रेमजाल में फँसाया, कार में रेप करने के बाद जंगल के पास छोड़कर फरार

लड़की को प्यार के जाल में फँसाकर उसकी इज्जत लूटने की एक और घटना सामने आई है। मामला गाजियाबाद के लालकुआँ का है। आरोपित युवक ने लड़की को मिलने के बहाने बुलाया। फिर, कार में उसके साथ बलात्कार किया। बलात्कार के बाद पीड़िता को सुनसान जगह पर छोड़ फरार हो गया। आरोपित की पहचान आसिफ के तौर पर की गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, 22 वर्षीय पीड़िता नोएडा के एक कॉल सेंटर में काम करती है और गाजियाबाद मसूरी की रहने वाली है। 5 माह पहले वह अपनी दादी के मायके बुलंदशहर के जहाँगीराबाद गई थी। वहाँ उसकी पहचान पड़ोस में रहने वाले आसिफ से हुई। आसिफ शाहबेरी में फर्नीचर का काम करता था। धीरे-धीरे दोनों में बातें होनें लगीं और मामला शारीरिक संबंध तक पहुँच गया।

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लड़की का आरोप है कि आसिफ ने शादी का झाँसा दे उसके साथ संबंध बनाए। जब वह गर्भवती हो गई तो उसने उसका गर्भपात करवा दिया। इसके बाद से ही उसने आसिफ से दूरी बनानी शुरू कर दी।

बीते शनिवार (नवंबर 23, 2019) को आसिफ ने उसे गाजियाबाद के लालकुआँ बातचीत करने के लिए बुलाया। इसी दौरान कार में उसके साथ रेप किया। लड़की ने विरोध किया तो उसे दादरी बाइपास से सटे जंगल के पास छोड़कर फरार हो गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है। दादरी के कोतवाली इंचार्ज दिनेश सिंह ने बताया कि जल्द ही आरोपित गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

बता दें इस मामले के अलावा कल गुड़गाव और मुजफ्फनगर से भी रेप के मामले आए हैं। गुड़गाँव में जहाँ 22 साल के बिंदु नामक युवक ने 12 साल की लड़की का बलात्कार कर उसे मुँह खोलने पर जान से मारने की धमकी दी। तो वहीं, यूपी के मुजफ्फरनगर जिले में 26 साल के एक युवक ने 24 साल की युवती का अपहरण कर उसके साथ चलती कार में बलात्कार किया। इस दौरान आरोपित सुबोध के साथियों ने पूरी वारदात का वीडियो भी बनाया। अपहरण के कुछ घंटों बाद लड़की को उसके कॉलेज के बाहर छोड़ते हुए आरोपितों ने घटना के बारे में किसी को बताने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी।

महाराष्ट्र पर ‘सुप्रीम’ फैसला आज, एनसीपी का दावा- लौटे आए 54 में से 52 विधायक

महाराष्ट्र में शनिवार (नवंबर 23, 2019) सुबह हुए सियासी उलटफेर के मामले में उच्चतम न्यायालय आज (नवंबर 25, 2019) दूसरे दिन फिर सुनवाई करेगी। बता दें कि महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री और अजित पवार के उप मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने को लेकर शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने सर्वोच्च अदालत में चुनौती दे रखी है। तीनों दलों की संयुक्त याचिका में राज्यपाल द्वारा 23 नवम्बर को भाजपा सरकार को सरकार बनाने के लिए दिए गए निमंत्रण को रद्द करने का आदेश देने की माँग की गई है। इस याचिका पर रविवार को जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने सुनवाई की थी।

याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सोमवार (नवंबर 25, 2019) सुबह 10:30 बजे राज्यपाल का आदेश और फडणवीस की तरफ से उन्हें सौंपे गए समर्थन पत्र की कॉपी पेश करने का आदेश दिया था। साथ ही कोर्ट ने महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस, उप मुख्यमंत्री अजित पवार, केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार को भी नोटिस जारी कर जवाब माँगा था। 

इस बीच, एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक ने दावा किया है कि पार्टी के 54 में से 52 विधायक शरद पवार के साथ एकजुट हैं और अजित पवार अब अकेले पड़ गए हैं। अजित पवार को मनाने की कोशिशें भी जारी है। एनसीपी नेता छगन भुजबल सोमवार की सुबह उनसे मिलने पहुॅंचे। इससे पहले शिवसेना के नेता ने भी उनसे मुलाकात की थी। इस मसले पर आज संसद में भी हंगामा होने के आसार हैं। लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी और लोकसभा में पार्टी के चीफ व्हिप के. सुरेश ने महाराष्ट्र मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। विनय विश्वम ने राज्यसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है।

शिवसेना का दावा है कि शिवसेना-एनसीपी- कॉन्ग्रेस गठबंधन के पास 165 विधायकों का समर्थन है और वह आसानी से विधानसभा में बहुमत साबित कर देगा। वहीं भाजपा ने दावा किया है कि फडणवीस के पास 170 विधायकों का समर्थन है। बता दें कि 288 सदस्यीय सदन में बहुमत के लिए 145 विधायकों की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट में रविवार को हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति एन वी रमन, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस गठबंधन को कोई अंतरिम राहत नहीं दी और फडणवीस सरकार को 24 घंटे के अंदर बहुमत साबित करने का कोई निर्देश जारी नहीं किया। अदालत ने कहा कि सोमवार को दोनों पत्रों को पढ़ने के बाद ही इस मुद्दे पर विचार करेगी।

पीठ ने कहा था, ‘‘राज्यपाल के आदेश के साथ ही देवेन्द्र फडणवीस द्वारा सौंपे गए पत्रों को पढ़ने के बाद ही मुद्दों पर विचार किया जाएगा और याचिकाकर्ताओं द्वारा 24 घंटे के अंदर शक्ति परीक्षण कराने की माँग पर विचार किया जाएगा। हालाँकि, राज्य सरकार की तरफ से कोई पेश नहीं हुआ लेकिन हम तुषार मेहता से आग्रह करते हैं कि कल सुबह साढ़े दस बजे तक उन दोनों पत्रों को पेश करें जब मामले की सुनवाई शुरू होगी ताकि हम उचित आदेश पारित कर सकें।’’

कोर्ट में शिवसेना की तरफ से पेश हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि जिस तरीके से सुबह पाँच बजकर 47 मिनट पर राष्ट्रपति शासन हटाया गया यह ‘‘विचित्र’’ था, क्योंकि कैबिनेट की कोई बैठक नहीं हुई और यह स्पष्ट नहीं था कि किस आधार पर राज्यपाल ने इसकी अनुशंसा की। इसके साथ ही जिस तरीके से सुबह आठ बजे मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को शपथ ग्रहण कराया गया उस पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए और कहा कि यह ‘‘रहस्यों से घिरा’’ है और सार्वजनिक पटल पर दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं कि किस तरह से सरकार का गठन किया गया।

वहीं एनसीपी और कॉन्ग्रेस की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सरकार बनाने के लिए फडणवीस को निमंत्रण देने का राज्यपाल का निर्णय ‘‘धोखेबाजी’’ और ‘‘लोकतंत्र का विनाश’’ करना है। सिंघवी ने कोर्ट से कहा कि जोड़-तोड़ की राजनीति को रोकना जरूरी है, इसलिए जल्द से जल्द फ्लोर टेस्ट हों। सुप्रीम कोर्ट आज फिर इस पर सुनवाई करेगी, जिसके बाद महाराष्ट्र की राजनीतिक स्थिति स्पष्ट होने की संभावना है।

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महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस पर बहुमत साबित करने की बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि ये पूरे भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। अब भाजपा ने ज़मीन पर इसकी पूरी रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को दी है। कहा जाता है कि राणे के दोस्त सभी पार्टी में हैं। वो बाल ठाकरे की रिमोट कंट्रोल वाली सरकार में मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। भाजपा को उनके अनुभव का फ़ायदा मिल सकता है। नारायण राणे की एक ख़ास बात ये भी है कि वो फ़िलहाल तो भाजपा में हैं लेकिन कभी शिवसेना और कॉन्ग्रेस में भी रह चुके हैं। दोनों दलों में उनका प्रभाव है।

राज्यसभा सांसद नारायण राणे के शिवसेना और कॉन्ग्रेस के कई नेताओं से अभी भी काफ़ी दोस्ताना संबंध हैं। जब उन्होंने 2017 में कॉन्ग्रेस छोड़ी थी, तभी उन्होंने कहा था कि उनके दोस्त सभी पार्टियों में हैं। हाँ, नारायण राणे को दो नेताओं से चिढ़ ज़रूर है। उन्होंने कहा था कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण उनके दोस्त नहीं हैं। आज जब शिवसेना और कॉन्ग्रेस के यही दोनों नेता बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, नारायण राणे के लिए उन्हें पटखनी देने का ये मौक़ा व्यक्तिगत भी हो चुका है।

यह भी जानने वाली बात है कि जब नारायण राणे को राज्यसभा भेजा गया था, तब शिवसेना ने इसका विरोध किया था। भाजपा ने अपने सहयोगी की आपत्ति को दरकिनार करते हुए राणे को राज्यसभा भेजा। नारायण राणे को शिवसेना का वो विरोध भी याद ही होगा। ताज़ा विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नारायण राणे की ‘महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष’ पार्टी का भाजपा में विलय कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी। जब हाल ही में महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा था, तब राणे ने कहा था कि वो भाजपा की सरकार के लिए सभी ‘साम, दाम, दंड और भेद’ अपनाएँगे।

नारायण राणे ने कहा कि उन्हें बस 40 और विधायकों का जुगाड़ करना है क्यों भाजपा के पास पहले से ही 105 विधायक हैं। युवाकाल से ही शिवसेना के साथ रहे राणे को बाल ठाकरे ने 1999 में मुख्यमंत्री बना कर उनकी वफादारी का इनाम दिया था। वो उद्धव ठाकरे के पुराने आलोचक रहे हैं और उन्हें क्षमतावान नहीं मानते हैं। वो कॉन्ग्रेस के पृथ्वीराज चव्हाण सरकार में राजस्व मंत्री बने और फिर आलाकमान के ख़िलाफ़ बोलने के लिए 2008 में निकाल बाहर किए गए। बाद में कॉन्ग्रेस ने उन्हें फिर अपनाया। 2017 में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और तभी से उनका झुकाव भाजपा की तरफ उठा।

राणे पहले ही कह चुके हैं कि शिवसेना और कॉन्ग्रेस के कई विधायक उनके संपर्क में हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय मंत्रियों नितिन गडकरी और पियूष गोयल को भी देवेंद्र फडणवीस की मदद के लिए बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। अगर सुप्रीम कोर्ट फ़ौरन बहुमत साबित करने का आदेश देता है तो सदन में भाजपा के लिए मुश्किलें आ सकती हैं, ये बात पार्टी को भी पता है।

41 सालों में 4 बार CM रहे लेकिन कभी जनता ने शरद पवार को बहुमत नहीं दिया: बोया पेड़ बबूल का…

एनसीपी के संस्थापक-अध्यक्ष शरद पवार काफ़ी समय से राजनीति में हैं। वो 1958 में ही यूथ कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए थे। अगर चुनावी इतिहास की बात करें तो शरद राव पवार 1967 में पहली बार बारामती विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। यही वो क्षेत्र है, जहाँ से फ़िलहाल उनके भतीजे अजित पवार विधायक हैं। बारामती लोकसभा क्षेत्र से शरद पवार सांसद भी रह चुके हैं। उनकी बेटी सुप्रिया सुले इसी संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। लेकिन, अगर हम आपको बताएँ कि पिछले 42 वर्षों से चुनावी राजनीति में सक्रिय पवार मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में मंत्री रहे लेकिन महाराष्ट्र ने कभी उन्हें बहुमत नहीं दिया, तो आप चौंक जाएँगे?

जी हाँ, 1978 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने से लेकर अभी तक, शरद पवार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए महाराष्ट्र ने कभी भी बहुमत नहीं दिया। लेकिन, जोड़-तोड़ के महारथी पवार 4 बार मुंबई की गद्दी पर आसीन हुए। वो पहली बार 1978 में मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने वसंसदादा पाटिल की सरकार गिराई थी और जनता पार्टी से मिल कर सरकार का गठन किया। इसके बाद वो 1988 में फिर से मुख्यमंत्री बने, जब महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री यशवंत राव चव्हाण को राजीव गाँधी ने अपनी कैबिनेट में शामिल किया और शरद पवार को मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला लिया।

एक ऐसा भी समय आया था, जब शरद पवार प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे। 1991 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रणब मुखर्जी और शरद पवार के नाम की चर्चा चल रही थी। राजीव गाँधी की मृत्यु के बाद पीएम पद के कई दावेदार थे। ऐसे में, नरसिम्हा राव ये बाजी मार ले गए। वो न सिर्फ़ प्रधानमंत्री बने बल्कि उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का पद भी अपने कब्जे में रखा। पूरे 5 सालों तक उन्होंने सरकार चलाई और शरद पवार के अरमान धरे के धरे रह गए। मार्च 1990 के चुनावों में भी कॉन्ग्रेस बहुमत से दूर रह गई। वही वो चुनाव था, जब शिवसेना और भाजपा बड़ी ताक़त बन कर उभरी।

निर्दलीयों के समर्थन से शरद पवार मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। इसके बाद 1993 में बॉम्बे में दंगे हुए। तत्कालीन मुख्यमंत्री सुधाकर राव नाइक ने इन दंगों को हैंडल करने में हुई नाकामी की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद शरद पवार फिर से मुख्यमंत्री बना कर महाराष्ट्र भेजे गए। उससे पहले वो नरसिम्हा राव कैबिनेट में रक्षा मंत्री थे। इस तरह से चार बार पवार मुख्यमंत्री बने लेकिन जनता ने कभी उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए बहुमत नहीं दिया। पहली बार 1978 में उन्होंने पार्टी तोड़ी। 1988 में राजीव गाँधी ने कृपा बरसाई। 1990 में जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई। 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के इस्तीफे के बाद सीएम बने।

शरद पवार ने जिस तरह से वसंतदादा की सरकार गिराई थी, ठीक उसी तरह आज उनके भतीजे अजित पवार ने बगावत कर दिया है। तब शरद पवार मुख्यमंत्री बने थे, आज अजित उप-मुख्यमंत्री बने हैं। खेल वही है, बस मोहरे और किरदार बदल गए हैं। शरद पवार ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठा कर 1999 के विधानसभा चुनाव लड़ा। चुनाव के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो शरद पवार ने फिर उसी सोनिया गाँधी को समर्थन दे दिया, जिसे तोड़ कर उन्होंने चुनाव लड़ा था।

दरअसल, 1999 के चुनाव में भाजपा-शिवसेना की कलह का भी उन्हें फायदा मिला। बाल ठाकरे ने 5 साल रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाई थी। उस दौरान शिवसेना के नारायण राणे और मनोहर जोशी सीएम थे। चुनाव के बाद भाजपा गोपीनाथ मुंडे को सीएम बनाने में जुटी थी लेकिन शिवसेना अड़ी रही। इसके बाद पवार ने कॉन्ग्रेस को समर्थन दे दिया और विलासराव देशमुख सीएम बने। शरद पवार 4 बार मुख्यमंत्री रह चुके थे। मार्च 1995 के बाद से अब तक, यानी पिछले ढाई दशक से वह मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं देख पाए।

उनकी एनसीपी कॉन्ग्रेस की जूनियर पार्टी बन कर रह गई। उन्होंने 2004, 2009, 2014 और 2019- ये चारों विधानसभा चुनाव कॉन्ग्रेस के पार्टनर के रूप में लड़ा। विलासराव देशमुख, सुशिल कुमार शिंदे, अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण की सरकारों को उनका समर्थन रहा। मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर शरद राव केंद्र में कृषि मंत्री बने रहे। वो 2004 से 2014 तक केंद्रीय कृषि मंत्री बने रहे। शरद पवार अपनी ही सेट की गई लिगेसी का सामना कर रहे हैं। वे 4 बार मुख्यमंत्री रहे, और चारों बार जनता से सीधा अपने नाम पर बहुमत पाकर सीएम नहीं बने। या तो अल्पमत में रहे, जोड़-तोड़ की या फिर अचानक से किसी सीएम के जाने के बाद कुर्सी पर बिठाए गए।

आज जोड़-तोड़ की ये राजनीति उनका ही पीछा कर रही है। सीनियर पवार अपने भतीजे के बयानों को ग़लत और भ्रामक बताते हुए दावा कर रहे हैं कि एनसीपी का गठबंधन अभी भी शिवसेना और कॉन्ग्रेस के साथ है। उद्धव ठाकरे एनसीपी विधायकों की बैठक में आकर उन्हें सम्बोधित करते हुए ढाँढस बँधा रहे हैं। उधर अजित पवार कह रहे हैं कि उन्होंने एनसीपी नहीं छोड़ी है और उनकी पार्टी का भाजपा के साथ गठबंधन हो चुका है। असमंजस की स्थिति बन चुकी है। ज़िंदगी भर जोड़-तोड़ में लगे रहे पवार अब ख़ुद इस समस्या से जूझ रहे हैं।

मीडिया में तरह-तरह की बातें चल रही हैं। कहा जा रहा है कि अजित पवार ने सितम्बर महीने में राजनीति से सन्यास की घोषणा कर दी थी, तभी से परिवार में कलह की शुरुआत हो गई थी। तब शरद पवार ने कहा था कि अजित के बेटे पार्थ पवार से उनकी बात हुई है। पार्थ ने सीनियर पवार को बताया कि अजित अपने चाचा यानी शरद पवार का नाम घोटाले में आने से दुःखी हैं। वैसे ये पहली बार नहीं था, तब अजित ने चाचा से बिना पूछे निर्णय लिया। इससे पहले 2012 में जब 70,000 करोड़ के सिंचाई घोटाले में उनका नाम आया था, तब भी उन्होंने डिप्टी सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय भी अजित ने शरद पवार से पूछा तक नहीं।

मीडिया में ये भी बातें चल रही हैं कि शरद पवार के एक अन्य भाई के पोते रोहित पवार को आगे किए जाने से अजित दुःखी थे। उनके बेटे पार्थ लोकसभा चुनाव हार गए और रोहित की विधानसभा चुनाव में जीत हुई। रोहित पवार और आदित्य ठाकरे मित्र हैं। सुप्रिया सुले ने रोहित और आदित्य के साथ फोटो डाल कर एनसीपी और शिवसेना की एकता दर्शाई है। राजनीतिक विश्लेषक सवाल पूछ रहे हैं कि क्या अजित रोहित को आगे किए जाने और अपने बेटे पार्थ की हार से दुःखी थे? क्योंकि, उप-मुख्यमंत्री का पद तो उन्हें शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस की सरकार में भी मिल रहा था।

अब देखना दिलचस्प होगा कि फ्लोर टेस्ट के दिन एनसीपी का क्या रुख रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रहा है। इसमें वह कहते दिख रहे हैं कि कार्यकर्ता ये जानते हैं कि भाजपा कभी-कभी दुश्मन का किला ढाहने के लिए विभीषण की सहायता लेती है। तो क्या अजित पवार एनसीपी के विभीषण हैं? तो फिर रावण कौन है? कुछ दिनों पहले अमित शाह ने भी एएनआई को दिए गए इंटरव्यू में कहा था कि वो चुप बैठे हैं, इसका मतलब ये नहीं है कि वो कुछ कर नहीं रहे। मोदी और शाह के इस बयानों के अलग-अलग मतलब निकाले जा रहे हैं। आप भी देखते रहिए- महाराष्ट्र का सियासी तमाशा।

मौकापरस्त गठजोड़ों का दागदार इतिहास: वीपी सिंह से लेकर शिवसेना तक, जोड़-तोड़ में पिसती है जनता ही

महाराष्ट्र में शिवसेना ने अपने घमंड को दर्शाते हुए सत्ता पाने की लालसा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा से गठबन्ध तोड़ दिया। इसके बाद शिवसेना ने उद्धव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एनसीपी और कॉन्ग्रेस की स्तुति में क्या कुछ नहीं किया? मगर अंत में जो हुआ वह यह बताने के लिए काफी है कि चुनाव बाद बनी कई दलों की मिली-जुली सरकार हमेशा ही जनता को ठगने में लग जाती है। ऐसी सरकार में जितने भी दल होते हैं सभी अपने-अपने मुनाफाखोरी धंधे में जुट जाते हैं।

देश ने आपातकाल के बाद पहली गठबंधन सरकार देखी, मगर कुछ ही समय में यह साफ हो गया कि इस सरकार में शामिल सभी दलों के ज़्यादातर लोग आपस में ही एक दूसरे की टाँग खींचने में लगे हैं। इतिहास गवाह है कि भारतीय राजनीति में गठबंधन के घटक दलों का उद्देश्य सत्ता होता है। यही वजह है कि 1977 की मोरारजी देसाई सरकार में अहम पद पर रहने के बावजूद चरण सिंह ने पीएम पद की लालसा के लिए 1979 में इस गठबंधन को तहस-नहस कर दिया, मगर पूर्ववर्ती सरकार की तरह यह भी उसी तरीके से ढह गई। बल्कि उससे भी कम।

इसके बाद साल 1989-91 के दौर में आई गठबंधन सरकारों का भी वही हाल हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर चंद्रशेखर की अगुवाई वाली सरकारों में भी कोई खास स्थिरता नहीं दिखी। देवेगौड़ा और गुजराल जैसे प्रधानमंत्रियों की सरकार गिराने में भी दलगत मतभेदों का बड़ा हाथ रहा। कालांतर में भी कॉन्ग्रेसी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में भी डीएमके के नेताओं पर भ्रष्टाचार के कई आरोप सामने आए। यह तमाम उदाहरण इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि सरकार की व्यवस्था को चलाने के लिए गठबंधन की सरकारें जनहित से ज्यादा कुर्सी बचाए रखने के लिए समर्पित होती हैं। जनहित ही नहीं ,प्रशासन के मोर्चे पर भी अनेक दलों के गठबंधन की सरकार अक्सर विफल रहती हैं। ऐसे में कुर्सी की जोड़-तोड़ करने वाली पार्टियों के शासन में जनता ही पिसती है।

यह सच है कि एक समय महाराष्ट्र में बाला साहेब की तूती बोलती थी। एक इशारे पर मुंबई थम जाया करती थी। उनकी अगुवाई में शिवसेना का मानो एक छत्रराज चलता था। उनके न रहने के बाद ही इस मामले को लेकर शक गहरा गया था कि उनकी इस विरासत को सहेजने में उनकी अगली पीढ़ी और उसके कार्यकर्ता कितने सक्षम साबित होंगे। यह सच है कि शिवसेना ने अब वह हनक ही खो दी जिसके चलते वह सत्ता में बैठे को भी आँख दिखाने की ताकत रखती थी।

विचारधारा में अंतर न होते हुए भी जब 50-50 के फॉर्मूले पर शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन तोड़कर एनसीपी और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों संग विलय की जो उत्सुकता दिखाई, उसने जनता के सामने उसके सत्तालोलुप चरित्र को सामने लाकर रख दिया। ट्विटर पर #ShivsenaCheatsMaharashtra जैसे ट्रेंड किसी राजनीतिक दल नहीं बल्कि आम लोगों की भावनाएँ दर्शा रहे थे। महाराष्ट्र के लोगों के लिए यह उनके द्वारा शिवसेना को भरोसे पर दिए गए वोट का सौदा करने जैसा था।

जिस शिवसेना से जनता उम्मीदें लगाए बैठी थी, वही शिवसेना अगर एनसीपी जैसे दलों से अपनी पार्टी लाइन और विचारधारा को लेकर समझौता कर सकती है, सत्ता में बैठने के लिए अपने ही वोटरों के भरोसे का सौदा कर सकती है तो क्या इस बात का क्या भरोसा कि वह सत्ता में बैठकर जनहित का काम करे? स्वाभाविक है कि जिसके रहमोकरम पर सरकार चलेगी, उसके प्रति नतमस्तक रहना उसकी (शिवसेना की) अघोषित ज़िम्मेदारी रहेगी। देश और देश के राज्यों में मिली-जुली सरकारें राजनीतिक दलों के पेट भरने का एक ऐसा जरिया होती हैं जहाँ जनता के कष्टों की सुनवाई अनिश्चितकाल तक टल जाती है। महाराष्ट्र के सन्दर्भ में यह सोचना बहुत ज़रूरी झो जाता है कि तीन ऐसी पार्टियाँ (जो एक दूसरे की हमेशा से धुर-विरोधी रहीं) – एनसीपी, शिवसेना और कॉन्ग्रेस यदि एक साथ गठबंधन में शामिल होतीं तो राज्य सरकार और उसके लोगों का क्या ही हश्र होता।

1999 में विदेश मूल के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी के अन्दर से सोनिया गाँधी का विरोध करने वालों में सबसे अग्रणी नेता शरद पवार खुद थे। दरअसल पवार सोनिया को इस मुद्दे पर पीछे करके पार्टी की और से पीएम पद पर अपनी दावेदारी पेश करना चाहते थे। मगर इसके उलट उनका यह दाँव उन्हें ही भारी पड़ गया। उनकी हरकतों की भनक लगने पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने उन्हें ही निष्कासित कर दिया। 20 साल बाद, वही शरद पवार महाराष्ट्र में सरकार बनाने और शिवसेना को समर्थन देने के लिए सोनिया की सलाह लेने पहुँच गए थे। यहाँ तक कि उसके तुरंत बाद हुए 1999 के विधानसभा चुनावों के बाद वो फिर उसी कॉन्ग्रेस को समर्थन दे बैठे।

बालासाहेब ठाकरे की राजनीति ही हिंदुत्व से शुरू हुई। उन्होंने राजनीतिक संगठन के रूप में शिवसेना बनाई। भारतीय राजनीति के इतिहास में हिन्दू ह्रदय सम्राट’ शब्द उन्ही के लिए संबोधन में इस्तेमाल होता था। उनकी लड़ाई सिर्फ हिंदुत्व के लिए ही नहीं बल्कि छद्म सेकुलरिज्म पर भी थी। वही छद्म सेकुलरिज्म, जिसे कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने समाज के वर्ग विशेष का वोट लेने का जरिया बना लिया था। तीनों पार्टियों की विचारधारा, उनमे मौजूद भिन्नता खुद यह बताती है कि अगर यह गठबंधन सफल भी होता तो इस त्रिशंकु से जनहित की उम्मीद करना एक भूल होती।

भारत में जोड़-तोड़ की राजनीति नई नहीं है, मगर भारतीय राजनीति में ऐसी सरकारों की स्थिरता हमेशा सवालों के घेरे में रही है। दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी तक, अगर बहुमत न हो, तो त्रिशंकु सरकारों ने देश की प्रगति अपने फैसलों और नीतियों के ज़रिए कितना ध्यान दिया यह एक प्रश्न चिन्ह है।