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अधीर रंजन ने संसद सत्र के पहले ही दिन दिया विवादित: कॉन्ग्रेस की हुई फजीहत

संसद में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने संसद के शीतसत्र शुरू होते ही अपने बयान से एक बार फिर सबको आलोचना का मौका दे दिया है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल 2019 के दौरान बयान देकर अपनी किरकिरी करवाने वाले नेता विपक्ष अधीर रंजन ने ऐसा पहली बार नहीं किया है।

कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद राज्य की स्थिति का जायजा लेने पहुँचे यूरोपीय यूनियन के सदस्यों के दौरे पर टिप्पणी करते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने उन्हें “किराए का टट्टू” कहा है। कई सांसदों ने अधीर रंजन के इस बयान का विरोध किया। वहीं लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने भी अधीर रंजन के इस बयान को जाँचने की बात कही, उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो इसे लोकसभा कार्रवाई के रिकॉर्ड से हटा दिया जाएगा।

भारतीय सांसदों को कश्मीर जाने से रोकने और विदेश से आए ईयू के दल को कश्मीर भेजने पर आपत्ति जताते हुए अधीर रंजन ने लोकसभा में भारत सरकार पर निशाना साधा। संसद के शून्यकाल में बोलते हुए चौधरी ने कहा “हमारे कई नेताओं और सांसदों को कश्मीर नहीं जाने दिया गया। राहुल गाँधी को भी वहाँ जाने से रोक दिया गया। वहाँ मजदूर मर रहे हैं, आर्मी वाले मर रहे हैं।”

इस दौरान अधीर रंजन ने फारूख अब्दुल्ला के संसद में न उपस्थित होने के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हुए इसे क्रूरता बताया। बता दें कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद वहाँ की परिस्थितियों का जायजा लेने के लिए यूरोपियन यूनियन का एक 28 सदस्यीय दल भारत पहुँचा था। अपनी यात्रा के दौरान इस दल ने राज्यपाल से लेकर जम्मू-कश्मीर प्रशासन और सिविल सोसाइटी के लोगों से भी बातचीत की थी।

हालाँकि, ईयू दल के इस दौरे का कई नेताओं ने विरोध किया था। विरोध करने वाले नेताओं में सबसे पहला और सबसे प्रमुख नाम AIMIM के नेता और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का था। ओवैसी ने तो ईयू सांसदों को नाज़ी प्रेमी तक कह दिया था। ओवैसी के इस बयान के पलटवार में दल के सदस्यों ने कहा था कि “हम नाज़ीप्रेमी नहीं हैं, अगर हम ऐसे होते तो हम निर्वाचित नहीं होते। हम नाजी प्रेमी कहे जाने से बहुत नाराज हैं।”

छत्तीसगढ़ में बलात्कार पीड़िता को ही सुना डाली सजा, कहा- इससे गाँव की बदनामी हुई

छत्तीसगढ़ के जाशपुर जिले से एक चौंका देने वाली खबर सामने आई है। इस जिले में एक गाँव के लोगों ने रेप विक्टिम को ही सजा सुना दी। 23 वर्षीय रेप पीड़िता का दोष था उसने पुलिस से अपने साथ हुए दुष्कर्म की शिकायत करने की हिम्मत जुटाई थी। घटना उस वक़्त की है जब पीड़िता अपने यहाँ से पड़ोसी गाँव में अपने रिश्तेदारों के घर जा रही थी। इसी दौरान आरोपी संदीप और किशोर ने उसके साथ दुष्कर्म किया और उसे इस बारे में किसी से न कहने की धमकी भी दी।

इसके बावजूद पीड़िता ने अगले दिन पुलिस के पास अपने साथ हुई इस घटना पर कार्रवाई की माँग की। छत्तीसगढ़ की पुलिस ने लड़की की मदद करने की बजाय उसकी रिपोर्ट दर्ज तक नहीं की। इसके बाद गाँव में इस मुद्दे पर बैठक हुई, पीड़िता ने न्याय की गुहार लगाते हुए अपनी आपबीती सुनाई, कुकरम करने वालों पर 5000 का जुर्माना लगा दिया गया लेकिन बैठक में मौजूद लोगों ने जो फैसला किया उसे सुनकर पीड़िता भी दंग रह गई।

दरअसल उन्होंने मामले को पुलिस तक ले जाने के लिए पीड़िता को दोषी माना। उनका कहना था कि पीड़िता के इस कदम से गाँव की काफी बदनामी हुई है। इस दोष को पीड़िता के सर मढ़ने के साथ ही उसपर भी 5000 रूपए का जुर्माना भी लगा दिया गया।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रेप विक्टिम ने बताया, “गाँव के लोगों ने बैठक में मुझपर व मेरे परिवार के लोगों पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया, हमारे पास और कोई विकल्प भी नहीं था।”

इस विषय पर पीड़िता की माँ ने बताया कि “कुकर्म करने वाले तो जुर्माने की कीमत देकर छूट गए मगर हम तो बहुत गरीब परिवार से हैं, इतने पैसे कहाँ से लाकर दें।”

पीड़िता का कहना है कि पुलिस ने दूसरी बार शिकायत करने पर मामला दर्ज किया। अगर यह मामला पहली बार में दर्ज कर लिया जाता तो ऐसी नौबत नहीं आती। बता दें कि बलात्कार की घटना के अगले ही दिन पीड़िता अपनी शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुँची थी मगर पुलिस ने इस सम्बन्ध में कोई मामला दर्ज नहीं किया। इसके बाद 12 दिन बीत जाने पर पीड़िता ने एक बार फिर से पुलिस से गुहार लगाई तब जाकर कहीं पुलिस ने उसकी शिकायत दर्ज की।

हालाँकि, पुलिस विभाग ने लड़की की ओर से लगाए गए इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया है। स्थानीय कोतवाली के प्रमुख लक्ष्मण प्रसाद ध्रुवे ने इस मामले पर बोलते हुए कहा कि ‘उसने (पीड़िता) घटना के दस दिन बाद महिला सेल से संपर्क किया। इसके बाद भी उसने मामले की रिपोर्ट नहीं लिखवाई। इसके बाद हमने दोनों आरोपितों के खिलाफ उसका बयान दर्ज किया, और इस मामले में अभी जाँच जारी है।’ वहीं इस मुद्दे पर गाँव में बैठक लगाने वालों में से कोई भी व्यक्ति इस मुद्दे कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है।

फँस गई शिवसेना: सरकार बनाने पर सोनिया गाँधी से पवार ने नहीं की बात

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाक़ात के बाद शरद पवार के तेवर बदले-बदले नज़र आ रहे हैं। पवार ने बैठक के बाद कहा कि शिवसेना के साथ सरकार गठन को लेकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से कोई बातचीत ही नहीं हुई। पवार का ये बयान चौंकाने वाला है क्योंकि अब तक शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस गठबंधन द्वारा मिल कर सरकार बनाने की बातें मीडिया में चलाई जा रही थीं। एनसीपी के मुखिया आज सोनिया गाँधी के दिल्ली स्थित आवास पर पहुँचे और वहीं दोनों नेताओं की बैठक हुई।

बैठक के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए शरद पवार ने कहा कि उन्होंने सोनिया गाँधी को महाराष्ट्र की ताज़ा राजनीतिक परिस्थितियों से अवगत कराया। उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को राज्य में चल रही राजनीतिक हलचल के बारे में जानकारी दी। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी भी इस दौरान बैठक में मौजूद थे। पवार ने कहा कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी के कुछ नेता आपस में बात करेंगे और जो भी निष्कर्ष निकलेगा, उससे दोनों दलों के आलाकमान को अवगत कराएँगे।

जब शरद पवार से पूछा गया कि क्या सोनिया गाँधी महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिल कर सरकार गठन करने के ख़िलाफ़ हैं, पवार ने कहा कि सरकार गठन को लेकर कोई बातचीत ही नहीं हुई। उन्होंने कहा कि किसी अन्य तीसरे दल के बारे में चर्चा हुई ही नहीं। बकौल पवार, उनकी और सोनिया की बैठक में सिर्फ़ कॉन्ग्रेस और एनसीपी को लेकर ही बातचीत हुई। इधर केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने कहा कि उन्होंने संजय राउत के सामने 3 साल भाजपा का और 2 साल शिवसेना का सीएम वाले फॉर्मूले को लेकर चर्चा की, जिसपर वो राजी भी हो गए। उन्होंने बताया कि अब वो इस सम्बन्ध में भाजपा से बात करेंगे।

शरद पवार के इस रुख से शिवसेना को झटका लगा है, जो लगातार अपने पास 170 विधायकों का समर्थन होने का दावा कर रही है। शिवसेना एनसीपी और कॉन्ग्रेस के समर्थन के बलबूते सरकार बनाने की बात करती आ रही है। वहीं सोनिया गाँधी शिवसेना की हिंदुत्ववादी विचारधारा के कारण उसे समर्थन देने से हिचक रही है। कॉन्ग्रेस के नव-निर्वाचित विधायक चाहते हैं कि महाराष्ट्र में पार्टी शिवसेना को समर्थन दे लेकिन आलाकमान इसके ख़िलाफ़ है। फ़िलहाल राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू है।

अशोक गहलोत सरकार को अवमानना याचिका पर HC का नोटिस: 6 हफ्ते में माँगा जवाब

राजस्थान हाई कोर्ट ने सोमवार (नवंबर 18, 2019) को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ दाखिल एक अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है। यह नोटिस अशोक गहलोत एवं मुख्य सचिव डीबी गुप्ता को जारी किया गया है। राजस्थान हाईकोर्ट के 2 जजों की बेंच ने नोटिस का जवाब देने के लिए अशोक गहलोत सरकार को 6 हफ्ते का वक्त दिया है।

दरअसल यह नोटिस 88 वर्षीय याचिकाकर्ता मिलाप चंद डांडिया की याचिका पर दिया गया है। अवमानना याचिका दायर करने वाले मिलाप चंद डांडिया का कहना है कि उन्होंने अवमानना याचिका इसलिए दायर की क्योंकि राजस्थान सरकार ने मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र का जवाब नहीं दिया। उनका कहना है कि उन्होंने अदालत के आदेश को लागू करने की माँग की थी।

मिलाप चंद डांडिया का आरोप है कि हाईकोर्ट का आदेश आने के 2 महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी गहलोत सरकार ने कोर्ट के फैसले को इंप्लीमेंट नहीं किया है। याचिका में गहलोत सरकार के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले को क्रियान्वित नहीं किया, जिसके तहत कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी खर्चे पर आजीवन सुविधाएँ नहीं उठा सकेंगे। कोर्ट के इस आदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन मिलने वाली कुछ सुविधाओं में कटौती की बात कही गई थी।

बता दें कि राजस्थान हाईकोर्ट की ओर से दिए गए एक बड़े फैसले के तहत इसी साल के 4 सितंबर को पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा ली जा रही आजीवन सुविधाओं पर रोक लगा दी गई थी। जस्टिस प्रकाश गुप्ता द्वारा 4 सितंबर को दिए गए फैसले के तहत राजस्थान मंत्री वेतन संशोधन अधिनियम 2017 को अवैध घोषित कर दिया गया था।

हाई कोर्ट का यह फैसला मिलापचंद डांडिया द्वारा दायर याचिका पर आया था। जिसमें राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला, कार, ड्राइवर, टेलीफोन सेवाएँ और 10 कर्मचारी वाले स्टाफ जैसी सुविधा जिंदगी भर के लिए देने वाले कानून को चुनौती दी गई थी।

सिब्बल बोले- 90 दिन से जेल में हैं चिदंबरम, जल्दी करिए सुनवाई: CJI की पीठ ने कहा- देखेंगे

INX मीडिया मामले में पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। सोमवार को उनकी तरफ से वकील और कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अगुआई वाली पीठ के समक्ष याचिका पर जल्द सुनवाई का अनुरोध किया है।

उन्होंने पीठ से कहा कि पूर्व वित्त मंत्री पिछले 90 दिनों से जेल में हैं और उनकी जमानत याचिका पर मंगलवार या बुधवार को सुनवाई होनी चाहिए। इसके बाद पीठ ने सिब्बल से कहा कि हम देखेंगे कि केस को मंगलवार या बुधवार को सूचीबद्ध किया जाए।

गौरतलब है कि बीते दिनों 15 नवंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय द्वारा INX मीडिया से जुड़े धनशोधन के मामले में चिदंबरम को जमानत देने से इनकार कर दिया था। साथ ही कहा था कि उनके ऊपर लगे आरोप पहली नजर में गंभीर प्रकृति के हैं और अपराध में उनकी भूमिका भी सक्रिय व प्रमुख रही है।

चिदंबरम पर इस मामले में लगभग ढाई साल पहले 15 मई 2017 को मामला दर्ज हुआ था। 21 अगस्त 2019 को उन्हें उनके घर से सीबीआई ने गिरफ्तार किया। इस मामले में गत माह 22 तारीख को उन्हें जमानत मिल गई थी, लेकिन ईडी द्वारा गिरफ्तारी के कारण वे बाहर नहीं आ सके। इसके बाद उन्होंने जमानत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

चिदंबरम ने यह कहते हुए जमानत का अनुरोध किया था कि साक्ष्य दस्तावेजी प्रकृति के हैं और ये जाँच एजेंसियों के पास हैं, इसलिए वे उनमें छेड़छाड़ नहीं कर सकते। ईडी ने उनकी याचिका का विरोध करते हुए कहा कि वह भले ही दस्तावेजी साक्ष्यों से छेड़छाड़ न कर पाएँ, लेकिन वे गवाहों को प्रभावित करने तथा धमकी देने की कोशिश कर सकते हैं। चिदंबरम ने सीबीआई मामले में जमानत मिलने के 22 अक्टूबर के आदेश का भी हवाला दिया था और कहा था कि भ्रष्टाचार के मामले में उनके खिलाफ साक्ष्य से छेड़छाड़ करने, विदेश भागने और गवाहों को प्रभावित करने का कोई सबूत नहीं है। इसके बाद हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था।

एशिया के इस देश से शुरू हुआ मास्क लगाने का चलन, झेल चुका है कई आपदा

बीते कुछ सालों में प्रदूषण और श्वास सम्बन्धी बीमारियों के चलते हिन्दुस्तानियों की आदत बनी है कि वे सर्जिकल मास्क पहनने के आदी हो रहे हैं। यह सिलसिला भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर अमेरिका के मैनहैटन तक फ़ैल चुका है। 2002 में SARS और 2006 में बर्ड-फ्लू के बाद इबोला जैसे संकट में भी लोगों ने मास्क लगाकर इस संकट से निजात पाई, ऐसे में एहतियात बरतने वाले ज़्यादातर लोग एशियाई थे। हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी आज प्रदूषण की चपेट में है और इससे बचने के लिए मास्क का इस्तेमाल करती है।

अगर इस मास्क को पहनने का इतिहास खंगालें तो पता चलता है कि इसकी शुरुआत जापान से हुई थी। एक मीडिया रिपोर्ट के हवाले से पता चलता है कि बीसवीं शताब्दी में पहले विश्वयुद्ध के दौरान तकरीबन 20-40 मिलियन लोगों की मौत हुई जोकि उस समय विश्व की आबादी का 5% है। इन मौतों के चलते कई बीमारियाँ फैलना शुरू हुईं।

इसी दौरान स्कार्फ से लेकर मास्क का चलन शुरू हुआ। लोग बीमारियों से न मरें इसके लिए उन्होंने इस आदत को तबतक जारी रखा जबतक कि 1919 में इससे फैली महामारी का अंत नहीं हो गया। 1923 में आए ‘ग्रेट कांटो’ भूकंप ने जापान में रहने वाले कई लोगों के घरों को उजाड़ कर रख दिया। इस घटना ने वहाँ रहने वाले करीब छ: लाख लोगों के लिए उस जगह को नरक में तब्दील कर दिया। इस प्राकृतिक आपदा से इलाके में सब तरफ धुआँ और राख फ़ैल गया। इसके बाद भी लोगों ने जो सबसे पहला एहतियात अपनाया वह चेहरे पर पहना जाने वाला मास्क था।

जापान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण कई आपदाओं के काफी करीब रहा है। आपदाओं में होने वाली मौतें अक्सर संक्रमण लाती हैं जिनसे महामारी फैलती है। जापान में 1934 के ग्लोबल फ़्लू ने वहाँ मास्क-प्रेम को एक बार फिर से उजागर कर दिया। इसके बाद सर्दी के वक़्त मास्क पहनना एक प्रचलन बन गया। इसका बड़ा कारण था कि ज़रा सा संक्रमण भी एक से दूसरे व्यक्ति तक न पहुँचे।

1950 के दशक में जापान की औद्योगिक क्रांति तेज़ी से बढ़ रही थी। नतीजतन हुआ यह कि इस तेज़ी के चलते हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इतनी बढ़ गई कि इसने फिरसे जापान के लोगों को मास्क से उनके लगाव की याद दिला दी। आज एक साल में करीब 230 बिलियन डॉलर के सर्जिकल मास्क अकेले जापान वाले खरीदते हैं। जापान से सटे चीन और कोरिया जैसे देश भी प्रदूषण के इन्ही हालातों को झेलने के लिए मजबूर हैं यही वजह है कि उन्होंने भी यही रास्ता अपना लिया है। क्वार्टज़ की रिपोर्ट के मुताबिक जाँच में यह भी पाया गया कि एक लम्बे अरसे से मास्क लगाने के चलते जापान में यह एक प्रचलन सरीखा हो गया है, यही वजह है कि वहाँ के स्वस्थ बच्चे भी अब मास्क लगाकर घूमते हैं।

‘संजय राउत ने कहा- कम से कम 2 साल के लिए तो दे दो CM का पद, BJP के साथ ही बनाएँगे सरकार’

महाराष्ट्र में सरकार गठन की कोशिशों के बीच शिवसेना का बयान लगातार बदल रहा है। अब शिवसेना के नेता संजय राउत ने कहा है कि ढाई साल के लिए नहीं तो कम से कम 2 साल के लिए तो मुख्यमंत्री का पद उनकी पार्टी को मिलना ही चाहिए। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रामदास आठवले ने ऐसा दावा किया है। आठवले ने कहा कि संजय राउत कम से कम 2 साल के लिए मुख्यमंत्री का पद शिवसेना को मिलने पर भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए राजी हैं। बकौल आठवले, नए फॉर्मूले के तहत 3 साल भाजपा का सीएम रहेगा और 2 साल शिवसेना का।

हालाँकि, भाजपा साफ़-साफ़ कहती आ रही है कि मुख्यमंत्री उसकी ही पार्टी का होगा और वो भी पूरे पाँच सालों के लिए। ऐसे में लगता है कि 50-50 की बात कर रही शिवसेना अब मोलभाव करते हुए 60-40 पर राजी होती दिख रही है। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के इस बयान के बाद भाजपा की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। आठवले के अनुसार, राउत ने कहा कि अगर भाजपा 60-40 फॉर्मूले पर राजी हो जाती है तो शिवसेना को कोई समस्या नहीं है। आठवले ने बताया कि अब वो इस फॉर्मूले पर विचार-विमर्श करने के लिए भाजपा के पास जा रहे हैं।

दरअसल, आठवले ने ही इस फॉर्मूले को शिवसेना के समाने रखा था, जिसपर संजय राउत ने सहमति जताई। उधर शरद पवार ने अपने बयान से शिवसेना को सकते में डाल दिया है। पवार ने कहा कि सरकार का गठन कैसे होना है, इस बारे में भाजपा और शिवसेना सोचे। उन्होंने मीडिया में चल रही उस चर्चा को नकार दिया, जिसमें कहा जा रहा था कि शिवसेना और एनसीपी मिल कर सरकार बना रही है। फ़िलहाल शरद पवार दिल्ली में सोनिया गाँधी के साथ बैठक कर रहे हैं।

रामदास आठवले ने इससे पहले भी कहा था कि अमित शाह महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर आश्वस्त हैं। आठवले ने बताया था कि शाह ने उन्हें महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना ही मिल कर सरकार बनाएगी, बस थोड़ा इंतजार करने और धैर्य रखने की ज़रूरत है। अब देखना यह है कि 60-40 का फॉर्मूला लेकर आठवले जब भाजपा के पास जाएँगे, तब उधर से क्या जवाब आएगा?

पुणे में बैठ कर दिल्ली चलाने वाला मराठा: 16 की उम्र में सँभाली कमान, निज़ाम और मैसूर को किया चित

पानीपत का तीसरा युद्ध मराठा साम्राज्य और अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह अहमद शाह दुर्रानी के बीच हुआ था। वह युद्ध इतना भीषण था कि उसमें 1 लाख मराठा सैनिकों के मारे जाने की बात कही जाती है। इस युद्ध में मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिव राव भाउ ने किया था। वो छत्रपति और पेशवा के बाद तीसरे स्थान पर आते थे। युद्ध में सदाशिव राव का साथ श्रीमंत विश्वास राव पेशवा ने दिया था। वो पेशवा बालाजी बाजीराव भट्ट के बेटे थे। युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई। इससे आहत सदाशिव अपने हाथी को छोड़ कर घोड़े पर सवार हुए और दुर्रानी की सेना पर प्रलय बन कर टूट पड़े। मराठा सेना ने हाथी के ऊपर सदाशिव का स्थान खाली देख कर सोचा कि उनके सेनापति मारे गए हैं। सेना में भगदड़ मच गई और दुर्रानी ने इसका फ़ायदा उठाया। सदाशिव भी वीरगति को प्राप्त हुए।

ये कहानी यहीं से शुरू होती है। जनवरी 1761 में हुए इस युद्ध के बाद उसी साल जून में एक 16 वर्ष के लड़के ने राजाराम भोंसले के छत्र तले मराठा साम्राज्य की कमान सँभाली। वो विश्वास राव के भाई थे। उन्होंने पानीपत के युद्ध की हार को क़रीब से देखा था। उन्हें पता था कि ये लड़ाई अहमद शाह दुर्रानी से नहीं, बल्कि अवध के नवाब शुजाउद्दौला और अफ़ग़ान रोहिल्ला के साथ भी थी। इन सभी ने गठबंधन बना कर मराठा साम्राज्य को चुनौती दी थी। उस 16 वर्ष के लड़के का नाम था माधवराव। माधवराव मराठा साम्रज्य के 8वें पेशवा थे। पानीपत के तीसरे युद्ध ने न सिर्फ़ उनके भाई विश्वासराव, बल्कि उनके चाचा सदाशिव राव की भी बलि ले ली थी। यह बहुत ही कठिन समय था।

उनके पेशवा बनने के एक महीने पहले ही उनके पिता नानासाहब की मृत्यु हो गई थी। हैदराबाद का निज़ाम मराठा साम्राज्य पर बुरी नज़र रखे हुए था। सदाशिव के नेतृत्व में मराठों ने उसे फ़रवरी 1760 में धूल चटाई थी, पानीपत के तीसरे युद्ध के लगभग 1 वर्ष पहले। वह अपनी खोई ज़मीन वापस पाने को बेचैन था। निज़ाम ने उस युद्ध में अहमदनगर, दौलताबाद, बुरहानपुर और बीजापुर जैसे बड़े क्षेत्र गँवा दिए थे। ऐसी कठिनाइयों के बीच मराठा को पुनर्जीवित करने का श्रेय माधवराव को दिया जाता है। भले ही नवंबर 18, 1772 में कम उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उससे पहले उन्होंने ऐसे-ऐसे कारनामे किए कि इतिहास में उनका नाम दर्ज हो गया।

अपनी मृत्यु के वर्ष ही जनवरी में उन्होंने मुग़ल बादशाह शाह आलम II को फिर से दिल्ली में स्थापित किया। इससे पहले आलम इलाहबाद में निर्वासन की ज़िंदगी जी रहे थे। लेकिन माधवराव की पहली बड़ी परीक्षा हुई दिसंबर 1761 में, जब निज़ाम ने मौके की ताक में पुणे की ओर कूच किया। रघुनाथराव के नेतृत्व में मराठों ने फिर से निज़ाम को धूल चटाई। हालाँकि, इस युद्ध में सेना का नेतृत्व करने वाले माधवराव के चाचा रघुनाथराव भी पेशवा बनना चाहते थे और एक तरह से पुणे में आंतरिक कलह चल रहा था। लेकिन, निज़ाम इसका फ़ायदा नहीं उठा पाया। उधर, जयपुर का राजपूत राजा माधव सिंह भी मराठा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए था।

अगस्त 1763 में निज़ाम और मराठा एक बार फिर आमने-सामने थे। रघुनाथराव भी मराठा सेना का नेतृत्व कर रहे थे। निज़ाम ने पुणे की ओर बढ़ते समय मंदिरों को तोड़ा था। माँ पार्वती की प्रतिमा को खंडित कर दिया था। क्रोधित रघुनाथराव ने बदला लेने की ठान रखी थी। लेकिन उन्हें अपने भतीजे का प्रभुत्व भी नहीं पसंद था। गोदावरी के दक्षिणी किनारे पर स्थित राक्षसभुवन क्षेत्र में दोनों सेनाएँ भिड़ीं। निज़ाम का वजीर विट्ठल सुन्दर हैदराबाद की सेना का नेतृत्व कर रहा था। मराठा इतिहास पर कई पुस्तकें लिख चुके उदय कुलकर्णी के अनुसार, युद्ध के बीच में अचानक से रघुनाथराव दुश्मनों से घिर गए थे। तब माधवराव की रणनीतिक चपलता के कारण उनकी जान बची और हैदराबाद का वज़ीर मारा गया। इसके बाद चाचा भी समझ गए कि भतीजे में कुछ बात है और आंतरिक कलह भी कम हो गई।

अमरनाथ डोगरा अपनी पुस्तक ‘दत्तोपंत ठेंगड़ी जीवन दर्शन (वॉल्यूम 3)’ में एक घटना का जिक्र करते हैं, जिससे हमें माधवराव पेशवा के व्यवहार और सोच का पता चलता है। एक बार हाथियों की लड़ाई आयोजित की गई थी, जिसे देखने के लिए पेशवा भी मौजूद थे। तभी एक हाथी पागल हो उठा और वो दर्शक दीर्घा में पेशवा की ओर दौड़ पड़ा। उनका अंगरक्षक खंडेराव बहुत बहादुर था। बावजूद इसके वह वहाँ से भाग खड़ा हुआ। माधवराव बाल-बाल बचे। बाद में लोगों ने उनसे अनुरोध किया कि भाग खड़े होने वाले अंगरक्षक को कार्यमुक्त कर दें। लेकिन, पेशवा माधवराव ने ऐसा नहीं किया। उनका मानना था कि वीर से वीर व्यक्ति भी असमंजस की स्थिति में भयाक्रांत हो जाता है।

रघुनाथ राव भी बहादुर थे। उन्होंने सिंध के पार तक भगवा ध्वज लहराया था। माधवराव द्वारा जान बचाए जाने के 4 वर्षों बाद उन्होंने फिर से बगावती तेवर तेज़ कर दिए। इन कलह के कारण पेशवा को कर्नाटक और उत्तर भारत के कई हिस्सों में सैन्य अभियान का विचार त्यागना पड़ा। एमएस नरवणे अपनी पुस्तक ‘Battles of the Honourable East India Company: Making of the Raj‘ में लिखते हैं कि पेशवा माधवराव उदार थे और परिवार के बीच युद्ध को टालने के लिए उन्होंने बहुतों बार प्रयास किया। वो बड़ों का सम्मान करते थे। अंततः युद्ध हुआ और थोड़प के युद्ध में रघुनाथराव की हार हुई। उन्हें पुणे लाया गया। लेकिन पेशवा ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की। बस उनकी सक्रियता कम की गई। नरवणे लिखते हैं कि पेशवा की अति-उदारता एक ग़लती थी, क्योंकि रघुनाथ राव सुधरने वाले लोगों में से नहीं थे।

इसी तरह जानोजी भोंसले भी पेशवा के ख़िलाफ़ था। वो रघुनाथराव की तरफ़ था। माधवराव ने उसे ठीक करने के लिए निज़ाम का इस्तेमाल किया। इसके बाद भोंसले आजीवन पेशवा के प्रति वफादार बना रहा। उसने 8 लाख रुपए के मूल्य के क्षेत्र भी पेशवा के हवाले किया। मैसूर का हैदर अली भी मराठा का दुश्मन था। सन 1771 में उसे भी पराजित किया गया। रुहेलों, राजपूतों और जाटों को भी मराठा साम्राज्य के आधीन लाने का श्रेय माधवराव को ही जाता है। असल में माधवराव ने हैदर अली को कई बार हराया था। उसे 1762 में भी पराजित किया गया था, लेकिन वो जंगलों में भाग गया। अगर उस वक़्त बीमारी की वजह से पेशवा को वापस पुणे नहीं लौटना होता तो शायद न मैसूर का राज रहता और न ही टीपू सुल्तान।

मई 1764 में हैदर अली को जंगलों से खींच कर निकाला गया और उसे पराजित किया गया। प्रोफ़ेसर एआर कुलकर्णी अपनी पुस्तक ‘The Marathas‘ में लिखते हैं कि इस युद्ध के बाद हैदर अली और उसका खानदान मराठा नाम सुन कर ही काँप उठता था। इसके बाद 1765 में माधवराव ने हैदर अली के ख़िलाफ़ फिर से मोर्चा खोला और स्वयं सेना का नेतृत्व किया। हैदर अली को फिर पराजित किया गया और बदले में उसने जो भी मराठा क्षेत्र कब्जा रखे थे, वो वापस आ गए। जब अंग्रेजों और मैसूर के बीच युद्ध हुआ, तब दोनों पक्ष पेशवा को अपनी तरफ करना चाह रहे थे। लेकिन बदले में पेशवा ने निज़ाम को उखाड़ फेंकने की शर्त रख दी, जिसने अंग्रेजों को सहमा दिया। अंग्रेजों को लगा कि इससे मराठा साम्राज्य की शक्ति दुगुनी हो जाएगी।

ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी मराठा दिल्ली की तरफ़ बढ़े। वहाँ पहुँच कर उन्होंने मुग़ल बादशाह को उसका खोया हुआ सिंहासन दिलाया। इससे पहले माधवराव ने दिल्ली भेजे सेनानियों को पत्र लिख कर कहा था कि उस क्षेत्र में उपस्थित 50,000 मराठा सैनिकों का फायदा उठाया जाए और दिल्ली सहित आसपास के क्षेत्रों में ऐसे लोगों को बिठाया जाए, जो मराठा के अधीन कार्य करें। मुग़ल बादशाह ऐसा करने के लिए राजी हुआ और इसीलिए उसकी ताजपोशी कर दी गई। माधवराव ने अपने पूर्वजों की ग़लतियों से सीख ली। उन्होंने मराठा कमांडरों से कहा कि स्वार्थी होने से बात बिगड़ जाती है। इससे पहले मराठा सरदार एक-दूसरे की खामियाँ निकाल कर जीती हुई बाज़ी हार जाते थे। माधवराव ने इस समास्या की ओर ध्यान देते हुए इसे ख़त्म किया।

पेशवा माधवराव ने मराठा साम्राज्य को फिर उसी स्वर्णयुग में वापस पहुँचा दिया, जहाँ वो पानीपत के युद्ध के पहले था। हजारों सैनिकों के मारे जाने और लाखों लोगों के तबाह होने के बाद एक 16 साल के बच्चे ने कमान अपने हाथ में ली और एक दशक में भारत का मानचित्र बदल कर रख दिया। दुर्भाग्यवश 1772 में माधवराव का मात्र 27 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्हें क्षय रोग (टीबी) हो गया था। माधवराव 11 साल की अवधि में ही वो कर गए, जिसे करने में बड़े बड़े-बड़े योद्धाओं को दशकों लगे। छत्रपति शिवाजी के सम्राज्य को उन्होंने चारों ओर फैलाया। पारिवारिक कलह और चारों ओर दुश्मनों से घिरे रहने के बावजूद इतनी कम उम्र में दिल्ली में भगवा लहराना आसान काम नहीं था।

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कॉन्ग्रेस में महिलाओं की इज्जत नहीं, होता है उत्पीड़न: महिला कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी के ख़िलाफ़ खोला मोर्चा

कॉन्ग्रेस पार्टी में अब महिला कार्यकर्ताओं का असंतोष सामने आ रहा है। उत्तराखंड की राजधानी में महिला कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं की राज्य कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में पार्टी की सैकड़ों महिला कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। उन सभी ने राज्य सरकार की आलोचना तो की ही, लेकिन उपस्थित कॉन्ग्रेस पदाधिकारी तब चकित रह गए जब उन महिलाओं ने अपनी ही पार्टी की आलोचना शुरू कर दी। महिला कार्यकर्ताओं ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी में मेहनत करने वालों को टिकट नहीं दिया जाता।

ये बैठक देहरादून के राजीव भवन में हुई। महिला कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने साफ़ कहा कि जब राजनीति में भागीदारी की बात आती है तो सांसदों और विधायकों की पत्नियों को टिकट दे दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ज़मीन पर मेहनत करने वाली महिला कार्यकर्ताओं की पार्टी में कोई इज्जत नहीं है। उन्होंने प्रभारी और प्रदेश उपाध्यक्ष को सम्बोधित करते हुए स्पष्ट कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी महिलाओं की उपेक्षा कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सांसदों व विधायकों की जिन पत्नियों को टिकट दिया जाता है, उनका पार्टी के कार्यक्रमों से कोई लेना-देना नहीं होता।

महिला कॉन्ग्रेस की कार्यकर्ताओं ने इसे उत्पीड़न करार दिया। उन्होंने पूछा कि मेहनत करें कार्यकर्ता और टिकट दिए जाएँ पैसे वालों को? कार्यकर्ताओं का गुस्सा देख कर पार्टी प्रभारी परविंदर कौर और प्रदेश अध्यक्ष सरिता आर्य से कुछ कहते नहीं बना। वो दोनों कार्यकर्ताओं की बातों को सुनती रह गईं। महिलाओं ने कहा कि कॉन्ग्रेस को ये समझने की ज़रूरत है कि महिलाएँ किसी भी स्तर पर कम नहीं हैं। उन्होंने आधी आबादी को समान प्रतिनिधित्व दिए जाने की भी वकालत की।

महिला कॉन्ग्रेस की कार्यकर्ताओं ने कहा कि उनकी बातों को पार्टी आलाकमान के सामने उठाने की ज़रूरत है। बता दें कि कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष इस वक़्त सोनिया गाँधी हैं। महिला अध्यक्ष के रहते पार्टी में महिलाओं द्वारा इस तरह के आरोप लगाना कॉन्ग्रेस के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

4 साल की बच्ची का 3 दिन से पड़ा है शव: ईसाई परिवार पढ़ रहा बाइ​बल, कहा- नहीं करेंगे दफ़न, प्रार्थना से होगी जिंदा

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। एक ईसाई परिवार पिछले तीन दिन से चार साल की मृत बच्ची को जिंदा करने की कोशिश में लगा हुआ है। जिले के भुडकुडा थाने के सिसवार गाँव में रहने वाले अरविंद और उनका परिवार चार साल की मृत बेटी को वापस जिंदा करने के लिए प्रभु यीशु की प्रार्थना कर रहे हैं। हद तो तब हो गई जब वह पुलिस के समझाने पर भी वे नहीं माने और बच्ची के शव के पास बाइ​बल पढ़ते रहे।

गुरुवार (नवंबर 14, 2019) शाम बच्ची की मौत हो गई थी। लेकिन दफनाने की बजाए परिजन शव को उत्तर प्रदेश के मऊ के करुबीर गाँव में अपने रिश्तेदार के घर ले गए और वहाँ उसके जीवित होने के लिए ‘प्रार्थना’ करने लगे। बता दें कि कुछ साल पहले ईसाई धर्म को अपनाने वाले इस परिवार को उसके समुदाय के लोगों ने आश्वस्त किया था कि बच्चे को यीशु से प्रार्थना करके पुनर्जीवित किया जा सकता है।

गुरुवार की शाम अरविंद की बेटी महिमा को उल्टी और पेट में दर्द शुरू हुआ, जिसके बाद उसे जिला अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने महिमा को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के एक दूसरे अस्पताल में रेफर कर दिया। हालाँकि, महिमा की हालत बिगड़ गई और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

इसके बाद बच्ची के पिता अरविंद उसके शव को लेकर अपने ससुराल पहुँच गए। वहाँ पर तीन दिनों तक मृत बच्ची के शव के रखकर परिवार वाले उसे जीवित करने की प्रार्थना करने लगे। जौनपुर निवासी राजेंद्र चौहान के कहने पर अरविंद ने बच्ची के शव को नहीं दफनाया। राजेंद्र के कहने पर गाँव के कुछ लोगों ने बच्ची के जिंदा होने की उम्मीद से उसे एक झोपड़ी में रख दिया और प्रर्थना करने लगे। लगातार तीन दिन से चल रही प्रार्थना की सूचना मिलने पर एसपी अनुराग आर्य ने एसओ विनोद कुमार तिवारी को पुलिस की एक टीम के साथ जाँच के लिए भेजा।

एसओ ने परिवार वालों को बहुत समझाया लेकिन परिजन शव का दफनाने के लिए तैयार नहीं हुए। पूछताछ में पता चला कि इस अंधविश्वास में पूरा गाँव शामिल था। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि गाँव की सरिता नाम की एक लड़की को भी डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था, लेकिन यीशु से प्रार्थना के बाद वह ‘पुनर्जीवित’ हो गई और अब अपने परिवार के साथ रह रही है। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि ईसाई ग्रामीण जो अज्ञानी लोगों को अंधविश्वास की ऐसी प्रथाओं में विश्वास करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, वो पिछले 12 सालों से जबरन धर्मांतरण भी करवा रहे थे।