हिन्दुओं के त्योहार, परम्पराओं और मान्यताओं को सम्मान देने के चलते अक्सर इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर आने वाली पश्चिम बंगाल की सांसद नुसरत जहां और हमेशा उनके साथ नज़र आने वाली मिमी चक्रवर्ती कोलकाता के एक वृद्धाश्रम में भाई फोंटा का पर्व मनाने पहुँची। बता दें कि हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक दीपवाली है, जो करीब पाँच दिनों तक मनाया जाता है। इसमें धनतेरस से लेकर नरक-चतुर्दशी और भैय्या दूज (भाई-फोंटा) शामिल है।
Kolkata: Trinamool Congress MPs Nusrat Jahan and Mimi Chakraborty participate in ‘Bhai Phonta’ celebration at an old age home. #WestBengalpic.twitter.com/jqjS7xsmCk
पूरे देश में भैया दूज का त्यौहार मनाया जा रहा है। इसी त्यौहार को मनाने के लिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद नुसरत जहां और मिमी चक्रवर्ती ने एक वृद्धाश्रम को चुना। बता दें कि ऐक्ट्रेस से राजनेता बनीं तृणमूल कॉन्ग्रेस की दोनों ही सांसद मिमी और नुसरत का इस कार्यक्रम में शरीक होने की तस्वीरें मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आईं। इस दौरान लोगों ने ट्वीट कर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ दीं। एक यूजर ने तो यहाँ तक लिख दिया कि “फतवे वाला मौलवी कहाँ है?”
बता दें कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब हिन्दू धर्म के किसी त्योहार में शामिल होने पर नुसरत जहां को सुर्खियाँ मिली हों लेकिन नकारात्मक खबरों के साथ। इससे पहले भी कई बार धार्मिक आयोजनों में शामिल होने पर नुसरत को जहाँ एक ओर एक बड़ा वर्ग सम्मान की दृष्टि से आदर देता है तो वहीं दूसरी ओर कट्टरपंथी मौलाना टाइप के लोग उनके खिलाफ ज़हर उगलने से नहीं चूकते। नुसरत जहां को हिन्दुओं के पर्व-त्योहार मनाने और उनकी परम्पराओं का सम्मान करने के लिए मौलाना फतवा तक जारी कर चुके हैं, इस्लाम से खारिज कर चुके हैं। सोशल मीडिया यूजर उन्हें गालियों से बींध चुके हैं।
इससे पहले दुर्गा पूजा के अवसर पर भी नुसरत के शरीक होने, सिन्दूर खेला में भाग लेने को लेकर कई कठमुल्लाओं ने कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की थी। नुसरत को अपनी मर्ज़ी से एक हिन्दू युवक से शादी करने पर भी ख़ासा विरोध झेलना पड़ा था। यही वजह है कि नुसरत ने इस मामले में अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा था कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता लोग क्या कहते हैं। बता दें कि दुर्गा पूजा के पंडाल में जाने पर नुसरत को गालियों का भी सामना करना पड़ा था। इस्लामिक कट्टरपंथ के गढ़ देवबंद में तो एक उलेमा ने यहाँ तक कह दिया था कि नुसरत को जल्द मारना होगा, इसके चलते पूरा इस्लाम खतरे में है।
ब्रिटेन की एक टीवी प्रजेंटर हैं समीरा अहमद। BBC में काम करती हैं। लेकिन परेशान हैं। परेशानी इसलिए क्योंकि उन्हें BBC रोज़गार तो दे रहा है लेकिन उसके बदले जो मेहनताना मिलता है, उसमें भेदभाव है। यह भेदभाव पुरुषों के मुकाबले संस्थान (बीबीसी) में महिलाओं को लगभग बराबर काम के लिए बहुत ही कम सैलरी को लेकर है। अब इसी मामले को लेकर समीरा अहमद BBC को कोर्ट में घसीट लाई हैं।
समीरा अहमद के इस कदम के समर्थन में नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स से लेकर यूनाइटेड किंगडम के कई व्यापर संगठन भी आ गए हैं। और तो और, समीरा के इस फैसले को देखते हुए अब तक BBC की जिन महिला कर्मचारियों ने किसी कारण से आवाज नहीं उठाई थी, वो भी खुल कर सामने आ रही हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि BBC की लगभग एक दर्जन महिला कर्मचारियों ने ट्रिब्यूनल के सामने असमान सैलरी (लिंग के आधार पर, जबकि काम बराबरी के स्तर का) को लेकर अपनी बात रखी है।
समीरा अहमद साल 2012 से ही बीबीसी के कार्यक्रम ‘न्यूज़वॉच’ का संचालन करती आ रही हैं। उन्होंने पूर्व में इसी संस्थान के लिए रेडियो और टेलीविजन के कई कार्यक्रमों में भी काम किया है। काफी समय से बीबीसी में अपनी सेवाएँ देने वालीं 51 वर्षीय समीरा का आरोप है कि उनके संस्थान बीबीसी में महिलाओं और पुरुषों में भेद-भाव बरता जाता है। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने पुरुष सहकर्मी जेरेमी वाइन के मुकाबले 85 प्रतिशत कम तनख्वाह दी जाती है। बता दें कि जेरेमी भी समीरा की तरह ही “पॉइंट्स ऑफ़ व्यू” नामक एक शो होस्ट करते हैं।
अपने दावे को पुख्ता करने के लिए समीरा ने इस सम्बन्ध में आँकड़े भी पेश किए। नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के मुताबिक वाइन को 2008 से 2018 के बीच प्रत्येक शो के लिए 3000 पाउंड्स (लगभग 2.72 लाख रुपए) दिए गए। हालाँकि 2018 के जनवरी में वाइन को मिलने वाली प्रत्येक शो की पेमेंट कम कर 1300 पाउंड्स (1.18 लाख रुपए) कर दिया गया था। सैलरी में इस कटौती के बाद वाइन ने उसी साल जुलाई में इस्तीफ़ा दे दिया। इसके विपरीत समीरा ने बताया कि 2012 से ही उन्हें 440 पाउंड्स (करीब 40000 रुपए) प्रति शो की पेमेंट की जा रही है, हालाँकि 2015 में इसे बढ़ाकर 465 पाउंड्स (42000 रुपए) कर दिया गया था।
महिला और पुरुष के बीच समान काम को लेकर सैलरी देते समय भेदभाव करने को आप ऊपर के आँकड़े से समझ गए होंगे। अब एक सच्चाई और, जिससे BBC कितना धूर्त है, यह पता चल जाएगा। समीरा ने बताया कि जब साल 2015 में उनकी सैलरी प्रति शो बढ़ाकर 465 पाउंड्स कर दिया गया, तो वह बहुत खुश थीं लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं। उनकी बढ़ाई गई तनख्वाह को बीबीसी ने नौकरी का कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू करते ही फिर से कम कर दिया। मतलब दूसरों (दबे-कुचलों) की आवाज उठाने का नाटक करने वाला मीडिया का स्वघोषित झंडाबरदार खुद अपनी ही कर्मचारी को दबा रहा है, उसका हक मार रहा है!
इस मामले पर नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के महासचिव ने कहा –
“सैलरी में होने वाली गैर-बराबरी की हमारी संस्थाओं में कोई जगह नहीं है, यही वजह है कि हम समीरा की माँग का समर्थन कर रहे हैं। यह दुखद है कि समाधान के लिए समीरा को एक ऐसी प्रक्रिया से गुज़ारना पड़ रहा है, जो लम्बी और निराशाजनक है, बीबीसी इस मसले को हल करने में विफल रहा है इसीलिए अब पेमेंट को लेकर लिंगभेद की बात पर फैसला ट्रिब्यूनल करेगा। समीरा को उसके जुझारूपन और दृढ़ संकल्प के लिए बधाई दी जानी चाहिए।”
समीरा का कहना है कि उसे देश (यूनाइटेड किंग्डम) के इक्वल पे एक्ट 1970 के तहत बीबीसी में उसके काम का पूरा हर्जाना दिया जाना चाहिए। बता दें कि अगले सात दिनों तक लन्दन की एक अदालत इस मामले पर सुनवाई करेगी। इस सुनवाई में समीरा की ओर से यह तर्क रहेगा कि जब उनका शो ‘न्यूज़वॉच’ और वाइन का शो ‘पॉइंट्स ऑफ़ व्यू’ दोनों एकसमान प्रोग्राम हैं, जो 15 मिनट की अवधि वाले प्रजेंटर बेस्ड हैं, दोनों प्रोग्राम में एक ही फॉर्मेट होता है, जिसमें दर्शक बीबीसी के कंटेंट पर अपनी राय रखते हैं। तो फिर दोनों प्रोग्राम के प्रजेंटर को अलग-अलग सैलरी क्यों?
नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के मुताबिक, बीबीसी ने पहले इस बात का वादा किया था कि समीरा को उनके पुराने शो और अन्य सभी कार्यक्रमों को लेकर पूरी पेमेंट पिछली तारीखों को ध्यान में रखकर कर दी जाएँगी, जिनमें समीरा अहमद और उनके पुरुष सहकर्मियों के बीच 50 प्रतिशत और 33 प्रतिशत का अंतर था। वहीं इस पूरे मामले पर बीबीसी की ओर से कहा गया है कि समीरा अहमद जिस शो का संचालन करती हैं, वह न्यूज़ सेगमेंट में आता है जबकि वाइन का कार्यक्रम एंटरटेनमेंट यानी मनोरंजन केटेगरी का है। बीबीसी ने अपना पक्ष रखते हुए यह भी कहा कि समीरा को उसके शो में उनसे पूर्व काम करने वाले पुरुष के समान ही पेमेंट दिया जाता है।
यह जानना जरुरी है कि इससे पहले बीबीसी (चीन) की पूर्व संपादक कैरी ग्रेसी ने पिछले साल समान वेतन मामले पर BBC से इस्तीफा दे दिया था। समीरा अहमद मामले की ट्रिब्यूनल में जो सुनवाई चल रही है, वहाँ पहुँची ग्रेसी ने कहा, “महिलाएँ समानता चाहती हैं, वे चाहती हैं कि उनका काम सम्मानपूर्वक हो। वे नहीं चाहती हैं कि उनके काम को कम करके आँका जाए। यह उनके जीवन के हर पहलुओं को प्रभावित करता है, यह सिर्फ वित्त (जो महत्वपूर्ण हैं) के बारे में नहीं है… यह आत्म-सम्मान के बारे में भी है और प्रगति के बारे में भी है। समीरा का केस केवल एक है, अभी कई मामले आने बाकी हैं।”
एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने स्टेज से नीचे उतर कर एक महिला सिक्योरिटी गार्ड का हालचाल लिया। दरअसल, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व अवॉर्ड समारोह में हिस्सा ले रहे थे। इस दौरान मंच के सामने एक महिला सुरक्षाकर्मी का पैर मुड़ने की वजह से संतुलन बिगड़ गया और वो नीचे गिर पड़ीं। जब ऐसा हुआ, तब राष्ट्रगान चल रहा था।
राष्ट्रगान ख़त्म होते ही राष्ट्रपति और दोनों केंद्रीय मंत्रियों ने मंच से नीचे उतर कर उक्त महिला सुरक्षाकर्मी का हालचाल पूछा। महिला सुरक्षाकर्मी से बातचीत करने के बाद राष्ट्रपति और दोनों मंत्री वापस मंच पर लौट गए। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने महिला सुरक्षाकर्मी को पानी का बोतल दिया। राष्ट्रपति और वित्त मंत्री के इस व्यवहार से सोशल मीडिया पर लोगों ने उनकी तारीफ की। आमतौर पर राष्ट्रगान पूरा होने के बाद राष्ट्रपति मंच से चले जाते हैं।
#WATCH A woman security personnel deputed at National Corporate Social Responsibility Awards event collapsed during playing of National Anthem, today.President Kovind, FM Nirmala Sitharaman & MoS Finance Anurag Thakur came down the stage to inquire about her health. #Delhipic.twitter.com/HUSvzkizHu
इस घटना के दौरान कॉर्पोरेट मामलों के राष्ट्रीय सचिव इंजेटी श्रीनिवास भी वहाँ पर मौजूद थे। सीएसआर पुरस्कार कॉर्बोरेट मामले मंत्रालय की तरफ़ से ही दिए जाते हैं। इसमें समावेशी उपक्रम संचालित करने वाली कॉर्पोरेट कंपनियों को अवॉर्ड दिए जाते हैं। कुल 19 विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है। इस श्रेणी में उन कंपनियों को शामिल किया जाता है, जो दुर्गम परिस्थितियों में अच्छा कार्य कर रही हैं। ये कम्पनियाँ नक्सल इलाक़ों में महिला विकास, पेयजन और बाल विकास जैसे अभियान में मदद देने के लिए कार्य करती हैं।
इससे पहले भी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीत चुके हैं। एक कार्यक्रम के दौरान जब उन्होंने अपने शिक्षक त्रिलोकी नाथ टंडन को देखा तो वो तुरंत मंच से नीचे उतरे और कुर्सी पर बैठे वयोवृद्ध शिक्षक के पाँव छू कर आशीर्वाद लिया। राष्ट्रपति ने 85 वर्षीय टंडन के सौ साल जीने की कामना की, जिसके जवाब में टंडन ने मजाकिया लहजे में कहा कि वो इसके लिए तैयार हैं।
इसीलिए मैं मानता हूँ कि इस देश को किसी गंगा-जमुनी टाइप ‘तहज़ीब’ की नहीं बल्कि सनातन संस्कृति और संस्कारों की ही जरूरत है और यह वही संस्कृति/संस्कार हैं कि भारत के राष्ट्रपति श्री कोविंद जी अपने शिक्षक को सम्मान देने के लिए मंच से नीचे उतरकर आते हैं और उनके चरणों में झुक जाते हैं। pic.twitter.com/YMw2JsIP2W
वहीं अपने अंग्रेजी के शिक्षक रहे प्यारेलाल को भी राष्ट्रपति ने मंच से नीचे उतर कर सम्मानित किया था और पूछा था कि कहीं वो उन्हें भूल तो नहीं गए। प्यारेलाल 100 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। उन्होंने प्यारेलाल की बहू से कहा था कि किसी भी प्रकार की दिक्कत होने पर सीधा उनसे संपर्क करें। उस दौरान राष्ट्रपति अपने एकाउंट्स के शिक्षक से भी मिले थे, जिन्होंने उनके स्वभाव की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
देश भर में किसानों की बदहाली को मुद्दा बनाकर राजनीति करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा शासित राज्य से किसान की आत्महत्या की घटना सामने आई है। कमलनाथ के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस पार्टी ने मध्य प्रदेश में सत्ता पाते ही किसानों के लिए मुआवज़े की घोषणा की थी जिसके बाद दावा यह किया जा रहा था कि राज्य में किसानों की समस्याओं से निजात पा ली जाएगी। मगर ज़मीनी हालत कुछ और ही हैं, मध्यप्रदेश सरकार से फसल बर्बाद होने का मुआवजा न मिलने के चलते एक किसान ने ज़हर पीकर आत्महत्या कर ली।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आत्महत्या करने वाले कमल चंद ग्वाल राज्य के बीना शहर में किसानी करते थे और इस बार अपनी सोयाबीन की फसल बर्बाद होने के बाद से काफी परेशान थे। इसी के बाद कमलचंद ने रविवार को ज़हर का घूँट पी लिया जिसके बाद हालात बिगड़ते चले गए और सोमवार को उनकी मौत हो गई। भाजपा के एक स्थानीय नेता महेंद्र राय ने बताया कि ग्वाल ने ख़ुदकुशी इसलिए की क्योंकि उसे समय पर अपनी बर्बाद हुई फसल का मुआवजा नहीं मिल सका। राय ने बताया, “ग्वाल ने इस साल भारी बारिश के चलते बर्बाद हुई अपनी फसल के मुआवज़े के लिए जिला प्रशासन से गुहार लगाई थी, मगर मुआवजा मिलने में देरी होने के चलते उसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया।”
बता दें कि इस घटना के बाद स्थानीय नागरिकों ने बीना में मृतक किसान का शव चौराहे पर रखकर उसके परिवार वालों की प्रशासनिक मदद लिए की माँग करते हुए प्रदर्शन किया। एसडीएम केएल मीणा द्वारा उनकी इस माँग पर आश्वासन देने के बाद जाकर यह प्रदर्शन ख़त्म हुआ।
बता दें कि मध्य प्रदेश की सत्ता में कॉन्ग्रेस पार्टी के आने के बाद से ही किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला बढ गया है। क़र्ज़ माफ़ी के वादे पर चुनाव जीतकर ‘जय किसान ऋण मुक्ति योजना’ वाली कमलनाथ सरकार इस मोर्चे पर पूरी तरह नाकामयाब साबित हुई है। सत्ता में आने के बाद कमलनाथ ने क़र्ज़ माफ़ी जैसे अपने पुराने वादों से खुदको बड़ी चतुराई से अलग कर लिया।
क़र्ज़ माफ़ी के झूठे वादे करने के बाद राज्य सरकार ने किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े में एक और योगदान दे दिया है। बता दें कि जनवरी में कमलनाथ की सरकार ने किसानों का 120 करोड़ रूपए का क़र्ज़ माफ़ करने का दावा किया था जो फर्जी था। इसका लाभ किसी भी किसान को इसका लाभ नहीं मिल सका था मगर राज्य सरकार ने किसानों की क़र्ज़ माफ़ी को लेकर अपनी पीठ खुद ही थपथपा ली थी। मध्य प्रदेश सरकार की इन्ही झूठ बोलने वाली हरकतों के चलते उनके राज्य में अधिकतर किसान और खेती से जुड़े लोग आत्महत्या करने को मजबूर हो गए हैं।
सीरिया के इदलिब में खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस का सरगना अबु बकर-अल बगदादी को अमेरिकी सैनिकों ने एक ऑपरेशन के तहत वीभत्स मौत दी। रिपोर्ट्स के अनुसार, 15 मिनट तक चले इस ऑपरेशन को अमेरिका ने बहुत ही गोपनीय तरीके से रात के अंधेरे में अंजाम दिया। गौरतलब है कि अमेरिकी सेना ने इस ऑपरेशन का नाम देश की एक महिला मानवाधिकार कार्यकर्ता ‘कायला म्यूलर’ के नाम पर रखा। बता दें कि कायला का बगदादी ने रेप किया था। सीरिया में बगदादी के लड़ाकों ने कायला मूलर को पकड़ लिया था और बगदादी के हवश का शिकार होने के बाद 2015 में उसकी हत्या कर दी थी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ता कायला मुलर जो अपनी ग्रैजुएशन पूरी करने 2012 में तुर्की गई थीं और फिर वहाँ से सीरिया चली गई थीं। मुलर गृह युद्ध का शिकार हुए लोगों को सहायता देने के लिए सीरिया गई थीं। वह डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की सहायता से चलने वाले एक चैरिटी अस्पताल से निकलकर जा रही थीं, तभी अगस्त, 2013 में उन्हें ISIS के लड़ाकों ने अलेप्पो से उन्हें अगवा कर लिया। बाद में कायला को लेकर इस्लामिक स्टेट ने 30 दिन के समय के साथ अमेरिका पर कई शर्तें थोपी थीं, जिसमें 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर की डिमांड भी थी।
गौरतलब है कि कायला मुलर का भारत से जुड़ाव भी रहा है, वह यहाँ तिब्बती शरणार्थियों को अंग्रेजी पढ़ा चुकी थीं। यह सीरिया जाने से पहले की बात है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, IS की कैद में रहने के दौरान मुलर ने अपने परिजनों ने एक पत्र भी लिखा था, जिसमें उन्होंने लिखा था, “मैं नहीं चाहती कि मुझे छुड़ाने के लिए आप लोग कोई समझौता करें।” म्यूलर ने लिखा था, “मैं जानती हूँ कि आप चाहेंगे की मैं स्ट्रॉन्ग बनू। मैं एकदम वही कर रही हूँ।”
हालाँकि, IS ने दावा किया था कि जॉर्डन के हवाई हमले में कायला की मौत हो गई। लेकिन, जॉर्डन ने इससे इनकार कर दिया था। जॉर्डन के प्रवक्ता ने कहा कि इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने कायला की हत्या की। कायला मुलर के परिजनों ने भी 2015 में एक बयान जारी कर कहा था, “हमें बेहद दुख के साथ यह बताना पड़ रहा है कि कायला मुलर अब इस दुनिया में नहीं रहीं।”
इस वीडियो में कायला मुलर का आखिरी सन्देश है, आप देख सकते हैं:
अब जब अमेरिका ने कायला मुलर के नाम से चलाए गए ऑपरेशन में बगदादी को कुत्ते की मौत मारकर, उसके मौत की पुष्टि कर दी है तो यह कहा जा रहा है कि अमेरिका ने लाखों बेगुनाहों के साथ कायला के मौत का भी हिसाब चुकता कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि इस पूरे ऑपरेशन की तस्वीरें और वीडियो भी जल्दी ही देखने को मिल सकते हैं।
बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्र्ंप ने सोमवार को कहा कि शनिवार तक बगदादी को ढेर करने के ऑपरेशन की वीडियो और तस्वीरें साझा की जा सकती हैं। इसमें एयर फुटेज, जवानों की लैंडिंग और बगदादी की गुफा में घुसने का वीडियो और तस्वीरें हो सकती हैं।
सुहागरात की रात। फूल-मालाओं से सजा बिस्तर। चन्दन-टीका लगाया एक शख्स अपनी नई-नवेली दुल्हन के साथ आता है। दुल्हन भी सोलह श्रृंगार किए और सिंदूर से मॉंग भरे हुए। कुछ पल में दूल्हा तकिया सरकाता है तो कंडोम का एक पैकेट नजर आता है।
चलिए अब पर्दा हटाते हैं। यह वीडियो अप्रैल 2006 में आया था। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने परिवार नियोजन यानी फैमिली प्लानिंग के प्रति जागरुकता बढ़ाने के मकसद से इसे तैयार किया था। आपने कभी किसी हिंदू की भावना इस वीडियो से आहत होते सुनी? किसी साधु-संत को इसे धर्म पर हमला बताते हुए सुना? या फिर किसी नेता को गरजते देखा-सुना कि यह वीडियो हिंदुओं के खिलाफ साजिश है?
असल में, किसी ने इस बात पर गौर भी नहीं किया होगा कि इस प्रचार में हिंदू वेशभूषा में ही नवविवाहित जोड़े को क्यों दिखाया गया होगा। यह गौर करने की चीज भी नहीं है। असल चीज है इसके पीछे छिपा संदेश और वह है जनसंख्या नियंत्रण। यह समझना कि छोटा परिवार सुख का आधार होता है।
ऐसे एड वीडियो में हिन्दू परिवार आज से नहीं बल्कि वर्षों से दिखाए जाते रहे हैं
अब सिक्के के दूसरे पहलू को देखते हैं। असम सरकार ने निर्णय लिया है कि दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। इसका विरोध होना शुरू हुआ। एक तो समुदाय विशेष के ठेकेदारों को लगा कि इससे उनके मजहब पर निशाना साधा जा रहा है। दूसरा बड़ा कारण यह कि असम में भाजपा की सरकार है। ‘ऑल इंडिया इस्लामिक डेमोक्रेटिक फ्रंट’ के सुप्रीमो और सांसद बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि केवल दो बच्चे पैदा करना इस्लाम के ख़िलाफ़ है। उन्होंने पूछा कि भला इस दुनिया में आने वाले को कौन रोक सकता है?
इस विवादित बयान के जवाब में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने पूछा कि क्या बदरुद्दीन जैसे लोग इस्लाम को बच्चे पैदा करने की फैक्ट्री समझते हैं? उन्होंने ईरान और इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक मुल्क़ों का उदाहरण दिया,जहाँ जनसंख्या नियंत्रण के लिए कारगर उपाय किए गए हैं। अगर असम की ही बात करें तो वहाँ 60% से भी अधिक जनसंख्या हिन्दू है। नया नियम पूरे राज्य की जनता पर लागू होता है। फिर बदरुद्दीन जैसों को ही दिक्कत क्यों हो रही है? अगर एचआईवी एड्स के ख़िलाफ़ अभियान में बनाए गए वीडियो में किसी हिन्दू को दिखाया जाता है तो इसका अर्थ ये थोड़े है कि एचआईवी एड्स केवल हिन्दुओं को होता है, मुस्लिमों को नहीं?
‘छोटा परिवार-सुखी परिवार’, ‘हम दो-हमारे दो’ को लेकर न जाने कितने ही एड बने होंगे। कुछ सरकारी तो कुछ गैर सरकारी संगठनों की ओर से। पाठ्यक्रम में बच्चों को चित्र के माध्यम से छोटे परिवार की महत्ता समझाई जाती रही है। अमूमन ऐसे तमाम वीडियो, चित्रों में दर्शाए गए लोगों की वेशभूषा हिंदुओं जैसी होती है। लेकिन, कभी कोई बवाल नहीं हुआ। ऐसा भी नहीं है कि परिवार नियोजन की बात बीजेपी या मोदी के सरकार के आने से शुरू हुई है। आजादी के बाद ही जनसंख्या विस्फोट से होने वाली समस्या को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। 1952 में पहला परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू भी हो गया था। साल दर साल इसमें बदलाव भी होते रहे। लेकिन, जब भी जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून बनाने की बात होती है या परिवार नियोजन को लेकर कोई बात कही जाए और उसमें भूल से भी समुदाय विशेष के लोगों की तस्वीर हो, तो उसे धर्म विशेष के खिलाफ साजिश मान ली जाती है।
आज तक किसी ने ये तो नहीं पूछा कि ‘दो बूँद ज़िंदगी की’ वाले एड में साड़ी पहने हिन्दू महिलाओं को ही क्यों दिखाया जाता है, बुर्का पहनी महिलाओं को क्यों नहीं? किसी ने ये भी नहीं पूछा कि क्या सिर्फ़ हिन्दू बच्चों को ही पोलियो होता है, या फिर हिन्दू ही पोलियो मिटाने प्रति जागरूक नहीं हैं? ऐसा इसीलिए, क्योंकि ऐसे एड किसी बीमारी अथवा सामाजिक बुराई के प्रति लोगों को जागरूक बनाते हैं और उसके ख़िलाफ़ अभियान में सहायक सिद्ध होते हैं। ख़ास बात यह कि ये बीमारियाँ मजहब देख कर नहीं आतीं।
बदरुद्दीन अजमल की नजर में हिंदुस्तान में इस्लाम सिर्फ बच्चा पैदा करने की फैक्ट्री है ..क्या ईरान इंडोनेशिया मलेशिया इत्यादि अन्य देश में इस्लाम नहीं जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के लिए कारगर उपाय किए हैं??
इसका सीधा अर्थ है कि कुछ लोग सभी चीजों को अपने फायदे के लिए मजहबी चश्मे से देखते हैं और लोगों को उकसाते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि देश के हित में क्या है। यही कारण है कि असम सरकार के एक फैसले को समुदाय विशेष के विरोध के तौर पर पेश करने की कोशिश हो रही है।
यही कारण है कि असम सरकार के फैसले का विरोध करने वाले लोगों की मंश को लेकर भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि बदरुद्दीन जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, क्या मुस्लिम महिलाएँ भी उससे इत्तेफ़ाक़ रखती हैं? स्वामी ने पूछा कि क्या मुस्लिम महिलाएँ, जिनमें बदरुद्दीन की पत्नी भी शामिल है, 7-8 बच्चे 9 महीने कोख में रख कर पैदा करने की इच्छुक हैं? या फिर उनका मत मायने नहीं रखता? उन्हें भी तो इसके लिए काफ़ी दर्द और परेशानी से गुजरना पड़ता है। 13 विधायकों वाली पार्टी के अध्यक्ष बदरुद्दीन का साफ़ मानना है कि सरकार कुछ भी नियम-क़ानून बनाए, इससे मुस्लिमों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला।
वैसे, फैमिली प्लानिंग लिबरलों के लिए कल तक एक प्रोग्रेसिव सोच थी। लेकिन, इस बार स्वतंत्रता दिवस पर मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित करते हुए जनसंख्या नियंत्रण की बात क्या कर दी, अब यह लिबरलों के लिए अछूत टॉपिक हो गया। पीएम मोदी ने जनसंख्या विस्फोट को लेकर लोगों को चेताया था। उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण को देशभक्ति से जोड़ते हए कहा था कि इस संकट को समझते हुए जो लोग अपने परिवार को सीमित रखते हैं, वो अभिनन्दन के पात्र हैं। उनका सीधा कहना था कि घर में आने वाले बच्चे को लेकर लोगों को पहले यह सोचना चाहिए कि क्या वो इसके लिए तैयार हैं?
बस तभी से ये प्रोग्रेसिव सोच अचानक से ‘मुस्लिमों पर हमला’ हो गया और पीएम द्वारा इसकी चर्चा करते ही इसका महत्व जाता रहा। ये हमारे देश के इलीट गिरोह की सोच है। खैर, हिन्दू आज तक आहत नहीं हुए तभी पोलियों से लेकर कई बीमारियाँ या तो लगभग ख़त्म हो चुकी हैं या फिर ख़त्म होने की ओर हैं। जो लोग इन चीजों से आहत होकर इसे अपने मजहब पर हमला बता रहे हैं, उनके समाज और समुदाय में ‘तीन तलाक़’ जैसी कई मजहबी कुरीतियाँ पल रही थीं, जिसे हटाने के लिए भी सरकार को ही आगे आना पड़ा। अगर हर सरकारी योजना, पहल और फ़ैसले को मजहब के आधार पर तौला जाएगा और फिर शरिया क़ानून के मुताबिक़ परखा जाएगा तो फिर हो गया विकास!
राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस के तीन कार्यकर्ता बम बनाते वक्त मारे गए। धमाका सोमवार को मुर्शिदाबाद जिले के तलताली इलाके स्थित एक जर्जर मकान में हुआ। मारे गए लोगों की पहचान मिंटू मंडल, ननटू मोला और छवि शेख के तौर पर की गई है।
तलताली में नदी तट पर कब्जे को लेकर टीएमसी के दो गुटों के बीच हिंसक झड़पें होती रहती है। इसी महीने की 12 तारीख को दोनों गुटों के बीच बमबाजी हुई थी। सोमवार के धमाके में मारे गए तीनों लोग उस घटना में भी शामिल थे।
स्थानीय लोगों के मुताबिक तीनों एक जर्जर घर में बम बना रहे थे। लेकिन, गलती से विस्फोट हो गया। धमाका इतना जबर्दस्त था कि तीनों के शरीर के परखच्चे उड़ गए और कई अन्य जख्मी हो गए। भारी संख्या में जलांगी थाने से पहुॅंची पुलिस ने पीड़ितों के शव इकट्ठे किए। पुलिस ने बताया है कि प्राथमिक जॉंच से पता चला है कि बम बनाते वक्त विस्फोट हुआ।
जालांगी ब्लॉक के टीएमसी नेता रकीबुल ने मृतकों के पार्टी से जुड़े होने से इनकार किया है। लेकिन, जालांगी के टीएमसी विधायक अब्दुर रज्जाक मंडल ने तीनों को पार्टी कार्यकर्ता बताया है। हालॉंकि घटना क्यों हुई इसके बारे में किसी तरह की जानकारी से उन्होंने इनकार किया है। उन्होंने बताया कि पार्टी ने घटना की जॉंच शुरू कर दी है।
सूत्रों के अनुसार नदी तट पर कब्जे को लेकर हिंसा नई नहीं है। पहले कॉन्ग्रेस और वाम दलों के बीच इसको लेकर संघर्ष होता रहता था। अब टीएमसी के कार्यकर्ता उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। पुलिस ने इस मसले पर टीएमसी के दो गुटों के बीच संघर्ष होते रहने और इसके लिए ही बम बनाए जाने की पुष्टि की है। स्थानीय लोगों की माने तो बम प्रतिद्वंद्वी गुट पर हमले की लिए ही बनाया जा रहा था और लोगों से शाम के समय नदी की ओर नहीं जाने को कहा गया था।
ननटू मोला की पत्नी ने प्रतिद्वंद्वी गुट पर अपने पति और अन्य लोगों को बम से उड़ाने का आरोप लगाया है। उसके मुताबिक गुटीय हिंसा के कारण ननटू छिप कर पिछले कुछ दिनों से नदी किनारे जर्जर इमारत में रह रहा था। प्रतिद्वंद्वी गुट के लोगों को यह बात पता चल गई और उन्होंने उस घर को बम से उड़ा दिया। पुलिस मामले की जॉंच कर रही है। बम निरोधक दस्ता भी मंगलवार को मौके पर पहुॅंचा। भारी मात्रा में जिंदा बम बरामद किए गए हैं।
27 अक्टूबर को कई पाकिस्तानी मुस्लिम भारत और भारत सरकार के खिलाफ अनुच्छेद 370 को हटाने को लेकर विरोध करने जुटे मगर विरोध के लिए जुटी इस भीड़ के प्रदर्शन का रुख ही बदल गया। उन्होंने जैसे इस प्रदर्शन को हिन्दुओं के प्रति अपनी नफरत की कट्टरता और नीयत दर्शाने का मौका बना दिया। पाकिस्तानी मुसलामानों की उस भीड़ ने जैसे भारत के प्रधानमंत्री मोदी के पुतले को अपनी नफरत का इज़हार करने का एक जरिया हीबना लिया था। पाकिस्तानी मुस्लिमों की इस भीड़ ने भारतीय प्रधानमंत्री की तस्वीर वाले पुतले को घसीटकर कुचलना शुरू कर दिया। यह पाक समर्थित मुस्लिम यहीं नहीं रुके बल्कि इस हरकत के दौरान उन्होंने एक-दूसरे को उकसाना शुरू कर दिया जिससे वहाँ मौजूद सारे मुस्लिम अपनी कुंठा इसके ज़रिए प्रकट करने लगे।
Check this out. Truly shocking. Pakistani Muslims stamp on the head of an effigy of @PMOIndia in central London. On #Diwali of all days. This is sheer hatred and @metpoliceuk should arrest all concerned. pic.twitter.com/K1eZXLY29f
बता दें कि इस विरोध प्रदर्शन के बहाने भारत और हिन्दुओं के प्रति नफरत फैलाने की इस हरकत के पीछे लंदन के कई पाकिस्तानी समर्थन वाले ग्रुप और जेकेेएलएफ यानि जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की युनाइटेड किंगडम वाली ब्रांच का हाथ है। यह खूंखार संगठन इतने आक्रामक और असहिष्णु हैं कि पिछले कुछ महीनों के अंदर हुए इन संगठनों द्वारा प्रायोजित विरोध प्रदर्शनों में पाकिस्तानी कट्टरपंथियों ने कई बार लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग की इमारत को निशाना बनाया है।
हालाँकि, दिवाली को लेकर हुए इस विरोध प्रदर्शन को लेकर लंदन के मेयर सहित ब्रिटेन के कई अन्य राजनेताओं ने आपत्ति जताई है, प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भी इस प्रदर्शन की निंदा की है। भारतीय मूल के ब्रितानी सांसद नवीन शाह और अन्य भारतीय उच्चाधिकारियों से इस घटना के सन्दर्भ में इलाके की पुलिस और ब्रितानी गृहसचिव प्रीती पटेल को भी इसकी सूचना दी है। बता दें कि ब्रिटेन में रहने वाले हिन्दू समुदाय के लोगों ने दिवाली के मौके पर त्यौहार के उमंग को भंग करने के उद्देश्य से पाकिस्तानी मुस्लिमों की ऐसी हरकत की कड़ी निंदा की है। इस घटना को हिन्दूफोबिया तथा नस्लभेदी बताया, हिन्दुओ के पवित्र त्यौहार दीपावली पर इस तरीके से नफरत फैलाने की हरकत को ब्रिटेन के नागरिकों के समुदाय ने भी गलत ठहराया ।
विरोध प्रदर्शन के लिए निकाला जाने वाला यह मार्च दरअसल भारतीय उच्चायोग के सामने से होकर गुजरने वाला था मगर पुरानी घटनाओं के चलते स्थानीय पुलिस ने एहतियातन इसे पब्लिक ऑर्डर एक्ट 1986 की धारा 12 के तहत रोक दिया। अपने इस विरोध प्रदर्शन में पाकिस्तानियों ने एक वैन इस्तेमाल की जिसपर तमाम भारत-विरोधी नारे लिखे थे, इसी के प्रति-उत्तर में भारतीयों ने एक वैन लेकर शहर भर में प्रचार किया जिसमें दिवाली की शुभकामनाएँ लिखी थीं। ऐसे ही प्रदर्शनों के लिए लन्दन और यूएस में पाकिस्तानी संगठनों ने प्रदर्शन में जाने के लिए बसों का इंतज़ाम किया था।
ब्रितानी मीडिया का एक चर्चित चेहरा केटी हॉपकिंस को तब शर्मसार होना पड़ा जब उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे कई पाकिस्तानी का विरोध किया था। केटी ने प्रदर्शन करने वालों की हरकतों के लिए उनकी हरकत को सीधे शब्दों में इसे हिन्दूफोबिया कहा था।
केरल में सिस्टर लूसी कलपूरा को रोमन कैथोलिक चर्च के अंतर्गत आने वाले ‘द फ्रांसिस्कन क्लारिस्ट धर्मसभा’ (एफसीसी) से निष्कासित कर दिया गया है। जिसे लेकर उन्होंने चर्चों की महासभा को एक पत्र लिखा है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पत्र में सिस्टर लूसी ने लिखा है कि उन्हें पोप फ्रांसिस के सामने अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए।
Earlier, the Vatican had rejected her appeal against her dismissal from the Franciscan Clarist Congregation. She is one of the nuns who had participated in the protest against rape accused Franco Mulakkal. https://t.co/qQwM53u4pD
बता दें कि इससे पहले वेटिकन ने उनकी उस अपील को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने फ्रांसिस्कन क्लारिस्ट धर्मसभा से निष्कासित किए जाने के खिलाफ अपील की थी। लूसी उन ननों में शामिल हैं जिन्होंने दुष्कर्म के आरोपित पूर्व बिशप फ्रांको मुलक्कल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
गौरतलब है कि केरल नन रेप मामले में बिशप फ्रैंको मुलक्कल को बचाने की कोशिश करने के आरोप राज्य की वामपंथी सरकार और प्रशासन पर पहले भी लगते रहे हैं। मीडिया की खबरों के मुताबिक आरोपित बिशप को नोटिस जारी करने के बाद केरल पुलिस के एक अधिकारी का तत्काल तबादला कर दिया गया था।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सिसटर लूसी के खिलाफ कार्रवाई कविता प्रकाशित करने, कार खरीदने और दुष्कर्म के आरोपित पूर्व बिशप के खिलाफ प्रदर्शन में भाग लेने की वजह से की गई है। बता दें कि अलुवा आधारित धर्मसभा की प्रमुख एन जोसफ की ओर से पाँच अगस्त को नन लूसी कलाप्पुरा को पत्र जारी कर जवाब माँगा गया था। पत्र में उठाए गए सवालों ‘द फ्रांसिस्कन क्लारिस्ट धर्मसभा’ के नियमों का उल्लंघन करने वाली जीवनशैली अपनाने के मामले में संतोषजनक जवाब देने में असफल रही थीं। लिहाजा उन्हें धर्मसभा से बर्खास्त करने का फरमान सुनाया गया है।
पत्र में लिखा गया था कि उन्हें उचित समय पर चेतावनी दी गई थी, लेकिन उन्होंने कोई अफ़सोस व्यक्त नहीं किया। लिहाजा 11 मई को धर्मसभा की आम परिषद की बैठक में कलाप्पुरा को ‘सर्वसम्मति’ से बर्खास्त करने का फैसला किया गया। कलपूरा को जनवरी में जारी नोटिस में एफसीसी ने ड्राइविंग लाइसेंस लेने, कार खरीदने, ऋण लेने, किताब प्रकाशित करने और वरिष्ठों की जानकारी के बिना धन व्यय करने के नियमों का उल्लंघन करार दिया था।
बता दें कि इससे पहले आरोपित बिशप पर एक नन ने मानसिक तौर पर उत्पीड़ित करने का आरोप लगाया था। जिस मामले में अदालत ने मुलक्कल को 11 नवंबर को तलब किया है। मानसिक उत्पीड़न को लेकर नन ने मंगलवार (23 अक्टूबर 2019) को केरल महिला आयोग के पास एक शिकायत दर्ज कराई थी। इसके मुताबिक नन को मुलक्कल और उसके लोग सोशल मीडिया के जरिए बदनाम कर रहे हैं।
महाराष्ट्र में शिवसेना लगातार भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। इसी कोशिश में पार्टी ने 5 विधायकों के समर्थन का दावा किया है। शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने कहा था कि लोकसभा चुनाव के दौरान ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से 50-50 फॉर्मूले पर बात हुई थी। शिवसेना का कहना है कि ये फॉर्मूला भाजपा की तरफ़ से ही आया था। अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि भाजपा-शिवसेना में किसी 50-50 फॉर्मूले को लेकर बात नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि शिवसेना को ढाई वर्ष के लिए मुख्यमंत्री का पद देने जैसी कोई बातचीत नहीं हुई थी।
देवेंद्र फडणवीस ने साफ़ कर दिया कि वो अगले 5 साल के लिए मुख्यमंत्री के पद पर बने रहेंगे। फडणवीस ने अपने निवास ‘वर्षा’ पर पत्रकारों को बताया कि उद्धव और शाह के बीच 50-50 फॉर्मूले की बात ही नहीं हुई थी। बुधवार को भाजपा विधायक दल की बैठक बुलाई गई है, जिसमें नेता चुनने की औपचारिक प्रक्रिया होगी। फडणवीस ने कहा कि चूँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद सार्वजनिक रूप से उनके नाम का ऐलान कर चुके हैं, ऐसे में ये बैठक बस औपचारिकता पूरी करने के लिए होगी।
बता दें कि जीत के बाद पीएम मोदी ने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए फडणवीस का नाम लिया था। फडणवीस ने कहा कि शिवसेना को काबिलियत के हिसाब से ही सीटें दी जाएँगी। फडणवीस ने कहा कि अब तक 10 निर्दलीय विधायक भाजपा को समर्थन दे चुके हैं और 5 अन्य का समर्थन मिलने की उम्मीद है। इस तरह भाजपा के पास राज्य में 15 निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल हो जाएगा।
कुर्सी पर शिवसेना और BJP में आर-पार, फडणवीस बोले- पूरे 5 साल CM रहूंगा
उधर भाजपा सांसद संजय काकडे ने कहा कि 45 शिवसेना विधायक भाजपा के सम्पर्क में हैं और भाजपा के नेतृत्व में सरकार गठन को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। राज्यसभा सांसद ने कहा कि 56 में से 45 शिवसेना विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। बता दें कि हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा को 105 सीटें आई हैं और शिवसेना ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री का पद चाहती है। लेकिन सांसद काकडे ने कहा कि 45 शिवसेना विधायक भाजपा नेताओं को कॉल कर के सरकार में शामिल होने के इच्छुक हैं।
बीजेपी सांसद संजय काकड़े का दावा – शिवसेना के विधायक बीजेपी के संपर्क मे । शिवसेना तोड़कर क्या बीजेपी बनाएगी महाराष्ट्र में सरकार ? संविधानकीशपथ, रहिएगा साथ शाम 4 बजे @ABPNewshttps://t.co/tbf7QOBswv
रियल स्टेट कारोबारी और भाजपा नेता संजय काकडे ने कहा कि शिवसेना के विधायक भाजपा नेताओं को फोन कर के कह रहे हैं कि कुछ भी कीजिए लेकिन हमें सरकार में शामिल होना है। हालिया चुनाव में भाजपा की सीटें पिछली बार से कम हुई हैं, जिसने शिवसेना को और ज्यादा मुखर होने का मौक़ा दे दिया है। पार्टी भाजपा पर हमलावर है और मोलभाव का कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं देना चाहती। हालाँकि, जहाँ पिछली बार भाजपा ने 250 से भी अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था, इस बार पार्टी ने उससे 100 कम सीटों पर चुनाव लड़ा। 14 सीटें भाजपा-शिवसेना से इतर अन्य गठबंधन पार्टियों को दी गई थीं।