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मुस्लिम महिलाओं के साथ रात को सोते हैं चीनी अधिकारी: खिलाते हैं सूअर का माँस, पिलाते हैं शराब

चीन उइगर मुस्लिमों के लिए रोज नए नियम-क़ानून बना रहा है। वहाँ इस्लामी टोपी लगा कर घूमने पर पाबन्दी है, नमाज भी पुलिस की निगरानी में अनुमति लेकर ही पढ़ी जा सकती है और इस्लामिक रीति-रिवाजों पर प्रतिबन्ध है चीन के शिनजियांग प्रान्त में ख़ास करके उइगर मुस्लिमों को डिटेंशन कैम्प में रखा गया है, जहाँ उनका ‘चीनीकरण’ किया जा रहा है। ख़बर के अनुसार, चीन में जिन मुस्लिमों को डिटेंशन कैम्प में भेजा गया है, उनके घर पर निगरानी रखने के लिए चीनी नागरिकों को हायर किया गया है। ये चीनी नागरिक उइगर मुस्लिमों के घर पर निगरानी रखते हैं।

यहाँ तक कि ये चीनी उइगर मुस्लिमों की पत्नियों के साथ उसी बिस्तर पर सोते हैं। उइगर मुस्लिम परिवारों के लिए नियम बनाया गया है कि वो नियमित रूप से चीनी अधिकारियों को अपने घर पर आमंत्रित करें और अपने मजहबी और राजनीतिक विचारों से उन्हें अवगत कराएँ। इसीलिए, चीन ने ‘पेअर अप एंड बिकम फॅमिली’ योजना लागू की है, जिसमें हर उइगर परिवार को एक चीनी असाइन किया गया है। अब तक 15 लाख लोगों को डिटेंशन कैम्प में रखे जाने की ख़बर है। इनके परिवारों में अधिकतर महिलाएँ होती हैं। उनके घर में जबरदस्ती के ‘सम्बन्धी’ के रूप में किसी चीनी नागरिक को भेजा जाता है।

वह चीनी नागरिक उइगर मुस्लिम नहीं होता। इस अभियान को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का भी पूरा समर्थन मिल रहा है। एक परिवार ने बताया कि हर 2 महीने पर ये ‘सम्बन्धी’ उनके घर में आते हैं और कुछ दिनों तक लगातार घर में रहते हैं, रात में भी। वो घर की महिलाओं के साथ एक ही बिस्तर पर सोते हैं। ये ‘सम्बन्धी’ उइगर मुस्लिमों के परिजनों को नए विचारों से अवगत कराते हैं और उनके अंदर राष्ट्रवाद की भावना जगाते हैं। साथ ही उन्हें चीन के बारे में बताया जाता है और ज़िदगी के बारे में बातें की जाती हैं।

ये चीनी ‘सम्बन्धी’ उइगर मुस्लिमों के परिजनों के घर में रहते हैं, उनके साथ काम करते हैं और साथ ही खाते-पीते हैं। कभी-कभी मौसम ज्यादा ठंडा रहा तो तीन लोग एक ही बिस्तर पर सोते हैं। उइगर मुस्लिमों के बारे में चीनी अधिकारियों ने बताया कि अभी तक किसी ने भी इसके ख़िलाफ़ विरोध दर्ज नहीं कराया है। कम्युनिस्ट पार्टी के एक अनाम कैडर ने बताया कि ये उइगर मुस्लिमों के परिजन घर में काफ़ी अच्छे से खातिरदारी करते हैं और जिस चीज की भी ज़रूरत हो, वो देते हैं। चीन के अधिकारियों ने कहा कि उइगर मुस्लिम महिलाओं के साथ चीनी पुरुष ‘सम्बन्धी’ का सोना एकदम सामान्य हो चुका है और अभी तक महिलाओं के साथ ग़लत हरकत किए जाने की कोई ख़बर नहीं आई है।

हालाँकि, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस ‘होम स्टे’ योजना के ख़िलाफ़ आपत्ति दर्ज कराने का किसी भी उइगर मुस्लिम को अधिकार नहीं है। इन संगठनों का कहना है कि चीनी अधिकारी उइगर मुस्लिमों के घरों में घुस कर वो सब कुछ करते हैं, जो घर का पुरुष सदस्य करता है। वो बच्चों की देखभाल से लेकर साथ बैठने , खाने-पीने तक, सभी चीजें परिवार की तरह करते हैं। संगठनों ने इसे प्राइवेसी और मूलभूत मानवाधिकार का हनन करार दिया है। कई लोगों का कहना है कि उइगर मुस्लिमों, ख़ासकर महिलाओं के घरों को ही इस तरह से जेल बना डाला गया है, जिससे निकलने के लिए उनके पास कोई रास्ता नहीं है।

ये चीनी सम्बन्धी उइगर मुस्लिमों के परिवारों को चीन की क्षेत्रीय नीति और चीनी भाषा की शिक्षा देते हैं। वो अपने साथ शराब और सूअर का माँस लाते हैं, और मुस्लिमों को जबरन खिलाते हैं। उइगर मुस्लिम परिवारों को जबरन उन सभी चीजों को खाने बोला जाता है, जिसे इस्लाम में हराम माना गया है। चीनी अधिकारियों का कहना है कि इससे एक-दूसरे को जानने-समझने में मदद मिलती है और समाज में एकता आती है।

कैम्पस में CRPF तैनात कर 8500 छात्रों को गिरफ़्तार किया जा रहा है: JNU छात्र संघ उपाध्यक्ष ने फैलाया झूठ

जेएनयू छात्र संघ और यूनिवर्सिटी प्रशासन के बीच की लड़ाई लगातार बढ़ती जा रही है। जेएनयू के छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी बीच छात्र संघ के उपाध्यक्ष साकेत मून ने आरोप लगाया कि सरकार ने जेएनयू के छात्रों को जेल भेजने के लिए कैम्पस के अंदर सीआरपीएफ को तैनात कर दिया। बाद में जेएनयू छात्र संघ के उपाध्यक्ष का ये दावा झूठा निकला। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कहा है कि साकेत मून का दावा पूरी तरह झूठा है और यूनिवर्सिटी कैम्पस के अंदर सीआरपीएफ की तैनाती नहीं की गई है।

जेएनयू छात्र संघ के उपाध्यक्ष और वामपंथी छात्र नेता साकेत ने कहा कि ये शर्म की बात है कि सरकार ने सीआरपीएफ की तैनाती कर के छात्रों को जेल भेजने की तैयारी की है। जेएनयू के कुलपति 8500 छात्रों को जेल भेजना चाहते हैं। साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ फोटो भी शेयर किया, जिसमें सीआरपीएफ के जवानों को दिखाया गया था। जेएनयू प्रशासन के अधिकारियों ने कहा कि जेएनयू कैंपस में सीआरपीएफ की तैनाती नहीं की गई है, कोई भी आकर देख सकता है। उन्होंने कहा कि छात्रों को गुमराह करने के लिए ऐसे दावे किए जा रहे हैं।

हॉस्टल फी बढ़ाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्र जेएनयू प्रशासन के दफ्तर की ओर मार्च करने वाले थे लेकिन अचानक से 7 दिनों के प्रदर्शन के बाद उन्होंने इस प्लान को रद्द कर दिया। इसकी बजाय उन सभी छात्रों ने वसंत कुंज थाने की तरफ मार्च किया और वहाँ जेएनयू के कुलपति जगदीश कुमार को लेकर ‘मिसिंग रिपोर्ट’ दायर की। एबीवीपी ने पहले छात्र संघ को विरोध प्रदर्शन में अपना समर्थन दिया था लेकिन हालिया घटनाओं के बाद उसने छात्र संघ की आलोचना की है।

एबीवीपी ने कहा कि जेएनयू छात्र संघ के पास भविष्य के लिए कोई योजना है ही नहीं। एबीवीपी ने आरोप लगाया कि छात्रों के आंदोलन को छात्र संघ ने गुमराह करने और दिशा भटकाने की कोशिश की है। संगठन ने कहा कि वसंत कुञ्ज पुलिस स्टेशन जाने का फ़ैसला छात्रों की एकता को तोड़ने का प्रयास है। जेएनयू छात्र संगठन के पूर्व अध्यक्ष एन साई बालाजी ने भी इसी तरह का आरोप लगाया और फोटो शेयर किया।

इससे पहले छात्रों ने ऐसा हंगामा किया था कि जेएनयू के ‘डीन ऑफ स्टूडेंट्स’ उमेश कदम का ब्लड-प्रेशर अचानक से बहुत ज्यादा हो गया और उनकी तबियत ख़राब हो गई। प्रोफेसर कदम को जेएनयू के हेल्थ सेंटर में लाया गया था, जहाँ डॉक्टरों ने उनका इलाज किया था। हालाँकि, छात्र वहाँ भी पहुँच गए और उन्होंने बीमार प्रोफसर को बंधक बना लिया था। जिस एम्बुलेंस में प्रोफेसर को ले जाया जा रहा था, छात्रों ने उसे भी घेर कर नारेबाजी की थी।

‘बड़बोला संजय राउत बेताल की तरह है, वह BJP और शिवसेना के बीच सबसे बड़ा रोड़ा है’

महाराष्ट्र में सरकार बनाने की लड़ाई दिल्ली पहुँच चुकी है और राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में घटनाक्त्रम लगातार बदल रहा है। इसी बीच एक मराठी अख़बार ने शिवसेना के नेता संजय राउत की तुलना बेताल से की है। बिक्रमादित्य और बेताल की कहानी के किरदार से अख़बार ने राउत की तुलना की और उसकी तरह बताया। अख़बार ने कहा कि संजय राउत की वजह से भाजपा और शिवसेना नई सरकार के गठन के लिए साथ नहीं आ पा रहे हैं।

नागपुर से संचालित अख़बार ‘तरुण भारत’ ने संजय राउत को आड़े हाथों लिया। राउत पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए दैनिक समाचारपत्र ने लिखा कि वो जोकर हैं। साथ ही अख़बार ने दावा किया कि राउत ऐसा माहौल बनाना चाह रहे हैं, जिससे लगे कि भाजपा के भीतर देवेंद्र फडणवीस को लेकर एकमत नहीं है और वो अलग-थलग पड़ गए हैं। अख़बार ने इसे मनोरंजन की संज्ञा दी।

तरुण भारत ने ‘उद्धव और बेताल’ नाम से संपादकीय लिखा था, जिसमें ये बातें कही गई। अख़बार ने लिखा कि महाभारत में भी एक संजय था, जिसने पांडव और कौरव के बीच हुए भीषण युद्ध का आँखों-देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाया था। अख़बार ने लिखा:

“बालासाहब ठाकरे ने पूरी ज़िंदगी एनसीपी और कॉन्ग्रेस का विरोध किया। लेकिन ये बेताल बाल ठाकरे के सपनों को चकनाचूर कर रहा है। इस बड़बोले के पीछे शिवसेना का चलना निराशाजनक है। शिवसेना को पता होना चाहिए कि जिस डाली पर कोई बैठा हो, अगर वो उसी डाली को काटने लगे तो उसे शेखचिल्ली बोलते हैं। ये जनादेश महायुति के लिए है और भाजपा सबसे बड़ा दल होने के नाते सरकार गठन कर सकती है।”

अख़बार ने 1955-99 का भी दौर याद दिलाया, जब शिवसेना महाराष्ट्र के राजग गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ की भूमिका में थी और बालासाहब ठाकरे ने मातोश्री से रिमोट कण्ट्रोल सरकार चलाई थी। अख़बार ने पूछा कि अगर उस समय भाजपा सीएम पद माँगती तो क्या शिवसेना दे देती?

जानें क्या है ‘RCEP’: PM मोदी ने इसमें शामिल होने से क्यों किया इनकार

बैंकॉक में आरसीईपी यानी रीजनल कॉम्प्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि भारत इसमें शामिल नहीं होगा। इस समूह के ज़रिए चीन अन्य देशों के बाजार में अपने पैर पसारने और हित साधने के लिए जुटा था। पीएम मोदी ने बैठक में यह साफ़ कर दिया कि हिन्दुस्तानियों के हितों को ताक पर नहीं रखा जाएगा। दरअसल आरसीईपी समझौता 10 आसियान देशों (इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, चीन, जापान, फिलिपीन्स, कम्बोडिया, लाओस, ब्रूनेई, म्यांमार और सिंगापुर) और 6 अन्य देशों (भारत, जापान, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया, चीन, ऑस्ट्रेलिया) के बीच एक मुक्त व्यापार समझौता है।

इस समझौते के तहत प्रस्ताव था कि यह 16 देश एक दूसरे को व्यापार टैक्स से लेकर कई अन्य सुविधाएँ देंगे मगर जैसे ही इस मुद्दे पर समझौते की तारीख़ करीब आई तो भारत में कई राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया। बता दें कि जहाँ एक तरफ इस समझौते को विश्व की सबसे बड़ी डील कहा जा रहा है वहीं दूसरी ओर अमेरिका के खिलाफ चले ट्रेड-वॉर में चीन का एक मोहरा है। दरअसल अमेरिका से व्यापार युद्ध में मात खा रहा चीन इस समझौते को जल्द से जल्द पारित कराने को उतावला है जबकि भारत सहित आरसीईपी के अन्य आसियान देशों का मत था कि इसपर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए और 2020 तक इसे लंबित किया जा सकता है ताकि इसपर विस्तृत चर्चा हो सके।

एक मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस समझौते से भारत के बाज़ार को भारी क्षति पहुँचने की सम्भावना है, और हो सकता है कि भारतीय बाज़ारों में चीनी सामान की बाढ़ आ जाए। ऐसे में इसका सीधा नुकसान भारत के छोटे कारोबारियों पर पड़ेगा। साथ ही इसे अमेरिका के ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) का चीन की ओर से प्रति-उत्तर के रूप में देखा जा रहा है।

दरअसल, जब डोनाल्ड ट्रम्प ने इस टीपीपी से अमेरिका को अलग कर दिया तब एशियाई देशों के मुक्त व्यापार के लिए इस आरसीईपी का गठन किया गया। इस समझौते को लेकर कहा जा रहा है कि यह सिर्फ टैरिफ फ्री ट्रेड यानी कर मुक्त व्यापार के लिए है। वहीं इसमें शामिल देशों की आर्थिक समानता पर भी सवाल किए जा रहे है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कहा जा रहा है कि आरसीईपी समझौते पर भारत ने अभी अपना मत स्पष्ट नहीं किया है।

दरअसल भारत ने इस समझौते पर हस्ताक्षर से पूर्व कुछ शर्तें रखी थीं जिसके बाद इसके लंबित होने की आशंका थी मगर बाद में भारत ने उसे रद्द कर दिया। बता दें कि पीएम मोदी ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि भारत समावेशी और संतुलित आरसीईपी के समझौते पर ही सहमत होकर इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ेगा।

जब 4 दिन में स्मॉग से मरे 12000 लोग: वे सॅंभल गए, लेकिन हम दिल्ली वाले कब सीखेंगे

बीते कुछ सालों में दिल्ली में प्रदूषण रोक-थाम मामले को लेकर केवल एक मजाक हुआ हैं। आँकड़े दर्शाते हैं कि दिल्ली की हवा की गुणवत्ता का स्तर कुछ सालों में केवल खतरे के निशान पर रहा है। स्थिति ये हो गई है कि अब लोगों ने इसी माहौल को राज्य की आबो-हवा समझ लिया है।

ताजा हालातों के मुताबिक प्रदूषण के मामले में दिल्ली पूरे विश्व में 3 नंबर पर सबसे ज्यादा प्रदूषित राज्य है। जिन्हें घर में बैठकर गलतफहमी है कि वे सुरक्षित हैं। तो उन्हें जानने की जरूरत हैं कि लोगों को आँखों में जलन की शिकायत, साँस लेने में दिक्कत और त्वचा पर खराशें होना शुरू हो गई है और ये प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के कोई आम लक्षण नहीं हैं, ये उस खतरे के निशान हैं जिसने साल 1952 में केवल चार दिन के भीतर कई हजारों लोगों को मौत की आगोश में सोने पर मजबूर कर दिया।

जी हाँ, साल 1952 में 5 दिसंबर से 9 दिसंबर वो तारीखे हैं, जब लंदन का आसमान एक अजीब से स्मॉग की चादर में ढक गया। हालाँकि, 4 दिन बाद ये धुआँ आसमान से छटाँ लेकिन अफसोस अपने साथ कई हजार लोगों को तड़पने के लिए छोड़ गया। ये वाकया लंदन के सबसे बड़े नागरिक संकटों में गिना गया। जिसके कारण 2 लाख से ज्यादा लोग बीमार पड़े और 12,000 लोगों से ज्यादा की जानें गईं। तबाही के इस धुएँ को वहाँ ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन का नाम दिया गया।

बताया जाता है कि लंदन में सर्दी से बचने के लिए वहाँ के लोग कोयला जलाया करते थे। जिस कारण कार्बन डाइक्साइड की मात्रा वायु में बढ़ गई। इसके अलावा कोयले से चलने वाले पावर स्टेशनों से भी प्रदूषण काफी बढ़ा। देखते ही देखते 4 दिसंबर 1952 को मौसम ऐसा बदला कि आसमान की घुँध और घरों-फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआँ एक साथ मिल गए। जिससे निर्मित हुई घनी परत की चादर। जो हवा के अभाव में 4 दिनों तक शहर के ऊपर जमी रही।

हालत ये हो गई कि लोगों को सड़कें नजर आना बंद हो गईं, गाड़ी चलाना असंभव हो गया और पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम और ऐम्बुलेंस सर्विस भी ठप्प हो गए। लोगों की जिंदगी इतने दिनों में इस कदर बदहाल हो गई कि वे दिन के सूरज को देखने के लिए तड़प गए। इस स्मॉग से धीरे-धीरे लोगों का स्नायु तंत्र बुरी तरह से प्रभावित होने लगा, फेफड़े संक्रमित हो गए, सांस की बीमारियां हो गई, गले में समस्या हो गई। नतीजतन इस स्मॉग के 4 दिनों तक रहने से 4 हजार लोग मरे, और बाद में भी लोगों के मरने का दौर जारी रहा।

हालाँकि, इस घटना के बाद लंदन संभल गया। ‘द ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन’ के बाद वहाँ प्रदूषण को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए गए, और दोबारा इस गलती को दोहराने की कल्पना भी नहीं हुई। इस संबंध में राइट टू क्लीन एयर कानून बना और लंदन समेत सभी यूरोपीय देशों ने वाकये से सीख ली।

आज दिल्ली की स्थिति लंदन के उन 4 दिनों जैसी ही हैं। हर तरफ धुँध हैं। लोगों के आँखों में जलन है, तरह-तरह की परेशानियाँ हैं। प्रदूषण अपने चरम पर है। फर्क सिर्फ़ ये हैं कि लंदन एक बार की गलती से सुधर गया, लेकिन दिल्ली वाले कब सुधरेंगे ये बड़ा सवाल है।

धड़ल्ले से संसाधनों का प्रयोग बताता है कि प्रकृति के उपहारों के प्रति हम लापरवाह हो गए हैं और मानव निर्मित संसाधनों को अपनी जरूरत समझते हैं। ये पहली बार नहीं है जब दिल्ली का प्रदूषण विमर्श का विषय बना हो, इससे पहले भी ऐसी गंभीर स्थिति दिल्ली ने देखी है। बहुत दूर न भी जाया जाए तो अभी 2 साल पहले साल 2017 में ही हवा की गुणवत्ता सूचकांक 460 दर्ज किया गया था। अब हालात उससे भी बदतर हैं।

एक खबर के मुताबिक दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण की रोकथाम के लिए इस समय 300 टीमें काम कर रही हैं। जरूरी मशीनरियों को बाँटा गया है और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों, कचरों को जलाए जाने और निर्माण गतिविधियों पर खासतौर से नजर रखी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले पर संज्ञान लेते हुए राज्य और केंद्र सरकारों को फटकार लगाई है। साथ ही पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के मुख्य सचिवों को बुधवार को पेश होने का आदेश दिया है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा शुरू किए गए ऑड-ईवन पर कोर्ट ने पूछा है कि इससे क्या फायदा होगा? और कहा है कि अब जो लोग निर्माण कार्य पर लगी रोक का उल्लंघन करेंगे उनपर 1 लाख रुपए और कूड़ा जलाने पर 5 हजार रुपए का जुर्माना वसूला जाएगा।

गौरतलब है कि प्रशासन द्वारा दिखाई जा रही सख्तियाँ निस्संदेह ही बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम के लिए जरूरी हैं, लेकिन ये भी आवश्यक है कि हम अपनी गलतियों को सुधारने के लिए दूसरे देशों से सीख लें, जिन्होंने इस समस्या के समाधान पर अच्छा काम किया है। लंदन जहाँ 1952 में स्मॉग ने अपना कहर बरसाया था। वहाँ अब ‘टॉक्सिक चार्ज’ नाम से दस पाउंड का कर शुरू कर दिया गया है। 2003 से यहाँ मध्य लंदन में अगर कोई पेट्रोल-डीजल से चलने वाला वाहन प्रवेश करता है तो उसे ये जुर्माना देना पड़ता है। इसी तरह नीदरलैंड में भी भी पर्यावरण की रोकथान के लिए लोग साइकिल चलाते हैं। उनका मकसद 2025 तक सभी वाहनों को बिजली और हाइड्रोजन वाहनों में बदलना है। दिल्ली में चालू हुए सम-विषम योजना को भी प्रदूषण रोकने के लिए चीन और पेरिस जैसे देशों में अपनाया गया है और साथ ही अन्य कोशिशे भी जारी हैं।

अयोध्या में मोबाइल और इंटरनेट पर पाबन्दी नहीं: सोशल मीडिया के अफवाहों का प्रशासन ने किया खंडन

नवंबर माह में राम जन्मभूमि/ बाबरी मस्जिद प्रकरण पर आने वाले उच्चतम न्यायालय के संभावित फैसले के मद्देनज़र ज़िले में विभिन्न माध्यमों से अफ़वाहे फैलाने का काम भी जारी है। इसे गंभीरता से लेते हुए ज़िला प्रशासन ने जनपद वासियों से अपील की है कि न ही वो अफ़वाह फैलाएँ और न ही उन पर ध्यान दें।

कुछ अफ़वाहों के मद्देनज़र ज़िला प्रशासन ने जो महत्वपूर्ण बिन्दु बताए हैं, वो इस प्रकार हैं:

  • आने वाले दिनों में मोबाइल फोन नेटवर्क व इंटरनेट सेवाएँ बाधित नहीं की जाएँगी।
  • बाजार रोज़ाना की तरह अपने समय से खुलेंगे और अपने समय से बंद होंगे, उसमें किसी प्रकार का फेरबदल नहीं किया जाएगा। 
  • जनपद के सभी स्कूल फिर चाहे वो सरकारी हो या प्राइवेट, रोजाना अपने समय से खुलेंगे और बंद होंगे। स्कूल में पुलिस फ़ोर्स के रुकने का बच्चों की पढ़ाई पर कोई असर नहीं होगा। 
  • इस समय किसी राजनीतिक या धार्मिक मुद्दे पर कोई आपत्तिजनक मैसेज लिखना या भेजना अपराध है। ऐसा करने पर बिना वारंट के गिरफ़्तारी हो सकती है। 
  • आपकी डिवाइस को मंत्रालय के सिस्टम से जोड़ दिया जाएगा।
  • अपने बच्चों, भाइयों, रिश्तेदारों, दोस्तों, परिचितों आदि सभी को सूचित कर दें कि इन सबका ध्यान रखें और सोशल साइट्स को संयम से चलाएँ।
  • कोई आपत्तिजनक पोस्ट या वीडियो आदि जो आप रिसीव करते हैं राजनीति या वर्तमान स्थिति पर सरकार या प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ उसे न भेजें।

इस सन्दर्भ में अयोध्या पुलिस ने सोशल मीडिया पर भी जानकारी साझा की।

ज़िला प्रशासन ने समस्त जनपद वासियों से अपील की है कि आप सभी अपने रोज़मर्रा के जीवन को सामान्य जीवन की तरह बिताएँ। किसी भी अफ़वाह पर ध्यान न दें, किसी भी तरह की अफ़वाह फैलाने वाले व्यक्ति के बारे में तुरंत पुलिस को सूचित करें, जिससे अफ़वाह फैलाने वालों को दंडित किया जा सके। सूचित करने वाले का नाम व पता गोपनीय रखा जाएगा। जनजीवन को सामान्य रखने में ज़िला प्रशासन के सभी अधिकारियों का सहयोग करें।
बता दें कि अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से पहले अयोध्या के ज़िलाधिकारी ने 30 बिन्दुओं वाला आदेश भी जारी किया है। 

कार सेवक नहीं थे राजीव: शाहबानो से पीछा छुड़ाने को राम मंदिर आंदोलन में डाला था हाथ

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय देश ने मुस्लिम तुष्टिकरण का सबसे बड़ा नमूना देखा, जब शाहबानो मामले में अदालत का फ़ैसला पलट दिया गया। एक मुस्लिम महिला को मिला न्याय उससे वापस छीन लिया गया और ऐसा देश की सबसे ताक़तवर सरकारों में से एक ने किया, 415 सीटों वाली राजीव गाँधी सरकार ने। इसके बाद राजीव गाँधी की मुस्लिम तुष्टिकरण वाले छवि बन गई, जिससे निकलने के लिए वो व्याकुल थे। उन्हें डर था कि कहीं मुस्लिमों को ख़ुश करने के चक्कर में हिन्दू हाथ से न निकल जाएँ। अपनी इसी छवि को हटाने के लिए राजीव गाँधी ने राम मंदिर मामले में हाथ डाला

फ़रवरी 1986 में फ़ैजाबाद अदालत ने आदेश दिया कि राम मंदिर का ताला खुलवाया जाए। प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने ताला खुलवाने में मदद की और इसके जरिए वे हिन्दुओं के मन से अपनी मुस्लिम-प्रेमी छवि हटाना चाहते थे। लेकिन, इतने से ही बात नहीं बनी। जिस गति से राम मंदिर से लोग जुड़ते चले गए, उसी गति से राजीव गाँधी के आसपास के कई नेता उनसे दूर होते चले गए। वीपी सिंह से लेकर अन्य बड़े नेताओं तक, राजीव गाँधी के आपसास से अनुभवी नेता जा रहे थे और उनकी जगह चाटुकारों से भरी जा रही थी।

इसी कारण राजीव गाँधी ने राम मंदिर का ताला खुलवाने में योगदान दिया। लेकिन, राम मंदिर के लिए लोगों के मन में भावनाएँ इतनी प्रबल थीं कि इतने से किसी का मन नहीं भरा। विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस अभियान को जनांदोलन बनाया और बाद में भारतीय जनता पार्टी के जुड़ने से इसे राजनीतिक मजबूती मिली। यह, कहानी शुरू होती है शिलापूजन से। विहिप ने देशभर में शिलायात्रा निकाली, जिसमें लोगों ने शिला दान कर के राम मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराया। गाँव-गाँव में चल रही इस यात्रा से देश के मनोभाव का पता चला, लेकिन राजीव गाँधी का भाषण लिखने वाले मणिशंकर अय्यर जैसे नेता इसे भाँप नहीं पाए।

जब बाबरी विध्वंस हुआ, तब माधव गोडबोले केंद्रीय गृह सचिव थे। उनका एक ताज़ा बयान आया है और यही कारण है कि राम मंदिर के इतिहास के इस हिस्से पर हम फिर से गौर कर रहे हैं। गोडबोले ने कहा है कि राम मंदिर आन्दोलन के दो प्रथम कारसेवक थे। एक तो उन्होंने जस्टिस कृष्णमोहन पांडेय को पहला कारसेवक बताया, क्योंकि उनके आदेश के बाद ही मंदिर का ताला खोला गया था। जिला अदालत की छत पर फ्लैग पोस्ट पकड़े एक काला बन्दर बैठा हुआ था, जिसे देख कर उन्हें ऐसा आदेश देने की प्रेरणा मिली। वो बन्दर भूखा-प्यासा बैठा हुआ था। गोडबोले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को दूसरा कारसेवक करार दिया।

गोडबोले का कहना है कि अगर राजीव गाँधी चाहते तो इस मामले का हल निकाला जा सकता था। लेकिन, क्या सचमुच राजीव गाँधी भगवान राम के प्रति इतनी श्रद्धा रखते थे और राम मंदिर बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे? अगर उस समय की घटनाओं से देखें तो राजनीतिक नौसिखिया राजीव गाँधी सिर्फ़ अपनी पुरानी छवि को बदलने के लिए ही राम मंदिर आंदोलन के प्रति सॉफ्ट स्टैंड रख रहे थे। तभी उन्होंने अपने भाषण में रामराज्य का जिक्र किया था। शायद उन्होंने जनभावनाओं को पहचानने में थोड़ी-बहुत सफलता हासिल की थी, लेकिन भाजपा ने 1989 के पूरा चुनाव ही राम मंदिर पर कॉन्ग्रेस को घेरते हुए लड़ा।

जिस तरह उन्होंने ताला खुलवाने का श्रेय लिया, उसी तरह राजीव गाँधी राम मंदिर पर शिलान्यास का श्रेय भी लेना चाहते थे। विहिप ने शिलान्यास की घोषणा की थी और इसके लिए सरकार से उसे अनुमति भी मिल गई। हालाँकि, जिस जगह शिलान्यास किया जाना था- उसे न्यायालय ने विवादित बता दिया। राजीव गाँधी चाहते थे कि यूपी के सीएम एनडी तिवारी अदालत को बताएँ कि ये जगह विवादित नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह को तिवारी को मनाने के लिए लखनऊ भेजा गया। राजीव गाँधी विहिप, आरएसएस और भाजपा से राम मंदिर मुद्दा छीनने के लिए ये सब कर रहे थे, क्योंकि शाहबानो मामला उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था।

बोफोर्स घोटाले के कारण उनकी भारी बहुमत वाली सरकार की लोकप्रियता भी जाती रही थी और राम मंदिर आंदोलन को देख कर उन्होंने हिन्दू वोट बैंक को लपकने की कोशिश की। ख़ुद नरसिम्हा राव ने अपनी पुस्तक ‘अयोध्या 6 दिसंबर 1992’ में लिखा है कि कॉन्ग्रेस के लोग धार्मिक भावनाओं को तवज्जो नहीं देते थे। लेकिन, क्या कारण था कि अचानक से राजीव गाँधी हिन्दुओं की भावनाओं की लहर पर सवार होने को बेचैन हो उठे? इसका सीधा जवाब है कि चुनाव में उन्हें फायदा चाहिए था।

तभी तो पानी में बने मचान पर रहने वाले हिमालय के तपस्वी देवरहा बाबा के पास पहुँच गए। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘युद्ध में अयोध्या‘ में बताया है कि देवरहा बाबा ने राजीव से बातचीत करने के बाद अशोक सिंघल को वृंदावन बुलाया था। उन्होंने कहा था कि अदालत द्वारा विवादित बताए जाने के बावजूद शिलान्यास चुने गए जगह पर ही होगा, क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री से आश्वासन मिला है। देवरहा बाबा के पास राजीव गाँधी सलाह के लिए जाते थे और एक तरह से बाबा विहिप और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका में भी थे। राजीव गाँधी ने तो तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष बलराम जाखड़ को देवरहा बाबा से लगातार संपर्क में रहने को भी तैनात कर दिया था।

9 साल पुरानी भाजपा 1989 आम चुनाव के बाद 2 सीटों से सीधा 185 सीटों पर पहुँच गई और राजीव गाँधी की उम्मीदों पर पानी फिर गया। वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने, जिनकी सरकार में राम मंदिर आंदोलन की समर्थक भाजपा भी शामिल थी और इस आंदोलन के विरोधी वामदल भी। राजीव गाँधी को विपक्ष में बैठना पड़ा। इसका मतलब ये कि लाख कोशिशों के बावजूद राजीव गाँधी अपनी शाहबानो वाली छवि से पीछा नहीं छुड़ा पाए। शाहबानो और बोफोर्स- ये दो नाम उनका आजीवन पीछा करते रहे। राजीव गाँधी भाजपा को राम मंदिर का फायदा नहीं उठाने देना चाहते थे लेकिन वे खुद हाथ जला बैठे।

विहिप के अशोक सिंघल, बजरंग दल के विनय कटियार और भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई और इन चेहरों को जनता के बीच लोकप्रियता भी मिली, जबकि राजीव गाँधी का ग्राफ गिरता ही चला गया। नागपुर में चुनाव प्रचार करते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से शिलान्यास का श्रेय लेने की कोशिश की। बाबरी एक्शन समिति भी उनकी विरोधी हो गई और भाजपा तो विरोध में थी ही। इस तरह से न उनका पुराना मुस्लिम वोट बैंक बचा और न ही नया हिन्दू वोट बैंक बना।

आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी पर चलेगा बुलडोजर, एनजीटी के आदेश के बाद नोटिस जारी

पूर्व मंत्री और सपा सांसद आजम खान के मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय पर बुलडोजर चलने का खतरा मॅंडरा रहा है। रामपुर के उपजिलाधिकारी प्रेम प्रकाश तिवारी ने इस बाबत नोटिस जारी किया है। नोटिस में कोसी नदी क्षेत्र में बनी यूनिवर्सिटी की दीवार 3 दिन में तोड़ने के लिए कहा गया है। नोटिस नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेश के अनुपालन में जारी किया गया है। इससे पहले आजम द्वारा विधायक फंड से बनवाए गए उर्दू गेट और उनके बेटे के लग्जरी रिसॉर्ट हमसफर पर भी प्रशासन का बुलडोजर चल चुका है।

उल्लेखनीय है कि एनजीटी ने पिछले दिनों नदी क्षेत्र में यूनिवर्सिटी के निर्माण को तोड़ने के आदेश दिए थे। एनजीटी में एक याचिका दायर की गई थी। जिसमें कहा गया था कि आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी में कोसी नदी क्षेत्र की जमीन भी शामिल है। यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए कोसी नदी के पास वाली जमीन पर कब्ज़ा कर उस पर इमारत बना दी गई।


रामपुर के उपजिलाधिकारी द्वारा जारी किया गया नोटिस (साभार: Newsstate)

याचिका में कहा गया था कि इस निर्माण से नदी की धारा प्रभावित हुई। जिस पर एनजीटी ने सुनवाई की और फिर इसके बाद नदी क्षेत्र से निर्माण हटाने के आदेश दिए थे। अब एनजीटी के आदेश के अनुपालन में उप जिलाधिकारी ने नोटिस जारी किया है, जिसमें तीन दिन के अंदर नदी क्षेत्र में बनी दीवार को हटाने को कहा गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले 16 अगस्त 2019 को प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए रिसॉर्ट के अवैध हिस्से को जमींदोज कर दिया था। इस रिसॉर्ट के मालिक आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम हैं। प्रशासन ने उनके रिसॉर्ट के अवैध हिस्से को गिरा दिया। बता दें कि करोड़ों की लागत से बने इस रिसॉर्ट का लोकार्पण पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने किया था।

उससे पहले 6 मार्च 2019 को मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के स्वार रोड पर आजम खान द्वारा विधायक फंड से बनवाए गए उर्दू गेट को 6 बुलडोजर का प्रयोग कर 3 घंटे में ढाह दिया था। इस गेट की ऊँचाई इतनी कम थी कि यहाँ से बस और ट्रक भी नहीं निकल पाते थे। ऐसे में हमेशा दुर्घटना का ख़तरा बना रहता था। कई दुर्घटनाएँ हुई भी थी। इसके अलावा आजम खान पर मदरसे से किताबें चुराने, क्लब से शेर की मूर्तियाँ चुराने और बेटे के नाम पर रिसॉर्ट सिंचाई विभाग की ज़मीन ‘चुरा’ कर (अवैध कब्ज़ा कर) बनवाने का भी आरोप है।

NRC भविष्य का दस्तावेज, मीडिया और ‘उग्र नेताओं’ ने इस पर फैलाया भ्रम: CJI

असम से लेकर पूरे देश में चर्चा का मुद्दा बन चुके नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए इसके समर्थन में अपनी बात रखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कई तथ्य पेश किए। लेखक और पत्रकार मृणाल तालुकदार की किताब ‘पोस्ट कोलोनियल असम’ (1947-2019) के विमोचन समारोह में बोलते हुए मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने अपने संबोधन में एनआरसी को लेकर मीडिया की गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग पर भी गंभीर सवाल उठाए

जस्टिस गोगोई ने अपने संबोधन में कहा “मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जिसे आप पुस्तक विमोचन के कार्यक्रमों में पाएँगे, यहाँ आने की असल वजह थी कि मृणाल ‘नन्द तालुकदार सोशल हिस्ट्री प्रोजेक्ट’ के जिस काम में पूरी निष्ठा से लगे थे।” दरअसल जिस प्रोजेक्ट का ज़िक्र गोगोई ने अपने वक्तव्य में किया वह आज़ादी के बाद से लेकर अब तक असम की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को संकलित करता आ रहा है, इसमें एनआरसी भी शामिल है।

कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि असम का इतिहास अशांति से भरा रहा है, इस प्रदेश के लोगों ने औद्योगिक हमले से लेकर कृषि संघर्ष और बाढ़ की आपदाओं के बीच सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर कई बड़े संकटों का सामना किया है मगर इसके बावजूद यहाँ के लोगों ने हमेशा भारत का सर गर्व से ऊँचा किया है। जस्टिस गोगोई ने बताया कि व्यापक आंदोलनो और परिणामस्वरुप हुई हिंसा ने असम के सामाजिक-राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा है, यहाँ सबसे बड़ी समस्या अवैध प्रवासियों की है जोकि राज्य के ज़्यादातर संसाधनों पर काबिज हैं और इस मुद्दे पर स्थानीय लोगों का स्वर भी मुखर है। असम ने पिछले चार दशक में इस मुद्दे पर काफी हिंसक झड़पें देखी हैं। 1978 में इसके लिए ‘थ्री-D’ का नारा प्रचलित हुआ थ्री-D यानी डिटेक्शन, डिलीशन और डिपोर्टेशन यानी अवैध रूप से रह रहे प्रवासी को ढूँढो (डिटेक्शन), मिटाओ (डिलीशन) और बाहर भेज दो (डिपोर्टेशन)।

एक समय सभी राजनीतिक दल इस समस्या को सुलझाने की कोशिश में आगे आए और उन्हें इसके लिए जनसमर्थन भी मिला। मगर चार दशकों में तस्वीर इतना बदल गई कि उग्र-राजनीतिक बयानबाजी और लगातार हिंसा से राज्य के लोगों के बीच दहशत और शत्रुता लगातार बढ़ती चली गई और उस वक़्त राज्य की व्यवस्था ऐसे दंगों पर नियंत्रण करने के योग्य नहीं थी।

बता दें कि असम एकॉर्ड 1985 – जोकि असम राज्य के सम्बन्ध में एक आधिकारिक दस्तावेज़ है उसके मुताबिक असम के लिए नागरिकता और नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स (एनआरसी) का प्रावधान किया गया है, इसीलिए एनआरसी कोई नया मुद्दा नहीं है। एनआरसी का सबसे पुराना कानूनी अस्तित्व 1951 से जुड़ा हुआ है। यहाँ तक कि मौजूदा वक्त में की जा रही कार्रवाई 1951 के तत्कालीन एनआरसी के नियम में संशोधन की ही एक प्रक्रिया है। गोगोई ने कहा कि एनअआरसी को लेकर असम के लोग बेहद उदारदिल हैं। उन्होंने देरी के बावजूद तय की जा रहीं सभी तारीखों का स्वागत किया। यह इन्सानियत की एक स्वीकार्यता ही है जो समावेशिता तक जाती है। इतिहास में असम को मिले घाव अभी तक भर नहीं पाए हैं और अब किसी नए सियासी तमाशे के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं।

मुख्य न्यायधीश ने एनआरसी की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि यह सबसे ज्यादा यह लोगों की स्वीकार्यता की बात है कि इसे लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने एनआरसी की गैर-ज़िम्मेदाराना रिपोर्टिंग करते मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए। जस्टिस गोगोई ने कहा कि मीडिया-उससे जुड़े संस्थान और खासकर सोशल मीडिया के ज़रिए इस मुद्दे को लेकर लोगों तक पहुँचने वाली बातें ख़ासा प्रभावित हुईं। उनके मुताबिक मीडिया ने अपने दर्शकों और पाठक वर्ग का परिचय असम के वास्तविक हालातों से कराया ही नहीं बल्कि दोनों के बीच एक गहरी खाई बना डाली। कार्यक्रम में जस्टिस गोगोई ने अवैध प्रवासियों पर कानूनी चोट करने वाले एनआरसी के मुद्दे को इतिहास में घटित हिंसक वारदातों से जोड़ते हुए राज्य की शांति व्यवस्था और मीडिया की एकतरफ़ा रिपोर्टिंग पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ज़मीन पर वास्तविक हालातों से अनभिग्य हैं मगर बैठे-बैठे एनआरसी की आलोचना कर रहे हैं।

7 दिन में डेंगू के 230 मामले: केजरीवाल ने कहा डेंगू की तरह ही प्रदूषण को भी हराएँगे

राजधानी दिल्ली में सोमवार (नवंबर 4, 2019) से शुरू हुए ऑड-ईवन स्कीम को लेकर आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दावा किया है कि इस स्कीम से उनकी सरकार प्रदूषण से उसी तरह निजात दिलाएगी, जैसे डेंगू को खत्म किया। AAP प्रमुख ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “दिल्ली के लोगों ने सराहनीय काम किया है। उन्होंने डेंगू और प्रदूषण दोनों पर काबू पाया है।”

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा कि दिल्ली में पिछले पाँच वर्षों की तुलना में इस साल अब तक डेंगू के सबसे कम मामले दर्ज किए गए हैं। साथ ही उन्होंने दिल्लीवासियों से अगले महीने तक सामूहिक प्रयास जारी रखने की अपील भी की। एक अन्य मंत्री गोपाल राय ने दावा किया, “हम प्रदूषण को भी उसी तरह हरा देंगे जैसे हमने डेंगू के मामले में किया है।”

हालाँकि इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले हफ्ते डेंगू के 230 से अधिक नए मामले सामने आए थे, जो इस साल अब तक के एक हफ्ते में सबसे ज्यादा है। हाल के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली में 2019 में अब तक मच्छर जनित वायरल बीमारी के 1,069 मामले सामने आ चुके हैं।

दक्षिणी दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी) के अनुसार, वेक्टर जनित बीमारी के कुल 833 मामले दर्ज किए गए। जिसमें से 551 अक्टूबर में, 190 सितंबर में, 52 अगस्त में, 18 जुलाई में, 11 जून में। और बाकी सारे मामले जनवरी और मई के बीच दर्ज किए गए थे। इसी तरह, पिछले आँकड़ों के अनुसार 2108 में 2798 डेंगू के मामले सामने आए और चार मौतें दर्ज हुईं, वहीं 2017 में 4726 मामले दर्ज किए गए, और 10 मौतें भी हुईं।

बता दें कि यह आँकड़ा दिल्ली सरकार द्वारा शुरू किए गए अभियान 10 हफ्ते, 10 बजे, 10 मिनट के दौरान आया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मच्छरों से उत्पन्न होने वाली बीमारियों से निजात पाने के लिए 8 सितंबर 2019 को यह अभियान शुरू किया था।

गुरुग्राम के मैक्स अस्पताल में डॉ राजीव डांग ने कहा, “हालाँकि पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष डेंगू के मामलों में राष्ट्रीय राजधानी में थोड़ी कमी देखी गई है, लेकिन कुल संख्या अभी भी उच्च स्तर पर बनी हुई है। सितंबर में विशेषज्ञों ने आगाह किया था कि दिल्ली में डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया के मामले बढ़ रहे हैं और आने वाले हफ्तों में स्थिति बदतर हो सकती है।”