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17 मुस्लिमों को बचाया, फिर भी अब्दुल और शबाना ने फँसाया: 15 साल जेल में रहे शशिकांत, परिवार तबाह

साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में सवार कारसेवकों को जलाए जाने की वीभत्स घटना के लगभग 18 वर्ष हो चुके हैं। यही वो वारदात थी, जिसके बाद गुजरात में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे। इस मामले में कई ऐसे लोगों को भी फँसा दिया गया, जो बिलकुल निर्दोष थे। व्यक्तिगत दुश्मनी का बदला दंगों की आड़ में लेने की कोशिश की गई। ऐसा ही एक मामला शशिकांत का है। अब शशिकांत की पत्नी मंगलाबेन ने गुजरात सरकार से मुआवजे की माँग की है। उन्होंने कहा है कि दुर्भावना के कारण फँसाए गए उनके पति पर चले अभियोजन के बदले उन्हें मुआवजा दिया जाए

ग़लत पहचान के कारण शशिकांत को बिना किसी अपराध के 15 वर्ष जेल में गुजारने पड़े थे। शशिकांत ने दंगे के दौरान 17 मुस्लिमों को बचाया था। लेकिन, अब्दुल सत्तार नामक ऑटो रिक्शा ड्राइवर ने निजी खुन्नस की वजह से उन्हें झूठे आरोपों में फँसा दिया। उस समय शशिकांत के ख़िलाफ़ शबाना बानो नाम की एक महिला ने भी बयान दिया था। शबाना ने बाद में स्वीकार किया कि उसने 10,000 रुपए लेकर झूठा बयान दिया था। सत्तार की कुछ साल पहले हार्ट अटैक से मौत हो गई, जबकि शबाना गुजरात छोड़ कर जा चुकी है।

एक पुलिस कॉन्स्टेबल के बेटे शशिकांत को दंगों के ठीक बाद गिरफ़्तार किया गया था। उनकी पहचान के लिए उन्हें 3 बार ‘आइडेंटिफिकेशन परेड’ में शामिल किया गया। अब्दुल सत्तार ने तीसरी बार में शशिकांत के दंगों में शामिल होने की बात कही। लेकिन शशिकांत को तब गिरफ़्तार नहीं किया गया था। उनके पिता ने बताया कि अब्दुल अपनी बीवी की पिटाई करता था, जिसके कारण शशिकांत ने उसे कई बार फटकार भी लगाई थी। अब्दुल इसे पारिवारिक मामलों में हस्तक्षेप मानता था और शशिकांत से बदला लेना चाहता था।

शशिकांत के पिता ने भी आरोप लगाया था कि उनके बेटे को व्यक्तिगत खुन्नस का बदला निकालने के लिए झूठे आरोपों में फँसाया जा रहा है। शशिकांत की पत्नी का कहना है कि उन्होंने बिहार और बंगाल के करीब डेढ़ दर्जन मुस्लिमों को दंगे की चपेट में आने से बचाया था। बावजूद इसके, उनकी दुकान को जला दिया गया और सारे सामान लूट लिए गए। इसके बाद पूरा परिवार कुछ दिनों के लिए भोपाल चला गया, लेकिन मीडिया ने फैलाया कि वो लोग गुजरात छोड़ कर भाग गए हैं। शशिकांत को 2005 में जमानत भी मिली थी, लेकिन अब्दुल सत्तार ने दावा किया कि उसे शशिकांत की तरफ से लगातार धमकियाँ मिल रही है। इस कारण उन्हें फिर जेल में डाल दिया गया।

शशिकांत के एक पड़ोसी ने जब ये अन्याय देखा तो उसने आवाज़ उठाने की कोशिश की। बाद में अब्दुल सत्तार ने उस परिवार को भी धमकी दी और उसके ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज करा दिया। इस बीच शशिकांत के पिता की भी मृत्यु हो गई। ख़ुद शशिकांत जेल से बाहर आने के बाद ख़ुद को अपमानित महसूस करते और ‘ट्विन हीट अटैक्स’ के कारण उनकी मृत्य हो गई।

इसी तरह का एक और मामला है। हुसैननगर निवासी ज़रीना शेख ने दावा किया कि वो गर्भवती कौसर बानो हत्याकांड की प्रत्यक्षदर्शी है। उसने बताया था कि भीड़ ने कौशर का पेट फाड़ के तलवार से भ्रूण को निकाल लिया और उसे आग में फेंक दिया। इसके बाद कौसर को भी आग में जला डाला। ज़रीना के इस बयान को सच माना जाता रहा। 2010 के एक रिपोर्ट से पता चलता है कि डॉक्टर ने जब कौसर का पोस्टमॉर्टम किया तो पाया कि भ्रूण को नुकसान नहीं पहुँचाया गया था।

कौसर की हत्या निंदनीय थी, लेकिन इसे लेकर जिस तरह का झूठ फैलाया गया, वो भी निंदनीय था। इसी तरह गुजरात दंगों के मामले में कई ऐसे लोगों को फँसाया गया, जो बाद में निर्दोष साबित हुए लेकिन तब तक उनकी ज़िंदगी, उनका परिवार और करियर- सब तबाह हो चुका था।

जस्टिस बोबडे होंगे अगले CJI: अयोध्या विवाद की सुनवाई करने वाली पीठ में हैं शामिल

जस्टिस शरद अरविंद बोबडे देश के अगले मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) होंगे। मंगलवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उनकी नियुक्ति पर मुहर लगा दी है। 63 वर्षीय बोबडे 18 नवंबर को सीजेआई पद की शपथ लेंगे। मौजूदा सीजेआई रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं।

अयोध्या विवाद की सुनवाई करने वाली संवैधानिक पीठ में शामिल जस्टिस बोबडे 17 महीने के लिए 23 अप्रैल 2021 तक सीजेआई के पद पर बने रहेंगे। वे देश के 47वें मुख्य न्यायाधीश होंगे। अयोध्या मामले में गोगोई के रिटायर होने से पहले फैसला आने की उम्मीद है।

18 अक्टूबर को सीजेआई गोगोई ने केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र लिख कर जस्टिस बोबडे को अगला चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की थी। वर्तमान में वे देश के दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश हैं। मुंबई और नागपुर दोनों परिसरों में महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं।

लाइव लॉ के अनुसार जस्टिस बोबडे ने 1978 में नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल करने के बाद बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र में रजिस्ट्रेशन करवाया था। 21 साल तक बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में प्रैक्टिस की। 1998 में वरिष्ठ वकील के रूप में नामित किया गया। मार्च 2000 में वे बॉम्बे हाई कोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश बने। अप्रैल 2013 में वे सुप्रीम कोर्ट पहुॅंचे।

सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण बेंच में जस्टिस बोबडे शामिल रहे हैं। 2018 में कर्नाटक के राजनीतिक विवाद को लेकर जिस बेंच ने रात भर सुनवाई की थी, उसमें भी वे शामिल थे। उन्होंने जस्टिस आर बानुमति और जस्टिस इंदिरा बनर्जी के साथ मिलकर मुख्य न्यायाधीश गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जॉंच भी की थी।

योगी के गोरखपुर में कॉन्ग्रेस के पास एक अदद दफ़्तर भी नहीं, विवाह भवन में होती है बैठकें

कॉन्ग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। महाराष्ट्र में 5 सालों में नंबर एक से चौथे नंबर की पार्टी बन कर ख़ुशी मना रही कॉन्ग्रेस का यूपी के कई जिलों से गायब ही होती दिख रही है। गुरु गोरक्षनाथ की धरती पर कॉन्ग्रेस के पास एक अदद दफ्तर भी नहीं है। दूसरी तरफ पार्टी दावा करती है कि उत्तर प्रदेश में वो 2022 तक अपनी खोई हुई ज़मीन वापस ले लेगी। फ़िलहाल तो ऐसा लग रहा है कि ज़मीन वापस पाना तो दूर, ज़मीन पर उतरने के लिए ही कॉन्ग्रेस को वर्षों इंतजार करना पड़ेगा।

गोरखपुर जिले में कॉन्ग्रेस के पास दफ़्तर नहीं है। पार्टी वहाँ सिर्फ़ व्हाट्सएप्प से ही चल रही है। पार्टी के सारे कामकाज व्हाट्सएप्प के माध्यम से ही हो रहे हैं। इससे कहा जा सकता है कि कॉन्ग्रेस के नेता गोरखपुर जिले में ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं। गोरखपुर राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ है। वह यहाँ से 5 बार सांसद चुने जा चुके हैं। इससे पहले उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ भी 4 बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। महंत दिग्विजयनाथ भी इस क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं।

गोरखपुर में कॉन्ग्रेस का एक दफ़्तर तक न होने की बात पर पार्टी नेता कहते हैं कि राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी को इससे अवगत करा दिया गया है। हालाँकि, अभी तक प्रियंका गाँधी की तरफ से उन्हें कोई आश्वासन नहीं मिला है। गोरखपुर कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष निर्मला पासवान कहती हैं कि पार्टी को जल्द ही जिले में एक नया दफ्तर मिलेगा। वरिष्ठ नेता सैयद जमाल ने बताया कि जिला कॉन्ग्रेस कमिटी के अध्यक्ष रहे भृगुनाथ चतुर्वेदी 2017 तक पुर्दिलपुर स्थित दफ्तर में बैठते थे, लेकिन उनके दिवंगत होने के बाद कॉन्ग्रेस के पास से ये दफ्तर भी चला गया।

कॉन्ग्रेस नेता अनाधिकारिक रूप से चारुचंद्रापुरी में स्थित एक घर को कभी-कभार दफ्तर के रूप में प्रयोग करते हैं। गोरखपुर में कॉन्ग्रेस की बैठकें विवाह भवनों में होती हैं। लेकिन अधिकतर पार्टी व्हाट्सएप्प पर ही कार्य करती है और बड़ी बैठकों के लिए ही मैरिज हॉल बुक किए जाते हैं।

1991 से लेकर 2014 तक गोरखपुर में हुए हर लोकसभा चुनाव में भाजपा की ही जीत होती रही। इसके बाद हुए उपचुनाव में सपा के प्रवीण निषाद जीते, लेकिन बाद में वो भी भाजपा में शामिल हो गए और 2019 के लोकसभा चुनाव में भोजपुरी अभिनेता रवि किशन ने जीत दर्ज की। रवि किशन ने ख़ुद को गोरखनाथ मंदिर का उम्मीदवार बता कर वोट माँगा था। इस तरह से भाजपा ने 2019 में अपना खोया हुआ गढ़ फिर से हासिल कर लिया।

दीगर यह है कि कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी के पास उत्तर प्रदेश का प्रभार है। लोकसभा चुनावों से पहले उन्हें विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई थी। इस इलाके का गोरखपुर महत्वपूर्ण केंद्र है। आम चुनावों में कॉन्ग्रेस के लिए प्रियंका कोई कमाल तो नहीं कर पाईं, लेकिन गोरखपुर जैसे जगह पर पार्टी के लिए अब तक एक दफ्तर भी नहीं शुरू करवा पाना उनकी सांगठनिक क्षमता का एक और नायाब नमूना है।

सुतली बम के साथ 2 धरे : दिल्ली में 10000 Kg पटाखे जब्त, 261 गिरफ्तारियाँ और 433 केस

दिल्ली पुलिस ने इस वर्ष 261 लोगों को पटाखे फोड़ने व बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली में दिवाली पर एक निश्चित समय तक ही पटाखे फोड़ने की अनुमति थी। साथ ही पटाखे बेचने पर भी बंदिश है। दिल्ली पुलिस ने दीपावली के दिन लगातार गश्त जारी रखा और इस दौरान महिला दस्ते को भी पेट्रोलिंग पर लगाया गया था। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस दीपावली कुल 261 लोगों को पटाखों का प्रयोग करने के कारण गिरफ़्तार किया गया

इनमें से 166 लोगों को पटाखे फोड़ने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। दीपावली के दिन ही 44 लोगों को पटाखे बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। उन पर इंडियन एक्सप्लोसिव एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है। 51 अन्य लोगों को भी पटाखों का प्रयोग करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। इन सभी के ख़िलाफ़ कुल 433 केस दर्ज किए गए। हालाँकि, ये सभी आँकड़े 2018 से काफ़ी कम रहे। अधिकारियों ने इसका श्रेय दिल्ली पुलिस की लगातार गश्ती को दिया है।

पुलिस के कण्ट्रोल रूम में 940 लोगों ने कॉल कर अपने इलाक़े में पटाखे फोड़े जाने की शिकायत की। दीपावली के दिन तक कुल 10,000 किलो पटाखे जब्त किए जा चुके थे। दीपावली के दिन ही अकेले 3,765 किलो प्रतिबंधित पटाखे जब्त किए गए। इनमें से 1,320 किलो पटाखे पूर्वी दिल्ली के ज्योति नगर स्थित एक जनरल स्टोर से जब्त किए गए। पिछले वर्ष इन्हीं मामलों में पुलिस ने 310 लोगों को गिरफ़्तार किया था और कुल 562 केस दर्ज किए थे।

आँकड़ों में देखें दीपवली पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई

पिछले वर्ष जिन लोगों को पटाखे बेचने व फोड़ने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था, उनमें से कई अभी भी अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। इस बार सबसे ज्यादा 52 लोगों को नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया। इन लोगों पर 2,000 रुपए जुर्माना और 2 वर्ष की जेल हो सकती है। कुछ मामलों में दोनों ही सज़ाएँ दी जा सकती हैं। वहीं दिल्ली पुलिस प्रमुख ने रात में तैनात पुलिसकर्मियों के बीच मिठाइयाँ वितरित की। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता ने उक्त जानकारियाँ दी।

महाराष्ट्र में BJP का कुनबा और बढ़ा: अमित शाह मुंबई जाएँगे, कॉन्ग्रेस में टूट का ख़तरा

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब भी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। शिवसेना अब भी 2.5 साल के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अड़ी हुई है, तो दूसरी ओर भाजपा उससे मोलभाव करने को तैयार नहीं दिख रही। इस बीच, भाजपा के समर्थन का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। निर्दलीय विनोद अग्रवाल और महेश बालदी ने अपना समर्थन बीजेपी को देने की घोषणा की है।

निर्दलीय राजेंद्र राउत, बीजेपी की बागी गीता जैन और युवा स्वाभिमान पार्टी के रवि राणा ने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान पहले ही कर रखा है। राणा को छोड़ सभी ये सभी नवनिर्वाचित विधायक मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलकर उन्हें समर्थन पत्र सौंप चुके है। राणा ने फडणवीस को पत्र लिखकर बीजेपी को समर्थन देने की बात कही थी।

बुधवार को भाजपा विधायक दल के नेता का चुनाव करने वाली है। इसके लिए पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अमित शाह मुंबई जाने वाले हैं। सूत्रों के अनुसार, यदि शिवसेना राजी नहीं हुई तो बीजेपी अल्पमत की सरकार भी बना सकती है, जैसा उसने 2014 के विधानसभा चुनावों के बाद किया था। कयास कॉन्ग्रेस में टूट के भी लगाए जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले भी कॉन्ग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने की नेताओं में होड़ लगी थी। जिस तरह पिछले दिनों कर्नाटक और गोवा में कॉन्ग्रेस में विधायक दल में टूट देखने को मिली थी, उससे ऐसी किसी भी संभावना को सिरे से नकारा नहीं जा सकता।

हालॉंकि, कॉन्ग्रेस भी अपनी ओर से शिवसेना को साधने की कोशिश कर रही है। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष बाला साहेब थोराट और राज्य के पूर्व मंत्री विजय वडेट्टीवार कह चुके हैं कि यदि शिवसेना की ओर से प्रस्ताव आता है तो वे हाई कमान के साथ इसकी चर्चा करेंगे। वडेट्टीवार तो इशारों-इशारों में पॉंच साल के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी शिवसेना को सौंपने की बात कह चुके हैं। लेकिन, शिवसेना की ओर से कॉन्ग्रेस को अभी तक कोई भाव नहीं मिला है।

वैसे, कॉन्ग्रेस की इस कोशिश में आड़े उसकी सहयोगी एनसीपी का रुख भी है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने नतीजों के बाद कहा था कि सरकार गठन का जनादेश भाजपा शिवसेना को मिला है और वे विपक्ष में बैठेंगे। लेकिन सियासत में कोई भी बात अंतिम नहीं होती। पर्दे के पीछे से सारे समीकरण बिठाने की कोशिश होती रहती है। 2014 में बीजेपी की अल्पमत सरकार के गठन में एनसीपी की अहम भूमिका भी रही थी। बाद में शिवसेना उस सरकार में शामिल हुई थी।

288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी को 105 सीटें मिली है। बहुमत का नंबर है 145। शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटों पर सफलता मिली है। शेष सीटें निर्दलीयों और छोटे दलों के खाते में गई है। निर्दलीय में ज्यादातर भाजपा के ही बागी हैं।

गैंगरेप के बाद 2 Km पैदल चल कर थाना पहुँचीं साध्वी, ‘माँ बीमार है’ कह कर ले गए थे आरोपित

बिहार के नवादा जिला स्थित ककोलत के एक आश्रम में रहने वाली एक साध्वी के साथ बलात्कार की ख़बर आई है। वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बस्ती की रहने वाली है। गैंगरेप करने वाले उनके परिचित ही थे। साध्वी ने महिला थाना में बताया कि कुछ लोगों ने उन्हें उनके माँ के बीमार होने की सूचना दी। बाद में गाड़ी में जब वह उन्हीं लोगों के साथ अपने पैतृक घर जा रही थी, तो एक सुनसान जगह पर ले कर उनके साथ रेप किया गया। अरियरी थाना क्षेत्र के फूलचोढ़ गाँव में ये घटना हुई

आरोपितों ने 25 वर्षीय साध्वी को अपने साथ ले जाने के लिए उनके माँ के बीमार होने की झूठी ख़बर दी थी। पुलिस ने बताया है कि मामले की जाँच की जा रही है। मंगलवार (अक्टूबर 29, 2019) को साध्वी की मेडिकल जाँच कराई जाएगी। इस घटना में जीवन पटेल नाम के एक युवक का नाम सामने आया है। उसे 2017 में आश्रम से चोरी के आरोप में निकाल दिया गया था। पीड़िता ने उसके अलावा कमलनाथ चौधरी का आरोपित के रूप में नाम लिया है।

ककोलत के जिस आश्रम में ये घटना हुई है, उसमें स्त्री-पुरुष दोनों ही रहते हैं। जहाँ ये घटना हुई, वो क्षेत्र ककोलत और शेखपुरा के बीच में पड़ता है। सामूहिक बलात्कार करने के बाद आरोपित साध्वी को वहीं छोड़ फरार हो गए। थाने में शिकायत दर्ज कराने के लिए उन्हें 2 किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ा। बाद में ग्रामीणों के सहयोग से वह थाने पहुँची और वहाँ शिकायत दर्ज कराई गई।

2 वर्ष पूर्व इसी आश्रम की 3 साध्वियों के साथ बलात्कार की घटना सामने आई थी। उस मामले को पुलिस ज़मीन पर कब्जे करने वाले एंगल से भी देख रही थी। महिला थाना ने जानकारी दी है कि आरोपितों की गिरफ़्तारी के लिए यूपी पुलिस से संपर्क साधा गया है। साध्वी ने बताया कि बलात्कार के बाद वे काफ़ी देर तक बेहोश रहीं और उन्हें सुबह होश आया। आरोपितों में 2 उनके परिचित हैं। दो ओरिपियों को वे जानती नहीं हैं। वे रास्ते में बारी-बारी से गाड़ी में सवार हुए थे।

गुलाम नबी ने खाली किया VVIP बंगला, अब अब्दुल्ला-महबूबा की बारी: सरकारी ख़र्चों पर भोग-विलास ख़त्म

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने से कई ऐसे नेताओं को निराशा हाथ लगी है, जो राज्य में किसी पद पर रहने के कारण मलाई मार रहे थे। इसमें एक नाम जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद का भी है, जिन्हें श्रीनगर के वीवीआईपी इलाक़े में बंगला मिला हुआ था। उन्हें ये
बंगला मुफ्त में दिया गया था और उन्हें इसका किराया भी नहीं देना होता था। अगर जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा नहीं हटाया जाता तो ये सुविधाएँ सभी पूर्व-मुख्यमंत्रियों को आजीवन मिलतीं। अब गुलाम नबी आज़ाद को ये बंगला खाली करना पड़ा है।

गुलाम नबी आज़ाद नवंबर 2005 से लेकर जुलाई 2008 तक जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे थे। हालाँकि, वह श्रीनगर में नहीं रहते थे, लेकिन तब भी उन्होंने गुपकार रोड के जीठयार स्थित जम्मू-कश्मीर बैंक गेस्टहाउस को सालों तक अपने कब्जे में रखा। जम्मू-कश्मीर बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री ने गेस्ट हाउस खाली कर दिया है। लेकिन अभी तक प्रशासन की तरफ से ये संपत्ति बैंक को सुपुर्द नहीं की गई है। गुपकार रोड पर महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला के भी वीवीआईपी बंगले हैं। आज़ाद ‘अस्थायी निवास’ के नाम पर गेस्ट हाउस को ही अपना स्थायी बंगला बना कर रह रहे थे।

अब जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बन जाने और इसका विशेषाधिकार चले जाने के कारण महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला को भी अपने वीवीआईपी बंगले खली करने पड़ेंगे, जो उन्हें सरकार की तरफ से मिले थे। उन्हें इसके लिए 1 नवम्बर तक की समय-सीमा दी गई है। फ़िलहाल ये दोनों ही कश्मीरी नेता हिरासत में रखा गए हैं। ‘जम्मू कश्मीर स्टेट लेजिस्लेशन पेंशन एक्ट 1984’ के तहत इन नेताओं को ज़िंदगी भर सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने की छूट थी। इस एक्ट को 1996 में संशोधित कर कई और सुविधाएँ जोड़ी गई थीं, जिससे इन नेताओं पर और सरकारी रुपए ख़र्च होने लगे।

1 नवंबर को जम्मू-कश्मीर रीआर्गेनाईजेशन बिल के लागू होते ही इन कश्मीरी नेताओं को मिल रही सारी सरकारी सुख-सुविधाएँ अपने-आप हट जाएँगी। फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने किसी सरकारी संपत्ति पर आधिकारिक कब्ज़ा नहीं कर रखा है, लेकिन उनके बेटे उमर अब्दुल्ला के मामले में ऐसा नहीं है। हालाँकि, फ़ारूक़ अब्दुल्ला ट्रांसपोर्ट और मेडिकल जैसी कई अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाते रहे हैं। उमर अब्दुल्ला के बंगले में तो अत्याधुनिक जिम सहित कई अन्य सुविधाओं पर करोड़ों ख़र्च किए गए हैं। इन सरकारी बंगलों की सजावट और अन्य निर्माण कार्यों में भी करोड़ों रुपए फूँके गए। इन ख़र्चों को राज्य सरकार ने वहन किया।

फ़िलहाल उमर अब्दुल्ला को श्रीनगर के हरि निवास में रखा गया है। मीडिया सूत्रों के अनुसार, वहाँ भी वो अपने मनपसंद पिज़्ज़ा, सलाद और घर के बने खाने की डिमांड करते हैं। उनके मनोरंजन के लिए हॉलीवुड फ़िल्मों की कई सीडी भी उपलब्ध कराई गई है।

खुद का पता नहीं, दूसरों की जिंदगी की गारंटी कैसे ले सकता हूँ: इमरान खान

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की हालत बिगड़ने की खबरों के बीच प्रधानमंत्री इमरान खान की एक बड़ी टिप्पणी सामने आई है। इमरान ने कहा है कि वे किसी की जिंदगी की गारंटी नहीं ले सकते। उन्होंने यह बात इस्लामाबाद हाई कोर्ट के निर्देश के आलोक में कही। बीते हफ्ते हाई कोर्ट ने कहा था कि जेल की सजा भुगत रहे शरीफ के स्वास्थ्य की ‘जिम्मेदारी’ सरकार ले।

डॉन न्यूज के अनुसार सोमवार को ननकाना साहिब में बाबा गुरु नानक यूनिवर्सिटी का शिलान्यास करते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने यह बात कही। उन्होंने कहा,

“आज मैंने खबर पढ़ी कि कोर्ट ने संघीय और प्रांतीय सरकारों से पूछा है कि क्या वे कल नवाज शरीफ की जिंदगी की गारंटी ले सकते हैं। मैं तो कल तक के लिए अपनी ही जिंदगी की गारंटी नहीं ले सकता, तो मैं किसी अन्य की जिंदगी की गारंटी कैसे दे सकता हूॅं?”

शरीफ के परिजनों का कहना है कि यदि उन्हें कुछ हुआ तो इसके जिम्मेदार इमरान खान होंगे। पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) नेता शरीफ की तबीयत स्वास्थ्य और मानवीय आधार पर दो अदालतों से जमानत मिलने के एक दिन बाद रविवार को और खराब हो गई। प्लेटलेट्स काफी घट जाने के कारण डॉक्टरों को उनकी हृदय संबंधी दवाइयॉं बंद करनी पड़ी है।

रविवार को आई रिपोर्ट के अनुसार 69 वर्षीय शरीफ के प्लेटलेट्स एक ही दिन में 45,000 से घटकर 25,000 हो गए। सोमवार रात प्लेटलेट्स घटकर 2000 हो गया। इसके बाद उन्हें भ्रष्टाचार निरोधक निकाय (एनएबी) की हिरासत से सर्विसेज अस्तपाल ले जाया गया। तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके शरीफ को शनिवार को लाहौर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान एंजाइना एटैक (हृदय में जकड़न) आया था। एंजाइना में हृदय में रक्त का प्रवाह घट जाने के कारण छाती में दर्द होता है।

यूरोपियन पैनल के दौरे से पहले J&K में आतंकियों ने की ट्रक ड्राइवर की हत्या, अक्टूबर में छठी वारदात

दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग में आतंकियों ने फिर से राज्य में सामान्य हो रहे व्यापार को रोकने के लिए घिनौनी कोशिश की है। सोमवार (अक्टूबर 28, 2019) को आतंकियों ने एक ट्रक ड्राइवर को मार दिया। पिछले कुछ दिनों से आतंकी लगातार ट्रक ड्राइवर्स को निशाना बना रहे हैं, क्योंकि घाटी व शेष भारत के बीच व्यापार का अहम जरिया ट्रक ही है। सेब का व्यापार भी ट्रक द्वारा ही किया जाता है। उधमपुर स्थित कटरा के निवासी नारायण दत्त छठे ट्रक ड्राइवर हैं, जिन्हें अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद जान गँवानी पड़ी है।

नारायण दत्त पर ये हमला बिजबेहरा के कनिलवान इलाक़े में हुआ। आतंकियों ने उन पर गोली चलाई, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वहाँ 2 अन्य ट्रक ड्राइवर भी थे, जिनकी जान को ख़तरा था। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकरी ने तुरंत घटनास्थल पर पहुँच कर अन्य ट्रक ड्राइवरों की जान बचाई। हालाँकि, अन्य घटनाओं की तरह आतंकियों ने ट्रक में आग नहीं लगाई। इलाक़े में घेराबंदी कर के सुरक्षा बल तलाशी अभियान चला रहे हैं, ताकि हमलावरों को पकड़ा जा सके। ये हमला यूरोपियन पार्लियामेंट के 28 सदस्यीय पैनल के दौरे से एक दिन पहले हुआ।

जम्मू-कश्मीर में आतंकी ऐसे ट्रक ड्राइवरों को निशाना बना रहे हैं, जो बाहर से आते हैं। 24 अक्टूबर को सेब लेकर जा रहे ट्रक ड्राइवर की शोपियाँ में हत्या कर दी गई थी। उससे पहले 14 अक्टूबर को शरीफ ख़ान नामक ट्रक ड्राइवर की हत्या कर दी थी। उसकी गाड़ी पर राजस्थान का नंबर था। इसके ठीक 2 दिनों बाद शोपियाँ में ही चरणजीत नामक पंजाबी व्यापारी की हत्या कर दी गई थी, जबकि एक अन्य इस हमले में बाल-बाल बच गया था। उसी दिन पुलवामा में छत्तीसगढ़ के ईंट-भट्ठा मजदूर की हत्या कर दी गई थी।

मंगलवार को यूरोपियन पार्लियामेंट का प्रतिनिधिमंडल भी जम्मू-कश्मीर के दौरे पर पहुँचेगा। ये लोग वहाँ रात भी गुजारेंगे और आम नागरिकों से बातचीत कर स्थिति का अवलोकन करेंगे। यूरोपियन पैनल जम्मू-कश्मीर में अधिकारियों से भी बातचीत करेगा। इससे एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने यूरोपियन डेलीगेशन को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को लेकर जानकारी दी। घाटी के हालात को लेकर भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का भी विवरण दिया गया।

शोकग्रस्त BBC ने आतंकी बगदादी को ‘पूज्य पिताजी, सादर प्रणाम’ वाले अंदाज में दी श्रद्धांजलि

वाशिंगटन पोस्ट ने जिस तरह से खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस के प्रमुख सरगना अबू-बकर अल-बगदादी के मारे जाने के बाद उसे इस्लामिक विद्वान बताते हुए उसका गुणगान किया, बीबीसी उससे भी कई क़दम आगे निकल गया। बीबीसी ने बगदादी को ऐसे प्रस्तुत किया, जैसे वो मानव-सेवा के लिए बलिदान हुआ कोई सामाजिक कार्यकर्ता हो। लेकिन नहीं, वो तो कई नृशंस कत्लों का गुनहगार आतंकी था। यह भी कह सकते हैं कि बीबीसी ने बगदादी के मौत के बाद एक तरह से शोक मनाया और उसे ऐसे सम्मान दिया, जैसे वो कोई ऋषि-मुनि रहा हो। बीबीसी ने बार-बार उसके लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग किया।

अमेरिका के राष्ट्रपति कहते हैं कि बगदादी कुत्ते की मौत मारा गया। ट्रम्प ने बताया कि रोते-चीखते बगदादी की मौत सुरंग में गिरने के बाद हुई। उससे पहले अमेरिकी सेना ने उसका पीछा किया। ट्रम्प ने उसे कायर, अनैतिक, बीमार, क्रूर और हिंसक आतंकी करार दिया। लेकिन, उससे पहले जरा बगदादी के बारे में बीबीसी की भाषा देखिए:

  • बगदादी ‘छिपे हुए थे।’
  • उन‘ पर निगरानी रखी जा रही थी।
  • उनके‘ बार-बार जगह बदलने के कारण इससे पहले रेड नहीं हो सका।
  • बगदादी ‘कथित‘ इस्लामिक स्टेट के ‘मुखिया थे‘।
  • अप्रैल के एक वीडियो में आईएस ने बताया था कि बगदादी ज़िंदा ‘हैं।’
  • 2014 में बगदादी पहली बार ‘दिखे थे।’
  • बगदादी अंतर्मुखी ‘थे।’
  • मई 2017 में वह ज़ख़्मी ‘हो गए थे।’
  • बगदादी 2010 में आईएसआईएस के ‘नेता बने थे।’
  • दुनिया ‘उन्हें‘ अल-बगदादी के नाम से जानती थी।
  • बगदादी का परिवार ‘धर्मनिष्ठ‘ था।
  • बगदादी कंठस्थ करने के लिए ‘जाने जाते थे।’
  • वह रिश्तेदारों को सतर्क नज़र से ‘देखते थे‘ कि इस्लामिक क़ानून का पालन हो रहा है या नहीं।
  • वह 2004 में दो पत्नियों व छह बच्चों के साथ ‘रहे।’
  • वह बच्चों को क़ुरान ‘पढ़ाते थे।’
  • बगदादी फुटबॉल क्लब ‘के स्टार थे।’
  • बगदादी हिंसक इस्लामिक मूवमेंट की तरफ़ ‘आकर्षित हो गए।’
  • वो क़ैदियों को इस्लाम की शिक्षा ‘देते थे।’
  • उन्हें‘ शूरा काउंसिल में शामिल किया गया।

बीबीसी की उपर्युक्त भाषा से लगता है कि उसका कोई अपना मर गया है और वो उसे श्रद्धांजलि दे रहा है। श्रद्धांजलि देते समय जैसे किसी व्यक्ति के अच्छे कार्य गिनाए जाते हैं, वैसे ही लगभग 4 लाख मौतों के लिए जिम्मेदार आतंकी संगठन के सबसे बड़े सरगना की मौत पर बीबीसी ने गिनाया। क्या हजार लाशें गिरा कर कोई एकाध बार फुटबॉल खेल ले तो उसे आतंकी कहा जाएगा या फिर दुनिया को बताया जाएगा कि ‘एक फुटबॉल स्टार नहीं रहा’? हो सकता है बीबीसी को हिंसक इस्लामिक आतंक ‘आकर्षित’ लगता हो लेकिन लाखों जान लेने वाला ये आतंकवाद डरावना है, भयावह है- आकर्षक नहीं।

जम्मू कश्मीर में आम नागरिकों और सुरक्षा बलों को मार रहे आतंकी ‘विद्रोही’ हो जाते हैं, बगदादी ‘एक्टिविस्ट’ अर्थात कार्यकर्ता हो जाता है, लादेन एक अच्छा ‘पिता’ हो जाता है और दाऊद इब्राहिम तो मीडिया के इस वर्ग के लिए बॉलीवुड हीरो से कम है नहीं। आख़िर क्या कारण है कि जब भी किसी आतंकी की मौत हो जाती है तो उसके घर-परिवार को ढूँढ कर यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि उसके पिता एक शिक्षाविद हैं या फिर उसकी माँ कितनी अच्छी हैं या फिर उसका परिवार कितना सरल, शांत और शौम्य है? क्या इन चीजों से कोई फ़र्क़ पड़ता भी है क्या?

बगदादी कैदियों को इस्लाम की शिक्षा ‘देते थे’

हाल ही में कमलेश तिवारी की मौत के बाद लल्लनटॉप जैसे मीडिया पोर्टल ने लिखा कि आरोपितों के पिता के बयान को सुना जाना चाहिए। क्या इससे कमलेश तिवारी वापस आ जाएँगे या फिर उनके पीड़ित परिजनों को न्याय मिल जाएगा? क्या हत्यारोपित का पिता कुछ बोल दे तो उसे पत्थर की लकीर मान लेनी चाहिए? ठीक इसी तरह, बीबीसी आईएसआईएस के सरगना की मौत पर शोक मनाता दिख रहा है और उसे ऐसे सम्मान दे रहा है, जैसे कोई अपने मृत पिता को देता है।

लगे हाथ बीबीसी को मोसुल के उसी ‘पवित्र मस्जिद’ में जाकर बगदादी की आत्मा की शांति के लिए नमाज भी अदा करनी चाहिए, जिसमें वह पहली बार दिखा था। अरे सॉरी, ‘दिखे थे।’ बगदादी की रूह की शांति के लिए बीबीसी को कुछ चील-कौवों को खाना खिलाना चाहिए और हो सके तो गयाजी जाकर तर्पण-अर्पण भी करना चाहिए। लेकिन हाँ, लाखों मृतकों के परिजन दुनिया के सबसे बड़े न्यूज़ नेटवर्क्स में से एक से यह सवाल ज़रूर पूछेंगे कि उनकी बदहाली के जिम्मेदार व्यक्ति का गुणगान कर के उनके जले पर नमक क्यों छिड़का जा रहा है?

बगदादी पवित्र मस्जिद से भाषण देने के बाद पहली बार ‘दिखे थे’

यही स्थिति रही तो आश्चर्य नहीं होगा अगर कल को बीबीसी का होमपेज खोलते ही ज़ाकिर नाइक के वीडियो मिलें, जिसमें वह ‘जिहाद’ के लिए मुस्लिम युवकों को भड़काता दिखे। जब आईएसआईएस के सबसे बड़े आतंकी का गुणगान किया जा सकता है, फिर ज़ाकिर नाइक तो बहुत छोटी बात है। सबसे बड़ी बात कि बीबीसी ने इस लेख में ‘कथित इस्लामिक स्टेट’ का प्रयोग किया है। अर्थात, बीबीसी यह मानता ही नहीं है कि इस्लामिक स्टेट नामक कोई आतंकी संगठन इस दुनिया में है भी। बीबीसी का कहना है कि 4-6 लाख लोग यूँ ही हवा में मर गए, उन्हें किसी ने नहीं मारा।

जब आईएसआईएस है ही नहीं तो फिर अमेरिका की सेना सीरिया में पूरी-भाजी तलने गई थी? बीबीसी ने क्षण भर में उन सैनिकों के बलिदानों को भी नकार दिया, जिनकी मौत आईएसआईएस से लड़ते हुए हुई। साथ ही बीबीसी ने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों को भी नकार दिया, जिन्होंने पता लगाया था कि केरल सहित भारत के कई हिस्सों से मुस्लिम युवकों ने आईएसआईएस ज्वाइन किया है। आईएसआईएस तो था ही नहीं, है ही नहीं, वो तो ‘कथित आईएसआईएस’ है। हिंसक इस्लामिक क़ानून और हिंसक विचारधारा को बीबीसी ने ऐसे प्रस्तुत किया है, जैसे ये किसी धर्मग्रन्थ का हिस्सा हो।

आप भी जान लीजिए कि ‘फुटबाल स्टार बगदादी’ कौन ‘थे’?

बीबीसी के लिए यह सब नया नहीं है। यह मीडिया के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो आतंकियों से सहानुभूति रखता है। यहाँ हमने उसके इस कारनामे को हूबहू आपने सामने रख कर यह दिखाने की कोशिश की है कि कैसे आतंकियों के सम्मान में मीडिया संस्थान झुकते हैं और उसे ऐसे सम्मान देते हैं, जैसे वह लाखों मौतों का गुनहगार न होकर कोई समाजिक कार्यकर्ता हो। अगर भारत में आएँ तो यहाँ नक्सलियों को ऐसे ही ट्रीट किया जाता है, जैसे वो सम्पूर्ण समाज के प्रतिनिधि हों और सरकार से जनता का हक़ माँग रहे हों। भले ही वो लोगों को भड़का कर भीमा-कोरेगाँव हिंसा भड़काते हों, उन्हें महिमामंडित कर के दिखाया जाता है।