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कमलनाथ के खिलाफ 5000 शिक्षकों का प्रदर्शन, सैलरी नहीं दे रही कॉन्ग्रेस सरकार

मध्यप्रदेश के सरकारी कॉलेजों के शिक्षक तनख्वाह न मिलने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश कॉलेजियेट प्रोफेसर्स यूनियन के इस प्रदर्शन में तकरीबन 5000 शिक्षक आन्दोलन कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक यह आन्दोलन तीन चरणों में होगा जिसमें प्रदर्शन करने वाले शिक्षक 21 नवम्बर से प्रतिदिन राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार को उनके (शिक्षकों के) बकाया पैसे देने के लिए पत्र लिखेंगे।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यूनियन के अध्यक्ष कैलाश त्यागी ने कहा, “हम बड़े खुश थे जब हमने सुना कि हमारी तनख्वाह दिवाली से पहले ही दे दी जाएगी, मगर हमें आज तक सैलरी नहीं मिली। मुझे तो यह जानकारी भी मिली है कि कई कॉलेजों में तो शिक्षकों को दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली।”

एक अन्य प्रोफ़ेसर ने बताया, “हम सबकी अपनी मजबूरियाँ हैं, परिवार की भी ज़िम्मेदारी है। हम ईएमआई तक नहीं भर पा रहे। आप समझ सकते हैं कि हम किन हालात से गुज़र रहे हैं।”

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों ने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए 24 से लेकर 30 नवम्बर तक काली पट्टी बाँधने का निश्चय किया है। सरकारी शिक्षकों के एक एसोसिएशन के सचिव प्रोफेसर आनंद शर्मा ने ने बताया कि 1 दिसंबर से सभी शिक्षक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे।

शुरुआत में इस मुद्दे को टालने के लिए राज्य की कमलनाथ सरकार ने कहा था कि उनके पास शिक्षकों ऐसी कोई शिकायत ही नहीं पहुँची है। मगर इसके बाद सोमवार शाम राज्य के उच्च शिक्षा विभाग की ओर से सभी शिक्षकों को मैसेज भेजा गया जिसमें लिखा था कि उनकी अक्टूबर की सैलरी तत्काल प्रभाव से उन्हें भेज दी गई है।

शिक्षकों के प्रति मध्य-प्रदेश सरकार के उदासीन रवैये के खिलाफ लम्बे समय से वहाँ के शिक्षक अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। 5 सितम्बर को टीचर्स डे के दिन गेस्ट फैकल्टी के तौर पर काम करने वाले कई लेक्चरर अपना विरोध दर्ज कराने भोपाल पहुँचे थे। उनका कहना था कि प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार उन्हें परमानेंट करने के अपने वादे से मुकर रही है।

भोपाल में शिक्षक दिवस पर शिक्षकों के प्रदर्शन से भड़क कर कमलनाथ के कैबिनेट मंत्री गोविन्द सिंह ने कहा था, “सरकार के पास पैसे पेड़ पर नहीं उगते, सरकार आने वाले पाँच साल में अपने वादे को पूरा करने की कोशिश करेगी।”

बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने चुनाव पूर्व यह वादा किया था कि सत्ता में आने पर वे गेस्ट के तौर पर काम करने वाले 80,000 शिक्षकों को परमानेंट कर देंगे, मगर अभी तक इस सम्बन्ध में कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।

सीताराम! नक्सली आतंकियों के नाजायज बापों को राम से इतनी एलर्जी क्यों है…

मार्क्सनंदन कामपंथी वामभक्तों की पार्टी ‘माकपा’ ने दो दिन की बैठक की। बैठक क्यों की, इसकी क्या जरूरत थी, ये इनके पार्टी वालों को छोड़ कर किसी की समझ में नहीं आता। इन्हें अब स्कूल की प्राइमरी कक्षाओं में मॉनीटर का चुनाव छोड़ कर कोई पूछने वाला बचा नहीं है, लेकिन 24/7 चिल्लाने वाली मीडिया में खबरों की कमी के बीच इनसे भी दो बातें पूछ ली जाती हैं कि भैया, दो दिवसीय चिंतन जो किया उसमें हुआ क्या।

इन्होंने अपने मुद्दे तक सत्ता की चाहत में भुला दिए, जो कि बाकी पार्टियों द्वारा हथिया लिए गए, तब इनके पास सिवाय कल्पनाशीलता के कुछ बचता नहीं है। आज इनकी हालत इतनी बेकार हो चुकी है कि केरल में वामपंथी सरकार ने जब दो वामपंथियों को यूएपीए के तहत जेल में डाल दिया तो बिफर गए कि अपनी सरकार में ऐसा कैसे हो सकता है।

इनके दो दिवसीय बैठक से जो मूल बात निकल कर बाहर आई वो यह है कि ‘अयोध्या पर फैसला आया है, न्याय नहीं हुआ।’ इसके साथ ही भावुकता में बहते हुए मार्क्सवंशियों ने यहाँ तक कहा कि ये फैसला एक खास वर्ग के लोगों को ध्यान में रख कर दिया गया है। उनकी इस पंक्ति से सड़ाँध मारने वाले तर्क की दुर्गंध फैल जाती है। इनके कहने का मतलब यह है कि ‘हिन्दुओं को ध्यान में रख कर फैसला दिया गया है’, जबकि सुप्रीम कोर्ट को ‘इस वर्ग के नहीं, दूसरे वर्ग के लोगों को ध्यान में रख कर फैसला देना चाहिए था।’

आप इनकी ऐंठ देखिए कि है कुछ नहीं इनके पास, लेकिन जो है उसी को इतनी जोर से बजा रहे हैं कि कब फूट जाए, पता नहीं। इनकी ऐंठ और घमंड यह है कि इनके लिए भारतीय इतिहास 1949 से ही शुरु होता है। उसके पहले जो हुआ, उसको बोलते भी नहीं कहीं। बहुत पीछे जाते हैं तो 1528 में पहुँचते हैं जहाँ रहमदिल, आलमपनाह बाबर, जिसके माता और पिता पक्ष पर करोड़ों हत्याओं का रक्त है, कंधे पर पत्थर उठा कर एक जंगल-झाड़ में, छेनी-हथौड़ा से कूटते हुए मस्जिद बनाता दिखता है।

इनका वश चले तो यही कह दें कि बाबर ने ही भारत को समुद्र से खींच कर बाहर निकाला था, और हर भारतीय को उसका शुक्रगुजार होना चाहिए। इनका वश चले तो सुप्रीम कोर्ट में जज नहीं, पोलित ब्यूरो के सदस्य बैठेंगे।

चीन के उइगरों पर चुप क्यों हो?

1962 के भारत-चीन युद्ध में चीन का समर्थन करने वाले वामपंथी, आज मंदिर के ऊपर बनी उस नासूर मस्जिद के लिए ‘हाय बाप-हाय दादा’ चिल्ला रहे हैं, जैसे कि उसी मस्जिद में इनके युवा काडरों के लिए विशिष्ट पदार्थों का भंडारण होता था जिसके सेवन से ऐसे दुनिया बदलने वाले ख्याल इनके दिमाग में उपजते हैं।

आम तौर पर वेनेजुएला से ले कर स्वीडन तक के वामपंथी लम्पटों के लिए तुरंत झंडा निकाल लेने वाले भारतीय वामपंथी, चीन पर झंडे का डंडा स्थान विशेष में छुपा लेते हैं। उइगरों के साथ जो चीन कर रहा है, उस पर एक बयान तक नहीं आता। ये तो कम्यून मानते हैं, देश तो ‘टुकड़े-टुकड़े’ हो जाए, ‘केरल, पंजाब, बस्तर’ सबके लिए आजादी माँगते हैं, फिर भारत के समुदाय विशेष और चीन के उइगरों में अंतर कैसा? वो इसलिए कि भारत का समुदाय विशेष कन्हैया को वोट देता है, वहीं उइगर मुस्लिम महिलाओं के साथ चीनी राष्ट्रपति क्या करवा रहे हैं, वो इंटरनेट पर मिल जाएगा।

बैठक में बताया जा रहा है कि राफेल और सबरीमाला पर भी इनकी कुछ राय है। इनकी राय सुप्रीम कोर्ट के साथ नहीं है। ये चाहते हैं कि सारी हिन्दू परम्पराएँ ध्वस्त हो जाएँ, लेकिन धर्म/मजहब को न मानने वाले ये चम्पू अचानक से मस्जिद के लिए कंधे पर ईंट ले कर चलने को तैयार हैं।

वामपंथियों से सीधा सवाल यह है कि जब तुम सर्वहारा की लड़ाई लड़ने का ज्ञान देते हो, तो इसमें मस्जिद की उपयोगिता कहाँ से आ गई? विचार इस पर करो कि खास समुदाय में एक प्रतिशत महिलाएँ ही ग्रेजुएट क्यों हैं? बहुत ज्यादा दया आती है अल्पसंख्यकों की स्थिति पर तो हलाला जैसी बेहूदगी से मुक्त करवाओ उन्हें! अगर कथित अल्पसंख्यकों से इतना ही प्रेम है तो उनकी आधुनिक शिक्षा के लिए प्रयास करो, उन्हें मदरसों से बाहर निकालो।

लेकिन वो तुमसे हो नहीं पाएगा। वो इसलिए नहीं हो पाएगा क्योंकि नसों में दोगलेपन से सना हुआ रक्त बह रहा है। मुस्लिम को बाबरी मस्जिद मिले या न मिले, वो जिंदा रह सकता है, अपने जीवन में आगे बढ़ सकता है, लेकिन अगर उसके पास शिक्षा का अभाव है, वहाँ ध्यान नहीं दिया जा रहा है तो वो कहीं पत्थरबाज बनेगा, कहीं आतंकी बनेगा, कहीं कट्टरपंथियों के साथ मिल कर दंगों को अंजाम देगा।

तुम ये कर नहीं पाओगे क्योंकि अपनी मीटिंग में चाय-समोसे का फंड जुटा पाना भी तुम्हारे लिए आज मुश्किल है। वो इसलिए मुश्किल है क्योंकि तुम पर किसी का विश्वास रहा नहीं, और जेएनयू जैसी जगहों पर नितम्ब चिपकाकर चुनाव जीतने से पद तो मिल जाता है, लेकिन गंगा ढाबा पर ‘दो रूपया देना कामरेड, बीड़ी पीनी है’ वाले फंड से बीड़ी ही खरीदी जा सकती है, लोगों का विश्वास नहीं।

इसलिए, मार्क्स को ही अपना बाप बनाने पर तुले मूर्खाधिराजो! हे धूर्त नक्सलियो! हे दोगले वामपंथियो! सुप्रीम कोर्ट को दोष देना बंद करो और अगर सच में चाहते हो मजहब विशेष का उत्थान हो, तो उनकी बेहतरी के लिए कुछ मुद्दे मैं बता रहा हूँ जिसे पकड़ कर तुम्हारा बेहतर टाइमपास हो सकता है: अशिक्षा, कुपोषण, कट्टरपंथ, हलाला-बहुपत्नी प्रथा-तीन तलाक जैसी कुरीतियाँ इत्यादि।

पैटर्न है लोकतंत्र के खम्भों पर लगातार हमला

इनका पैटर्न है ये। पाँच साल से चिल्लाते रहे कि लोकतंत्र की तो हत्या हो गई, आज लोकतंत्र शर्मसार हुआ, आज दोबारा मर गया, आज तो आपातकाल आ गया है, आज तो घृणा फैलाई जा रही है, आज तो असहिष्णुता आ गई है हिन्दुओं में, लेकिन लोकतंत्र का ‘लोक’ इन्हें नकारता रहा। जितनी घटनाएँ ये लोग लिंचिंग, ‘जय श्री राम’, गौरक्षक आदि के नाम पर गिनाते हैं, हर एक में हिन्दुओं को पीड़ित होने का अनुपात ही ज्यादा है।

हर अखलाख के लिए दस भरत यादव हैं, हर पहलू खान के लिए दस प्रकाश मेशराम हैं, हर तबरेज पर दस काँवड़ियों का जत्था है जिस पर पत्थरबाज़ी हुई, हर हिन्दू असहिष्णुता की खबर पर दस खबरें हैं कि दुर्गा की मूर्ति कट्टरपंथियों ने तोड़ी, रामनवमी जुलूस पर हमला किया, कई मंदिर तोड़े, जय श्री राम पर झूठी खबरें फैलाई गईं …

इसलिए, अब मीडिया में जब ये हर बार अपने प्रपंच पर पकड़ लिए जाते हैं तो तथ्य की राह छोड़ कर अब विचार पर उतर आए हैं। पहले ‘मु##मानों की लिंचिंग हो रही है’ को काटने के लिए खबरें छुपा ली जाती थीं, अब वैसा नहीं हो पाता, तो अब ये लोग ऐसी बातें नहीं कर पा रहे। अब इन्होंने विधायिका पर प्रश्न करना छोड़ दिया है और लोकतंत्र के दूसरे खम्भे पर हमला बोलना शुरु कर दिया है।

अब इनके फायरिंग रेन्ज में सुप्रीम कोर्ट है। अब वो सुप्रीम कोर्ट है, वो न्यायपालिका है जिसमें कमोबेश हर भारतीय की आस्था है। अगर इसी खम्भे पर मूत्र विसर्जन कर-कर के, गला दिया जाए, तो इन वामपंथियों का लक्ष्य सध जाएगा। इसलिए, पूरी लॉबी एक साथ, इकट्ठा हो कर चिल्ला रही है कि मजहब विशेष के साथ तो अयोध्या में अन्याय हो गया। एक ऐसा नहीं है इनमें जो यह कह सके कि नहीं, वो जगह हिन्दुओं की थी, मंदिर था, वहाँ मस्जिद बनानी ही नहीं चाहिए थी। और जब बन गई तो मजहब विशेष वालों को साम्प्रदायिक सौहार्द का परिचय देते हुए, बिना कोर्ट कचहरी के, जगह खाली कर देनी चाहिए थी।

उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने लगातार कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास है। उन्हें विश्वास इसलिए था क्योंकि बाबरी का ध्वंस लोगों की स्मृतियों में ताजा था। सबको दिखा था कि बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया है। इसलिए उम्मीद थी कि फैसला उसी टूटी मस्जिद के आधार पर होगा। राम के अस्तित्व पर सवाल उठाए गए इस देश में! पूछा गया कि वो हुए, ये किसने देखा। रामायण तो मिथ्या है, कल्पना है किसी लेखक की।

इसलिए, जब तक इन्हें उम्मीद थी कि फैसला इनके पक्ष में आएगा, ये चुप रहे। तब तक सवाल नहीं उठाया सुप्रीम कोर्ट पर, लेकिन पाँच जजों के एकमत फैसले को ये दस-बीस वामपंथी नेता ‘अन्याय’ कह रहे हैं। भारत का संविधान सबको बोलने की आजादी देता है, आजादी तो इतनी देता है कि इसी देश के टुकड़े की इच्छा पर ‘इंशाअल्लाह’ कहा जाता है, और लोग कुछ नहीं कहते।

अब सुप्रीम कोर्ट ही उठल्लू हो गया है। अब इन वामपंथियों की सभा तय करेगी कि सुप्रीम कोर्ट के जज क्या फैसला सुनाएँ। ये चाहते हैं कि राफेल में घोटाले की बात मान ले सुप्रीम कोर्ट, नहीं मान रही तो फिर ये लोग खुद जाँच करेंगे। जो सामरिक महत्व की गोपनीय बातें सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए, उसे ये चार चम्पक वामपंथी सरेआम कर देना चाहते हैं ताकि सारे देशों से भारत के रिश्ते खराब हो जाएँ।

लेकिन ऐसी सभा, ऐसा कोर्ट, ऐसी जाँच समितियाँ इन वामपंथियों के सपनों में ही बैठ सकती है क्योंकि इन भिखारियों के पास बीड़ी पीने के तो पैसे हैं नहीं, सभा कैसे बुलाएँगे।

वीर सावरकर को भारत रत्न देने के लिए पैरवी की जरूरत नहीं: संसद में मोदी सरकार

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में बीजेपी ने स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) को भारत रत्न देने का वादा किया था। अब लोकसभा में भी सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया दी है। गृह मंत्रालय ने लोकसभा में मंगलवार को कहा कि भारत रत्न के लिए सिफारिशें आती रहती हैं लेकिन इसके लिए किसी औपचारिक सिफारिश की जरूरत नहीं है। समय-समय पर भारत रत्न को लेकर फैसले किए जाते हैं।

बता दें कि संसद के शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन मंगलवार (नवंबर 19, 2019) बीजेपी के ही एक सांसद गोपाल चिन्नया शेट्टी ने इस संबंध में सवाल पूछे। जिसके बाद गृह मंत्रालय की ओर से जवाब में ये बातें कही गई।

गौरतलब है कि भारत रत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और सरकार इसके लिए राष्ट्रपति से संस्तुति करती है। महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने घोषणा की थी कि सत्ता में आने के बाद वह वीर सावरकर के नाम की सिफारिश भारत रत्न के लिए करेगी। इसे लेकर उस समय भी काफी विवाद हुआ था।

कॉन्ग्रेस सावरकर को भारत रत्न देने की बीजेपी की माँग की निंदा कर रही थी। कॉन्ग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा था, “अगर महात्मा गाँधी की 150 वीं वर्षगाँठ पर यह सरकार वीर सावरकर को भारत रत्न देने के बारे में सोचती है, तो मैं कह सकता हूँ कि इस देश को भगवान ही बचा सकते हैं।”

इसके अलावा उन्होंने बीजेपी की इस माँग पर कटाक्ष करते हुए पूछा था कि वह महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को यह सम्मान देने की माँग क्यों नहीं करती? मनीष तिवारी का कहना था कि सावरकर पर महात्मा गाँधी हत्याकांड में साजिश में शामिल होने के आरोप में मुकदमा चला था। हालाँकि बाद में वह बरी हो गए थे।

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राम जन्मभूमि पर जमीयत ने उगला जहर, कहा- हिंदुओं को मंदिर के लिए कहीं और 5 एकड़ जमीन देता सुप्रीम कोर्ट

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद से ही कई मजहबी संगठन और उसके नेता सवाल उठा रहे हैं। इसमें जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और एआईएमआईएम प्रमुख तथा हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी अगुआ हैं। जमीयत ने एक बार फिर जहर उगलते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को मुस्लिमों की बजाए हिंदुओं को मंदिर बनाने के लिए अलग से जगह देनी चाहिए थी।

शीर्ष अदालत ने दशकों से चल रहे इस विवाद का निपटारा करते हुए 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने विवादित जमीन रामलला को सौंपते हुए मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार को तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया था। साथ ही, दूसरे पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने के भी निर्देश दिए थे।

ज्यादातर तबकों ने इस फैसले का स्वागत किया। बाबरी मस्जिद के मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी भी इनमें हैं। लेकिन, ओवैसी ने फैसले के बाद कहा कि मुस्लिमों को 5 एकड़ जमीन नहीं चाहिए। जमीयत और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की बात भी कही है। बीते दिनों जमीयत के प्रमुख अरशद मदनी ने कहा था कि उन्हें मालूम है कि समीक्षा याचिका खारिज हो जाएगी। इसके बावजूद वे इसे दाखिल करेंगे।

अब मौलाना मदनी ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले में, सभी सबूत बाईं ओर इशारा करते हैं, जबकि फैसला दाईं ओर जाता है। कोर्ट यह स्वीकार करता है कि मुस्लिमों ने 1857 से 1949 तक वहाँ नमाज अदा की। इस बात को माना गया कि 1934 में मस्जिद को नुकसान पहुँचाया गया था और इसके लिए हिंदुओं पर जुर्माना भी लगाया गया था। यह भी स्वीकार किया गया कि 1949 में वहाँ मूर्तियों की स्थापना गलत थी। साथ ही 1992 में मस्जिद के विध्वंस को भी गैर कानूनी करार दिया।” मदनी ने कहा कि कोर्ट ने यह भी नहीं कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। लेकिन, फैसले में जमीन उन लोगों को दे दी जिन्होंने मस्जिद तोड़ी थी।

यहाँ पर हम आपको बता दें कि सैयद अरशद मदनी ने जो कुछ कहा है, उसमें कई त्रुटियाँ हैं।

1. कोर्ट ने कहा कि मस्जिद के नीचे की संरचना ‘गैर-इस्लामी’ थी। कोई भी यह नहीं बता सकता कि वो संरचना किस चीज की थी। कोई भी आदमी अपने होश में यह नहीं बता पाएगा कि वह पब था या शॉपिंग मॉल।

2. यह निर्णय स्वीकार करता है कि दूसरे पक्ष ने भी 1857 से 1949 तक नमाज़ अदा की लेकिन अदालत ने यह भी माना है कि यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि 1528 ई से 1857 तक वहाँ नमाज़ अदा की जाती थी। यह वक्फ बोर्ड के वकील द्वारा भी स्वीकार किया गया है।

3. SC का फैसला यह भी कहता है, 1856-57 में, अयोध्या में हिंदुओं और दूसरे समुदाय के बीच हुए दंगों के कारण, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रांगण में एक रेलिंग स्थापित की। जिसके परिणामस्वरूप प्रांगन का विभाजन हुआ। हिंदुओं ने रामचबूतरा, सीता रसोई और अन्य धार्मिक संरचनाओं के बाहरी प्रांगण में स्थापित होने का सबूत दिया। इसके अलावा अदालत ने कहा कि द्विभाजन का मतलब यह नहीं था कि हिंदुओं ने राम जन्मभूमि पर अपना अधिकार छोड़ दिया।

4. कोर्ट ने कहा कि विध्वंस अवैध था। हालाँकि, यह एक अलग मामला है। यह जमीन के लिए एक टाइटल विवाद था और विध्वंस का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

बता दें कि मदनी ने भ्रामक और झूठे तर्क देने के बाद बाद यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 का दुरुपयोग किया है। इसके साथ ही मौलाना ने कहा कि वो अपनी समीक्षा याचिका में तर्क दे रहे हैं कि वैकल्पिक भूमि हिंदुओं को दी जानी चाहिए।

इससे पहले मौलाना अरशद मदनी ने कहा था कि एक बार एक मस्जिद का निर्माण हो जाने के बाद वह हमेशा एक मस्जिद ही रहता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दूसरे पक्ष को दी गई 5 एकड़ जमीन को भी खारिज कर दिया था। पहले मुस्लिम पक्षकारों को मस्जिद के लिए 5 एकड़ राम जन्मभूमि के 67 एकड़ जमीन के भीतर चाहिए था, मगर अब उनकी ये माँग हिंदुओं को वैकल्पिक 5 एकड़ जमीन देने पर स्थानांतरित हो गई है।

गौरतलब है कि जमीयत वही संगठन है जिसने हिंदुवादी नेता कमलेश तिवारी के हत्यारों को मदद की पेशकश की थी। हिंदू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी की 18 अक्टूबर को निर्मम हत्या कर दी गई थी।

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FACT CHECK: क्लिप दिखा यूपी पुलिस को बताया बर्बर, पूरा वीडियो सामने आया तो किसान सरपट भागा

उत्तरप्रदेश के उन्नाव में रविवार को जमीन मुआवजे की माँग कर रहे किसानों द्वारा हिंसात्मक रवैया अपनाने के बाद सोशल मीडिया पर उन्नाव पुलिस का एक वीडियो वायरल हुआ है। इस वीडियो में एक किसान खेत में पड़ा हुआ है और उसके इर्द-गिर्द भारी संख्या में पुलिस फोर्स लाठी लिए खड़ी है। थोड़ी देर में वीडियो में दिखता है कि एक पुलिस वाला किसान के पास आया और उसे लाठी मारकर उठाने का प्रयास करता है। लेकिन किसान की हालत ऐसी लगती है जैसे वह उठ भी नहीं सकता हो।

22 सेकेंड की इस वीडियो के इंटरनेट पर पहुँचने के बाद ये सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से शेयर की जाने लगी। बिना सच्चाई जाने उन्नाव पुलिस को बर्बर कहा जाने लगा। खुद समाजवादी पार्टी के नेता अनुराग भदौरिया ने इसे सोमवार को शेयर किया और बताया कि कैसे यूपी पुलिस किसानों पर अत्याचार करती है।

इसके बाद टाइम्स के पत्रकार पीयूष राय ने भी इस वीडियो को शेयर किया और लिखा कि पुलिस को लाठी हिंसात्मक भीड़ पर काबू पाने के लिए इस्तेमाल करनी चाहिए, लेकिन वह ऐसे शख्स पर लाठी चार्ज कर रही है, जो पहले ही बेहोश है। पीयूष ने वीडियो को विचलित करने वाला बताया।

साथ ही कंचन श्रीवास्तव नाम की पत्रकार ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा क्या कोई यकीन कर सकता है कि यह वीडियो राम राज्य का है और कई अधिकारी जिसकी सेवा कर रहे हैं वह अन्नदाता है?

कपिल सिब्बल के बंद हो चुके न्यूज चैनल तिरंगा टीवी के पत्रकार रहे सैफ उल्लाह खान ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा कि मुआवजा माँग रहे किसानों का उपचार।

वीडियो वायरल होने के साथ ही मामला तूल पकड़ने लगा और उन्नाव पुलिस सवालों के घेरे में आ गई। इसके बाद यूपी पुलिस ने इस घटना का पूरा वीडियो जारी किया। बताया कि जो वीडियो वायरल हुआ है वह इसका सिर्फ एक हिस्सा है।

उन्नाव पुलिस द्वारा जारी वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस द्वारा ‘पीटा गया’ किसान करीब 14 सेकेंड तक जमीन पर पड़ा रहता है। फिर अचानक से उठता है और भागने लगता है। जिससे वहाँ वीडियो बना रहे लोग भी हैरान हो जाते हैं और उसे देखने लगते हैं। लोगों के जेहन में सवाल आता है कि जमीन पर पड़ा युवक एक दम ठीक कैसे हो गया।

जाहिर है वह युवक केवल हठ में वहाँ लेटा हुआ था और पुलिस के कहने पर भी अपनी जगह से नहीं उठ रहा था। लेकिन मीडिया और राजनेताओं ने उन्नाव पुलिस को ऐसे दिखाया जैसे उनकी बर्बता के कारण युवक की हालत गंभीर हो गई। पुलिस ने बताया है कि वह पत्थरबाजी कर रहे लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने पहुँचे थी।

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24 साल में 250 बच्चों का यौन शोषण, रेप करने के बाद डायरी में स्कोर लिखता था डॉक्टर

फ्रांस में एक रिटायर्ड सर्जन द्वारा 250 से ज्यादा बच्चों का यौन शोषण किए जाने का मामला सामने आया है। इस सर्जन का नाम जोई ली स्कारनेक है। वह चार लड़कियों के यौन शोषण के आरोप में मई 2017 से जेल में बंद है। फ्रांसीसी अभियोजकों के अनुसार उसके खिलाफ नए मामले मिले हैं। अभियोजकों ने इसे फ्रांस के इतिहास का यौन शोषण का सबसे बड़ा मामला बताया है।

स्कारनेक के खिलाफ अब तक करीब 209 बच्चों की गवाही हो चुकी है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सर्जन ने जिन बच्चों को अपनी हैवानियत का शिकार बनाया उनमे 181 नाबालिग हैं। 184 बच्चे ऐसे भी हैं जो यौन-उत्पीड़न की इस त्रासदी पर अब कुछ भी कहने से बच रहे हैं। उन्होंने अपने और से लगाए गए आरोपों को वापस लेने की इच्छा जताई है।

स्कारनेक के खिलाफ जाँच की शुरुआत 1989 से लेकर 2017 के बीच चार लड़कियों के यौन उत्पीड़न से शुरू हुई थी। उसके खिलाफ 15 साल से कम उम्र के व्यक्ति के साथ दबाव बनाकर शारीरिक सम्बन्ध बनाने (यानी बलात्कार) का केस दर्ज हुआ था। इस मामले का फैसला 2020 की शुरुआत में अपेक्षित है। मामले की जाँच जब समाप्त होने की और थी तब पुलिस को इस डॉक्टर की एक सीक्रेट डायरी हाथ लगी थी। इसके बाद जाँच में एक बार फिर तेज़ी आ गई। इस डायरी की मदद से एकाएक कई मामले सामने आने लगे।

जाँच आगे बढ़ी तो मालूम चला कि स्कारनेक यौन उत्पीड़न के बाद डायरी में पीड़ित बच्चों का नाम लिखता था। डायरी में अपने कुकर्मों का उल्लेख उसने “सेक्सुअल एनकाउंटर” लिखकर किया था। डायरी में उसने बच्चों के यौन उत्पीड़न को “फैंटेसी” बताया था। जाँचकर्ताओं ने उसके घर से चाइल्ड पोर्न की कई तस्वीरों से लेकर डॉल्स तक बरामद की थी।

डायरी से पता चला कि उसने दक्षिणी फ़्रांस के Jonzac शहर में अपनी पड़ोसी की बेटी का भी रेप किया था। 2014 से 2017 के बीच वह इस शहर में रहता था। अभियोजन पक्ष के अनुसार सर्जन ने 1991 से लेकर 2014 के बीच इन घटनाओं को अंजाम दिया।

मामूली आदमी नहीं हैं सोनिया और राहुल गाँधी: कॉन्ग्रेस सांसदों का लोकसभा में हंगामा

संसद सत्र के दूसरे दिन मंगलवार (नवंबर 19, 2019) को गाँधी परिवार से स्पेशल प्रटेक्शन फोर्स (एसपीजी) सुरक्षा वापस लिए जाने के विरोध में कॉन्ग्रेस सदस्यों ने लोकसभा में जमकर हंगामा किया। लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी सुरक्षा पाने वाले मामूली लोग नहीं हैं। वाजपेयी जी ने गाँधी परिवार को एसपीजी सुरक्षा दी थी। 1991 से अब तक एनडीए दो बार सत्ता में आई, लेकिन उनकी एसपीजी सुरक्षा कभी नहीं हटाई गई।”

लोकसभा में जब अधीर रंजन इस मसले को उठा रहे थे, तब लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने कहा कि ये मामला अभी लिस्ट में नहीं है। ऐसे में जब ये मामला लिस्ट में हो, तभी सदन में इस मसले को उठाएँ। इससे पहले सोमवार (नवंबर 18, 2019) को भी कॉन्ग्रेस नेता ने इस मसले को लोकसभा में उठाया था और गृह मंत्री से जवाब माँगा था। चौधरी ने गाँधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने के गृह मंत्रालय के कदम पर लोकसभा में स्थगन नोटिस भी दिया था।

बता दें कि शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन की कार्यवाही आरंभ होते ही कॉन्ग्रेस के सदस्य नारेबाजी करते हुए आसन के निकट पहुँच गए। इसके बाद डीएमके के सदस्य भी कॉन्ग्रेस के समर्थन में आसन के समीप पहुँच कर नारेबाजी करने लगे। कॉन्ग्रेस और डीएमके के सदस्यों ने ‘बदले की राजनीति बंद करो’, ‘एसपीजी के साथ राजनीति करना बंद करो’ और ‘वी वॉन्ट जस्टिस’ के नारे लगाए। इसके बाद कॉन्ग्रेस सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया। 

उल्लेखनीय है कि हाल ही में सरकार ने कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी की एसपीजी सुरक्षा वापस ले ली थी। अब उन्हें जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। अभी गाँधी परिवार की सुरक्षा में CRPF के जवान लगे हुए हैं। तीनों सदस्यों की सुरक्षा में कुल 6 कंपनियाँ तैनात हैं। यानी करीब 600 जवान, 24 घंटे सोनिया-राहुल-प्रियंका की सुरक्षा में तैनात रहेंगे।

पेशवा की ‘छबीली’: चीते का शिकार करने वाली वो वीरांगना जिसकी तलवारों से फिरंगी भी कॉंपे

ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ते-लड़ते अपनी वीरगाथा को अमर कर जाने वाली झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्मदिवस 19 नवंबर को होता है। वैसे तो लक्ष्मीबाई के विवाह के बाद उनके जीवन का हर पल एक क्रांति का विस्फोट करता है लेकिन उनके जीवन से जुड़े कुछ अन्य पहलू भी हैं, जो बताते हैं कि 1857 में अंग्रेजों को धूल चटाने वाली लक्ष्मीबाई की वीरता परिस्थितियों का फलितार्थ नहीं थी। अच्छे-अच्छे जाँबाजों को रणभूमि में धूल चटाना उनका जन्मजात कौशल था। वह पितृसत्ता द्वारा गढ़ी गई हर भ्रांतियों को तोड़कर आगे बढ़ीं और खुद को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज करवा गईं।

19 नवंबर 1828 को बनारस में एक मराठा ब्राह्मण के घर में जन्मीं रानी लक्ष्मीबाई का नाम पहले मणिकर्णिका था। घरवाले दुलार में ‘मनु’ बुलाते थे। पेशवा ने उनके स्वभाव के कारण ‘छबीली’ नाम दिया था। रानी, बचपन से ही शस्त्रों के ज्ञान में धनी थी। घुड़सवारी से लकर तलवारबाजी उनके प्रिय खेल थे। 4 साल की उम्र में माँ भागीरथीबाई का साया खोने के बाद पिता मोरोपंत ने उनकी परवरिश की। पिता बिठूर के राजदरबार में थे इसलिए मनु का भी अधिकतर समय वहीं बीतता था। उम्र बढ़ने के साथ उनके भीतर अलग-अलग कौशल विकसित होने लगे, जैसे कोई योद्धा युद्धभूमि के लिए तैयार हो रहा हो। वे रंग रूप से जितनी आकर्षक थीं, उनके हाव-भाव भी उतने ही मन को लुभाने वाले थे।

बताया जाता है मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर से सिर्फ़ इसलिए हुआ था, क्योंकि झाँसी के महाराज शिवराव भाऊ उनकी बहादुरी से स्तब्ध रह गए थे। दरअसल, उन्होंने मनु को चीते का शिकार करते देखा था, जिसके बाद वह मनु का तेज भूल नहीं पाए। कुछ दिन बाद वह पेशवा के महाराज से मिले और अपने बेटे गंगाधर राव के लिए मनु का हाथ माँगा। झाँसी के महाराज के मन में मनु को अपनी पुत्रवधु बनाने की इच्छा इतनी प्रबल थी पेशवा के आगे कई बार इस संबंध में निवेदन किया। 1842 में 14 साल की उम्र में मनु का विवाह गंगाधर राव से हुआ।

लक्ष्मीबाई, रानी ऑफ झॉंसी का अंश

शादी के बाद गंगाधर राव को एहसास हो गया कि उनका विवाह किसी साधारण महिला से नहीं हुआ है। रानी के युद्ध कौशल, बुद्धि, विवेक को परखते हुए उन्होंने मणिकर्णिका का नाम लक्ष्मीबाई रखा। अपने जीवन काल में राजा ने उन्हें केवल असीम प्रेम ही नहीं किया, बल्कि उनकी इच्छाओं और पसंद-नापसंद का ख्याल रखते हुए शस्त्र संचालन, पुस्तकें, प्रशासन में हिस्सेदारी की व्यवस्था भी सुनिश्चित की। कहा जाता है कि रानी के ससुराल वाले चाहते थे कि वे महल के भीतर रसोई आदि का काम सँभाले, लेकिन वह व्यवस्था में सुधार लाने में जुटी रहती थी। इसके कारण उनके दुश्मन बढ़ते ही जा रहे थे।

समय बीतने के साथ-साथ रानी लक्ष्मीबाई ने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह केवल 4 महीने जीवित रह पाया। यह वाकया राजा-रानी दोनों के जीवन में निराशा भर गया और राजा पुत्रवियोग में बीमार रहने लगे। लेकिन, जब उन्हें राज्य पर अंग्रेजों की कुदृष्टि का अंदाजा हुआ तो उन्होंने अपने चचेरे भाई का बच्चा गोद ले लिया, ताकि उनके बाद झाँसी के सिंहासन का उत्तराधिकारी सुनिश्चित हो सके। बच्चे को दामोदार राव नाम दिया गया। लेकिन महाराज की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उसे उनका उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और झाँसी को ब्रितानी राज्य में मिलाने का षड्यंत्र रचने लगे।

उस वक्त भारत में लॉर्ड डलहौजी वायसराय‍ था। जब रानी को पता लगा तो उन्होंने एक वकील की मदद से लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया, लेकिन ब्रितानियों ने रानी की याचिका खारिज कर दी। सन् 1854 के मार्च माह में अंग्रेजी हुकूमत ने रानी को महल छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन रानी ने दृढ़निश्चय किया कि वे अपने राज्य को नहीं छोड़ेंगी। यही वो समय था जब रानी लक्ष्मीबाई ने प्रण लिया कि वे अपने राज्य को फिरंगियों की हुकूमत से आजाद करवाकर दम लेंगी।

रानी लक्ष्मीबाई का साहस देखकर अंग्रेजों ने कई बार उनके प्रयासों को विफल करने का प्रयास किया। झाँसी के पड़ोसी राज्य ओरछा व दतिया भी झाँसी पर हमला करने लगे, लेकिन रानी ने उनके इरादों को नाकामयाब कर दिया। किंतु 1858 में ब्रिटिश सरकार ने झाँसी पर हमला कर उसको घेर लिया व उस पर कब्जा कर लिया, लेकिन रानी अपने प्रण पर अटल थीं। उन्होंने 14,000 बागियों की सेना तैयार की। योद्धा की भाँति पोशाक धारण की। पुत्र दामोदर को पीठ पर बाँधा और दोनों हाथों में तलवार लेकर युद्ध मैदान में आ उतरीं। घोड़े की लगाम को मुँह से पकड़े वे अपने सहयोगियों के साथ तात्या तोपे से मिलीं और ग्वालियर के लिए कूच किया।

देश के गद्दारों के कारण रानी को राह में फिर शत्रुओं का सामना करना पड़ा और फिर 29 साल की महानायिका ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया। 18 जून 1858 को युद्ध मैदान में अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गईं। आज उनके जीवन गाथा को शब्दों में सॅंजोए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली थी’ हर बच्चे की जुबान पर है।

24 को रामलला को मिलेगी फैसले की कॉपी: सुब्रह्मण्यम स्वामी काशी में करेंगे ‘स्पॉट इन्वेस्टीगेशन’

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी रामलला को 24 नवंबर को सौंपी जाएगी। रामलला विराजमान की तरफ से कानूनी लड़ाई लड़ने वाले वकीलों का एक दल अयोध्या पहुॅंच उन्हें आदेश की कॉपी देंगे और आशीर्वाद लेंगे। वहीं, भाजपा नेता संसद सुब्रह्मण्यम स्वामी 23 नवंबर को अयोध्या जाएँगे। स्वामी ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है।

बताया जा रहा है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी वकीलों के दल का स्वागत करेंगे। कारेसवकपुरम में वकीलों का अभिनंदन किया जाएगा। वकीलों के इस दल में रामलला की पैरवी करने वाले सीनियर एडवोकेट के. परासरण और उनके परिवार के करीब 2 दर्जन सदस्य भी होंगे। वकीलों का यह दल रामलला का दर्शन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी परिसर के रिसीवर अयोध्या के कमिश्नर को सौंपेगा।

स्वामी ने अयोध्या यात्रा को लेकर जो ट्वीट किया है उसमें वाराणसी जाने की बात भी कही है। उन्होंने कहा है कि वह काशी विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र में ‘स्पॉट इनवेस्टिगेशन’ के लिए आएँगे। भाजपा नेता ने बीते दिनों एक इंटरव्यू में कहा था, “हमें तीन मंदिर चाहिए। एक राम मंदिर, दूसरा कृष्ण जन्मस्थान मथुरा का कृष्ण मंदिर और तीसरा काशी विश्वनाथ। काशी विश्वनाथ और कृष्ण मंदिर के तो सबूत भरपूर हैं। ये (राम मंदिर) सबसे मुश्किल था।”

काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में मौजूद उपासना स्थल को लेकर भी लंबे समय से आवाज उठती रही है। राम जन्मभूमि पर फैसला आने के बाद स्वामी के वाराणसी आने और ‘स्पॉट इन्वेस्टिगेशन की बात लिखने से वाराणसी में भी सरगर्मी बढ़ गई है।

कॉन्ग्रेस 30 नवंबर को रामलीला मैदान में नहीं करेगी रैली, ‘भारत बचाने’ के लिए अभी समय नहीं

बेरोजगारी, आर्थिक मंदी और कृषि संकट को लेकर आगामी 30 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली कॉन्ग्रेस की रैली स्थगित कर दी गई है। कॉन्ग्रेस ने इसे ‘भारत बचाओ’ रैली का नाम दिया था। जानकारी के मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र के मद्देनजर रैली के आयोजन की तिथि आगे बढ़ाई गई है। 30 नवंबर को होने वाली यह रैली अब 14 दिसंबर को हो सकती है।

कॉन्ग्रेस ने देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलन करने की योजना बनाई थी। हालाँकि अयोध्या मामले का फैसला आने के कारण में कुछ राज्यों में पार्टी ने इस कार्यक्रम को थोड़ा आगे बढ़ा दिया था। पार्टी का कहना है कि उसने पिछले कुछ दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों में मोदी सरकार की ‘विफलताओं’’ को उजागर करने के लिए विरोध प्रदर्शन किया। इससे पहले कॉन्ग्रेस महसचिवों, प्रदेश प्रभारियों, विभाग अध्यक्षों, प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के प्रमुखों और विधायक दल के नेताओं की बैठक में 30 नवम्बर की रैली करने का निर्णय हुआ था।

कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा था, “भारतीय जनता पार्टी ने भारत को मंदी व तालाबंदी की कगार पर ला खडा कर दिया है। इस पार्टी ने भारत को भुखमरी की तरफ धकेल दिया है और भारत को बेरोजगारी के कुएँ में धकेल दिया है। इस सरकार ने भारत की सम्प्रभुता, आर्थिक सबलता पर आक्रमण और हमला कर दिया है। इसलिए देश के हर जिले मे सोनिया गाँधी व राहुल गाँधी के आह्वान पर इसे लेकर एक व्यापक आंदोलन हमने किया। इस सारे आंदोलन का आगाज 30 नवंबर को ‘भारत बचाओ’ रैली के माध्यम से दिल्ली के रामलीला मैदान में होगा।”

उन्होंने कहा था, “सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के आह्वान पर 25 नवंबर तक हर जिले के अंदर और हर प्रांत के अंदर एक व्यापक आंदोलन का आगाज हमने किया था। 60 प्रतिशत मुल्क में यह आंदोलन संपूर्ण हो चुका है और आज की बैठक में निर्णय किया गया है कि 40 प्रतिशत जहाँ बचा है, वहाँ भी ये संपूर्ण हो जाएगा। 30 नवंबर को ‘भारत बचाओ’ रैली से यह आंदोलन समाप्त होगा।”