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TN शेषन बदल दी थी EC की तस्वीर: राव से लेकर लालू यादव तक किसी को भी नहीं बख्शा, PM मोदी ने जताया शोक

भारत में चुनाव नियमों को सख़्ती से लागू करवाने के लिए मशहूर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का रविवार (10 नवंबर) को निधन हो गया। 87 वर्षीय शेषन ने कार्डियक अरेस्ट के बाद चेन्नई में अंतिम साँस ली। भारत के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का पूरा नाम तिरुनेलै नारायण अय्यर शेषन था। वह 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर, 1996 तक इस पद पर रहे। उन्होंने भारतीय चुनाव प्रणाली में कई बदलाव किए। मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत भी भारत में उन्हीं के द्वारा शुरू की गई थी। 1996 में उन्हें रैमन मैग्सेसे अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था।

शेषन के बारे में यह बात प्रसिद्ध थी कि ‘राजनेता सिर्फ़ दो लोगों से डरते हैं, एक भगवान और दूसरे शेषन’। देश में चुनाव व्यवस्था में शुचिता, पारदर्शिता लाने का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने ट्वीट किया, “टीएन शेषन एक उत्कृष्ट सिविल सेवक थे। उन्होंने अत्यंत परिश्रम और निष्ठा के साथ भारत की सेवा की। चुनावी सुधारों के प्रति उनके प्रयासों ने हमारे लोकतंत्र को मजबूत और अधिक सहभागी बनाया है। उनके निधन का दुख है। ओम शांति।”

पीएम मोदी के अलावा, गृहमंत्री अमित शाह समेत अन्य नेताओं ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

बता दें कि भारत में चुनाव व्यवस्था में जब-जब सुधार की बात की जाएगी, तब-तब शेषन को याद किया जाएगा। वास्तव में वे ही थे, जिन्होंने चुनाव आयोग की तस्वीर बदल दी थी। चुनाव संबंधी नियमों को कड़ाई से लागू करवाने के लिए उन्होंने अपने कार्यकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव किसी को नहीं बख़्शा था।

टीएन शेषन पहले ऐसे चुनाव आयुक्त थे जिन्होंने बिहार में पहली बार चार चरणों में चुनाव करवाया था। इस दौरान उन्होंने मात्र गड़बड़ी की आशंका होने पर ही चारों बार चुनाव की तारीखें बदल दी थी। साथ ही बूथ कैप्चरिंग के लिए बिहार में उन्होंने अर्धसैनिक बल की तैनाती भी कर दी थी। इसके अलावा, चुनाव प्रचार के दौरान खर्च पर अंकुश लगाने की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी।

जानकारी के अनुसार, शेषन जब नए-नए मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे, उस दौरान पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि आयोग में कोई काम तो होता नहीं तो वो करते क्या हैं? इस पर उन्होंने कहा था कि वह अपने ऑफ़िस में बैठकर क्रॉसव‌र्ल्ड पजल्स खेलते हैं।

बता दें कि शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले चुनाव आयोग की छवि बहुत अच्छी नहीं थी। मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले शेषन ने कई मंत्रालयों में काम किया और वो जहाँ भी गए उस मंत्री और मंत्रालय की छवि सुधर गई। मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालने से पहले 1989 में वह देश के 18वें कैबिनेट सचिव के पद पर थे।

अगर बाबरी मस्जिद अवैध थी तो लालकृष्ण आडवाणी पर मुकदमा क्‍यों चल रहा: ओवैसी ने SC के फैसले पर उठाया सवाल

अयोध्या भूमि विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की पीठ ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यदि बाबरी मस्जिद अवैध थी, तो इसे ढहाने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी पर मुकदमा क्यों चल रहा है और अगर यह वैध थी, तो आडवाणी को जमीन क्यों दी जा रही है? हैदराबाद के सांसद ने इस बात पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि जिस इंसान ने किसी का घर गिराया, कैसे उसे वही घर दिया जा सकता है।

जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में खामियाँ बताईं। उन्‍होंने अपनी बात दोहराई कि ‘सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है लेकिन अचूक नहीं।’ ओवैसी ने कहा, “यदि एक व्यक्ति आपका घर गिरा देता है और आप पंच के पास जाते हैं और वह आपका घर उसी व्यक्ति को दे देता है, जिसने आपका घर गिराया और कहता है कि इसके बदले आपको दूसरी जगह जमीन दी जाएगी तो आपको कैसा लगेगा?” ओवैसी ने कहा कि उनका मूल सवाल यह है कि यदि बाबरी मस्जिद अवैध थी तो मस्जिद को ध्वस्त करने वाले आडवाणी और अन्य लोगों पर मुकदमा क्यों चल रहा है?

ओवैसी ने उन लोगों पर भी निशाना साधा जो मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध करने को लेकर उनकी आलोचना कर रहे हैं। ओवैसी ने कहा कि यह उनका संवैधानिक अधिकार है कि वह इसका विरोध करें। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य स्थान पर 5 एकड़ जमीन देने की बात मुस्लिमों का अपमान है। उन्होंने कहा, “बाबरी मस्जिद हमारा कानूनी अधिकार है। हम जमीन के लिए नहीं लड़ रहे थे। हमें खैरात नहीं चाहिए। हमें भिखारी मत समझिए। हम भारत के सम्मानित नागरिक हैं।”

इसके साथ ही ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि 80 साल की उम्र में भी राजीव धवन ने अदालत में घंटों बहस की। उन्होंने कहा, “राजीव धवन साहब का शुक्रिया अदा करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं है। तथ्य यह है कि उन्होंने इस मामले को लिया और परीक्षा की इस घड़ी में लड़ना अपने आप में एक बड़ी बात है।” सांसद ने कहा कि कपिल सिब्बल ने भी मामले में अपना योगदान दिया, लेकिन कॉन्ग्रेस ने उन्हें केस लड़ने से रोक दिया।

अयोध्या मामला: मुस्लिम पक्ष के पास बचा है यह रास्ता, 17 नवंबर को सुन्नी वक्फ बोर्ड करेगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अयोध्या विवाद पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया। फैसले में राम जन्मभूमि की माँग करने वालों को जमीन सुपुर्द कर दी गई और मस्जिद की माँग करने वालों को दूसरी जगह पर 5 एकड़ जमीन देने का निर्देश दिए गए। हालाँकि, इस फैसले के बाद कुछ मस्जिद पक्षकार नाखुश नजर आए और उन्होंने मामले पर रिव्यू याचिका डालने की बात की। लेकिन इस कथन पर अमल किया जाएगा या नहीं, ये अब भी सवाल है।

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का अध्ययन कर रहा है। खबर के मुताबिक, इस अध्ययन के बाद वह 17 नवंबर को रिव्यू पिटीशन डालने पर फैसला करेगा। खुद AIMPLB (ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) के वकील जफरयाब जिलानी ने शनिवार को इसपर संकेत दिए थे कि वो रिव्यू पेटिशन के साथ सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

दरअसल, AIMPLB के सदस्यों का सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला नहीं सुनाया। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर छुपकर मूर्ति रखी गई। इसके अलावा कोर्ट का ये भी कहना है कि कानून तोड़ते हुए 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को ढहाया गया। लेकिन फिर भी जमीन मंदिर को क्यों दी गई।

इसके बाद AIMPLB का ये भी तर्क है कि उन्होंने हिंदुओं को सीता रसोई और चबुतरे पर पूजा करने से कभी मना नहीं किया। सुन्नी वक्फ बोर्ड का कहना है कि उनके पास ज़मीन की कोई कमी नहीं है। उन्हें बस न्याय चाहिए।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1045 पन्नों के फैसले में पूरी विवादित जमीन पर रामलला का हक माना है। इस जमीन पर मंदिर निर्माण की रूपरेखा तैयार करने के लिए केंद्र सरकार को 3 महीने में ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया गया है। केंद्र सरकार ही ट्रस्ट के सदस्यों का नाम निर्धारित करेगी। साथ ही मंदिर निर्माण में कार्य आगे बढ़ेगा।

राम मंदिर की नींव हिन्दू नववर्ष या रामनवमी पर रखी जाए, संतों ने सुझाई ये 2 तारीखें: रिपोर्ट्स

अयोध्या भूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद राम मंदिर के निर्माण को लेकर संत समाज ने दो तारीखों का सुझाव दिया है। अखिल भारतीय संत समिति ने सर्वसम्मति से कहा कि मंदिर की नींव हिन्दू नववर्ष (नव संवत्सर) या भगवान राम के जन्मदिन (रामनवमी) को ही रखी जाए। पंचांग के अनुसार, हिन्दू नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है, जो 2020 में 25 मार्च से शुरू होगा। रामनवमी 2 अप्रैल को है। इन दोनों तारीखों को लेकर संघ भी सहमत है।

दैनिक भास्कर ने संघ के सूत्रों के हवाले से लिखा कि मंदिर निर्माण से जुड़ी आगे की रूपरेखा संत समाज की सहमति से ही तय की जाएगी। बता दें कि इससे पहले मंदिर निर्माण की ज़िम्मेदारी विश्व हिन्दू परिषद (VHP) पर थी। लेकिन, अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने को कहा है। इसलिए संत समाज और संघ की भूमिका काफ़ी महत्वपूर्ण हो गई है। वहीं, VHP के नेताओं ने भी संतों द्वारा सुझाई गई दो तारीखों पर अपनी सहमति दी है और कहा कि उनके द्वारा सुझाई गईं तारीख़ों से बेहतर और कोई तारीख़ नहीं हो सकती। कुल मिलाकर अब सरकार पर भी दबाव रहेगा कि वो जल्द ही ट्रस्ट बनाए और इसमें संतों के प्रमुख वर्गों को शामिल करें।

बता दें कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने रविवार (10 नवंबर) देश के प्रमुख धर्मगुरुओं के साथ बैठक की थी, जिसका मक़सद धर्मगुरुओं के साथ संवाद और सम्पर्क के ज़रिए सभी समुदायों के बीच भाईचारे की भावना को मज़बूत बनाना था। धर्मगुरुओं ने दशकों पुराने अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने का संकल्प लिया। चार घंटे तक हुई इस बैठक में स्वामी अवधेशानंद गिरी, बाबा रामदेव, स्वामी चिदानंद सरस्वती, स्वामी परमात्मानंद, मौलाना अरशद मदनी, मौलाना कल्बे जव्वाद आदि मौजूद थे। अवधेशानन्द गिरी धर्माचार्य सभा के चेयरमैन हैं। मौलाना कल्बे जव्वाद शिया धर्मगुरु हैं, वहीं मौलाना अरशद मदनी भी अपने समुदाय में ख़ासा रसूख रखते हैं।

इसके अलावा, रविवार को 4223 जगह ईद-ए-मिलादुनबी (बारावफात) के जुलूस निकले। अयोध्या में कई जगहों पर हिन्दुओं ने फूलों से जुलूस का स्वागत किया। इसी तरह मुस्लिम नेताओं ने राम जन्मभूमि न्यास पहुँचकर रामलला को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के लिए बधाई भी दी। इमाम शमसुल कमर क़ादरी ने कहा कि सौहार्द बनाए रखना सबकी ज़िम्मेदारी है। इसलिए हमने कोर्ट के फ़ैसले के दिन शनिवार (9 नवंबर) को बारावफात के जुलूस नहीं निकाले।

ग़ोरतलब है कि करीब 500 साल पुराना अयोध्या विवाद शनिवार को आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की पॉंच जजों की पीठ ने 1045 पन्नों के अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला को सौंप दी है। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश भी सरकार को दिया है।

उद्धव बनेंगे मुख्यमंत्री: शिवसेना नेता अरविंद सावंत ने किया केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे का ऐलान

महाराष्ट्र में चल रहे राजनीतिक संकट के बीच शिवसेना नेता अरविंद सावंत ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे का ऐलान कर दिया है। उन्होंने आज 11 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की बात कही है। आपको बता दें कि सावंत मोदी कैबिनेट में भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम मंत्री हैं।

बता दें कि राज्य में हाल के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी ने सरकार बनाने में असमर्थता जताई। जिसके बाद राज्य के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए आमंत्रण दिया है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि शिवसेना कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर शिवसेना सरकार का गठन कर सकती है। उल्लेखनीय है कि शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) ने कहा है कि यदि शिवसेना एनडीए का साथ छोड़ देती है तो महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए उसे समर्थन देने पर विचार हो सकता है।

एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा कि यदि शिवसेना को हमारा समर्थन चाहिए तो उसे बीजेपी के साथ सारे रिश्ते तोड़ने का ऐलान करना होगा। उसे एनडीए से बाहर आना होगा और मोदी कैबिनेट में शामिल उसके पार्टी नेताओं को इस्तीफा देना होगा।

और अब ऐसा लग रहा है कि सरकार बनाने के लिए शिवसेना ने एनसीपी की शर्तों को मानते हुए केंद्र में बीजेपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ने का फैसला किया है। अरविंद सावंत ने मराठी में ट्वीट किया, “शिवसेना का पक्ष सत्य के साथ है। ऐसे खराब माहौल में दिल्ली की सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। मैं मंत्री पद से इस्तीफा दे रहा हूँ और आज 11 बजे प्रेस के सामने अपना पक्ष रखूँगा।” सावंत के केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे के ऐलान के साथ ही यह साफ हो गया है कि शिवसेना ने एनडीए छोड़ने का मन बना लिया है।

गौरतलब है कि बीजेपी 105 सीट लेकर सबसे बड़ी पार्टी लेकर उभरी तो शिवसेना को 56 सीटें मिली। जो जरुरी बहुमत 145 से कहीं अधिक ज्यादा था। वहीं कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटें मिली है। राज्य विधानसभा में कुल 288 सीटें है। लेकिन शिवसेना ने सीएम पद पर दावेदारी ठोक दिया। और बीजेपी ने शिवसेना की माँग 50-50 के फार्मूले को नकार दिया है। जिसके बाद शिवसेना ने एनसीपी और कॉन्ग्रेस के साथ सरकार बनाने का निर्णय लिया है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को दिए 5 एकड़ ज़मीन पर सलीम ख़ान ने- कॉलेज तो जावेद अख़्तर ने कहा- बने अस्पताल

लंबे समय से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (9 नवंबर) को ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। पाँच जजों की संवैधानिक पीठ ने 40 दिनों की सुनवाई के बाद यह फ़ैसला सुनाया। फ़ैसले के तहत विवादित ज़मीन राम लला के हक़ में गई। इसके साथ ही मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ ज़मीन अलग से मस्जिद के लिए देने की बात कही।

बता दें कि अयोध्या फ़ैसले का स्वागत करते हुए हिन्दी सिनेमा जगत की हस्तियों द्वारा प्रतिक्रियाएँ दर्ज की जा चुकी हैं। हाल ही में सलमान ख़ान के पिता सलीम ख़ान ने मस्जिद निर्माण के लिए मिलने वाली ज़मीन पर स्कूल या अस्पताल बनाने की सलाह दे चुके हैं। इसी बीच अब गीतकार और लेखक जाावेद अख़्तर ने 5 एकड़ ज़मीन पर अस्पताल बनाने सलाह दी है। जावेद अख़्तर ने ट्विटर के ज़रिए अपनी प्रतिक्रिया दी। इसमें उन्होंने लिखा, “बहुत अच्छा होगा अगर इस 5 एकड़ जमीन पर चैरिटेबल हॉस्पिटल बनाने का फैसला किया जाएगा। इसे सभी समुदाय के लोगों का समर्थन भी मिलेगा।”

इससे पहले 83 वर्षीय सलीम ख़ान ने अयोध्या फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा था कि अयोध्या में मुस्लिम पक्ष को मिलने वाली पाँच एकड़ ज़मीन पर स्कूल बनाया जाना चाहिए। मुस्लिमों को मस्जिद नहीं बल्कि स्कूल की ज़रूरत है। उन्होंने कहा था,

“फ़ैसला आने के बाद जिस तरीके से शांति और सौहार्द्र कायम रही यह प्रशंसनीय है। अब इसे स्वीकार कीजिए… एक पुराना विवाद समाप्त हुआ। मैं तह-ए-दिल से इस फ़ैसले का स्वागत करता हूँ। मुस्लिमों को अब इसकी (अयोध्या विवाद) चर्चा नहीं करनी चाहिए। इसकी जगह उनको बुनियादी समस्याओं की चर्चा करनी चाहिए और उसे हल करने की कोशिश करनी चाहिए। मैं ऐसी चर्चा इसलिए कर रहा हूँ कि हमें स्कूल और अस्पताल की ज़रूरत है। अयोध्या में मस्जिद के लिए मिलने वाली पाँच एकड़ जगह पर कॉलेज बने तो बेहतर होगा।”

पटकथा लेखक सलीम ख़ान के अलावा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर) जमीरउद्दीन शाह ने भी ऐसा ही कुछ कहा। अयोध्या फ़ैसले पर आधारित NDTV के एक चर्चा के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को दी जाने वाली ज़मीन पर स्कूल या अस्पताल का निर्माण क्यों नहीं कर लेना चाहिए? अयोध्या में पहले से ही पर्याप्त मस्जिदें हैं। 

चर्चा के कार्यक्रम में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को स्वीकार करते हुए उसका स्वागत तो किया था, लेकिन कोर्ट के बाहर इस मसले को हल न कर पाने पर निराशा भी जताई थी। उन्होंने कहा था कि पाँच एकड़ ज़मीन को स्वीकार करने में भले ही कुछ लोगों को दिक्कत हो रही है और वो कह रहे हैं कि उन्हें वो ज़मीन नहीं चाहिए। लेकिन उस ज़मीन को स्वीकार लेना चाहिए और उस पर मस्जिद की बजाय स्कूल या अस्पताल बनवा देना चाहिए।

पाकिस्तान की शर्मनाक हरकत: वॉर म्यूजियम में अभिनन्दन को दिखाया कैदियों की तरह

भारत को नीचा दिखाने की जुगत में पाकिस्तान एक बार फिर से अपनी ओछी हरकतों पर उतर आया है। दरअसल, पाकिस्तान ने अपने वॉर म्यूजियम में IAF के पॉयलट विंग कमांडर अभिनंदन का पुतला लगाया है। जिसमें वे एक पाकिस्तानी सैनिक की पकड़ में नजर आ रहे हैं।

इस तस्वीर को खुद पाकिस्तानी पत्रकार और राजनैतिक टिप्पणीकार अनवर लोधी ने अपने ट्विटर पर पोस्ट किया है। लोधी ने अपने ट्वीट पर लिखा, “पाकिस्तानी सेना ने संग्रहालय में अभिनंदन का पुतला लगाया है। इसे और दिलचस्प बनाया जा सकता था, अगर पुतले के हाथ में चाय का कप भी पकड़ा दिया जाता।” 

इस तस्वीर में नजर आ रहा है कि अभिनंदन के पुतले को काँच के बॉक्स में रखा गया है। जिसमें उनका चेहरा झुका हुआ और पाकिस्तानी फौजी का सीना तना हुआ दिखाया जा रहा है। इसके अलावा अभिनंदन के पुतले के बगल में एक मग भी रखा हुआ है। जिसे ये दर्शाने के लिए लगाया गया है कि उन्होंने अपनी हिरासत में अभिनन्दन को चाय भी पिलाई थी। जिसे पीते हुए उनकी वीडियो बहुत वायरल हुई थी। इस वीडियो में उनसे पाकिस्तानी अधिकारी पूछते नजर आ रहे थे कि चाय कैसी है और उन्होंने कहा था, “चाय शानदार है, धन्यवाद।”

गौरतलब है कि अभिनन्दन को चाय पिलाने की वीडियो जारी होने के बाद पाकिस्तान ने विश्व कप से पहले भी इसका फूहड़ता से मजाक उड़ाया था। उस समय भी भारत को नीचा दिखाने की कोशिश हुई थी। हालाँकि, बाद में भारत ने भी अपनी ओर से एक अलग विज्ञापन बनाकर जवाब दे दिया था।

यहाँ बता दें कि बालाकोट के आतंकी कैंपों पर हुई IAF की कार्रवाई के बाद अगले दिन पाकिस्तान ने भारत पर हवाई हमला करने की कोशिश की थी। जिसके जवाब में अभिनंदन ने अपने मिग-21 से उनके एक एफ-16 को मार गिराया था और अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए दूसरे को भी खदेड़ा था। इस दौरान वे पाकिस्तान की सीमा में जा गिरे थे और पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में लिया था। हालाँकि, वे पड़ोसी मुल्क में केवल कुछ ही घंटों के लिए थे, लेकिन इस प्रदर्शनी को देखकर लग रहा है, जैसे अभिनंदन को पकड़ना उनकी कोई उपलब्धि हो।

खैरात नहीं मुआवजा है मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन: ओवैसी पर बरसे ‘कारसेवक’ मोहम्मद आमिर

राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मस्जिद को दिए जाने वाले 5 एकड़ जमीन को खैरात बताया था। अब उनके इस बयान पर मोहम्मद आमिर उर्फ बलबीर सिंह का बयान सामने आया है। ओवैसी के इस बयान के लिए वो उन पर जमकर बरसे। बता दें कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस में मोहम्मद आमिर भी शामिल थे। फिर बाद में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया।

बता दें कि दशकों पुराने विवाद और 134 साल चली कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अयोध्या भूमि विवाद का फैसला सुना दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने एकमत से अयोध्या को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हुए पूरी 2.77 एकड़ विवादित जमीन रामलला विराजमान को सौंपकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। वहीं मुस्लिम पक्षकारों को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन देने का निर्णय सुनाया।

असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के इस फैसले पर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए कहा था कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना था कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि मुल्क हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है। संघ अब काशी और मथुरा के मुद्दे को भी उठाएगा।

अब ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मोहम्मद आमिर ने कहा कि मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को जो जमीन दी जा रही है, वो खैरात नहीं, बल्कि मुआवजा है। इससे पहले ओवैसी के बयान पर बाबा रामदेव ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि ओवैसी का अपना एक अलग मजहबी एजेंडा है। उस मजहबी एजेंडे को चलाकर ये अपना राज कायम रखना चाहते हैं और लोगों को अलग-अलग तरीके से भड़काना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “अगर ओवैसी का वश चले तो ये हैदराबाद में निजामी के समय की तरह ही दूसरा फसाद खड़ा कर दे, लेकिन इसकी औकात ही नहीं है इतनी कि हिन्दुस्तान का बँटवारा कर सके।”

आमिर 1 दिसंबर 1992 को देश भर से आने वाले हजारों कारसेवकों में शामिल होने के लिए अयोध्या पहुँचे थे। आमिर के अनुसार 6 दिसंबर को मध्य गुंबद पर चढ़ने वाले वो पहले व्यक्ति थे। बता दें कि आमिर ने एक मुस्लिम महिला से शादी की है और इस्लाम की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए एक स्कूल चलाते हैं। मोहम्मद आमिर और मोहम्मद उमर (एक अन्य कार सेवक जिन्होंने विध्वंस में भाग लिया था) ने मिलकर अब तक 100 से अधिक मस्जिदों का निर्माण किया है।

महाराष्ट्र: गवर्नर ने शिवसेना से पूछा- बनाएँगे सरकार, एनसीपी ने कहा- सम​र्थन चाहिए तो छोड़ो NDA

भाजपा ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने से इनकार कर दिया। इसके बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने दूसरे सबसे बड़े दल शिवसेना से सरकार गठन के बारे में पूछा है। गवर्नर कार्यालय की तरफ से इस संबंध में शिवसेना विधायक दल के नेता एकनाथ खडसे से सरकार बनाने की इच्छा के बारे में पूछा गया है।

बताया जाता है कि कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर शिवसेना सरकार का गठन कर सकती है। एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा है कि यदि गवर्नर सरकार बनाने के लिए शिवसेना को न्योता देते हैं तो पार्टी उसको समर्थन देने पर विचार कर सकती है। मलिक के अनुसार फिलहाल शिवसेना की ओर से उनकी पार्टी को कोई प्रस्ताव नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि इस संबंध अंतिम फैसला कॉन्ग्रेस और एनसीपी मिलकर करेगी।

मलिक ने बताया कि एनसीपी ने 12 नवंबर को अपने विधायकों की बैठक बुलाई है। उन्होंने कहा कि यदि शिवसेना को हमारा समर्थन चाहिए तो उसे बीजेपी के साथ सारे रिश्ते तोड़ने का ऐलान करना होगा। उसे एनडीए से बाहर आना होगा और मोदी कैबिनेट में शामिल उसके पार्टी नेताओं को इस्तीफा देना होगा।

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बता दें कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में शिवसेना भी शामिल है। महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव भी उसने बीजेपी के साथ ही मिलकर लड़ा था। लेकिन, नतीजे आने के बाद से वह ढाई साल के लिए सीएम पद मॉंग रही है। 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 105 और उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली है। कॉन्ग्रेस को 44 और उसकी सहयोगी एनसीपी को 54 सीटें मिली है।

इससे पहले महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने राज्यपाल से मुलाकात कर उन्हें बताया कि पार्टी सरकार नहीं बनाएगी। पाटिल ने शिवसेना पर जनादेश के अपमान का आरोप लगाया। पाटिल ने अफ़सोस जताते हुए कहा कि शिवसेना और भाजपा को बहुमत मिलने के बावजूद सरकार का गठन नहीं हो सका है। उन्होंने शिवसेना पर जनादेश का अपमान करने का आरोप लगाया। साथ ही कहा कि यदि कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ मिल कर शिवसेना सरकार चलाना चाहती है तो उन्हें हमारी शुभकामनाएँ है।

वहीं, शिवसेना सांसद संजय राउत ने फिर ​से अपनी पार्टी का सीएम होने की बात दोहराई है। उन्होंने कहा, “पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने साफ कहा है कि सीएम शिवसेना का होगा। जब उन्होंने कह दिया तो इसका मतलब है कि किसी भी कीमत पर शिवसेना का ही मुख्यमंत्री होगा।” इस बीच, पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने कहा है कि हालात पर पार्टी की नजर है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के लिए सभी विकल्प खुले हैं और पार्टी ने अभी तक अंतिम फैसला नहीं किया है।

जस्टिस गांगुली ने अयोध्या फैसले पर उठाए सवाल: काटजू को कठघरे में खड़ा कर चुके CJI गोगोई करेंगे तलब?

आज़ादी के बाद भारत एक संसदीय लोकतंत्र वाला देश बना। यहाँ अगर संसद को कानून बनाने का अधिकार है तो सुप्रीम कोर्ट को भी इसी व्यवस्था ने कानून की व्याख्या का सर्वोच्च अधिकार दिया है। दोनों ही संस्थाओं की अवमानना अथवा अपमान करने के सन्दर्भ में विभिन्न प्रकार की कार्रवाई के प्रावधान किए गए हैं। यही वजह है कि सियासी दलों से लेकर राजनीति के कई बड़े दिग्गज तक, सभी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर टिप्पणी करने से बचते हैं।

बावजूद इसके कुछ जज ऐसे होते हैं, जो रिटायर होने के बाद ऐसे ही बयान देते हैं, जैसा उनके कार्यकाल के दौरान किसी ने दिया होता तो वो उन्हीं जज के द्वारा तलब कर लिया जाता। अब अशोक गांगुली के बयान को ही देखिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 5 वरिष्ठ जजों द्वारा सर्वसम्मति से दिए गए फ़ैसले पर सवाल उठाया। अगर ये फ़ैसला उन्होंने दिया होता और किसी अन्य व्यक्ति (भले ही वो रिटायर्ड जज ही क्यों न हो) ने उस पर ऐसी टिप्पणी की होती, तो उसे जस्टिस गांगुली ही अवमानना ममले में कठघरे में खड़ा कर लेते। आइए आपको पूरा मामला समझाते हैं।

अयोध्या के सदियों पुराने भूमि-विवाद पर सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद ज्यादातर तबकों ने सामाजिक सद्भाव की बात कहते हुए कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन पर रामलला विराजमान का मालिकाना हक बताया, जबकि मस्जिद के लिए दूसरे पक्ष को 5 एकड़ ज़मीन देने की बात कही। लेकिन कुछ लोगों को यह फैसला पांच नहीं रहा। इनमे जस्टिस गांगुली भी हैं।

जस्टिस गांगुली ने कहा कि अल्पसंख्यकों ने अरसे तक वहाँ मस्जिद देखी है, जिसे तोड़ डाला गया। साथ ही उन्होंने कहा कि एक संविधान के विद्यार्थी के रूप में उन्हें इस फ़ैसले को समझने में मुश्किल आ रही है। कुछ ऐसा ही रिटायर्ड जज मार्कण्डेय काटजू के साथ हुआ था। काटजू ने अपने ब्लॉग में लिख दिया था कि जस्टिस रंजन गोगोई को क़ानून की समझ नहीं है। कुछ ही दिनों बाद वो अदालत की अवमानना मामले में उसी कोर्ट में खड़े थे, जहाँ उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई फ़ैसले सुनाए होंगे। जस्टिस गोगोई ने उनकी समीक्षा याचिका ख़ारिज कर दी थी। जस्टिस गोगोई ने तो गार्ड को बुला कर काटजू को कोर्ट से निकाल बाहर करने की बात भी कही थी, लेकिन वकीलों के निवेदन के बाद उन्होंने ऐसा नहीं किया।

सम्भावना तो ये भी है कि रिटायर्ड जस्टिस अशोक गांगुली के साथ भी ऐसा हो सकता है। उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का अपमान किया है। जस्टिस गांगुली ने यह भी कहा कि संविधान के लागू होने से पहले वहाँ क्या था, क्या नहीं- ये सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं है। इससे सीधा इंगित होता है कि जस्टिस गांगुली 1950 के बाद से ही भारत के इतिहास की शुरुआत मानते हैं। तभी एक समय ऐसा आया था जब अभिनेता अनुपम खेर ने उन्हें बड़ी विनम्रता से हजारों की भीड़ के सामने कहा था कि माफ़ कीजिए लेकिन आप ग़लत हैं। उस दौरान जस्टिस गांगुली ने असहिष्णुता गैंग के सुर में सुर मिलाया था।

सुप्रीम कोर्ट के जज रहे गांगुली दरअसल यह भूल गए कि उनकी यह टिप्पणी उन्हें महँगी पड़ सकती है। गांगुली खुद भी इस बात से अपरिचित नहीं होंगे कि न्यायालय के किसी आदेश पर टिप्पणी कर उसका निरादर करना कानूनी अपराध है। फैसले पर टिप्पणी करते हुए गांगुली ने कहा कि “इससे मुसलमान क्या सोचेगा”।

जस्टिस गांगुली भले ही कहें कि वहाँ मुस्लिमों ने एक अरसे से मस्जिद ही देखी है, क्या वो फिर संविधान के अस्तित्व में आने से पहले के भी काल का जिक्र नहीं कर रहे? इस तरह वो अपनी ही बातों में विरोधाभास पैदा कर रहे हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी मामले में आज़ादी से पहले क्या हुआ था और क्या नहीं, इस पर अदालत आँख ही मूँद ले? 2017 में जस्टिस कर्णन भी अवमानना मामले में कोर्ट में पेश हुए थे और उन्हें जेल का सामना भी करना पड़ा था। काटजू, कर्णन के बाद क्या अब गांगुली का भी नंबर हो सकता है?

अपने बयान में पूर्व जज गांगुली ने यहाँ तक कहा कि उस मस्जिद में नमाज़ पढ़ी जाती थी तब संविधान अस्तित्व में आया। मगर यह भूल गए कि कोर्ट में पेश साक्ष्यों ने इस बात की पुष्टि की कि मस्जिद बन जाने के बावजूद हिन्दू उसके बाहर अपने अराध्य श्रीराम भगवान की प्रार्थना किया करते थे और मौजूदा वक़्त में भी यह हिन्दुओं की आस्था का केंद्र है। अदालत ने भी सुनवाई के दौरान इस तथ्य को स्वीकार किया। अगर जज गांगुली यह कहते हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता का बचाव किया जाना चाहिए तो फिर यह क्यों भूल जाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी ‘धार्मिक स्वतंत्रता के बचाव’ की ही एक दलील की बात कहता है। इतना ही नहीं दोनों पक्षों की धार्मिक स्वतंत्रता का बचाव करता यह आदेश अपने आप में एक नजीर है।

लिहाज़ा जज रह रह चुके एक व्यक्ति का अदालत के फैसले पर इस प्रकार की टिप्पणी करना आखिर कितना मुनासिब है। जस्टिस गांगुली खुद 2008 में 2जी घोटाले में सभी कम्पनियों के लाइसेन्स रद्द करने वाले फैसले में शामिल रह चुके जज हैं।