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SC ने मुस्लिम महिलाओं की मस्जिद में एंट्री वाली याचिका पर कहा- 10 दिन बाद सुनेंगे, ‘एक अलग कारण’ है

सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद में महिलाओं की एंट्री से सम्बंधित याचिका पर सुनवाई को 10 दिनों के लिए टाल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस याचिका पर सुनवाई को अगले 10 दिनों तक स्थगित किया जाता है। इस मामले में अलग-अलग पक्ष हैं, जिनमें से कुछ ने रीजॉइंडर दायर करने के लिए 4 हफ़्तों तक का समय माँगा है। जस्टिस बोड़बे ने 10 दिनों के लिए सुनवाई स्थगित करने के पीछे कारण भी स्पष्ट किया। भावी मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि सुनवाई को आगे बढ़ाने का ‘एक अलग कारण’ है।

बता दें कि मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री एक ज्वलंत मुद्दा रही है। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा भी इस सम्बन्ध में याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट गई थी, जिस ख़ारिज कर दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा था कि जब मुस्लिम महिला आकर ऐसी कोई याचिका दायर करती है, तब सुप्रीम कोर्ट इसपर विचार करेगा। इस याचिका में मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री पर इस्लामिक प्रतिबन्ध को बराबरी के अधिकार के विरुद्ध बताया गया था। इसमें कहा गया था कि ये मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार से जवाब भी माँगा है। एक अन्य याचिका दायर की गई थी, जिसमें मुस्लिम महिलाओं पर मस्जिदों में लगी रोक को असंवैधानिक बताया गया था। कहा गया था कि ये मूलभूत अधिकारों, बराबरी का अधिकार और जेंडर जस्टिस के ख़िलाफ़ है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वो 5 नवम्बर तक इस समबन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट करे। कोर्ट ने इस सम्बन्ध में महिला विकास मंत्रालय, अल्पसंख्यक मामले मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग को नोटिस भेज कर पूछा था।

दायर की गई याचिका में कहा गया है कि न सिर्फ़ मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में मुख्य द्वार से प्रवेश करने का अधिकार मिलना चाहिए, बल्कि उन्हें मुसल्ला (नमाज पढ़ने की जगह) में जाकर नमाज पढ़ने की इजाजत मिलनी चाहिए। याचिका में कहा गया है कि चूँकि भारत के मस्जिदों को सरकार से सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, इसीलिए सरकार को कहा जाना चाहिए कि वो मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं को प्रवेश करने के लिए निर्देशित करना चाहिए।

ऑटो सेक्टर में मंदी है और नहीं भी: ‘The Hindu’ ने 1 दिन में 2 विरोधाभासी ख़बरें चला कर पाठकों को बनाया पागल

राफेल पर लेख लिख-लिख कर विपक्ष को मुद्दा देने वाले एन राम के कारण ‘द हिन्दू’ की पहले ही काफ़ी किरकिरी हुई थी। राफेल की रट लगाते-लगाते कॉन्ग्रेस पार्टी की इतनी बुरी हार हुई कि ‘द हिन्दू’ ने इसपर लेख छापना लगभग बंद ही कर दिया। अब मीडिया संस्थान की नई करतूत सामने आई है। एक ही चीज को संस्थान ने अपने दो अलग-अलग अख़बारों में ‘घोड़ा’ भी कहा है और ‘चतुर’ भी कहा है। ख़ासकर जब ख़बर अर्थव्यवस्था से जुडी हुई हो तो डाटा को मनचाहे ढंग से प्रेजेंट कर अपना प्रोपेगंडा फैलाना आसान हो जाता है।

‘द हिन्दू’ ने कुछ ऐसा ही किया है। ऑटोमोबाइल सेक्टर में त्योहारों के कारण रौनक आई है, ऐसा ‘द हिन्दू’ का कहना है। त्योहारों के मौसम में ऑटोमोबाइल सेक्टर में रौनक नहीं आई है, ये भी ‘द हिन्दू’ का ही कहना है। कहने का मतलब है कि अख़बार की नज़र में ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए खुशियाँ आई भी हैं और नहीं भी आई हैं। दो अलग-अलग ख़बरें वेबसाइट पर एक ही दिन प्रकाशित की गईं। दोनों ख़बरों को अख़बारों में भी एक ही दिन छापा गया। आइए, आप आपको पूरा माजरा जरा अच्छे से समझाते हैं ताकि आपको भी ‘द हिन्दू’ की ‘घोड़ा-चतुर’ पॉलिसी का ज्ञान हो।

‘बिजनेस लाइन’ ने शुक्रवार (नवंबर 1, 2019) को ख़बर चलाई कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में ये त्योहारी सीजन कोई खुशियाँ लेकर नहीं आया है। इसमें कहा गया कि डोमेस्टिक मार्किट अक्टूबर में रेड जोन में रहा। इसमें हौंडा, महिंद्रा और टाटा मोटर्स को हुए घाटे का जिक्र किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि दोपहिया वाहनों की बिक्री में मंदी आ गई है। ठीक उसी दिन, ‘द हिन्दू’ ने ख़बर प्रकाशित की कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में ये त्योहारी सीजन खुशियाँ ही खुशियाँ लेकर आया है। इसमें बताया गया कि किस तरह मारुती सुजुकी ने बिक्री में बढ़ोतरी दर्ज की है। मारुती के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के हवाले से यह भी बताया गया है कि बाजार में सकारात्मक बदलाव आया है।

हैरत की बात तो यह है कि ‘बिजनेस लाइन’ और ‘द हिन्दू’, ये दोनों ही अख़बार एक ही कम्पनी द्वारा प्रकशित किया जाता है। दोनों ही अख़बार और वेबसाइट ‘कस्तूरी एंड संस’ के मालिकाना हक़ में है। ऐसे में, एक ही समय पर दो अलग-अलग विरोधाभासी हैडलाइन देकर ग्राहकों के दो अलग-अलग वर्गों को संतुष्ट करने की चाल में ‘द हिन्दू’ और ‘बिजनेस लाइन’ ने शायद यही एडिटोरिअल पॉलिसी बना रखी है। किसी चीज को एक अच्छा कहेगा तो दूसरा बुरा। एक में मंदी होगी तो दूसरे में अर्थव्यवस्था छलाँग मार रही होगी।

अयोध्या दहलाने की बड़ी साजिश: 7 पाकिस्तानी आतंकी नेपाल के रास्ते यूपी में घुसे, हाई अलर्ट

अगले 10 दिनों के भीतर राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने वाला है। ऐसे में, अयोध्या में बड़े आतंकी हमले की साजिश रची जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों का एक जत्था घुस गया है, जो राम मंदिर मामले के बीच दहशत फैलाना चाहता है। बता दें कि राम मंदिर मामले में अगस्त महीने में शुरू हुई नियमित सुनवाई अक्टूबर में ख़त्म हो गई थी। इस महीने सीजेआई रंजन गोगोई रिटायर होने वाले हैं और उससे पहले फ़ैसला आना तय है। सुनवाई ख़त्म होने के बाद 5 सदस्यीय पीठ ने फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था।

अयोध्या मामले की सुनवाई ख़त्म होने के बाद से विभिन्न ख़ुफ़िया एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल के रास्ते 7 आतंकवादी उत्तर प्रदेश में घुस चुके हैं। ख़ुफ़िया सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि ये सभी पाकिस्तानी आतंकवादी हैं, जिन्हें अयोध्या में आतंक फैलाने के लिए भेजा गया है। सम्भावना जताई जा रही है कि ये आतंकी अयोध्या, फ़ैजाबाद और गोरखपुर में छिपे हो सकते हैं। सात में से पाँच आतंकियों की पहचान भी हो गई है।

जिन 5 आतंकियों की पहचान हुई है, उनके नाम है– मोहम्मद याकूब, अबू हमजा, मोहम्मद शाहबाज, निसार अहमद और मोहम्मद कौमी चौधरी। ख़ुफ़िया विभाग सभी जानकारियों को जुटा रहा है और इन आतंकियों के मंसूबों को नाकाम करने के लिए लगातार लगा हुआ है। सोमवार (नवंबर 4, 2019) को ख़ुफ़िया विभाग ने पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित नरोवाल में आतंकी कैम्पों का पता लगाया है। इन कैम्पों में आतंकियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। यह भी जानने लायक बात है कि जिस सीमावर्ती जिले में ये आतंकी जमे हुए हैं, करतापुर साहिब गुरुद्वारा भी वहीं पर स्थित है।

पंजाब में स्थित डेरा बाबा नानक साहिब और नरोवाल में स्थित करतारपुर साहिब गुरुद्वारा को कनेक्ट करते हुए पाकिस्तान ने सिख श्रद्धालुओं को वहाँ दर्शन करने की अनुमति दे दी है। ख़ुफ़िया सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के सीमावर्ती जिलों में स्थित अंडरग्राउंड आतंकी कैम्पों में कई महिलाओं को भी ट्रेनिंग दी जा रही है। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद से आतंकी पहले से ही बौखलाए हुए हैं लेकिन सुरक्षा बलों की सक्रियता के कारण वो किसी आतंकी हमले में सफल नहीं हो पाए। इसके बाद आतंकियों ने जम्मू कश्मीर में निर्दोष ट्रक ड्राइवरों व मजदूरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।

4 साल के बच्चे को चू**या कहने पर NGO ने स्वरा भास्कर के ख़िलाफ़ करवाई शिकायत दर्ज

4 साल के बच्चे पर अभद्र और नस्लवादी टिप्पणी करने के आरोप में लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम नामक एक NGO ने स्वरा भास्कर के ख़िलाफ राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग में कानूनी शिकायत दर्ज करवाई है।

अपने पत्र में आयोग के अध्यक्ष को एनजीओ ने स्वरा द्वारा एक कार्यक्रम में बाल कलाकार पर की गई टिप्पणी के बारे में शिकायत की। एनजीओ ने पत्र में लिखा कि स्वरा भास्कर ने ‘सन ऑफ अबिश’ नामक एक यूट्यूब शो में दक्षिण भारत के निश्चित क्षेत्र से आने वाले बच्चे पर अभद्र टिप्पणी करते हुए नस्लवादी और भेदभावपूर्ण बयान दिया।

संगठन ने अपने पत्र में उस वायरल वीडियो का लिंक भी दिया, जिसमें स्वरा अपने शुरुआती विज्ञापन शूट के बारे में बताती दिखीं, जोकि एक साबुन से संबंधित था। जिसमें स्वरा को बताते देखा जा सकता है कि वो अपने ऐड के दौरान इस बात से काफ़ी आश्चर्यचकित रह गई थीं जब एक चार साल के बाल कलाकार ने उन्हें ‘ऑन्टी’ कहकर संबोधित किया। स्वरा ने इस घटना का ज़िक्र करते हुए उस बाल कलाकार को ‘चू ** या’ कहा।

अपनी शिकायत में एनजीओ ने United Nations Convention of Child Rights का भी उल्लेख किया, जो बच्चों के ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार के भेद-भाव पर बात करता है। साथ ही इसमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 का हवाला देकर कहा गया कि जाति, वंश, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव करना कानूनी रूप से मना है।

शिकायत में कहा गया स्वरा द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा पूरे भारत में एक गलत मिसाल कायम करती है, जिसने दक्षिण भारत के बच्चों को नकारात्मक तस्वीर में चित्रित किया है।

इसके अलावा अपनी शिकायत में लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम ने स्वरा भास्कर की इस वीडियो को हॉटस्टार, ट्विटर, यूट्यूब सबसे हटाने की माँग की और कहा स्वरा पर कड़ी कार्रवाई की जाए।

छठ घाट पर फाड़ डाला बजरंगबली का झंडा: सलामत, इजामुल, अंसारी गिरफ्तार – गिरिडीह में तनाव

गिरिडीह के हीरोडीह थाना क्षेत्र के नारायण सिंहडीह गाँव में छठ घाट पर लगे बजरंगबली के झंडे को कुछ उपद्रवियों द्वारा उखाड़कर फेंकने व गंदा किए जाने से ग्रामीण काफी आक्रोशित हैं। पुलिस ने मामले में तीन लड़कों को गिरफ्तार भी किया है। इनके नाम हैं – सलामत रज़ा, इजामुल हक और वसीद अंसारी।

इसके अलावा पुलिस, अभियुक्त के रूप में शोएब अंसारी, तनवीर अंसारी, शमिमुल्ला, सराफत अंसारी और बुधन अंसारी को अपने साथ ले गई है। ग्रामीणों की तरफ से रविन्द्र कुमार वर्मा ने कसियोटोल के 11 युवकों के विरुद्ध धार्मिक झंडा फाड़ने, गन्दा करने और धर्म विशेष को नीचा दिखाने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी के लिए आवेदन किया था।

दैनिक जागरण के गिरिडीह संस्करण में छपी खबर का स्क्रीनशॉट

बता दें कि रविवार (नवंबर 3, 2019) को कसियाटोल के कुछ लड़कों ने छठ पर्व की समाप्ति के बाद घाट पर लगे झंडे को उखाड़कर फाड़ दिया था, जिसको लेकर दो समुदायों के बीच तनाव पैदा हो गया। दोनों पक्षों के बीच मामला सुलझाने का प्रयास किया गया लेकिन तनाव कम नहीं हुआ। इस मामले में पुलिस की सारी कोशिशें अब तक नाकाम रही हैं।

पुलिस का कहना है कि दोनों पक्षों की आपस में सुलह हो जाती, लेकिन कुछ कट्टरपंथियों की वजह से ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि वो लोग नहीं चाहते थे कि इनके बीच का तनाव समाप्त हो जाए। जिसकी वजह से बात बनते-बनते रह गई। 

अभी भी सुलह की कोशिशें की जा रही हैं। तनाव को कम करने के प्रयास में खोरीमहुआ एसडीएम धीरेंद्र सिंह, एसडीपीओ नवीन कुमार सिंह, जमुआ बीडीओ विनोद कर्मकार, सीओ रामबालक प्रसाद, पुलिस इंस्पेक्टर विनय राम ने दिन भर कसियोटोल एवं बदडीहा में कैंप किए। पुलिस ने कहा कि असामाजिक कार्य करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। जो भी दोषी होंगे, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही ऐहतियात के तौर पर कसियोटोल में पुलिस बल के जवान तैनात कर दिए गए हैं, ताकि मामला और न बिगड़े।

‘शिवसेना का जन्म ही कॉन्ग्रेस के आशीर्वाद से हुआ था’ – बाल ठाकरे ने इमरजेंसी का किया था समर्थन

महाराष्ट्र का राजनीतिक ऊँट किसी भी करवट बैठ सकता है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि शरद पवार ने सोनिया गाँधी के साथ बैठक की, जिसमें शिवसेना को समर्थन करने पर ज़रूर चर्चा हुई होगी। हालाँकि, पवार ने इसे सिर्फ़ राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा करार दिया। वैसे देखा जाए तो शिवसेना और कॉन्ग्रेस पहले भी एक-दूसरे का समर्थन कर चुकी है। या कह सकते हैं कि शिवसेना ने कई मौक़ों पर कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था। बाल ठाकरे ने आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी का समर्थन कर सबको चौंका दिया था। यह और बात है कि शिवसेना के संस्थापक अपने हिंदुत्ववादी विचारों के लिए जाने जाते थे।

ये किस्सा 1975 का है, जब इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगा कर कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया था। तब बालासाहब ठाकरे पर भी गिरफ़्तारी की तलवार लटकी थी। ऐसा इसलिए, क्योंकि ठाकरे कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े विरोधियों में से एक थे। कार्टूनिस्ट के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले ठाकरे अपने कार्टूनों से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को निशाना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। वह अपने भाषणों में कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ आग उगलते थे। फायरब्रांड नेता होने के कारण उनके बयान चर्चा में भी रहते थे। ऐसे में ठाकरे द्वारा इंदिरा गाँधी और आपातकाल का समर्थन करना चौंकाने वाला था।

बालासाहब इतने पर ही नहीं रुके थे। उन्होंने 1977 के आम चुनाव और 1978 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था। इसका नतीजा ये हुआ कि पार्टी को न सिर्फ़ मुंबई बीएमसी बल्कि पूरे महाराष्ट्र में जनता का समर्थन नहीं मिला उन चुनावों में शिवसेना को कॉन्ग्रेस का समर्थन करना भरी पड़ा। ये मुद्दा जनवरी 2018 में फिर से तब उछला था, जब महाराष्ट्र सरकार ने इमरजेंसी के दौरान जेल गए लोगों को पेंशन देने की घोषणा की थी। एनसीपी ने शिवसेना से पूछा था कि क्या बाल ठाकरे द्वारा इमरजेंसी का समर्थन करना एक बड़ी भूल थी?

अगर आपको कोई कहे कि शिवसेना का जन्म ही कॉन्ग्रेस के आशीर्वाद से हुआ था, तो आपको शायद आश्चर्य हो। सीपीआई के संथापक और वयोवृद्ध वामपंथी नेता श्रीपद अमृत डांगे की बेटी रोजा देशपांडे का मानना है कि शिवसेना के उद्भव से लेकर उसके पूरे सेटअप के लिए कॉन्ग्रेस ही जिम्मेदार है। वह अपने इस बयान के पीछे तर्क देते हुए याद दिलाती हैं कि जब शिवसेना की स्थापना की घोषणा हुई थी, तब कॉन्ग्रेस नेता रामराव आदिक मंच पर मौजूद थे। शिवसेना की स्थापना 1966 में हुई थी। प्रसिद्ध वकील रामराव आदिक आगे जाकर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री भी बने।

शिवसेना का उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों, दोनों से ही संघर्ष के इतिहास रहा है। साथ ही पार्टी बौद्ध दलितों का भी विरोध कर चुकी है। यहाँ तक कि शिवसेना ने 1979 में मुस्लिम लीग के साथ भी गठबंधन किया था। आपातकाल के बारे में कई किस्से प्रचलित हैं। उनमें से एक ये भी है कि जब एक के बाद एक विपक्षी नेताओं को जेल भेजा जा रहा था, तब राज्य के मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने ठाकरे के सामने दो विकल्प रखे थे। उन्होंने ठाकरे से या तो आपातकाल का समर्थन करने या फिर जेल जाने का विकल्प दिया था। जेल जाने से बचने के लिए बाल ठाकरे ने आपातकाल और इंदिरा गाँधी का समर्थन किया, ऐसा कहा जाता है।

इसके बाद न सिर्फ़ 1977 लोकसभा और 1978 के बीएमसी चुनाव बल्कि 1980 के लोकसभा चुनाव में भी बाल ठाकरे ने कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था। उन्होंने कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ प्रत्याशी ही नहीं उतारे। शिवसेना ने बहाना बनाया कि बाल ठाकरे के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री एआर अंतुले के साथ निजी रिश्ते हैं, इसीलिए शिवसेना कॉन्ग्रेस का समर्थन कर रही है। शिवसेना-भाजपा का गठबंधन 1989 में फाइनल हुआ लेकिन बाल ठाकरे उससे पहले कई ऐसे दलों और लोगों के साथ गठबंधन बना चुके थे या समर्थन कर चुके थे, जिनका विरोध करते वो और उनकी पार्टी थकती नहीं थी। इन विरोधाभासों के कारण कम्युनिष्ट पार्टी कहती है कि कॉन्ग्रेस ने वामपंथियों के मुक़ाबले शिवसेना को खड़ा किया था।

1980 में शिवसेना द्वारा कॉन्ग्रेस का समर्थन करने का पार्टी को इनाम भी मिला था। एआर अंतुले के समर्थन के एवज में 2 शिवसेना नेताओं को विधान परिषद में भेजा गया। 1977 के मेयर चुनाव में शिवसेना ने मुरली देवड़ा का समर्थन किया, जिसके कारण पार्टी के पहले मेयर डॉक्टर हेमचन्द्र गुप्ता ने शिवसेना से इस्तीफा दे दिया था। मुरली के बेटे मिलिंद देवड़ा अभी मुंबई रीजनल कॉन्ग्रेस कमिटी के मुखिया हैं। 1982 में वो मौक़ा भी आया, जब शिवसेना के संस्थापक-अध्यक्ष बाल ठाकरे ने शरद पवार और जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मंच साझा किया। उन्होंने गिरनगाँव मिल में मजदूरों के हड़ताल को लेकर दशहरा रैली के दौरान पवार के साथ मंच साझा किया।

यह भी जानने लायक बात है कि ठाकरे ने उसी कॉन्ग्रेस का विरोध करने के लिए पवार के साथ मंच साझा किया, जिसके वो पहले समर्थक रहे थे। बाल ठाकरे के बाद के दिनों में भी हमें ऐसे मौके देखने को मिले जब उन्होंने 2007 में राष्ट्रपति पद के लिए कॉन्ग्रेस समर्थित उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था। उस दौरान वरिष्ठ भाजपा नेता भैरों सिंह शेखावत स्वतंत्र उम्मीदवार थे और उन्हें राजग का समर्थन प्राप्त था लेकिन शिवसेना ने गठबंधन लाइन से अलग जाकर पाटिल का समर्थन किया। इस बात पर भी गौर कीजिए कि जिस चीज का नाम लेकर ठाकरे ने शेखावत का विरोध किया था, आज उनकी पार्टी वही कर रही है।

बाल ठाकरे ने कहा था कि भैरोंसिंह शेखावत स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में इसीलिए चुनाव लड़ रहे हैं क्योंकि भाजपा की तरफ़ से खड़े होने पर उन्हें कई दलों का समर्थन नहीं मिलता। ठाकरे ने इसे ‘सौदेबाजी’ करार देते हुए कहा था कि वो इसका समर्थन नहीं करते। बाल ठाकरे की पार्टी आज भाजपा के साथ ‘सौदेबाजी’ में लगी है और रोज मोलभाव किए जा रही है। इसी तरह 2012 में शिवसेना ने राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया था। मुखर्जी ने फोन कर के बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे से बात की थी। उस समय संजय राउत ने ही इसकी घोषणा की थी कि शिवसेना मुखर्जी का समर्थन करेगी। प्रणव मुखर्जी ने मातोश्री पहुँच कर बाल ठाकरे से मुलाक़ात भी की थी।

कुल मिला कर देखें तो ‘सौदेबाजी’ और मोलभाव शिवसेना के भीतर तब से है, जब से उसकी स्थापना हुई थी। ‘ठाकरे’ फ़िल्म के डायलॉग ‘लूँगी उठाओ, पूँगी बजाओ’ को लेकर विरोध हुआ था क्योंकि इसमें दिखाया गया था कैसे बाल ठाकरे ने दक्षिण भारतीयों का विरोध किया था। एक समय ऐसा भी आया, जब मुंबई से बिहारियों को भगाया जाने लगा। बौद्ध दलितों से टकराव की बात हम ऊपर कर चुके हैं। बालासाहब ने मनमोहन सिंह को भी ‘काफ़ी बुद्धिमान और सौम्य’ प्रधानमंत्री बताया था। कुल मिला कर देखें तो शिवसेना की राजनीति विरोध और ‘सौदेबाजी’ पर ही टिकी हुई है।

…अब पाकिस्तान में टेनिस मैच भी नहीं खेला जाएगा, ITF ने लिया निर्णय: 5 दिन में माँगा Pak से जवाब

इंटरनेशनल टेनिस फेडरेशन (ITF) ने सुरक्षा कारणों के कारण भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले डेविस कप मुकाबले को न्यूट्रल वेन्यू पर करवाने का फैसला किया है। इस बात की जानकारी खुद ITF ने सोमवार (नवंबर 5, 2019) को बयान जारी करके दी। आईटीएफ ने बताया कि इस्लामाबाद में होने वाले टेनिस मुकाबले को न्यूट्रल वेन्यू पर शिफ्ट कर दिया गया है।

अपने बयान में आईटीएफ ने साफ कहा, “एशिया/ओसनिया ग्रुप-1 मुकाबले को इस्लामाबाद में नहीं करने का फैसला किया गया है। अब यह मुकाबला न्यूट्रल वेन्यू पर आयोजित किया जाएगा।” बता दें ये मुकाबला 29-30 नवंबर को खेला जाना है।

सोमवार को आए बयान के मुताबिक, ITF के सुरक्षा सलाहकारों की ओर से प्राप्त रिपोर्ट की समीक्षा के बाद डेविस कप कमिटी ने ये फैसला किया है कि अब भारत-पाक मैच न्यूट्रल वैन्यू पर खेला जाएगा। जिसके लिए पाकिस्तान टेनिस फेडरेशन के पास अब किसी भी न्यूट्रल वेन्यू को नॉमिनेट करने का विकल्प है, इसे चुनने के लिए उसे ITF से 5 दिन का समय मिला है।

ITF ने अपने बयान में बताया है कि विकल्प का चयन और उसपर स्वीकृति के बाद वेन्यू की जानकारी दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि आईटीएफ और डेविस कप कमिटी की पहली प्राथमिकता ऐथलीटों, अधिकारियों और दर्शकों की सुरक्षा है। जिसके आधार पर उन्होनें ये फैसला लिया है।

ITF के इस फैसले को सोशल मीडिया पर यूजर्स द्वारा काफी सराहा जा रहा है। लोगों का कहना है कि ये बिलकुल उचित निर्णय है और इसके लिए ITF का धन्यवाद।

वहीं कुछ लोगों का ये भी कहना है कि इस मैच को दुबई या फिर अफगानिस्तान में करवाया जाना चाहिए। ताकि दोनों टीमों के हिस्से बराबर समर्थन आए।

गौरतलब है कि पाकिस्तान में खिलाड़ियों की आतंरिक सुरक्षा लंबे समय से एक बड़ी चुनौती का विषय बनी हुई है। अभी हाल ही में श्रीलंकाई खिलाड़ियों को भी पाकिस्तान में भारी सुरक्षा के बीच उनके होटल तक पहुँचाया गया था, तब सोशल मीडिया पर मजाक बना था कि पाक खुद जानता है उनके सरजमीं पर कोई सुरक्षित नहीं है, इसलिए खिलाड़ियों प्रधानमंत्री से भी ज्यादा सुरक्षा मुहैया करवाई गई है।

APJ अब्दुल कलाम का नाम अवॉर्ड से हटा दिया, मुख्यमंत्री ने उसके साथ अपने पापा का नाम जोड़ा

आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की सरकार ने मिसाइल मैन और देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजी अब्दुल कलाम के नाम पर मेधावी छात्रों को दिए जाने वाले स्कॉलरशिप का नाम बदलकर वाईएसआर विद्या पुरस्कार कर दिया है। आंध्र प्रदेश सरकार ने 4 नवंबर को एक अधिसूचना जारी किया, जिसमें एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर दिए जाने वाले स्कॉलरशिप का नाम वाईएसआर विद्या पुरस्कार किए जाने की बात कही गई।

आंध्र प्रदेश सरकार ने मौलाना अबुल कलाम आजाद की जन्मतिथि पर यह बदलाव करने का फैसला किया। बता दें कि मौलाना अबुल कलाम आजाद की जन्मतिथि 11 नवंबर है और इसे पूरा देश राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाता है। यह भी जानना जरूरी है कि जगन मोहन रेड्डी के पिताजी का नाम वाईएसआर रेड्डी है।

जगन मोहन रेड्डी सरकार का कहना है कि 11 नवंबर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के अवसर पर राज्य के मोधावी छात्रों को ‘वाईएसआर विद्या पुरस्कार’ के तहत स्कॉलरशिप दिया जाएगा। पहले इस स्कॉलरशिप का नाम मिसाइलमैन वैज्ञानिक और पूर्वराष्ट्रपति के नाम पर ‘डॉ एपीजे अब्दुल कलाम प्रतिभा पुरस्कार अवार्ड’ था। जिसका नाम बदल दिया गया है। इसमें किए गए संशोधन से संबंधित दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं।

ये पुरस्कार केवल सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए है। इसे सरकारी स्कूल के मेधावी बच्चों के बीच वितरित किया जाएगा। इस मौके पर जिला के मंत्री, सांसद और विधायक भी उपस्थित रहेंगे।

बगदादी की ‘आतंकी’ बहन अपने पति, बहू और 5 बच्चों के साथ गिरफ्तार: कंटेनर से खींच कर निकाला

आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (IS) के सरगना रहे अबु बकर अल-बगदादी के खात्मे के बाद अब सुरक्षा एजेंसियों की नजर उसके परिवार वालों पर है। इसी सिलसिले में बगदादी की बहन रशमिया अवद को उत्तरी सीरिया के शहर से गिरफ्तार कर लिया गया है। यह गिरफ्तारी खुफिया जानकारी के आधार पर की गई।

द न्यू यॉर्क टाइम्स अखबार के मुताबिक 65 वर्षीय बगदादी की बहन रशमिया को सोमवार (नवंबर 4, 2019) को उत्तरी सीरिया के अजाज शहर से गिरफ्तार किया गया। यहाँ वो अपनी पति और रिश्तेदारों के साथ रहती थी। छापे के दौरान बगदादी की बहन एक कंटेनर में छुपी बैठी थी।

इस गिरफ्तारी के बाद तुर्की की ओर से कहा गया है कि आतंकवाद के खिलाफ यह एक बड़ी सफलता है। तुर्की के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि छापे के दौरान बगदादी की बहन को उसके पति, बहू और पाँच बच्चों के साथ गिरफ्तार किया है। तुर्की की जाँच एजेंसियाँ इनसे गहन पूछताछ कर रही है।

अधिकारी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि पूछताछ के दौरान बगदादी की बहन IS के कामकाज और उसकी खुफिया जानकारियों का खुलासा करेगी क्योंकि शक है कि रशमिया खुद भी एक आतंकी है और उसे बगदादी के साथ-साथ उसके पूरे नेटवर्क की जानकारी है। जिससे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में और मजबूत होगी। इससे आतंकी संगठन आईएस को खत्म करने में मदद मिलेगी और इस काम में लिप्त बाकी लोगों को भी पकड़ा जा सकेगा।

इससे पहले 27 अक्टूबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने IS सरगना अबु बकर अल बगदादी को एक ऑपरेशन में मारने का दावा किया था। ट्रंप ने कहा था कि इडलिब में अमेरिकी डेल्टा फोर्स के एक ऑपरेशन में बगदादी मारा गया। ऑपरेशन के वक्त बगदादी एक मकान में था। जब अमेरिकी सेना ने उस पर हमला किया तो वो अपने तीन बच्चों के साथ एक सुरंग में भागने लगा। अमेरिका सेना और अमेरिकन आर्मी के कुत्तों ने कुछ देर तक उसे दौड़ाया इसके बाद चारों ओर से घिरा देख बगदादी ने खुद को उड़ा लिया था।

इस्सामिक स्टेट के प्रवक्ता अबु हमजा अल-कुरैशी ने 31 अक्टूबर को ऑडियो मैसेज जारी कर बगदादी के मारे जाने की पुष्टि की थी। उसने बताया था कि अबु इब्राहिम अल-हाशिमी अल-कुरैशी को बगदादी के स्थान पर संगठन का नया सरगना बनाया गया है।

CM पद को लेकर समझौता नहीं करेगी BJP: फडणवीस-ठाकरे, NCP-कॉन्ग्रेस-SS के बाद अब तीसरा विकल्प!

महाराष्ट्र में लगातार बदलते सियासी समीकरण के बीच सोमवार (नवम्बर 4, 2019) को एनसीपी के मुखिया ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाक़ात की। इस मुलाक़ात का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला क्योंकि क़रीब आधे घंटे तक चली बैठक के बाद निकल कर पवार ने दोहराया कि उन्हें विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है। साथ ही उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि सोनिया के साथ सरकार गठन को लेकर चर्चा हुई। उन्होंने इसे महाराष्ट्र के ताज़ा राजनीतिक परिदृश्य पर हुई चर्चा करार दिया। लेकिन हाँ, पवार अपने मौजूदा स्टैंड को साफ़ करते हुए ये कहने से भी नहीं चूके कि भविष्य में क्या होगा, उन्हें पता नहीं।

भाजपा के दो महासचिवों सरोज पांडेय और भूपेंद्र यादव को महाराष्ट्र भेजा गया था लेकिन ये दोनों ही दिल्ली लौट आए हैं। पार्टी आलाकमान से चर्चा करने के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी दिल्ली में हैं। दोनों महासचिव शिवसेना से आखिरी दौर की बातचीत करने के बाद ही दिल्ली आए हैं लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला। भाजपा सीएम पद को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है। उधर महाराष्ट्र के पर्यटन मंत्री जयकुमार रावल ने शिवसेना के रुख को देखते हुए राज्य में दोबारा चुनाव कराने की इच्छा व्यक्त की।

फडणवीस के क़रीबी मंत्री ने कहा कि शिवसेना के रुख से भाजपा कार्यकर्ता नाराज़ हैं और वो चाहते हैं कि दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ें। भाजपा ‘देखो और इंतजार करो’ की भूमिका में है। पार्टी ने शिवसेना की माँगों के सामने झुकने से इनकार कर दिया है। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने इकनोमिक टाइम्स को बताया कि शिवसेना ने 124 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जो महाराष्ट्र में कुल सीटों का आधा भी नहीं है। उनका सवाल था कि ऐसे में शिवसेना किस मुँह से 50-50 की बातें कर रही है? भाजपा इस बात को लेकर भी दृढ़ है कि शिवसेना को गृह मंत्रालय भी नहीं दिया जाएगा।

शिवसेना नेता संजय राउत ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाक़ात कर कहा कि राज्य में जल्दी से जल्दी सरकार का गठन होना चाहिए। राउत ने दावा किया कि शिवसेना सरकार गठन की राह में रोड़ा नहीं अटका रही है। फडणवीस ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलाक़ात की। उन्होंने बताया कि वो महाराष्ट्र में हुए बेमौसम बरसात को लेकर केंद्र से मदद माँगने आए हैं। उधर एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने भी कहा कि राज्य में जल्द से जल्द नई हुकूमत को आना चाहिए, जिससे बारिश से बेहाल किसानों के लिए कुछ किया जा सके। दिल्ली और मुंबई में हुई किसी भी हाई-प्रोफाइल बैठक का कोई नतीजा सामने नहीं आया।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की चिंता है कि विचारधारा अलग होने के कारण शिवसेना-कॉन्ग्रेस का गठबंधन चल पाएगा या नहीं? हालाँकि, पार्टी नेता कहते हैं कि बाल ठाकरे के रहते शिवसेना ने प्रणव मुखर्जी की राष्ट्रपति उम्मीदवारी का समर्थन किया था। प्रतिभा पाटिल के समय भी शिवसेना ने भाजपा उम्मीदवार के ख़िलाफ़ जाते हुए उनका समर्थन किया था। एनसीपी और कॉन्ग्रेस इस विकल्प पर भी विचार कर रही है कि शिवसेना को समर्थन देकर राज्य में सरकार बनाई जाए और भाजपा को सत्ता से बाहर रखा जाए। उधर 121 विधायकों के समर्थन का दावा कर रही भाजपा ने फ़िलहाल अल्पमत वाली सरकारी के गठन वाली बातों को नकार दिया है।

मीडिया सूत्रों का कहना है कि शिवसेना ख़ुद चाहती है कि भाजपा को सरकार गठन के लिए राज्यपाल की तरफ़ से न्योता मिले क्योंकि स्पीकर के चुनाव के समय ही यह पूरी तरह साफ़ हो जाएगा कि पार्टी को कितना समर्थन है? यह भी देखने वाली बात है कि शिवसेना के एकमात्र मंत्री केंद्र सरकार में बने हुए हैं, इसीलिए कई लोगों का मानना है कि पार्टी सिर्फ़ मोलभाव कर रही है। संजय राउत ने दोनों प्रमुख विपक्षी दलों से संपर्क साधा है। कॉन्ग्रेस के कई नेताओं का कहना है कि ज़रूरी नहीं है कि पार्टी सरकार में शामिल हो, शिवसेना को बाहर से समर्थन दिया जा सकता है।

कॉन्ग्रेस यह तभी करेगी जब शिवसेना राजग से पूरी तरह अलग हो जाए। कुछ दिनों में राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आएगा। कॉन्ग्रेस की चिंता है कि अगर शिवसेना ने मंदिर बनाने का खुला समर्थन किया तो पार्टी क्या करेगी?