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राम जन्मभूमि पर छलका वामपंथियों का दर्द, माकपा ने कहा- सुप्रीम कोर्ट ने न्याय नहीं किया

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ज्यादातर तबकों में सराहना हो रही है। लेकिन, राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर पहुॅंच चुके वामपंथियों को यह रास नहीं आ रहा है। माकपा पोलित ब्यूरो की दो दिवसीय बैठक में प्रस्ताव पास कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया गया है। पोलित ब्यूरो का मानना है, ‘अयोध्या विवाद पर कोर्ट का फैसला आया है, न्याय नहीं।’

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बैठक में अयोध्या और सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चर्चा हुई। बैठक के बाद जारी बयान में अयोध्या पर कहा गया है कि फैसला एक पक्ष की भावनाओं और विश्वासों को केंद्र में रखकर दिया गया है। इस मामले में निर्णय भले आ गया है, लेकिन न्याय नहीं हुआ है।

पत्रकारों से बात करते हुए सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि कोर्ट का फैसला स्पष्ट रूप से कहता है कि 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर असंवैधानिक रूप से मूर्तियों की स्थापना हुई, जो कि गंभीर रूप से कानून का उल्लंघन है। लेकिन फिर भी विवादित जमीन कानून का उल्लंघन करने वालों को दे दी गई। फैसला में स्पष्ट है कि एएसआई की रिपोर्ट में ऐसा कोई सबूत नहीं हैं, जिसमें बताया गया हो कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी।

सबरीमाला पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ बहुमत से इस मामले में 2018 के फैसले को बरकरार रखने में विफल रही। अब इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने से और पुनर्विचार याचिका को लंबित रखने से मामले में अस्पष्ट और अनिश्चित स्थिति पैदा हो गई है।

पोलित ब्यूरो की दो दिवसीय बैठक में अन्य कई मुद्दों पर भी प्रस्ताव पारित किए गए। इनमें अर्थव्यवस्था, राफेल और जम्मू-कश्मीर प्रमुख है। घटती आर्थिक विकास दर पर चिंता जताते हुए सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े किए गए हैं। वहीं, राफेल सौदे की जॉंच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की कॉन्ग्रेस की मॉंग का समर्थन किया गया है।

गौरतलब है कि दिल्ली में हुई पोलित ब्यूरो की बैठक में पार्टी की गुटबाजी भी उभरकर सामने आ गई थी। ब्यूरो के तीन वरिष्ठ सदस्यों ने केरल में पार्टी के दो युवा कार्यकर्ताओं पर यूएपीए लगाए जाने को लेकर मुख्यमंत्री पिनरई विजयन को जमकर सुनाया था।

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पाकिस्तान: इस्लाम कबूल नहीं करने पर महिला पत्रकार को किया प्रताड़ित, नौकरी छोड़ने को हुई मजबूर

पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना का सिलसिला थम नहीं रहा। इसके कारण ईसाई पत्रकार गोनिला गिल को नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। 38 वर्षीय गिल ने एक मजहब विशेष के युवक से शादी की है। लेकिन, उन्होंने अपना धर्म नहीं बदला। इसके कारण ऑफिस के सहकर्मी ही उन्हें प्रताड़ित करते थे। अंत में वे इतनी परेशान हो गईं कि उन्हें दुनिया न्यूज यानी अपना ऑफिस ही छोड़ना पड़ा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गोनिला ने कुछ समय पहले हुसनैन जामिल से शादी की। लेकिन, अपना धर्म नहीं बदला। यही बात उनके साथी कर्मचारियों को खटकने लगी। वे हमेशा उनके धर्म के प्रति उनके विश्वास को लेकर और युवक से शादी करने के बावजूद धर्म न बदलने के कारण उन्हें कोसते रहते। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि वे मानसिक तौर पर परेशान रहने लगीं और थक-हारकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

लाहौर प्रेस क्लब से जुड़ी गोनिला एकमात्र ईसाई पत्रकार थीं। लेकिन फिर भी उन्हें धार्मिक अहिष्णुता का शिकार होना पड़ा। मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया, “वे मेरी आस्था को लेकर घटिया बातें करते थे। लेकिन, मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी और अपने धर्म के साथ खड़ी रहूॅंगी।”

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है जब अल्पसंख्यकों को लेकर पाकिस्तान की हकीकत उजागर हुई है। प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के विधायक रहे बलदेव सिंह ने हाल में ही अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों का खुलासा किया था। इससे त्रस्त होकर उन्होंने भारत से शरण माँगी थी। उन्होंने पंजाब पहुँचकर गुहार लगाई थी कि वह अब भारत में ही रहना चाहते हैं।

अल्पसंख्यक समुदाय यानी हिंदुओं, सिखों, ईसाईयों, अहमदियों और शियाओं पर अत्याचार की घटनाएँ आम है। हिंदू और सिख लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर निकाह करवाने को मजबूर किया जाता है। खुद पाकिस्तान के विपक्षी दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने बीते दिनों कहा था कि पाकिस्तान सबसे बुरी किस्म की असहिष्णुता का सामना कर रहा है।

अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को लेकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार आलोचना हो चुकी है। भारत भी कई मंचों से वहॉं अल्पसंख्यकों की दुर्दशा का मसला उठा चुका है। हालॉंकि पाकिस्तान इन आरोपों को नकारता रहता है। लेकिन, गिल के साथ घटे वाकये ने एक बार उसकी धार्मिक असहिष्णुता उजागर कर दी है।

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महात्मा गाँधी के नाम पर रखें मेडिकल कॉलेज का नाम, कॉन्ग्रेसी मंत्री ने कहा- जुबान बंद कर

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के कोलारस विधानसभा से भाजपा विधायक बीरेंद्र रघुवंशी ने प्रभारी मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर पर धमकाने का आरोप लगाया है। बता दें कि सोमवार (नवंबर 18, 2019) की शाम बीरेंद्र रघुवंशी और प्रद्युम्न सिंह तोमर के बीच कलेक्ट्रेट के सभागार में जिला योजना समिति की बैठक के दौरान जमकर नोकझोंक हो गई।

विवाद शिवपुरी मेडिकल कॉलेज के नामकरण को लेकर हुआ। विधायक रघुवंशी का आरोप है कि जिला योजना समिति की बैठक में जब मेडिकल कॉलेज के नामकरण की बात आई तो उन्होंने माधवराव सिंधिया के बजाय महात्मा गाँधी के नाम पर नामकरण करने का प्रस्ताव रखा। इसी बात पर तोमर बिफर गए और धमकी देने लगे।

बीरेंद्र रघुवंशी ने कहा कि तोमर ने उन्हें देख लेने, जुबान बंद करने और ठिकाने लगाने की धमकी दी। बीजेपी विधायक ने कहा कि सुरक्षा के लिए वे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखेंगे। उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार से भी सुरक्षा की माँग की है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें या परिवार को कुछ भी हुआ तो इसके जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ प्रद्युम्न तोमर होंगे।

बीजेपी विधायक का कहना है कि पूरा विश्व महात्मा गाँधी की 150वीं वर्षगाँठ मना रहा है। ऐसे में उन्होंने मेडिकल कॉलेज का नाम महात्मा गाँधी के नाम पर रखने का सुझाव दिया। माधवराव सिंधिया के नाम से पहले भी तीन भवनों के नाम रखे जा चुके हैं। रघुवंशी ने आरोप लगाया कि उनकी इस बात पर तोमर ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी।

वहीं बीजेपी विधायक के धमकाने के आरोपों पर मंत्री तोमर ने कहा, “मुझे ऐसे किसी वाकये की जानकारी नहीं है। मेडिकल कॉलेज का नाम माधवराव सिंधिया के नाम पर रखने का निर्णय आम सहमति से लिया गया था।”

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शिवसेना को मत दो सम​र्थन: कमलेश तिवारी के हत्यारों के मददगार मुस्लिम संगठन ने सोनिया गॉंधी को लिखा खत

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर जारी सियासी उठापठक के बीच एक पत्र सामने आया है। यह पत्र कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखा गया है। पत्र जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख अरशद मदनी ने लिखा है। जमीयत वही मुस्लिम संगठन है जिसने हिंदुवादी नेता कमलेश तिवारी के हत्यारों को मदद की पेशकश की थी।

पत्र में सोनिया से शिवसेना को समर्थन नहीं देने की अपील की गई है। मदनी ने कहा है कि शिवसेना को समर्थन देना कॉन्ग्रेस के लिए घातक साबित होगा। मदनी ने पत्र में लिखा, “मैं आपका ध्यान महाराष्ट्र के राजनीति की तरफ आकर्षित करना चाहता हूँ। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आप शिवसेना का समर्थन करने की सोच रही हैं। यह कॉन्ग्रेस के लिए बहुत ही खतरनाक और घातक कदम साबित होगा। उम्मीद है कि आप मेरा निवेदन अच्छी भावना के साथ लेंगी।”

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सोनिया गॉंधी को लिखा पत्र

बता दें कि यह वही इस्लामिक संस्था है, जिसने हिंदू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की दिनदहाड़े गला रेत कर, गोली मार कर हत्या करने वाले हत्यारों को कानूनी लड़ाई में साथ देने की घोषणा की थी। कमलेश तिवारी की नृशंस हत्या का विरोध करने और हत्यारों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की बात करने के बजाय जमीयत उलेमा-ए-हिंद हत्यारों के बचाव में सामने आया था। हिंदू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी की 18 अक्टूबर को निर्मम हत्या कर दी गई थी।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इस मामले में गिरफ्तार पाँचों आरोपितों के परिवार से मुलाकात की। उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ने में असमर्थता जताई तो जमीयत ने अपने खर्चे पर वकील और अन्य सहायता करने का भरोसा दिलाया था। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के इस कदम ने साबित कर दिया था कि वो इस तरह के कुकृत्य और नृशंस हत्या करने वालों के साथ है।

यह पत्र ऐसे वक्त में लिखा गया है जब महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की शिवसेना की उम्मीदें धूमिल हुई है। शुरुआत में ऐसी खबरें आई थी कि सरकार चलाने को लेकर तीनों दलों ने कॉमन मिनिमम एजेंडा तय कर लिया है और शिवसेना हिंदुत्व के अपने एजेंडे से पीछे हटने को तैयार है।

लेकिन, इसके बाद कहा जाने लगा कि शिवसेना का समर्थन करने को लेकर सोनिया गॉंधी असमंजस में हैं। इस संबंध में अंतिम फैसला सोमवार को दिल्ली में एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और सोनिया के बीच हुई बैठक में होना था। लेकिन, बैठक के बाद पवार ने कहा कि सरकार गठन को लेकर कोई बात नहीं हुई। वैसे एनसीपी के बदलते स्टैंड का संकेत पवार ने दिल्ली पहुॅंचते ही दे दिया था। उन्होंने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा था कि शिवसेना ने विधानसभा चुनाव कॉन्ग्रेस एनसीपी के खिलाफ लड़ा था। ऐसे में उसके सरकार कैसे बनाई जा सकती है।

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हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठावान थी इंदिरा गाँधी: वो 6 बातें, जिनसे आज के कॉन्ग्रेस को सीखने की ज़रूरत है

आज इंदिरा गाँधी का जन्मदिन है। भारत की तीसरी प्रधानमंत्री, जिन्हें समर्थक तो सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री मानते ही हैं, विरोधियों के भी ईमानदार आकलन में जो पहले से एक-दो पायदान ही नीचे जाएँगी। बचपन में इंदु प्रियदर्शिनी नाम पाने वाली इंदिरा का नाम और उनके किए हुए अच्छे काम का श्रेय राहुल और सोनिया गाँधी की कॉन्ग्रेस लेते नहीं थकते। लेकिन चाहे उनमें और राहुल या सोनिया गाँधी में तुलना हो, या उनके और यूपीए के शासनकाल में, मुस्लिम तुष्टिकरण और परिवारवाद जैसी नकारात्मक समानताओं के अलावा उनकी एक भी अच्छी बात का प्रतिबिम्ब नहीं दिखता।

देश सबसे पहले

इंदिरा गाँधी पर यह आरोप बिलकुल सही है कि वे स्वेच्छाचारी थीं- अपने अलावा किसी की नहीं सुनती थीं, और समय के साथ जनता को बरगलाने के लिए चटाया जा रहा “इंडिया इज़ इंदिरा, इंदिरा इज़ इंडिया” का राजनीतिक चूरन खुद कब उन्होंने चाट लिया, यह शायद उन्हें भी नहीं पता चला होगा। लेकिन, भारत के हितों के खिलाफ उन्होंने जानबूझकर कोई कदम उठाया हो, ऐसा सबूत मिलना मुश्किल है। वे भारत के लिए सही क्या है और क्या गलत, इसको लेकर बहुत सारे गलत विचार अवश्य रखतीं थीं- लेकिन देश के हितों के बारे में इंदिरा गाँधी की नीयत पर कभी कोई दाग नहीं लगा पाया।

वहीं राफेल को लेकर राहुल गाँधी की नकारात्मक राजनीति इतिहास में लिखे जाने लायक है। न केवल देश के भीतर की राजनीति पर विदेशी राष्ट्रपति (फ़्राँस के राष्ट्रपति) को बयान देना पड़ गया, बल्कि एक समय ऐसा लगने लगा कि शायद सौदा न ही हो। और बाद में कारण क्या निकला? राफेल का सौदा रद्द होकर उसके प्रतिद्वंद्वी यूरोफाइटर को मिलने में राहुल गाँधी के करीबी संजय पाहवा को फायदा होना था। इसके अलावा विकीलीक्स के लीक्ड केबिलों में यह भी सामने आया था कि उन्होंने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि भारत को जिहादियों से अधिक खतरा कथित ‘हिन्दू आतंकवाद’ से है।

पाकिस्तान की कमर तोड़ने में संकोच नहीं

इंदिरा गाँधी ने भले ही वार्ता की मेज पर 1971 की लड़ाई के फायदे गँवा दिए हों, लेकिन उससे पहले तक उन्होंने पाकिस्तान की जो कमर तोड़ी, उसे भारत और बांग्लादेश ही याद नहीं रखते, बल्कि पाकिस्तान की सेना का उस युद्ध में नेतृत्व करने वाले जनरल नियाज़ी के उपनाम ‘नियाज़ी’ को गाली बनाकर उस हार का ज़ख्म सहलाता है। इस जीत ने न केवल भारत की सैन्य ताकत को निर्णायक रूप से पाकिस्तान से इक्कीस साबित किया, बल्कि बाकी की दुनिया ने भी यह जान लिया कि भारत चीज़ क्या है।

वहीं मनमोहन-सोनिया की सरकार की अगर बात करें, तो पाकिस्तान को लेकर मनमोहन सरकार से अधिक लचर रुख अगर किसी का रहा तो केवल नेहरू का। उसके अलावा यूपीए और यूपीए-2 के मुकाबले सभी महत्वपूर्ण प्रधानमंत्रियों ने (आयाराम-गयाराम सरकारों वाले को छोड़कर) पाकिस्तान को लेकर कड़ा रुख ही रखा। डॉ. मनमोहन सिंह ने शर्म-अल-शेख में बलूचिस्तान को लेकर पाकिस्तान को जो कूटनीतिक हथियार दे दिया, वह आज भी यदा-कदा भारत के लिए असहज स्थिति पैदा कर ही जाता है।

विदेश नीति में भी मनमोहन सरकार पाकिस्तान को घेरने की हर कोशिश में नाकाम रही। 26/11 के बाद भारत ने जो डोज़ियर दिया, पाकिस्तान ने उसका मज़ाक़ बना कर रख दिया- लेकिन मनमोहन-सोनिया कुछ नहीं कर पाए।

पुलवामा और उरी के हमले अगर इंदिरा सरकार के समय में हुए होते, तो भी पाकिस्तान को कमोबेश वैसा ही जवाब मिलता, जैसे मोदी ने दिया। लेकिन वही 26/11 के बाद, बनारस, दिल्ली से लेकर मुंबई, हैदराबाद और दंतेवाड़ा अनेकों बम धमाकों के बाद भी यूपीए सरकार ने जो लचर रुख अख्तियार किया, वह इंदिरा गाँधी की विरासत को शर्मसार करने वाला है।

कभी हिन्दू होने से परहेज़ नहीं

इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि इंदिरा की बहुत सी नीतियाँ हिन्दू-विरोधी रहीं, जिनमें सबसे कुरूप चेहरा याद आता है 1966 में निहत्थे साधुओं की भीड़ पर गोलीबारी का। लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि इंदिरा गाँधी (नरेंद्र मोदी के प्रादुर्भाव के पहले) तक अपने निजी जीवन में हिन्दू धर्म के कर्मकांडों के प्रति सबसे अधिक निष्ठा रखने वाले भारत के प्रधानमंत्रियों में भी रहीं- उनसे इक्कीस शायद नरसिम्हा राव रहे, जिनके बारे में कहा जाता है कि बाबरी ध्वंस की बात सुनकर भी उन्होंने दैनिक पूजा भंग नहीं की। वे ज्योतिषियों और तांत्रिकों के पास भी आस्थापूर्वक जाती थीं, अकसर उनके बड़े-बड़े मंदिरों में पूजा-अर्चना करने के वृत्तांत मिलते हैं, और उनके पास अपने योग गुरु भी थे।

आज राहुल गाँधी कोट के ऊपर जनेऊ पहन कर (सावरकर के कथित शब्दों में, कि जिस दिन हिन्दू होने के नाम पर वोट मिलने या रुकने लगा, कॉन्ग्रेसी कोट के ऊपर जनेऊ पहनेंगे) ब्राह्मणत्व पर इठलाते फिरते हैं तो इसीलिए कि गैर-हिन्दू पति और ससुराल के बाद भी उनकी दादी ने उनके पिता और चाचा की परवरिश हिन्दू के तौर पर की।

यहीं वर्तमान कॉन्ग्रेस को देखें तो हिंदूवादी राजनीति से आगे जाकर हिन्दू धर्म पर हमला शुरू करने का काल इटैलियन ईसाई सोनिया गाँधी के कॉन्ग्रेस में उदय के आसपास का ही है। यह कोई संयोग नहीं है। उन्होंने उस साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी अधिनियम का मसौदा तैयार कराया, जो अगर कानून बन जाता तो इस देश में हिन्दू होना साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों में आपको स्वतः दोषी बना देता- ज़ाहिर तौर पर इससे बड़ी संख्या में मतांतरण होते। उनकी नेशनल एडवाइजरी काउन्सिल के न जाने कितने संगी-साथी पंथिक मतांतरण कराने वाले NGOs से जुड़े हुए रहे।

सावरकर के योगदान को स्वीकारा

आज शिव सेना के साथ कॉन्ग्रेस की महाराष्ट्र में सरकार बनने में सबसे बड़ी अड़चनों में से एक है सावरकर के प्रति कॉन्ग्रेस का परहेज- और यह नफरत सीधे ऊपर हाई कमांड से आती है। इस ‘ऊपर से ऑर्डर’ वाली नफ़रत के चलते ही एनएसयूआई वाले सावरकर की मूर्ति पर जूते की माला पहनाते हैं, कालिख उछालते हैं, देशद्रोह का झूठा लांछन लगाते हैं

वहीं इसके उलटे सावरकर के प्रति इंदिरा गाँधी का रवैया बहुत अधिक सकारात्मक रहा। उन्होंने न केवल यह पहचाना कि मोहनदास गाँधी की हत्या में सावरकर पर लगे आरोप गलत थे, बल्कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और 1857 का इतिहास लिखने में सावरकर की भूमिका का भी सम्मान किया। उन्होंने न केवल सावरकर को “भारत का विशिष्ट पुत्र” बताया था, बल्कि यह भी कहा था कि उनका ब्रिटिश सरकार से निर्भीक संघर्ष स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में अपना खुद का महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यही नहीं, सावरकर के सम्मान में उन्होंने डाक टिकट जारी किया और अपने व्यक्तिगत धन से ₹11,000 (1980 में बहुत बड़ी रकम) का योगदान भी किया था

राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर कड़ा रुख

इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान को तो जूते की नोंक पर ला ही दिया 1971 की लड़ाई में! इसके अलावा भी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उनका रुख हमेशा ही कड़ा माना जाता है- मनमोहन-सोनिया के ढुलमुल रवैये उलट, जिसके चलते दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ़ जवान नक्सलियों शिकार हुए, अनेकों बम धमाके और 26/11 हुआ। हाँ, इंदिरा गाँधी ने एक बड़ी गलती अकालियों को हराने के लिए भिंडरावाले को उभारा, लेकिन जब गलती का अहसास हुआ तो उसे खुद सुधारा भी- यहाँ तक कि उसी गलती को सुधारने की ‘सज़ा’ उन्हें मौत के रूप में मिली।

स्पष्ट फैसले- भले गलत हों

इंदिरा गाँधी ने गलत फैसले भी कम नहीं लिए हैं- इमरजेंसी, प्रिवी पर्स बंद कर यह संकेत देना कि भारत सरकार अपनी ज़बान से जब चाहे सुविधानुसार पलट सकती है, समाजवादी अर्थव्यवस्था जारी रखना, जेनएयू को वामपंथियों के हाथ में सौंप देना आदि। लेकिन, उन्होंने गलत फैसले भी निर्णायक तरीके से लिए। मनमोहन सरकार के समय जैसे निर्णय लेने की प्रक्रिया को ही लकवा मार गया, उससे इंदिरा गाँधी से अधिक कोई नहीं झुँझला पड़ता।

आज इंदिरा गाँधी के जन्मदिन पर उनकी खुद की पार्टी से ज़्यादा उन्हें याद करने और उनकी सकारात्मक चीजों का अनुकरण करने की जरूरत और किसी को नहीं है। कॉन्ग्रेस के लिए सबसे अच्छी सलाह यही हो सकती है कि वह एक और इंदिरा गाँधी तलाशे, न कि केवल उनके परिवार या उनकी जैसी नाक के पीछे भागे!!

जब इंदिरा गाँधी ने JNU की गुंडागर्दी पर लगा दिया था ताला: धरी रह गई थी नारेबाजी और बैनर की राजनीति

अंग्रेजी में कहते हैं कि हर काले बादल में एक उजली रेखा उम्मीद की होती ही है- एव्री क्लाउड हैज़ अ सिल्वर लाइनिंग। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, जिनका आज जन्मदिन है, के शासनकाल के सबसे स्याह धब्बे इमरजेंसी में भी कुछ उजले छींटे थे- जिनमें से एक था आज अव्यवस्था ही नहीं, कुव्यवस्था के हिमायती बन चुके कम्युनिस्टों के गढ़ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्टूडेंट्स यूनियन पर तालाबंदी।

इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी में JNU के कम्युनिस्ट गुंडों पर नकेल कसने का वह साहस (या दुस्साहस) दिखाया जो न तो 1999 में दो सैनिकों के साथ यूनिवर्सिटी के भीतर छात्रों द्वारा हाथापाई करने पर ‘लौह पुरुष’ आडवाणी और न ही 2010 में 76 CRPF जवानों की नृशंस हत्या का जश्न मनाए जाने पर डॉ. मनमोहन सिंह ने दिखाया। इंदिरा गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय स्टूडेंट्स यूनियन (JUNSU) को ही ताला लगा दिया- उसकी मान्यता ही समाप्त कर डाली।

पिकेटिंग करना अधिकार भी, इमरजेंसी में कर्त्तव्य भी, लेकिन आपसे जो असहमत हो, उसका क्या?

फ़िलहाल राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के महासचिव देवी प्रसाद त्रिपाठी अपने छात्र और छात्र राजनीति के दिनों में जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष और माकपा से जुड़े छात्र संगठन स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया के सदस्य हुआ करते थे। जब इमरजेंसी लगी तो वे पुलिस से बचते-बचाते इमरजेंसी के खिलाफ, इंदिरा गाँधी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करते फिर रहे थे। फिर सितंबर में एक दिन उन्होंने यूनिवर्सिटी में तीन दिन की हड़ताल का आयोजन किया।

यहाँ तक तो बात सही जा रही थी। हड़ताल, पिकेटिंग, विरोध-प्रदर्शन आदि का आयोजन हर लोकतंत्र में अधिकार होता है- इंदिरा गाँधी के सस्पेंडेड लोकतंत्र में भी होना चाहिए था। लेकिन इसके बाद डीपी त्रिपाठी ने जो किया, वह ‘टिपिकल’ माओवंशी, लेनिनवादी, स्टालिनवादी मानसिकता थी- कि हमारे सामूहिक भले की माँग के लिए दूसरों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन किया जाए, उनके व्यक्तिगत निर्णय लेने के अधिकार को सम्मान न दिया जाए।

उनकी हड़ताल में जर्मन कोर्स की एक छात्रा शामिल नहीं होना चाहती थी, इसलिए वह क्लास करने के लिए जर्मन फैकल्टी की ओर बढ़ी। उसका नाम था मेनका गाँधी- संजय गाँधी की पत्नी और इंदिरा गाँधी की बहू। डीपी त्रिपाठी ने खुद अपने शब्दों में बताया है कि उन्होंने कैसे 19 साल की उस युवती का रास्ता रोक लिया।

ऊपरी तौर पर देखने पर तो मामला सीधा-सीधा लगता है। इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगा रखी थी, जो ज़ाहिर तौर पर गलत थी, और उसके विरोध के लिए एकता होनी ज़रूरी थी। इसलिए डीपी त्रिपाठी ने मेनका गाँधी से ‘प्रार्थना’ की कि वे ‘छात्र एकता’ का सम्मान करें और वापिस लौट जाएँ। लेकिन ज़रा खुद सोचिए- एक पुरुष छात्र नेता जब 19 साल की एक लड़की को क्लास जाने से रोकने के लिए एक झुण्ड लेकर उसके मुँह पर खड़ा हो जाए, तो यह याचना है या कि धमकी? जवाब हम में से हर किसी का दिल दे सकता है क्योंकि आज भले ही इमरजेंसी न हो (मोदी से अंधी नफरत करने वालों के लिए तो 2014 से ही लगी है), लेकिन ठीक यही तरीका हम में से अधिकांश ने ‘मास बंक’ के लिए अपनाया है; और जिन्होंने नहीं अपनाया, वो इसके भुक्तभोगी रहे हैं।

आप विरोध प्रदर्शन कर क्यों रहे थे? क्योंकि इंदिरा गाँधी ने आपकी स्वतंत्रता, बोलने का अधिकार, अपने निर्णय खुद लेने का अधिकार छीन लिया। कथित तौर पर नहीं, बल्कि पूरी तरह। गलत किया- और इसके खिलाफ आपको क्लास न जाने, नारे लगाने वगैरह का भी अधिकार बिलकुल था। लेकिन जो आपके विरोध से इत्तिफ़ाक़ न रखे, विरोध का विरोध करे, उसका क्या? कहाँ तक सही है आपके विरोध का हिस्सा बनने से इंकार करने वाले एक इंसान को घेर कर खड़े हो जाना? उस पर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दबाव बनाना? कि नहीं, हम तो सही ही हैं, और हमारा विरोध तो हो ही नहीं सकता?

जो लोग इंदिरा की बहू और इमरजेंसी के विलेन संजय गाँधी की पत्नी होने को मेनका के इन अधिकारों को छीने जाने का स्वीकार्य जस्टिफिकेशन मान लेते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि मेनका केवल इंदिरा की बहू और संजय गाँधी की पत्नी नहीं थीं- वे एक युवा लड़की थीं उस समय, जो पढ़ना चाहती थी; शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, और राजनीति को अपनी पढ़ाई के आड़े नहीं आने देना चाहती थी।

क्या इंदिरा की बहू और संजय गाँधी की पत्नी होने से मेनका की एक छात्रा के तौर पर पहचान खत्म हो गई? या उस पहचान से संबद्ध अधिकार, राजनीति में न पढ़ अपना कोर्स पूरा करने की इच्छा की अभिव्यक्ति गलत हो गई?

यहाँ मैं इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी का बचाव नहीं कर रहा- यह लोकतंत्र के लिए, गणतंत्र के लिए, संविधान से चलने वाले देश के लिए, संविधान लिखने वाली पार्टी के लिए बेशक धब्बे हैं। कॉन्ग्रेस को अगले 4 चुनाव केवल इनके लिए हरा दिया जाए तो भी कोई गलत बात नहीं। लेकिन इससे उस एक ब्याहता लड़की, जो शादी और ससुराल की ज़िम्मेदारियों के बावजूद शिक्षा से चिपटी हुई थी, को क्लास जाने से रोकना नैतिक रूप से सही नहीं हो जाता।

इंदिरा का ‘बदला’

मेनका गाँधी लौटीं- दिल्ली पुलिस के डीएसपी पीएस भिंडर के साथ। डीपी त्रिपाठी होने के धोखे में प्रबीर पुरकायस्थ (जिन्होंने आगे जाकर दिल्ली साइंस फ़ोरम की स्थापना की, और न्यूज़क्लिक डॉट इन के सम्पादक रहे) को गिरफ्तार कर लिया गया, और गलतफहमी दूर होने के बाद भी कथित तौर पर उन्हें टॉर्चर किया गया। इमरजेंसी में गलत पहचान में गिरफ़्तार होने का इकलौता मामला कहा जाता है। लेकिन इन चीज़ों को डिफ़ेंड नहीं किया जा सकता।

लेकिन उनकी बहू को सार्वजनिक तौर पर अपमानित करना, अपने खिलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शन का जबरन हिस्सा बनाया जाना इंदिरा गाँधी को न बर्दाश्त हो सकता था, न ही उन्होंने किया। सितंबर, 1975 की इस घटना के बाद उसी साल 7 नवंबर को न केवल अकादमिक काउंसिल की मीटिंग में उन्हें घुसने से रोक कर 6 महीने के लिए विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया, बल्कि जिस स्टूडेंट्स यूनियन के वह अध्यक्ष थे (और जिसके कन्हैया कुमार भी अध्यक्ष रहे हैं, और जिसे कई लोगों ने, कई मौकों पर जेनएयू के सारे कम्युनिस्ट ज़हर की जड़ बताया है) उसकी ही मान्यता खत्म कर दी गई। यही नहीं, 11 नवंबर, 1975 को इमरजेंसी में लोकतान्त्रिक ही नहीं मानवाधिकारों तक के हनन के लिए बदनाम मीसा एक्ट के तहत उन्हें गिरफ्तार कर जेल भी भेज दिया गया।

JNUSU का पलटवार

इंदिरा गाँधी मार्च 1977 में चुनाव हार गईं- लेकिन JNU के चांसलर के पद पर डटी रहीं। सीताराम येचुरी और अन्य छात्र नेता 500 छात्रों का हुजूम लेकर JNU कैम्पस से 5 सितंबर, 1977 को उनके घर के सामने जा पहुँचे। 10-15 मिनट उनके गला फाड़ने के बाद इंदिरा गाँधी अपने आपातकाल के गृह मंत्री रहे ओम मेहता के साथ बाहर निकलीं और प्रदर्शनकारियों के बीच मुस्कुराते हुए जा पहुंचीं

येचुरी ऊपर की तस्वीर में जो भाषण पढ़ रहे हैं, कहा जाता है कि उसमें आपातकाल की यातनाओं का ज़िक्र इतने भयावह तरीके से था कि ‘आयरन लेडी’ इंदिरा की मुस्कुराहट मिनटों में काफ़ूर हो गई। पत्थरदिल कही जाने वाली इंदु प्रियदर्शिनी पाषाण-भाव चेहरे पर लिए लौट पड़ीं- पूरा मेमोरेंडम सुना भी नहीं। और अगले ही दिन खबर आई कि उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया है। JNU वालों ने उनके नायब, वीसी डॉ. बीडी नागचौधरी को पहले ही इस्तीफ़े के लिए मजबूर कर दिया था।

आज

आज जो जेएनयू में बैठे हैं, और कम्युनिस्ट ब्रेनवॉशिंग का शिकार नहीं हैं, वे लगभग समवेत स्वर में यह कहते हैं कि इन दो बुरी चीज़ों- इंदिरा गाँधी की तानाशाही, और जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन की गुंडागर्दी- में वे इंदिरा गाँधी का पक्ष लेंगे। अच्छा होता अगर मोरारजी देसाई सरकार बनने पर इंदिरा के इस एक फैसले को अलोकतांत्रिक होने के बाद भी वैसे ही छोड़ देते, न पलटते। कम-से-कम ये कम्युनिस्ट कैंसर गले न पड़ा होता।

जिन्हें जेएनयू का कम्युनिस्ट ज़हर नहीं पीना होता है, उनके लिए इंदिरा गाँधी अधिक गलत थीं- और जेएनयू के झोलबाज खाली ‘भटके हुए नौजवान’, जो काम तो सही कर रहे थे, लेकिन कुछ ज़्यादा आगे बढ़ गए और सही काम करने में एक छोटी गलती (मेनका गाँधी को ज़बरदस्ती अपनी लड़ाई में शामिल करने का प्रयास) कर गए, जिसके लिए उन्हें सजा ज़रूरत से ज़्यादा मिली। इन विचार वाले लोगों के लिए उस घटना के आगे जाकर आज JNUSU जो कुछ चरस समाज में बो रही है, उसके आधार पर भूतकाल में उनके साथ किए गए अत्याचार को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता।

पता नहीं, इस घटना विशेष में नैतिकता का पलड़ा असल में किसकी ओर भारी है- अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता ऐसे ‘कॉज’ के लिए न कुर्बान करने की इच्छा रखने वाली मेनका के व्यक्तिगत निर्णय का, या अपनी (और दूसरों की) व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीने जाने के विरोध प्रदर्शन में अपने विरोध का विरोध कर रही आवाज़ को दबाने को स्वीकार्य मानने वाले कम्युनिस्ट विचार का। शायद इतिहास के कुछ पन्नों पर सही-गलत का ठप्पा भले न लगाया जा सके, लेकिन उन्हें समय-समय पर पढ़ा जाते रहना ज़रूरी होता है।

लेकिन इस अनिश्चितता के बाद भी इंदिरा गाँधी के जन्मदिन और JNUSU की हालिया हरकतों (शिक्षकों का अपहरण, पूरे कॉलेज में दीवारों पर नफ़रती बातें लिखना, स्वामी विवेकानंद की मूर्ति को बदरंग करना) के आलोक में ज़रूरी है कि इसे पढ़कर हम में से हर कोई खुद से पूछे कि इंदिरा गाँधी ने जो किया, वह सही था या गलत।

हम साथी हैं… हमें साथ चलना है… फिर स्त्रीवाद के इस दौर में पुरुष हीन क्यों?

जंगल के बीच बॉंसों के एक झुरमुट में शम्भू कुमार विद्या सिद्ध कर रहे थे। ऐसा करते उन्हें बारह वर्ष बीत चुके थे। बारह वर्ष बाद जब उन्हें विद्या सिद्ध हुई तो आकाश-मार्ग से एक शस्त्र प्रकट हुआ। शम्भु कुमार उस समय ध्यान में थे। उसी दौरान जंगल में भटकते हुए लक्ष्मण कहीं से आन पहुँचे। उस समय लक्ष्मण अपने भाई राम और भाभी सीता के साथ वनवास में थे। जंगल में भटकते हुए कंद और अन्य सामग्री खोजने वे यहीं जंगल में भटकते रहते थे। वे नहीं जानते थे कि बॉंसों के झुरमुट में कोई व्यक्ति बैठा है। उन्होंने अपने सामने जब आकाश-मार्ग से एक सिद्ध विद्या का अस्त्र प्रकट हुआ देखा तो उसे फ़ौरन हाथ में ले लिया, क्योंकि वे नारायण का रूप थे अतः उनमें इतनी शक्ति थी कि वे उस विद्या-अस्त्र को थाम सकें। उस अस्त्र को हाथ में लेकर जैसे ही उन्होंने उसे परखने के लिए यहाँ-वहॉं घुमाया तो उनका हाथ बॉंसों के उसी झुरमुट में जा लगा, जिससे उस झुरमुट में बैठे शम्भू कुमार का सर धड़ से अलग हो गया। उनकी मृत्यु हो गई।

लक्ष्मण को जब इसका भान हुआ कि उनके हाथों किसी जीव की हत्या हो गई है तो वे फौरन अपने भाई के पास पहुँचे ताकि अपने कृत्य के लिए क्या प्रायश्चित हो सकता है यह जान सकें। उधर, शम्भु कुमार की माता सूर्पनखा प्रतिदिन की भॉंति जब अपने पुत्र से मिलने, उन्हें देखने आईं तो पुत्र को मृत पाकर विलाप करने लगीं। पहले तो उन्होंने विलाप किया फिर जंगल में घूमते हुए यह खोजने की कोशिश करने लगीं कि उनके पुत्र का वध किसने किया। कुछ ही देर में उन्हें एक कुटिया में लक्ष्मण नज़र आए। कामदेव रूप वाले लक्ष्मण को देख वे अपने पुत्र का विलाप भूल गईं और लक्ष्मण पर मोहित हो गईं। जब उन्होंने लक्ष्मण के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लक्ष्मण ने उसे ठुकरा दिया। सूर्पनखा ने इसे अपना अपमान समझा और अपने भाई रावण के सामने पहुँचकर अपने पुत्र के वध और अपने अपमान की कथा सुनाई। उस बयान में सूर्पनखा ने कहा कि लक्ष्मण ने उनके साथ दुराचार किया है। फटे वस्त्र, शरीर से चोटिल और अस्त-व्यस्त हाल में पहुँची बहन को देख रावण का खून-खौल उठा और उन्होंने प्रण लिया कि वे इसका बदला लेंगे।

यहाँ इतने विस्तार से इस कहानी को लिखने का क्या औचित्य? क्यों हम इस बारे में बात करें कि लक्ष्मण ने सूर्पनखा का अपमान किया था या नहीं? या क्यों हम इस बारे में बात करें कि सूर्पनखा ने जो आरोप लक्ष्मण पर लगाए वे सही थे या नहीं?

इस विषय पर बात करने या इस पौराणिक कहानी का उल्लेख इस रूप में करने का औचित्य मुझे तब नहीं दीखता जब मैं वर्तमान में कुछ वैसी ही घटनाएँ पुनः होते ना देखती।

“लक्ष्मण ने सूर्पनखा की नाक काटी थी” हम सभी यह कहानी बचपन से सुनते आ रहे हैं। एक पुरुष द्वारा एक स्त्री के साथ हुए इस अनाचार के लिए हम लक्ष्मण को ग़लत भी ठहरा सकते हैं, कदाचित ठहराते ही हैं। मगर क्या वही सच था जो हम अब तक पढ़ते-सुनते आए? हमारी वेद-पुराण-ग्रंथ सिखाते हैं कि आँख बंद कर किसी भी बात पर भरोसा मत करो, तथ्य देखो, परखो, संभव हो तो आत्म-परीक्षण करो, पर क्या कभी हमने इस बात पर सवाल उठाया कि लक्ष्मण ने असल में एक अबला स्त्री के साथ दुराचार किया भी था या नहीं?

क्या फ़र्क पड़ता है। हमें मौका मिला है, हम स्त्रीवादी हैं, हर वह मुद्दा हम अपने पक्ष में ले लेना चाहते हैं जहाँ हमें कोई स्त्री किसी पुरुष पर आक्षेप लगाती दिखती है। इसमें दोष हमारा नहीं, इतने समय से हम अधीनता की बेड़ियों में जकड़े अब जब लड़ने निकले तो भूल गए कि कहीं इस लड़ाई में हमारे क़दमों तले कोई बेगुनाह तो नहीं रौंदा जा रहा।

लक्ष्मण-सूर्पनखा का जो प्रसंग यहाँ लिखा वह भी मैंने किसी ग्रंथ में ही पढ़ा था। वह मनगढ़ंत नहीं। अतः उसे आधार बनाएँ तो असल में लक्ष्मण ने सूर्पनखा के साथ कोई दुराचार नहीं किया था। उन्होंने सिर्फ एक पराई स्त्री का विवाह प्रस्ताव ठुकराया था, जिसे उस स्त्री ने अपना अपमान माना और उसका एक विकृत रूप अपने भाई के सामने प्रस्तुत किया। यदि हम इसी कहानी को सत्य माने तो क्या वाक़ई लक्ष्मण दोषी थे?

यह सवाल हम क्यों उठाएँ? इसके लिए मेरे दो मत हैं, पहला कि किसी भी पौराणिक कहानी को सिर्फ इसलिए नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि उसे हमने अपनी आस्था और भगवान से जोड़ दिया है, बल्कि उसके हर चरित्र को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

दूसरा, क्योंकि वह आरोप किसी स्त्री ने लगाया था अतः वह सत्य ही होगा यह मानसिकता भी नहीं होनी चाहिए, जो कि वर्तमान में हवा में ज़हर की तरह फ़ैल रही है।

चारों ओर हाहाकार मचा है। आक्षेप-पटाक्षेपों से सोशल मीडिया और अख़बारों की सुर्ख़ियों ने पुरुषों का एक नया चेहरा हमारे सामने प्रस्तुत किया है। #metoo नाम से चले इस केम्पैन के तहत जब स्त्रियों ने बोलना शुरू किया तो लगने लगा कि शायद धरती पर कोई पुरुष बचेगा ही नहीं जिस पर हरासमेंट के आरोप न लगें, जो अनाचारी ना हो। कुछ इस तरह का माहौल बनता दिख रहा है कि अब शायद स्त्रियाँ किसी विशेष अपराधी पर नहीं, बल्कि पूरी पुरुष जाति पर ही भरोसा नहीं कर सकेंगी।

हमें प्रत्येक पुरुष से अपनी बेटियों को बचाना होगा। पुरुष देखते ही हमें उसे घृणा भाव से देखना होगा। क्यों? क्योंकि वह पुरुष है और वह दुराचार कर सकता है।

क्या वाकई? एक पल यहीं रूककर सोचिए कि क्या आप यही बात अपने पिता, पुत्र, या पति के संबंध में भी सत्य मानेंगी? या क्या हम स्त्रियों की समझ और परखने की नज़र इतनी तेज़ नहीं कि हम किसी पुरुष की मंशा ही समझ पाएँ? कहते हैं स्त्री के पास से यदि कोई पुरुष बुरी भावना से भी गुज़रे तो वह उसके छुए बिना ही अपनी छठी इन्द्रिय से यह भाँप लेती है कि वह पुरुष ग़लत था। तो फिर सभी पुरुषों को एक ही कठघरे के रखने की क्या आवश्यकता आन पड़ी?

कुछ वक़्त के लिए इस सबसे दूर होकर बैठी तो सोचने लगी कि क्या वाक़ई ऐसा ही है? क्या वाक़ई अब मेरे देश में कोई ऐसा पुरुष नहीं जिस पर कोई-न-कोई स्त्री दुराचार का आरोप नहीं लगाएगी? या क्या वाक़ई हमें स्त्रियों द्वारा लगाए जा रहे हर आरोप को इसलिए सत्य मान लेना चाहिए क्योंकि वे ‘स्त्रियों’ ने लगाए हैं। जो अब तक बोल नहीं पाती थीं, जिन्हें अब तक दबा कर रखा गया और जिन्हें अब मुखर होने का मौका मिला है।

जब इन सवालों पर चिंतन किया तो अनायास ही कुछ घटनाएं स्मृति पटल पर दौड़ने लगीं। कमरे में पंखे से लटके एक ऐसे पुरुष की याद टीस बनकर ताज़ा हो गई जिसका ज़िक्र एक करीबी ने मुझसे किया था। आँखों देखी घटना के रूप में। वह पुरुष जो दो छोटी बच्चियों का पिता था, अपने बैंक की तरफ से कर्जा वसूली कार्यक्रम के तहत एक किसान के घर पहुँचा। किसान ने उसे अपने बाहरी अहाते में बैठने को कहा, कि वह अभी भीतर से पैसा लेकर आता है। कुछ देर बाद वह देखता है कि किसान तो बाहर से पुलिस लेकर आ रहा है। उस किसान ने उस अधिकारी पर आरोप लगाया कि वह जबरदस्ती उसके घर में घुसा और उसकी पत्नी के साथ छेड़छाड़ की, बलात्कार की कोशिश की। उस अधिकारी ने जब अपनी सफाई देने की कोशिश की तो पुलिस ने उसकी एक ना सुनी। उसके खिलाफ़ केस दर्ज हुआ और अंत उस अधिकारी की आत्महत्या से हुआ।

जब इस घटना के बारे में सोचती हूँ तो लक्ष्मण और सूर्पनखा की कहानी याद आ जाती है। यदि राम बलशाली न होते, या वे भगवान का रूप न होते तो क्या रावण ने उसी क्षण अपनी बहन के साथ दुराचार करने वाले का वध न कर दिया होता? बिना यह जाने की सत्य क्या है?

हम सभी वर्तमान में दुराचार से संबंधित जितनी भी घटनाएँ सुन रहे हैं क्या वे सभी सत्य ही हैं? यह जानने की कोशिश हम क्यों नहीं करते? इसके पीछे की हमारी मानसिकता क्या है?

हम जिस दौर में हैं यह स्त्रीवादी दौर है। स्त्रियाँ मुखर हो रही हैं। अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। अपनी आज़ादी, अपनी स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठा रही हैं। यह एक बेहद ज़रूरी कदम है जिसे सालों पहले हो जाना चाहिए था। मगर इस बेहद ज़रूरी कदम के बीच कहीं कुछ ऐसा तो नहीं जिसकी अनदेखी हो रही है? या जिसे बहुत हल्के में आंका जा रहा है, जबकि उसकी तरफ ध्यान देना ज़रूरी है। अन्यथा हम फिर एक ऐसा समाज बना लेंगे जो एक पक्षीय होगा?

वह अनदेखी क्या है? वह है पुरुषों के प्रति हीन और स्त्रियों के प्रति दया भाव। आप रास्ते से गुज़र रहे हों और आप एक स्त्री और पुरुष को लड़ता हुआ देख रहे हों तो आपके मन में पहला भाव यही उठेगा कि देखो कितना बुरा पुरुष है, स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने की जगह सरेआम उससे लड़ रहा है। वहीं यदि कोई स्त्री किसी पुरुष को पीट रही हो तो आप खुश होंगे कि वाह कितनी हिम्मत वाली है कि एक पुरुष को पीट रही है। ज़रूर वह पुरुष ग़लत होगा। जबकि सम्भावना है कि ग़लती स्त्री की ही हो। मगर हम यह नहीं सोचते।

हमने डिफ़ॉल्ट में अब यह मान लिया है कि स्त्री यदि पितृसत्ता के खिलाफ कुछ भी कह रही है तो वह सत्य ही होगा। किसी दुराचार का आरोप लगा रही है तो भी वह सत्य ही होगा। जबकि आपको यह जानकर हैरानी होगी कि फैमिली कोर्ट में आने वाले दुराचार के ढेरों मामले झूठे साबित होते हैं। कुछ वर्ष पुराना जसलीन कौर का केस भी याद हो आता है जिसमें वह लड़का, हर पेशी में हाज़िर होता है लेकिन ख़ुद को पीडिता बताने वाली वह लड़की कभी मुक़दमे के दौरान हाज़िर नहीं होती। इस पूरी कार्यवाही में वह लड़का और उसका परिवार किस मानसिक पीड़ा से गुज़रा होगा यह हमें समझना होगा।

दुराचार होना किसी स्त्री के लिए जितनी पीड़ादायक बात है, उतनी ही पीड़ादायक यह उस पुरुष के लिए जो निर्दोष है मगर फिर भी उस पर झूठा आरोप लगा। जो सज्जन हैं, जो मलिन भाव नहीं रखते, जिनकी नज़रों में हर स्त्री वासना की प्रस्तुति नहीं है, उन पर यदि कोई झूठा आरोप लगाए तो उन्हें भी उतनी ही मानसिक पीड़ा से गुज़रना पड़ता है, यह वर्तमान में हमें समझना बेहद ज़रूरी है।

इस बात का यह अर्थ कतई मत निकालिए कि यहाँ स्त्री-विरोधी बात कहने की कोशिश की जा रही है। बात बस इतनी सी कहने की कोशिश की जा रही है कि आरोप स्त्री का लगाया हो या पुरुष का सज़ा आरोपी को मिलनी चाहिए, न कि सिर्फ इसलिए क्योंकि वह पुरुष है।

हम रावण को पसंद नहीं करते। वजह भी साफ़ है उसने सीता का हरण किया था। मगर कहीं किसी शास्त्र में पढ़ा था कि रावण ने यह प्रण लिया था कि वह किसी भी पर-नारी को तब तक हाथ नहीं लगाएगा जब तक उस स्त्री की सहमति न हो। यही कारण था कि रावण ने सीता का हरण तो किया मगर उसके साथ दुराचार नहीं किया वरन उसे ससम्मान रखा। मगर फिर भी हम रावण को पसंद नहीं करते।

रावण दोषी था या नहीं, लक्ष्मण दोषी था या नहीं, या आज वह पुरुष दोषी है भी या नहीं जिस पर किसी स्त्री ने आरोप लगाया है यह तलाशने की जगह हम भी उसी भीड़ में इकठ्ठा होकर पत्थर फेंकने लगते जो पहले से ही सुनी-सुनाई बात पर पत्थर फेंक रही है।

वर्तमान परिपेक्ष्य में देखा जाए तो जितने भी मामले हमारे सामने आ रहे हैं, क्या यह ज़रूरी नहीं कि यदि कोई पुरुष वाकई दोषी है तो उसके खिलाफ़ कानूनी कार्यवाही की जाए? या सिर्फ सोशल मीडिया पर उस व्यक्ति का नाम ले देना भर हमारी आवाज़ उठाने का अंतिम पड़ाव है? और वे लोग जो दर्शक हैं क्या उन्हें पहली ही नज़र में किसी भी पुरुष को सिर्फ इसलिए दोषी मान लेना चाहिए, क्योंकि वह पुरुष है?

आचार्य मनु ने कहा है– अरक्षिता गृहे रुद्धाः, पुरुषैराप्तकारिभिः!!
“स्त्री स्वयं अपनी रक्षा करने से ही सुरक्षित हो सकती है”

इस पर अमल करते हुए हम अपनी बेटियों को बचपन से हिम्मत सिखा रही हैं। उन्हें ताकत और मुखर होना सिखा रही हैं। उनकी पैदाइश पर ख़ुश हो रही हैं। उन्हें आगे बढ़ा रही हैं। पर क्या हम अपने बेटों को बचपन से एक अच्छा पुरुष बनने की सीख दे रही हैं? क्या हम उन्हें सिखा रही हैं कि किसी भी स्त्री की ‘ना’ को स्वीकारना सीखो? या क्या हम उन्हें यह सिखा रही हैं कि अपनी माता, बहन या पत्नी के साथ घर के कार्यों में उतनी कि भागीदारी रखो जितनी उसकी बहन, माता या पत्नी की है?

यदि हम उन्हें यह सिखा ही नहीं रहीं तो दोषी कौन हुआ? वे पुरुष जो बचपन से अपने पौरुष के दंभ के साथ, या एक अलग ही प्रिविलेज के साथ पले-बढ़े? या वे माताएँ जिन्होंने कभी उन्हें उस रूप में पाला ही नहीं जिस रूप में वे उन्हें आज देखना चाहती हैं।

एक माँ जब अपने साथ घटी घटनाओं के विरोध में अपनी बेटी को आवाज़ उठाना सिखाती है तो उसी क्षण यह बेहद ज़रूरी है कि वह अपने बेटे को भी उसमें सहभागी बनाए। वह उसे बचपन से यह सिखाए कि पग-पग पर उसके बेटे को स्त्रियों के सम्मान का साथी कैसे बनना है। यदि हम अब उन्हें बचपन से यह सब नहीं सिखाते हैं तो कल को उनके किसी भी कु-कृत्य के लिए हम भी उतने ही दोषी होंगे जितने वे खुद, या शायद उनसे ज्यादा ही, क्योंकि हमने उन्हें एक पुरुष रूप में पाला न कि एक इंसान के रूप में और यदि बड़े होकर वे अपने पौरुष का दंभ दिखाते हैं तो इसमें वे अकेले दोषी नहीं होंगे।

शिव का एक रूप है अर्धनारीश्वर। जो स्त्री और पुरुष के पूरक होने का प्रतीक है। आपकी धर्म में आस्था नहीं। आप शिव को नहीं मानते? कोई बात नहीं। आप प्रकृति को मानते होंगे। प्रकृति भी यही कहती है कि नर और मादा एक दूसरे के पूरक है। धरती पर उपस्थित सभी जीव यहाँ तक कि पेड़-पौधे भी नर और मादा के मिलन से अंकुरित होते हैं। ऐसे में यह सोच लेना कि अब तक पुरुषों ने, पितृसत्ता ने हमें दबाया तो अब हमारी बारी है, न सिर्फ निहायत मूर्खता होगी बल्कि अपने भविष्य के साथ अन्याय भी होगा।

हमें बेशक़ ज़रूरत है कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की मगर अपने साथी को प्रतिद्वंदी मानते हुए नहीं, बल्कि उसमें विश्वास रखते हुए।

हम जिस लड़ाई के मैदान में खड़े हैं वहॉं यह बेहद ज़रूरी है कि हम शकुनि से इसलिए नफरत न करें कि वह महाभारत कराने का मुख्य अपराधी था। बल्कि हम यह देखें कि वह अपनी बहन से इतना प्रेम करता था कि उसने उसके लिए एक अँधा पति स्वीकारना नहीं चाहा. वह अपनी बहन को मूर्ख बनते और जीवन भर अँधा होते नहीं देखना चाहता था। इसलिए उसने उन लोगों से प्रतिशोध लेना चाहा जिन्होंने उसकी बहन का जीवन अंधकारमय बनाया। अब यह उसकी किस्मत ही थी कि उसके विरोधी इतने बेबकूफ थे कि उसकी चालों में फँसते गए और एक महा-युद्ध को जन्म हुआ।

यहाँ हमें युधिष्ठिर को भी सिर्फ इसलिए नहीं पूज लेना चाहिए क्योंकि वे पांडव थे, सत्य और धर्म के रक्षक थे। बल्कि एक पल ठहरकर यह सोचना चाहिए कि उन्होंने अपनी स्त्री को अपनी संपत्ति माना और उसे पांसों के खेल में दॉंव पर लगा डाला।

यहाँ एक स्त्री अस्मिता की रक्षा की अगर बात उठे तो आपका विश्वास किस ओर होना चाहिए यह आपको तय करना होगा।

बेशक़ वर्तमान में जितने आक्षेप पुरुषों पर लग रहे हैं उनमें से कई सत्य भी होंगे। मगर इसका यह अर्थ नहीं मान लेना चाहिए कि पूरा पुरुष वर्ग ही दोषी है। यदि कोई दोषी है भी तो वह परवरिश जिसने उन्हें इतने लम्बे काल तक पौरुष के दंभ के साथ पाला।

यह ज़रूरी है कि हम अपने आस-पास के पुरुषों पर, अपने साथियों पर भरोसा रखें। उन पर जो हमारे साथ हैं। उन पर जिन्होंने हमें ऐसा माहौल दिया कि हम भरोसा करना सीखें. हम उन्हें यह अहसास दिलाएं कि हमें उन पर भरोसा है।

19 नवम्बर को अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जाता है। भारत में यह दिन महिलाओं को क्या पुरुषों को भी याद नहीं रहता। कईयों को तो पता भी नहीं होता कि उनके लिए भी कोई दिन है। यह नगण्य है, क्योंकि महिला दिवस और महिला क्रांति की चकाचौंध में हमने यह ज़रूरी ही नहीं समझा कि पुरुषों के लिए भी बनाए गए ऐसे किसी दिन के बारे में बात हो।

1992 में जब पुरुषों के लिए एक दिन निर्धारित किया गया तो उनसे पूछा गया कि आख़िर आप पुरुषों के लिए एक दिन क्यों चाहते हैं? पुरुषों की तो पूरी सत्ता ही है। अब तक उन्हीं के द्वारा तो शासन किया गया। उन्हीं के द्वारा महिलाओं का जीवन-जीवनशैली निर्धारित की गई तो अब ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी कि उन्हीं पुरुषों के लिए एक दिन निर्धारित किया जाए?

तब कई सारे आँकड़ों और मुद्दों के बीच एक मुद्दा यह भी रखा गया कि कई देशों में प्रतिवर्ष पुरुषों की आत्महत्या की दरें महिलाओं से बहुत अधिक हैं।

एक ओर महिला सशक्तिकरण हो रहा है, जहाँ उनकी आवाज़ सुनी जा रही है, जहाँ वे अपनी बात रख सकती हैं, कह सकती हैं, मगर वे पुरुष कहाँ जाएँ जो महिला या पुरुष दोनों के ही द्वारा शोषित हो रहे हैं। पुरुषों को तो पहले ही इतना मजबूत समझा जाता है कि “मर्द को दर्द नहीं होता” या “औरतों की तरह क्यों रोता है” जैसी कहावतें ही बन गईं। मगर क्या वाक़ई पुरुष इतना भावना-हीन है कि उसे किसी भी तकलीफ पर दर्द नहीं होता, वह रो नहीं सकता, या वह इतना संबल है कि हर परेशानी को सँभाल सकता है। नहीं, यह भी सदियों से चली आ रही है परिपाटी की तरह पूर्वाग्रह से ग्रसित एक धारणा है।

वे भी परेशान हो सकते हैं, उनके साथ भी दुराचार हो सकता है। उन्हें भी सहायता की आवश्यकता हो सकती है। वे भी अपनी बात रखना चाहते होंगे। उन पर लगे आरोप भी असत्य होते होंगे। उनके पास भी अपनी सत्यता प्रमाणित करने के लिए कुछ तथ्य होंगे, जिन्हें सिर्फ इसलिए दरकिनार नहीं कर दिया जाना चाहिए क्योंकि वे पुरुष हैं।

हम साथी हैं… हमें साथ चलना है… यही प्रकृति की और हमारी ज़रूरत है।

(लेखिका अंकिता जैन की दो किताबे ‘ऐसी-वैसी औरत’ और ‘मैं से मॉं तक’ प्रकाशित हो चुकी है)

BHU में सावरकर की फोटो उखाड़ कर पोती स्याही: वामपंथी छात्र ने कहा- ‘वाह! माँ #% दी’

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के बाद अब बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में भी वामपंथी छात्रों ने उलूल-जलूल हरकतें करनी शुरू कर दी है। ताज़ा ख़बर के अनुसार, बीएचयू में वीर सावरकर की फोटो के साथ छेड़छाड़ की गई है। छात्रों ने न सिर्फ़ स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के चित्र को दीवार से उखाड़ कर नीचे फेंक दिया बल्कि उसपर स्याही भी पोत दी। दरअसल, मामला ये है कि बीएचयू के पोलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में महात्मा गाँधी, बाबासाहब आंबेडकर और वीर सावरकर सहित कई महापुरुषों के चित्र लगे हुए हैं। सभी क्लासरूम में 3 वर्ष पहले छात्रों व शिक्षकों के सहयोग से इन चित्रों को लगाया गया है।

ये घटना सोमवार (नवंबर 18, 2019) की है। सुबह 10 बजे जब एमए फर्स्ट ईयर के छात्र जब रूम नंबर 103 में क्लास करने पहुँचे तो उन्होंने जो देखा, उससे वो हतप्रभ रह गए। वीर सावरकर की फोटो को दीवार से उखाड़ कर पहली बेंच पर पटक दिया गया था। फोटो पर स्याही लगी हुई थी। इसके बाद छात्र आक्रोशित हो उठे और धरने पर बैठ गए। छात्रों के आक्रोश को देख कर एचओडी वहाँ पर पहुँचे। एचओडी ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि ये ग़लत है। उन्होंने छात्रों को आश्वसन दिया कि एक कमिटी गठित कर के मामले की जाँच की जाएगी।

वीर सावरकर की फोटो के साथ छेड़छाड़, दीवार से उखाड़ दिया गया

एचओडी ने कहा कि वीर सावरकर की फोटो को फिर से कक्षा की दीवार पर लगाया जाएगा। साथ ही दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने का भी आश्वासन दिया। इसके बाद छात्रों का धरना ख़त्म हुआ। एमए के छात्रों ने वामपंथी छात्र संगठन आइसा पर आरोप लगाया है। छात्रों ने कहा कि ये उनका ही काम है क्योंकि वो लोग पहले से ही ऐसी धमकियाँ दे रहे थे। जब दिल्ली विश्वविद्यालय में सावरकर की प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ कर के उन्हें अपमानित किया गया था, तब आइसा के एक सदस्य आशुतोष कुमार ने फेसबुक पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।

पहले कुछ यूँ लगी हुई थी वीर सावरकर की फोटो

आशुतोष ने फेसबुक अकाउंट पर लिखा था कि सावरकर की प्रतिमा को कालिख पोत कर ‘मइया &% दी गई’। साथ ही उसने धमकी भी दी थी कि अब बीएचयू के पोलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में लगे सावरकर के फोटो बारी है। इस धमकी के कारण लोग इस पूरी घटना में वामपंथी छात्र संगठन आइसा का हाथ होने की ही आशंका जता रहे हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन को भी इस सम्बन्ध में सूचित कर दिया गया है।

आइसा के आशुतोष का आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट

आक्रोशित छात्रों ने चेतावनी दी है कि वो मंगलवार को इस मामले में एफआईआर दर्ज करेंगे। बीएचयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सह संयोजक अभय प्रताप सिंह ने इस मामले को लेकर ऑपइंडिया से बातचीत की। उन्होंने कहा कि सितम्बर में भी वीर सावरकर की फोटो को क्लासरूम में निकाल कर फेंक दिया गया था। इसके बाद एबीवीपी ने इसे किसी की ग़लती समझ कर फोटो को रिपेयर करवाया। बीएचयू में एमए फाइनल ईयर के छात्र अभय प्रताप ने कहा कि ये पूर्णरूपेण वामपंथी छात्र संगठन का काम है क्योंकि जेएनयू से लेकर डीयू तक ये लोग ऐसी ही हरकतें कर रहे हैं। छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को भी पत्र लिख कर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। पत्र की कॉपी:

छात्रों ने डीन को पत्र लिख कर की कड़ी कार्रवाई की माँग

बीएचयू में पिछले कुछ महीनों से ऐसे कई मामले आ रहे हैं, जिसमें हिन्दू-विरोधी हरकतों की झलकियाँ मिल रही हैं। एबीवीपी का आरोप है कि वामपंथी छात्र संगठन अब बीएचयू को नया जेएनयू बनाना चाहते हैं। अब देखना यह है कि मंगलवार को छात्रों द्वारा नामजद एफआईआर दर्ज कराने के बाद क्या कार्रवाई की जाती है?

नेहरू के बंगले का टैक्स नहीं चुका रहे थे कॉन्ग्रेसी: 4 करोड़ के टैक्स का नोटिस, धरे गए तो बोले ये साजिश है

नेहरू-गाँधी खानदान का पैतृक घर आनंद भवन इन दिनों गृह-कर न भरने के चलते सरकार के निशाने पर है। प्रयागराज स्थित इस घर को नगर निगम की ओर से चार करोड़ 19 लाख रूपए के बकाया टैक्स पर नोटिस भेजा गया है। एक ज़माने में यही आनंद भवन मोतीलाल नेहरू का बंगला हुआ करता था। निगम ने यह नोटिस आनंद भवन-स्वराज भवन के कमर्शियल उपयोग की वजह से भेजा है। दरअसल यह परिसर अब एक घर नहीं बल्कि एक पर्यटन स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

दूसरी ओर इस कार्रवाई पर कॉन्ग्रेसियों ने भी मोर्चा खोल लिया है। इस फैसले के जवाब में कॉन्ग्रेस पार्टी ने कहा है कि इस हिसाब से तो साबरमती ट्रस्ट और संसद पर भी टैक्स लगाया जाना चाहिए। इस मामले में आनंद भवन का रखरखाव करने वाले फंड के सचिव बाला कृष्णन ने मेयर को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि चैरिटेबल ट्रस्ट की गतिविधि कामर्शियल नहीं हो सकती है। उन्होंने हाउस टैक्स का मूल्यांकन गलत होने की बात कही है। वहीं इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता बाबा अभय अवस्थी ने योगी सरकार पर हमला बोला है। उन्होंने इसे सियासी साजिश बताया।

जबकि नगर निगम का कहना है कि आनंद भवन की ओर से पहले समय पर टैक्स चुका दिया जाता था मगर बीते कई सालों से ऐसा नहीं हुआ है जिसके चलते आनंद भवन पर करीब 2 करोड़ 71 लाख 13 हज़ार 534 रूपए का गृहकर बकाया है। इस धनराशि पर टैक्स लगने के बाद यह बढ़कर चार करोड़ 19 लाख 57 हज़ार 495 रूपए हो गई है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक 1970 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के निर्णय के बाद आनंद भवन और स्वराज भवन को एक ट्रस्ट को सौंप दिया था। अब इस पूरे परिसर की देख-रेख जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फण्ड के तहत होती है। इस प्रांगण में बाल भवन, संग्रहालय,तारामंडल आदि शामिल हैं जिसके लिए अगन्तुकों टिकट खरीदना पड़ता है। इससे अर्जित किया जाने वाला पैसा सीधे रख-रखाव वाले फण्ड में जमा किया जाता है।

बता दें कि स्वराज भवन आनंद भवन का ही एक भाग है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मोतीलाल नेहरू ने अपनी संपत्ति का यह भाग कॉन्ग्रेस पार्टी को अपने कामकाज के लिए दे दिया था। उस वक़्त से लेकर आजतक इसे स्वराज भवन कहा जाता है।

बांग्लादेश से संचालित मेघालय के उग्रवादी संगठन HNLC पर गृहमंत्रालय ने UAPA के तहत लगाया बैन

भारत सरकार ने मेघालय के एक विद्रोही संगठन हिनीवट्रेप नेशनल लिब्रेशन काउंसिल (एचएनएलसी) को पूरी तरह से बैन कर दिया है। यह एक उग्रवादी संगठन है जो सार्वजनिक रूपसे भारत को खंडित करने के अपने उद्देश्य की घोषणा कर चुका है। इस संगठन का उद्देश्य है कि खासी और जयंतिया जनजाति बहुल इलाकों को भारत से अलग किया जाए। सरकार ने न सिर्फ इस संगठन एचएनएलसी को प्रतिबंधित किया है बल्कि इससे जुड़ी तमाम छोटी-बड़ी इकाइयों को भी पूरी तरह से बैन कर दिया है।

बता दें कि एचएनएलसी संगठन के सदस्य स्थानीय लोगों को डरा,धमकाकर जबरन वसूली करने वाले यह संगठन देश की सीमा से पार बांग्लादेश में अपने कैम्प चलाते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस संगठन के तार पूर्वोत्तर के राज्यों में चलने वाले उग्रवादी संगठनों से भी जुड़े हुए हैं। यह उग्रवादी संगठन अपने-अपने इलाकों से पैसा वसूलकर बांग्लादेश में कैम्प चलाते हैं और प्रशिक्षण देते हैं।

उपद्रवी हरकतों के चलते केंद्र सरकार ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि एचएनएलसी और उसकी गतिविधियाँ देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए एक बड़ा खतरा है। बता दें कि इस संगठन पर 16 नवम्बर 2000 को बैन लगाया गया था मगर बाद में इस बैन को हटा लिया गया।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय के मुताबिक इस संगठन की गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाए जाने की ज़रूरत है। अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो इस संगठन को हथियारबंद होकर पैर-पसारते देर नहीं लगेगी। जिसके बाद देश के कई नागरिकों से लेकर सुरक्षाकर्मियों की जान जा सकती है। इसके बाद इन संगठनों को भारत विरोधी गतिविधियों को विस्तार देने में देर नहीं लगेगी।

इस सम्बन्ध में गृह-मंत्रालय ने अधिसूचना जारी करते हुए एचएनएलसी और इससे जुड़े सभी बड़े-छोटे संगठनों पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाने का आदेश दिया है। भारत सरकार ने आतंकी वारदात को अंजाम देने वाले इस संगठन एचएनएलसी को देश की सुरक्षा के चलते यूएपीए कानून के तहत बैन कर दिया है।