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जब ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में वैदिक मंगलाचरण की जगह कुरान-हदीस की आयतें गूँजेगी तो ‘हम’ याद आएँगे

डॉ फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध काशी हिन्दू विश्विद्यालय के कुलपति आवास के बाहर जारी है। संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों की कुलपति से हुई मुलाकात भी बेनतीजा रही लेकिन छात्र अभी भी अपनी माँगों और मूल्यों को लेकर धरने पर हैं। यहाँ एक बात गौर करने वाली यह भी है कि छात्रों का विरोध JNU के प्रोफ़ेसर वर्तमान वाईसचांसलर राकेश भटनागर के सामने JNU की तर्ज पर न होकर अपने आपमें सभी नैतिक मूल्यों को समाहित किए हुए वैदिक परंपरागत रीति से ही जारी है। छात्र कभी बुद्धि-शुद्धि यज्ञ कर रहे हैं तो कभी रुद्राभिषेक तो कभी प्रदर्शन के तौर पर हनुमान चालीसा का पाठ जारी है। यही वो मूल्य हैं जिनके रक्षार्थ ये छात्र इतनी सर्दी में भी वहाँ दिन-रात डटे हैं। कई छात्रों की इस दौरान तबियत भी ख़राब हो गई लेकिन अपने संकल्पों हेतु डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है।

विरोध का तरीका भी वैदिक

ऑपइंडिया से बात करते हुए शशिकांत मिश्रा, कृष्णा, शुभम, चक्रपाणि ओझा सहित SVDV के कई छात्रों ने बताया, “हम इसलिए संघर्ष कर रहे हैं कि यदि हम आज फेल भी हो गए तो आज से 20 साल बाद जब हम अपने मातृ संस्थान की तरफ देखेंगे तो अफ़सोस थोड़ा कम होगा कि हमने संघर्ष किया था लेकिन धनलोलुपता और ‘छद्म सेक्युलरिज्म’ की आड़ में महामना मालवीय जी के भावनाओं और दृष्टिकोण के साथ खिलवाड़ किया गया वो भी उसी जगह जहाँ आज भी उनकी आत्मा बसती है।”

कई शोध छात्रों ने यह बात डंके की चोट पर कही कि बेशक आज बीबीसी, वायर, क्विंट, प्रिंट जैसे पोर्टल और कई मीडिया संस्थान इसे मजहबी स्वरुप देकर ये खुलेआम लिख रहे हों कि BHU में एक संस्कृत के प्रोफ़ेसर का विरोध उसके मजहब के कारण हो रहा है वो भी ‘संस्कृत विभाग’ में, मंगलेश डबराल के लेख में दो हाथ और आगे जाते हुए बीबीसी ने डॉ. फिरोज खान को ‘पद्म श्री’ भी दे डाला है ताकि वो ‘ज़्यादा योग्य’ लगें लेकिन क्यों दिया गया इस पर मौन है। यही वामपंथियों और देश की पारम्परिक संस्कृति, वैदिक धर्म, सनातन परंपरा का विरोध करने वालों की बहुत पुरानी चाल है कि हर बात को ब्राह्मणवाद से जोड़ देना। जिसे बीबीसी ने इस बार भी बखूबी अंजाम दिया है। झूठ और फेक न्यूज़ को कैसे परोसा जाता है इसे आप अक्सर बीबीसी पर देख सकते हैं जिसे वो तथाकथित बड़े नामों की चाशनी में लपेट कर परोसता है कि झूठ न पकड़ा जाए लेकिन बार-बार पकड़े जाने के बावजूद बीबीसी बाज नहीं आता।

बीबीसी में छपा मंगलेश डबराल का लेख
बीबीसी में ही छपा वुसअतुल्लाह खान का लेख

यहाँ ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि डॉ. फिरोज खान को देश ने नहीं बल्कि बीबीसी ने अपने झूठ को प्रामाणिक बनाने के लिए ‘पद्म श्री’ दे डाला। इस बात की तस्दीक SVDV के पूर्व शोध छात्र और वर्तमान में असिस्टेंट प्रोफेसर (कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक, नागपुर, महाराष्ट्र) सौरभ द्विवेदी ने भी की। उन्होंने साफ-साफ यह आरोप दोहराया कि बीबीसी सहित कई मीडिया संस्थान ये झूठ फैला रहे हैं कि डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति संस्कृत विभाग में हुई, उन्हें स्पष्ट कर दूँ कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग कला संकाय के अंतर्गत आता है और फिरोज खान की नियुक्ति ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में हुई है। हम यहाँ अपनी परम्पराओं और मालवीय मूल्यों की रक्षा हेतु विरोध कर रहे हैं। हमारा विरोध सिर्फ किसी दूसरे मजहब का विरोध नहीं है। यहाँ हुई नियुक्ति सिर्फ संस्कृत भाषा से नहीं जुड़ी इस संकाय का मूल ‘धर्म विज्ञान’ में छिपा है।

इस पूरे खेल के मुख्य अभियुक्त चतुर्वेदी जी के ही शोध छात्र सौरभ द्विवेदी ने ये दावे के साथ कहा, “SVDV में फिरोज खान की यह नियुक्ति पैसों और नेक्सस के सिवाय और किसी आधार पर नहीं हुई है। पैसों के लालची साहित्य विभागाध्यक्ष ने अपने 5 साल पुराने विश्वसनीय स्टूडेंट को पैसे लेकर नियुक्त किया है, बस इतनी सी बात है।” सौरभ द्विवेदी सहित सभी शोध छात्रों ने माँग की कि इस नियुक्ति का विश्वविद्यालय प्रशासन से इतर किसी स्वतंत्र संस्था से जाँच होनी चाहिए, फिर अपने आप सारा कच्चा चिट्ठा खुल जाएगा।

ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉ. सौरभ द्विवेदी ने बताया, “फ़िरोज खान के मुस्लिम होने का उन्हें कोई नुकसान नहीं है, बल्कि फायदा ही है। कुछ लोग मालवीय मूल्यों, संविधान और मुस्लिम होने की बात को लेकर अधिक भ्रमित हैं। आपको बता दूँ कि किसी भी संस्था की स्थापना के पीछे उसके संस्थापक का एक उद्देश्य होता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू’ शब्द और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ‘धर्म’ शब्द में संस्थापक की बहुत सारी अवधारणाएँ निहित हैं। हमारी परम्परा नामकरण संस्कार करने की रही है, और हम सबसे सार्थक नाम चुनने की कोशिश करते हैं, यह सभी को समझना चाहिए।”

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सौरभ द्विवेदी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि एक घर बनाने में जब हम सबकी जिंदगी खप जाती है। तब संसाधन-विहीन एक व्यक्ति मदन मोहन मालवीय ने आज के एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय की नींव रखी। भीख माँगकर 40 हजार लोगों के पढ़ने और रहने की जगह बनाई। जब भारत में ब्रिटिश शासन अंग्रेजी मूल्यों वाली शिक्षा को मानक शिक्षा के तौर पर स्थापित कर रही थी तब उन्होंने ‘हिन्दू’ मूल्यों के संरक्षण के लिए एक विश्वविद्यालय की परिकल्पना की थी। महात्मा गाँधी ने उन्हें ‘महामना’ कहा। आज संविधान में स्पष्ट निर्देश न होने का बहाना करके उनके मूल्यों की जो अनदेखी की गई है, वह मर्माहत करने वाला है।

आपको बता दूँ कि जब SVDV का एक प्रतिनिधि मंडल कुलपति से मिलने गया तो उन्होंने इस बात को ढाल बनाना चाहा कि “मालवीय जी एक व्यक्ति हैं वो गलत हो सकते हैं और मेरे पास 1969 का संशोधित BHU एक्ट है जिसमें यह नहीं लिखा है कि वहाँ मुस्लिम की नियुक्ति नहीं होगी। शिलालेख मैं नहीं जानता मेरे लिए संविधान सब-कुछ है।”

जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं भी उसी विश्विद्यालय का छात्र हूँ और आज जिस देश के संविधान और कॉन्ग्रेस के दौर में BHU के संशोधित संविधान का वाईसचांसलर हवाला दे रहे हैं तो यहाँ इस बात का जिक्र करना ज़रूरी है कि मालवीय जी का 1946 में गुलाम भारत में महाप्रयाण हुआ और वे संविधान-निर्माण का हिस्सा नहीं रहे। लेकिन जिन विचारों और उद्देश्यों को लेकर उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की नींव रखी वो आज भी ज़िंदा है, आज भी उनके विचार जीवित हैं और उतने ही प्रासंगिक है, जितने तब थे।

सौरभ द्विवेदी भी इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि विश्वविद्यालय के दीवारों और पत्थरों पर उनके संदेश पढ़ते हुए हम जवान हुए हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय के हम जैसे छात्र उन विचारों को आत्मसात् करने की कोशिश करते हैं। विश्वविद्यालय की दीवारों पर वेदों उपनिषदों के मन्त्र पढ़े हैं हमने। विश्वनाथ मंदिर में खुदे 18 अध्याय गीता को देखकर नतमस्तक हुए हैं। हिन्दू मूल्यों के संरक्षण में मालवीय जी जैसा बनने का सपना देखा है। हमेशा आदर्श माना है। जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ा है, या पढ़कर भी श्रद्धाविहीन हैं, हम उनसे इस आस्था की उम्मीद बिल्कुल नहीं करते। उनकी धर्म-निरपेक्षता ईमानदार है। लेकिन जो लोग इस आस्था से जुड़े हैं, उनका चुप रहना आज जरूर अखर रहा है।

आगे बढ़ने से पहले एक बात और जान लेते हैं कि बार-बार डॉ. फिरोज खान के इस नियुक्ति के विरोध में ‘मालवीय मूल्यों’ का हवाला दिया जा रहा है तो समझिए हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में मालवीय मूल्य क्या हैं इसकी बानगी बस इससे समझ लीजिए कि 1906 में ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना और मुस्लिमों के अनावश्यक माँगों को देखकर 1915 में महामना मालवीय कॉन्ग्रेस में अपनी ऊँची साख होने के बावजूद कॉन्ग्रेस से अलग हुए और हिन्दू-हित की बात के लिए 1915 में ‘अखिल भारतीय हिन्दू महासभा’ की स्थापना की। अपने जीवनकाल में 4 बार कॉन्ग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष रहे, जिसमें से दो अधिवेशनों के समय महामना जेल में भी रहे। जब ब्रिटिश हुकूमत में कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने 1916 के ‘लखनऊ पैक्ट’ के तहत मुस्लिमों के लिए अतिरिक्त एवं पृथक प्रतिनिधित्व की बात की, तब मालवीय जी ने कॉन्ग्रेस के इस प्रस्ताव का तीखा प्रतिरोध किया। आज वही प्रतिरोध कहीं न कहीं ‘धर्म संकाय’ के छात्र कर रहे हैं।

सौरभ द्विवेदी इस बात में आगे जोड़ते हुए कहते हैं, “विनायक दामोदर सावरकर और डॉ केशव बलिराम हेडगवार इस हिन्दू महासभा का अहम हिस्सा रहे। बाद में इस संस्था से ‘हिन्दुत्व-बीज’ को लेकर डॉ हेडगेवार ने हिन्दू महासभा से इतर एक संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की। आज उस ‘हिन्दुत्व’ मूल वाले ‘संघ’ के पदाधिकारी जब एक ‘हिन्दू’ विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर जैसे एक ‘नास्तिक’ या धार्मिक रूप से तटस्थ व्यक्ति की सिफारिश करते हैं उस विश्वविद्यालय में जहाँ आज भी शिक्षा में मूल्य और धर्म की रक्षा भी एक ज़रूरी अंग है तो हृदय असीम वेदना से भर जाता है।”

आज मीडिया गिरोह के वो तमाम लोग जो इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम में समेटते हुए इसे ब्राह्मणवाद से जोड़ कर ध्वस्त करने में जी-जान से लगे हुए हैं। जो बनारस से परिचित नहीं हैं वे शायद न जानते हों मैं वहीं का हूँ उन्हें आज यह कह सकता हूँ कि उदारवाद के नाम पर वामपंथी और उनका गिरोह जो जहर हर जगह बोने का काम कर रहे हैं वस्तुतः उनकी उदारवादिता एक ढोंग है, अदूरदर्शिता है। बनारस में आप कहीं भी निकल जाइए संस्कृत के श्लोक बच्चा-बच्चा पढ़ता और बोलता नजर आ जाएगा है, वैदिक मन्त्रों और ऋचाओं से घाट गुंजायमान मिलेंगे लेकिन उन्हें कभी इसे किसी मुस्लिम से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ी। या उनसे जिनकी उन श्लोकों और मंत्रो के प्रति न भाव हो, न श्रद्धा हो, वह उनके लिए शब्दों संयोजन भले हो सकता है लेकिन उसके प्राण को वो कभी महसूस नहीं कर सकते। क्योंकि उनके अंदर इन मन्त्रों, श्लोकों के प्रति समर्पण और भक्ति का भाव कभी नहीं आएगा।

आज मीडिया गिरोह के लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विश्विद्यालय प्रशासन ने डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति उनकी योग्यता के आधार पर किया है। जिसका हम आगे खंडन करेंगे उससे पहले यहाँ एक घटना का जिक्र करना भी समीचीन होगा, ये वही काशी है जहाँ जब पण्डितराज जगन्नाथ शाहजहाँ की पुत्री लवंगी से विवाह करके दिल्ली से बनारस आए और विद्वत्-सभा में जाने की कोशिश की तब उन्हें ‘यवनीसंसर्गदूषित’ कहकर संस्कृत-विद्या के अपय्य दीक्षित जैसे दृढ़ धार्मिक आचार्योंं ने बहिष्कार किया, और उनकी सारी विद्वत्ता प्रतिपादित करते रहने के बावजूद नहीं अपनाया। शायद आप अब यह समझ सकते हैं कि मालवीय जी ने ‘हिन्दू विश्वविद्यालय’ और ‘धर्म विज्ञान संकाय’ के लिये बनारस को यूँ ही नहीं चुना था। उन्हें पता था धर्म की दृढ़ता बनारस में है।

सौरभ द्विवेदी भी कहते हैं कि आज जब SVDV के छात्र विरोध में सड़कों पर हैं और इस बात का अफ़सोस जता रहे हैं कि आज जब एक तरफ धर्म, संस्कृति, वेद, वेदांग और प्राचीन मूल्यों के विरोधी वामपंथी फिरोज खान के समर्थन में खड़े हैं और इस नियुक्ति को जी-जान से सही ठहराने की हर संभव कोशिश में लगे हैं और बाकी लोग, यहाँ तक की संकाय के आचार्य भी नौकरी बचाने के लिए अपनी धार्मिक दृढ़ता को गिरवी रख चुके हैं। उनकी चुप्पी बनारस को सदियों तक सालती रहेगी। महामना का कहना था कि मुझे मोक्ष नहीं चाहिए। मेरी आत्मा यहीं विश्वविद्यालय में मौजूद रहेगी। अगर ऐसा है तो संकाय के जिम्मेदार आचार्यों को देखकर उनकी आत्मा बहुत ग्लानि महसूस कर रही होगी।

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आज जब बीबीसी, वायर, क्विंट, प्रिंट जैसे तमाम मीडिया गिरोह इस मुद्दे को ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने की तरफ मोड़ कर इस विरोध को कुंद करने में लगे हैं जितना हाइप मीडिया में आज JNU के अपने ‘सौभाग्य’ को ‘अधिकार’ समझकर हिंसक आंदोलन को मिल रहा है ऐसे दौर में सत्य हमारे साथ है। हमारा विरोध भी गाँधी – महामना की इस धरती पर इतिहास में बेशक दर्ज न हो पर उसकी ताप दूर तक जाएगी। सौरभ द्विवेदी ने मीडिया के ब्राह्मणवाद वाली थ्योरी को ख़ारिज करते हुए सभी तथ्य सामने रख दिए ताकि लोग सत्य से परिचित हों और ऐसे मीडिया समूहों के बहकावे में न आएँ।

सौरभ ने पूरा आँकड़ा समझाते हुए बताया कि हिन्दू धर्म संकाय के साहित्य विभाग के एक OBC पद हेतु 27 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया। 26 हिन्दू OBC थे – यादव, पटेल, चौधरी आदि आदि। एक मुस्लिम OBC था – खान और हिन्दू विश्वविद्यालय के नास्तिक कुलपति राकेश भटनागर और भ्रष्ट साहित्य विभागाध्यक्ष और उनके गैंग ने मुस्लिम OBC को ज़्यादा योग्य माना। 26 OBC हिन्दू मूर्ख साबित किए गए। और OBC-SC/ST के हक़ के लिए लड़ने वाले प्रोपोगंडावादी झुण्ड ने एक स्वर में मुस्लिम का धर्म देखकर 26 हिन्दू OBC को लात मार दिया। दूसरी ओर उन 26 OBCs के हक़ के लिए और उनको योग्य सिद्ध करने के लिए ‘संकीर्ण मानसिकता’ की उलाहना लिए आज ‘हिन्दू’ एक ‘हारी हुई लड़ाई’ भजन कीर्तन, मन्त्रों और यज्ञ के सहारे शांतिपूर्ण ढंग से गाँधीवादी तरीके से लड़ रहे हैं।

यह सब देखकर लगता कि SVDV के धरनारत छात्र सही मायने में आज के ‘धर्मयोद्धा’ हैं। यहाँ सिर्फ संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने का मसला है ही नहीं, उन्हें आज की चिन्ता भी नहीं है। लेकिन जब 20 साल बाद ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में वैदिक मंगलाचरण की जगह कुरान और हदीस की आयतें गूँजेगी, विश्व हिन्दू पंचांग की जगह कुरान और बाइबिल का प्रकाशन होगा, तो बुढ़ापे में आप इस कुण्ठा से जरूर गुजरेंगे कि जब मालवीय मूल्यों और हिन्दू सनातन धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ कुछ छात्र लड़ रहे थे, जब संविधान की कोई एक पंक्ति उनके पक्ष में नहीं थी, शायद एक ढंग का तर्क भी उनके पास नहीं था, और महामना के नाम पर जीवनयापन करने वाले अधमर्ण मौन थे, तब भावनाओं के बल पर, अन्तरात्मा की आवाज पर, महामना के आदर्शों और मूल्यों की रक्षा के लिए पुलिस की लाठी खाने और खून का कतरा गिरने तक कुछ निहत्थे एक धर्मयुद्ध लड़ते रहे थे। और हम मौन थे तो आज की अपनी दुर्गति के लिए जिम्मेदार कोई और नहीं हम खुद हैं।

जल या जलेबी: बोले गंभीर- मेरे जलेबी खाने से प्रदूषण बढ़ा है, तो मैं हमेशा के लिए खाना छोड़ दूँगा

क्रिकेटर से नेता बने भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने आज दिल्ली मुख्यमंत्री केजरीवाल पर निशाना साधा। उन्होंने बीते दिनों खुद को ट्रोल किए जाने वाली बात को आधार बनाकर कहा, “अगर मेरे जलेबी खाने से दिल्ली का प्रदूषण बढ़ रहा है तो मैं हमेशा के लिए जलेबी छोड़ सकता हूँ। 10 मिनट में मुझे ट्रोल करना शुरू कर दिया गया, अगर इतनी मेहनत दिल्ली के प्रदूषण को कम करने में की होती तो हम साँस ले पाते।”

गौतम गंभीर ने इस दौरान केजरीवाल से ये भी सवाल पूछा कि उन्होंने पिछले पाँच सालों में क्या किया? उन्होंने आप सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा, “आपने पाँच वर्षों में केवल विज्ञापन दिया है। हमने विज्ञापन नहीं दिया, बल्कि काम किया है। आपके और हमारे बीच में यही फर्क है।”

गंभीर ने दिल्ली वासियों को मिल रहे गंदे पानी का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, “सीएम केजरीवाल ने दिल्ली को मुफ्त पानी दिया, लेकिन वो भी जहरीला। उन्होंने किया क्या है? जबकि वे जलबोर्ड के अध्यक्ष हैं।” बता दें इस मुद्दे पर गौतम गंभीर ने ट्वीट भी किया है। जहाँ उन्होंने इंदौर मामले और प्रदूषित जल के मामले को, ‘जल या जलेबी’ लिखकर उठाया है।

इसके अलावा बता दें, गौतम गंभीर ने मीडिया से बात करते हुए प्रदूषण से जुड़ी अहम बैठक में न पहुँचने का भी कारण बताया। जिसके कारण वे पिछले दिनों खूब ट्रोल हुए थे। उन्होंने कहा कि वे प्रदूषण मुद्दे पर आयोजित बैठक में न शामिल होकर इंदौर टेस्ट में कमेंट्री करने इसलिए पहुँचे थे, क्योंकि वे एक अनुबंध से बंधे थे।

उन्होने कहा,“मुझे पता है कि प्रदूषण पर बैठक बहुत अहम थी। लेकिन मैं अनुबंध से बंधा था। मैंने यह कॉन्ट्रैक्ट जनवरी में साइन किया था, जबकि राजनीति से अप्रैल में जुड़ा। उस अनुबंध के तहत ही मुझे कमेंट्री के लिए जाना पड़ा। 11 नवंबर को जिस दिन बैठक होनी थी मुझे इसके बारे में मेल मिला था। मैंने तभी उन्हें इस बारे में जानकारी दे दी थी कि मैं क्यों इस बैठक में शामिल नहीं हो पा रहा हूँ।”

दरअसल, बीते दिनों दिल्ली में बढ़े प्रदूषण को लेकर संसदीय समिति की बैठक होनी थी। बैठक में भाग लेने समिति के 29 सदस्यों में से केवल 4 सांसद ही पहुँचे थे। सांसदों की संख्या कम होने के कारण बैठक रद्द करनी पड़ी, लेकिन इसके बाद गंभीर की इंदौर में पोहा-जलेबी खाते हुए तस्वीर वायरल हो गई। जिसके बाद आप ने गौतम गंभीर को इस तस्वीर को लेकर घेरना शुरू कर दिया।

गंभीर की वीवीएस लक्ष्मण के साथ तस्वीर शेयर कर आम आदमी पार्टी ने लिखा था कि दिल्ली वायु प्रदूषण से परेशान है और गौतम गंभीर इंदौर में मस्ती कर रहे हैं। सांसदों को दिल्ली आना चाहिए था, लेकिन किसी के नहीं आने पर बैठक रद्द करनी पड़ी। बता दें आम आदमी पार्टी की ओर से ये ट्वीट देखकर भाजपा सांसद ने भी जवाब दिया था कि अगर उन्हें गाली देने से दिल्ली का प्रदूषण कम होगा तो वे उन्हें जी भर के गालियाँ दे सकते हैं।

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग का कमाल: 100 सवाल, 41 गलतियाँ, हाई कोर्ट ने रद्द की परीक्षा

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की ओर से आयोजित सिविल जज भर्ती परीक्षा छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रद्द कर दी है। इस परीक्षा में कई प्रश्नों पर अभ्यर्थियों ने आपत्ति जताई थी। प्रश्न पत्र में गलतियों की भरमरार थी। इसे देखते हुए हाई कोर्ट ने परीक्षा रद्द करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के निर्देश पर अब इन पदों के लिए दोबारा परीक्षा ली जाएगी। साथ ही अदालत ने परीक्षा में शामिल हुए अभ्यर्थियों से दोबारा होने वाली परीक्षा में शामिल होने के लिए कोई शुल्क नहीं लेने का निर्देश भी आयोग को दिया।

बता दें कि राज्य के विभिन्न न्यायालयों में रिक्त सिविल जजों के पदों पर भर्ती के लिए मई 2019 को राज्य लोक सेवा आयोग के माध्यम से परीक्षा आयोजित की गई थी। लोक सेवा आयोग ने जुलाई में इस परीक्षा का रिजल्ट भी जारी कर दिया था। मामले में जस्टिस गौतम भादुड़ी की बेंच ने सुनवाई करते हुए परीक्षा और परिणाम को रद्द करने का फैसला सुनाया।

कोर्ट ने ये फैसला परीक्षा के लिए प्रकाशित उत्तर कुंजी में शामिल 100 प्रश्नों में 41 गलतियाँ पाए जाने के बाद दिया। जस्टिस गौतम भादुड़ी की सिंगल जज बेंच ने परीक्षा परिणाम के खिलाफ 10 याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर ‌रिट पेटिशन्स की सुनवाई में कहा कि जिस प्रकार पूरी परीक्षा ली गई है, उसे जारी नहीं रखा जा सकता। 

उन्होंने कहा कि कोर्ट का मानना है कि 100 में 41 सवाल और जवाब गलत पाए गए हैं, इसका प्रतिशत निश्चित रूप से चयन प्रक्रिया के मॉड्यूल को कमजोर करेगा और न्यायालय इस पर मौन धारण नहीं कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह से पूरी परीक्षा आयोजित की गई थी उसे बरकरार रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार परीक्षा में पूछे गए 100 प्रश्नों में से 30 से अधिक प्रश्न स्पष्ट रूप से गलत पाए गए। इसके अलावा कुछ प्रश्नों में वाक्यांश और वर्तनी की गलतियाँ थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रश्नपत्र के अंग्रेजी और हिंदी संस्करण में प्रश्नों और उत्तर के अनुवाद में भी अंतर था।

सुनवाई के दौरान पीएससी के तरफ से इस बात पर आपत्ति की गई कि मॉडल उत्तर कुंजी एक्सपर्ट द्वारा जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक एक्सपर्ट द्वारा जारी उत्तर पर न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकती।‌ न्यायालय ने पीएससी के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह परीक्षा विधि से संबंधित है, इसलिए इस पर हस्तक्षेप करना जरूरी है।

2 साल के लिए बंद करो JNU, बदतमीज छात्रों को जेल में डालो: सुब्रह्मण्यम स्वामी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हॉस्टल की बढ़ी हुई फीस को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी बीच मानव संसाधन विकास (HRD) मंत्रालय ने तीन सदस्यीय एक समिति गठित की है, जो जेएनयू की सामान्य कार्यप्रणाली बहाल करने के तरीकों पर सुझाव देगी। इधर विरोध-प्रदर्शन के कारण मेट्रो स्टेशनों को भी बंद कर दिया गया है। दिल्ली पुलिस के आदेश के बाद उद्योग भवन, लोक कल्याण मार्ग, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और पटेल चौक मेट्रो स्टेशन पर सेवाओं को ठप्प कर दिया गया है।

जेएनयू में प्रबंधन और छात्रों के बीच पिछले कई दिन से जारी विवाद के समाधान के लिए सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर वीएस चौहान की अगुवाई में तीन सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया है। यह समिति सभी पक्षों से बातचीत कर जेएनयू के विवाद का समाधान सुझाएगी। राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने उपद्रवी छात्रों की आलोचना करते हुए कहा कि ये सभी बदतमीज हैं और इन्हें जेल भेजने की जरूरत है। स्वामी ने कहा कि जेएनयू को 2 साल के लिए बंद कर के छात्रों को किसी अन्य यूनिवर्सिटी में भेज देना चाहिए।

सरकार की तरफ से जारी आदेश में कहा गया कि जेएनयू में कामकाज को सामान्य कैसे किया जाए। यह समिति इस संबंध में विचार-विमर्श कर अपनी रिपोर्ट सौंपेंगी। समिति के अन्य सदस्यों में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एसआईसीटीई) के अध्यक्ष प्रोफेसर अनिल सहस्रबुधे और यूजीसी के सचिव प्रोफेसर रजनीश जैन हैं।

समिति शांतिपूर्ण समाधान के लिए छात्रों और जेएनयू प्रशासन के बीच तुरंत बातचीत शुरू करेगी। मानव संसाधान विकास मंत्रालय में शिक्षा सचिव आर सुब्रमण्यम ने बताया कि उच्चाधिकार समिति जेएनयू छात्रों और प्रशासन के साथ विचार विमर्श कर सभी मसलों का शांतिपूर्वक समाधान ढूँढेगी।

इसके बावजूद छात्रों का संसद मार्च जारी है। संसद भवन की तरफ जाने की लगातार कोशिश करने के बावजूद पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद जेएनयू छात्रों ने अपना रास्ता बदल लिया है। अब वे वसंत विहार की ओर से मुड़कर संसद की तरफ जाने की कोशिश कर रहे हैं और वसंत विहार थाने तक पहुँच चुके हैं। एक तरफ छात्रों का कहना है कि वो किसी भी हालत में संसद पहुँच कर रहेंगे, वहीं पुलिस ने सभी रास्तों पर छात्रों को रोकने के पुख्ता इंतजाम किया हुआ है।

लगातार संसद जाने को लेकर पुलिस के साथ धक्का-मुक्की कर रहे जेएनयू छात्रों ने छात्रसंघ अध्यक्ष समेत कई छात्रों को हिरासत में लिए जाने के बाद एक नई माँग उठाई है। छात्रों का कहना है, “हमें पुलिस ‘मास अरेस्ट’ कर ले, लेकिन आज हम संसद तक जाकर रहेंगे।” बता दें कि अब तक तीन से ज्यादा बसों में भरकर मार्च कर रहे छात्रों को हिरासत में ले लिया गया है।

Pak में तख्तापलट के कयास, आर्मी चीफ से मिल अचानक छुट्टी पर गए इमरान खान

पाकिस्तान में मौजूदा समय में सियासत का पारा चरम पर है और इमरान सरकार के लिए खतरा बढ़ता ही जा रहा है। पहले विपक्षी दलों के प्रहार ने इमरान सरकार को हिला कर रख दिया तो वहीं अब सहयोगी दलों ने भी आँख दिखानी शुरू कर दी है। लिहाजा पाकिस्तान के राजनैतिक गलियारों में इमरान सरकार पर छाए अनिश्चितता के बादल चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं।

इस बीच खबर आ रही है कि सेना प्रमुख जावेद बाजवा के से मुलाकात के बाद इमरान खान दो दिन की छुट्टी पर चले गए हैं। इसके बाद इस चर्चा ने और जोर पकड़ लिया है कि इमरान खान की कुर्सी खतरे में है। पाकिस्तान के राजनीतिक विशलेषकों का कहना है कि इमरान खान ने एक साल के कार्यकाल में एक दिन के लिए भी छुट्टी नहीं ली, लेकिन अचानक सेना प्रमुख से मुलाकात के बाद अपने सभी सरकारी कामकाज को रोककर दो दिन की छुट्टी पर चले जाना इस ओर संकेत कर रहे हैं कि सब कुछ ठीक नहीं है।

जानकारी के मुताबिक इमरान ने सत्ता संभालने के बाद बीते एक साल से ज्यादा समय में एक भी छुट्टी नहीं ली है। उन्हें जानने वाले बताते हैं कि वो जितनी देर जागते रहते हैं, आधिकारिक कामकाज में ही लगे रहते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उनकी किसी छुट्टी की कोई पूर्व योजना भी नहीं थी।

पाकिस्तानी पीएम का इस तरह से अचानक छुट्टी पर चले जाना सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। इसको लेकर कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, तो वहीं उनके कुछ राजनैतिक विरोधियों ने लिखा, “मिस्टर प्राइममिनिस्टर, इन्हीं दो दिनों में यह प्लान बना लीजिएगा कि अब आपको जो लंबी छुट्टी मिलने वाली है, वह आप कहाँ बिताएँगे।”

गौरतलब है कि इमरान सरकार के खिलाफ विपक्ष ने देशभर में हल्लाबोल रखा है। JUI-F ने इमरान खान के इस्तीफे को लेकर लगातार आंदोलन छेड़ रखा है। इसके साथ ही सैन्य प्रमुख और इमरान की मुलाकात इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि दोनों के बीच लंबे अर्से तक कोई मुलाकात नहीं हुई थी। सरकार में भागीदार मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट-पाकिस्तान के वरिष्ठ नेता ख्वाजा इजाहरुल हसन ने कहा है कि यदि अर्थव्यवस्था की स्थिति नहीं सुधरी तो शायद ही इमरान सरकार अगले बजट तक चल पाएगी।

पीएम मोदी ने थपथपाई NCP और BJD की पीठ, कहा- इनसे सीखें सभी पार्टियाँ

राज्यसभा के 250वें सत्र को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी सांसदों को बधाई दी। संसद सत्र के पहले दिन अपने सम्बोधन की शुरुआत करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि 250वें सत्र तक की यात्रा में सभी सांसद बधाई के अधिकारी हैं। उन्होंने अब तक के सभी सांसदों का स्मरण किया और उनके योगदान की सराहना की। पीएम मोदी ने कहा कि भले ही समय व परिस्थितियाँ बदलती चली गईं लेकिन राज्यसभा ने बदलाव को आत्मसात करते हुए लगातार काम किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा ज़मीन तक जुड़ा है और राज्यसभा दूरदर्शी है।

इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शरद पवार की पार्टी एनसीपी और नवीन पटनायक के बीजद की प्रशंसा की। पीएम मोदी ने दोनों पार्टियों की पीठ थपथपाते हुए कहा कि इन दोनों दलों ने कभी वेल में जाकर हंगामा नहीं किया और इनकी राजनीति ख़त्म भी नहीं हुई। उन्होंने कहा कि सभी दलों को एनसीपी और बीजेडी से सीख लेनी चाहिए।प्रधानमंत्री ने कहा कि हंगामा न करने के बावजूद दोनों ही पार्टियाँ अपने-अपने मुद्दों को सही तरीके से सदन में रखती हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ही दल संसद के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं।

प्रधानमंत्री ने राज्यसभा की ख़ासियत बताते हुए कहा कि यहाँ खेल, कला और विज्ञान से जुडी ऐसी-ऐसी हस्तियाँ पहुँची हैं, जिनका चुनाव लड़ कर सीधे जनता द्वारा चुन कर आना शायद संभव नहीं हो पाता। बकौल पीएम मोदी, राज्यसभा के दो पहलू हैं- पहला स्थायित्व और दूसरी विविधता। स्थायी इसीलिए क्योंकि ये लोकसभा की तरह भंग नहीं होती। विविध इसीलिए क्योंकि यहाँ राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी गई है। राज्यों के कल्याण की बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्य और केंद्र मिल कर देश को आगे बढ़ा सकते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों को प्रतिद्वंद्विता नहीं करनी चाहिए, साथ मिल कर विकास कार्यों को जनता तक पहुँचाना चाहिए।

राज्यसभा की उपलब्धियों की चर्चा करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि पिछले 5 साल का समय देखें तो यही सदन है जिसने तीन तलाक का बिल पास करके महिला सशक्तिकरण का बहुत बड़ा काम किया। उन्होंने आगे कहा कि इसी सदन ने सामान्य वर्ग के ग़रीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया। पीएम मोदी ने कहा कि इन सबके बावजूद कहीं भी विरोधाभाव की स्थिति पैदा नहीं हुई और परस्पर सहयोग का भाव बना रहा।

पीएम मोदी ने आगे कहा कि इसी सदन ने जीएसटी के रूप में वन नेशन-वन टैक्स की ओर सहमति बनाकर देश को दिशा देने का काम किया है। उन्होंने बताया कि देश की एकता और अखंडता के लिए अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने की शुरुआत पहले इसी सदन में हुई। बता दें कि इन प्रस्तावों को राज्यसभा के बाद लोकसभा में पास किया गया था।

आगरा का नाम होगा अग्रवन! योगी सरकार कर रही है विचार, साक्ष्य जुटाने को खँगाला जा रहा इतिहास

उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद को प्रयागराज और मुगलसराय स्टेशन को दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन का नाम देने के बाद अब योगी सरकार आगरा का नाम बदलने पर भी विचार कर रही है। कहा जा रहा है कि आगरा का नाम जल्द ही अग्रवन हो सकता है। इसके लिए सरकार ने आम्बेडकर विश्वविद्यालय के इतिहासकारों और विशेषज्ञों की राय जानने के लिए उनसे संपर्क किया है।

जानकारी के मुताबिक आगरा स्थित आम्बेडकर विश्वविद्यालय को पत्र लिखकर सरकार ने आगरा नाम के ऐतिहासिक पहलू पर पता लगाने के लिए कहा है। अब विश्वविद्यालय का इतिहास विभाग इस प्रस्ताव पर आगे काम कर रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बताया जा रहा है कि सरकार आगरा का नाम अग्रवन कर सकती है, क्योंकि पहले ये जगह इसी नाम से जानी जाती थी। इतिहासकारों और विशेषज्ञों को उन हालातों और समय के बारे में पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई है जब अग्रवन का नाम बदलकर आगरा कर दिया गया।

खुद बीआर अम्बेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ अरविंद कुमार दीक्षित ने इस पर जानकारी देते हुए बताया कि उन्हें शासन की ओर से आगरा के नाम को अग्रवन करने के संबंध में पत्र मिला है। पत्र में उससे जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य के बारे में पूछा गया है। अब उनके विश्वविद्यालय की ओर से इस मामले में इतिहास से जुड़े साक्ष्य और शोध के लिए प्रो. सुगम आनंद को नामित किया गया है। अब वह इस संबंध में साक्ष्य एकत्रित करने के बाद रिपोर्ट देंगे।

हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर के अनुसार विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग प्रमुख प्रो. सुगम आनंद ने बताया है कि, शासन द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पर काम शुरू हो चुका है। प्रमाण खोजे जा रहे हैं कि इसके संबंध में कोई तथ्य या साक्ष्य उपलब्ध हो जाए। इसके साथ ही शोध किया जा रहा है ताकि इस संबंध में इतिहास को समझा जा सके। उनके मुताबिक इतिहास में जहाँ पर कहीं भी अग्रवन का जिक्र है तो उसे भी सत्यापित किया जा रहा है। क्योंकि आगरा के नामों को लेकर विभिन्न मत हैैं। लेकिन वे लिखित प्रमाण या फिर अभिलेख पर शोध कर रहे हैं।

अग्रवन का कहाँ-कहाँ जिक्र

बता दें इस नाम पर विचार करने हेतु विश्वविद्यालय में बैठक भी आयोजित हुई है। जहाँ विद्वानों ने कहा कि आगरा गजेटियर में अग्रवन का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा दयालबाद एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में कल्चरल स्टडी ऑफ आगरा रीजन शोध में आगरा के अग्रवन नाम का जिक्र है। वहीं, आगरा पर हुए एक दूसरे शोघ में टॉमली ज्योग्राफी और आगरा गजेटियर का जिक्र करते हुए आगरा का नाम अग्रवन के रूप में लिखा गया है। जिसमें आगरा को ब्रज के वनों में शामिल अग्रवन का क्षेत्र कहा गया है। महाराजा अग्रसेन की जीवनी पर शोध करने वाले ओमप्रकाश मित्तल के अनुसार भी महाभारत काल में आगरा का नाम अग्रवन था। राजा बल्लभ ने अपने परिवार में अग्रसेन के जन्म की खुशी में इसी अग्रवन के एक हिस्से में अग्रपुर की स्थापना की थी।

वित्तीय अनियमितताओं में फँसा NDTV कंगाल होने के कगार पर, संपत्ति से 89 करोड़ ज्यादा कर्ज़

स्टॉक एक्सचेंज में एनडीटीवी की त्रैमासिक फाइलिंग की ऑडिटर्स रिव्यू में कुछ अहम खुलासे हुए हैं। पता चला है कि मीडिया संस्थान घाटे में जा रहा है। एनडीटीवी का क़र्ज़ काफ़ी बढ़ गया है और मीडिया संस्थान की मौजूदा संपत्ति से 88.92 करोड़ रुपए ज्यादा हो गया है। एनडीटीवी का वित्तीय परफॉरमेंस लगातार गिर रहा है और ये निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। ईडी और इनकम टैक्स की कार्रवाइयों के कारण कम्पनी की साख पहले से ही गिरी हुई है।

एनडीटीवी के ऑडिट रिपोर्ट में जताई गई चिंता

आप ऊपर संलग्न किए गए ऑडिट रिपोर्ट में प्वाइंट नंबर सात में देख सकते हैं कि ऑडिटरों ने एनडीटीवी के लाभ और हानि वाले हिस्से की तरफ ध्यान आकृष्ट कराया है। सितम्बर 2019 तक ख़त्म हो रहे त्रैमासिक समयावधि में एनडीटीवी को 10.17 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है। सबसे बड़ी चिंता की बात तो ये है कि जितनी एनडीटीवी की संपत्ति है, उससे लगभग 89 करोड़ ज्यादा तो क़र्ज़ (देनदारी) हो गया है

कभी-कभी किसी कम्पनी के फाइनेंसियल रिपोर्ट में कुछ ग़लत जानकारियाँ चली जाती हैं, इसे मटेरियल स्टेटमेंट कहते हैं। एनडीटीवी ने ऑडिट रिपोर्ट से पहले ये समीक्षा की है ताकि ‘मटेरियल स्टेटमेंट’ वाली गड़बड़ियों से बचा जा सके। वो इस बात को सुनिश्चित करना चाहते थे कि वित्तीय रिपोर्ट में सभी जानकारियाँ सही हैं। ऑडिटरों ने आशंका व्यक्त की है कि एनडीटीवी की पैरेंट कम्पनी शायद इसे चलाने में सक्षम नहीं हो पा रही है। हालाँकि, ऑडिटरों ने माना कि अनिश्चितता से निकलने के लिए पैरेंट कम्पनी ने कुछ रणनीतिक और ऑपरेशनल तरीके अपनाए हैं।

‘गोइंग कंसर्न’ का अर्थ होता है कि कम्पनी अभी पूरी तरह कंगाल नहीं हुई है और इसे चलाने के लिए संसाधन और वित्त मौजूद हैं। इस रिपोर्ट में ‘गोइंग कंसर्न’ की बात की गई है। जब कोई कम्पनी इस केटेगरी में नहीं रहती है, तब उसे कंगाल घोषित कर दिया जाता है। वित्तीय अनियमितताओं के कारण जाँच का सामना कर रही एनडीटीवी के लिए ऑडिटर्स रिव्यू चिंता का विषय है। जानकारियाँ उपलब्ध न कराने, एफडीआई के नियमों में उल्लंघन करने और इनकम टैक्स मामलों में एनडीटीवी के ख़िलाफ़ कई मामले चल रहे हैं। आईसीआईसीआई बैंक से 375 करोड़ रुपए लोन लेने के मामले में भी कम्पनी के ख़िलाफ़ सीबीआई जाँच चल रही है।

जून 2017 में प्रणय रॉय, उनकी पत्नी राधिका रॉय और उनके स्वामित्व वाली आरआरपीआर होल्डिंग कम्पनी के ख़िलाफ़ एफआईआर भी दर्ज की जा चुकी है। एनडीटीवी और आईसीआईसीआई के शेयरधारक क्यूएसएल ने दोनों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई है। अगस्त 2019 में ‘Securities Appellate Tribunal (SAT)’ ने सेबी द्वारा एनडीटीवी पर लगाए गए 2.1 करोड़ रुपए के जुर्माने को सही ठहराया था।

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ओवैसी ही बाबर है, अयोध्या पर देश में तनाव पैदा करना चाहता है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: यासिर जिलानी

राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने अयोध्या मसले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के रवैए की आलोचना की है। मंच के प्रवक्ता यासिर जिलानी ने कहा है कि बोर्ड देश में तनाव पैदा करना चाहता है। उल्लेखनीय है कि एआईएमपीएलबी ने रविवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की बात कही थी। साथ ही मस्जिद के लिए पॉंच एकड़ जमीन लेने से भी इनकार कर दिया था।

इसकी आलोचना करते हुए राष्ट्रीय मुस्लिम मंच (RMM) के प्रवक्ता जिलानी ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भ्रम की स्थिति में है, उसका रवैया स्पष्ट नहीं है। जिलानी का कहना है कि वे अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद टाइटल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर समीक्षा याचिका दायर करके देश में तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

जिलानी ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के लोग देश में उन्माद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। वे उन मुस्लिम भाइयों को उकसाने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्होंने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अपनी शांति और भाईचारे का परिचय दिया है। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों ने AIMPLB को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने सवाल किया है कि जब वे खुद यह कह रहे हैं कि उनकी याचिका को खारिज कर दिया जाएगा तो फिर वो इसे दाखिल क्यों कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि मैं सुरक्षा एजेंसियों से अपील करता हूॅं कि वह बोर्ड की गतिविधियों पर नजर रखें। पुनर्विचार याचिका के माध्यम से वे ड्रामा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।

बता दें कि जमीयत उलेमा ए हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा था कि उन्हें ख़ूब मालूम है कि उनकी समीक्षा याचिका शत-प्रतिशत खारिज ही की जानी है, फिर भी वो सुप्रीम कोर्ट जाएँगे और इसे दाखिल करेंगे। मदनी ने कहा कि ये उनका अधिकार है, उनकी लड़ाई है।

RMM प्रवक्ता जिलानी ने AIMIM प्रमुख और असदुद्दीन ओवैसी के बयान की भी निंदा की। उन्होंने कहा कि ओवैसी को बताना चाहिए कि वे किसके लिए मस्जिद चाहते हैं। मजहब का कौन सा समुदाय उनके साथ खड़ा है। इसके साथ ही उन्होंने एक ट्वीट करते हुए लिखा था, “मुझे मेरी मस्जिद वापस चाहिए- ओवैसी। ओहो अब पता चला ये ओवैसी ही बाबर है….वाह रे खुदा…..आप सभी की असलियत सामने ला ही देते हैं।”

दिल्ली पहुँच पवार का यू टर्न: हमारे खिलाफ लड़ी शिवसेना, उसके साथ सरकार कैसे बना लें

महाराष्ट्र में एनसीपी और कॉन्ग्रेस के साथ सरकार बनाने की शिवसेना की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा है। सोनिया गॉंधी के साथ बैठक से पहले शरद पवार ने कहा है कि शिवसेना को भाजपा के साथ अपना रास्ता
तय करना है।

उन्होंने कहा, “बीजेपी-शिवसेना ने हमारे खिलाफ चुनाव लड़ा था। फिर कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना का गठबंधन कैसे हो सकता है। हमने कॉन्ग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, इसलिए आज बैठक करने जा रहे हैं। शिवसेना और भाजपा अलग हैं। हम और कॉन्ग्रेस अलग हैं। उनको उनका रास्ता तय करना है और हम अपनी राजनीति कर रहे हैं।”

जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि शिवसेना तो कह रही है कि पवार साहब के साथ मिलकर सरकार बना रहे हैं, तो शरद पवार ने सिर्फ ‘अच्छा’ कह आगे बढ़ गए। पवार के इस बयान ने महाराष्ट्र में सरकार गठन पर सस्पेंस और बढ़ा दिया है। इससे पहले खबर आ रही थी कि शिवसेना को समर्थन देने पर कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी असमंजस में हैं।

कॉन्ग्रेस और एनसीपी के नेताओं की ओर से बताया गया था कि सोमवार को शाम 4 बजे पवार और सोनिया गॉंधी की बैठक में सरकार बनाने को लेकर आखिरी फैसला होगा। कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा था कि इस बैठक के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि कॉन्ग्रेस शिवसेना के साथ सरकार गठन के लिए आगे बढ़ेगी या नहीं। इससे पहले रविवार को एनसीपी की एक बैठक हुई थी। इस बैठक के बाद पार्टी प्रवक्ता नवाब मलिक ने बताया कि एनसीपी चाहती है कि राज्य में जल्द से जल्द राष्ट्रपति शासन खत्म हो। लेकिन, सरकार गठन को लेकर आखिरी फैसला सोनिया गॉंधी और शरद पवार के बीच होने वाली बैठक के बाद ही होगा।

राज्य की राजनीतिक तस्वीर बदलने के कयास भाजपा की सहयोगी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (RPI) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले के एक बयान से भी लगने शुरू हो गए थे। अठावले ने रविवार को कहा था, “मैंने अमित भाई (भाजपा अध्यक्ष अमित शाह) से कहा कि अगर वह मध्यस्थता करते हैं तो एक रास्ता निकाला जा सकता है, जिस पर उन्होंने (अमित शाह) जवाब दिया कि चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा। भाजपा और शिवसेना मिलकर सरकार बनाएँगे।” इससे पहले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी संकेतों में इशारा किया था कि भाजपा अब भी राज्य में सरकार बना सकती है। महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने भी कहा था कि पार्टी के पास 119 विधायकों का समर्थन है।

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