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शादी समारोह में कॉन्ग्रेस MLA तनवीर सैत पर फरहान ने किया चाकू से हमला

कर्नाटक के मैसूरु में रविवार (नवंबर 17, 2019) कॉन्ग्रेस विधायक तनवरी सैत पर एक युवक ने चाकू से हमला कर दिया। 20 साल के हमलावर फरहान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। हमला किन वजहों से किया गया यह स्पष्ट नहीं है।

हमले में कॉन्ग्रेस विधायक बुरी तरह से घायल हो गए। उन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया। चोट गहरी होने के कारण उनकी हालत गंभीर है। घटना रविवार रात 11:45 बजे की बताई जा रही है।

एएनआई ने इस घटना की जानकारी देते हुए एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है। इसमें देखा जा सकता है कि कुछ लोग आरोपित युवक को पकड़कर ले जा रहे हैं और घटनास्थल पर काफी हो हल्ला हो रहा है।

पुलिस कमिश्नर केटी बालाकृष्ण बताया कि हमले में विधायक के गर्दन और कंधे पर गंभीर चोटें आई हैं। जिसके कारण उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस के अनुसार, हमलावर की पहचान फरहान के रूप में हुई है। जिसकी उम्र करीब 20 साल की है और उदयगिरि का रहने वाला है।

बता दें, हमले की वजह फिलहाल पता नहीं चल पाई है, लेकिन पुलिस मामले की जाँच में जुटी है। जानकारी के अनुसार मैसूर पुलिस के कमिश्ननर ने नरसिम्हाराजा से विधायक तनवीर सैत से मुलाकात की है और जरूरी पूछताछ करके मामले को दर्ज कर लिया है। इसके बाद उनसे मिलने वाले लोगों का सिलसिला अभी जारी है।

बाबरी मस्जिद पर मुस्लिम दो फाड़, सुन्नी वक्फ बोर्ड दाखिल नहीं करेगा पुनर्विचार याचिका

अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर मुस्लिम पक्षों का विभाजन नजर आने लगा है। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने साफ कर दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करेगा। बाबरी मस्जिद के मुख्य पक्षकार रहे इकबाल अंसारी भी रिव्यू पिटिशन दाखिल नहीं करने की बात कह चुके हैं। हालॉंकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है।

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर फारूक़ी ने कहा, “भले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है, लेकिन हम ऐसा नहीं करने के अपने पुराने स्टैंड पर कायम हैं।” उन्होंने कहा कि फैसले से पहले एआईएमपीएलबी ने कहा था कि उसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला मंजूर होगा। फिर उसने पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला क्यों किया। यह पूछे जाने पर कि क्या बोर्ड मस्जिद निर्माण के लिए जमीन स्वीकार करेगा फारूकी ने कहा कि इस संबंध में वक्फ बोर्ड की 26 नवंबर को होने वाली बैठक में फैसला किया जाएगा।

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बता दें कि राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड मुख्य याचिकाकर्ताओं में से एक था। इस मामले में 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। शीर्ष अदालत ने विवादित जमीन रामलला को सुपुर्द करते हुए वहॉं मंदिर निर्माण के लिए सरकार को तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया है। साथ ही मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में कहीं और मस्जिद बनाने के लिए पॉंच एकड़ जमीन उपलब्ध कराने के भी निर्देश दिए थे।

गौरतलब है कि रविवार (नवंबर 17, 2019) को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने न्यायालय के फैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात कही थी। बोर्ड का कहना है कि मस्जिद की जमीन अल्लाह की है और शरई कानून के मुताबिक वह किसी और को नहीं दी जा सकती। उस जमीन के लिए आखिरी दम तक कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी।

जमीयत के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी का भी कहना है कि मुस्लिम मस्जिद स्थानांतरित नहीं कर सकते, इसलिए दूसरी जमीन नहीं ली जा सकती। उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मुस्लिम पक्ष के ज्यादातर तर्कों को स्वीकार किया है। लिहाजा मुस्लिमों के पास अब भी जमीन वापस पाने के कानूनी विकल्प मौजूद हैं।

एलन सुहैब और तहा फैज़ल पर पुलिस ने UAPA कैसे लगाया: केरल के CM पर टूट पड़े वामपंथी नेता

केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन को माकपा पोलित ब्यूरो की बैठक में असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। दो दिवसीय यह बैठक रविवार को दिल्ली में समाप्त हुई थी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक केरल में माकपा के दो युवा कार्यकर्ताओं पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत कार्रवाई को लेकर ब्यूरो के सदस्यों ने विजयन को खूब सुनाया।

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया है कि पोलित ब्यूरो के तीन सदस्यों ने इस महीने की शुरुआत में कोझीकोड में पार्टी के दो युवा कार्यकर्ताओं के खिलाफ यूएपीए के तहत कार्रवाई पर बेहद नाराजगी जताई। तीखी आलोचना के बाद विजयन ने सफाई देते हुए कहा कि जब यह मामला सरकार के पास आ गया तो वे उचित कार्रवाई करेंगे। उल्लेखनीय है कि यूएपीए के तहत आरोपों को लेकर आखिरी मंजूरी राज्य सरकार देती है।

लेकिन इससे तीनों वरिष्ठ सदस्य शांत नहीं हुए। उनका गुस्सा इस बात को लेकर था कि ऐसा उस राज्य में हुआ जहॉं पार्टी की सरकार है। इसके बाद फैसला किया गया कि इस मसले पर चर्चा जनवरी में पार्टी की सेंट्रल कमेटी की बैठक में होगी।

सीपीआई कार्यकर्ता एलन सुहैब और तहा फैज़ल पर यूएपीए के सेक्शन 20 (जिसमें आतंकी समूह या संगठन का सदस्‍य होने पर सजा का प्रावधान है), 38 (आतंकी संगठन से संबद्ध होने का अपराध), 39 ( आतंकी संगठन को सहयोग प्रदान करने का अपराध) के तहत केरल पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। अदालत ने दोनों को 15 दिन की हिरासत में भेज दिया था। दोनों की उम्र करीब 20 साल है और वे कानून तथा पत्रकारिता के छात्र हैं। इनके पास से माओवादी विचारधारा से संबंधित पैम्फलेट बरामद किए गए थे। साथ ही जम्मू कश्मीर पर केंद्र सरकार के फैसले की निंदा की थी।

दोनों के खिलाफ यूएपीए के तहत कार्रवाई की बात सामने आने के बाद माकपा महासचिव सीताराम येचुरी और उनके पूर्ववर्ती प्रकाश करात ने इस पर आपत्ति जताई थी। इस मामले में पार्टी का एक धड़ा विजयन के रवैए से नाखुश है। हालॉंकि यह गुट पहले भी उनके खिलाफ रहा है। लेकिन, लोकसभा चुनावों में प्रदेश में पार्टी के बेहतरीन प्रदर्शन ने उनके विरोधियों को चुप रहने पर मजबूर कर दिया था। अब युवा कार्यकर्ताओं पर यूएपीए के तहत कार्रवाई को बहाना बनाकर वे फिर से विजयन के खिलाफ सक्रिय हो गए हैं।

सुब्रह्मण्यम स्वामी और कॉन्ग्रेस नेता सलमान निजामी ने पूछा- सिमी से जुड़ा कासिम मुस्लिमों का नुमाइंदा क्यों?

राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने की जानकारी देने के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस विवादों में घिर गया है। रविवार (नवंबर 17, 2019) को आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को सैयद कासिम रसूल इलियास ने भी संबोधित किया। कासिम जेएनयू के विवाद छात्र नेता रहे उमर खालिद का अब्बा है। साथ ही वह प्रतिबंधित संगठन सिमी से भी जुड़ा रहा है।

उसकी मौजूदगी को लेकर सवाल उठाने वालों में भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी और कॉन्ग्रेस नेता सलमान निजामी भी शामिल हैं। स्वामी ने ट्वीट कर कहा है, “क्या प्रतिबंधित संगठन सिमी के सदस्य अब पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे मुस्लिम संगठनों के नेता हैं? गृह मंत्रालय को इसपर संज्ञान लेना चाहिए।

वहीं, कॉन्ग्रेस नेता सलमान निजामी ने कासिम पर सवाल उठाते हुए उसकी पूरी कुंडली सार्वजनिक कर दी है। निजामी ने ट्वीट किया है, “ये कासिम कौन है? जो 2019 लोकसभा चुनाव में अपनी जमानत राशि भी नहीं बचा पाया, जिसे केवल 1% वोट मिले। क्या अब वो 20 करोड़ मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करेगा। अब प्रत्यक्ष रूप से AIMPLB अतिवादियों के नियंत्रण में है। कासिम उस संगठन का अध्यक्ष था जिसे आतंकी गतिविधियों के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया और उसका बेटा उमर खालिद भी नास्तिक है। हमें बेवकूफ मत बनाओ।

गौरतलब है कि कासिम किसी ज़माने में सिमी का अध्यक्ष भी रह चुका है। साल 1985 में उसने खुद को इस संगठन से अलग कर लिया था। वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया के टिकट पर पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल सीट जंगीपुर से वह लोकसभा का भी चुनाव लड़ चुका है।

सिमी जैसे संगठन से लेकर मुस्लिम बहुल इलाके से लोकसभा पहुँचने की कोशिश कर चुका कासिम अब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में है। जमात-ए-इस्लामी हिंद की केन्द्रीय समिति का सदस्य भी है। वह बाबरी मस्जिद को-आर्डिनेशन कमिटी का संयोजक भी रह चुका है।

कासिम का बेटा उमर खालिद खुद को नास्तिक कहता है। हालाँकि कमलेश तिवारी की हत्या के बाद इस्लामिक चरमपंथ को लेकर उसकी सहानुभूति उजागर हो गई थी। संभव है कि खालिद ने नास्तिकता का चोला इसलिए भी ओढ़ रखा हो ताकि इस्लामिक समाज में फैली व्यापक असहिष्णुता पर कोई चर्चा न हो।

गैर-मुस्लिम को झूठ बोलकर फँसाने के इस कदम को तक़िया भी कहा जाता है जो इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं के अनुकूल है। इसके तहत एक मुस्लिम गैर-मुस्लिम को भरोसे में लेकर यह जताता है कि वह दरअसल इस्लाम में विश्वास नहीं रखता।

महाराष्ट्र: शिवसेना को समर्थन से क्यों डर रहीं सोनिया गाँधी, क्या पवार से मुलाकात के बाद खोलेंगी पत्ते?

एजेंडा तैयार। सरकार में हिस्सेदारी का फॉर्मूला फाइनल। बावजूद इसके महाराष्ट्र में अब तक कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर शिवसेना सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाई है। इसकी सबसे बड़ी वजह कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी की दुविधा है। ऐसे में अब नजरें सोमवार को दिल्ली में सोनिया और एनसीपी के मुखिया शरद पवार के बैठक पर टिकी है।

कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा है कि इस बैठक के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि कॉन्ग्रेस शिवसेना के साथ सरकार गठन के लिए आगे बढ़ेगी या नहीं। इससे पहले रविवार को एनसीपी की एक बैठक हुई थी। इस बैठक के बाद पार्टी प्रवक्ता नवाब मलिक ने बताया कि एनसीपी चाहती है कि राज्य में जल्द से जल्द राष्ट्रपति शासन खत्म हो। लेकिन, सरकार गठन को लेकर आखिरी फैसला सोनिया गॉंधी और शरद पवार के बीच होने वाली बैठक के बाद ही होगा।

सोनिया की दुविधा की सबसे बड़ी वजह उत्तर भारतीयों और कथित अल्पसंख्यकों को लेकर शिवसेना का स्टैंड है। हालॉंकि जो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार किया गया है उससे जाहिर है कि शिवसेना अपने हिन्दुत्व के एजेंडे से पीछे हटने को तैयार है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शिवसेना मजहब विशेष को 5 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण देने और वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मॉंग से पीछे हटने को तैयार हो गई। शिवसेना पहले चाहती थी कि पार्टी संस्थापक बाल ठाकरे की पुण्यतिथि 17 नवंबर को नई सरकार का गठन हो जाए। लेकिन, सोनिया के पत्ते नहीं खोलने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। सोनिया के असमंजस में होने की दूसरी वजह शिवसेना को समर्थन देने पर कॉन्ग्रेस के भीतर का मतभेद भी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री सुशील शिंदे और मुंबई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे संजय निरुपम जैसे नेता शिवसेना के साथ जाने के पक्ष में नहीं है।

दूसरी तरफ, केंद्र में भाजपा की सहयोगी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (RPI) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले के एक बयान ने भी राज्य की राजनीतिक तस्वीर को लेकर कयासों को बल दे दिया है। अठावले ने रविवार को कहा था, “मैंने अमित भाई (भाजपा अध्यक्ष अमित शाह) से कहा कि अगर वह मध्यस्थता करते हैं तो एक रास्ता निकाला जा सकता है, जिस पर उन्होंने (अमित शाह) जवाब दिया कि चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा। भाजपा और शिवसेना मिलकर सरकार बनाएँगे।” इससे पहले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी संकेतों में इशारा किया था कि भाजपा अब भी राज्य में सरकार बना सकती है। महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने भी कहा था कि पार्टी के पास 119 विधायकों का समर्थन है।

288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 145 विधायकों का समर्थन जरूरी है। विधानसभा चुनाव में भाजपा को 105, शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटों पर जीत मिली थी। शिवसेना ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन, ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद की मॉंग पर उसके अड़ने के बाद भाजपा ने ​सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद राज्यपाल ने सरकार गठन को लेकर शिवसेना और एनसीपी की राय जानी थी। लेकिन, दोनों ही दल समर्थन पेश करने में विफल रहे ​थे जिसके बाद राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।

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निकाह के बाद बीवी को तलाक दे इब्राहिम बना आर्यन, अंजलि से की शादी: बिलासपुर हाई कोर्ट ने दिया फैसला

छत्तीसगढ़ के एक दूसरे मजहब के युवक इब्राहिम ने अपना नाम और धर्म बदलकर एक हिन्दू लड़की से शादी की। दोनों युवक और युवती छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। छत्तीसगढ़ के धमतरी के रहने वाले 33 वर्षीय इब्राहिम सिद्दकी ने 23 साल की अंजलि जैन से शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन करके (जैसा उसने कोर्ट को बताया) अपना नाम आर्यन रख लिया। इसके बाद इब्राहिम ने रायपुर के एक आर्य समाज मंदिर में जाकर अंजलि से विवाह किया।

दूसरे मजहब के लड़के से शादी की बात सुनते ही लड़की के घरवालों के तो जैसे होश उड़ गए! लड़की के घर वालों ने अपनी बेटी को तुरंत अपने पास बुला लिया और फिर कभी वापस इब्राहिम के पास जाने नहीं दिया। इसके बाद दो अलग-अलग मजहबों की शादी को लेकर विवाद हुआ और लड़की के घर वालों ने इस घटना को लव जिहाद करार दिया। अंजलि के परिवार वालों के मुताबिक इब्राहिम ने बहला-फुसलाकर उनकी बेटी से शादी की। यह शादी फरवरी 2018 में हुई थी। तब अंजलि की उम्र 22 साल जबकि इब्राहिम की उम्र 26 साल थी।

आर्य मंदिर में इब्राहिम-अंजलि की शादी

इसके बाद इब्राहिम अपनी पत्नी को वापस पाने के लिए बिलासपुर हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। इस पर हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि अंजलि को सरकारी हॉस्टल या अपने माता-पिता के पास रहना होगा। और इब्राहिम की याचिका खारिज कर दी। अंजलि ने हॉस्टल में रहने का फैसला लिया। इस मामले में पेंच यह था कि इब्राहिम पहले शादीशुदा था और अंजलि से प्रेम के कारण उसने अपनी पत्नी को तलाक दिया था।

हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए इब्राहिम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। लेकिन यहाँ भी पेंच! अंजलि ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसके माता-पिता और परिवार वालों ने उसकी आजादी पर कोई रोक नहीं लगाई है और न ही उसे जोर-जबरदस्ती कर अपने कब्जे में रखा है। अंजलि के इस बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इब्राहिम की याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद अप्रत्याशित ढंग से अंजलि ने बिलासपुर हाई कोर्ट को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में उसने अपने परिवार वालों पर जोर-जबरदस्ती का आरोप लगाया और कहा कि वो अपने पति इब्राहिम यानी आर्यन के साथ रहना चाहती है। अंजलि का ने यह बताया कि उसने यह शादी किसी के दबाव में नहीं की बल्कि दोनों के बीच आपसी प्यार के चलते यह रिश्ता आगे बढ़ा।

इसी चिट्ठी के आधार पर बिलासपुर हाई कोर्ट ने दोनों के रिश्ते को जायज़ ठहराते हुए फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने अंजलि को अपनी मर्ज़ी के व्यक्ति के साथ प्रेम व शादी करने तथा अपनी मर्ज़ी की जगह रहने का फैसला सुनाया है।

18 महीने में 8 करोड़ रुपए कैसे कमाएँ… कॉन्ग्रेस MLA और उनकी पत्नी ने यह कर दिखाया

कर्नाटक के हेब्बल से कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक बी सुरेश की पत्नी पद्मावती ने इस बार होस्कोटे से उपचुनाव में पर्चा दाखिल किया। नियमों के अनुसार चुनाव लड़ने के लिए अपनी संपत्ति और आय को लेकर सारा ब्यौरा देना ज़रूरी है। यही वजह है कि 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव लड़ते वक़्त जहाँ एक ओर सुरेश ने अपनी संपत्ति का हलफनामा दिया तो वहीं दूसरी ओर 18 महीने बाद उप-चुनाव के लिए मैदान में उतरी उनकी पत्नी पद्मावती ने भी अपनी संपत्ति की पूरी जानकारी देते हुए सारे डाक्यूमेंट्स जमा किए।

पति और पत्नी दोनों के दिए संपत्ति ब्यौरे में एक हैरान कर देने वाली बात सामने आई। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बी सुरेश और उनकी पत्नी के हलफनामे में दर्ज संपत्ति में करीब 8 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी देखी गई। यानी 18 महीने में इस दंपत्ति की संपत्ति में 8 करोड़ रुपए का इजाफा हो गया। चुनाव आयोग के नियमानुसार चुनाव लड़ने वाले को अपना ही नहीं बल्कि अपने जीवनसाथी (पति/पत्नी) की चल-अचल संपत्ति का भी ब्यौरा देना होता है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सुरेश और उनकी पत्नी की कुल संपत्ति तकरीबन 425.5 करोड़ रुपए है।

गौरतलब है कि 2018 में कर्नाटक के हेब्बल से विधायक का चुनाव लड़ते वक़्त उनकी संपत्ति 416.7 करोड़ रुपए थी। वहीं 2019 में इन्होंने दो लक्ज़री गाड़ियाँ भी खरीदी थीं जिनकी कीमत करीब 1.2 करोड़ थीं। इनमें महिंद्रा एसयूवी और मर्सिडीज़ बेंज शामिल हैं। कॉन्ग्रेस नेता बी. सुरेश के साम्राज्य में करोड़ों की कमर्शियल और रेजिडेंशियल इमारत से लेकर महँगे आभूषण आदि शामिल हैं।

बी सुरेश का नाम तब सुर्ख़ियों में आया था, जब जनवरी में उन्होने कर्नाटक के पूर्व सीएम सिद्धरमैय्या को अपनी मर्सिडीज़ दे दी थी। बाद में इस पर सफाई देते हुए बी सुरेश ने मीडिया से बातचीत में कहा था, “यह मेरी गाड़ी है जिससे मैं अक्सर ट्रेवल किया करता था, यह गाड़ी मेरी पत्नी के नाम पर है। मैंने इसे सीएम को गिफ्ट नहीं किया। आप समझने की कोशिश कीजिए। क्या ज़रूरत के समय आप अपने दोस्त को अपनी गाड़ी नहीं देंगे?”

170 विधायकों के साथ दिसंबर में ही बनाएँगे सरकार: संजय राउत ने दोहराया- CM शिवसेना का ही होगा

शिवसेना नेता संजय राउत ने एक बार फिर दोहराया है कि उनकी पार्टी के नेतृत्व में ही सरकार बनेगी। राउत ने 170 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए कहा कि दिसंबर महीने में ही सरकार गठन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। राउत के बयान से लगता है कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी से शिवसेना की बातचीत अभी लम्बी चलेगी और इन दलों में सहमति बनने में समय लगेगा। दिसंबर आने में अभी 15 दिन से भी अधिक बचे हैं। 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 145 विधायकों की ज़रूरत होती है। राउत ने कहा कि शिवसेना विधानसभा के फ्लोर पर अपनी ताक़त दिखाएगी

राउत ने दावा किया कि शिवसेना के नेतृत्व में बनने वाली सरकार पूरे 5 सालों तक चलेगी। उन्होंने तीनों दलों के बीच कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार किए जाने की ख़बर की पुष्टि की। बता दें कि एनसीपी ने शिवसेना से हिंदुत्व वाले रुख में नरमी लाने को कहा है। साझा समझौते में यह भी तय किया गया है कि शिवसेना वीर सावरकर के लिए भारत रत्न की माँग नहीं करेगी। साथ ही कई कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में फ्लॉप रही कर्जमाफी को भी साझा समझौते में शामिल किया गया है। राउत ने कहा कि एनसीपी और कॉन्ग्रेस से उनकी बातचीत जारी है।

शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ के एग्जीक्यूटिव एडिटर संजय राउत ने कहा कि पुराने एनडीए और अभी के एनडीए में काफ़ी अंतर है। शिवसेना और अकाली दल को राजग का संस्थापक दल बताते हुए राउत ने कहा कि अगर उनकी पार्टी गठबंधन से अलग नहीं होती तो जनता कभी उन्हें माफ़ नहीं करती। उन्होंने कहा कि भाजपा ने उद्धव ठाकरे को झूठा साबित करने का प्रयास किया है। राउत ने ‘सामना’ में अपने कॉलम ‘रोकटोक’ में लिखा कि भाजपा ख़ुद को शिवाजी की पार्टी बना कर पेश कर रही है लेकिन सतारा से उदयनराजे भोसले शिवाजी के नाम पर चुनाव लड़ने के बावजूद हार गए। राउत ने लिखा कि शिवाजी सिर्फ़ भाजपा के नहीं हैं, महाराष्ट्र के सभी 11 करोड़ लोगों के हैं।

उधर रविवार (नवंबर 17, 2019) को जब पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बाल ठाकरे की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दने पहुँचे तो उन्हें शिवसेना समर्थकों की नारेबाजी का सामना करना पड़ा। शिवसेना कार्यकर्ताओं ने फडणवीस के सामने ‘सरकार किसकी, शिवसेना की’ जैसे नारे लगाए। एनसीपी नेता नवाब मलिक ने फडणवीस को हारा हुआ जनरल करार दिया। मलिक ने कहा कि फडणवीस एक हारे हुए जनरल की तरह अपनी फ़ौज का मनोबल बढ़ाने में लगे हुए हैं। मलिक ने कहा कि फडणवीस को अपनी हार स्वीकार कर लेनी चाहिए।

इधर शिवसेना और एनसीपी नेताओं ने भी पहली बार बाल ठाकरे की समाधि ‘शिवतीर्थ’ पर पहुँच कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। एनसीपी नेता छगन भुजपाल ने ठाकरे के साथ अपने क़रीबी संबंधों को याद किया। उद्धव ठाकरे और उनकी पत्नी रश्मि ने भी शिवाजी पार्क में बाल ठाकरे को श्रद्धांजलि अर्पित की। ‘युवा सेना’ के अध्यक्ष आदित्य ठाकरे ने भी बालासाहब की सातवीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

दिल्ली का पानी सबसे ख़राब, दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष हैं केजरीवाल: रामविलास पासवान ने खोली पोल

दिल्ली की हवा और पानी दोनों ही फ़िलहाल ख़राब हैं। केंद्र सरकार ने देश भर में 21 शहरों के नमूनों की जाँच की। जाँच में पता चला कि मुंबई का पानी सबसे अव्वल है, तो दिल्ली का पानी सबसे ख़राब। इसमें राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के 11 इलाक़ो से नमूने लिए गए थे। इसमें केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान के 12 जनपथ स्थित सरकारी आवास और लुटियन की दिल्ली में कृषि भवन, नंदनगरी, सोनिया विहार, पीतमपुरा, अशोक नगर और बुराड़ी जैसे इलाक़े शामिल हैं। 

दिल्ली सरकार ने नमूना परीक्षण का दावा करने वाली रिपोर्ट का खंडन किया। भारतीय मानक ब्यूरो, भारतीय मानक अधिनियम, 1986 द्वारा स्थापित BIS भारत का राष्ट्रीय मानकीकरण निकाय है। दिल्ली में एकत्र किए गए 11 नमूने पानी की गुणवत्ता के लिए BIS द्वारा निर्धारित सभी 19 मापदंडों में विफल रहे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सितंबर 2017 से दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के अध्यक्ष हैं।

इसके अलावा, दिल्ली सरकार ने चुनौती दी है कि पानी की गुणवत्ता की तुलना अन्य भाजपा शासित राज्यों से ‘निष्पक्ष’ तरीके से की जाए और इसे जाँच के लिए न्यूट्रल एजेंसी को भेजा जाए। ग़ौर करने वाली बात यह है कि मुंबई में नल के पानी की गुणवत्ता 10 में से 10 नमूनों में निर्धारित मानकों का अनुपालन करती पाई गई। मुंबई, महाराष्ट्र की राजधानी है, जो पिछले महीने तक भाजपा शासित राज्य था। सरकार गठन को लेकर चल रहे राजनीतिक घमासान के चलते वर्तमान में वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है।

BIS, डीजेबी के उपाध्यक्ष और AAP नेता दिनेश मोहनिया ने कहा कि वो जानना चाहते हैं कि कोलकाता, चेन्नई और जयपुर जैसे राजधानी शहरों में पानी की जाँच करने के लिए कौन से मापदंडों का इस्तेमाल किया गया था। केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान ने आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि BIS एक स्वतंत्र निकाय है और उन्होंने निष्पक्ष तरीके से पानी के नमूने की जाँच की है।

पासवान ने कहा कि अगर दिल्ली जल बोर्ड पानी की गुणवत्ता के बारे में आश्वस्त है, तो उन्हें BIS या WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) मानकों के तहत अनिवार्य परीक्षण करने में संकोच नहीं करना चाहिए। पासवान ने कहा कि 3 अक्टूबर को डीजेबी के सीईओ (अरविंद केजरीवाल), भारतीय मानक ब्यूरो के महानिदेशक और एनडीएमसी (नई दिल्ली नगर निगम) के अधिकारियों के साथ एक बैठक आयोजित की गई थी जहाँ यह सुझाव दिया गया था कि पानी के नमूनों का परीक्षण करने के लिए एक टीम गठित की जाए। उन्होंने कहा कि पहले दिल्ली सरकार ने इसका परीक्षण करवाने के लिए सहमति दी थी, लेकिन बाद में इसके माध्यम से इसका पालन करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

पासवान ने यह भी सुझाव दिया कि यदि वे चाहें तो डीजेबी और टीम, BIS के साथ मिलकर पानी के नमूनों का परीक्षण किसी अन्य प्रयोगशाला में करवाएँ।

राम मंदिर फैसले पर पुनर्विचार याचिका का उमर खालिद कनेक्शन, आतंकी संगठन SIMI से भी है रिश्ता

अयोध्या मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने का निश्चय किया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुस्लिम पक्ष ने यह ऐलान किया, उसमें उमर खालिद के पिता और एक समय सिमी (जो बाद में आतंकवादी संगठन घोषित हुआ) का हिस्सा रहे सय्यद सैयद कासिम रसूल इलियास मीडिया को संबोधित कर रहे थे। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कासिम ने अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मंदिर फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात कही है।

उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास एक ज़माने में सिमी का हिस्सा रहे थे लेकिन 1985 में इस संगठन से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद वे वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया के टिकट पर पश्चिम बंगाल से चुनाव भी लड़ चुके हैं। उन्होंने मुर्शिदाबाद की एक मुस्लिम बहुल इलाके वाली जंगीपुर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा था।

सिमी जैसे संगठन से लेकर मुस्लिम बहुल इलाके से लोकसभा चुनाव लड़ चुके कासिम अब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में हैं और जमात-ए-इस्लामी हिंद की केन्द्रीय समिति के एक सक्रिय सदस्य के रूप में जाने जाते हैं। साथ ही बाबरी मस्जिद को-आर्डिनेशन कमिटी के संयोजक भी रह चुके हैं।

वहीं कासिम के बेटे उमर खालिद खुद को एक नास्तिक कहते हैं। हालाँकि खालिद की छवि तैयार करने का श्रेय मुख्यधारा की मीडिया को जाता है, जिसने उसे समाज के सामने एक कट्टर नास्तिक वामपंथी का जामा पहनाया है। जबकि खालिद ने उस वक़्त इस्लामिक चरमपंथ के आगे घुटने टेक दिए थे जब कमलेश तिवारी की हत्या में जिहादियों के शामिल होने की बात सामने आई थी। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि खालिद चाहते ही नहीं कि उनके इस्लामिक समाज में फैली व्यापक असहिष्णुता पर कभी भी कोई चर्चा हो।

गैर-मु##मान को झूठ बोलकर फँसाने के इस कदम को तक़िया भी कहा जाता है जोकि इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं के अनुकूल है। इसके तहत मजहब विशेष का एक शख्स दूसरे मजहब के व्यक्ति को भरोसे में लेकर यह जताता है कि वह दरअसल इस्लाम में विश्वास नहीं रखता।

बता दें कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में मस्जिद बनाने के लिए अलग ज़मीन देने की बात कही है। इसी निर्णय के साथ जन्मभूमि पर एक भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए रास्ता साफ हो गया था। मगर आज की मुस्लिम संगठनों की बैठक के बाद उन्होंने यह दावा किया है कि वह इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे।