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10000 उपद्रवियों, 1659 अकाउंट्स पर नजर, 500 अरेस्ट: राम मंदिर फैसले से पहले UP में तैयारी

राम जन्मभूमि मामले पर अगले 10 दिनों के भीतर किसी भी दिन फ़ैसला आ सकता है। फ़ैसला आने के बाद किसी भी तरह की कोई अप्रिय घटना ना हो, इसके लिए प्रशासन कई पुख़्ता इंतज़ाम करने में जुटा हुआ है। कहीं फ्लैग मार्च, कहीं सद्भावना रैली, तो कहीं हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। केंद्र सरकार से लेकर यूपी सरकार और वहाँ का पूरा प्रशासनिक अमला हाई अलर्ट पर आ चुका है।

गुरुवार (7 नवंबर) को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग के ज़रिए सभी ज़िलों के ज़िलाधिकारियों और पुलिस सुपरिटेंडेंट के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की। इसके अलावा, उन्होंने लखनऊ में आला अधिकारियों के साथ बैठक भी की। इस बैठक में डीजीपी, मुख्य सचिव से लेकर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शामिल रहे। अयोध्या मामले पर आने वाले फ़ैसले को ध्यान में रखते हुए लखनऊ महोत्सव की तारीख जनवरी के तीसरे सप्ताह तक के लिए बढ़ा दी गई है।

नवभारत टाइम्स की ख़बर के अनुसार, यूपी के डीजीपी ओपी सिंह ने बताया कि हमारे रडार पर क़रीब 10 हज़ार लोग हैं। उन पर नजर रखी जा रही है, जिससे वो किसी भी तरह की अशांति न फैला सकें। वहीं, 500 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार कर जेल भेजा गया है। उन्होंने बताया कि फिलहाल पुलिस का काम सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी रखना है, जिसके लिए बक़ायदा एक टीम को लगाया गया है। अभी तक ऐसे क़रीब 1,659 लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर यूपी पुलिस की नज़र है, जिनसे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली पोस्ट किए जाने की संभावना है।

जानकारी के मुताबिक़, पुलिस की तरफ से सुरक्षा के मद्देनज़र एक पूर्व मंत्री समेत 10 पूर्व विधायकों को भी ज़िला छोड़ने का नोटिस दिया गया है। साथ ही यह चेतावनी दी गई है कि यदि वो फ़ैसले वाले दिन मेरठ में दिखाई दिए तो उनकी तुरंत गिरफ़्तारी होगी। हालाँकि, प्रशासन की ओर से इन 10 लोगों के नाम उजागर नहीं किए गए हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि पूर्व विधायक योगेश वर्मा और पूर्व मंत्री याकूब क़ुरैशी के अलावा ऐसे कई अन्य उपद्रवियों की पहचान की गई है, जिन पर पहले से ही संगीन धाराओं में मामले दर्ज हैं।    

इसके अलावा, कई अस्थाई जेलें भी बनाई गईं हैं। बरेली ज़ोन के शहर शाहजहाँपुर, बदायूँ, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा और बिजनौर में 4 हजार से अधिक ऐसे लोग चिन्हित किए गए हैं, जो बवाल करवा सकते हैं। इसके अलावा 90 ऐसे स्थान चिन्हित किए गए हैं, जो संवेदनशील हैं।

एडीजी अविनाश चंद्र के अनुसार, ज़ोन में सभी जगह शांति बनी रहे, इसके लिए संवेदनशील स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं और निगरानी रखने के लिए ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सभी थानों में पीस कमिटी और पुलिस मित्रों की मीटिंग की जा रही है। साथ ही हर थाना क्षेत्र में फ्लैग मार्च भी किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर भी नज़र रखी जा रही है। फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है। उनका कहना है कि अगर किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लेकर किसी भी तरह की कोई अफ़वाह फैलाई या किसी तरह की कोई विवादित टिप्पणी की तो उसे छोड़ा नहीं जाएगा, उसके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

अयोध्या मामले पर आने वाले फ़ैसले के मद्देनज़र ज़िले में 30 बम निरोधक दस्तों की तैनाती भी की गई है। साथ ही 10 नवंबर तक 150 कंपनियाँ केंद्र की तरफ से और 150 कंपनियाँ राज्य सरकार की तरफ से सुरक्षा के लिए तैनात की जाएँगी। वहीं, भारतीय रेलवे भी अयोध्या फ़ैसले को देखते पुख़्ता इंतज़ाम में जुट गया है। इसके लिए रेलवे पुलिस की तरफ से सात पेज की एडवाइज़री जारी की गई है। इस एडवाइजरी के तहत RPF के जवानों की छुट्टी रद्द कर दी गई है। रेलवे पुलिस ने देश के 78 रेलवे स्टेशनों को अति संवेदनशील माना है, जहाँ सुरक्षा के ठोस इंतज़ाम किए जा रहे हैं। इस स्टेशन्स में दिल्ली, मुंबई, महाराष्ट्र समेत यूपी के कई स्टेशन्स शामिल हैं।

दिल्ली में ‘मुफ्त बिजली’ का सच: चुनाव बाद लगेंगे पैसे… खुद देखिए केजरीवाल सरकार का ऑर्डर

अपनी विवादित टिप्पणियों के चलते हमेशा चर्चा में रहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पूरी राजनीति मानो झूठे वादों और नौटंकी पर ही टिकी हुई है। झूठ की सियासत करने वाले केजरीवाल का एक और झूठ बिजली के बिल माफ़ करने को लेकर सामने आया है। दरअसल, केजरीवाल यह कहते नज़र आ रहे हैं कि उनकी सरकार ने दिल्ली की जनता को 200 यूनिट तक बिजली मुफ़्त में देने का फ़ैसला किया है और इससे काफ़ी लोगों को फ़ायदा मिल रहा है। जबकि उनके इस खोखले दावे की सच्चाई यह है कि केजरीवाल सरकार ने सिर्फ़ चुनाव के मद्देनज़र यह सियासी खेल खेला है।

दिल्ली विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर जो मुफ़्त बिजली बिल से संबंधित दस्तावेज़ उपलब्ध हैं, उसके अनुसार, सिर्फ़ 31 मार्च 2020 तक ही 200 यूनिट मुफ़्त बिजली का प्रावधान किया गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी चुनावी राजनीति को अंजाम देते हुए जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने दिल्ली वासियों के हित में कई अहम फ़ैसले लिए हैं, इनमें मुफ़्त बिजली भी शामिल है।

दिल्ली विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेज़

आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध संबंधित दस्तावेज़ को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

केजरीवाल ने अपने झूठ को भले ही सामने न आने दिया हो, लेकिन सोशल मीडिया के इस युग में लोगों की नज़र से कुछ नहीं बच पाता। देर-सवेर लोग इन चुनावी दावों की तह तक पहुँच ही जाते हैं और खोज लाते हैं इसकी असल हक़ीकत। ऐसा ही मुफ़्त बिजली के खोखले दावों के साथ भी हुआ। यूज़र्स ने आधिकारिक वेबसाइट के दस्तावेज़ को संलग्न करते हुए केजरीवाल के झूठ का पर्दाफ़ाश किया।

इसके अलावा, भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने दिल्ली में 200 यूनिट तक बिजली का बिल माफ़ करने की मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की घोषणा को चुनावी लॉलीपॉप बताया था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा था कि जब भी चुनाव आते हैं, अरविंद केजरीवाल मुफ़्त वाली घोषणाएँ करने में जुट जाते हैं। उन्होंने दिल्ली सचिवालय से प्राप्त एक दस्तावेज़ (सर्कुलर) का हवाला देते हुए इस बात का भी ज़िक्र किया था कि 31 मार्च 2020 के बाद मुफ़्त बिजली का कोई उल्लेख ही नहीं है।

राम मंदिर फैसला: CJI ने यूपी के मुख्य सचिव और DGP को बुलाया, लेंगे राज्य की कानून व्यवस्था का जायजा

अगले हफ्ते राम जन्मभूमि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है। इसको लेकर प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है। पंच कोसी परिक्रमा को लेकर अलग व्यवस्था की गई है। साथ ही ड्रोन से अयोध्या शहर की निगरानी की जा रही है। इस बीच खबर यह है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को तलब किया है, जहाँ वो शुक्रवार (नवंबर 8, 2019) को दोनों के साथ राज्य की कानून व्यवस्था का जायजा लेंगे।

इस बैठक के पीछे का उद्देश्य अयोध्या भूमि विवाद मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले राज्य में कानून व्यवस्था का आकलन करना है। सीजेआई ने यूपी के मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार तिवारी और डीजीपी ओम प्रकाश सिंह को बुलाया है। वो अपने चैंबर में इनके साथ मीटिंग करेंगे और कानून व्यवस्था का जायजा लेंगे।

उल्लेखनीय है कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर 40 दिनों की रोजना सुनवाई के बाद फैसला 16 अक्टूबर को सुरक्षित रखा गया था। बता दें कि न्यायमूर्ति गोगोई का कार्यकाल 17 नवंबर को समाप्त होने वाला है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि उनके सेवानिवृत्त होने से पहले इस पर फैसला सुना दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के फैसले को देखते हुए गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एडवाइजरी भेजी है। सभी राज्यों को फैसले को लेकर अलर्ट रहने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही अतिरिक्त सुरक्षा के लिए गृह मंत्रालय ने अर्धसैनिक बलों की 40 कंपनियाँ भेजी हैं। इन 40 कंपनियों में 4000 पैरा मिलिट्री फोर्स के जवान शामिल हैं।

पहला हलाल चश्मा: इंडोनेशिया में किया गया लॉन्च, सिद्धार्थ की कंपनी ने किया यह काम

इंडोनेशिया में हर वस्तु के लिए हलाल सर्टिफिकेट अनिवार्य होने के बाद वहाँ के उद्योग मंत्रालय ने मंगलवार (नवंबर 5, 2019) को पीटी अटल्ला इंडोनेशिया कंपनी द्वारा निर्मित पहले हलाल सर्टिफाइड चश्मे को लॉन्च किया।

अंतरा न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार इस कदम को सराहते हुए इंडोनेशिया के औद्योगिक मंत्रालय ने पीटी अटल्ला कंपनी की काफी तारीफ की। मीडिया से बातचीत के दौरान मंत्रालय की ओर से कहा गया कि वे पीटी अटल्ला इंडोनेशिया के प्रयासों की सराहना करते हैं। हालाँकि चश्मा ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तत्काल हलाल सर्टिफिकेशन की जरूरत पड़े, लेकिन फिर भी कंपनी ने ये कर दिखाया।

गौरतलब है कि इसी साल 17 अक्टूबर से इंडोनेशिया में 2014 का कानून लागू होने के बाद हर वस्तु पर हलाल सर्टिफिकेट होना अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसे में खाद्य वस्तु से जुड़ी कंपनियों के लिए ये सर्टिफिकेट लेना सबसे ज्यादा अनिवार्य है। जबकि अन्य कंपनियों को पाँच सालों के भीतर ये सर्टिफिकेट लेना जरुरी है।

इस कानून की जरुरतों पर बात करते हुए मंत्रालय ने बताया कि कानून का उद्देश्य उपभोक्ताओं को हलाल उत्पादों पर सुरक्षा और निश्चितता प्रदान करना है, साथ ही उत्पादकों का अतिरिक्त मूल्य (added value) बढ़ाना है।

इस अवसर पर बोलते हुए अटल्ला इंडोनेशिया के निदेशक वेंजको सिद्धार्थ ने भी जानकारी दी कि उनके प्रोडक्ट को 2 अक्टूबर को ही हलाल सर्टिफिकेट मिल गया था। जिसे लेने के पीछे उनका उद्देश्य इंडोनेशिया की बहुसंख्यक आबादी यानी मुस्लिम लोगों में अपने वस्तु की कीमत और ब्रांडिंग को बढ़ाना था।

सिद्धार्थ के अनुसार उनकी कंपनी 500 लोगों को रोजगार प्रदान करती है और एक दिन में 60,000 फ्रेम और लेंस तैयार करती है। हालाँकि फ्रेम और लेंस बनाने के उद्योग क्षेत्र में मंत्रालय के पास 15 कंपनियाँ रिकॉर्ड में हैं जिन्होंने 6,300 लोगों को रोजगार दिया है, लेकिन पीटी अटल्ला केवल मात्र ऐसी लोकल कंपनी हैं, जो अपने फ्रेम से लेकर अन्य सामान तक के प्रोडक्ट खुद बनाती है।

पाकिस्तानी पिता की जानकारी छुपाई थी आतिश तासीर ने: रद्द हुआ OCI, भारत में प्रवेश पर लगेगी रोक

एक लेखक और पत्रकार है – आतिश तासीर। इसे ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) स्टेटस मिला हुआ था। लेकिन गुरूवार (नवंबर 7, 2019) को यह रद्द कर दिया गया है। कारण है – भारतीय गृह मंत्रालय से जरूरी सूचनाएँ छिपाना। दरअसल, ब्रिटेन में जन्मे लेखक व पत्रकार आतिश अली तासीर ने भारत सरकार से जो जरूरी सूचना छुपाई, वह यह थी कि उसके पिता पाकिस्तानी मूल के थे।

गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार, तासीर ओसीआई कार्ड के लिए अयोग्य हो गया है, क्योंकि ओसीआई कार्ड के लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में वो असमर्थ रहा। उसने अपने पिता के पाकिस्तानी होने की बात अधिकारियों व सरकारी रिकॉर्ड में छिपाई।

बता दें कि ओसीआई कार्ड के नियम 7A में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति या उसके माता-पिता या दादा-दादी या परदादा-परदादी पाकिस्तान, बांग्लादेश या ऐसे देश जो भारत सरकार के आधिकारिक गजट में अनुसूचित हैं, का नागरिक है, तो वह ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया कार्ड के पंजीकरण के योग्य नहीं है।

प्रवक्ता ने कहा कि तासीर को उसके पीआईओ/ओसीआई कार्ड के संबंध में अपना जवाब/आपत्ति दर्ज करने का अवसर दिया गया था, लेकिन उसने इस नोटिस पर कोई संज्ञान नहीं लिया। उसने इस पर अपना कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद आतिश अली तासीर का नाम भारतीय नागरिकता कानून, 1955 के तहत ओसीआई कार्ड धारक की सूची से हटा दिया गया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने भी गुरूवार को मीडिया से बात करते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति ने धोखे से, फर्जीवाड़ा करके या फिर तथ्य छुपा कर ओसीआई कार्ड हासिल किया है, तो ओसीआई कार्ड धारक के रूप में उसका पंजीकरण रद्द कर दिया जाएगा। ओसीआई के मुताबिक उस व्यक्ति का पंजीकरण रद्द करने के साथ ही भविष्य में उसके भारत में प्रवेश करने पर भी रोक लग जाएगी।

आतिश तासीर ने टाइम मैगजीन के 20 मई के संस्करण में एक कवर स्टोरी लिखी थी। इसमें तासीर ने पीएम मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ कहते विवादास्पद सवाल किया था- क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र फिर से मोदी को 5 साल का मौका देने को तैयार है? इस लेख में कहा गया था कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र पहले से काफी बँट गया है। साथ ही आतिश ने पीएम मोदी पर धार्मिक राष्ट्रवाद का जहर भरने जैसे तमाम आरोप लगाए थे। हास्यास्पद यह है कि द प्रिंट के पत्रकार ने मनगढ़ंत पत्रकारिता करते हुए यह लिख मारा कि आतिश पर सरकार ने एक्शन इसलिए लिया क्योंकि उसने पीएम मोदी के खिलाफ लेख लिखा था।

सरकार द्वारा आतिश के ओसीआई को रद्द किए जाने पर मीडिया हाउस द प्रिंट ने दावा किया कि तासीर के टाइम मैगजीन में इस लेख के लिखने के बाद से ही उसके ओसीआई को रद्द किए जाने पर विचार किया जा रहा था। हालाँकि, विदेश मंत्रालय ने मीडिया हाउस द्वारा फैलाए जा रहे झूठ को पूरी तरह से नकार दिया। विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया कि द प्रिंट की रिपोर्टिंग पूरी तरह से गलत और तथ्यरहित है।

बता दें कि तासीर के पिता सलमान तासीर, पंजाब (पाकिस्तान में) के गवर्नर थे और उस देश के सबसे हाई प्रोफाइल राजनेताओं में से एक थे। तासीर को पहला पीआईओ कार्ड 1999 में और इसके बाद 2016 में जारी किया गया था। इसके अलावा आतिश तासीर के पास ब्रिटिश पासपोर्ट और अमेरिका का ग्रीन कार्ड भी है।

अयोध्या, प्रयाग, काशी, मथुरा: ‘हिन्दू पद पादशाही’ के लिए मराठों की संघर्ष गाथा

अयोध्या विवाद पर आसन्न फैसले से भगवान श्री राम की भूमि वापिस पाने के सदियों पुराने हिन्दू स्वप्न के पूरा होने की उम्मीद है। बर्बर जिहादियों से यह पवित्र भूमि वापिस पाने के लिए सैकड़ों सालों में अनगिनत प्रयास हुए हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश एक भी प्रयास सफल नहीं रहा। इसके बाद भी अयोध्या-मथुरा-काशी की पुण्यत्रयी और तीर्थराज प्रयाग हमेशा से हिंदवी स्वराज्य के सपने का अभिन्न अंग रही और मराठाओं ने इन्हें पाने के लिए अनथक प्रयास किए

योजनाएँ

पठानों के साथ सफ़दर जंग की दूसरी लड़ाई (1751-52) में मराठाओं ने निमंत्रण पाने पर साथ दिया और फतेहगढ़ की लड़ाई जीतने के बाद होल्कर ने तीनों पवित्र स्थान पेशवा को सौंपे जाने की माँग की। लेकिन उस समय वह माँग पूरी न कर उन्हें केवल धन दे दिया गया। मराठों ने उस समय ज़्यादा चिल्ल-पों इसलिए नहीं की, क्योंकि वे भी लम्बी रणनीति पर चल रहे थे। उन्होंने सफ़दर जंग का साथ देते हुए भी पठानों का पूरा सफाया नहीं किया और उन्हें जंग के प्रतिद्वंद्वी मुस्लिम के रूप में रहने दिया, ताकि बँटे मुस्लिम धड़ों के बीच हिन्दू साम्राज्य को इस युद्ध का सबसे अधिक फायदा हो।

इतिहासकार एएल श्रीवास्तव की किताब The First Two Nawabs of Awadh के मुताबिक करोड़ों की धनराशि, दैनिक खर्चे का पैसा अलग से और आधे बंगश राज्य को पाकर मराठों ने 50 लाख रुपए अहमद खान बंगश और सदुल्लाह खान रुहल्ला से भी वसूले। यह राशि युद्ध की क्षतिपूर्ति नहीं थी, जैसा कि इतिहासकार सरदेसाई दावा करते हैं, बल्कि उनके लिए संधि में सकारात्मक पहलुओं का जुगाड़ करने के ऐवज में था, जबकि नवाब वज़ीर को केवल दुश्मन को जंग के मैदान में हराने का खोखला हर्ष मिला।


The First Two Nawabs of Awadh का अंश

पेशवा के सेनापतियों (‘सरदारों’) में से एक मल्हार राव होल्कर एक बड़ी सेना लेकर काशी पहुँच भी गए थे। वे वहाँ औरंगज़ेब की बनाई ज्ञानवापी मस्जिद को तोड़ देना चाहते थे और उसकी जगह पुण्यभूमि पर प्राचीन मंदिर की पुनर्स्थापना करना चाहते थे। लेकिन काशी के लोगों ने ही मराठों को रोक दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि मराठों के चले जाने के बाद जिहादी इसका बदला स्थानीय निरीह हिन्दुओं का कत्लेआम करके लेंगे। काशी के ब्राह्मणों ने ही पेशवा से अपने सरदार को ऐसा करने से रोकने की अपील की। इतिहासकार जीएस सरदेसाई इस घटना का सबूत अपनी किताब New History of the Marathas में 18 जून, 1751 को एक मराठा दूत के लिखे गए पत्र के हवाले से देते हैं। वे इसके अलावा प्रयाग के लिए भी मराठा भावनाओं की सशक्तता का ज़िक्र करते हैं।

बनारस, इलाहाबाद, अयोध्या: पेशवा के पत्र

1759 में पेशवा बालाजी राव द्वारा दत्ताजी शिंदे को लिखे गए एक पत्र में भी इन तीनों स्थलों का ज़िक्र है। ‘सिंधियाओं के प्रबंधक’ माने जाने वाले रामजी अनंत के ज़रिए यह संदेश भिजवाया गया था। पेशवा ने लिखा था कि शुजा-उद-दौला से दो-तीन लक्ष्य हासिल किए जाने हैं। उन्होंने शिंदे को शुजाउद्दौला से बनारस, अयोध्या और इलाहाबाद हासिल करने के लिए कहा। उसी पत्र में कहा गया कि उसने 1757 में ही मराठों को बनारस और अयोध्या देने का वादा कर दिया था और काशी पर बात चल रही थी। अतः अगर सम्भव हो तो शिंदे तीनों को पाने की कोशिश करें।

इसके कुछ महीनों बाद भी एक पत्र में बनारस और काशी का ज़िक्र है। उस पत्र में शिंदे को दिल्ली में डेरा डाल कर मानसून बिताने, वहाँ पर भ्रष्ट अन्ताजी मानकेश्वर को गिरफ़्तार कर पुणे भिजवा देने और उसके बाद मुग़ल वज़ीर (जिससे वैसे तो वे दोस्ताना संबंध चाहते थे) को हटा कर शुजाउद्दौला को उसकी जगह दिला देने समेत किसी भी कीमत पर काशी, मथुरा और प्रयाग को मराठा नियंत्रण में ले आने की हिदायत दी गई है। यानी हिन्दू पवित्र स्थल हमेशा पेशवाई के जेहन में बने रहे।

ज़मीन पर साकार क्यों नहीं हुई धार्मिक स्थलों की मुक्ति?

हम देख सकते हैं कि हिन्दू पवित्र स्थलों को विधर्मियों से वापिस लेना मराठों की प्राथमिकता हमेशा ही थी। इसके भी सबूत हैं कि अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा सेना के सेनापति रहे सदाशिव राव भाऊ को भी यह आदेश पेशवा से मिले थे। लेकिन 1761 की इस लड़ाई में हार के चलते यह सपना पूरा नहीं हो पाया। हालाँकि उस हार से राजनीतिक रूप से मराठे 10 साल में ही उबर गए, लेकिन तब तक भारत में अंग्रेज़ों के जमते कदमों ने मराठों की धमक को कम कर दिया था।

मराठे अविभाजित भारत के मध्य-दक्षिण यानि दक्कन के पठारों से सत्ताबल पाते थे और उत्तर भारत में उनकी शक्ति सीमित थी। इतिहास के इस काल के बारे में बहुत विस्तृत जानकारी रखने वाले ट्विटर हैंडल @ArmchairPseph के एडमिन का भी मानना है कि उत्तर में अवध और बंगाल के नवाबों की ताकत मराठों के सामने ठीक-ठाक रूप से थी। अतः दक्षिण में फैले साम्राज्य की ताकत के बल पर उससे काफ़ी दूर उत्तर में इन स्थानों पर कब्ज़ा करने लायक शक्ति उस समय तक मराठों के पास नहीं आई थी। उनकी सेनाओं के लौटने के बाद इन स्थानों की सुरक्षा लायक ताकत उस समय तक उनके पास नहीं थी।

अहिल्याबाई होल्कर

मल्हार राव होल्कर की बहू अहिल्या बाई होल्कर, जिन्होंने 1767 में खुद का साम्राज्य बनाया और रानी बनीं, ने आखिरकार 1780 में आज का काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया। मुख्यतः उनके धन और बाकी अन्य मराठाओं के योगदान से बने आक्रांताओं द्वारा तोड़ दिए गए मंदिरों जैसे पुरी के रामचंद्र मंदिर, रामेश्वरम के हनुमान मंदिर, परली का वैद्यनाथ मंदिर, अयोध्या में सरयू घाट, केदारनाथ, उज्जैन और कई अन्य मंदिरों पर उनकी अमिट छाप है।

हालाँकि राजनीतिक और सैन्य कारणों से मराठे हिन्दुओं के पवित्र स्थलों को वापिस हिन्दुओं के लिए पाने का सपना पूरा नहीं कर पाए, लेकिन भरसक प्रयासों में कोई कोताही न रहने की बात मानने के लिए इतने सबूत काफी होने चाहिए। आज जब हम इतिहास के इस मुहाने (राम जन्मभूमि पर आसन्न फैसले की घड़ी) पर खड़े हैं, तो यह याद करना ज़रूरी है कि हमारे पूर्वजों ने धन, प्राण, शक्ति समेत इसके लिए कितनी कुर्बानियाँ दी हैं।

(मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी रूपांतरण मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

अयोध्या पर फैसले से पहले रेलवे ने रद्द की RAF कर्मियों की छुट्टियॉं , 78 रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा के इंतजाम कड़े

भारतीय रेलवे ने गुरुवार को अपने सभी मण्डलों को एक सात पन्ने की एडवाइजरी जारी करते हुए सभी स्टेशनों की सुरक्षा कड़ी करने की सलाह दी है। आरपीएफ के जवानों की छुट्टियाँ भी रद्द कर दी गईं है। बता दें कि रेलवे की ओर से यह फैसला अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के आने वाले निर्णय से ठीक पहले आया है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पाँच सदस्यीय बेंच ने लगातार चालीस दिन तक चली सुनवाई के बाद इस मामले में 16 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवम्बर को रिटायर होने वाले हैं। इससे पहले फैसला आने की उम्मीद है।

रेलवे द्वारा जारी एडवाइजरी के तहत अधिकारियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि रेलवे प्लेटफॉर्म से लेकर पार्किंग, पुल, टनल, प्रोडक्शन यूनिट से लेकर हर उस जगह की सुरक्षा बढ़ा दी जाए जहाँ हिंसा की आशंका हो सकती है या किसी भी तरीके से हथियार या बम रखने की कोई गुंजाइश हो।

रेलवे सुरक्षाबलों को भी इस सम्बन्ध में निर्देश दिए गए हैं कि रेलवे परिसर की निकटता वाली सभी धार्मिक या मज़हबी प्रकृति की इमारतों पर ध्यान रखा जाए– वे किसी भी तरीके से साम्प्रदयिक उन्माद या दंगे का संभावित केंद्र सकती हैं। देश में 78 ऐसे बड़े स्टेशनों को चिन्हित कर लिया गया है जहाँ से यात्रा करने वाले लोगों की संख्या अधिक है। विशेष सिक्योरिटी प्रदान किए जाने वाले इन स्टेशनों में दिल्ली, मुंबई समेत कई बड़े स्टेशन शामिल हैं।

राम जन्मभूमि पर आने वाले अदालत के फैसले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने रेलवे को दिया बिजली बचाने का आदेश वापस लेते हुए अपने हालिया निर्देश में सभी स्टेशनों को 100 प्रतिशत बिजली खर्च कर उन्हें हर वक़्त रोशनी से भरपूर रखने को कहा है। गृह मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश में पहले ही 4,000 अतिरिक्त अर्धसैनिक बलों के जवानों को सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया है। बता दें कि अयोध्या में पहले से ही धारा 144 लागू है।

हनी ट्रैप: आईएसआई की महिला जासूस को फेसबुक से जानकारी देने वाले दो जवान गिरफ्तार

सैन्य जानकारी लीक करने के आरोप में दो जवानों को राजस्थान के जोधपुर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया। मध्यप्रदेश के रहने वाले लांस नायक रवि वर्मा और असम के विचित्र बोहरा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एक महिला जासूस के संपर्क में थे और उसे भारतीय सेना की अंदरूनी खबर दे रहे थे। दोनों राजस्थान के पोखरण में तैनात थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कि इन्हें हनी ट्रैप में फँसाने वाली महिला एक पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई की एक एजेंट है। इस महिला ने फोन कर दोनों जवानों को हनी ट्रैप के जरिए अपना शिकार बनाया और भारतीय सेना के सम्बन्ध में जानकारी एकत्रित करने की कोशिश की।

राजस्थान के एडीजी उमेश मिश्र ने बताया कि प्राथमिक जाँच के दौरान इस बात की पुष्टि हुई है कि दोनों ही सैनिक भारतीय सेना से जुड़ी अहम जानकारियों आईएसआई की महिला जासूस से साझा कर रहे थे। दोनों जवानों को अपना शिकार बनाने के लिए हनी ट्रैप का जाल बिछाने वाली महिला ने उनके नंबर पर कॉल की जिसके लिए उसने इन्टरनेट से वॉयस ओवर इन्टरनेट प्रोटोकॉल (VOIP)की तकनीक का इस्तेमाल किया।

इन्टरनेट से फोन करने की इस तकनीक के जरिए अपनी पहचान और स्थान गुप्त रखते हुए उसने दोनों से पंजाबी लहजे में बात की। इस तकनीक के कारण जवानो के मोबाइल पर महिला का नंबर डिस्प्ले नहीं हुआ। दोनों जवान फेसबुक और ह्वाटसएप के जरिए उसे सेना के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी।

मामले का खुलासा सीबीआई और आईबी के एक साझा ऑपरेशन के बाद हुआ। इसके बाद उन्हें जोधपुर रेलवे स्टेशन पर से उस वक़्त गिरफ्तार कर लिया गया जब दोनों अपने-अपने गाँव भागने की तैयारी में थे। दोनों को गिरफ्तार कर जयपुर ले जाया गया, जहाँ उनसे पूछताछ जारी है। बता दें कि ऐसी तमाम घटनाओं को देखते हुए भारतीय सेना ने अपने जवानों को हनी ट्रैप से बचने और इस तरह के बिछाए हुए जाल से सचेत रहने की चेतवानी भी दी है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सेना ने एडवाइजरी जारी करते हुए फेक फेसबुक प्रोफाइल से भी सतर्क रहने को कहा है।

हिन्दूफ़ोबिया के वीर: शोएब दानियाल के लिए साधु आतंकी, जयराम रमेश के लिए निहत्थों पर गोलीबारी बड़ी बहादुरी

क्या आपने कभी सुना है कि कोई फिदायीन आत्मघाती हमला करने अपने बीवी-बच्चों को साथ लेकर गया हो? क्या कभी किसी ने सुना है कि संसद पर हमला करने वाले अफ़ज़ल गुरु, 26/11 वाले कसाब या पुलवामा के जिहादी आदिल अहमद डार ने अपने घर की या अपने आस-पड़ोस की किसी भी औरत या बच्चे को लेकर अल्लाहु अकबर का नारा धमाका या गोलीबारी करने के पहले लगाया हो?

ऐसा आपने नहीं ही देखा या सुना होगा। यानी यह माना जा सकता है कि आतंकी हमलावर कभी अपने खुद के औरतों और बच्चों को लेकर हमला करने नहीं पहुँचेंगे, और अगर कोई अपने खुद के औरतें और बच्चे लेकर कोई बात करने पहुँचा हो, तो हिंसा करना उसका इरादा नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें उस के खुद के पक्ष के औरतों और बच्चों को नुकसान पहुँचने का खतरा होगा।

तो फिर ऐसा क्यों है कि ‘जाने माने पत्रकार’ शोएब दानियाल और ‘हार्वर्ड से पढ़े लिखे बौद्धिक’ कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश को 2016 के अपने लेखों में लगता था कि अपने साथ औरतों और बच्चों को लेकर, शांतिपूर्ण ढंग से, निहत्थे होकर गौहत्या के खिलाफ कानून की माँग करने, 1966 में संसद का घेराव करने पहुँची एक भीड़ आतंकियों की थी? क्यों उसके लिए जयराम रमेश “संसद पर पहला हमला” विशेषण का प्रयोग कर उसकी बरसी को याद किया था? वह भी तब जब उस भीड़ को अहिंसक होने के बावजूद इंदिरा गाँधी की पुलिस के हाथों हिंसा और मौत ही हाथ लगे?

क्यों शोएब दानियाल उस अहिंसक हिन्दू विरोध-प्रदर्शन की याद अफ़ज़ल गुरु के 2001 के षड्यंत्र से तुलना कर दिलाते हैं, जिसमें 8 सुरक्षा बल के लोग और एक बेगुनाह माली हिंसक, कट्टरपंथी जिहादियों के हाथों मारे गए थे?

इसका जवाब होगा निडर, बेख़ौफ़ हिन्दूफ़ोबिया

दानियाल की बातों (और नाम) से साफ़ ज़ाहिर है कि वे उसी जिहादी-इस्लामी, मज़हबी नफ़रत और हिंसा में लिथड़ी विचारधारा के करीब 2 अरब वाहनों में से एक हैं, जिसे लगता है कि महज़ हिन्दू, या ‘काफ़िर’, होना भर गुनाह-ए-अज़ीम है, काबिल-ए-कत्ल है; वे उसी कट्टरपंथ के प्रवक्ता हैं जिसमें खुद संसद हमले के बारे में “जिहाद का मतलब स्ट्रगल होता है ब्रो, डोंट ‘डिमनाइज़’ इट” बताया जाता है, और एक अहिंसक भीड़, जिसमें औरतें और बच्चे भी थे, और ज़ाहिर तौर पर जिसका मकसद कोई हिंसा नहीं था, को अपने यहाँ वालों की तरह ही खूँखार दिखाने के लिए उसी संसद हमले से उसकी तुलना कर दी जाती है।

जयराम रमेश भी इतने आराम से गौभक्तों के लोकतान्त्रिक प्रदर्शनों को ‘संसद भवन पर हमला’ बताने की हिमाकत इसलिए कर पाते हैं कि उन्हें पता है इसकी कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ेगी। हिन्दू न कभी इतने कट्टरपंथी हुए हैं, न होंगे (और न ही होना चाहिए) कि अपने साधु-संतों के अपमान को, चाहे वो शवों का ही अपमान क्यों न हो, कमलेश तिवारी के कातिलों की तरह ‘काबिले कत्ल’ नहीं बताएँगे। जयराम रमेश को कभी भी किसी आदमी से अकेले में मिलते हुआ यह डर नहीं होगा कि उसके पास मौजूद मिठाई के डिब्बे में से हथियार निकाल कर “जय श्री राम”, “जय साधु-संत” या “जय गौ माता” बोल कर उन्हें कोई काट नहीं डालेगा। उन्हें यह लेख लिखते समय पता था कि निहत्थे साधु-संतों पर गोली चलवाने को “वाह, क्या ‘निर्भीक’ फैसला लिया!” बोलने के लिए राजनीतिक कीमत भी नहीं चुकानी पड़ेगी, क्योंकि इससे अगर 400-500 हिन्दू वोट छिटकते भी हैं तो 20 करोड़ की एक ‘समुदाय विशेष’ की भीड़ का बड़ा हिस्सा ज़बान चटखारते हुए बीफ़-कबाब के सपने देखते हुए उनकी पार्टी को वोट देने के निर्णय पर और दृढ़ता से जम जाएगा।

केवल इस प्रदर्शन की तुलना अफ़ज़ल गुरु के जिहाद से कर के ही नहीं, और भी कई कदमों पर जयराम रमेश और शोएब दानियाल अपने हिन्दूफ़ोबिया के सबूत बड़ी अकड़ से देते हैं।

शोएब दानियाल के स्क्रॉल पर प्रकाशित लेख में इस घटना के कुछ साल पहले हुई एक घटना का भी ज़िक्र है। कुछ गौ रक्षक कार्यकर्ताओं से मिलते हुए जवाहरलाल नेहरू ने नाराज़गी जताई थी कि आखिर ऐसा प्रोपेगंडा कथित तौर पर क्यों चलाया जा रहा है कि वे बीफ़ खाते हैं। अब अपने आप में यह घटना सामान्य-सी लगती है, और होनी भी चाहिए, कि एक व्यक्ति अपने राजनीतिक विरोधियों से से कह रहा है कि उसके बारे में कथित तौर पर गलत बातें न की जाएँ। लेकिन इस घटना को शोएब दानियाल ने अपने लेख में जिस अंदाज़, जिस ‘टोन’ के साथ लिखा है, ऐसा लगता है कि मानो मजहब विशेष में स्वीकृत और (अधिकाँश, यदि सभी नहीं) हिन्दुओं में बुरे माने जाने वाले बीफ़-भक्षण से खुद को दूर दिखाने की कोशिश कर नेहरू ने कोई भयानक पाप कर दिया हो।

‘डेमॉनाईज़िंग’ (दानवीकरण करने वाला) टोन यह होता है दानियाल जी- कि मजहब विशेष के खाने-पीने की पद्धति से अलग, अपनी या अपने वोटरों की आस्था और गैर-इस्लामिक भोजन पद्धति का सम्मान कर देने भर से अपने ‘सेक्युलर’ राजा बाबू नेहरू को आप गोदी से उतार फेंकने को तैयार हैं। आप ऐसा दिखा रहे हैं मानो अगर कोई यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करे कि उसे इस्लाम में स्वीकार्य और मजहब में प्रचलित भोजन पद्धति में कोई चीज़ नहीं पसंद, या वह हिन्दुओं की भोजन-पद्धति और आस्था में किसी चीज़ का कोई सम्मान करने का राजनीतिक संदेश देना चाहे तो आपके हिसाब से यह ‘गुनाहे-अज़ीम’ है।

इसी तरह का हिन्दूफ़ोबिक टोन जयराम रमेश के लेख में भी है। वे द हिन्दू में छपे अपने में लेख इस बात पर नाराज़गी जताते हैं कि उक्त हत्याकांड के बाद, पुरी शंकराचार्य के अनशन के बाद (जिसे पत्रकारिता के समुदाय विशेष के ही अख़बार मिंट में ‘शायद गाँधी से भी लम्बा चला अनशन’ खिसियाते हुए माना गया है) गौ हत्या पर कानून बनाने की संभावना पर विचार के लिए बनी कमेटी में एमएस ‘गुरु जी’ गोलवलकर, तत्कालीन आरएसएस प्रमुख, को भी जगह दे दी गई। यह संघ से ज्यादा हिन्दुओं से दुश्मनी का भाव है- उन दिनों संघ विशुद्ध रूप से हिन्दू हितों की पैरोकारी करने वाले संगठन के रूप में देखा जाता था (उसका मजहबी अंग, राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, 2002 में बना है), और संघ की उपस्थिति को हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व माना जाता था। यानी जयराम रमेश को इस बात से आपत्ति थी कि हिन्दुओं के मुद्दे पर बनी कमेटी में हिन्दुओं के सबसे बड़े संगठन का प्रतिनिधित्व क्यों था!

जयराम रमेश यहीं नहीं रुकते। चटखारे लेकर वे यह भी बताते हैं कि कैसे गौहत्या रोकने के लिए अनशन करने वाले पुरी शंकराचार्य को एक तरह से गौमाँस खिलाया गया। उस कमेटी में अमूल के संस्थापक और भारत में दुग्ध उत्पादन ‘आंदोलन’ के जनक माने जाने वाले वर्गीज़ कुरियन भी थे और पुरी शंकराचार्य भी। रमेश के अनुसार कुरियन ने शंकराचार्य की सेवा में पनीर भिजवाया और अगले दिन उन्हें बताया कि दूध से पनीर बनाने के लिए गाय के बछड़े की आँत से निकाले गए जीव-रसायन (‘रेनेट’) का इस्तेमाल हुआ है। किसी को धोखे से ऐसी चीज़ खिलाना जो न केवल उसकी आस्था के खिलाफ है, बल्कि जिसे रोकने को लेकर वह इंसान आंदोलन कर रहा है, अनशन कर चुका है- ऐसा कृत्य भी नीचता है, और इसे जिस ‘मज़े लेने’ के टोन में रमेश ने बताया, वह उससे भी गिरी हुई निकृष्टता है।

इन दोनों लेखों में और भी समानताएँ हैं। दोनों में गुलज़ारी लाल नंदा को मंत्रिमंडल से अपमानित करके निकाले जाने पर तालियाँ पीटी गईं हैं, जबकि उस समय नंदा का पार्टी में बहुत सम्मान था। न केवल तत्कालीन गृह मंत्री होने के तौर पर, बल्कि इसलिए भी कि दो-दो बार कॉन्ग्रेस में प्रधानमंत्रियों नेहरू और शास्त्री की आकस्मिक मौत के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री की भूमिका निभाने के बाद भी उन्होंने किसी और को पूर्णकालिक प्रधानमंत्री चुने जाने पर शालीनतापूर्वक जगह खाली कर दी थी। इन दोनों के ही मुताबिक नंदा को निकाला भी इसलिए नहीं गया था कि उनके मातहत विभाग ने निहत्थी भीड़ पर अंग्रेजी, औपनिवेशिक बर्बरता दिखाई थी, बल्कि इसलिए कि वे भारतीय साधु समाज से जुड़े थे/गौहत्या पर रोक के समर्थक थे। यानी इंदिरा गाँधी को शक था कि नंदा के ‘बॉस’ होने के कारण पुलिस ने कम लोगों की जान ली, वरना ‘स्कोप’ और भी साधुओं की हत्या का था!

इसके अलावा दोनों ही के लेखों में इस हत्याकांड के बाद हुए 1967 के संसदीय चुनावों में भारतीय जनसंघ की सीटें 14 से 35 हो जाने और इंदिरा गाँधी की सीटें घट जाने को ऐसे दिखाया गया है मानो सीटें घट जाने के रूप में इस हत्याकांड के लिए इंदिरा गाँधी ने सही ही नहीं, सही से ज़्यादा ही कीमत चुका दी!

आज इस हत्याकांड की बरसी पर इंदिरा गाँधी के इस बर्बर दमन को याद करने के साथ जयराम रमेश और शोएब दानियाल जैसे हिन्दूफ़ोबिक लोगों की ओर भी एक गौर किए जाने की ज़रूरत है। यह सोचे जाने की ज़रूरत है कि सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी के धर्म को गाली देने, उसके साथ होने वाली हिंसा पर ताली पीटने की हिम्मत कहाँ से आती है? यह भी सोचना होगा कि ऐसी आस्था जिसने न केवल किसी के साथ मज़हबी हिंसा नहीं की, जबरिया मतांतरण नहीं किया, उससे शोएब दानियाल जैसे व्यक्ति की दुश्मनी क्या है? और जयराम रमेश जैसे लोग जिनकी हिन्दुओं से दुश्मनी नहीं शायद इस कारण से ऐसा कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दुओं को गाली देने से, उनकी हत्या का जश्न मनाने से हिन्दुओं का तो वोट जाएगा नहीं, लेकिन दानियाल जैसों का वोट भर-भर कर चला आएगा।

इसका जवाब ढूँढ़ना भी जरूरी है- और उस जवाब का समाधान करना भी।

CPI(M) दुनिया का छठा सबसे खूँखार आतंकी संगठन, जैश और लश्कर से भी ज्यादा बहाए खून

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) दुनिया का छठा सबसे खूॅंखार आतंकी संगठन है। अमेरिकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आया है। आतंकवाद पर य​ह रिपोर्ट शुक्रवार को जारी की गई। ‘कंट्री रिपोर्ट ऑन टेररिज्म 2018’ के आँकड़े बताते हैं कि सीपीआई (एम) ने पिछले साल 177 आतंकी घटनाओं में करीब 311 लोगों की हत्या की। हालॉंकि केंद्रीय गृह-मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2018 में वामपंथी हिंसा की 833 वारदातें हुई। इनमें 240 लोगों ने अपनी जान गँवाई थी।

पिछले साल की ‘कंट्री रिपोर्ट ऑन टेररिज्म-2017’ में अमेरिका ने माओवादियों को दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक संगठन बताया था। ताजा रिपोर्ट में सीपीआई (एम) खूँखार आतंकी संगठनों की श्रेणी में छठे स्थान पर रखा गया है। उससे पहले इस सूची में तालिबान, इस्लामिक स्टेट, अल शबाब (अफ्रीका), बोको हरम (अफ्रीका) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ फिलिपीन्स है।

सीपीआई (एम) का मकसद गुरिल्ला वार के जरिए सरकार को उखाड़ फेंकना है। 21 सितंबर 2004 को इसकी स्थापना कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)), पीपुल्स वार ग्रुप और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) के विलय से हुई थी। यूएपीए कानून के तहत भारत सरकार ने भी सीपीआई (माओवादी) को आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।

रिपोर्ट में अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग ने अफगानिस्तान, सीरिया और ईराक के बाद विश्व में भारत को आतंकवाद से प्रभावित चौथा देश बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल भारत में घटित 57 प्रतिशत आतंकवादी घटनाएँ जम्मू-कश्मीर में हुई थीं। मीडिया में आ रही रिपोर्ट्स की मानें तो अमेरिका की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2018 के दौरान भारत में घटित होने वाली अधिकांश घटनाओं के पीछे सीपीआई (माओवादी) के नक्सली शामिल रहे हैं। वे करीब 176 ऐसी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार हैं जोकि कुल आतंकी घटनाओं का 26 फ़ीसदी है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक जैश-ए-मोहम्मद ने 60 और हिज्बुल मुजाहिद्दीन ने 59 आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया। ऐसी घटनाओं में इनकी हिस्सेदारी 9-9 फीसदी है। लश्कर-ए-तैय्यबा को 55 वारदातों के साथ करीब 8 फीसदी घटनाओं का ज़िम्मेदार बताया गया है।

मुंबई हमलों में पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की सक्रिय भूमिका होने का दावा करने वाली इस लिस्ट में भारत के राज्यों में सक्रिय कुछ अन्य संगठनों के भी नाम शामिल हैं। इनमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम, नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड-इसाक मुइवा और आईएसआईएस की जम्मू-कश्मीर इकाई शामिल है। भारत और अमेरिका के आँकड़ों में फर्क को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने टिप्पणी से इनकार किया है।