बीबीसी ने आईएसआईएस के मारे गए सरगना अबू-बकर अल बगदादी के लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग किया था। बीबीसी ने बगदादी को ऐसे ही सम्बोधित किया था, जैसे किसी बड़े जनप्रतिनिधि अथवा प्रतिष्ठित लोगों को किया जाता है। बीबीसी की इसके लिए ख़ासी आलोचना हुई थी। जहाँ वाशिंगटन पोस्ट ने बगदादी को ‘इस्लामिक विद्वान’ बताते हुए उसका महिमामंडन किया था, बीबीसी ने उसे ‘अंतर्मुखी’ और उसके परिवार को ‘धर्मनिष्ठ’ बता कर उसकी ख़ूब बड़ाई की थी। बीबीसी बगदादी के बचपन और जवानी के किस्से लेकर आया था और उसे ‘महान’ बताने की कोशिश की थी।
लेकिन सोशल मीडिया में लताड़ क्या पड़ी बीबीसी ने बगदादी के लिए ‘थे‘ की जगह ‘था‘ का प्रयोग करना शुरू कर उसे सम्मान देना बंद कर दिया है। पहले बीबीसी ने लिखा था, ‘बगदादी छिपे हुए थे‘, और अब लिखा है “बगदादी इदलिब में क्यों था?” ये स्क्रीनशॉट बीबीसी के उस न्यूज़ का है, जिसमें उसने बगदादी को सम्मान दिया था:
बीबीसी ने ‘बगदादी मारे गए’ लिखा था
वहीं आलोचना के बाद अपनी दूसरी ख़बर में बीबीसी ने खूँखार आतंकी रहे बगदादी के लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करना बंद कर दिया है। इसे आप नीचे इस स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं:
पहले बीबीसी ने वाशिंगटन पोस्ट से भी कई क़दम आगे निकलते हुए बगदादी को ऐसे प्रस्तुत किया था, जैसे वो मानव-सेवा के लिए बलिदान हुआ कोई सामाजिक कार्यकर्ता हो। जबकि बगदादी और उसका आतंकी संगठन आईएसआईएस 5 लाख से भी अधिक हत्याओं का गुनहगार है। यह भी कह सकते हैं कि बीबीसी ने बगदादी के मौत के बाद एक तरह से शोक मनाया और उसे ऐसे सम्मान दिया, जैसे वो कोई ऋषि-मुनि रहा हो। बीबीसी ने बार-बार उसके लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग किया था।
सबसे बड़ी बात कि बीबीसी ने इस लेख में ‘कथित इस्लामिक स्टेट’ का प्रयोग किया था। अर्थात, बीबीसी यह मानता ही नहीं है कि इस्लामिक स्टेट नामक कोई आतंकी संगठन इस दुनिया में है भी। बीबीसी का क्या ये मतलब था कि 4-6 लाख लोग यूँ ही हवा में मर गए, उन्हें किसी ने नहीं मारा?
पाकिस्तान के मंत्रियों की तरफ़ से भारत के ख़िलाफ़ आ रहे अजीबोगरीब बयानों का दौर थमता नहीं दिख रहा है। पाकिस्तान के मंत्री अली अमीन गंडापुर ने कहा है कि न सिर्फ़ भारत, बल्कि भारत का समर्थन कर रहे देशों की तरफ़ भी मिसाइलें छोड़ी जाएँगी। गंडापुर पाकिस्तान में कश्मीर मामलों के मंत्री हैं। उन्होंने धमकी दी कि अगर जम्मू-कश्मीर को लेकर तनाव बढ़ जाता है तो फिर पाकिस्तान युद्ध में जाने को विवश हो जाएगा। उन्होंने कहा कि कश्मीर मसले पर जो भी लोग भारत का साथ दे रहे हैं, उन्हें इस्लामाबाद अपना दुश्मन समझेगा।
गंडापुर ने कहा कि भारत का साथ दे रहे देश यह जान लें कि यदि पाकिस्तान ने एक मिसाइल अपने पड़ोसी पर छोड़ी तो दूसरी उनकी तरफ भी दागी जाएगी। गंडापुर पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान मामलों के मंत्री भी हैं और अक्सर विवादित बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं। उनके साथ-साथ पाक के रेल मंत्री शेख रशीद ख़ान भी अजीबोगरीब बयान देते रहते हैं। शेख रशीद को नरेंद्र मोदी का नाम लेते ही माइक से करंट लगा था, जिसके बाद उनकी काफ़ी किरकिरी हुई थी। उन्होंने पाकिस्तान के पास पाव भर के परमाणु बम होने का दावा किया था।
Minister for Kashmir Affairs, Gandapur is back and how: “any country that will not stand with Pakistan over Kashmir will be considered our enemy and missiles will be fired at them as well, in case of war with India.” I hope Trump received the message. pic.twitter.com/lcwuZwJiNq
पाकिस्तानी पत्रकार नायला इनायत ने गंडापुर का एक वीडियो ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने भारत का साथ देने वाले देशों की तरफ मिसाइल छोड़ने की धमकी दी है। नायला ने लिखा कि पाकिस्तानी मंत्री गंडापुर फिर से चर्चा में हैं। साथ ही उन्होंने मजाकिया अंदाज में लिखा, “मैं आशा करती हूँ कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इन बातों को सुन रहे हैं।” गंडापुर का बयान ऐसे समय में आया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी के दौरे पर हैं और उन्होंने सऊदी के किंग और क्राउन प्रिंस से मुलाक़ात की। इस दौरान भारत और सऊदी के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने के बाद पाकिस्तान बौखलाया हुआ है, क्योंकि सुरक्षा परिषद और यूएन जनरल असेंबली से लेकर एफएटीएफ तक, उसे हर जगह निराशा हाथ लगी है और भारत का हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारी रहा। जहाँ इमरान ख़ान यूएनजीए में कश्मीर, इस्लाम, भारत और पैगम्बर मुहम्मद की बातें करते रहें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण को लेकर भारत का पक्ष रखा और अपने भाषण में एक बार भी पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया। ऐस में पाकिस्तान के मंत्रियों की तरफ़ से इस तरह के बयानों का आना स्वाभाविक है।
महाराष्ट्र में भाजपा के नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक आज (अक्टूबर 30, 2019) मुंबई में होगी। बैठक में औपचारिक तौर पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के विधायक दल का नेता चुने जाने के आसार हैं। बैठक के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और पार्टी उपध्याक्ष अविनाश राय खन्ना को केंद्रीय पर्यवेक्षक बनाकर भेजा है।
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री @AmitShah ने केंद्रीय मंत्री श्री @nstomar एवं पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री अविनाश राय खन्ना को महाराष्ट्र में पार्टी के विधायक दल का नेता चुने जाने के लिए आहूत बैठक में केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया है।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि फडणवीस शुक्रवार (नवंबर 1, 2019) को दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। भाजपा सदन में विश्वासमत हासिल करने को लेकर आश्वस्त है। शिवसेना नेता पोस्टरों के माध्यम से आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री का चेहरा बना कर पेश कर रहे हैं, ताकि भाजपा पर दबाव बनाया जा सके। फडणवीस ने उद्धव ठाकरे की बात को नकारते हुए कहा है कि लोकसभा चुनाव के दौरान किसी 50-50 फॉर्मूले पर बात नहीं हुई थी।
मुंबई मिरर के सूत्रों के अनुसार, शिवसेना के न मानने की स्थिति भाजपा महाराष्ट्र में अल्पमत की सरकार चला सकती है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि 15 निर्दलीय विधायकों के साथ विधानसभा में फडणवीस के समर्थन में कुल संख्या 120 हो जाएगी। एनसीपी के वॉकआउट के बाद भाजपा विश्वासमत साबित कर देगी और अगले 6 महीने बाद फिर से फ्लोर टेस्ट पास करेगी।
महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने कहा है कि 50-50 फॉर्मूला वाली उद्धव की माँग पर ख़ुद अमित शाह उनसे बातचीत कर सकते हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि सत्ता में बराबर की भागीदारी को लेकर बात हुई थी, लेकिन 50-50 को ग़लत अर्थ में लेते हुए शिवसेना मुख्यमंत्री पद की माँग कर रही है। भाजपा संसद संजय काकडे ने दावा किया था कि 45 शिवसेना विधायक भाजपा के संपर्क में हैं और वो भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन करना चाहते हैं। शरद पवार के विपक्ष में बैठे के ऐलान के साथ ही कॉन्ग्रेस द्वारा शिवसेना को साथ लेने की कोशिशों को भी झटका लगा है।
इससे पहले मंगलवार को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बीजेपी के साथ बैठक रद्द कर दी थी। गौरतलब है कि 288 सीट वाली महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा 105 सीटों पर जीत के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, वहीं शिवसेना ने 56 सीटों पर जीत दर्ज की है। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी को 54 और कॉन्ग्रेस को 44 सीटें मिली हैं। ऐसे में सत्ता पर काबिज होने के लिए पर्याप्त बहुमत किसी एक दल के पास नहीं है।
पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम करार दिए जा चुके अहमदियों पर प्रशासन का अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है। खबर है कि बहावलपुर जिले के हासिलपुर गाँव में अहमदियों का 70 साल पुराना एक मस्जिद ध्वस्त कर दिया गया। इसकी जानकारी खुद समुदाय के प्रवक्ता सलीमुद्दीन ने दी।
सलीमुद्दीन ने बताया, “ हासिलपुर के असिस्टेंट कमिश्नर ने बालदिया कार्यकर्ताओं के साथ एक टीम बनाई और मुराद जिला स्थित अहमदियों के 70 वर्ष पुराने इबादत स्थल को बिना किसी सूचना के नष्ट कर दिया।”
इस घटना पर पाक प्रशासन ने अपनी सफाई में कहा है कि मस्जिद का निर्माण अतिक्रमण कर किया गया था। वहीं, सलीमुद्दीन का कहना कि मस्जिद का निर्माण समुदाय के स्वामित्व वाली जगह पर हुआ था और ये मस्जिद यहाँ पर कई दशकों से था।
Minaret & others parts of Ahmadi mosque in 161 Murad Bahawalpur demolished in operation led by Hasilpur assistant commissioner. Ahmadiyya community spokesperson says no notice served & property belongs to community for decades. Those who filmed the incident arrested & charged pic.twitter.com/rk9hdW3tTg
पाकिस्तानी अहमदियों का आरोप है कि सरकार ने अपराधियों के ख़िलाफ़ एक्शन लेने के बजाए उनके एक साथी पर ही झूठे आरोपों में मामला दर्ज कर लिया है। समुदाय के लोगों का कहना है, ” पुलिस ने उन लोगों पर मामला दर्ज नहीं किया जिन्होंने मस्जिद नष्ट किया। बल्कि उन्होंने उनके समुदाय के ही एक व्यक्ति को हिरासत में ले लिया, क्योंकि उसने पूरा वाकया कैमरे में कैद किया था।”
70-year-old Ahmadiya mosque razed down by Pakistani authorities in Bahawalpurhttps://t.co/J7yanCIiwK
गौरतलब है कि पाकिस्तान में अहमदियों पर अत्याचार की कहानी दशकों पुरानी है। साल 1974 में पहले इन्हें पाकिस्तानी संसद ने गैर मुस्लिम करार दिया था और फिर कुछ साल बाद प्रतिबंध लगा दिया गया था कि ये लोग खुद को मुस्लिम न कहें। बाद में इन्हें इनके धार्मिक आदर्शों को पढ़ाए जाने से रोका जाने लगा और धीरे-धीरे इनके हज जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।
इसके अलावा पाकिस्तान में अन्य अल्पसंख्यकों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। हाल में कई ऐसे मामले सामने आए , जिनमें हिंदू और सिख लड़कियों का अपहरण कर पहले उनका धर्म-परिवर्तन कराया गया और बाद में उनका निकाह किसी मुस्लिम युवक से करवा दिया। पाकिस्तान में हिंदू प्रिंसिपल, हिंदू मंदिर, हिन्दुओं की दुकानों पर प्रहार की खबर भी ज्यादा पुरानी नहीं हैं। जिसमें बाद में खुलासा हुआ था कि हिंदुओं पर हमला किसी घटना का आक्रोश नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी ताकि हिंदू बच्ची के अपहरण के मामले को दबाया जा सके।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान नया पाकिस्तान बनाने के वादे से सत्ता में आए थे। लेकिन, उनके कार्यकाल में भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और उन्हें प्रताड़ित करने की घटनाएँ थम नहीं रही है। हाल की कुछ घटनाओं में तो उनकी पार्टी के कार्यकर्ता भी संलिप्त रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर में हाल के दिनों में दूसरे राज्य से आए लोगों पर हमले की वारदातें बढ़ गई हैं। मंगलवार (अक्टूबर 29, 2019) को आतंकियों ने इस तरह के सातवें हमले को अंजाम देते हुए पश्चिम बंगाल के 5 मजदूरों की हत्या कर दी। ये घटना कुलगाम के कटरासु में हुई। घाटी में पिछले 15 दिनों में 11 लोगों की हत्या कर दी गई है। ये सभी दूसरे राज्यों के लोग थे। ताज़ा घटना में मारे गए सारे मजदूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के बाशिंदे थे। ये सभी किराए के घर में रहते थे। आतंकियों ने उन्हें घर में घुस कर घसीटते हुए बाहर निकाला और फिर गोली मार दी।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि इस क्रूर हत्याकांड से वो सदमे में हैं और मृतकों के परिवारों पर जो गुजर रही है, उसे सिर्फ़ बातों से दूर नहीं किया सकता। उन्होंने मृतकों के परिवारों को हरसंभव सहायता देने की बात कही। ममता ने कहा कि वो इस घटना से काफ़ी आहत हैं।
We are shocked and deeply saddened at the brutal killings in Kashmir. Five workers from Murshidabad lost their lives. Words will not take away the grief of the families of the deceased. All help will be extended to the families in this tragic situation
इस घटना के बाद से कश्मीर पुलिस, सेना और सीआरपीएफ के जवान इलाक़े को घेर कर तलाशी अभियान में लगे हुए हैं। इस घटना में एक अन्य मजदूर के गंभीर रूप से घायल होने की बात भी पता चली है। वहीं 3 अन्य मजदूर गायब बताए जा रहे हैं। ये सभी लोहार और मिस्त्री के तौर पर काम करते थे। हमला ऐसे वक़्त में हुआ जब यूरोपियन पार्लियामेंट का प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर के दौरे पर है। पैनल में शामिल सांसदों ने डल झील में नाव की सवारी की और स्थानीय लोगों से बातचीत की।
ताज़ा हमले में मारे गए मजदूरों के नाम हैं- शेख कमरुद्दीन, शेख मोहम्मद रफ़ीक, शेख मुरसुलीन, शेख निजामुद्दीन और मोहम्मद रफीक शेख। वहीं, जहरउद्दीन गंभीर रूप से घायल है। इस घटना के 1 दिन पहले ही विदेशी डेलीगेशन के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद से अवगत कराया था और भारत सरकार द्वारा शांति स्थापने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा की थी।
5 innocents from West Bengal killed by Pakistani terrorists in Kulgam today are:
1. Sheikh Kamrudin 2. Sheikh MD Rafiq 3. Sheikh Murnsulin, 4. Sheikh Nizam u Din 5. Mohd Rafiq Sheikh
Zahoor u Din is critically injured and battling for life. Prayers for the departed. Horrific. https://t.co/YfNY6LpIsJ
इससे पहले सोमवार (अक्टूबर 28, 2019) को भी आतंकियों ने एक ट्रक ड्राइवर की हत्या कर दी थी। उधमपुर स्थित कटरा के निवासी नारायण दत्त छठे ट्रक ड्राइवर थे, जिन्हें अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद जान गँवानी पड़ी है। नारायण दत्त पर ये हमला बिजबेहरा के कनिलवान इलाक़े में हुआ। आतंकियों ने उन पर गोली चलाई, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वहाँ 2 अन्य ट्रक ड्राइवर भी थे, जिनकी जान को ख़तरा था। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकरी ने तुरंत घटनास्थल पर पहुँच कर अन्य ट्रक ड्राइवरों की जान बचाई।
इससे पहले छत्तीसगढ़ के एक ईंट-भट्ठा मजदूर की भी हत्या कर दी गई थी। उधर यूरोपियन पैनल ने जम्मू-कश्मीर में भारतीय सैन्य अधिकारियों से भी मुलाक़ात की, जिन्होंने पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को लेकर उन्हें जानकारियाँ दी।
मद्रास हाईकोर्ट ने फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट करने को लेकर एक युवक को जमानत लेने के लिए शर्त रखी है कि उसे एक इसाई तथा एक इस्लामिक संगठन को 25-25 हज़ार रुपये देने पड़ेंगे। स्वराज्य मैगजिन में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु में रहने वाले 26 वर्षीय सिल्वाकुमार ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में हिन्दुओं से आग्रह किया था कि वे उन दुकानदारों का बहिष्कार करें, जिन्होंने अपनी दुकान मयिलाडूथुरई शहर में 6 फरवरी को एक दिवसीय बंद के दिन भी खुली रखी थी। यह बंद इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन पीएफआई के गुडों द्वारा पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) नेता वी रामालिंगम की हत्या के विरोध में बुलाया गया था। बता दें कि जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ आवाज़ उठाने पर रामालिंगम की निर्मम हत्या कर दी गई थी।
इस सम्बन्ध में सेल्वाकुमार ने एक फेसबुक पोस्ट लिखी थी जिसमें हत्यारों के प्रति सहानुभूति रखने का इशारा किया गया था। उस पोस्ट का संज्ञान लेते हुए पास ही के मनालमेदु थाने के इंस्पेक्टर ने पोस्ट करने वाले लड़के के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली थी। इसके बाद जब सेल्वाकुमार ने जब अपनी बेल के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया तो उसे भारी-भरकम धनराशि देने की बात कही गई।
अपनी याचिका में सेल्वाकुमार ने कहा कि जिस फेसबुक पोस्ट के लिए उन्हें दोषी ठहराया जा रहा है वह दरअसल उसने लिखी भी नहीं बल्कि किसी और की लिखी पोस्ट को दोबारा पोस्ट किया है। अपनी याचिका में उन्होंने आगे कहा कि आदेश के बाद उसने अपनी पोस्ट फेसबुक से भी डिलीट कर दी मगर मद्रास हाईकोर्ट को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात ये है कि सेल्वाकुमार को अदालत द्वारा यह कहा गया कि वह ‘तमिलनाडु मुस्लिम मुन्नेत्र कड़गम’ (टीएमएमके) नामक एक इस्लामिक संगठन के खाते में इसके लिए 25000 रुपए जमा करे। बता दें कि यह वही संगठन है, जिसने कश्मीर में सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को धमकी दी थी। इसी मामले में संगठन के एक आदमी की अगस्त में गिरफ़्तारी भी हुई थी। 2012 में यही संगठन उस षड्यंत्र में शामिल था, जिसके तहत चेन्नई स्थित यूएस कांसुलेट जनरल के ऑफिस पर हमला हुआ था। 2013 में इसी संगठन ने माँग की थी कि कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम पर बैन लगा दिया जाए।
टीएमएमके संगठन उन तमाम मुस्लिम संगठनों से एक है, जिसने 2016 में सरकार से यह माँग की थी कि कट्टरपंथी इस्लामिक विचारों को फ़ैलाने वाले जाकिर नाइक को आतंकवादी न कहा जाए। इसके बाद यह खुलासा हुआ था कि दूसरे मजहब के युवा जाकिर नाइक से प्रेरित पाए गए थे जो इस्लामिक स्टेट ज्वाइन करने की इच्छा रखते हैं।
मद्रास हाईकोर्ट का यह जजमेंट उस विवादित जजमेंट की याद दिलाता है जो राँची की कोर्ट ने जुलाई में दिया था। बता दें कि राँची की एक निचली अदालत ने जजमेंट में फेसबुक पर अपत्तिजनक पोस्ट करने वाली ऋचा भारती को कुरान की प्रतियाँ बाँटने का आदेश दिया गया था। हालाँकि भारी विरोध और प्रदर्शनों के बाद कोर्ट ने खुद ही इस हास्यास्पद फैसले को वापस ले लिया था।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। लेकिन शनिवार-रविवार और छुट्टियों को हटा दें तो उनके पास आधिकारिक कार्य करने के लिए सिर्फ 8 दिन ही बचे हैं। इन 8 दिनों में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे 7 ऐसे बड़े मामलों के फैसले आने हैं, जो धर्म, रक्षा और राजनीति जैसे विषयों से संबंधित हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि फिलहाल दिवाली की छुट्टियों के तहत बंद सुप्रीम कोर्ट जब 4 नवंबर को खुलेगा, तो किस मामले में कैसा फैसला आएगा।
अयोध्या-बाबरी मस्जिद मामला
रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि के विवादित 2.77 एकड़ जमीन के स्वामित्व के लिए हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों द्वारा दायर की गई अपील पर 40 दिन सुनवाई चली। CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों वाली पीठ ने इस मामले पर 16 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इस मामले में दोनों पक्षों ने इतिहासकारों, ऐतिहासिक यात्रियों, गैजेटियर, अंग्रेज के जमाने से चले आ रहे जमीन संबंधी कागजातों के साथ अपनी-अपनी आस्था का पक्ष भी रखा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टों को भी सुनवाई के दौरान जजों के समक्ष रखा गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सितंबर 2010 के अपने फैसले में विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बाँटा था – राम लला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड।
सबरीमाला रिव्यू पिटिशन
इस मामले में भी 5 जजों की पीठ है। पीठ की अध्यक्षता करेंगे CJI गोगोई। दरअसल 28 सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केरल स्थित सबरीमाला मंदिर में रजस्वला (10 से 50 साल की ऐसी स्त्रियाँ, जिन्हें मासिक धर्म/पीरियड आते हों, आ सकने की संभावना हो) को मंदिर में प्रवेश पर लगे रोक को हटा दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ 65 याचिकाएँ दायर की गईं। तर्क यह दिया गया कि अदालत ने “सदियों पुरानी” धार्मिक मान्यता के साथ हस्तक्षेप किया है। और यह भी कि सबरीमाला देवता एक “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” हैं, जिनकी तपस्या मासिक धर्म होने वाली महिला उपासकों के प्रवेश से भंग नहीं होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने अपने तर्क में यह बात भी रखी कि सभी वर्गों (लिंग-आधारित) के पूजा का अधिकार होना आवश्यक है लेकिन जिसकी पूजा की जा रही है, और जिस मंदिर विशेष में की जा रही है, उसके अधिकारों को भी ध्यान में रखना उतना ही जरूरी है।
इस मामले में CJI गोगोई 5 जजों की समीक्षा पीठ के साथ यह तय करेंगे कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को यथावत रखना है या उसे बदल कर नया फैसला सुनाना है।
राफेल रिव्यू पिटिशन
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर अधिवक्ता प्रशांत भूषण, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा ने राफेल फाइटर प्लेन सौदे से संबंधित रिव्यू पिटिशन दायर की थी। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के द्वारा राफेल मामले में ही पिछले साल 14 दिसंबर को दिए गए फैसले के विरोध में दाखिल की गई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील में भ्रष्टाचार संबंधी आरोप पर जाँच के आदेश देने से इनकार कर दिया था।
The Hindu ने कथित डॉक्युमेंट्स लीक किए थे, जिनके आधार पर याचिकाकर्ताओं ने पुनर्विचार याचिका डाली थी। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने तर्क दिया था कि चूँकि वे दस्तावेज़ अवैध तरीके से प्राप्त किए गए हैं, अतः उनकी अदालत में कोई प्रमाणिकता नहीं हो सकती। अदालत ने इस तर्क को ख़ारिज कर दिया था, लेकिन राफेल सौदे पर याचिकाकर्ताओं के मन-मुताबिक कोई त्वरित फैसला भी नहीं दिया।रिव्यू पिटिशन पर 10 मई 2019 को कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
जिस पीठ ने यह फैसला सुरक्षित रखा था, उसमें मुख्य न्यायाधीश गोगोई भी शामिल थे। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि केंद्र सरकार ने अदालत को गुमराह किया, जिसके बाद 14 दिसंबर, 2018 को कोर्ट की ओर से इस तरह (जाँच के आदेश देने से इनकार) का आदेश आया।
राहुल गाँधी पर अवमानना का मुकदमा
इसी राफेल मामले में अदालत द्वारा फैसला सुरक्षित कर लेने के बाद तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने मीडिया से दावा किया था कि अदालत ने कह दिया ‘चौकीदार (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) चोर है’। भाजपा नेत्री मीनाक्षी लेखी ने राहुल गाँधी द्वारा अपने शब्द अदालत के होने का दावा करने को अदालत की अवमानना मानते हुए मुकदमा किया, जिसके बाद राहुल को माफ़ी माँगनी पड़ी थी। उन्होंने कहा था कि चुनावी गर्मागर्मी में उनकी ज़बान फिसल गई थी। CJI गोगोई इस मामले पर भी अपना फैसला सुनाएँगे।
क्या RTI मुख्य न्यायाधीश पर लागू होगा?
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4 अप्रैल को सीजेआई के आरटीआई के अंतर्गत आने पर फैसला सुरक्षित कर लिया था। 5 जजों की संविधान पीठ सुप्रीम कोर्ट के महासचिव द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट के सीजेआई को आरटीआई में लाने के फैसले (2010) के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सेवानिवृति से पहले रंजन गोगोई के अहम फैसले में से एक यह भी होगा।
फाइनेंस एक्ट 2017 की वैधता
10 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने रेवेन्यू बार असोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर फैसला सुरक्षित कर लिया था। याचिका में फाइनेंस एक्ट 2017 के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई थी, जिनसे विभिन्न न्यायिक ट्रिब्यूनलों जैसे एनजीटी, इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल, नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल आदि की ताकत और संरचना प्रभावित हो रही थी।
सीजेआई के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज एके पटनायक जाँच कर रहे थे इस बात की कि क्या सीजेआई गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत कोई साजिश थी? जस्टिस अरुण मिश्रा, आरएफ नरीमन और दीपक गुप्ता की विशेष पीठ ने जस्टिस पटनायक की नियुक्ति की थी। जाँच का आधार अधिवक्ता उत्सव बैंस की वह शिकायत थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उनसे फिक्सरों, कॉर्पोरेट लॉबीइस्टों और सुप्रीम कोर्ट के नाराज कर्मचारियों ने सीजेआई के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए संपर्क किया था। खबरों के मुताबिक जस्टिस पटनायक ने जाँच पूरी कर अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दी है। यह फैसला भी अपने आप में ऐतिहासिक होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस्लामिक स्टेट पर हुई अमेरिकी कार्रवाई के सन्दर्भ में ट्वीट करके एक अहम खुलासा किया है। ट्रम्प ने बताया कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी फ़ौज की कार्रवाई में किए गए हमले के दौरान इस्लामिक स्टेट के मुखिया बगदादी के साथ उसका उत्तराधिकारी भी हमले में मारा गया है।
बगदादी के बाद इस आतंकवादी इस्लामिक संगठन की कमान संभालने का दायित्व अब्दुल्लाह कार्दश के कन्धों पर थी। हालाँकि ट्रम्प ने मारे गए आतंकी का नाम सार्वजानिक नहीं किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बगदादी कई बीमारियों से ग्रसित था, यही वजह है कि कार्दश ही इन दिनों आतंकी संगठन की देखरेख करता था और आने वाले समय में इसकी पूरी ज़िम्मेदारी संभालने में लगा था।
US President Donald Trump: Just confirmed that Abu Bakr al-Baghdadi’s number one replacement has been terminated by American troops. Most likely would have taken the top spot – Now he is also Dead! (file pic) pic.twitter.com/C5sWuaKFhl
बता दें कि इस्लामिक आतंकवादी संगठन आईएसआईएस का सरगना बगदादी जिस अमेरिकी हमले में मारा गया, उसकी जानकारी अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने ट्विटर हैंडल के ज़रिए दी थी। अपने ट्वीट में ट्रम्प ने घटना की ओर इशारा करते हुए लिखा था कि कुछ बड़ा होने वाला है। इसी के बाद दुनिया भर में चर्चा शुरू हो गई थी कि सबसे खूंखार आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के सरगना अबू बकर अल बगदादी को अमेरिका ने मार गिराया है।
बगदादी की मौत के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि वह उसके उत्तराधिकारियों के बारे में जानते हैं। ट्रंप ने ही रविवार को ऐलान किया था कि खूंखार आतंकी बगदादी अमेरिकी सेना के ऑपरेशन में मारा गया। अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, “हम उसके उत्तराधिकारियों के बारे में जानते हैं और उन पर हमारी नजर है।”
ट्रम्प ने बगदादी के उत्तराधिकारी की मौत पर ट्वीट किया, “अभी-अभी पुष्टि हो गई है कि बगदादी का नंबर वन रिप्लेसमेंट भी अमेरिकी सेना द्वारा मारा गया। वह आईएस का सरगना बनने वाला था, अब उसकी मौत हो चुकी है।” अब्दुल्लाह के बारे में कहा जाता है कि वह इससे पहले ईराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन के लिए काम किया करता था। इस्लामिक स्टेट में उसका रसूख ऐसा था कि वह बगदादी के हर फैसले को वही अंजाम दिया करता था।
आज हम उस दौर में रह रहे हैं, जहाँ कट्टरपंथी इस्लाम ने लाखों लोगों की मौत के साथ दुनिया को अपने चंगुल में जकड़ रखा है, जो काफिरों (हिन्दुओं) पर होने वाली हर तरह की हिंसा के लिए साफ़ तौर पर जिम्मेदार है। लेकिन ऐसे दौर में भी अधिकांश वामपंथी प्रोपेगेंडा चलाने वाले वेबसाइट उन पर आँख मूँदे हुए हैं। वहाँ उन्हें कोई बुराई नज़र नहीं आती। कोई असहिष्णुता दिखाई नहीं देती क्योंकि समस्यायों के व्यापार पर पलने वाले ऐसे कुटीर उद्योग जो मुख्य रूप से हिंदुओं, उनके धर्म और संस्कृति को टारगेट करने पर ही केंद्रित है। दशकों से ऐसे गिरोहों का एकमात्र उद्देश्य ही पीड़ित हिन्दुओं को और प्रताड़ित और अपमानित करना हो चुका है। अब तो ये गोएबल्स धुरंधर प्रचारक इतना आगे बढ़ चुके हैं कि अपने नापाक मतलब के लिए बच्चों को बलि का बकरा बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। यहाँ बात हो रही है बच्चों की एक पत्रिका ‘चंपक’ के नवीनतम संस्करण पर।
@OnlyNakedTruth नामक ट्विटर हैंडल से एक ट्विटर यूजर ने चंपक के अक्टूबर संस्करण के कुछ स्क्रीनशॉट ट्वीट किए, जो कि कश्मीर पर केंद्रित है। इसमें ये दिखाया गया है कि अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करने के लिए मोदी सरकार के कदम ने उस विशेष स्थिति को ही समाप्त कर दिया, जिसका कश्मीर दशकों से लाभ ले रहा था। यहाँ यह छिपा है कि वामपंथी और अलगाववादी इससे मलाई काट रहे थे और आतंकी कश्मीर में आश्रय पा रहे थे।
Does anyone know why children’s magazine Champak has become a leftist-Islamic tool of propaganda? Their Oct edition cover story is about Kashmir (came out after article 370 removal). It is encouraging kids to understand the difficulties faced by KMs there by writing to them. pic.twitter.com/er5msEOR2z
इसी ट्विटर हैंडल द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट में से एक में बच्चों से कश्मीर में अन्य बच्चों को लिखने का देखिए कितना ‘मार्मिक’ आग्रह किया गया है।
चंपक पत्रिका के अक्टूबर संस्करण के एक हिस्से में पत्रिका बच्चों से कश्मीर में अपने जैसे अन्य बच्चों के नाम पत्र लिखने और उनसे वहाँ की स्थिति के बारे में पूछने के लिए अपील की गई है। पत्रिका के इस संस्करण में कहा गया है कि कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त किए जाने के बाद घाटी में स्थिति ठीक नहीं है। हजारों सैनिकों और सेना की बटालियनों को कश्मीर भेजा गया है और जगह-जगह कर्फ्यू लगा हुआ है। यहाँ तक कि टेलीफोन लाइनों और इंटरनेट सेवाओं को भी निलंबित कर दिया गया है। मतलब उनपर बड़ा अत्याचार हो रहा है। आप हमें पत्र भेंजे हम उन्हें निश्चित रूप से कश्मीर के बच्चों तक पहुँचाएँगे। ऐसा करके बच्चों में ये जहर बोने की कोशिश है कि देखिए वहाँ के बच्चे किस हाल में हैं। कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि इससे पहले वहाँ के क्या हालात थे।
अगला स्क्रीनशॉट तो और भी खतरनाक है:
चम्पक अक्टूबर एडिशन का एक हिस्सा
अगले भाग में, चंपक में एक छोटे लड़के की तस्वीर खींची गई है, नाम है हसन जो स्कूल जाना और खेलना चाहता है, जबकि अत्याचारी भारतीय राज्य और वहाँ की सेना उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रही है। कहानी के माध्यम से दुष्प्रचार का पूरा खाका खींचा गया है, लेख में इस बारे में भी बात की गई है कि हसन की माँ घर पर नहीं है और पिता फोन के काम न करने के कारण उनसे संपर्क नहीं कर पाने के कारण सभी दुखी हैं। यहाँ एक बात गौर करने लायक है जैसे फोन का कुछ दिनों काम न करना बहुत बुरी स्थिति है। इससे अच्छा तो आतंकवाद और अलगाववाद ही था।
हालाँकि, इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है, कि घाटी में संचार व्यवस्था पर वास्तव में रोक थी, लेकिन क्यों थी इस पर चर्चा नहीं है। जबकि सबको पता है कि कश्मीर कहीं अधिक अति सूक्ष्म विषय है, जिसे छोटे स्कूली बच्चों को भावुकता के साथ सुनाए गए ऐसे कहानियों के माध्यम से नहीं समझाया जा सकता है। यह कहानी स्पष्ट रूप से बच्चों को कश्मीर में बड़े पैमाने पर होने वाले जिहाद, आईएसआईएस और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों की मौजूदगी के बारे में नहीं बताती है, और ये भी नहीं कि अनुच्छेद 370 के कारण घाटी के हिंदुओं, वहाँ के पंडितों, महिलाओं के अधिकारों और अन्य छोटे समुदायों के अधिकारों पर कितना ज़्यादा बुरा प्रभाव पड़ रहा था। ये सभी वर्ग अपने मूलभूत अधिकारों से भी वंचित थे। लेकिन ये ऐसे वामपंथी प्रोपेगेंडा बाजों के लिए कोई समस्या की बात नहीं है बल्कि कुछ दिनों तक फोन का बंद होना सबसे बड़ी समस्या और कश्मीर के लोगों पर अत्याचार हो गया।
हम सब जानते हैं कि शुद्ध भावुकता के साथ बच्चों को ऐसे आधे-अधूरे तथ्य परोसने के कई खतरे हैं, ऐसे कई तथ्य हैं जो चम्पक बच्चों से छिपा रहा है। लेकिन यही तो वामपंथी प्रोपेगेंडा का असली हथियार है। हमेशा उन्हीं तथ्यों या घटनाओं पर बात या बवाल कीजिए जो एजेंडे को शूट करे।
दिल्ली प्रेस और उग्र हिंदूफ़ोबिया:
दिल्ली प्रेस, जहाँ से बच्चों की मैगज़ीन चंपक प्रकाशित होता है, उसे अब परंपरागत रूप से जमीनी वास्तविकताओं से दूर कर अक्सर वामपंथी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाने के लिए, हिंदुओं और भारतीय संस्कृति के खिलाफ लगातार अभियान चलाने का मुखपत्र बना दिया गया है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस तरह से कहीं न कहीं मासूम बच्चों की जड़ों में ही मट्ठा घोल देने का प्रयास इस वामपंथी एजेंडे के तहत किया जा रहा है।
जानकारी के लिए बता दूँ कि दिल्ली प्रेस एक बड़ा प्रकाशन हाउस है जो 10 अलग-अलग भाषाओं में 36 पत्रिकाओं के माध्यम से अपना प्रोपेगेंडा और एजेंडा फैला रहा है। दिल्ली प्रेस की स्थापना 1939 में हुई थी और इसकी शुरुआत 1940 में कारवाँ पत्रिका से हुई थी। कारवाँ के कारनामे आपने पुलवामा के समय देखें होंगे जहाँ एक तरफ देश बलिदानियों के दुःख से आहत था तो वहीं कारवाँ हुतात्माओं की जाति तलाश रहा था।
IndiaFacts.org में प्रकाशित एक ओपिनियन में लेखक ने लिखा है:
“ऐसे समय में जब नास्तिकता वयस्कों के बीच भी अलोकप्रिय हो रही थी, बच्चों की पत्रिका, चंपक ने नास्तिक प्रोपेगेंडा पर काम करना शुरू किया, जिसका मुख्य टारगेट हिंदू धर्म था। कई कहानियों के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया गया कि कैसे ‘मूर्तियों की पूजा करना अंधविश्वास है’ और कैसे ‘विज्ञान के वर्चस्व वाले विश्व में धर्म पर हावी होने वाली संस्कृति को बदल देना चाहिए।’ यहाँ इनके वामपंथियों के निशाने पर यह धर्म हमेशा ‘हिंदू धर्म’ ही है।
यह सब कुछ नया नहीं है बल्कि कश्मीर पर चंपक की नवीनतम लघु कहानी के जरिए परोसे गए प्रोपेगेंडा जैसा ही है।
सरिता: ‘अश्लीलता’ और हिंदूफोबिया से जुड़े वाक्यांश का उपयोग
दिल्ली प्रेस, की एक अन्य पत्रिका सरिता तो ‘उग्र हिंदूफ़ोबिया’ के ख़िलाफ़ तो पूरा वसीयतनामा ही प्रस्तुत करती है।
दिल्ली प्रेस की वेबसाइट खुद सरिता को एक प्रमुख पत्रिका के रूप में पेश करते हुए लिखता है कि यह पत्रिका जो ‘धार्मिक अश्लीलतावाद’ और ‘राजनीतिक सत्तावाद’ के खिलाफ लड़ाई है।
यह देखना दिलचस्प है कि सरिता का वर्णन करने के लिए दिल्ली प्रेस ‘धार्मिक अश्लीलता’ से लड़ने जैसे शब्द का उपयोग कर रहा है। इस मैगज़ीन में छपे हिंदू-विरोधी लेखन को देखते हुए, कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि सरिता का उद्देश्य केवल हिंदू संस्कृति और धर्म के सिद्धांतों पर सवाल उठाना है, जिसे वे अक्सर ‘अंधविश्वास’ के रूप में दिखाते हैं। ‘अश्लीलतावाद’ जब एक गहरी हिंदू-विरोधी पत्रिका का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है, तो इसका अर्थ केवल ब्राह्मणवाद-विरोधी माना जा सकता है, जो कि एक ट्रैप है जो अक्सर वामपंथियों द्वारा हिंदू धर्म को गलत तरीके से वर्णित करने के लिए बड़ी धूर्तता से उपयोग किया जाता है।
सरिता में छपे कई ऐसे लेख हैं जिनके शीर्षक, जो स्पष्ट रूप से हिंदू-विरोधी तिरस्कार और नफरत को प्रदर्शित करते हैं। जैसे- ‘कांवड़िया, अंधविश्वासी परंपराओं के वाहक’, “(हिन्दू) पंडितों का भ्रम”, “वास्तु (हिंदू) धर्म की एक बुराई”, धर्म की आड़ में सब्ज़बाग, नए टोटकों से ठगी: मिर्ची यज्ञ और गुप्त नवरात्री’ आदि कुछ ऐसे लेख हैं जो पत्रिका में मौजूद हैं। इन लेखों के शीर्षकों से ही एजेंडा साफ़ दिखने लगता है कि इनके निशाने पर कौन है।
सरिता पत्रिका का वर्तमान मुखपृष्ठ, धर्म इस प्रकार दिखता है:
सरिता धर्म होमपेज सरिता धर्म होमपेज सरिता धर्म होमपेज
’धर्म’ के होम पेज पर हर एक लेख में हिंदू धर्म को अपमानित करता हुआ लेख देख सकते हैं। 13 लेखों में कुछ के टाइटल हैं- “पुजारी कैसे भक्तों को भटकाते हैं”, “किस तरह से भक्ति के शहर में ‘लड़कियों की बिक्री’ होती है। साधुओं और संतों को एक्सपोज़ करने के नाम पर यह लेख कि ‘धर्म खून से खेलता है।”
वेबसाइट के आर्काइव में आगे भी, ऐसे कई लेख मिलते हैं जो बताते हैं कि सरिता हिंदुओं के विश्वास का अपमान करने के मिशन पर है।
अनिवार्य रूप से, लेख का शीर्षक है, “अंधविश्वास और पाखंड का महिमामंडन करती श्री दुर्गासप्तशती”।
सरिता ने पहले भी और यहाँ तक कि हाल ही में अक्टूबर 2019 में हाल ही में प्रकाशित किए गए गटर के स्तर के हिंदूफोबिक लेखों के बारे में बात करने के लिए देखे जा सकते हैं। हालाँकि, इतने से ही यह स्पष्ट है कि सरिता, दिल्ली प्रेस की प्रमुख हिंदी पत्रिका पिछले कई दशकों से हिंदू धर्म के खिलाफ धर्मयुद्ध छेड़े हुए है। इसे सारी बुराई सिर्फ एक ही धर्म में दिख रही है।
वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि सरिता के हिंदूफ़ोबिया की गाथा नई नहीं है। 1957 में, अरविंद कुमार की कविता “राम का अन्तर्द्वंद” को लेकर एक विवाद उत्पन्न हुआ जो सरिता में ही प्रकाशित हुआ था।
कारवाँ: दिल्ली प्रेस का मूल हिंदूफ़ोबिया
कारवाँ पत्रिका दिल्ली प्रेस की पहली पेशकश थी और इसे 1940 में लॉन्च किया गया था। लेकिन वर्तमान में कारवाँ इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली प्रेस वास्तव में अपने दुर्भावनापूर्ण लेखों के माध्यम से कितना नीचे गिर गया है। पुलवामा आतंकी हमला पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित और नृशंस रूप से किया गया एक आत्मघाती हमला था जिसमें कई भारतीय सैनिकों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया था। पूरा देश ने एकजुट होकर शोक व्यक्त किया। देश ने एक ऐसे आतंकी राज्य पाकिस्तान के खिलाफ प्रतिशोध की माँग भी की जिसने हमारे सैनिकों के खून से पुलवामा की गलियों को रंग दिया। जब राष्ट्र अपने सशस्त्र बलों के पीछे खड़ा था, तो उस समय कारवाँ उनकी जाति की गिनती में व्यस्त था।
द कारवाँ के एज़ाज अशरफ की एक रुग्ण रिपोर्ट में, उन्होंने हमारे शहीद सैनिकों की ‘जाति का विश्लेषण’ किया था। कारवाँ का एजेंडा तो ऐसा है, जिसमें उन्होंने उन बलिदानी सैनिकों को भी नहीं छोड़ा, जिनकी पाकिस्तान जैसे आतंकी स्टेट द्वारा प्रायोजित आतंकी संगठन जैश द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी।
इसी द कारवाँ ने केवल अपने एजेंडे के लिए अमित शाह, पीएम मोदी, एनएसए डोभाल और उनके बेटे पर कई घटिया आधारहीन रिपोर्ट प्रकाशित किए हैं। और जब खुलासा हुआ तो नए प्रोपेगेंडा की तरफ निकल लिए।
कुलमिलाकर, लाखों पाठकों के साथ, दिल्ली प्रेस ने एक ऐसा व्यापक जाल बुन डाला है। जिससे निकलना शायद अब उससे संभव न हो। सरिता, कारवाँ, जो संभ्रांत अंग्रेजी बोलने वाली भीड़ का मुखपत्र है। दिल्ली प्रेस ने अब अपनी प्रोपेगेंडा की धार और तेज करने के लिए स्पष्ट रूप से अब बच्चों की पत्रिका चंपक को भी अपने एजेंडे का हथियार बनाकर मासूमों के कोमल मन पर भी अपनी विषबेल फ़ैलाने के पथ पर अग्रसर है।
आज सूचना युद्ध के युग में दिल्ली प्रेस ने एक ऐसे पक्ष को चुना है जो हिन्दफोबिया से ग्रसित और वामपंथी दूषित एजेंडे का पोषक है। आज जब एक ऐसा दौर चल रहा है जहाँ आतंक को बढ़ावा देने के लिए एक देश जी जान से लगा है तो इस दौर में आपको सोचना अपने समाज, अपने देश और अपने बच्चों के भावी भविष्य के बारें में। हम सबको पता है यह वामपंथी एजेंडे का पोषक पक्ष जो हिंदुओं के लिए खड़ा नहीं है, और न ही यह भारत के लिए खड़ा है। तो हमें खुद अपने लिए खड़ा होना होगा। और ऐसे प्रोपेगेंडा से निपटना होगा। ये वामपंथी गिरोह जहाँ भी जहर फ़ैलाने की कोशिश करें उसे पूरी सजगता से रोकना होगा। इसी में देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों की भलाई है।
नोट: यह लेख मूलतः इंग्लिश में प्रकाशित हुआ है, जिसका अनुवाद रवि अग्रहरि ने किया है।
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव परिणामों की घोषणा होने के बाद से ही राज्य में सरकार किसकी बनेगी, यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। शिवसेना जहाँ एक ओर 50-50 के फॉर्मूले पर अड़ी हुई है तो वहीं दूसरी ओर भाजपा का पक्ष है कि अगले पाँच साल तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस होंगे। बता दें कि सरकार बनाने को लेकर चल रही भाजपा-शिवसेना की इसी खींचतान में दोनों के बीच होने वाली बैठक रद्द हो गई है। शिवसेना के संजय राउत का कहना है कि यह बैठक खुद उद्धव ठाकरे ने रद्द की है। लेकिन बैठक रद्द होने के बाद जो हुआ वो चौंकाने वाला है।
Sanjay Raut, Shiv Sena: Discussions between BJP-Shiv Sena were scheduled for 4 pm today. But if the CM himself is saying that the ’50-50 formula’ was not discussed then what will we even talk about? On what basis should we talk to them? So Uddhav ji has cancelled today’s meeting pic.twitter.com/duyYQpCQtn
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के विशेष कार्याधिकारी श्रीकांत भारतीय के घर पर हमला हुआ है। मुख्यमंत्री के ओएसडी के अमरावती स्थित घर पर कुछ अज्ञात लोगों ने हमला बोल दिया, साथ ही घर के बाहर खड़ी कार में भी तोड़फोड़ की। जिस समय यह घटना हुई, श्रीकांत अपने परिवार के लोगों के साथ घर से बाहर गए हुए थे। एक अधिकारी ने बताया कि इस घटना को महाराष्ट्र चुनाव के परिणामों और सत्ता-समीकरणों के बनते-बिगड़ते खेल से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालाँकि इस घटना में कोई भी हताहत नहीं हुआ है।
राजनीतिक खींचतान के बीच दोनों पार्टियों के नेता बयानों के जरिए एक दूसरे पर दबाव बढ़ाने की कोशिश में लगे हुए हैं मगर उनके इन प्रयासों के चलते बीच का कोई रास्ता अभी तक नहीं निकल सका है। चुनाव परिणाम आने के पाँच दिन के बाद भी फ़िलहाल कोई सत्ता की ओर सीढ़ी चढ़ता नज़र नहीं आ रहा है।
शिवसेना जिस 50-50 फॉर्मूले की बात कर रही है, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उसका खंडन करते हुए उनकी इस माँग को पूरी तरह से नकार दिया है। उन्होंने कहा कि राज्य में पूरे पाँच साल भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार चलेगी। मतलब, इशारा साफ़ था कि फडणवीस अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी से भी बाँटने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने अपने निवास पर मीडिया से बातचीत में कहा कि ढाई वर्ष के लिए शिवसेना का मुख्यमंत्री होगा, ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस बात की पुष्टि की है कि ऐसा कोई वादा नहीं किया गया है।
50-50 फॉर्मूले पर बात नहीं बनते देखने के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने दोनों पार्टियों के नेताओं की शाम चार बजे होने वाली बैठक को रद्द कर दिया। इस मामले पर सांसद संजय राउत ने सवालिया अंदाज़ में अपनी बात रखते हुए कहा, “अगर मुख्यमंत्री ही कह रहे हैं कि 50-50 फॉर्मूला पर चर्चा नहीं होगी तो बैठक और उसकी चर्चा का आधार ही क्या रह जाएगा?” उन्होंने बताया कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और ठाकरे की उपस्थिति में 50- 50 फॉर्मूले पर बातचीत हुई थी। वे बोले, “यह सब उन्होंने कैमरे के सामने कहा था मगर अब उससे इनकार कर रहे हैं।”
वहीं मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि सरकार के गठन को लेकर शिवसेना की ओर से कोई माँग नहीं रखी गई है। यदि वे कोई माँग रखते हैं तो उस पर विचार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भाजपा पाँच साल तक स्थिर और दक्ष सरकार देने में सक्षम है। फडणवीस ने जानकारी दी कि उन्हें दस निर्दलीय विधायकों का समर्थन प्राप्त है और उन्हें पाँच और निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिलने की आशा है।
बता दें कि 288 सीट वाली महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा 105 सीटों पर जीत के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, वहीं शिवसेना ने 56 सीटों पर जीत दर्ज की है। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी को 54 और कॉन्ग्रेस को 44 सीटें मिली हैं। ऐसे में सत्ता पर काबिज होने के लिए पर्याप्त बहुमत किसी एक दल के पास नहीं है। यही वजह है कि सत्ता समीकरणों के लिए भाजपा का अपने घटक दल तथा निर्दलीय विधायकों से साथ लम्बी बैठकों का दौर जारी है।