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‘दिल्ली में प्रदूषण 25% कम’- केजरीवाल के इस दावे को ग्रीन पीस ने किया ख़ारिज, कहा- AAP का विज्ञापन गलत

पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ग्रीनपीस इंटरनेशनल ने दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा प्रदूषण घटाने वाले झूठे दावों की पोल खोली है। ग्रीनपीस का कहना है कि पिछले कुछ सालों में प्रदूषण का स्तर 25% नहीं घटा हैं। संस्था के अनुसार अगर दिल्ली और आसपास के राज्यों में वायु गुणवत्ता और सैटेलाइट डेटा के साथ पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों की बढ़ती खपत के आँकड़ों को मिलाकर देखें तो उन्हें ये दावा गलत लगता हैं।

एनजीओ के विश्लेषण के मुताबिक, “दिल्ली और आसपास के राज्यों में वायु गुणवत्ता निगरानी और उपग्रह के आँकड़ों के साथ ही पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों की बढ़ती खपत को मिलाकर देखें तो सरकार का यह दावा गलत है कि पिछले वर्षों के दौरान प्रदूषण के स्तर में 25 प्रतिशत की कमी आई है।”

लेकिन, ग्रीनपीस की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि उनके लिए यह विश्लेषण महत्वहीन है। उन्होंने कहा कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा है कि दिल्ली में प्रदूषण घटा है और अक्टूबर और नवंबर में प्रदूषण पराली जलाने से हो रहा है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय में दिल्लीवासियों को दिल्ली की सड़कों पर हर जगह सरकारी एडवरटाइजमेंट के जरिए राज्य में कम हुए प्रदूषण की सूचना दी जा रही थी। जिसमें कहा जा रहा था कि दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर 2012-2014 के 154 के औसत से 2016-2018 में 115 तक आ गया है। जिसका मतलब है कि पीएम 2.5 में करीब 25% कमी आई है।

बता दें कि ग्रीनपीस इंडिया ने सैटेलाइट डेटा के हवाले से कहा है कि साल 2013 से 2018 तक पीएम 2.5 के स्तर में कोई भी कमी नहीं दिख रही हैं। उनका कहना है कि पिछले 3 सालों की तुलना में केवल साल 2018 के अंतिम महीनों में प्रदूषण के स्तर में कुछ कमी आई है।

राहुल, प्रियंका और सोनिया गाँधी सबका हटाया गया SPG कवर: 1991 से मिली हुई थी यह सुविधा

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्‍यक्ष सोनिया गाँधी, राहुल और प्रियंका गाँधी की सुरक्षा की समीक्षा करते हुए SPG कवर को वापस लेने की सिफारिश की है। ऐसा ख़ुफ़िया इनपुट के आधार पर उन्हें कम खतरा देखते हुए किया जा रहा है। साथ ही, यह भी कहा जा रहा है कि गाँधी परिवार की सुरक्षा से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। गाँधी परिवार को अभी भी जेड प्‍लस सुरक्षा दी जाएगी।

बता दें कि सितंबर में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की विशेष सुरक्षा कवर को हटाए जाने के कुछ दिनों बाद उन्हें भी जेड प्लस वर्ग के तहत सीआरपीएफ कमांडो का सुरक्षा कवर मुहैया करा दिया गया था। सिंह और उनकी पत्नी गुरशरण कौर के पास उनके मोतीलाल नेहरू रोड स्थित आवास और देशभर में कहीं भी जाने के दौरान उनके साथ हमेशा सीआरपीएफ के 35 जवान सुरक्षा घेरे में रहते हैं। 10 NSG कमाण्डो के साथ कुल मिलाकर, उनकी सुरक्षा के लिए 55 सशस्त्र सुरक्षा कर्मी होते हैं, जिन्‍हें अलग-अलग शिफ्टों में तैनात किया जाता है।

मीडिया रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि अब गाँधी परिवार के सदस्‍य सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के लिए भी यही सीआरपीएफ कमांडो जेड प्लस का सुरक्षा कवर मुहैया कराई जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्र सरकार ने खतरे का आकलन करने के बाद पाया कि गाँधी परिवार को किसी तरह का सीधा खतरा नहीं है। बता दें कि राजीव गाँधी की 1991 में हत्‍या के बाद फैसला किया गया था कि पूर्व प्रधानमंत्रियों को भी एसपीजी सुरक्षा प्रदान की जाएगी। यहाँ यह भी जानना जरुरी है कि, पूर्व प्रधानमंत्रियों के सुरक्षा इंतजामों की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और जरूरत के मुताबिक उसे घटाया जाता है। इसी साल अगस्‍त में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी एसपीजी सुरक्षा भी हटा ली गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, एसपीजी सुरक्षा हटाने के साथ ही प्रियंका गाँधी को नोटिस भेजकर उनके बंगले को लेकर भी सवाल पूछा गया था। इस पर उन्‍होंने कहा था कि उन्‍हें बंगला छोड़ने में कोई दिक्‍कत नहीं है। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कॉन्ग्रेस की कार्यकारी अध्‍यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गाँधी और महासचिव प्रियंका गाँधी को एसपीजी सुरक्षा दी जाती है।

महाराष्ट्र की स्थिति पर बोले संजय राउत- अगर राष्ट्रपति शासन लगा तो ये जनादेश का अपमान होगा

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम को आए 2 हफ्तों से भी अधिक हो चुके हैं, लेकिन राज्य में सरकार के गठन को लेकर अभी कोई समझौता नहीं हुआ है। ऐसे में अगर आज भी महाराष्ट्र में कोई समीकरण सरकार बनाने की घोषणा नहीं करता तो वहाँ के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ेगा, क्योंकि आज बीते विधानसभा कार्यकाल का आखिरी दिन हैं।

ताजा रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र की राजनीति की बदलती आबो-हवा पर राज्यपाल लगातार नजर बनाए हुए हैं और शिवसेना के संजय राउत ने भी इसपर अपना बयान दे दिया है। उन्होनें कहा है कि अगर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगता है तो यह जनादेश का अपमान होगा। महाराष्ट्र न तो झुक रहा है और न दिल्ली के सामने कभी झुकेगा।

बता दें इससे पहले भी संजय राउत अपनी पार्टी की ओर से साफ कर चुके हैं कि वे राज्यपाल से मुलाकात नहीं करेंगे और केवल उनके अगले निर्णय तक का इंतजार करेंगे। उनका कहना है कि भाजपा जानबूझकर सरकार के गठन में देरी करवा रही हैं, क्योंकि वह राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहती हैं।

वहीं कॉन्ग्रेस भी इस बीच शिवसेना की तरह इल्जाम लगा रही है कि उनके विधायकों 50 करोड़ रुपए तक की पेशकश करके तोड़ने का प्रयास चल रहा हैं। जिस कारण वे सभी विधायकों को जयपुर होटल में शिफ्ट कर रहे हैं। जबकि भाजपा इन इल्जामों को खारिज कर रही है।

उधर, उद्धव से मिलने पहुँचे नितिन गडकरी ने शिवसेना के आरोपों पर साफ किया है कि उनकी ओर से विधायकों की खरीदद फरोख्त का कोई सवाल नहीं है, लेकिन अगर भाजपा और शिवसेना के मध्यस्थता की जरूरत पड़ी तो वे उसे करने के लिए तैयार हैं। इस दौरान गडकरी ने शिवसेना के 50-50 एजेंडे वाली बात पर भी इंकार किया और कहा कि ऐसा कोई वादा नहीं हुआ था।

इससे पहले बता दें गुरुवार को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से महाराष्ट्र भाजपा के प्रतिधिमंडल ने मुलाकात की थी। जिसमें भाजपा प्रदेशाध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने महाराष्ट्र की राजनीति पर बात करते हुए कहा था कि जनता ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत दिया है। फिर भी सरकार बनाने में देर हो रही है, अब तक सरकार बन जानी चाहिए। उन्होंने बताया था कि इसके लिए वे राज्य में कानूनी विकल्पों और राजनीतिक स्थिति पर चर्चा करने के लिए राज्यपाल से मिले थे। लेकिन उनकी पार्टी के आलाकमान से चर्चा करके ही आगे की रणनीति तय होगी।

राष्ट्रवाद एक ‘जहर’ है जो वैयक्तिक अधिकारों का हनन करने से नहीं हिचकिचाता: हामिद अंसारी

देश के पूर्व उप राष्ट्रपति और कॉन्ग्रेस नेता हामिद अंसारी ने चंडीगढ़ में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रवाद को वैचारिक जहर बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद एक ऐसा ‘वैचारिक जहर’ है, जो वैयक्तिक अधिकारों का हनन करने से नहीं हिचकिचाता। अंसारी ने कहा कि आजकल ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ के बीच अक्सर भ्रम देखने को मिलता है, लेकिन उनके अर्थ और विषय वस्तु बिल्कुल अलग-अलग हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया भर के लोग धार्मिकता और उग्र राष्ट्रवाद, इन दो महामारियों का शिकार बने हैं। ये महामारी लोगों के व्यवहार को प्रभावित करता है। अंसारी ने सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के 550 वें प्रकाश पर्व के अवसर पर आयोजित सम्मेलन में अपने संबोधन में कहा कि धार्मिक आस्थाओं के संस्थापकों के अनुयायियों ने उनकी शिक्षाओं का स्वरूप बिगाड़ दिया और धर्म को कमजोर या भ्रष्ट किया।

अंसारी ने कहा कि गुरु नानक, जिनकी 550 वीं जयंती मनाई जा रही है, उन्होंने सभी इंसानों के बीच भाईचारे की वकालत करने के साथ-साथ दलितों के उद्धार की वकालत की थी। उन्होंने आज की शब्दावली में उपयोग में लाए जाने वाले ‘अंतर-धार्मिक संवाद’ की हिमायत की थी।

इस दौरान अंसारी ने यह भी कहा कि दशकों पहले रबींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद को एक बड़ी बुराई बताया था। वह खुद  ‘राष्ट्र की पूजा’ की खिलाफ करते थे। उनका कहना है कि टैगोर ने इसे बेहोश करने की सर्वाधिक प्रभावी दवा बताया था, जिसका आविष्कार मनुष्यों ने ही किया है। वहीं अंसारी ने देशभक्ति को सैन्य और सांस्कृतिक दोनों तरफ से रक्षात्मक बताया। उन्होंने कहा कि महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन ने इसे एक ‘बाल रोग’ कहा था।

हामिद अंसारी ने कहा कि यह उत्कृष्ट भावनाओं को प्रेरित करती है लेकिन जब यह सिर चढ़ कर बोलेगी तो ऐसी स्थिति में यह उन मूल्यों को कुचल डालेगी, जिसकी रक्षा देश करना चाहता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद और देशप्रेम के बीच में भ्रम की ऐसी स्थिति पैदा हो रही है कि यदि इसे इसे छूट मिलती रही तो इसके परिणाम विस्फोटक होंगे।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद का मतलब है कि खुद की पहचान एक राष्ट्र के रूप में करना, उसे अच्छाई और बुराई, सही या गलत से परे रखना। इसके साथ ही वैयक्तिक फैसलों को निलंबित करना और अपने हितों को आगे बढ़ाने वालों को छोड़ कर दूसरों के कर्तव्य को मान्यता नहीं देना।

उन्होंने कहा, ‘‘अक्सर ही इसे देशभक्ति मान लिया जाता है और दोनों को एक दूसरे की जगह इस्तेमाल में लाया जाता है। लेकिन दोनों ही अस्थिर एवं विस्फोटक विषय-वस्तु वाले शब्द हैं तथा इनका सावधानी के साथ इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है। क्योंकि उनके अर्थ और विषय-वस्तु अलग-अलग हैं।’’ अंसारी ने कहा कि मानवता की रक्षा तभी की जा सकती है जब इन दोनों महामारियों से बचा जाए और इनकी जगह सामूहिक अनुभव एवं नैतिक दिशानिर्देश के तहत मानव व्यवहार को तरजीह दी जाए।

वकीलों ने अदालत के लॉकअप में लगा दी आग, 100 बंदियों की जा सकती थी जान

दिल्ली में हुए दिल्ली पुलिस और तीस हजारी कोर्ट के वकीलों के बीच के संघर्ष को लेकर रोज़ नए और स्तब्ध कर देने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। हमने पहले ही देखा कि कैसे हथियारबंद पुलिस के चोटी के अफसरों को गत शनिवार (2 नवंबर, 2019 को) निहत्थे वकीलों ने बेख़ौफ़ होकर पीटा- जिन्हें शायद पता था कि हथियारों से लैस होने के बावजूद पुलिस वाले उन्हें निकाल कर आत्म रक्षा के लिए भी इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं करेंगे, और जाहिर तौर पर उन्हें क़ानूनी कार्रवाई का भी डर नहीं था।

और अब खबर आ रही है कि उस दिन वकील केवल एडिशनल डीसीपी (नॉर्थ) हरिंदर सिंह, एसीपी सिविल लाइन्स राम मेहेर सिंह और डीसीपी नॉर्थ मोनिका भरद्वाज समेत पुलिस वालों के साथ हाथापाई करने और पुलिस व आम आदमी की गाड़ियाँ जलाने भर से नहीं रुके थे, बल्कि उन्होंने अदालत के परिसर में सुनवाई के लिए आए कैदियों को ठहराने के लिए बने लॉक अप को भी आग के हवाले कर दिया था। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट में किए गए दावे के मुताबिक वह लॉक अप भी उस समय खाली नहीं बल्कि भरा हुआ था। उसमें 100 के करीब बंदी थे- जिनमें से कई दंगाई वकीलों के खुद के नहीं तो किसी न किसी वकील के तो मुवक्किल रहे ही होंगे, जिनकी फीस से उन वकीलों की रोजी-रोटी चल रही होगी।

पहले दंगाईयों के हाथों मार खाने वाले, और उसके बाद घटना के अगले दिन यानि 3 नवंबर, 2019 को दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर स्थानांतरित किए गए एडिशनल डीसीपी (नॉर्थ) हरिंदर सिंह ने टाइम्स नाउ से बात करते हुए बताया कि वकीलों ने लॉकअप के चारों ओर बाकायदा पेट्रोल छिड़क कर आग लगाई थी- यानि यह कोई हादसा या अनजाने में भड़की आग नहीं थी। “उनकी नीयत लॉकअप तोड़ने की थी लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाए। हमने अंदर से बाल्टियों में पानी भर-भर के आग बुझाई। लेकिन (एक वाहन के) टैंक में विस्फोट होने से आग और धुआँ लॉकअप में भरने लगे।” उन्होंने बताया कि उस समय लॉकअप में करीब 100 बंदी थे, जो अगर पुलिस हस्तक्षेप न करती तो जान से हाथ धो बैठते।

अगर एडिशनल डीसीपी (नॉर्थ) हरिंदर सिंह की बात सच निकलती है, तो यह एक गंभीर आरोप ही नहीं है- यह इस ओर भी इंगित करता है कि यह हिंसा उतना सीधे ईगो में आकर हाथापाई और उसके बाद पुलिस व वकीलों के अपने-अपने ‘कैम्पों’ के पक्ष में उतर पड़ना भर नहीं है, जैसा दिख रहा है। यदि वकीलों ने लॉकअप को पहले तोड़ने की कोशिश की और उसमें असफ़ल रहने पर आगजनी का सहारा लिया, जैसा कि एडिशनल डीसीपी (नॉर्थ) का दावा है, तो यह निष्पक्ष और बेहद गंभीर जाँच का विषय होना चाहिए कि यह जेल तोड़ने का प्रयास महज़ गुस्से की अभिव्यक्ति था, या इसके पीछे कोई ठंडे दिमाग से बनाई गई योजना थी।

महाराष्ट्र: कॉन्ग्रेस को सता रहा है विधायकों के टूटने के डर, 30 विधायकों को भेजा जयपुर

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर सियासती गतिरोध अभी भी जारी है। इस बीच ख़बर आ रही है कॉन्ग्रेस ने अपने विधायकों को मुंबई से जयपुर भेज दिया है। सभी कॉन्ग्रेस विधायकों को जयपुर के एक रिज़ॉर्ट में ठहराया गया है। सभी विधायकों को शुक्रवार (8 नवंबर) की सुबह मुंबई से जयपुर रवाना किया गया था। न्यूज़-18 ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि कॉन्ग्रेस को सूचना मिली थी कि भाजपा नई सरकार के गठन के लिए उसके कुछ विधायकों के सम्पर्क में है और उन्हें तोड़ने का प्रयास कर रही है। इसलिए कॉन्ग्रेस ने अपने विधायकों को राज्य से बाहर भेजने का निर्णय लिया।

दरअसल, महाराष्ट्र में सरकार बनाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। ख़बर है कि कॉन्ग्रेस ने अपने 44 में से 30 विधायकों को जयपुर भेज दिया है। वहीं, बाक़ी विधायकों को शाम तक जयपुर रवाना होने के लिए कह दिया जाएगा।

कॉन्ग्रेस अपने विधायकों की ख़रीद-फरोख्त को बचाने के लिए बेहद चिंतित नजर आ रही है। इस बीच कॉन्ग्रेस नेता और राज्यसभा सदस्य हुसैन दलवई का बयान आया है। उन्होंने कहा, “सभी कॉन्ग्रेस विधायक एकजुट हैं। कोई भी विधायक पार्टी से अलग नहीं होगा। पार्टी हाईकमान के आदेश का विधायक पालन करेंगे। हम बीजेपी को राज्य में सरकार बनाने नहीं देंगे। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) हमारी सहयोगी है, वे हमारे साथ हैं। महाराष्ट्र को बचाने के लिए लोगों ने हमें वोट दिया है।”

ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस नेता नितिन ने अपने एक बयान में कहा है, “उन्हें ऐसी खबरें मिली हैं कि कुछ कॉन्ग्रेसी विधायकों को भाजपा की तरफ से पैसों की पेशकश हुई है। कल हमारे एक या दो विधायकों को 25 करोड़ रुपए का ऑफर मिला। हम विधायकों की खरीद-फरोख्त की इस परिपाटी को रोकने का पूरा प्रयास करेंगे, जो कि कर्नाटक में शुरु हुई है।”

बता दें कि भाजपा और शिवसेना के बीच अभी तक सरकार गठन को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। महाराष्ट्र में पिछली सरकार का कार्यकाल 9 नवंबर को खत्म हो रहा है। ऐसे में ये अंतिम 24 घंटे काफी अहम हैं। वहीं शिवसेना नेता संजय राउत ने अपने एक बयान में भाजपा पर राज्य को राष्ट्रपति शासन की ओर ले जाने का आरोप लगाया है। संजय राउत ने अपने बयान में कहा कि ‘बीजेपी महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहती है। यह जनादेश का अपमान है।’

ग़ौरतलब है कि महाराष्ट्र की 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 105 और उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली हैं। कॉन्ग्रेस ने 44 और उसकी सहयोगी एनसीपी ने 54 सीटों पर जीत हासिल की है। ऐसे में शिवसेना के साथ यदि कॉन्ग्रेस और एनसीपी आ जाते हैं तो सरकार बन सकती है। लेकिन, पवार ने नतीजों के तुरंत बाद कह दिया था कि उनकी पार्टी विपक्ष में बैठेगी। उन्होंने कहा था कि जनादेश भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने के लिए मिला है। इसके बाद से एनसीपी लगातार अपने इस रुख को दोहरा रही है।

‘क्या पूरे J&K में दंगे होने का इंतज़ार करना चाहिए था’- सिब्बल के बेतुके सवाल पर SC ने लताड़ा

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (7 नवंबर) को कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 के निरस्त किए जाने के बाद विभिन्न प्रतिबंधों को लागू करने के विरोध में सवाल किया और पूछा कि क्या अधिकारियों को ‘दंगे होने का इंतज़ार’ करना चाहिए था?

जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की तीन सदस्यीय पीठ ने आज़ाद के वकील, पार्टी सहयोगी और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से सवाल किया, “इस तरह के मामले में, ऐसी आशंका क्यों नहीं हो सकती कि पूरा क्षेत्र या स्थान अशांत हो सकता है?” इस पर सिब्बल ने तर्क दिया कि अधिकारियों द्वारा संचार और परिवहन व्यवस्था समेत अनेक पाबंदियाँ लगाना अधिकारियों का बेजा इस्तेमाल था। बता दें कि कपिल सिब्बल कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद की याचिका पर उनकी तरफ से बहस कर रहे थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल का तर्क था कि सार्वजनिक शांति को किसी प्रकार के ख़तरे की आशंका के बारे में उचित सामग्री के बगैर अधिकारी इस तरह की पाबंदियाँ नहीं लगा सकते।

उन्होंने पीठ के समक्ष तर्क दिया, कि सरकार यह कैसे मान सकती है कि सारी आबादी उसके ख़िलाफ़ होगी और इससे क़ानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होगी। 

सिब्बल ने कहा,

“घाटी के 10 ज़िलों में सात मिलियन लोगों को पंगु बनाना जरूरी था? उन्हें ऐसा करने के समर्थन में तथ्य सामने रखने होंगे। यहाँ हम जम्मू और कश्मीर के लोगों के अधिकारों की बात नहीं बल्कि भारत के लोगों के अधिकारों के बारे में बात कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि अधिकारियों को क़ानून और व्यवस्था की समस्या के बारे में आशंका हो सकती है, लेकिन उन्हें अपनी आशंकाओं को वापस लेने के लिए सामग्री की आवश्यकता होती है।

इस पर पीठ ने उनसे पूछा, “क्या उन्हें दंगे होने का इंतज़ार करना चाहिए था?”

इसका जवाब देते हुए, सिब्बल ने कहा, “वे कैसे मान सकते हैं कि दंगे होंगे। यह दर्शाता है कि उनके दिमाग में धारणा है और उनके पास कोई तथ्य नहीं है। ऐसा कहने के लिए उनके पास ख़ुफ़िया इनपुट हो सकते हैं।” उन्होने कहा कि यदि ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न होती तो अथॉरिटी वहाँ धारा-144 लगा सकती थी। राज्य का दायित्व न सिर्फ़ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है बल्कि ज़रुरतमंदों की रक्षा करना भी है। 

इसके आगे उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में क्या हो रहा है, भारत की जनता को यह जानने का अधिकार है। इस मामले पर अगली सुनवाई 14 नवंबर को होगी।

सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण के समय कहाँ और क्यों पिछड़ गया भारत का मुस्लिम?

हाल ही में आई एक खबर से पता चला कि मुस्लिमों में शिक्षा को लेकर बहुत ज़्यादा पिछड़ापन है और उनकी हालत अनुसूचित जातियों से भी ख़राब है। उसी प्रकार उनकी सामाजिक स्थिति भी बिगड़ी हुई है। आखिर यह किस तरह से सम्भव हो कि मुस्लिम अपनी वर्तमान स्थिति से ऊपर उठकर समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बन सके। सवाल यह है कि अन्य लोगों में और मुस्लिमों के रहन-सहन, सामाजिक स्तर, जीवन शैली में आज भी यह अंतराल आखिर क्यों बरक़रार है? आज भी एक पढ़े-लिखे मुस्लिम के लिए भी जिहाद और शरीयत से बाहर आना इतना कठिन क्यों है?

हालात ये हैं कि मनुवाद और पितृसत्ता पर सवाल उठाने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि हिन्दू धर्म अपने अंदर मौजूद गैर जरूरी चीजों को आत्मचिंतन के द्वारा स्वीकार करता रहा और समय की जरूरत के हिसाब से उन्हें त्यागता भी रहा, जबकि दूसरी ओर इस्लाम आज भी अपनी चरमपंथी विचारधारा और कट्टरता पर चल रहा है।

भारत का गौरवशाली इतिहास और इस्लाम

अपने देश के इतिहास पर नजर डालते समय हमें एक निश्चित कर्म में हो रही घटनाएँ नजर आती हैं। जैसे- मौर्य वंश, गुप्त वंश, चोल वंश आदि का महान और गौरवशाली साम्राज्य देखने को मिलता है। ये गौरवशाली सिर्फ अपनी सांस्कृतिक विरासत के कारण ही नहीं बल्कि अपनी धार्मिक उपलब्धियों के कारण भी थे।

इस समय भारत में धार्मिक ग्रंथों से लेकर शैव, वैष्णव और बौद्ध धर्मों का अनुसरण इतिहास की प्रत्येक घटना में स्पष्ट देखने को मिलता है। लेकिन इस उन्नत संस्कृति के बाद सातवीं सदी में उदय हुआ कट्टरता के एक नए युग का। एक तरह से इस एकेश्वरवादी कट्टरता का उदय तत्कालीन अन्य धर्मों के अनुसरण में होने वाली खामियों का नतीजा था।

सन 711 ईसवी में मुहम्मद बिन कासिम और सिंध क्षेत्र के हिन्दू राजा दाहिर के युद्ध के बाद ही भारत देश में इस्लाम का आगमन हुआ था। इस्लाम के उदय से ही देखा गया कि यह धर्म राजनीतिक और सांस्कृतिक तालमेल से बनाया गया एक ऐसा तंत्र था, जो विश्व पर किसी भी सूरत में राज करने का मकसद बनाकर स्थापित किया गया था। इसके इतिहास से लेकर वर्तमान तक में हिंसा, नरसंहार, और रक्तपात प्रवृतियाँ समाहित थीं और हैं। और इन सभी आधारों पर यह आगे बढ़ते गए।

ये जिस दिशा में भी बढ़ते गए वहीं जबरन धर्म परिवर्तन किया गया, व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर दिया गया। भारत जैसे देश में महिलाओं के व्यापार से लेकर बलात्कार जैसी क्रूर मानसिकताओं का भी बीजारोपण हुआ। इसका उदाहरण चचनामा में देखने को मिलता है – चचनामा में जिक्र मिलता है कि जब मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर को हराया तो उसके बाद उनकी दोनों बेटियों को यौनदासियों के रूप में खलीफा को तोहफा के तौर पर भेज दिया। हालाँकि, यही मोहम्मद बिन कासिम की मौत की वजह भी बना।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, हुआ ये कि मोहम्मद बिन क़ासिम द्वारा जब राजा दाहिर सेन की बेटियों को तोहफे के तौर पर खलीफ़ा के पास भेजा गया और वो खलीफ़ा के सामने पेश की गईं, तो उन्होंने बिन क़ासिम से बदला लेने के लिए एक झूठ कहा। उन्होंने खलीफ़ा से कहा कि क़ासिम पहले ही उनके साथ ‘हमबिस्तरी’ कर चुका है। ये सुनकर खलीफ़ा ने अपमानित महसूस किया और उसने बिन क़ासिम को बैल की चमड़ी में लपेटकर वापस दमिश्क़ मँगवाया। बताया जाता है कि उसी चमड़ी में दम घुटकर क़ासिम की मौत हो गई। भले ही बाद में राजा दाहिर सेन की बेटियों का झूठ सामने आने पर उन्हें दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया।

इसके बाद भारतभूमि कई वर्षों तक मुस्लिमों द्वारा धर्म परिवर्तन किए जाने से लेकर हर तरह की बर्बरता और जुल्म की गवाह बनी। मुस्लिमों ने भारत पर हर तरह से शासन किया और साथ ही अपनी तादाद को बढ़ाने और इस्लाम धर्म की बुनियाद मजबूत करने के लिए हर तरह की क्रूरता की। धर्म परिवर्तन ना करने वाले ‘काफ़िर’ और ‘बुतपरस्तों’ को जिन्दा जलाना, सर कलम करना, उनकी बाजारों में बोलियाँ लगाना और अन्य देशों में दास बनाकर बेच देना, ये सब मुस्लिम आक्रांताओं के शासन के दौरान हिन्दुओं के साथ किया जाता रहा।

भारत में पुनर्जागरण: सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन

19वीं सदी में भारतीय समाज ईस्ट इंडिया कम्पनी के आचरण और शासन नीति के विरुद्ध चिंतनशील हो उठा। यह वो समय था जब भारतवासी पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के सम्पर्क में आए और उन्होंने पाश्चात्य संस्कृति के साथ अपने गौरवशाली इतिहास की तुलना की। यह देखकर देश का सुधारवादी और प्रबुद्ध वर्ग सक्रिय हो गया और उसने भारतीय समाज को पुनर्जीवन प्रदान करने का संकल्प लिया।

लेकिन समाज सुधार की इस पहल में सबसे आगे सिर्फ हिन्दू ही थे और मुस्लिम तब भी अपने धर्म के अंदर निहित कुरीतियों को स्वीकार नहीं कर पाए थे। उदाहरण के तौर पर यदि देखें तो ब्रह्म समाज हिन्दू धर्म से सम्बन्धित प्रथम धर्म-सुधार आन्दोलन था। इसके संस्थापक राजा राममोहन राय थे, जिन्होंने 20 अगस्त, 1828 ई. में इसकी स्थापना की थी। इसका मुख्य उद्देश्य तत्कालीन हिन्दू समाज में व्याप्त बुराईयों, जैसे- सती प्रथा, बहुविवाह, वेश्यागमन, जातिवाद, अस्पृश्यता आदि को समाप्त करना था।

आत्मचिंतन की गैरमौजूदगी का दूसरा नाम है इस्लाम

तुलना करते हुए यदि देखें तो मुस्लिमों ने अपने धर्म से सम्बंधित किसी भी सुधारवादी कदम उठाने, स्वीकार करने और उसके उन्मूलन की दिशा में कोई कदम उठाने में करीब और पचास साल लगा दिए। यही वजह है कि एक ओर आज के समय में देश में अन्य धर्म और सम्प्रदाय आधुनिक शिक्षा प्रणाली और विज्ञान की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं समुदाय विशेष अभी भी शिक्षा की मदरसा नीति पर ही कायम हैं। आज भी मुस्लिमों का बहुत ही सीमित वर्ग है जो शिक्षा के आधुनिक स्वरुप से जुड़ा हुआ है और वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित शिक्षा के महत्त्व को समझता है।

मुस्लिम धर्म सुधार आन्दोलन में अहमदिया आन्दोलन की शुरुआत वर्ष 1889 में की गई थी। इस बीच यदि किसी मुस्लिम ने इस्लाम में निहित बुराइयों पर बात भी की तो उसका बहिष्कार किया गया और उसे गैर-इस्लामी समझ लिया गया।

अलीगढ़ आन्दोलन के नायक सर सैयद अहमद खान एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने सबसे पहले मुस्लिमों को सुधार की ओर बढ़ने की राय दी थी। इसके बदले में सर सैयद अहमद खान को मुस्लिम समुदाय द्वारा हर तरह कि धार्मिक कट्टरता का सामना करना पड़ा था, उनके खिलाफ फतवे भी जारी किए गए और आखिर में सैयद अहमद खान के अंदर का सच्चा मुस्लिम भी अपनी पूरी कट्टरता के साथ सामने आता गया।

लेकिन एक शिक्षित मुस्लिम होने के कारण सैयद अहमद खान के पास अपना उल्लू सीधा करने के कई विकल्प मौजूद थे, जैसे 1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नजरों में मुस्लिमों की छवि निखारने के लिए अंग्रेजों को शरण दी, क्रांति को हिन्दुओं के द्वारा की गई ‘हरामजदगी‘ बताया।

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इसके बदले सर सैयद अहमद खान को ब्रिटिश सरकार द्वारा जीवन पर्यन्त कई प्रकार के सम्मान और पद दिए गए। फिर भी देश का ‘लिबरल गिरोह’ वीर सावरकर के अंग्रेजों को लिखे गए पत्रों का तो जिक्र करता है, लेकिन ‘सर’ सैयद अहमद खान के वीरता के ‘कारनामों’ पर प्रकाश डालने से बचता रहता है। सवाल यह भी रहा कि उस समय मुस्लिमों के बीच कुछ ही गिने चुने चेहरे सम्मानित और शिक्षित माने जाते थे लेकिन वो भी अपनी धार्मिक कट्टरता से दूर नहीं रह पाए, तो फिर उस समय के अन्य लोगों से यह आशा आखिर किस प्रकार की जा सकती है?

यही प्रश्न आज भी इसी तरह से दिमाग में गूंजता है, जब सलमान खुर्शीद जैसे कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और AIMIM के नेता ओवैशी जैसे शिक्षित लोग महिला सशक्तिकरण के लिए तीन तलाक जैसे संवेदनशील मुद्दे को मज़हबी मामला बताते नजर आते हैं।

पूरा विश्व आज प्रगति के पथ पर अग्रसर है, वहीं मुस्लिम राष्ट्र अभी भी अपनी शरीयत के बंधनों में बंधे नजर आते हैं। मुस्लिम आज भी मदरसे की शिक्षा और दीनी तालीम से बाहर जाना कुफ्र समझते हैं। मुस्लिमों का शिक्षित और राजनीतिक वर्ग खुद हर प्रकार के ऐशो-आराम से घिरा है लेकिन अपने अनुयाइयों को वो आज भी जिहाद की शिक्षा को ही सबसे ऊपर बताते हैं।

इसका सबसे सटीक उदाहरण जम्मू कश्मीर में पत्थरबाजों को समर्थन देने वाले नेताओं के घर हैं, जिनके अपने बच्चे तो विदेशी विश्वविद्यालयों से अच्छी शिक्षा ले रहे हैं लेकिन वो कश्मीर की आवाम को हमेशा जिहाद की प्रेरणा ही देते रहे हैं।

देश की दूसरी बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा आज भी कबायली प्रवृतियों का अनुसरण करते नजर आता है। ‘अल्पसंख्यक’ इलाकों में अशिक्षा, भुखमरी, दरिद्रता और तमाम प्रकार की गरीबी आज भी उसी तरह से नजर आती है, जिस हाल में बहादुर शाह जफ़र छोड़कर गए थे। इस सबके पीछे एक हद तक हिन्दू और मुस्लिम समाज सुधार के वक़्त के करीब पचास वर्ष का अंतराल भी जिम्मेदार है। लेकिन उससे भी ज्यादा जिम्मेदार है मज़हबी कट्टरता!

अगर यह मजहब अब भी अपनी ‘किताब’ और शरीयत से बाहर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है तो अभी अगले 500 वर्ष भी वो जिहाद और मदरसा शिक्षा को सर्वोपरि मानते रहेंगे।

अयोध्या कांड: रथी आडवाणी, सारथी मोदी… और राम मंदिर की वह लहर जिसने खोद दी ‘सेक्युलरों’ की कब्र

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है,

रथ भावे आमी देव, पथ भावे आमी, मूर्ति भावे आमी, देव हॅंसे अंतरयामी।

यानी, रथ, रास्ता और मूर्ति तीनों सोचते हैं कि वही देवता हैं और उनके ही दर्शन को लोग आ रहे हैं। तीनों के अज्ञान को देख भगवान खुद हँसते रहते हैं।

कुछ ऐसी ही थी 29 साल पहले 1990 में निकली वह रथ यात्रा। 25 सितंबर को सोमनाथ से उसकी शुरुआत हुई। 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुॅंच यात्रा खत्म होनी थी। धर्मनिरपेक्षता की राजनीतिक पैंतरेबाजी ने बीच रास्ते में ही उसके पहिए रोक दिए। लेकिन, धर्मनिरपेक्षता के कथित झंडाबरदार उस राम लहर को नहीं रोक पाए जो इस रथ ने पूरे देश में पैदा किया। राम मंदिर की ऐसी लौ जगाई की रथ जिस रास्ते से गुजरता वहाँ की मिट्टी लोग सिर पर लगा लेते।

इस रथ यात्रा के रथी थे आज की भाजपा के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी। सारथी थे, वही नरेंद्र मोदी जो आज देश के प्रधानमंत्री हैं। उस समय वे गुजरात भाजपा के संगठन महामंत्री हुआ करते थे। असल में, राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का अवतरण इसी रथ यात्रा के जरिए हुआ था।

हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में मोदी को इस यात्रा का रणनीतिकार और शिल्पी बताया है। यात्रा के मार्ग और कार्यक्रम को लेकर औपचारिक तौर पर सबसे पहले जानकारी भी मोदी ने ही 13 सितंबर 1990 को दी थी। कहा जाता है कि इस यात्रा की हर सूचना जिस एक शख्स के पास होती थी वे मोदी ही थे। कुछ जानकारियाँ तो आडवाणी को भी बाद में मिलती थी। ‘नरेंद्र मोदी: एक शख्सियत, एक दौर’ में नीलांजन मुखोपाध्याय ने मोदी के हवाले से लिखा है, “इस अनुभव से मुझे मेरी प्रबंधन क्षमता को विकसित करने का अवसर मिला।”

जून 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में भाजपा का अधिवेशन हुआ था और राम मंदिर पहली बार पार्टी के एजेंडे में आया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रस्ताव पारित कर अयोध्या में राम मंदिर बनाने का संकल्प लिया गया। इस दिशा में सोमनाथ से अयोध्या तक की आडवाणी की राम रथ यात्रा पहली बड़ी पहल थी।

यात्रा की रणनीति तैयार करने में हर छोटी चीज का ध्यान रखा गया। शुरुआत के लिए उस सोमनाथ को चुना गया, जहाँ के पवित्र शिव मंदिर को इस्लामी आक्रांताओं ने बार-बार तोड़ा था। शुरुआत 25 सितंबर को हुई, जो एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय का जन्मदिन है।

यह रथ यात्रा बताती है कि सेक्यूलर जमात पर किस कदर समुदाय विशेष का मसीहा बनने का भूत सवार था। ‘युद्ध में अयोध्या’ के मुताबिक 19 अक्टूबर 1990 को इंडियन एक्सप्रेस के सुंदरनगर गेस्ट हाउस में एक बैठक हुई। बैठक में शामिल होने के लिए आडवाणी रथ यात्रा धनबाद में छोड़कर आए थे। बैठक प्रधानमंत्री वीपी सिंह की पहल पर हुई थी। आडवाणी ने कहा कि वे सरकार गिराना नहीं चाहते। यदि सरकार अध्यादेश लाकर विवादित ढाँचे के आसपास की जमीन विहिप या उसके प्रतिनिधि को सौंपती है तो हम उसका समर्थन करेंगे।

लेकिन, समुदाय विशेष के दबाव में वीपी सिंह पहले इससे पीछे हट गए। उन्होंने कहा कि न सिर्फ विवादित ढाँचा, बल्कि उसके आसपास की जमीन भी सरकार के कब्जे में होनी चाहिए। फिर बैठकों का सिलसिला चला और 20 अक्टूबर की रात अध्यादेश लागू हुआ। इसके मुताबिक,

  • विवादित ढाँचे और उसके आसपास की जमीन का सरकार अधिग्रहण करेगी।
  • विवादित ढाँचे और उसके चारों तरफ 30 फीट जमीन छोड़कर अधिग्रहित जमीन रामजन्मभूमि न्यास को सौंपी जाएगी।
  • वहाँ कभी मंदिर था या नहीं, इसे सुलझाने का काम संविधान की धारा 143(ए) के तहत सुप्रीम कोर्ट को सौंपा जाएगा।

ज्यादातर तबकों ने इसका स्वागत किया। बाबरी कमिटी इसके विरोध में थी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी। उन्होंने धमकी दी कि वे इस अध्यादेश को यूपी में लागू नहीं होने देंगे। अचानक 22 अक्टूबर को अध्यादेश वापस ले लिया गया और 23 अक्टूबर की सुबह बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी की रथ यात्रा रोक दी गई। उन्हें समस्तीपुर के सर्किट हाउस से गिरफ्तार कर सरकारी जहाज से दुमका ले जाया गया। फिर सड़क रास्ते से मंसानझोर, जहाँ डाकबंगले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उन्हें कैद कर लिया गया।

कहा जाता है कि वीपी सिंह नहीं चाहते थे कि मुलायम अकेले मजहब विशेष के मसीहा बने, इसलिए उनके निर्देश पर लालू यादव ने बिहार में ही आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। हेमंत शर्मा ने ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है- वीपी सिंह ने एक तीर से दो शिकार किए। आडवाणी को गिरफ्तार करवा मुलायम को पटखनी दी।

वीपी सिंह के अयोध्या भूमि अधिग्रहण आदेश का विरोध कर मुलायम सिंह यादव धर्मनिरपेक्षता के इकलौते झंडाबरदार बने थे। वीपी सिंह ने इसकी हवा निकालने की तरकीब ढूँढ़ी। पहले आडवाणी के रथ को देवरिया में रोका जाना जाना था। मुलायम सिंह रथ रोकने वाले नेता बनते। वीपी सिंह को यह मंजूर नहीं था। अरुण नेहरू ने बताया कि प्रधानमंत्री ने लालू यादव को संदेश भेजा कि वे आडवाणी को बिहार में ही रोक लें ताकि धर्मनिरपेक्षता का सारा नेतृत्व मुलायम सिंह यादव के पास ही न रहे।

आडवाणी की वो रथ यात्रा भले मंजिल तक नहीं पहुँच पाई, लेकिन, इसने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पैंतरेबाजी को बेनकाब कर दिया। इसी सनक में मुलायम ने 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाई और ‘मुल्ला मुलायम’ का खिताब हासिल किया। इसके तीन दिन बाद दो नवंबर को कोठारी बंधु को अयोध्या में छलनी कर दिया गया। यह सब केवल उस होड़ के कारण हुआ ​जो वीपी सिंह, मुलायम और लालू यादव के बीच मची थी। खुद को मजहब विशेष का सबसे बड़ा खलीफा साबित करने की होड़।

राम मंदिर को राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना और संकल्प का हिस्सा बता फूँकी गई उस रथ यात्रा के बिगुल को याद करने के लिए 8 नवंबर से बेहतर दिन नहीं हो सकता। आज आडवाणी 92 साल के हो गए हैं। जैसा हेमंत शर्मा ने अपनी किताब में लिखा है, ‘उनकी यात्रा ने राम मंदिर आंदोलन की दिशा ही बदल दी। इस यात्रा ने न केवल केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिरा दी, बल्कि यूपी में कॉन्ग्रेस की जड़ें हमेशा के लिए खोद दी।’

इस यात्रा ने बता दिया कि बहुसंख्यक हिंदुओं को गाली देकर, कथित अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण कर सत्ता हथियाने के दिन लद गए हैं। इस यात्रा ने सत्ता में भाजपा को स्थापित करने के बीज बोए। आज उसकी जड़ें इतनी फैल गई हैं कि जो नेहरू कभी राम को बेदखल करने पर अमादा थे, आज उनकी ही राजनीति के वारिस मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा को मजबूर हैं। बाकायदा मुनादी की जाती है उनके जनेऊधारी हिन्दू होने की।

गेस्ट हाउस कांड: मायावती ने मुलायम के खिलाफ केस लिया वापस, आजम, शिवपाल… चलता रहेगा मुकदमा

साल 1995 के चर्चिच लखनऊ गेस्ट हाउस कांड मामले में बसपा सुप्रीमो मायावती ने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ केस वापस ले लिया है। गेस्ट हाउस कांड के बाद से ही सपा और बसपा एक दूसरे के धुर विरोधी हो गए थे। लेकिन आपसी मतभेदों को भुलाकर पिछले लोकसभा चुनाव में दोनों ही दलों ने गठबंधन किया था और एक साथ चुनाव लड़ा था। इसके बाद आखिरकार मायावती ने मुलायम सिंह के खिलाफ केस वापस ले लिया है। 

जानकारी के मुताबिक मायावती ने केस वापसी के लिए बीते फरवरी में ही शपथ पत्र दिया था। सपा-बसपा का गठबंधन के दौरान ही गेस्ट हाउस कांड से केस वापस लेने की पथकथा लिखी गई थी। बताया जा रहा है कि जब लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनज़र जनवरी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन हुआ था तो अखिलेश यादव ने मायावती से मुलायम सिंह यादव के खिलाफ गेस्ट हाउस कांड में मुकदमा वापस लेने का आग्रह किया था।

जिसके बाद फरवरी में केस वापस लेने का शपथ पत्र दे दिया गया, लेकिन इसे गोपनीय रखा गया। मायावती ने इसकी जानकारी दो दिन पहले अपने नेताओं को दी। बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि उनके पार्टी प्रमुख मायावती ने उच्चतम न्यायालय में मामले को वापस लेने के लिए एक आवेदन दिया था। हालाँकि, सतीश चंद्र ने इस पर अधिक जानकारी नहीं दी। वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि फिलहाल उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसके बारे में पता करने के बाद ही वो कुछ कहेंगे।

बता दें कि लखनऊ गेस्ट हाउस कांड मामले में मुलायम सिंह यादव, उनके भाई शिवपाल सिंह यादव, बेनी प्रसाद वर्मा और आजम खान सहित कई नेताओं के खिलाफ मायावती की ओर से हजरतगंज थाने में मुकदमा दर्ज करवाया गया था। हालाँकि, मायावती ने सिर्फ मुलायम सिंह यादव पर ही नरमी दिखाई है। मामले में दर्ज अन्य लोगों के खिलाफ केस चलता रहेगा।

उल्लेखनीय है कि बाबरी विध्वंस के बाद 1993 में सपा-बसपा ने गठबंधन कर साथ चुनाव लड़े थे। इसके बाद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और गठबंधन सरकार भी बनाई, लेकिन दो साल में ही रिश्तों में खटास आ गई। 2 जून 1995 को मायावती ने गठबंधन तोड़ने को लेकर स्टेट गेस्ट हाउस में बसपा विधायकों की बैठक बुलाई, जहाँ सपा नेताओं ने सैकड़ों समर्थकों के साथ गेस्ट हाउस पर हमला कर दिया। सपा नेताओं के हमले से बचने के लिए मायावती ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था। आरोप है कि सपा के नेताओं ने मायावती के साथ बदसलूकी भी की थी।