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बंगाल के मंत्री पर TMC सांसद के समर्थकों ने किया हमला, ममता बनर्जी ने माँगा जवाब

राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल से एक बड़ा हैरान करने वाला मामला सामने आया है। राज्य के विद्युत मंत्री सोवनदेब चट्टोपाध्याय ने अपनी ही पार्टी की सांसद माला रॉय के समर्थकों पर मारपीट का आरोप लगाया है। मंत्री का कहना है कि उन पर हमला दक्षिण कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान किया गया।

चट्टोपाध्याय के मुताबिक यह कार्यक्रम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा शुरू की गई ‘परे परे सिनेमा’ का हिस्सा था। इसका मकसद क्षेत्रीय इलाकों में बांग्ला फिल्मों का विस्तार करना है। मंगलवार की शाम ऋतुपर्ण सेनगुप्ता और प्रसन्नजीत चटर्जी की फिल्म के ओपन एयर स्क्रीनिंग के दौरान मंत्री ने स्ट्रीट लाइटें बंद करवा दी।

इसके बाद सांसद माला रॉय के समर्थक आयोजन स्थल पर आकर हंगामा करने लगे। वे लाइट चालू करने की मॉंग कर रहे थे। उनका कहना था कि लोग अंधेरे से परेशान होकर सांसद से शिकायत कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच बहस धीरे-धीरे इतनी बढ़ गई कि चट्टोपाध्याय और माला रॉय के समर्थकों में झड़प हो गई और फिर रास्ते जाम कर दिए गए।

पुलिस ने किसी तरह हालात पर काबू पाया। मंत्री ने बताया, “हम पार्टी के निर्देशों पर ही कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का राज्य के हर क्षेत्र में विस्तार करने के लिए ये आयोजन रासबिहारी एवेन्यू में करा रहे थे। हर कोई जानता की अच्छी दृश्यता के लिए सड़कों की बत्तियाँ बुझानी पड़ती हैं। हमने में भी सिविक बॉडी से एनओसी मिलने के बाद ही ऐसा किया।”

आयोजन में हुई घटना पर आगे की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया, “हम शाम के 6 बजे कार्यक्रम शुरू करने वाले थे, लेकिन माला रॉय के समर्थकों ने सड़क की बत्तियाँ आकर जला दीं। इस दौरान मैंने कोलकाता के नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी को भी फोन किया, जिसके कुछ देर बाद जाकर सारी लाइटें बंद हुईं और हमने शो शुरू किया। लेकिन शो शुरू होने के कुछ ही सेकेंड बाद फिर से लाइट जला दी गई और माला रॉय के समर्थकों ने मुझसे मारपीट की। अंत में हमें शो बंद करना पड़ा।”

बता दें टीएमसी नेता ने अपने साथ हुई इस घटना की कड़ी निंदा की है। माला रॉय ने अपने समर्थकों के ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा है कि स्थानीय लोगों ने उनसे शिकायत की थी कि सोवनदेब ने उन जगहों की लाइटें भी बंद करवा दी है जहाँ कोई शो नहीं चल रहा।

सांसद माला रॉय के अनुसार विद्युत मंत्री से निवेदन किया गया था कि केवल वहीं की लाइटें बंद हों, जहाँ फिल्म दिखाई जा रही है। लेकिन उन्होंने पूरे रासबिहारी एवेन्यू की ही बत्तियाँ बंद करवा दी। इसके कारण स्थानीय लोग भड़क गए और प्रदर्शन करने लगे। लेकिन किसी ने चट्टोपाध्याय के साथ मारपीट नहीं की।

इस मामले में ममता बनर्जी ने पार्टी के दोनों नेताओं से जवाब-तलब किया है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने ट्वीट कर कहा है कि जिस पार्टी में आपसी तालमेल न हो, वो पार्टी लोकतंत्र की रक्षा कैसे करेगी। गौरतलब है कि टीएमसी कार्यकर्ताओं पर आए दिन भाजपा नेताओं को निशाना बनाने के आरोप भी लगते रहते हैं।

SPG सुरक्षा हटी, लेकिन प्रियंका गाँधी ने खाली नहीं किया सरकारी बंगला

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा एसपीजी सुरक्षा हटा लिए जाने के बाद भी दिल्ली के लोधी एस्टेट स्थित सरकारी बंगले में जमी हुईं हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी की बेटी प्रियंका को यह बंगला एसपीजी, गृह मंत्रालय और कैबिनेट सचिवालय की सुरक्षा सलाह के बाद दिया गया था। गौरतलब है कि कानूनी रूप से एक सामान्य नागरिक प्रियंका को वर्ष 1997 के फरवरी माह में टाइप IV का सरकारी आवास अलॉट किया गया था।

हाल ही में मोदी सरकार ने सोनिया गाँधी, उनके बेटे, वायनाड सांसद और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी व प्रियंका गाँधी को मिला हुआ एसपीजी सुरक्षा कवच हटाने का निर्णय लिया था। अब उनकी सुरक्षा का स्तर घटा कर ज़ेड प्लस कर दिया गया है। यानी इनकी सुरक्षा अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ (सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स) की ज़िम्मेदारी है। सोमवार (11 नवंबर, 2019 को) को सीआरपीएफ़ ने एसपीजी जवानों से तीनों की सुरक्षा के संबंध में जानकारी ली थी। फिलहाल एसपीजी सीआरपीएफ़ के सहायक की भूमिका में है।

इजरायली हथियारों एक्स-95, एके सीरीज़ और एमपी-5 गनों से लैस केंद्रीय अर्धसैनिक बल के स्पेशल वीवीआईपी सिक्योरिटी यूनिट के कमांडोज़ की एक टुकड़ी राहुल गाँधी के तुग़लक़ लेन स्थित आवास पर तैनात है। प्रियंका गाँधी के लोधी एस्टेट के घर पर भी एक दूसरी टीम ने सुरक्षा-व्यवस्था का ज़िम्मा सँभाल लिया है।

मीडिया खबरों के अनुसार सोनिया गाँधी के 10 जनपथ स्थित आवास पर भी सीआरपीएफ के कमांडोज़ ने सुरक्षा का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया है। जेड प्लस सिक्योरिटी का अर्थ 100 सीआरपीएफ़ कमांडोज़ की सुरक्षा घेरा है, जो उनके साथ देश भर में रहेगा। इसके अलावा उनके आवासों की भी सुरक्षा इसी एजेंसी के हाथ में होगी।

इसके अलावा उनके साथ एक डॉग स्क्वाड भी होगा, जो उनके आगमन के पहले किसी भी स्थान की सुरक्षा पड़ताल इन कमांडोज़ के साथ करेगा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ दिन तक एसपीजी और सीआरपीएफ की मिलीजुली सुरक्षा इन तीनों को मिलेगी और उसके बाद राज्य पुलिस की सहायता से सीआरपीएफ इनकी सुरक्षा का पूरा जिम्मा अपने हाथ में ले लेगी।

इन तीनों की सुरक्षा घटाने का निर्णय इंटेलिजेंस एजेंसियों के इनपुट पर गृह मंत्रालय और कैबिनेट सचिवालय द्वारा बनाई गई एक कमेटी ने लिया था। सुरक्षा प्राप्त लोगों की सुरक्षा और खतरे की समीक्षा सालाना तौर पर होती है।

ICJ की फटकार के बाद आर्मी एक्ट बदलेगा पाक, सिविल कोर्ट में अपील दायर कर पाएँगे कुलभूषण जाधव

पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को अपनी सजा के खिलाफ सिविल कोर्ट में अर्जी दाखिल करने का मौका मिल सकता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दरअसल कुलभूषण जाधव के मामले में पाकिस्तान अपने नियमों में बदलाव करने जा रहा है। इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस (ICJ) के निर्देशों का पालन करने के लिए पाकिस्तान आर्मी एक्ट में बदलाव करेगा। फिलहाल यह मामला सैन्य अदालत में है। आर्मी एक्ट सिविल कोर्ट में अपील दाखिल करने का अधिकार नहीं देता।

पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जासूसी के आरोप में जाधव को मौत की सजा सुनाई थी। पाकिस्तान का दावा है कि उसने बलूचिस्तान से मार्च 2017 में जाधव को गिरफ्तार किया था। पूर्व नौसैनिक जाधव पर लगाए गए सारे आरोप भारत ने खारिज कर दिए थे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कारोबार के सिलसिले में ईरान गए जाधव को पाकिस्तान ने अगवा कर लिया था।

उनकी मौत की सजा रुकवाने के लिए भारत आईसीजे गया था। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय अदालत को बताया कि पाकिस्तान जाधव को कानूनी सहायता नहीं देकर विएना संधि का उल्लंघन कर रहा है। भारत की दलीलों को स्वीकार करते हुए आईसीजे ने मौत की सजा पर रोक लगा दी थी। साथ ही पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए जाधव तक राजनयिक पहुॅंच देने को कहा था। इसके बाद 2 सितम्बर को भारतीय राजदूत ने जाधव से मुलाक़ात की थी। हाल ही में भारतीय उच्चायोग के इंचार्ज गौरव अहलूवालिया भी कुलभूषण से मिले थे।

इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा था , “यह स्पष्ट है कि कुलभूषण जाधव अत्यधिक दबाव में हैं। पाकिस्तान भारत पर अपने निराधार झूठे आरोपों को थोपने के लिए उन्हें मोहरा बना रहा था। इस मामले में हमें एक व्यापक रिपोर्ट का इंतजार है।” वहीं, पाकिस्तानी विदेश विभाग ने बयान जारी कर कहा था कि इस मामले में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सभी स्टैण्डर्ड प्रोसीजर्स का ख्याल रखा गया।

पत्रकार नेतागिरी करे तो वो ‘धोबी का कुत्ता’ बन भी सकता है, बना भी सकता है: हिंदी में सत्य का सामना

अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और अरुण शौरी जैसों ने पत्रकारिता से राजनीति में क़दम रखा और नए मानक स्थापित किए। लेकिन, पत्रकार से नेता बने दो चेहरे ऐसे भी हैं जिन्होंने इनके ठीक उलट प्रतिमान स्थापित किए हैं। इनमें से एक ने अपने नेता को ‘धोबी का कुत्ता’ बना दिया तो दूसरे को उसके नेता ने ‘धोबी का कुत्ता’ बना दिया।

एक देश की राजधानी में राजनीति करना चाहता था तो दूसरा देश की आर्थिक राजधानी में राजनीति या उसे जो भी कह लीजिए, कर रहा है। अपने नेता उद्धव ठाकरे को ‘धोबी का कुत्ता‘ बनाने वाले पत्रकार का नाम है संजय राउत। वहीं जिन्हें उनके नेता अरविन्द केजरीवाल ने ही ‘धोबी का कुत्ता’ बना दिया, उनका नाम है आशुतोष। राउत पत्रकार भी हैं और राजनेता भी। आशुतोष पत्रकार थे, राजनेता बने और अब फिर पत्रकार हैं। राजनीति का सत्यानाश होने के बाद अब वो ‘सत्यहिंदी’ चलाते हैं। वहीं जिस राउत के कारण महाराष्ट्र आज इस राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है, वो ‘सामना’ के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं।

दोनों में एक और चीज कॉमन है। वो है- राज्यसभा का पद। एक को आते-आते ही मिल गया। दूसरे को जाते-जाते भी नहीं मिला। एक आया था पत्रकारिता करने लेकिन नवाजा गया राज्यसभा के पद से। दूसरा पत्रकारिता छोड़ के राज्यसभा के लिए ही आया था, लेकिन ये पद गुप्ताओं के हिस्से चला गया। संजय राउत 2004 में राज्यसभा भेजे गए, 2010 में फिर भेजे गए और 2016 में तीसरी बार भेजे गए। उम्मीद है कि उन्हें 2022 में फिर से भेजा जाएगा। आशुतोष का 5 सालों में ही आम आदमी पार्टी से मोहभंग हो गया और वो निकल लिए।

एक ने फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखी है। दूसरे ने क़िताब लिखी है। दोनों ही वास्तविकताओं पर आधारित रचनाएँ हैं। राउत ने बाल ठाकरे पर बनी नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत फ़िल्म ‘ठाकरे’ की कहानी लिखी। आशुतोष ने अन्ना हजारे के आंदोलन की यादों को एक पुस्तक के रूप में समेटा। लेकिन उसकी सफलता का सारा श्रेय किसी और को दे दिया। मार्च 2018 में जब अन्ना ने अनशन शुरू किया, तब आशुतोष ने कहा कि उनके पास अब अरविन्द केजरीवाल के रूप में एक्स-फैक्टर नहीं है। राउत ने भी कई पुस्तकें लिख रखी हैं। इस तरह दोनों ही लेखक हुए।

राउत और आशुतोष में कई समानताएँ और विषमताएँ हैं। राउत ने कहा कि आंबेडकर का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था और ट्रोल हुए। बता दें कि बाबासाहब का जन्म मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। आशुतोष के लिए केजरीवाल ने कहा कि इस जन्म में तो आपका इस्तीफा मैं स्वीकार नहीं कर सकता। जन्म-जन्म का ये खेल अब यहाँ आ पहुँचा है कि महाराष्ट्र में नई सरकार का ही जन्म नहीं हो पा रहा। एक सुबह-सुबह न सिर्फ़ ब्रेड और अंडे खाता है, बल्कि उसकी फोटो लेकर जनता को बताता है कि ठण्ड के दिनों में नाश्ते में क्या लेना चाहिए। दूसरा अण्डों को ही शाकाहारी घोषित करने की बात करता है। अफसोस ये कि राउत ने ये बात संसद में कही। आशुतोष को मौक़ा ही नहीं मिला।

संजय राउत ने तो ये भी कहा था कि शाकाहारी चिकन की व्यवस्था होनी चाहिए। खैर, संसद के रूप में उनके पास एक ऐसा प्लॅटफॉर्म है जहाँ वो कुछ भी बोल सकते हैं। आशुतोष ये काम ट्विटर पर करते हैं। राउत ट्विटर पर ये सब नहीं करते। वो ट्विटर पर कविता-पाठ करते हैं। दोनों में एक और समानता है कि दोनों ही कॉर्टून प्रेमी हैं। जहाँ एक के नेता ही कार्टूनिस्ट हुआ करते थे, दूसरे के नेता कार्टूनिस्टों के फेवरिट कैरेक्टर हैं। बाल ठाकरे के कार्टून जहाँ पूरे देश में चर्चा का विषय बनते थे तो अरविन्द केजरीवल कार्टूनिस्टों को ढेर सारा मसाला देने का काम करते हैं।

एक की दिल्ली में सरकार बनने के बाद भी एकांतवास में दिन कटे, दूसरा सरकार न बनने के बावजूद ‘मुख्यमंत्री हमारा ही होगा’ कहते फिर रहा है। दोनों की विचारधारा अब धीरे-धीरे एक ही जगह जाकर रुक गई है। ‘सत्य हिंदी’ हो या ‘सामना’, दोनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ लेख प्रकाशित होते हैं। दोनों के ही ट्वीट्स भाजपा पर कटाक्ष होते हैं। दोनों ही सोशल मीडिया पर मजाक की विषय-वास्तु बन कर रह गए हैं। एक ने महाराष्ट्र के सीएम की ही तुलना कुत्ते से कर डाली थी, दूसरा कुत्ते को ही कुत्ता नहीं समझता। संजय राउत ने फडणवीस को लेकर कहा था कि एक कुत्ता भी सत्ता में आने के बाद ख़ुद को शेर समझने लगता है। दूसरे को इस बात से दिक्कत थी कि लोग कुत्ते को कुत्ता क्यों समझते हैं?

‘सामना’ और ”सत्य हिंदी एक ही ढर्रे पर चलते दिख रहे हैं। मराठी और हिंदी एक जैसे दिख रहे हैं। संजय राउत कुछ कारणों से अस्पताल में भर्ती थे। अंदर थे तो ‘अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ’ लिख रहे थे, बाहर आ गए हैं तो ‘मुख्यमंत्री शिवसेना का ही बनेगा’ बोल रहे हैं। एक बात तो तय है। कल को अगर अरविन्द केजरीवाल पर कोई फ़िल्म बनती है तो आशुतोष से बढ़िया कौन होगा उस फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखने वाला? इसके बाद वो इस मामले में भी राउत के टक्कर के हो जाएँगे। फ़िलहाल पत्रकारों की राजनीति या राजनीति की पत्रकारिता- दोनों में से किसी का भी लुफ्त उठा सकते हैं। दोनों एक-दूसरे में घुसी हुई हैं।

RTI से ऊपर नहीं CJI, पब्लिक अथॉरिटी बनना है तो पारदर्शिता ज़रूरी: रंजन गोगोई की पीठ का फैसला

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने जाने की वेला में भारत के सीजेआई ऑफ़िस को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के अंतर्गत घोषित कर दिया है। उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसके खिलाफ उन्हीं का संस्थान एक समय हाई कोर्ट में न केवल प्रतिवादी बन कर उपस्थित हुआ था, बल्कि शीर्ष अदालत में इस फैसले को चुनौती भी देने वाला खुद सुप्रीम कोर्ट ही था।

2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण और याचिकाकर्ता व आरटीआई कार्यकर्ता एससी अग्रवाल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के विरोध को दरकिनार करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट की तीन-सदस्यीय पीठ ने सीजेआई के कार्यालय को सूचना के अधिकार के दायरे के बाहर मानने से इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकारी के ज़रिए अपील की और मामला रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अगस्त 2016 में अपने नेतृत्व की पाँच सदस्यों वाली संविधान पीठ को सुपुर्द कर दिया। इसमें जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एनवी रमना, डीवाई चंद्रचूड़, दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना थे।

इसी बेंच ने आज का फैसला दिया है। फैसला लिखने वाले जज संजीव खन्ना ने कहा कि पारदर्शिता से न्यायिक स्वतंत्रता कमज़ोर नहीं होती। न्यायिक स्वतंत्रता जवाबदेही के साथ ही चलती है। यह जनहित में है कि बातें बाहर आएँ। जस्टिस रमना ने इसमें यह जरूर जोड़ा कि पारदर्शिता का मतलब जजों की निजता खत्म हो जाना या उन्हें सर्विलांस के दायरे में ले आना नहीं है। आरटीआई का इस्तेमाल न्यायपालिका पर नज़र रखने के लिए हो सकता है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि सम्पत्ति की जानकारी जजों की ‘निजी’ जानकारी नहीं हो सकती और न्यायपालिका का कामकाज औरों से अलग राह पर नहीं हो सकता अगर वे संवैधानिक कुर्सी पर हैं और लोकसेवा का कार्य कर रहे हैं।

केंद्रीय मंत्री की गाड़ी पर कॉन्ग्रेसियों का पथराव: राजस्थान के मंत्री का करप्शन उजागर करने से थे नाराज

राजस्थान के बाड़मेर जिले में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने मंगलवार (नवंबर 12, 2019) की रात केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी के वाहन पर पथराव किया। हालाँकि इस पथराव में किसी को चोट नहीं आई, लेकिन मंत्री के वाहन और पुलिस की जीप को खासा नुकसान पहुँचा।

इस दौरान कैलाश चौधरी के साथ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक तथा सांसद हनुमान बेनीवाल भी थे। कहा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के निशाने पर बेनीवाल ही थे। उन्होंने हाल ही में राज्य के राजस्व मंत्री हरीश चौधरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।

बेनीवाल ने मंगलवार को एक प्रेस वार्ता में मंत्री हरीश चौधरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे। जिसके बाद से ही कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता उनसे नाराज चल रहे थे। बेनीवाल के बयान के बाद कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने कार्यालय में बैठक भी बुलाई थी और लगभग सौ लोग उनका विरोध करने फलसूंड चौराहे पर भी पहुँचे थे। यहाँ करीब आधे घंटे तक इन लोगों ने बेनीवाल के ख़िलाफ़ नारेबाजी की थी।

ऐसे में जब कैलाश चौधरी के साथ बेनीवाल बाड़मेर में बायतु के उपखंड मुख्यालय पर आयोजित वीर तेजाजी और खेमाबाबा की जागरण में भाग लेने पहुँचे, तो वहाँ मौजूद कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला कर दिया। बता दें बायतू राजस्व मंत्री हरीश चौधरी का ही विधानसभा क्षेत्र है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मामले में पुलिस अधीक्षक शदर चौधरी ने कहा, “कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं में नाराजगी थी, वे बीती रात बायतू के पास इकट्ठा हुए और कहा कि सांसद को कार्यक्रम में शामिल नहीं होने दिया जाएगा।”

पुलिस के अनुसार मौक़े पर मौजूद आला अधिकारियों ने उनकों समझा-बुझाकर शांत करवाया, लेकिन जैसे ही कैलाश चौधरी की गाड़ी वहाँ पहुँची तो उनमें से कुछ लोगों ने वाहन पर पथराव किया। पुलिस ने हालात को काबू में कर लिया और दोनों नेताओं ने जागरण में भाग लिया। इस घटना पर हनुमान बेनीवाल ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “मैं भी इनकी तरह कर सकता हूँ, लेकिन यहाँ सभी मेरे अपने हैं, इसलिए मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ। “

8 साल पहले शरद पवार को मारा था थप्पड़ : हरविंदर सिंह को दिल्ली पुलिस ने दबोचा

एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार को 2011 में थप्पड़ मारने वाले को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। बता दें कि आरोपित लम्बे समय से फरार चल रहा था जिसके बाद 2014 अदालत ने अधिकारिक रूप से उसे फरार घोषित कर दिया था। आठ साल पहले जब यह घटना हुई थी तब पवार केंद्र की यूपीए सरकार में कृषि एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री हुआ करते थे।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गिरफ्तार किए गए आरोपित शख्स का नाम हरविंदर सिंह है। हरविंदर ने दिल्ली के संसद मार्ग स्थित एनडीएमसी सेंटर में एक कार्यक्रम से लौट रहे तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री को 2011 में थप्पड़ जड़ दिया था। बता दें कि आरोपित हरविंदर ने इस घटना से कुछ ही दिनों पहले पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुखराम पर भी हमला बोला था। मंत्री रहे सुखराम को अदालत ने भ्रष्टाचार का दोषी ठहराया था। उस समय अदालत ने हरविंदर को चेतावनी देते हुए छोड़ दिया था।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक हमला करने वाला शख्स प्रणब मुखर्जी पर हमला करना चाहता था मगर उनकी उम्र को देखते हुए उसने यह विचार त्याग दिया। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक आरोपित ने 2011 में अपनी सफाई पेश करते हुए कहा था, “हर ज़रूरी सामान की क़ीमतें बढ़ती जा रही है। मैं एक आतंकवादी नहीं हूँ क्योंकि आतंकवादी ऐसा क़दम नहीं उठाता। मैं अलग-अलग घोटालों में शामिल भ्रष्ट मंत्रियों से त्रस्त हूँ।”

थप्पड़ पड़ने के बाद पवार ने इसके लिए किसी भी पार्टी को दोषी नहीं ठहराया था, पवार की बेटी और एनसीपी से सांसद सुप्रिया सुले ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से शांत रहने को कहा था। गौरतलब है कि जब सुरक्षाकर्मियों ने हमलावर हरविंदर सिंह को बाहर निकाला तो उसने चिल्लाकर कहा था कि मैं यहाँ पूरी तैयारी के साथ मंत्री को थप्पड़ मारने ही आया था। जब दिल्ली पुलिस ने हरविंदर का इतिहास खंगाला तो पता चला कि वह न तो किसी राजनीतिक दल से जुड़ा था और न ही उसका मानसिक संतुलन बिगड़ा था।

उसने कहा था कि वह कॉन्ग्रेस नीत सरकार में घोटालों और भ्रष्टाचार से आहत था। मीडिया से बातचीत के दौरान हरविन्दर ने कहा था कि उसे किसी नतीजे की कोई परवाह नहीं है और न तो यह काम उसने सुर्ख़ियों में आने के लिए किया है।

उत्तराखंड के बेहद करीब बेस बना रहा है चीन, नेपाली सीमा पर डोकलाम 2.0 की तैयारी?

ज़्यादा दिन नहीं हुए जब चीन और भारत की सेनाओं की टुकड़ियाँ भारत, चीन और भूटान के बीच स्थित डोकलाम में आमने-सामने आ गईं थीं और दोनों के बीच हाथापाई भी हुई थी। तनाव बढ़ा तो चिंता यह भी होने लगी कि परमाणु हथियारों और आईसीबीएम मिसाइलों से लैस दोनों देशों में युद्ध की स्थिति न आ जाए।

आज चीन भारत को उसी के आँगन उत्तराखंड के मुहाने पर जिस तरह से घेरने की कोशिश कर रहा है, उससे वैसे ही हालात दोबारा पैदा होने का खतरा मँडराने लगा है। चीन उत्तराखंड की भारत-नेपाल सीमा स्थित लिपुलेख पास के बेहद करीब अपना बेस बनाने में जुटा है। यह भारत, चीन और नेपाल की तिहरी सीमाओं के बेहद करीब और उत्तराखंड राज्य की उत्तर-पूर्वी सीमा पर है।

टाइम्स नाउ के नेशनल अफेयर्स एडिटर सृंजॉय चौधरी की रिपोर्ट के अनुसार चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने लिपुलेख पास के बेहद करीब कई सारी सैन्य सुविधाओं और आधारभूत ढाँचे का निर्माण किया है। इसमें एक हेलीपैड, एक सोलर पैनल और एक लॉन्ग रेंज रेकनाइसेन्स एंड ऑब्ज़र्वेशन सिस्टम (लोर्रस) शामिल है। इसके अलावा उसके द्वारा दो सर्विलांस कैमरे लगाने की बात का भी उल्लेख रिपोर्ट में है।

रिपोर्ट में इसके अलावा चीन के गांसु प्रान्त में एक नया सैन्य बेस बनाए जाने की भी बात कही गई है। इस हवाई बेस में मेंटेनेंस हैंगर और 20 पार्किंग हैंगर हैं। इस बेस के करीब स्थानीय सैन्य हवाई ब्रिगेड के मध्यम लिफ्ट के हेलीकॉप्टरों को भी देखा गया है।

चीन की ये सभी हरकतें एक-दूसरे से जुड़ीं हुईं हैं। वह भारत को सभी ओर से घेर कर अलग-थलग कर देने की फ़िराक में है ताकि किसी सैन्य टकराव की स्थिति में भारत की सहायता को पड़ोसी देश भी न हों और हर ओर से घिरा होने के कारण किसी दूर के सहयोगी के लिए भी मदद पहुँचाना दूभर हो जाए। इसी नीति के तहत भारत-विरोध पर बने और पल रहे पाकिस्तान को शह देने के अलावा श्रीलंका, चीन, भूटान, बांग्लादेश समेत सभी देशों के भीतर वह विरोधी तत्वों को शह देता रहता है।

Pak ने फिर किया सीजफायर का उल्लंघन: जवाबी कार्रवाई में भारत ने मार गिराए 4 सैनिक, 3 चौकियाँ भी तबाह

जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों में पाकिस्तान लगातार सीजफायर का उल्लंघन कर रहा है। ताजा जानकारी के मुताबिक आज (नवंबर 13, 2019) सुबह 7 बजे से ही राजौरी के केरी क्षेत्र में गोलाबारी चालू है।

मंगलवार (नवंबर 12, 2019) को भी शाहपुर, कीरनी और बालाकोट में संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ और रिहायशी इलाकों समेत सैन्य चौकियों पर भी गोले दागे गए। भारतीय जवानों ने इसका मुॅंहतोड़ जवाब दिया।

भारतीय सैनिकों ने जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान की 3 चौकियाँ तबाह कर दी। इसके अलावा 3 से 4 पाकिस्तानी सैनिक मारे जाने की सूचना भी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पाकिस्तान की ओर से क्षेत्र के गाँव कस्बा, मंधारा, कीरनी, इस्लामाबाद, गूंतरियाँ, काईयाँ, अपर शाहपुर, लोअर शाहपुर के साथ ही नियंत्रण रेखा से दूरदराज के गाँव गलीपिंडी और कंडियार तक गोले दागे गए थे। जिसके बाद पूरे इलाके में दहशत फैल गई और लोगों ने सुरक्षित जगहों पर पनाह ली।

इसके अलावा बता दें, इससे पहले पाकिस्तानी सेना ने शुक्रवार को जिले के कृष्णा घाटी में आतंकियों की घुसपैठ कराने के लिए भारतीय क्षेत्र में गोलीबारी की थी। जिसमें सेना का एक जवान भी वीरगति को प्राप्त हुआ था, लेकिन भारतीय सेना की कार्रवाई में 2 घुसपैठिए भी मार दिए गए थे।

आडवाणी मर जाते तो मैं खुशियाँ मनाता: Facebook अधिकारी का घृणास्पद ट्वीट

फेसबुक के अधिकारी अगर खुलेआम अपनी जहरीली मानसिकता प्रदर्शित करने लगें तो आप उन्हें क्या कहेंगे? भारत में फेसबुक के अधिकारी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। वे न सिर्फ़ अपना राजनीतिक झुकाव प्रदर्शित कर रहे, बल्कि अपना हिंदुत्व-विरोधी चेहरा भी दिखा रहे हैं। कुछ ऐसा ही किया है राहुल फर्नांडिस ने। राहुल फेसबुक में न्यूज़ फीड और ‘स्टोरीज इंटीग्रिटी’ का काम देखते हैं। इसका मतलब हुआ कि फेसबुक पर कौन सी स्टोरी जानी चाहिए और कौन सी हटनी चाहिए, ये तय करने का अधिकार कम्पनी ने उन्हें दिया हुआ है। फेसबुक पर कौन सी ख़बर आपको दिखेगी और कौन सी नहीं, उसे छानने का काम उनके जिम्मे है।

पूर्व भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी शुक्रवार (नवंबर 8, 2019) को 92 वर्ष के हो गए। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उनके आवास पर पहुँच कर उन्हें जन्मदिवस की शुभकामनाएँ दी। जहाँ पक्ष-विपक्ष के कई नेताओं ने पूर्व उप-प्रधानमंत्री की लम्बी उम्र की कामना की, फेसबुक के अधिकारी राहुल फर्नांडिस उनके मरने की कामना कर रहे थे। आप ख़ुद उनका ये ट्वीट देख लीजिए, जिसे उन्होंने डिलीट कर दिया है:

आडवाणी को लेकर फेसबुक के अधिकारी ने किया आपत्तिजनक ट्वीट

जैसा कि आप उपर्युक्त ट्वीट में देख सकते हैं, राहुल फर्नांडिस ने लिखा कि ट्विटर पर लालकृष्ण आडवाणी को ट्रेंड करते देख कर वो ख़ुशी मनाने वाले थे, लेकिन तभी उन्हें पता चला कि वो तो अपने जन्मदिन की वजह से ट्रेंड हो रहे हैं। इसके बाद राहुल को निराशा हाथ लगी। वो चाहते थे कि आडवाणी किसी बुरे कारण से ट्रेंड हो रहे हों या फिर उनके साथ कुछ बुरा हुआ हो, ताकि राहुल फर्नांडिस खुशियाँ मना सकें। भाजपा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को लेकर घृणास्पद ट्वीट करने को लेकर राहुल लोगों के निशाने पर आए।

क्या यह व्यक्ति फेसबुक पर ऐसी ख़बरों को ही ज्यादा प्रचारित नहीं करता होगा, जिसमें भाजपा, हिंदुत्व और मोदी या आडवाणी जैसी शख्सियतों के प्रति घृणा प्रदर्शित की गई हो? प्रोपगेंडा फैलाया गया हो? क्या ये व्यक्ति ऐसी ख़बरों की रीच नहीं घटा देता होगा जिसमें मोदी अथवा भाजपा या फिर हिंदुत्व को लेकर सकारात्मक बातें की गई हों? ऐसा इसीलिए, ताकि ज्यादा लोगों तक इन चीजों लेकर नकारात्मकता पहुँचे, कुछ अच्छा नहीं। आप इस आदमी का ट्विटर प्रोफाइल यहाँ देख सकते हैं:

फेसबुक के अधिकारी राहुल फर्नांडिस का ट्विटर प्रोफाइल

राहुल फर्नांडिस के लिए यह नया नहीं है। वह इससे पहले भी कई घृणास्पद ट्वीट कर चुका है। उसने नरेंद्र मोदी और आडवाणी की रथयात्रा की एक फोटो शेयर करते हुए पूछा था कि जब आडवाणी पर केस चल रहे हैं तो फिर मोदी पर क्यों नहीं?

फेसबुक ने जब अपनी कम्पनी में ही राहुल फर्नांडिस जैसे घृणा फैलाने वाले लोग भर रखे हैं तो फिर उनसे न्यूट्रैलिटी की उम्मीद ही कैसे की जा सकती है? एक ऐसा अधिकारी, जो भारत के पूर्व उप-प्रधानमंत्री के लिए अशुभ बातें करता हो।