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फडणवीस सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची शिवसेना, पवार की बैठक में पहुँचे NCP के 50 विधायक

महाराष्ट्र में घटनाक्रम और नाटकीय होता जा रहा है। शनिवार (नवंबर 23, 2019) को अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर भाजपा का समर्थन कर दिया और देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अजित उप-मुख्यमंत्री बने। अब सभी दल अपने-अपने विधायकों को सुरक्षित ठिकाने पर पहुँचाने में लगे हुए हैं। कॉन्ग्रेस ने अपने विधयकों को जयपुर पहुँचा दिया है, जहाँ उसकी ही सरकार है। वहीं शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे भी विधायकों ने मिल कर उन्हें ढाँढस बंधा रहे हैं। उद्धव ने ललिता होटल में विधायकों को आश्वासन दिया कि सरकार शिवसेना की ही बनेगी।

सबसे ज्यादा खलबली एनसीपी के कैम्प में मची हुई है। न्यूज एजेंसी एएनआई ने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि एनसीपी के 54 में से 50 विधायक मुंबई में शरद पवार की बैठक में शामिल हुए। ये बैठक वाईबी सेंटर में हुई। 2 शिवसेना विधायक मुंबई एयरपोर्ट से लाए गए। शिवसेना के नेताओं मिलिंद नार्वेकर और एकनाथ शिंदे दो एनसीपी विधायकों संजय बंसोड और बालासाहब पाटिल को मुंबई एयरपोर्ट से लेकर आए। कहा जा रहा है कि ये दोनों अजित पवार गुट के विधायक हैं। शिवसेना ने सुप्रीम कोर्ट में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के फ़ैसले ख़िलाफ़ याचिका दायर की है। इसमें राज्यपाल के क़दम को मनमाना और त्रुटिपूर्ण बताया है। तीनों दलों ने मिल कर एक रिट पेटिशन भी दायर की है।

शिवसेना ने इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उसने कहा था कि राज्यपाल ने उसे सरकार गठन के लिए उचित मौक़ा नहीं दिया। उस याचिका के बारे में अब शिवसेना ने कुछ स्पष्ट नहीं किया है। कॉन्ग्रेस नेताओं की कोशिश है कि शनिवार रात को ही इस मामले की सुनवाई हो।

अगर ऐसा होता है तो रात भर ये नाटकीय ड्रामा चलता रहेगा। शिवसेना की तरफ से कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में पेश होंगे। शिवसेना की माँग है कि विधायकों की ख़रीद-फरोख्त रोकने के लिए 24 घंटे के अंदर फ्लोर टेस्ट कराया जाए। पार्टी का कहना है कि ये अल्पमत की सरकार है।

एनसीपी ने दावा किया है कि देवेंद्र फडणवीस के शपथग्रहण समहोह में शामिल होने वाले पार्टी के 8 विधायकों में से 7 वापस आ चुके हैं और उन सभी ने शरद पवार के प्रति आस्था जताई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधीर मुंगंतीवार ने दावा किया है कि भाजपा के पास 170 विधायकों का समर्थन है। विधायकों को जमा करने में मची आपाधापी के बीच राजस्थान में 2 बार पूरे के पूरे बसपा विधायक दल को तोड़ने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि उनकी सरकार जयपुर आने वाले सभी विधायकों को सुरक्षा देगी, चाहे वो किसी भी पार्टी के हों।

जिस दाँव से ‘दादा’ को चित कर CM बने थे शरद पवार, उसी से अजित ने चाचा को दी पटखनी

…अगर 36 का आँकड़ा पार नहीं कर पाए अजित पवार, तो महाराष्ट्र में गिर जाएगी फडणवीस की सरकार!

महाराष्ट्र: अपने विधायकों को लेकर फिर जयपुर भागी कॉन्ग्रेस, सबका फोन किया जब्त

जिस दाँव से ‘दादा’ को चित कर CM बने थे शरद पवार, उसी से अजित ने चाचा को दी पटखनी

अजित पवार की चाल ने लोगों को 41 साल पुरानी एक सियासी कहानी याद दिला दी है। यह कहानी भी महाराष्ट्र की है। उस कहानी के केंद्र में शरद पवार थे। ठीक वैसे ही जैसे आज उनके भतीजे अजित हैं। तब पवार कॉन्ग्रेस को तोड़ मुख्यमंत्री बने थे। उस समय अंगूर की खेती करने वाले पवार केवल 37 साल के थे। अपने दॉंव से वे राज्य के सबसे युवा सीएम बन गए। लेकिन, पवार ने कल्पना नहीं की होगी कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब यही दॉंव उन पर आजमाया जाएगा। उन्हें इस दॉंव से पटखनी देने वाला खुद उनका ही भतीजा होगा। वो भतीजा जिसे राजनीति के तमाम दॉंव-पेंच उन्होंने खुद सिखाए हैं।

फर्क केवल यह है कि इस दॉंव का इस्तेमाल करना वे 37 साल में सीख गए थे। बदले में मुख्यमंत्री का पद हासिल किया। भतीजे ने इस दॉंव को 60 साल की उम्र में आजमाया और डिप्टी सीएम का पद पाया। दरअसल, आपातकाल हटने के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद कॉन्ग्रेस टूट गई थी। एक धड़े को कॉन्ग्रेस (यू) और दूसरे को कॉन्ग्रेस (आई) के नाम से जाना गया। लोकसभा चुनाव के दौरान कई राज्यों में पार्टी की हार हई थी। महाराष्ट्र भी अपवाद नहीं रहा। हार के बाद तब मुख्यमंत्री रहे शंकर राव चव्हाण ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया।

शरद पवार के गुरु यशवंत राव चव्हाण कॉन्ग्रेस (यू) का हिस्सा बने। पवार भी गुरु के धड़े में गए। इसके बाद 1978 में कॉन्ग्रेस के दोनों धड़ों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। बाद में जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए कॉन्ग्रेस के दोनों गुट मिल गए और उन्होंने वसंतदादा के नेतृत्व में सरकार बनाई। शरद पवार को वसंतदादा की सरकार में श्रम एवं उद्योग मंत्री बनाया गया। कहा जाता है कि अपने गुरु यशवंत राव के इशारे पर शरद पवार ने ‘दादा’ की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 12 जुलाई 1978 को कैबिनेट से अचानक इस्तीफा दिया और महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल मच गया।

उस समय वाईबी चव्हाण कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे थे। अध्यक्ष स्वर्ण सिंह विदेश दौरे पर थे। वो उस समय धर्मसंकट में फँस गए कि पवार वाले मुद्दे को कैसे हैंडल करना है। चव्हाण ने पवार के इस क़दम को धोखा बताते हुए इसका विरोध तो किया, लेकिन पवार के ख़िलाफ़ कोई एक्शन नहीं लिया। जब कॉन्ग्रेस में कई बड़े नेता पवार के विरोधी हो उठे थे, चव्हाण ने नरम रुख अपनाया। कहा जाता है कि चव्हाण ने ही अपने चेले शरद पवार को ऐसा करने के लिए उकसाया था। दोनों के बीच एक बैठक भी हुई थी। कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी की बातों को न मानने वाले पवार के रुख से चव्हाण ख़ुश थे।

शरद पवार के नेतृत्व में ‘प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट’ बना और जनता पार्टी के समर्थन से सरकार बनी। उनके फ्रंट के अलावा उस गठबंधन में जनता पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया और सीपीएम के विधायक शामिल थे। पवार कॉन्ग्रेस के 40 विधायकों को लेकर निकले थे और बाकी अन्य पार्टियों के थे। रिपब्लिकन पार्टी रामदास आठवले की पार्टी है। पवार ने 288 सदस्यीय विधानसभा में 180 विधायकों का समर्थन जुटाया था। शरद पवार वसंतदादा कैबिनेट में इंदिरा गाँधी गुट के बढ़ते प्रभाव से नाराज़ थे और उनके व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तो थी ही। शरद पवार काफ़ी दिनों से जनता पार्टी से संपर्क में थे।

इस बार भी अजित पवार ने किसी को भी इस बात की भनक नहीं लगने दी कि वो क्या करने वाले हैं। अजित शुक्रवार रात तक अपनी पार्टी की तरफ़ से शिवसेना और कॉन्ग्रेस की बैठकों में शामिल हो रहे थे। उसी बैठक में मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव ठाकरे के नाम पर सहमति बन गई थी। शाम को उस बैठक में शामिल रहे अजित ने रात के 12 बजे राज्यपाल से मुलाक़ात कर भाजपा को समर्थन वला पत्र सौंप दिया। लगभग 6 घंटे के अंतराल में अजित पवार शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की बैठक से निकल कर फडणवीस को समर्थन दे आए। शरद पवार को उनके ही दाँव से भतीजे ने उन्हें चित कर दिया।

वैसे, एनसीपी में ताज़ा फूट की पटकथा सितम्बर 2019 से ही लिखी जानी शुरू हो गई थी। सितम्बर के आखिरी हफ्ते में अजित पवार ने अचानक से राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया था। शरद पवार ने कहा था कि 25,000 करोड़ रुपए के को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में उनका नाम आने से वो दुखी थे। ख़ुद शरद पवार ने स्वीकारा था कि भतीजे ने उनकी राय लिए बिना इस्तीफा दिया है। यहाँ तक कि इस्तीफा देने के बाद भी उन्होंने अपने चाचा से बात नहीं की थी। अजित के बेटे पार्थ ने उस समय कहा था कि अजित मानते हैं कि राजनीति से
संन्यास लेने का ये सही वक़्त है। कहा तो ये भी गया था कि शरद पवार द्वारा अपनी बेटी सुप्रिया सुले को आगे करने के फ़ैसले से अजित पवार नाराज़ थे।

1978 में जो हुआ था, वो पारिवारिक लड़ाई तो नहीं थी लेकिन वो भी चौंकाने वाली घटना ज़रूर थी। पूरे देश में यह चर्चा चल निकली थी कि चव्हाण के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस का जनता पार्टी के साथ गठबंधन हो सकता है। महाराष्ट्र को उदाहरण मान कर राजनीतिक विश्लेषक इन संभावनाओं पर चर्चा करने लगे थे कि इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस का एक धड़ा जनता पार्टी के साथ जाकर महाराष्ट्र की तर्ज पर काम कर सकता है। जनता पार्टी में कई ऐसे लोग थे, जो कॉन्ग्रेस से आए थे। कई सोशलिस्ट थे। ऐसे में, उनका चव्हाण के नेतृत्व में एक नई पार्टी के गठन की सम्भावना जताई गई थी।

उस दौरान शरद पवार के शपथग्रहण के दौरान चंद्रशेखर और मधु लिमये सहित जनता पार्टी के कई बड़े नेता शामिल हुए थे। जनता पार्टी ने पवार से ज्यादा संख्याबल होने के बावजूद उन्हें समर्थन दिया था, क्योंकि वो चाहते थे कि बाद में पवार को हटा कर वो ख़ुद के सीएम को बिठा सकते हैं। ताज़ा घटना में अजित पवार अगर एनसीपी के 36 विधायकों को तोड़ लेते हैं तो भाजपा और एनसीपी के अजित गुट की सरकार पूरे 5 साल चल सकती है। अब देखना यह है कि विधानसभा में फडणवीस और अजित बहुमत कैसे साबित करते हैं। अब तो एनसीपी द्वारा अजित को मनाने की कोशिशें भी असफल हो चुकी हैं।

कहा जाता है कि पवार ने 41 साल पहले जो कुछ किया था वो अपने राजनीतिक गुरु यशवंत राव चव्हाण के इशारे पर किया था। अजित ने अपने राजनीतिक गुरु शरद पवार की मिलीभगत से ही कदम उठाया है, ऐसा दावा करने वाले भी बहुत हैं। हालॉंकि अब तक शरद पवार के रुख से ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा। लेकिन, यह नहीं भूलना चाहिए कि पवार और उनकी बेटी को मोदी कैबिनेट में मंत्री बनाने की संभावना उसी रामदास आठवले ने जताई है जिन्होंने कुछ दिन पहले दावा किया था कि उनसे अमित शाह ने कहा है कि जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जाएगा और महाराष्ट्र में भाजपा की ही सरकार बनेगी।

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NCP ने अजित पवार को विधायक दल के नेता पद से हटाया, शरद पवार ने कहा- एक्शन लेगी पार्टी

हमारे पास नंबर है, सरकार तो हम ही बनाएँगे, लेंगे अजित पर फैसला: शरद पवार

वैज्ञानिकों ने सबूत के साथ साबित किया सरस्वती नदी का अस्तित्व: वैदिक ऋचाओं पर रिसर्च की मुहर

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में सरस्वती नदी का अनेकों-अनेक बार जिक्र आता है। वेद-पुराणों पर विश्वास न करने वाले लोग अक्सर सरस्वती नदी के अस्तित्व पर सवाल उठाते रहते हैं। अब वैज्ञानिक व विश्लेषकों द्वारा तैयार किए गए एक नए रिसर्च पेपर में खुलासा हुआ है कि सरस्वती नदी का न सिर्फ़ अस्तित्व था, बल्कि प्राचीन काल में यह लोगों के लिए जीवनदायिनी नदी के समान थी। ये रिसर्च रिपोर्ट विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित हुई है। इसमें बताया गया है कि सरस्वती को पहले घग्गर नदी के नाम से जाना जाता था। यह हड़प्पा सभ्यता के दिनों में जो बसावट थी, उसके बीचोंबीच बहती थी।

ये नदी हिमालय की ऊँची चोटियों पर स्थित ग्लेशियर से उतर कर उत्तरी-पश्चिमी भारत के हिस्सों में पहुँचती थी। हड़प्पा सभ्यता के सबसे अच्छे दिनों में भारत और पाकिस्तान के एक बड़े क्षेत्र को सरस्वती नदी ही सींचा करती थी। पहले कहा जाता था कि घग्गर बरसाती नदी थी और हड़प्पा के लोग बाकी दिनों में वर्षा पर आश्रित रहते थे। नदी की तलहटी के 300 किलोमीटर के क्षेत्र में लगातार हुए कई परिवर्तनों का अध्ययन करने के बाद यह पता चला है कि सरस्वती नदी के साल भर बहने के भी ‘स्पष्ट सबूत’ हैं।

वैज्ञानिकों ने पूरी समयावधि को दो भागों में बाँटा है। एक 78,000 ईसापूर्व से लेकर 18,000 ईसापूर्व तक और एक 7000 ईसापूर्व से लेकर 2500 ईसापूर्व तक। इन दोनों ही अवधियों में सरस्वती नदी निरंतर बिना किसी रुकावट के बहा करती थी। इसके साथ ही ऋग्वेद की कई ऋचाओं पर भी मुहर लग गई, जिनमें सरस्वती नदी के बारे में बताया गया है। दूसरी अवधि के ख़त्म होते ही हड़प्पा संस्कृति अपने अंतिम चरण में भी पहुँच गई थी और सरस्वती नदी के अंत के साथ ही वो लोग उपजाऊ भूमि की खोज में कहीं और निकल गए।

इस रिपोर्ट को अनिर्बान चटर्जी, ज्योतिरंजन रे, अनिल शुक्ला और कंचन पांडेय ने तैयार किया है। इसके लिए पहले हुए अध्ययनों के साथ-साथ कई आधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया गया। चटर्जी, रे और शुक्ला- ये तीनों ही अहमदाबाद के नवरंगपुरा स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी में कार्यरत हैं। कंचन पंडित आईआईटी बॉम्बे में ‘डिपार्टमेंट ऑफ अर्थ साइंसेज’ विभाग में कार्यरत हैं। अनिर्बान कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज में ‘डिपार्टमेंट ऑफ जियोलॉजी’ में भी सेवाएँ दे रहे हैं। इन चारों ने वैज्ञानिक आधार पर साबित किया है कि सरस्वती नदी एक मिथ नहीं है।

तो भारत में हड़प्पा के सामानांतर भी थी कोई सभ्यता.. यहाँ से खुदाई में मिली चीजें करती हैं इशारा

ब्रह्माण्ड में आदिकाल से अविरल बहती ‘सरस्वती’

मंदिर की ज़मीन भगवान के पास ही रहेगी, उसमें तोड़फोड़ हिंदुओं की भावना भड़काने जैसा: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि तमिलनाडु में हज़ारों करोड़ों का मंदिर का भूखंड भगवान के अधिकार में रहेगा। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस विवादित आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें अधिग्रहित भूमि अतिक्रमण करने वालों को सौंपने का प्रस्ताव था।

ख़बर के अनुसार, इसी साल 30 अगस्त को सरकार ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें पाँच साल से अधिक समय से मंदिर की ग़ैर-विवादित ज़मीन को नियमित करने को कहा गया था। मद्रास हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाते हुए तमिलनाडु सरकार को 20 जनवरी 2020 तक एक रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है। कितने मंदिरों और ज़मीन के खंड की राज्य सरकार निगरानी कर रहा है, उनके सर्वे नंबर, इन ज़मीनों पर अतिक्रमण का ब्योरा, अतिक्रमण करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई और उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन लेने में फेल होने वालो अधिकारियों के बारे में जानकारी माँगी गई है।

न्यायमूर्ति एम सत्यनारायणन और न्यायमूर्ति एन शेषासाय की खंडपीठ ने कहा, “अतिक्रमण को जायज़ ठहराना मंदिर की प्रॉपर्टी के साथ छेड़छाड़ जैसा है और इस तरह का कोई भी कार्य जिसमें मंदिर की जरूरत के अलावा उसमें किसी तरह की तोड़फोड़ की जाए तो यह हिन्दू भावनाओं को भड़काने जैसा होगा।”

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि मंदिर भूमि अतिक्रमण को नियमित करने से संबंधित सरकारी आदेश का दूसरा हिस्सा तब तक लागू नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि राज्य भर के सभी मंदिरों की भूमि का बायोमेट्रिक मूल्याँकन पूरा नहीं कर लिया जाता। सेलम के ए राधाकृष्णन की जनहित याचिका पर अंतरिम निर्देश पारित किया गया।

यह तर्क दिया गया था कि सरकारी आदेश कोई ब्लैंकेट ऑर्डर नहीं है और मंदिर की भूमि की उपलब्धता, मानव संसाधन और सीई विभाग की सहमति प्राप्त करने के आधार पर मंदिर की भूमि में अतिक्रमण किया जाएगा।

ग़ौरतलब है कि इस महीने की 9 तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया था, जिसके तहत समूची विवादित भूमि रामलला को सौंप दी गई। पाँच जजों की पीठ ने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के अयोध्या में विवादित स्थल से अलग पाँच एकड़ ज़मीन दिए जाने का आदेश दिया था।

कॉन्ग्रेस ने टाँग अड़ाई हमने कर दिखाया, अयोध्या में बनेगा भव्य राम मंदिर: गृहमंत्री अमित शाह

अयोध्या अधिनियम 1993 की वो धारा, जिसके तहत बनेगा राम मंदिर के लिए ट्रस्ट

अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू, सुप्रीम कोर्ट ने दिया है 3 महीने का वक्त

BHU छात्रों की रैली, PMO को ज्ञापन सौंप कहा- महामना के मूल्य और विश्वविद्यालय के संविधान का हो पालन

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के संस्कृत धर्म-विज्ञान संकाय में फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर छात्रों का आंदोलन जारी है। छात्रों ने शुक्रवार (नवंबर 22, 2019) को पीएमओ के दखल के बाद धरना को तो समाप्त कर दिया, लेकिन उनका आंदोलन अभी भी जारी है। इस आंदोलन के तहत सैकड़ों की संख्या में छात्रों ने शनिवार (नवंबर 23, 2019) को संस्कृत धर्म-विज्ञान संकाय से अरविंद पुर स्थित पीएमओ ऑफिस तक मार्च निकाला और पीएम को संबोधित ज्ञापन सौंप कर फिरोज खान की नियुक्ति रद करने की माँग की।

आंदोलन कर रहे छात्रों का कहना है कि जिस तरह से महामना के मूल्यों को दरकिनार करते हुए विश्वविद्यालय में असंवैधानिक रूप से नियुक्ति हुई है, उसी के विरोध में उनका ये आंदोलन जारी है और इसी क्रम में वो प्रधानमंत्री के कार्यालय पर ज्ञापन सौंपने आए हैं।

वहीं जब उनसे प्रोफेसर फिरोज खान के आयुर्वेद विभाग के संस्कृत प्रोफेसर पद के लिए आवेदन करने को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि फिरोज खान का आवेदन करना उनका निजी विषय है और अगर प्रशासन उनकी नियुक्ति करता है तो ये प्रशासन का विषय है। साथ ही छात्रों कहा कि उनका फिरोज खान से कोई द्वेष नहीं है। उनकी माँग बस इतनी है कि महामना के मूल्य और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संविधान का पालन हो।

बता दें कि पहली बार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के साहित्य विभाग में एक मुस्लिम सहायक प्रोफेसर डॉ फिरोज खान की नियुक्ति 5 नवम्बर को हुई। संकाय के विद्यार्थियों को जैसे ही इसकी जानकारी हुई, इस नियुक्ति के खिलाफ विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था और तब से लगातार प्रदर्शन जारी है।

उल्लेखनीय है कि जब प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर छात्र प्रदर्शन कर रहे थे तो देश भर में तमाम मीडिया समूहों ने इस न्यूज़ को ऐसे चलाया जैसे कि पूरे BHU में मुस्लिम टीचर की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। अलीगढ़ के तर्ज पर बेशक BHU के नाम में कुछ समानताएँ हो लेकिन वहाँ किसी का सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से विरोध कभी नहीं हुआ। 

दरअसल यह विरोध एक गैर-हिन्दू का ‘धर्म-विज्ञान संकाय’ में नियुक्ति का विरोध था। बता दें कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के अंतर्गत दो विभाग आते हैं। पहला संस्कृत विद्या और दूसरा धर्म विज्ञान। इन दोनों में अलग-अलग तरीके की पढ़ाई होती है। संस्कृत विभाग में संस्कृत को भाषा की तरह पढ़ाया जाता है। वहीं, संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में सनातन धर्म के रीति-रिवाजों, मंत्रों, श्लोकों, पूजा पाठ के तौर-तरीकों और पूजा पाठ के बारे में बताया जाता है।

ये प्लेटलेट क्या बला है? कौन सी बीमारी है? ये तो हमने नई चीज सीखी है: इमरान ख़ान का फिर बना मज़ाक

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की तबीयत को लेकर वहाँ राजनीति हो रही है। वे लाहौर के एक जेल में बंद थे। हाल ही में उन्हें इलाज के लिए एयर एम्बुलेंस से लंदन ले जाया गया। इस बारे में बोलते हुए इमरान ख़ान ने कहा कि जब उन्होंने नवाज़ शरीफ की रिपोर्ट देखी तो उसमें कई बीमारियाँ थीं। बकौल इमरान, पूर्व पाक पीएम को दिल का मरीज भी बताया गया है, उन्हें डायबिटीज भी है और किडनी भी ख़राब है। इसके बाद इमरान ख़ान ने कहा कि शरीफ को ‘प्लेटलेट्स भी हो गई हैं’। इमरान ख़ान ने कहा कि उन्होंने पहली बार प्लेटलेट्स नाम की कोई चीज सुनी और सीखी है। उन्होंने पूछा कि भला ये क्या बला है?

67 वर्षीय पाक पीएम के इस बयान पर लोगों ने उनका मज़ाक बनाया। पत्रकार नायला इनायत ने पूछा कि इतनी उम्र और अनुभव होने के बावजूद इमरान ख़ान ने ब्लड प्लेटलेट्स के बारे में नहीं सुना है। यह अजीब है। आप ऊपर देख सकते हैं कि ख़ान ने प्लेटलेट्स को एक बीमारी के रूप में दर्शाया है जबकि ये ब्लड सेल्स होते हैं, जो ब्लीडिंग को रोकते हैं। जब ख़ून में प्लेटलेट्स की कमी हो जाती है तो अत्यधिक ब्लीडिंग का ख़तरा आ जाता है क्योंकि ‘ब्लड क्लॉट’ बनने बंद हो जाते हैं।

इमरान ख़ान पर नवाज़ शरीफ की स्वास्थ्य चिंताओं को नज़रअंदाज़ करने का आरोप भी लगा है। मंगलवार (नवंबर 19, 2019) को शरीफ को लंदन ले जाया गया। इस पर टिप्पणी करते हुए इमरान ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट्स में कहा गया था कि वो कभी भी मर सकते हैं, लेकिन लंदन जाने वाली फ्लाइट को देखते ही उनकी सारी बीमारी दूर हो गई। इमरान ने नवाज़ शरीफ की बीमारी पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें प्लेन की तरफ बढ़ते शरीफ को देख कर आश्चर्य हुआ, क्योंकि वो काफ़ी स्वस्थ दिख रहे थे। उन्होंने कहा कि 15 बीमारियों वाले इंसान की सारी बीमारी लंदन वाली फ्लाइट देखते ही दूर हो गई। नवाज़ शरीफ को 7 हफ्ते के लिए लंदन जाने की इजाजत मिली है।

इमरान ख़ान ने कहा कि जिस तरह से नवाज़ शरीफ विमान की सीढ़ियों पर चढ़ रह थे, उनकी बीमारी की फिर से जाँच कराए जाने की ज़रूरत है। ताज़ा स्वास्थ्य अपडेट्स की बात करें तो नवाज़ शरीफ का 7 बार ‘कार्डियक इंटरवेंशन’ किया गया है। उनका इलाज स्विट्जरलैंड के डॉक्टरों द्वारा किया जा रहा है। नवाज़ शरीफ के बारे में डॉक्टरों ने बताया कि दिमाग तक ख़ून पहुँचाने वाली धमनियाँ 80% बाधित हो चुकी हैं।

‘बाप-बेटी दोनों को एक ही अस्पताल में कैद रखो’ – इमरान खान के आदेश के बाद नवाज शरीफ को हार्ट अटैक

खुद का पता नहीं, दूसरों की जिंदगी की गारंटी कैसे ले सकता हूँ: इमरान खान

…अगर 36 का आँकड़ा पार नहीं कर पाए अजित पवार, तो महाराष्ट्र में गिर जाएगी फडणवीस की सरकार!

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर इतना बड़ा उलटफेर हो जाएगा, इस बात का अंदाज़ा भी किसी को नहीं था। कयास तो यही लगाए जा रहे थे कि राज्य में शिवसेना-कॉन्ग्रेस और NCP मिलकर सरकार बनाएँगे। लेकिन, शनिवार की सुबह देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने मुख्यमंत्री व उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। इस गठबंधन को लेकर किसी को कानों-कान कोई ख़बर नहीं थी।

फ़िलहाल, अब दोनों को आगामी 30 नवंबर तक बहुमत साबित करना होगा। बहुमत के इस गणित को सटीक आँकड़ों के ज़रिए विस्तार से समझते हैं।

NCP के पास कुल 54 सीटें हैं, लेकिन बीजेपी को इस सभी सीटों का समर्थन नहीं मिला है। कहा जा रहा है कि इनमें से 35 विधायक NCP नेता अजित पवार के साथ हैं। वहीं, बीजेपी ने दावा किया है कि 13 निर्दलीय विधायकों का समर्थन उन्हें पहले से ही प्राप्त है। लेकिन अजित पवार को 35 नहीं बल्कि 36 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। ऐसा इसलिए क्योंकि दल-बदल कानून से बचने के लिए छोटे पवार के पास यही 36 का आँकड़ा होना जरूरी है। अगर अजित पवार को 36 विधायकों का समर्थन मिल गया तो उन्हें नई पार्टी बनाने में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन अगर वो ऐसा करने में क़ामयाब नहीं हो सके तो बागी विधायकों की सदस्यता तक ख़त्म हो सकती है।

NCP प्रमुख शरद पवार ने महाराष्ट्र में भाजपा नीत सरकार में शामिल होने के अपने भतीजे अजित पवार के फ़ैसले का समर्थन नहीं किया। साथ ही अपने विधायकों को बागी नेता को समर्थन देने की चेतावनी भी दे डाली। शिवसेना के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेन्स में, शरद पवार ने NCP विधायकों को दल-बदल विरोधी क़ानून की याद दिलाई और कहा कि वे अपनी सदस्यता खो सकते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें पता चला है कि 10-11 विधायक अजित पवार के साथ गए थे।

प्रेस कॉन्फ्रेन्स में मौजूद NCP विधायकों ने कहा कि उन्हें नहीं पता था कि उन्हें शपथ ग्रहण समारोह के लिए राजभवन ले जाया जा रहा है। बाद में, शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि अजित पवार ‘अकेले’ रहेंगे। इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि NCP अजित पवार को पार्टी से निष्कासित भी कर सकती है।

क्या होता है दल-बदल विरोधी क़ानून

संविधान के दल-बदल विरोधी क़ानून के संशोधित अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 का संबंध संसद तथा राज्य विधान सभाओं में दल परिवर्तन के आधार पर सांसदी-विधायकी से छुट्टी और अयोग्यता के कुछ प्रावधानों के बारे में है। दल-बदल विरोधी क़ानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची जोड़ा गया है, जिसे संविधान के 52वें संशोधन के माध्यम से वर्ष 1985 में पारित किया गया था। इस क़ानून में विभिन्न संवैधानिक प्रावधान थे और इसकी विभिन्न आधारों पर आलोचना भी हुई थी।

दल-बदल का सीधा सा मतलब एक दल से दूसरे दल में शामिल होना है। संविधान के अनुसार इसमें निम्नलिखित स्थितियाँ सम्मिलित हैं-

  • किसी विधायक का किसी दल के टिकट पर निर्वाचित होकर उसे छोड़ देना और अन्य किसी दल में शामिल हो जाना।
  • मौलिक सिद्धान्तों पर विधायक का अपनी पार्टी की नीति के विरुद्ध योगदान करना।
  • किसी दल को छोड़ने के बाद विधायक का निर्दलीय रहना।
  • लेकिन, पार्टी से निष्कासित किए जाने पर यह नियम लागू नहीं होगा।
  • सारी स्थितियों पर यदि विचार करें तो दल बदल की स्थिति तब होती है जब किसी भी दल के सांसद या विधायक अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ते हैं या पार्टी व्हिप की अवहेलना करते हैं। इस स्थिति में उनकी सदस्यता को समाप्त किया जा सकता है और उन पर दल-बदल निरोधक क़ानून लागू होगा।
  • पर यदि किसी पार्टी के एक साथ दो तिहाई सांसद या विधायक (पहले ये संख्या एक तिहाई थी) पार्टी छोड़ते हैं तो उन पर ये क़ानून लागू नहीं होगा पर उन्हें अपना स्वतन्त्र दल बनाने की अनुमति नहीं है वो किसी दूसरे दल में शामिल हो सकते हैं।

दरअसल, महाराष्ट्र में 288 विधानसभा सीटों के लिए 21 अक्टूबर को मतदान हुआ था और 24 अक्टूबर को चुनाव नतीजे घोषित हो गए थे। नतीजों के अनुसार, बीजेपी को 105, शिवसेना को 56, NCP को 54 और कॉन्ग्रेस को 44 सीटें मिली थी। इसमें, सरकार बनाने के लिए बहुमत का ज़रूरी आँकड़ा 145 है। शुरूआत में बीजेपी और शिवसेना साथ थीं, लेकिन ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री पद की शर्त पर दोनों के बीच कुछ तय नहीं हो सका और गठबंधन टूट गया। इसके बाद बीजेपी को सरकार बनाने के लिए 40 सीटों की ज़रूरत पड़ गई।

ग़ौरतलब है कि महाराष्ट्र में किसकी सरकार बनेगी और किसके साथ सरकार बनेगी, इस पर लंबे समय से सियासी दाँव-पेंच का खेल चल रहा था। लेकिन, आज सुबह एकाएक बदलते राजनीतिक समीकरणों के चलते इस पर विराम लग गया। अंतत: देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने क्रमश: मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए राज्य को नई सरकार दी।

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महाराष्ट्र में बड़ा उलटफेर हो गया। बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस ने दोबारा सीएम पद की शपथ ली है। वहीं, एनसीपी नेता अजित पवार ने डिप्टी सीएम पद की शपथ ली है। महाराष्ट्र में राजनीतिक घटनाक्रम पर शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि कल रात अजित पवार बैठक में मौजूद थे, लेकिन नजर नहीं मिला रहे थे। उनकी बॉडी लैंग्वेज भी अलग थी।

शिवसेना ने एनसीपी विधायकों को अगवा करने का आरोप लगाते हुए अपने विधायकों को तोड़ कर दिखाने की चुनौती भाजपा को दी है। शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा है कि 8 विधायक जो अजित पवार के साथ चले गए थे, उनमें से 5 विधायक वापस आ गए हैं। उनका कहना है कि उन विधायकों को झूठ बोलकर कार में बिठाया गया। राउत ने कहा कि एक तरह से उन विधायकों का अपहरण किया गया है। आगे उन्होंने कहा, “अगर हिम्मत है तो विधानसभा में बहुमत साबित करके दिखाएँ।”

आगे उन्होंने कहा कि वो धनंजय मुंडे के संपर्क में हैं और साथ ही उन्होंने अजित पवार के वापस आने की भी संभावना जताई है। उनका कहना है कि अजित पवार को ब्लैकमेल किया गया है। उन्होंने कहा कि इसके पीछे कौन है, इसका खुलासा जल्द ही ‘सामना’ अखबार में किया जाएगा।

बता दें कि शरद पवार से बगावत के बाद एनसीपी के नेता अजित पवार को पार्टी के विभिन्न पदों से हटा दिया गया है। वो एनसीपी के लेजिस्लेटिव समिति के अध्यक्ष थे। उन्हें पार्टी ने तत्काल प्रभाव से अपदस्थ कर दिया है। हालाँकि, अजित पवार को अभी तक पार्टी से नहीं निकाला गया है। शरद पवार ने कहा कि एनसीपी विधायक दल का नया नेता चुना जाएगा।

इससे पहले एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि अजित पवार के डिप्टी सीएम बनने के बारे में उन्हें अचानक पता चला। उन्होंने कहा था कि एनसीपी का जो भी प्रमाणिक कार्यकर्ता है, वह उनके (अजित पवार) के साथ नहीं जाएगा। पवार ने कहा था कि अजित पवार का फैसला पार्टी लाइन के खिलाफ है। यह अनुशासन तोड़ने वाला है। साथ ही उन्होंने दावा किया था कि एनसीपी का कोई भी कार्यकर्ता एनसीपी-बीजेपी की सरकार के समर्थन में नहीं है। इसके अलावा उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश करते हुए कहा था, “30 नवंबर तक बहुमत साबित करने का वक्त है। हमारे पास नंबर है, सरकार तो हम ही बनाएँगे।”

वहीं, उद्धव ठाकरे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, “जो खेल चल रहा है, उसे पूरा देश देख रहा है। पहले ईवीएम खेल चल रहा था और अब यह नया खेल चल रहा है। इसके बाद से मुझे नहीं लगता कि चुनावों की भी जरूरत है।” अपने विधायकों को तोड़ने के सवाल पर उद्धव ठाकरे ने कहा, “कोशिश करके देखें, महाराष्ट्र सोने वाला नहीं है।”

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महाराष्ट्र में अब कॉन्ग्रेस को अपनी पार्टी में टूट का डर दिख रहा है। पार्टी को डर है कि अगर शरद पवार जैसे बड़े नेता की पार्टी टूट सकती है और उनका भतीजा ही भाजपा से जाकर मिल सकता है तो कॉन्ग्रेस तो राज्य में चौथे नंबर की पार्टी है। इस डर के कारण कॉन्ग्रेस ने अपने सभी विधायकों का मोबाइल फोन जब्त कर लिया है। उन सभी को जयपुर ले जाया जाएगा। जयपुर में बसपा विधायक दल को 2 बार तोड़ने वाले अशोक गहलोत की सरकार है। कॉन्ग्रेस ने कई दिनों ने अपने विधायकों को जयपुर में ही ठहराया हुआ था लेकिन राष्ट्रपति शासन लगने के बाद उन्हें वापस बुला लिया गया था।

पूर्व नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और गाँधी परिवार के वफादार अहमद पटेल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी पत्रकारों ने इस मसले को लेकर सवाल पूछा। जवाब में कॉन्ग्रेस नेताओं ने बताया कि उनके सभी 44 विधायक पार्टी के साथ हैं। हालाँकि, कॉन्ग्रेस के 2 विधायकों के गाँव में होने की बात भी कही गई। खड़गे ने बताया कि वो दोनों भी पार्टी के साथ हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शिवसेना और एनसीपी में अपने विधायकों को कहीं और शिफ्ट करने में लगी हुई है। एनसीपी ये देखने में लगी है कि उसके कितने विधायक शरद पवार के साथ हैं।

शिवसेना ने भी अपने विधायकों को काफ़ी दिनों तक ठाकरे परिवार के निवास मातोश्री के पास ही स्थित एक होटल में रखा था। उन विधायकों को आधार कार्ड के साथ तलब किया गया था। अब कॉन्ग्रेस के विधायक भी जयपुर के रिसोर्ट में जाएँगे। इससे पहले ख़बर आई थी कि इन विधायकों को भोपाल ले जाया जाएगा, जहाँ कमलनाथ की सरकार है। लेकिन, अब कॉन्ग्रेस को लगता है कि भोपाल से जायदा अच्छी जगह उसके लिए जयपुर ही रहेगी।

न्यूज़ 18 के सूत्रों के अनुसार, अजित पवार 9 विधायकों के साथ एक चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली जा रहे हैं। वहीं राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को ही अपने आरोपों के लपेटे में लेकर उन्स इस्तीफा माँगा है।

महाराष्ट्र में अजित पवार के साथ एनसीपी का एक धड़ा भाजपा से जा मिला और देवेंद्र फडणवीस फिर से मुख्यमंत्री बने। अजित पवार को डिप्टी सीएम का पद मिला। पल-पल बदलते घटनाक्रम में विपक्षी नेताओं ने विधायकों को बरगलाने का आरोप लगाया। कॉन्ग्रेस का आरोप है कि भाजपा उसका विधायकों को प्रलोभन दे रही है।

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कैसे देवेंद्र बने दोबारा महाराष्ट्र के ‘शाह’: देर रात कैसे लिखी गई उलटफेर की पटकथा

महाराष्ट्र की सियासत में शनिवार सुबह बड़ा उलटफेर हुआ। जिस एनसीपी ने कॉन्ग्रेस और शिवसेना के साथ सरकार बनाने की बात कही थी, उसका एक धड़ा भाजपा से जा मिला। जिस भाजपा ने सबसे ज्यादा सीटें होने के बावजूद सरकार बनाने का दावा तक नहीं पेश किया था, रातोंरात बदले समीकरण में वो सत्ता में वापस लौटी और देवेंद्र फडणवीस के सर फिर से महाराष्ट्र का ताज सजा। यह सब शुक्रवार (नवंबर 23, 2019) की रात शुरू हुआ। शिवसेना सांसद संजय राउत का दावा था कि अजित पवार उस बैठक में अलग-अलग से लग रहे थे और किसी से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे। खैर, सुबह महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन का भी अंत हो गया। आइए, देखते हैं कब, क्या, कैसे हुआ।

शुक्रवार देर रात क्या हुआ?

शुक्रवार को एनसीपी, कॉन्ग्रेस और शिवसेना की संयुक्त बैठक हुई थी। बैठक से निकल कर एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने कहा था कि गठबंधन के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे होंगे। लेकिन, देर रात को ही देवेंद्र फडणवीस सरकार बनाने का दावा पेश करने पहुँचे और राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को एनसीपी का समर्थन पत्र सौंपा। फडणवीस ने 173 विधायकों के समर्थन का दावा किया। एनसीपी के 54 और 14 अन्य निर्दलीय विधायकों के समर्थन के बाद फडणवीस ने सरकार बनाने का दावा पेश किया।

हालाँकि, रात में किसी को इसकी भनक नहीं लगी। सब यही सोच रहे थे कि सुबह होते ही कॉन्ग्रेस और एनसीपी के समर्थन से शिवसेना सरकार बनाने का दावा पेश करेगी। रात के पौने 12 बजे एनसीपी विधायक दल के नेता अजित पवार भी राज्यपाल के पास पहुँच गए और उन्होंने भाजपा को समर्थन देने सम्बन्धी विधायकों द्वारा हस्ताक्षरित पत्र सौंपा। अजित पवार के इस पत्र के बाद ही राज्यपाल संतुष्ट हुए कि भाजपा के पास बहुमत का जादुई आँकड़ा है। भाजपा ने 170 से भी अधिक विधायकों के समर्थन का दावा किया।

रात के 12 बजे राज्यपाल ने हालात से केंद्र सरकार को अवगत कराया। केंद्र सरकार को राज्यपाल ने कहा कि राज्य में गठबंधन सरकार बनते ही राष्ट्रपति शासन हटा देना चाहिए। इसके बाद इस प्रस्ताव से राष्ट्रपति भवन को अवगत कराया गया।

शनिवार की सुबह क्या-क्या हुआ?

सुबह के 6 बजे राज्यपाल ने निर्णय लिया कि देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई जाएगी। इसके बाद फडणवीस ने 6.45 में राज्यपाल को सूचना दी कि अजित पवार को उपमुख्यमंत्री पद के लिए नामित किया गया है। राज्यपाल ने सुबह 8 बज कर 7 मिनट कर फडणवीस और पवार को शपथ दिलाने की प्रक्रिया पूरी की। बस इसके साथ ही उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने का सपना चकनाचूर हो गया।

किसने क्या कहा?

इस दौरान नेताओं की प्रतिक्रियाएँ भी रोचक आईं। उद्धव ठाकरे और शरद पवार ने साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के अपना दर्द छलकाया, कॉन्ग्रेस की तरफ़ से मल्लिकार्जुन खड़गे और अहमद पटेल ने इसे जनादेश का अपमान बताया। उद्धव ठाकरे ने छत्रपति शिवाजी को याद करते हुए कहा कि भाजपा ने पीछे से वार किया है। उन्होंने पूछा कि ऐसा ही चलता रहा तो चुनाव की ज़रूरत ही क्या है? महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि शिवसेना ने भाजपा को धोखा दिया है। संजय राउत ने कहा कि अजित पवार को ब्लैकमेल किया गया है और विधायकों को अपहृत कर ले जाया गया था।

केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने शरद पवार और सुप्रिया सुले को भी मंत्री बनाने का ऑफर दिया। रामविलास पासवान ने लिखा कि जिस जानवर को सड़क पर यह पता नहीं होता कि उसे दाएँ जाना है या बाएँ, वो मारा जाता है। मोदी और शाह ने फडणवीस और पवार को शपथग्रहण के लिए बधाई दी।

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