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‘J&K पुलिस ने शाह फैसल और सज्जाद लोन की जम कर की पिटाई’: सहमी महबूबा ने कहा- ये मार्शल लॉ

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने राज्य की पुलिस पर बड़ा आरोप लगाया है। पूर्व सीएम ने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश घोषित होते ही राज्य की पुलिस सत्ता के मद में चूर हो गई है। मुफ़्ती ने आरोप लगाया कि पुलिस ने सज्जाद लोन और शाह फैसल जैसे नेताओं की पिटाई भी की है। शाह फैसल ने नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया था लेकिन अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद उनके मंसूबों पर पानी फिर गया। शाह फैसल भारत के बारे में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नकारात्मकता फैलाने के लिए तुर्की भाग रहे थे लेकिन ऐन मौके पर उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट से धर दबोचा गया

सत्ता की वासना में जब नौकरशाही की निष्ठा शीघ्रपतित होती है तो लोग शाह फ़ैसल बन जाते हैं

वहीं सज्जाद लोन ‘जम्मू कश्मीर पीपल्स कॉन्फ्रेंस’ के मुखिया हैं और विधायक रह चुके हैं। अभी इन नेताओं को पुलिस ने अपने ऐहतियान हिरासत में ले रखा है। इन्हें हाउस अरेस्ट में रखा गया है। वहीं तीनों पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला और फ़ारूक़ अब्दुल्ला भी हाउस अरेस्ट के बाद अलग-अलग जगहों पर रखे गए हैं। महबूबा मुफ़्ती ने अपने ट्विटर हैंडल से आरोप लगाया कि सज्जाद लोन और शाह फैसल जैसे नेताओं को श्रीनगर एमएलए हॉस्टल में शिफ्ट करते समय पुलिस ने उनके साथ हाथापाई की। महबूबा मुफ़्ती ने आरोप लगाया कि पुलिस ने इन कश्मीरी नेताओं की जम कर पिटाई की।

महबूबा मुफ़्ती ने आरोप लगाया कि जम्मू कश्मीर में अभी मार्शल लॉ चल रहा है और जनप्रतिनिधियों को अपमानित किया जा रहा है। वहीं पीडीपी के प्रवक्ता वहीद पारा की पिटाई किए जाने की बात भी महबूबा मुफ़्ती ने कही है। महबूबा ने बताया कि ये वही वहीद पारा हैं, जिन्हें जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सराहा था। महबूबा ने पूछा कि सिविल सर्विस की परीक्षा में शीर्ष स्थान पाने के बाद जिस शाह फैसल को राज्य का रोल मॉडल बताया गया था, आज उन्हें इस तरह अपमानित क्यों किया जा रहा है? उनके साथ दुर्व्यवहार क्यों हो रहा है?

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सज्जाद लोन के बारे में महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि वो 2014 से ही नरेंद्र मोदी की नज़र में खटक रहे हैं। उन्होंने बताया कि सज्जाद लोन पहले अलगाववादी थे लेकिन बाद में उन्होंने लोकतान्त्रिक राजनीति में क़दम रखा। हालाँकि, जम्मू कश्मीर पुलिस ने महबूबा मुफ़्ती के दावों को नकार दिया है। आईपीएस इम्तियाज हुसैन ने कहा कि कुछ ट्विटर हैंडल्स द्वारा श्रीनगर स्थित एमएलए हॉस्टल में नेताओं के साथ मारपीट की बातें फैलाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी घटना नहीं हुई है। साथ ही इम्तियाज ने ये भी बताया कि पुलिस ने बस ज़रूरी सुरक्षा ड्रिल को अंजाम दिया है, जो नियमित तौर पर होता रहता है।

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद से ही कई अलगाववादियों व कश्मीरी नेताओं को हिरासत में रखा गया है। इनमें से कई नेताओं को गिरफ़्तार कर के किसी गेस्ट हाउस या होटलों में भी रखा गया है। अलगाववादियों को यूपी के जेल में भेजने की भी ख़बरें आई थीं।

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विदेशी MNCs से करार कर रही बाबा रामदेव की पतंजलि? कॉन्ग्रेस गैंग ने क्यों किया दुष्प्रचार? FACT CHECK

बाबा रामदेव की कम्पनी ‘पतंजलि’ लम्बे समाय से विवादों में घसीटी जाती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बाबा रामदेव की नजदीकियों के कारण वो अक्सर विपक्ष के निशाने पर भी रहते हैं। हालाँकि, कई राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकार होने के बावजूद पतंजलि को ज़मीन मुहैया कराई गई है और निवेश के लिए बुलाया गया है। अब कम्पनी के सीईओ आचार्य बालकृष्ण के एक इंटरव्यू को ग़लत तरीके से पेश करते हुए सोशल मीडिया पर झूठ फैलाया जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो ये कि इस काम में कॉन्ग्रेस पार्टी भी शामिल है। आइए, आपको बताते हैं कि मामला क्या है।

दरअसल, बालकृष्ण ने ‘इकनोमिक टाइम्स’ को दिए गए इंटरव्यू में कहा कि पतंजलि अब विदेशी मल्टी नेशनल कंपनियों के साथ करार के लिए तैयार है। लोगों ने इसका अर्थ ये लगाया कि पतंजलि अब उन्हीं विदेशी एमएमसी के साथ मिल कर कारोबार करेगी, जिनकी बाबा रामदेव शुरू से आलोचना करते रहे हैं। ‘स्वदेशी अपनाओ’ की बात करने वाले बाबा रामदेव को लेकर महिला कॉन्ग्रेस ने कहा कि पतंजलि और भाजपा, दोनों का ही दोहरा रवैया एक ही स्तर पर पहुँच गया है। कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि राष्ट्रवाद और स्वदेशी की बात करने वाले बाबा रामदेव अब विदेशी एमएनसी के साथ डील कर रहे हैं।

वहीं अधिवक्ता नज़मा फातिमा ख़ान ने बाबा रामदेव को ‘पलटू’ बताते हुए कहा कि जिन कंपनियों से बाबा रामदेव लड़ाई करने का दावा करते हैं, अब उन्हीं के साथ करार करेंगे। उन्होंने ‘इंडिया टाइम्स’ के न्यूज़ शेयर किया, जिसमें भ्रामक हेडलाइन के साथ ये चीजें बताई गई थीं।

अब आइए जानते हैं कि आचार्य बालकृष्ण ने क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि वो विदेशी कंपनियों के करार के विरोधी नहीं हैं, जब तक वो पतंजलि के सिद्धांतों के आड़े न आएँ। उन्होंने कहा था कि एमएनसी की तरफ से पतंजली को एक से एक ऑफर आ रहे हैं और उन्हें सिर्फ इसी वजह से नहीं नकारा जा रहा है क्योंकि वो एमएनसी हैं। उनके इस बयान को लोगों ने समझा कि पतंजलि किसी विदेशी कम्पनी या एमएनसी के साथ डील करने जा रही है।

इस सम्बन्ध में बाबा रामदेव ने सोशल मीडिया पर स्पष्टीकरण दिया। रामदेव ने सपाट शब्दों में कहा कि पतंजलि ने न तो कभी आज तक विदेशी निवेश स्वीकार किए हैं और न कभी भविष्य में ऐसा किया जाएगा। दरअसल, आचार्य बालकृष्ण ने कहा था कि विदेश में पतंजलि के उत्पादों के डिस्ट्रीब्यूशन के लिए स्थानीय कंपनियों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका अर्थ ये है कि अगर किसी अन्य देश में पतंजलि को अपने उत्पाद बेचने हैं और वहाँ कम्पनी सक्रिय नहीं है तो वहाँ किसी किसी कम्पनी को प्रोडक्ट बेचने का जिम्मा दे सकती है।

कम्पनी किसी एमएनसी के साथ करार नहीं करने जा रही है। बाबा रामदेव ने आगे कहा कि भारत में बना सामान अगर विदेश में बिकेगा तो इससे स्वदेशी अभियान को ही मजबूती मिलेगी। बाबा रामदेव के समर्थकों ने ट्विटर पर ‘सल्यूट बाबा रामदेव’ ट्रेंड कराया।

सोशल मीडिया पर लम्बे समय से पतंजलि के सभी उत्पादों में गोमूत्र होने की बात फैलाई जाती है जबकि जिस भी औषधि या उत्पाद में ये होता है, उस पर साफ़-साफ़ जिक्र कर दिया जाता है। एकाध प्रोडक्ट्स में गोमूत्र होने के कारण ‘हलाल इंडिया’ ने पतंजलि को हलाल सर्टिफिकेट नहीं दिया था। ऑपइंडिया से बात करते हुए भी पतंजलि ने स्पष्ट किया था कि उनके सभी उत्पादों में गोमूत्र नहीं होता।

₹50 करोड़ ज़ुर्माना, 5 साल की जेल: गंगा को स्वच्छ रखने के लिए मोदी सरकार सख्त, विधेयक की तैयारी

स्वच्छ और स्वतंत्र रूप से बहने वाली गंगा के उत्थान के लिए, सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में राष्ट्रीय नदी गंगा (कायाकल्प, संरक्षण और प्रबंधन) विधेयक-2019 को पेश करने के लिए तैयारी कर रही है।

इस विधेयक में गंगा के प्रवाह में बाधा डालने या इसे प्रदूषित करने के लिए पाँच साल की क़ैद और 50 करोड़ रुपए का ज़ुर्माना लगाने का प्रस्ताव है। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि बिल के तहत अपराधों को ग़ैर-ज़मानती और संज्ञेय माना गया है।

इस विधेयक का उद्देश्य ग़ैर-क़ानूनी जेटी और गंगा के तट पर बने बंदरगाह, नदी के पानी का डायवर्ज़न, अवैध खनन, पत्थर की खदान और नदी के पानी से भूमिगत जल की अवैध निकासी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना है।

इस विधेयक में गंगा और उसकी सहायक नदियों के घाटों को ख़राब करने के लिए भारी दंड का भी प्रस्ताव है। साथ ही, इस बात पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए कि नदी के प्रवाह के लिए अवरोध पैदा करने के ख़िलाफ़ अधिकतम 50 करोड़ रुपए का ज़ुर्माना लगाए जाने का प्रस्ताव है।

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि खनन, पत्थर उत्खनन या भूमिगत जल निकालने जैसी गतिविधियों को विनियमित करने के लिए एक प्रावधान किया गया है, जिसमें दो साल तक की कैद और/या 10 लाख रुपए तक का ज़ुर्माना भी हो सकता है। गंगा या उसकी सहायक नदियों के घाटों को दूषित करने पर एक वर्ष तक के कारावास/या 10,000 रुपए तक का ज़ुर्माना या पुनर्स्थापना के लिए लागत (जो भी अधिक हो) के भुगतान की सज़ा दी जाएगी।

प्रस्तावित विधेयक में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय गंगा परिषद के गठन का भी प्रावधान है, जिसमें केंद्रीय मंत्रियों के साथ उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शामिल होंगे।

ख़बर के अनुसार, प्रस्तावित अधिनियम में गंगा संरक्षण वाहिनी गठित करने का भी प्रावधान है, जो किसी भी व्यक्ति को अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन करने पर गिरफ़्तार करने और स्थानीय पुलिस स्टेशन के समक्ष पेश करने का अधिकार देगी। बता दें कि इस बिल को केंद्रीय जल मंत्रालय ने बनाया है, जिसके अध्यक्ष केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत हैं।

2011 विश्व कप फाइनल में MS धोनी की वजह से नहीं पूरा कर पाया था शतक: गौतम गंभीर

भारतोय क्रिकेट टीम के पूर्व सलामी बल्लेबाज गौतम गंभीर ने 2011 वर्ल्ड कप फाइनल में खेली गई अपनी पारी को लेकर बड़ी बात कही है। गंभीर ने उस मैच में 97 रन बनाए थे। हालाँकि, महेंद्र सिंह धोनी नाबाद 91 रन बना कर ‘मैन ऑफ द मैच’ चुने गए थे, लेकिन विषम परिस्थितियों में खेले गए गंभीर की जुझारू पारी को भी लोग जीत का श्रेय देते हैं। ऐसे इसलिए क्योंकि भारत का स्कोर एक समय 2 विकेट पर 31 रन हो गया था लेकिन इसके बाद जब गंभीर आउट हुए तो स्कोर 4 विकेट पर 223 था। इसी को लेकर गौतम गंभीर से अक्सर पूछा जाता है कि उन्होंने उस मैच में शतक क्यों नहीं पूरा किया था?

अब गंभीर ने इसके लिए तत्कालीन भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को जिम्मेदार ठहराया है। गंभीर ने कहा है कि धोनी की वजह से वह शतक पूरा करने से चूक गए। गौतम गंभीर ने कहा कि वो सभी युवाओं को बताना चाहते हैं कि जब तक उनका स्कोर 97 था, तब तक उन्होंने अपने शतक के बारे में सोचा तक नहीं था। उन्होंने बताया कि उनके मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ श्रीलंका द्वारा दिया गया 275 रनों का लक्ष्य चल रहा था और वो उसी पर नज़र बनाए हुए थे। उन्होंने ओवर ख़त्म होने के बाद धोनी के साथ हुई बातचीत को याद किया।

गंभीर ने कहा कि उस बातचीत के दौरान धोनी ने उन्हें बताया कि आप शतक से सिर्फ़ 3 रन दूर हो। धोनी ने गंभीर से कहा कि 3 रन बनाते ही उनका शतक पूरा हो जाएगा। बकौल गौतम गंभीर, धोनी की इस सलाह के बाद उनका ध्यान अपने शतक पर चला गया और उनका मन भटक गया। गंभीर ने उस मैच को याद करते हुए बताया कि अगर धोनी ने उन्हें शतक की बात याद नहीं दिलाई होती तो वो 3 रन बना कर आराम से शतक पूरा कर लेते। गौतम गंभीर के अनुसार, शतक को क़रीब देख कर वो हड़बड़ी में बड़े शॉट का प्रयास करने लगे और तिषारा परेरा को विकेट दे दिया।

गंभीर ने कहा कि जब तक वो 97 पर थे, तब तक वो वर्तमान को ध्यान में रख कर चल रहे थे लकिन जैसे ही धोनी ने उन्हें शतक की बात याद दिलाई, उनके मन में वही घूमने लगा। गंभीर ने युवाओं को सीख देते हुए कहा कि हमेशा वर्तमान में रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि जब वो आउट होकर ड्रेसिंग रूम की तरफ़ लौट रहे थे, तब उनके मन में यही चल रहा था कि ये 3 रन उन्हें ज़िंदगी भर परेशान करने वाले हैं और ऐसा हुआ भी। उन्होंने बताया कि उनसे हमेशा पूछा जाता है कि उन्होंने 3 अतिरिक्त रन बना कर शतक पूरा क्यों नहीं किया?

गौतम गंभीर फ़िलहाल ईस्ट दिल्ली से भाजपा सांसद हैं। हाल ही में प्रदूषण से जुड़े बैठक में शामिल न होने को लेकर उनकी ख़ासी आलोचना की गई थी। इसके बाद गंभीर ने एक ट्वीट कर बताया था कि उन्होंने सांसद बनने के बाद इस दिशा में अब तक क्या किया है? इंदौर में जलेबी और पोहा कहते हुए उनकी तस्वीर वायरल हो गई थी, जिसके लिए उन्हें सोशल मीडिया पर आलोचना का शिकार बनना पड़ा विपक्षियों ने ईस्ट दिल्ली में सांसद गंभीर के लापता होने के पोस्टर भी चिपकाए हैं।

जस्टिस अब्दुल नज़ीर और उनके परिवार को ‘Z’ श्रेणी की सुरक्षा, राम मंदिर फैसले के बाद PFI से खतरा

केंद्र सरकार ने जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और उनके परिवार को ‘Z’ श्रेणी की सुरक्षा कवच प्रदान करने का फ़ैसला किया है। वे राम मंदिर पर फ़ैसला देने वाली सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की पीठ का हिस्सा थे। दरअसल, जस्टिस नज़ीर और उनके परिवार को पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) से ख़तरे के मद्देनज़र सुरक्षा प्रदान की गई है। सुरक्षा एजेंसियों ने अयोध्या मामले पर फैसला आने के बाद पीएफआई से अब्दुल नजीर और उनके परिवार की जान को खतरा होने को लेकर आगाह किया है।

गृह मंत्रालय ने केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) और स्थानीय पुलिस को निर्देश दिया है कि जस्टिस नज़ीर और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान करें। ANI की ख़बर के अनुसार, PFI से ख़तरे के मद्देनज़र सुरक्षा बल और स्थानीय पुलिस को आदेश दिया गया है कि कर्नाटक व देश के अन्य हिस्सों में जस्टिस नज़ीर के परिवार के सदस्यों को ‘Z’ श्रेणी की सुरक्षा ‘तुरंत’ प्रदान की जाए। आपको बता दें कि PFI एक इस्लामिक संगठन है, जिस पर राजनीतिक हत्याओं, धर्म-परिवर्तन जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं।

जस्टिस नज़ीर को कर्नाटक के कोटा के साथ बेंगलुरु, मंगलुरु और अन्य जगहों पर ‘Z’ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की जाएगी। इसी तरह, कर्नाटक (बेंगलुरु और मंगलुरु) में रहने वाले उनके परिवार के सदस्यों को भी सुरक्षा दी जाएगी।

बता दें कि ‘Z’ श्रेणी के सुरक्षा कवच के तहत अर्धसैनिक बल के 22 जवान और पुलिस एस्कॉर्ट द्वारा एक व्यक्ति को सुरक्षा घेरे में रखा जाता है। 9 नवंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर पर आदेश दिया था। साथ ही मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में एक मस्जिद के निर्माण के लिए पाँच एकड़ भूमि प्रदान करने का निर्देश भी दिया गया था।

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद के फ़ैसले अलावा, न्यायमूर्ति नज़ीर सर्वोच्च न्यायालय की उस पाँच-सदस्यीय पीठ का भी हिस्सा थे, जिसने तत्काल ट्रिपल तलाक़ को असंवैधानिक घोषित किया था। जानकारी के अनुसार, 61 वर्षीय न्यायमूर्ति नज़ीर ने 1983 में कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में अपना करियर शुरू किया था। बाद में उन्हें 2003 में उच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। न्यायमूर्ति नज़ीर को 17 फरवरी, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था।

परमहंस दास ने राम जन्मभूमि न्यास प्रमुख के ख़िलाफ़ की आपत्तिजनक टिप्पणी, संगठन से निष्कासित

तपस्वी की छावनी के प्रमुख महंत सर्वेश्वर दास के शिष्य परमहंस दास को राम जन्मभूमि न्यास प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास के ख़िलाफ़ कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी करने पर संगठन से निष्कासित कर दिया गया है।

महंत सर्वेश्वर दास ने मीडिया को बताया कि परमहंस दास, जिनका मूल नाम उदय नारायण दास है, वे स्व-घोषित महंत और जगतगुरु थे और उन्होंने संत के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया। इस आरोप के अलावा महंत सर्वेश्वर दास ने साथी संतों से परमहंस दास को अपने दायरे में शरण न देने का आग्रह भी किया।

ख़बर के अनुसार, गुरुवार (14 नवंबर) को एक ऑडियो क्लिप वायरल हुई थी, इसमें परमहंस दास ने वीएचपी नेता रामविलास वेदांती के साथ संरक्षण के दौरान न्यास प्रमुख के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। महंत नृत्य गोपाल दास अयोध्या में सबसे अधिक पूज्य संत हैं और परमहंस की टिप्पणियों से अन्य संत नाराज़ हो गए हैं।

ऑडियो क्लिप वायरल होने के बाद, न्यास प्रमुख के नाराज़ अनुयायियों ने तपस्वी जी की छावनी में एक विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें परमहंस दास की गिरफ़्तारी की माँग की गई, जिसके बाद पुलिस एहतियात के तौर पर उन्हें कुछ घंटों के लिए अज्ञात स्थान पर ले गई।

एक टेलीविजन बहस में परमहंस दास ने राम जन्मभूमि न्यास के प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। परमहंस दास पर कथित तौर पर महंत नृत्य गोपाल दास की हत्या की साज़िश रचने का आरोप भी लगाया गया था। इसके बाद, उन्हें तपस्वी की छावनी से निष्कासित कर दिया गया। परमहंस दास कथित तौर पर अयोध्या से भाग गए हैं और वापस नहीं लौटे हैं।

छात्रों के एक गुट के कारण हजारों की पढ़ाई अधर में, JNU ने जारी की अपील- क्लास में लौटें प्रदर्शनकारी

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी ने उपद्रवी छात्रों के लिए अपील जारी की है। जेएनयू ने अपने बयान में कहा है कि छात्रों के एक गुट के कारण हजारों अन्य छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जेएनयू में वामपंथी छात्र संगठन के कई छात्र सड़कों पर उतरे हुए हैं। इस दौरान उन्होंने पुलिस के साथ झड़प की। पुलिस को छात्रों को तितर-बितर करने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा। दीक्षांत समारोह के दौरान जब उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू यूनिवर्सिटी कैम्पस में समारोह को सम्बोधित कर रहे थे, तब भी बाहर छात्रों ने ख़ासा उपद्रव किया। केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का भी रास्ता रोकने की कोशिश की गई।

वहीं अब जेएनयू प्रशासन उन छात्रों के लिए चिंतित है, जिन्हें समय पर पढ़ाई पूरी करनी है। कुछेक छात्रों के कारण हजारों छात्रों को तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है। जेएनयू ने अपने बयान में कहा:

“छात्रों के एक गुट द्वारा लगातार किए जा रहे विरोध प्रदर्शन के कारण हजारों छात्रों को दिक्कतें आ रही हैं। ये छात्र समय पर अपनी पढ़ाई और कोर्स पूरा करना चाहते हैं। वो यूनिवर्सिटी के अकादमिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हुए कोर्स पूरा करने की दिशा में बढ़ना चाहते हैं। जेएनयू सभी प्रदर्शनकारी छात्रों से निवेदन करता है कि वो अपने-अपने क्लास में लौट आएँ। इस विरोध प्रदर्शन के कारण पहले ही कोर्स पीछे चला गया है, छात्रों के लौटते ही उसे जल्द से जल्द पूरा किया जा सकेगा।”

जेएनयू ने बताया कि अकादमिक काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल द्वारा नया अकादमिक कैलेंडर जारी कर दिया गया है। जेएनयू प्रशासन ने कहा कि छात्रों के प्रदर्शन की वजह से यूनिवर्सिटी के कैलेंडर में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और समय-सीमा में किसी प्रकार की ढील नहीं दी जाएगी। यानी जेएनयू ने बता दिया है कि उपद्रवी छात्रों के सामने झुकते हुए अकादमिक कैलेंडर में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और फॉर्म भरने सहित अन्य प्रक्रियाओं के लिए तय समय-सीमा के तहत ही कार्य होगा।

छात्रों के विरोध प्रदर्शन के कारण जेएनयू के डीन उमेश कदम की तबियत बिगड़ गई थी। नारेबाजी के कारण प्रोफेसर कदम की तबियत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें एम्बुलेंस से अस्पताल ले जाया गया। एम्बुलेंस के रास्ते में भी छात्र लगातार नारेबाजी करते रहे। इस दौरान प्रोफेसर के बीवी-बच्चे भी वहीं मौजूद थे। इसी तरह छात्राओं ने एक महिला प्रोफेसर के कपड़े फाड़ने का प्रयास किया। महिला पत्रकार के साथ भी छात्रों ने बदतमीजी की। वामपंथी छात्र नेताओं में कैम्पस में सरकार द्वारा सीआरपीएफ के जवानों को तैनात किए जाने की झूठी अफवाह भी फैलाई। वामपंथी छात्रों ने स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के साथ भी छेड़छाड़ की और उनका अपमान किया।

बता दें कि जेएनयू में छात्र अब तक मात्र 10 प्रतिमाह रुपए देकर हॉस्टल में रहते आए हैं। उन्हें मात्र 20 रुपए में हॉस्टल में सिंगल रूम मिल जाता है। जेएनयू जहाँ स्थित है, वहाँ आसपास के इलाक़ों में आम कमरों का किराया काफ़ी ज्यादा है। पूरा बवाल इसी को लेकर किया गया गया कि हॉस्टल फी को बढ़ा कर 300 रुपए और 600 रुपए प्रतिमाह कर दिया गया। इसे मीडिया में हजारों प्रतिशत की बढ़ोतरी बता कर पेश किया गया। साथ ही छात्रों को उनके द्वारा प्रयोग किए जाने वाले बिजली-पानी का बिल भरने को कहा गया, जिससे वो सड़क पर उतर आए।

फिरोज खान की नियुक्ति पर अड़े BHU वीसी, छात्रों से बातचीत विफल

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के धर्म-विज्ञान संकाय में फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर छात्रों का प्रदर्शन लगातार जारी है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा की गई इस नियुक्ति में आन्दोलनरत छात्रों ने कुलपति से मुलाक़ात भी की मगर तीन दिन के बाद भी इस वार्ता का कोई भी हल नहीं निकल सका है।

छात्रों के आरोपों और उनकी माँगे सुनने के बाद प्रशासन ने अपने कदम को जायज़ ठहराते हुए फ़िरोज़ खान की नियुक्ति को सही बताया। अपनी बात स्पष्ट करते हुए प्रशासन ने अपनी इस प्रक्रिया को पारदर्शी बताया। बता दें कि यह छात्र 7 नवम्बर से विरोध प्रदर्शन पर बैठे हुए हैं। शुक्रवार देर रात आन्दोलन कर रहे छात्रों से मिलने के बाद कुलपति राकेश भटनागर ने इस विषय पर विधि विशेषज्ञ की राय लेने की बात कही है।

बता दें कि देश भर में तमाम मीडिया समूहों ने इस न्यूज़ को ऐसे चलाया हुआ है कि जैसे पूरे BHU में मुस्लिम टीचर की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। अलीगढ़ के तर्ज पर बेशक BHU के नाम में कुछ समानताएँ हो लेकिन वहाँ किसी का सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से विरोध कभी नहीं हुआ। फिर इस बार ऐसा क्या है कि इस नियुक्ति को रद्द करने की माँग SVDV के छात्र कर रहे हैं।

पढ़ें: ‘केवल हिन्दुओं’ के लिए बने BHU धर्म संकाय में डॉ. फ़िरोज़ खान की नियुक्ति कैसे हो गई: ग्राउंड रिपोर्ट

आपको बता दें कि संकाय के मंदिरनुमा भवन के प्रवेश द्वार पर दो स्तंभों पर शंकर-पार्वती की मूर्तियाँ स्थापित हैं जिनका संस्कृत विद्या धर्म संकाय के अधिकांश प्रोफेसर्स प्रदक्षिणा करते हुए संकाय में प्रवेश करते हैं। क्या ऐसा तब भी होगा जब इस संकाय में कल कई सारे मुस्लिम प्रोफ़ेसर होंगे। आपको शायद न पता हो कि BHU के इसी संकाय से प्रकाशित होने वाला ‘विश्व हिंदू पंचांग’ पूरे विश्व के हिन्दू धर्म के तिथि त्योहार सम्बन्धी सभी विवादों का समाधान करता है। लेकिन, आज दुर्भाग्य यह है कि इसके बारे में हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत सारे लोग ही नहीं जानते। और तब की सोचिए जब आज से 20 साल बाद गैर हिन्दू लोग यहाँ संकाय-प्रमुख और विभागाध्यक्ष होंगे तब हिन्दू-परम्पराओं की न जाने क्या-क्या और कैसी-कैसी व्याख्याएँ की जाएँगी।

मीडिया द्वारा इस मुद्दे को सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम तक सीमित कर देने से चिंतित वहाँ के छात्रों ने बताया की इस आधुनिक दौर में इन छात्रों को आप वह पारंपरिक रूढ़िवादी आदिवासी या कुछ भी समझ सकते हैं जो अपनी छोटी सी पुरखों की जमीन, सनातन परम्परा और ग्रामदेवता पर आए संकट से बचने के लिए आज भाला बरछी निकाल लिए हैं। क्योंकि, इनके सामने आधुनिक असलहों से लैस वाईसचांसलर(VC) JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर ‘सरकार’ हैं और विभागाध्यक्ष व एक्सपर्ट्स ‘पूँजीपति और अधिकारी।’ तथाकथित विकास और आधुनिकता का समर्थन करने वाली लिबरल जनता (गैंग) भी सामने है। यह छात्र आज खुद में कल का कश्मीरी हिन्दू भी देख रहे हैं। इनके लिए त्रासद यह है कि आज इनके पलायन की भूमिका ‘संघ समर्थित हिन्दू सरकार’ के शासन-काल में लिखी जा रही है। और लोग मौन हैं। आखिर अपनी परम्पराओं के संरक्षण के लिए हम अब खड़े नहीं हुए तो आने वाले समय जो थोड़ा-बहुत संरक्षित पारम्परिक ज्ञान-विज्ञान बचा है उसे भी आज के ‘दीमक’ चाट जाएँगे।

यह भी पढ़ें: BHU के हिन्दू धर्म फैकल्टी में आज फिरोज खान घुसे हैं, कल विश्वनाथ मंदिर से ‘अल्लाहु अकबर’ भी बजेगा

एक छात्र के मुताबिक “आज से बहुत पहले जब दिसंबर में काशी में राष्ट्रीय महासभा हुई और उसी अवसर पर 31 दिसंबर सन 1905 ई० को बरार के श्री वी०एन० महाजनी एम्० ए० के सभापतित्व में काशी के टाउन हॉल में एक बड़ी भारी सभा हुई थी। सब धर्मों के प्रतिनिधि देशभर के प्रसिद्ध शिक्षा प्रेमियों के सामने आज की यह योजना रखी गई। यहाँ भी हिंदू विश्वविद्यालय की योजना का सबने स्वागत किया। 1 जनवरी सन 1906 ई० को वहीं कॉन्ग्रेस के पंडाल में हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा हुई थी।”

‘अमित शाह ने कहा – भाजपा और शिवसेना ही बनाएगी सरकार, चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा’

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर चुनाव के नतीजे के बाद से ही खींचतान का माहौल बना हुआ है। इस बीच राज्य में सरकार गठन को लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से अपील की गई है कि वो इस सन्दर्भ में कुछ करें।

दरअसल, यह अपील केंद्र में भाजपा की सहयोगी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (RPI) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने की है। उन्होंने कहा, “मैंने अमित भाई (भाजपा अध्यक्ष अमित शाह) से कहा कि अगर वह मध्यस्थता करते हैं तो एक रास्ता निकाला जा सकता है, जिस पर उन्होंने (अमित शाह) जवाब दिया कि चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा। भाजपा और शिवसेना मिलकर सरकार बनाएँगे।”

इससे पहले, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं जलमार्ग विकास मंत्री नितिन गडकरी ने भी महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर एक बड़ा बयान दिया था। उन्होंने इशारा किया था कि राजनीति और क्रिकेट में कुछ भी हो सकता है। कई बार ऐसा लगता है कि आप मैच हार रहे हैं, लेकिन नतीजा उसके ठीक उलट होता है। नितिन गडकरी के इस बयान को बेहद अहम माना जा रहा था।

ग़ौरतलब है कि महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को मतदान हुआ था और 24 अक्टूबर को सभी 288 सीटों के लिए मतगणना हुई थी। भाजपा को सबसे अधिक सीटें, 105 मिलीं थी, शिवसेना को 56, राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी को 54 और कॉन्ग्रेस को 44 सीटें मिलीं थी। भाजपा-शिवसेना और कॉन्ग्रेस-NCP ने मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन, नतीजों के बाद शिवसेना ढाई साल के लिए सीएम का पद मॉंग रही थी जिसे भाजपा ने ठुकरा दिया था।

बहरहाल, महाराष्ट्र की स्थिति पर फ़िलहाल कुछ भी कह पाना संभव नहीं है। शिवसेना ने तो एनसीपी और कॉन्ग्रेस की सारी माँगे मान ली हैं। लेकिन, फिर भी तीनों पार्टियों के बीच का मतभेद और संशय ख़त्म नहीं हो रहा है। ऐसे में अगर इनकी सरकार किसी तरह बन भी गई, तो यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जब इन तीनों के बीच अभी ही वस्तु-स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही, तो फिर सरकार कैसे चलेगी।

194 लोगों ने की जिसकी ‘मॉब लिंचिंग’ वह 3 महीने बाद ज़िंदा लौटा: कठघरे में मीडिया और पुलिस

जिसकी मॉब लिंचिंग को लेकर मीडिया ने नकारात्मकता फैलाई, वो ज़िंदा वापस लौट आया। घटना पटना स्थित नौबतपुर के महमदपुर गाँव की है। यहाँ एक ऐसा व्यक्ति सकुशल वापस लौट आया, जिसे पुलिस एवं प्रशासन ने मृत घोषित कर दिया था। इस व्यक्ति का नाम कृष्णा है। अगस्त में ख़बर आई थी कि बच्चा चोर समझ कर उसे भीड़ ने पीट पीटकर मार डाला। इसके बाद गिरोह विशेष का मीडिया हरकत में आ गया था। स्क्रॉल ने एक लम्बी-चौड़ी ग्राउंड रिपोर्ट कर के बताया था कि किस तरह से देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएँ बढ़ गई हैं और ये चिंता का विषय है।

उस समय ख़बर आई थी कि मृतक की पत्नी ने लाश के हाथ में गोदना देख कर अपने पति की पहचान की थी। इसके अलावा एक टूटे हुए दाँत को देख कर शव की पहचान हुई थी, क्योंकि चेहरा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था। अब जब कृष्णा लौट आया है, उसके हाथ में कोई गोदना नहीं है। इससे पुलिस की कार्यवाही पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब मॉब लिंचिंग की ख़बर आई थी, तब परिजनों ने ख़ुद पुलिस से संपर्क किया था। शव क्षत-विक्षत हो चुका था और उससे दुर्गन्ध आ रही थी। अब पुलिस इस बात को लेकर माथापच्ची कर रही है कि ‘मृतक’ लौट आया है तो मरने वाला कौन था?

स्क्रॉल ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि कारवाँ-ए-मोहब्बत नामक संगठन ने ‘कृष्णा की मॉब लिंचिंग’ की ख़बर के बाद उसके परिवार के लिए फंड्स जुटाए थे। लोगों से चंदा लेकर रुपए इकट्ठे किए गए थे। अनवारुल हक़ और इब्राहम नामक एक्टिविस्ट्स इस मामले में काफ़ी सक्रिय रहे थे। इस पूरे मामले की सच्चाई तब उजागर हुई जब कृष्णा को उसके एक रिश्तेदार ने कन्याकुमारी में देखा। कृष्णा के श्राद्ध के बाद कन्याकुमारी गया यह रिश्तेदार उसे देख हतप्रभ रह गया।

रिश्तेदारों का कहना है कि कृष्णा 3-4 बार कन्याकुमारी जाकर आ चुका था। वह वहाँ काम करता था और कभी-कभी दूसरा काम खोजने जाता था। वह अगस्त महीने में घर लौटा और फिर बिना किसी को बताए वापस कन्याकुमारी चला गया। परिजनों ने उसके लापता होने की सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने एक शव परिवार को सौंप कर दावा किया कि यही कृष्णा है। इसके बाद मीडिया को मसाला मिला और मॉब लिंचिंग की बात फैलाई गई। इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर आक्रोश जताया गया, न्यूज़ पोर्टल्स में ओपिनियन लिखे गए और इसे ‘मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं’ के क्रम में रख दिया गया।

अब कृष्णा के वापस लौट आने से मीडिया और बिहार पुलिस, दोनों की ही पोल खुलती नज़र आ रही है। वहीं परिवार ख़ुश है। जिस रुदी देवी के माथे का सिन्दूर पोछ दिया गया था, अब वो फिर से सिन्दूर लगा रही हैं। एक और आश्चर्यजनक बात ये है कि 10 अगस्त को इस मामले में जो केस दर्ज किया गया था, उसमें 44 नामजद और 150 अज्ञात आरोपित थे। तो क्या 194 लोगों ने जिसे मिल कर मार डाला, उसके ज़िंदा लौट आने के बाद पुलिस और मीडिया पर सवाल खड़े नहीं होते?

वहीं, अब पुलिस को इस बात की टेंशन है कि जिस व्यक्ति की पहचान कृष्णा के रूप में हुई थी, उसे जलाए जाने के बाद उससे जुड़े सभी साक्ष्य भी चले गए हैं। ऐसे में उसकी पहचान कैसे हो पाएगी? वो कौन था? कैसे मरा? इन सभी सवालों के जवाब आने बाकी हैं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इस रिपोर्ट में क्या कृष्णा की शारीरिक बनावट और लाश के डील डॉल में कोई अंतर दिखा भी या नहीं? या फिर सिर्फ़ खानापूर्ति की गई, जिससे मीडिया को एक बड़ा मसाला मिल गया?