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गोवंश का मिला अवशेष, हिन्दू संगठनों के विरोध पर पूरी पुलिस चौकी सस्पेंड: 13 हिरासत में

उत्तर प्रदेश में बागपत के बड़ौत कोतवाली क्षेत्र के लुहारी गाँव के पास गोकशी को लेकर हिन्दू संगठन के कार्यकर्ताओं ने जमकर हंगामा किया। लापरवाही बरतने की वजह से एसपी ने बोहला चौकी पर तैनात 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है। इस घटना की जाँच-पड़ताल के लिए तीन टीमों का गठन किया गया है। इसके अलावा, पुलिस ने कई मीट विक्रेताओं और मांसाहार परोसने वाले होटलों में छापा मारकर 13 संदिग्धों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है।

ख़बर के अनुसार, पुलिस ने बताया कि संदिग्ध लोग यह नहीं बता पाए कि वो लोग मीट कहाँ से लाए और उन्हें कौन बेचता है। एसपी ने कार्रवाई करते हुए गोवंश के सैंपल जाँच के लिए लैब में भेज दिए हैं।

दरअसल, बुधवार (23 अक्टूबर) को सुबह गाँव के खेतों के पास लोगों ने गोवंश के अवशेष देखे। इसके थोड़ी देर बाद वहाँ हिन्दू संगठन के कार्यकर्ता पहुँचे और कार्रवाई की माँग को लेकर उन्होंने जमकर हंगामा किया। सूचना पाते ही इंस्पेक्टर समेत सीओ और एसडीएम भी घटना-स्थल पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने उचित कार्रवाई किए जाने का आश्वासन देकर गोवंश के अवशेषों को उठाने की कोशिश की, लेकिन लोग भड़क गए और डीएम और एसपी को बुलाने पर अड़ गए। इस दौरान बड़ौत के भाजपा विधायक केपी मलिक भी वहाँ पहुँचे।

भाजपा विधायक मलिक ने गोकशी पर अंकुश लगाने की बात कही और ऐसा करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई किए जाने की माँग की। इसके बाद एसपी प्रताप गोपेंद्र और डीएम शकुंतला गौतम घटना-स्थल पर पहुँचे, जहाँ उन्होंने लोगों को आश्वासन दिया कि आरोपितों को 48 घंटे के भीतर पकड़ लिया जाएगा।

वहीं, ग्रामीणों का कहना है कि यह घटना पुलिस की लापरवाही से हुई है और इसलिए बोहला पुलिस चौकी पर तैनात पूरे स्टाफ़ को निलंबित किया जाना चाहिए। इस पर एसपी ने बताया कि लापरवाही सामने आने पर बोहला पुलिस चौकी पर तैनात दरोगा, एक हेड कॉन्स्टेबल और तीन सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया है।

बता दें कि गोवंश की हत्या की यह घटना कोई पहली घटना नहीं है। इस साल में अब तक 23 घटनाएँ हो चुकी हैं, कई मामलों में दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी हुई है। कुल 89 लोगों को जेल भेजा जा चुका है। आईजी आलोक सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा है कि जिन थाना क्षेत्र में गोवंश की हत्या होगी, वहाँ के थानाध्यक्ष के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि दोषी पाए जाने पर गोकशी करने वालों के ख़िलाफ़ रासुका के तहत कार्रवाई की जाएगी।

‘रेप और किडनैप करती है Pak सेना’ – आरोप लगाने वाली 32 साल की इस्माइल के पिता का अपहरण

पाकिस्तानी महिला अधिकार कार्यकर्ता गुलालाई इस्माइल ने एक बार फिर से अपने ही देश का चेहरा बेनकाब कर दिया है। गुलालाई इस्माइल का आरोप है पाकिस्तान की एजेंसियाँ वहाँ की उन औरतों में डर पैदा करना चाहती हैं जो अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की हिम्मत दिखाती हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान ऐसे लोगों को निशाना बना रहा है, जो अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।

इस्माइल ने दावा किया है कि उनके पिता को गुरुवार (अक्टूबर 24, 2019) को ‘मिलिट्री पोशाक’ पहने लोगों ने पेशावर हाइकोर्ट से बाहर से किडनैप कर लिया। वो कहती हैं कि पाकिस्तानी एजेंसियों ने ऐसा इसलिए किया है ताकि उनकी आवाज को दबाया जा सके। गुलालाई इस्माइल ने ट्वीट करते हुए लिखा कि उनके पिता का अपहरण कर पाकिस्तान उन महिलाओं को आतंकित करने की कोशिश कर रहा है, जिन्होंने उनके पिता का समर्थन किया और पाकिस्तान से असहमति जताई। अब पाकिस्तान ऐसे लोगों को आतंक के नाम पर डराने की कोशिश कर रहा है।

गुलालाई इस्माइल ने एक पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता के ट्वीट का जवाब देते हुए यह बात कही, जिन्होंने उनके पिता को जेल में यातनाएँ दिए जाने को लेकर चिंता व्यक्त की थी। गुलालाई इस्माइल फिलहाल अमेरिका में राजनीति शरण की माँग कर रही हैं। बता दें कि इस्माइल पर पाकिस्तान में राजद्रोह का आरोप लगाया गया था। जिसके बाद सितंबर में वह पाकिस्तान छोड़कर अमेरिका चली गई थीं।

पिछले महीने न्यू यॉर्क में मीडिया के साथ बातचीत के दौरान भी इस्माइल ने इस्लामाबाद में अपने माता-पिता की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर की थी। न्यू यॉर्क की सड़कों पर इस्लामाबाद के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने वाले अल्पसंख्यकों के लिए इस्माइल उम्मीद का नया चेहरा बन गई हैं। पिछले महीने इस्माइल को न्यू यॉर्क की सड़कों पर देखा गया था, जो पाकिस्तान में दशकों से अल्पसंख्यकों का सामना कर रहे दुर्दशा और शोषण को उजागर करता है। इस्माइल ने कहा था, “पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान द्वारा खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में तानाशाही है।”

गौरतलब है कि एक पाकिस्तानी अदालत ने राष्ट्रीय संस्थानों को खराब करने से संबंधित एक मामले में इस्माइल के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था। इस्माइल ने इस गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट को देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई के समक्ष तुष्टिकरण के समान माना था। उन्होंने इस गौर-जमानती वारंट का जवाब देते हुए लिखा था, “ISI को ख़ुश करने के लिए पाकिस्तान की अदालतें यही सब करती हैं।” अदालत की रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर 21 अक्टूबर को इस्माइल अदालत के समक्ष पेश नहीं होती है, तो उसे ‘घोषित अपराधी’ घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

आलू और लौकी का फर्क नहीं समझने वाले हुड्डा के बेटे निर्दलीय विधायकों से कह रहे- जनता जूतों से मारेगी

कॉन्ग्रेस के एक युवा तुर्क हैं दीपेंदर सिंह हुड्डा। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बेटे। तीन बार लोकसभा के सांसद रहे हैं जूनियर हुड्डा। कुछ दिनों पहले तक पिता के साथ बगावती तेवर में थे। नाराज थे कि राहुल गॉंधी उनके पिता की मान, अशोक तंवर को हरियाणा प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से नहीं हटा रहे। राहुल की जगह जैसे ही सोनिया आईं उन्होंने हुड्डा पिता-पुत्र की मुराद पूरी कर दी। विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तंवर बुझे मन से कॉन्ग्रेस से चले गए।

जाते-जाते तंवर छोड़ गए थे वो मेहनत, जो उन्होंने बतौर प्रदेश अध्यक्ष संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश में की थी। इसका नतीजा 24 अक्टूबर को आए हरियाणा विधानसभा के चुनावी नतीजों में भी दिखा। कॉन्ग्रेस को 31 सीटें मिली। सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा अकेले दम पर बहुमत के आँकड़े से पीछे रह गई।

नतीजों के बाद सीनियर हुड्डा ने सबसे पहले काम किया तंवर के पसीने की कमाई को अपने जलवे के तौर पर पेश करने का। फिर वे सरकार बनाने की कोशिशों में जुट गए। निर्दलीय और अन्य विपक्षी दलों को साथ आने का न्योता दिया। लगे हाथ भाजपा पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप भी मढ़ दिया। हुड्डा के पास 2009 में इसी तरह सरकार बनाने का अनुभव था। लेकिन, वे भूल गए थे कि यह 2019 है। इसलिए उनका दॉंव नाकाम रहा और किसी ने कॉन्ग्रेस के समर्थन का ऐलान नहीं किया।

ये भी पढ़ें- 40 सीटें ला 2009 में हुड्डा बने थे सीएम, आज 40 वाले खट्टर की बारी

अब जबकि राज्य में एक बार फिर भाजपा की ही सरकार बनती दिख रही है, जूनियर हुड्डा ​फट पड़े हैं। भाजपा को समर्थन देने वाले विधायकों को धमकाते हुए दीपेंदर हुड्डा ने कहा है, “जो निर्दलीय विधायक खट्टर सरकार का हिस्सा बनने जा रहे हैं, वे अपनी राजनीतिक कब्र खोद रहे हैं। वे जनता के विश्वास को बेच रहे हैं। हरियाणा की जनता ऐसा करने वालों को कभी माफ नहीं करेगी। जनता उन्हें जूतों से पीटेगी।”

राजनीतिक वंशवाद के प्रतीक दीपेंदर अतीत में 24 इंच का आलू भी उगा चुके हैं। दिसंबर 2012 में लोकसभा में एफडीआई पर बहस चल रही थी। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार थी और नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। दीपेंदर हुड्डा ने बहस में भाग लेते हुए मैकडॉनल्डस को न्योता दिया किया वे हरियाणा आएँ और उन्हें अंबाला के किसान 24 इंच का आलू पैदा करके देंगे।

उस समय विपक्ष की नेता रहीं सुषमा स्वराज ने दीपेंदर को आईना दिखाते हुए कहा था, “उन्होंने मैकडॉनल्ड्स को दावत दे दी हम 24 इंच का आलू यानी 2 फीट का आलू उन्हें उगा कर देंगे। वो कहते हैं कि मैं किसान का बेटा हूॅं। अरे बेटा, किसान के बेटे हो, लौकी और आलू का अंतर तो समझ लो।” वैसे, जिस अंबाला के भरोसे दीपेंदर ने आलू उत्पादन में चमत्कार कर देने का दावा दिया था, वहॉं की जनता ने इस चुनाव में भी कॉन्ग्रेस पर यकीन नहीं जताया है। अंबाला सिटी और अंबाला कैंट दोनों विधानसभा सीटों पर कॉन्ग्रेस उम्मीदवार बड़े अंतर से हारे हैं।

ऊपर के वीडियो में सुषमा स्वराज का वह जवाब आप भी सुन सकते हैं – 11 से 12 मिनट के बीच।

पंक्चर बनाने वाले को मिला BJP का साथ, बन गए विधायक

हरियाणा में पटौदी विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी सत्यप्रकाश जरावता विजयी रहे। उन्हें कुल 60,633 मत मिले। जरावत ने 36,579 मतों के अंतर से अपने प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र सिंह पहाड़ी (निर्दलीय) को हराकर जीत हासिल की। 

दरअसल, सत्यप्रकाश के जीवन की शुरुआत पटौदी क्षेत्र में ही एक छोटी-सी दुकान से हुई। वहाँ वो अपनी आजीविका साइकल के पंचर बनाने से चला रहे थे। इस दौरान उनका जीवन में कई उतार-चढ़ाव से दो-चार हुआ। संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करते उन्हें कई वर्ष बीत गए। पंचर बनाने के अलावा वो कुछ वक़्त निकालकर सरकारी नौकरी की तैयारी भी करते थे। 

कड़े प्रयास और संघर्ष के परिणामस्वरूप सत्यप्रकाश की नौकरी गुरुग्राम ग्रामीण बैंक में क्लर्क के पद पर लग गई। इसके बाद वो बैंक में अधिकारी भी बने, और यहीं से उन्होंने वर्ग विशेष के लिए राजनीति भी शुरू कर दी। इसके लिए लिए उन्हें साथ मिला पूर्व आईएएस अधिकारी व दलित नेता उदित राज का। उनके सम्पर्क में आने के बाद जरावता अनुसूचित जाति जनजाति कर्मचारी संघ के पदाधिकारी भी बने। साथ ही वो लॉर्ड बुद्ध क्लब के प्रदेशाध्यक्ष भी बने।

इस दौरान सत्यप्रकाश जरावता कर्मचारी हित में अपनी आवाज़ भी बुलंद करते रहे। उनका सपना था कि वो विधानसभा चुनाव लड़ें और जनता के हित में अपना योगदान दे सकें। जरावता के बारे में कहा जाता है कि वो राव इंद्रजीत सिंह के कट्टर समर्थक थे। उन्हीं की सलाह-मशविरा के बाद जरावता ने सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी की थी। लेकिन दु:खद यह रहा कि राव इंद्रजीत की तमाम कोशिशों के बावजूद जरावता को कॉन्ग्रेस से टिकट नहीं मिला इसलिए वो बतौर निर्दलीय ही चुनाव लड़े और हार गए।

साल 2015 में जरावता बीजेपी में शामिल हुए। चुनाव लड़ने के लिए उन्हें टिकट तो नहीं मिला, लेकिन बीजेपी ने उन्हें अपना प्रदेश सहप्रवक्ता बना लिया। जरावता ने इस पद की गरिमा बनाए रखी और अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक पालन किया। 

सत्यप्रकाश जरावता की निकटता महामंडलेश्वर स्वामी धर्मदेव महाराज से काफ़ी थी। उन्होंने पिछले वर्ष मुख्यमंत्री के चाय पर चर्चा कार्यक्रम के तहत मुख्यमंत्री की अपने गाँव लोकरा में एक सफल जनसभा करवाई। इस जनसभा के बाद विधायक बिमला चौधरी ख़ासे नाराज़ हो गए। इसके विरोध में उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेन्स भी आयोजित की।

विधायक बिमला चौधरी की यही हरक़त पार्टी से उनके टिकट को काटने का सबब बन गई और वही टिकट जरावता को दे दिया गया। जरावता ने भी पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विधायकी में मिली जीत के साथ ही उन्होंने अपने सपने को भी साकार कर दिखाया। जरावता ने वहीं से जीत दर्ज की है, जहाँ पटौदी पैलेस है, मतलब जहाँ कुछ दिन पहले सैफ अली खान अपनी बेगम करीना कपूर खान के जन्मदिन को मनाने के लिए अपने बेटे तैमूर संग आए थे।

चमचमाते करतारपुर कॉरिडोर की पहली झलक आई सामने, लोगों ने रवीना को कहा थैंक्यू, देखें Video

करतापपुर कॉरिडोर पर कल (अक्टूबर 24, 2019) भारत और पाकिस्तान के बीच फैसला हो गया। दोनों देशों के अधिकारियों ने सहमति-पत्र पर अपने हस्ताक्षर किए और घोषणा हुई कि अब निर्धारित पोर्टल पर जाकर यहाँ जाने के लिए पंजीकरण किया जा सकता है। इस समझौते के बाद अब भारत के तीर्थयात्री बिना वीजा के सिर्फ़ पासपोर्ट लेकर कॉरिडोर के जरिए करतारपुर जा सकते हैं।

दिलचस्प यह है कि भले ही इसके उद्घाटन की तारीख 9 नवंबर की रखी गई है लेकिन सोशल मीडिया पर करतारपुर कॉरिडोर की चमचमाती झलक देखने को मिल गई है। ट्विटर पर बॉलीवुड अभिनेत्री रवीना टंडन ने कॉरिडोर की वीडियो डाली है और करतारपुर साहिब को नमन किया है। उन्होंने इस वीडियो का साभार अपने किसी पाकिस्तानी दोस्त को दिया है।

इस झलक को देखने के बाद सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आई हैं। किसी ने इस वीडियो के लिए रवीना टंडन को शुक्रिया कहा है। तो किसी ने इस स्थल को देखकर कहा है कि उन्हें लग रहा है कि इसे देखकर ही उन्होने करतारपुर साहिब के दर्शन कर लिए।

एक यूजर ने रवीना टंडन को पत्रकारों से भी तेज बताया, वहीं कुछ यूजर्स ने कॉरिडोर एंट्री के लिए 20 डॉलर वाली शर्त पर अपनी नाराजगी जताई। लोगों ने कहा कि उनका यहाँ जाने का बहुत मन है लेकिन वे पाकिस्तान को पैसे नहीं देना चाहते, क्योंकि उन पैसों से पाकिस्तान हमारी सेना के ख़िलाफ गोलियाँ खरीदेगा।

एक यूजर ने रवीना टंडन को पाकिस्तान के लोगों पर भरोसा न करने की सलाह दी। यूजर ने कहा ये लोग पाक सेना और आतंकियों के लिए काम करते हैं। इसलिए इनसे दूर रहें। पीठ में छूरा मार देंगे, पता भी नहीं चलेगा।

‘BJP को समर्थन है’ – चौटाला के छोटे भाई रणजीत सिंह का ऐलान, 4 अन्य ने भी लगाई मुहर!

हरियाणा विधानसभा चुनाव में किसी की पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। लेकिन बीजेपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है। पार्टी को सरकार बनाने के लिए 6 विधायकों की ज़रूरत है। ऐसे में वह निर्दलीय विधायकों के समर्थन से फिर से सरकार बनाने की तैयारी में है। इसी बीच रानिया सीट से निर्दलीय विधायक और ओमप्रकाश चौटाला के छोटे भाई रणजीत सिंह चौटाला ने बीजेपी को समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

रणजीत सिंह चौटाला ने हरियाणा बीजेपी के प्रभारी और बीजेपी महासचिव अनिल जैन से मुलाकात कर बीजेपी को समर्थन देने की बात कही। आजतक की खबर के अनुसार इनके अलावा रणधीर गोलन, बलराज कुंडू, राकेश दौलताबाद और गोपाल कांडा ने भी आज सुबह-सुबह (25 जनवरी, 2019) को राज्य में भाजपा सरकार बनाने के लिए अपने समर्थन की स्वीकृति दी है। बता दें कि सिरसा जिले की पाँच विधानसभा सीटों में इस बार भाजपा के खाते में कोई सीट नहीं आई है।

आपको बता दें कि रानिया से जीते रणजीत सिंह 31 साल बाद एक बार फिर से विधानसभा की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे। रणजीत सिंह का एक वीडियो सामने आया है। इसमें रणजीत सिंह कहते हैं, “मैं बीजेपी को अपना समर्थन दे रहा हूँ। मैं रानिया विधानसभा से एमएलए चुनकर आया हूँ। मैं मोदी जी की नीतियों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को अपना समर्थन दे रहा हूँ।”

इसके अलावा बीजेपी को पृथला से निर्वाचित नयनपाल रावत और दादरी से सोपवीर सांगवान का भी समर्थन मिला है, ऐसी खबर है। लेकिन अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष सुभाष बराला ने भी कहा है कि निर्दलीय विधायक बीजेपी के साथ हैं और राज्य में मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में बीजेपी फिर से सरकार बनाने जा रही है। उन्होंने कहा, “जनता का जनादेश बीजेपी को मिला है। हालाँकि इस बात की हम समीक्षा भी करेंगे कि हमें इस बार पिछली बार की तुलना में सात सीटें कम क्यों मिलीं। पार्टी और मुझे स्वयं इस चुनाव के परिणामों से सीखने को मिलेगा। हम राज्य में पार्टी को मजबूत करने के लिए कदम उठाएँगे।” वहीं सरकार बनाने की बात पर उन्होंने कहा, “हरियाणा के निर्दलीय विधायक बीजेपी के साथ हैं। मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में सरकार बनेगी। वो आज चर्चा के लिए दिल्ली आ रहे हैं।”

बता दें कि रणजीत सिंह को रानिया से दो विधानसभा चुनावों में हार का मुँह देखना पड़ा था। इसी के चलते ही कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस बार उनकी टिकट काटकर नए उम्मीदवार विनीत कंबोज को दी थी। लेकिन विनीत कंबोज पाँचवें नंबर पर रहे। टिकट कटने पर रणजीत सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी। रणजीत सिंह 1987 के बाद अब 31 साल बाद विधानसभा चुनाव जीते हैं। इस समय के दौरान न तो वे लोकसभा और न ही विधानसभा जीत पाए।

J&K का पहला BDC चुनाव: घाटी के 18 ब्लॉक में खिला कमल, जम्मू में 52 पर मारी बाजी

जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा हटाने और जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के फैसले के बाद पहली बार हुए बीडीसी (ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल) चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 280 ब्लॉकों में से 81 ब्लॉकों पर ही संतोष करना पड़ा। बता दें कि कुल 316 ब्लॉक में से 307 ब्लॉक पर चुनाव होना था। चूँकि 27 सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए थे, इसलिए 280 ब्लॉक पर ही मतदान हुआ।

गुरुवार (अक्टूबर 24, 2019) देर शाम चुनाव परिणाम की घोषणा हुई। जम्मू और कश्मीर के मुख्य निर्वाचन अधिकारी शैलेंद्र कुमार ने श्रीनगर में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य में पहले बीडीसी चुनाव में 98.3 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। उन्होंने कहा कि लगभग 26,000 पंचों और सरपंचों ने वोट डाला। 

शैलेंद्र कुमार ने कहा, “कुल 307 ब्लॉकों में से निर्दलीय ने 217 ब्लॉक जीते, जबकि भाजपा को 81 ब्लॉक मिले। 1 ब्लॉक कॉन्ग्रेस के खाते में आए। वहीं 8 ब्लॉक पर जम्मू और कश्मीर नेशनल पैंथर्स (JKNPP) पार्टी ने जीत दर्ज की।”

बीजेपी जम्मू में एक तिहाई ब्लॉक पर जीत हासिल कर सकी। पार्टी को 148 ब्लॉक में से 52 ब्लॉक पर सफलता मिली। वहीं नेशनल पैंथर्स पार्टी ने 8 ब्लॉक पर जीत हासिल की और शेष 88 बीडीसी सीटों पर निर्दलीय अध्यक्ष चुने गए। उल्लेखनीय है कि भाजपा ने 2014 के चुनावों में जम्मू की 37 में से 25 सीटें जीती थीं। बीजेपी ने कश्मीर घाटी में 137 में से 18 ब्लॉक जीते हैं।

जम्मू के कठुआ जिले के 19 ब्लॉक में से बीजेपी ने 9 ब्लॉक पर सीट दर्ज की। बाकी 10 सीटों पर निर्दलीय ने सफलता हासिल की। बता दें कि 2014 के विधानसभा चुनाव में इन सभी सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की थी। उधमपुर जिले में 17 ब्लॉक में से बीजेपी के खाते में 4 सीटें आईं। रजौरी जिले के 19 ब्लॉक में से बीजेपी ने 8 सीटों पर जीत दर्ज किया, वहीं पार्टी पूंछ जिले में खाता भी नहीं खोल सकी। 

राज्य का विशेष दर्जा हटाए जाने के बाद पहली बार हुए बीडीसी चुनावों में अपने नेताओं की नजरबंदी के कारण कॉन्ग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने इससे दूरी बनाए रखी। बता दें कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के बेअसर किए जाने के बाद से विपक्ष के अधिकतर नेता जिनके बयान से राज्य में माहौल खराब होने की आंशका थी, उन्हें नजरबंद रखा गया है। पार्टी नेताओं की नजरबंदी से नाराज विपक्षी दलों ने बीडीसी चुनाव का बहिष्कार किया था। इसके पीछे पार्टी का कहना था कि दिग्गज नेताओं की अनुपस्थिति में प्रचार करना मुश्किल होगा।

जो CM है अविवाहित, उसे बताया 6 बच्चों का बाप: BJP सरकार को बदनाम करने के लिए NDTV का प्रोपेगेंडा

राज्य की जनसंख्या वृद्धि दर को स्थिर करने के लिए, असम मंत्रिमंडल ने 1 जनवरी 2021 के बाद राज्य में दो से अधिक बच्चों को सरकारी नौकरी न देने का फ़ैसला किया। पंचायती राज और नगर निकाय चुनाव के लिए राज्य में पहले से ही दो-बच्चे का मानक लागू था, और अब उसी मानक को राज्य स्तर की सरकारी नौकरियों तक बढ़ाया गया है। इस फ़ैसले को लेकर समाचार पढ़ते हुए, NDTV की एंकर सोनल मेहरोत्रा ​​कपूर ने असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को बदनाम करने के लिए झूठ बोलने और फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाने का विकल्प चुना। यह हम नहीं कह रहे, खुद NDTV का वीडियो इसका जीता-जागता प्रमाण है।

NDTV की एंकर सोनल मेहरोत्रा ​​कपूर ने असम में सरकारी नौकरियों के लिए दो-बच्चे से संबंधित खबर को पढ़ते हुए दावा किया कि दो से अधिक बच्चे वाले लोग असम में सरकारी नौकरी पाने के पात्र नहीं होंगे, जबकि असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के ख़ुद 6 बच्चे हैं।

बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में, सोनल मेहरोत्रा ​​कपूर ने अपने दर्शकों को बताया कि दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री के ख़ुद के 6 बच्चे हैं, लेकिन उन्होंने इस दो-बाल नीति को लागू करने का फ़ैसला किया है।

इस वीडियो को NDTV ने माइक्रो-ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर भी शेयर किया था लेकिन, अब लगता है कि इसे NDTV ने डिलीट कर दिया है। लेकिन तकनीक के इस दौर में अगर वीडियो शेयर करने और डिलीट करने का ऑप्शन है तो समय रहते डाउनलोड करने का अवसर भी इसी तकनीक ने दिया है। ऊपर आप उसी डाउनलोड किए वीडियो को देख सकते हैं।

दरअसल, NDTV की एंकर सोनल मेहरोत्रा ख़ुद सच्चाई से कोसों दूर हैं क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के 6 बच्चे नहीं हैं। वास्तव में, असम के मुख्यमंत्री अविवाहित हैं और एकल जीवन जीते हैं।

NDTV द्वारा किया गया ट्वीट, जिसे अब हटा दिया गया है

बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब NDTV के एंकर्स ने झूठ फैलाने में कोई दिलचस्पी ली हो।

इससे पहले 2018 में, NDTV ने अपने सोशल चैनल्स पर हेडिंग के साथ एक न्यूज़ अपलोड और शेयर की थी – ‘असम बीजेपी विधायक के भतीजे, ‘नागरिक सूची में नहीं हैं, ऐसा भी होता है’ इस फ़र्ज़ी ख़बर में बीजेपी सांसद बिजोया चक्रवर्ती और जयदीप फुकन की फ़ोटो थी, जो गुवाहाटी के निवासी थे। तब जयदीप ने ट्विटर पर यह दावा किया था कि उनका नाम वास्तव में NRC सूची में है और वह भाजपा सांसद के भतीजे नहीं हैं।

जयदीप ने NDTV को एक आधिकारिक मेल भी लिखा था, जिसमें उन्हें उनके द्वारा प्रकाशित अप्रासंगिक न्यूज़ से उनकी फ़ोटो को तुरंत हटाने के लिए कहा था।

आंतकियों के निशाने पर हैं हिन्दू नेता, RSS के पदाधिकारी: ख़ुफ़िया विभाग का ख़ुलासा

हिन्दू महासभा के पूर्व अध्यक्ष और हिन्दू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे कमलेश तिवारी की हत्या की तरह अन्य हिन्दू नेता और राजनेता पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के निशाने पर हैं। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि पैसे देकर और जेहादी बनाकर आरएसएस नेताओं पर हमला किया जा सकता है। 

ख़बर के अनुसार, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को क़रीब दो दिन पहले ख़ुफ़िया विभाग से इस तरह की जानकारी मिली है। जानकारी मिलने के बाद हिन्दू नेताओं, आरएसएस के पदाधिकारियों और राजनेताओं की सुरक्षा की समीक्षा शुरू कर दी गई है। इस मामले में गृह मंत्रालय के आदेश पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने समीक्षा शुरू कर दी है।

स्पेशल सेल के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि कमलेश तिवारी की हत्या में आतंकी संगठन ISIS के कनेक्शन का पता लगाया जा रहा है। जिन नेताओं ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को हटाए जाने का समर्थन करते हुए हिन्दुओं का समर्थन किया था, वे आतंकी संगठन ISIS के निशाने पर बने हुए हैं। ऐसे नेताओं को आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल द्वारा मरवाया जा सकता है। 

कमलेश तिवारी हत्या मामले में भी ख़ुलासा हुआ था कि वो ISIS के निशाने पर थे। 2017 में गुजरात एटीएस ने ISIS के उबैद मिर्ज़ा और क़ासिम को गिरफ़्तार किया था। तब गुजरात एटीएस के अलावा सेंट्रल एजेंसी ने भी दोनों आतंकियों से पूछताछ की थी। उन्होंने पूछताछ में कमलेश तिवारी का नाम लिया था। इससे पता चलता है कि कमलेश तिवारी पर आतंकी संगठन की बहुत पहले से नज़र थी।

मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, कमलेश तिवारी की हत्या के बाद अन्य नेताओं को जान से मारने की धमकियाँ मिल रही थीं। इस संदर्भ में हिन्दूवादी संगठनों के कई नेताओं ने सरकार से सुरक्षा की माँग भी की थी। इनमें साध्वी प्राची, पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ, अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के यूपी अध्यक्ष राजीव कुमार और उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष अमित जानी के नाम शामिल हैं। 

ग़ौरतलब है कि लखनऊ में नाका क्षेत्र स्थित हिन्दू महासभा कार्यालय में कमलेश तिवारी को बदमाशों ने गला रेतकर व गोली मारकर हत्या कर दी थी। शुक्रवार (18 अक्टूबर 2019) को हत्या की वारदात को अंजाम देकर हमलावर वहाँ से फ़रार हो गए थे। गंभीर हालत में तिवारी को ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी।

जामिया में वामपंथियों ने लहराया फिलिस्तीन का झंडा: यूनिवर्सिटी ने कहा- इज़राइली कैम्पस में होंगे प्रतिबंधित

दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में फिलिस्तीन के समर्थन में झंडे लहराए गए हैं। एक विरोध प्रदर्शन में लहराए गए इन झंडों के बाद पहले तो 5 छात्रों को कारण बताओ नोटिस जारी हुआ, लेकिन बाद में घुटने टेकते हुए यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने न केवल नोटिस वापिस ले ली बल्कि भारत की यूनिवर्सिटी में हुए हुड़दंग के लिए एक तरह से पूरे इज़राइल देश को दंडित करते हुए यूनिवर्सिटी में इज़राइल से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम करने पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया। इसे विरोध प्रदर्शन का आयोजन कर झंडा लहराने वालों की जीत के तौर पर देखा जा रहा है, जो आइसा के सदस्य बताए जा रहे हैं।

जामिया के फैकल्टी ऑफ़ आर्किटेक्चर एंड एकिस्टिक्स ने इज़राइल को अपना कंट्री पार्टनर चुनते हुए “ग्लोबल हेल्थ ज़ेनिथ: कोन्फ़्लुएन्स ’19” नामक कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस कार्यक्रम के आयोजन के खिलाफ कुछ छात्रों ने (कथित तौर आइसा आदि वामपंथी संगठनों के सदस्य) इज़राइल के दुश्मन माने जाने वाले फिलिस्तीन के झंडे लहराने शुरू कर दिए, जिस पर उन्हें यूनिवर्सिटी की ओर से नोटिस जारी हुआ। लेकिन न केवल नोटिस को बाद में वापिस ले लिया गया, बल्कि यूनिवर्सिटी, विश्वविद्यालय और देश के गेस्ट्स का अपमान करने वाले हुड़दंगियों के ही तुष्टिकरण पर उतर आई। “हम आपको दिलासा देते हैं कि अगर कोई इज़राइली प्रतिनिधिमंडल किसी कार्यक्रम में भाग लेना चाहेगा तो हम नहीं लेने देंगे।”

उस विरोध प्रदर्शन के बीच में कुछ छात्रों के बीच की आपसी झड़प भी हो गई, जिसे वामपंथियों ने “यूनिवर्सिटी प्रशासन ने हमें पीटने के लिए गुंडे बुलाए” का स्पिन भी देने की कोशिश की थी

लेकिन ऑपइंडिया ने जब मौके पर मौजूद रहे छात्रों से बात की तो उलटी ही सच्चाई निकल कर बाहर आई। नाम न छपने की शर्त पर प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आपसी मारपीट प्रदर्शन में हुई तो थी, लेकिन उसका प्रशासन से कोई लेना देना दूर दूर तक नहीं था। उन चश्मदीदों ने यह भी बताया कि यूनिवर्सिटी द्वारा नोटिस वापिस लिए जाने का आश्वासन मिलने के बाद भी प्रदर्शनकारियों ने हुड़दंग बंद नहीं किया।

उस के पीछे की कहानी और ही कुछ है। 22 अक्टूबर को प्रदर्शनकरी छात्रों ने यूनिवर्सिटी के वीसी के दफ्तर का घेराव किया और किसी को कैम्पस से निकलने नहीं दिया। इस दौरान अंदर कुछ मेहमान उपस्थित थे, जिनमें कई बूढ़े और बीमार भी थे- यहाँ तक कि मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित भी। उनकी हालत सुनकर भी प्रदर्शनकारी नहीं पसीजे। अंत में एक बूढ़ी महिला रोने लगीं और अपनी सेहत का हवाला देकर जाने देने की भीख माँगने लगीं।

तब वामपंथियों में से ही कुछ का दिल पसीजा और उन्होंने अपने साथियों से बीमारों को निकलने देने की बात की। तब उन्मादी कम्युनिस्टों की भीड़ ने अपने ही साथियों पर हमला कर दिया और मॉब की स्थिति पैदा होने लगी। तब हमले के पीड़ितों ने भी सेल्फ-डिफेंस में हाथ चलाया। उस हाथापाई में दोनों ही गुटों को चोट आई और कई को अस्पताल ले जाना पड़ा।

लड़ने वाले दोनों ही गुट आइसा आदि कम्युनिस्टों के थे, लेकिन लड़ाई कराने का जिम्मा प्रशासन पर डाला गया। कहा गया कि उन्हें यूनिवर्सिटी ने मारपीट करने का आदेश दिया था। उसके बाद 23 को कैम्पस में पुलिस आई। प्रशासन के आगे प्रदर्षनकारी जो भी माँगें रखते गए, उन्हें माना जाता गया। लेकिन माँग करने वालों ने एक भी माँग घायलों की किसी भी तरह की सहायता की नहीं रखी। इससे खिसियाए हुए एक गुट ने अपना प्रदर्शन जारी रखा।

हमारे सूत्रों के हिसाब से इसी गुट ने बाद में रात को हॉस्टल में भी हिंसा की। इसके अलावा ऑपइंडिया की तफ्तीश में पता चला है कि हिंसा का एक कारण यह भी था कि वामपंथियों में ही इस प्रदर्शन को लेकर मतभेद था। प्रदर्शनकारियों में से कई फिलिस्तीन के झंडे के खिलाफ थे क्योंकि यह अतिरेक था, और जामिया आखिरकार सरकार के पैसे से चलता है।

हमारे सूत्रों के विवरण की तस्दीक प्रशासन से भी होती है। बकौल यूनिवर्सिटी के पीआरओ अहमद अज़ीम, वीसी के ऑफिस का घेराव करने वाले छात्रों को कुछ छात्रों संगठनों का उकसावा मिला हुआ था। उन्होंने यूनिवर्सिटी के मेहमानों को निकलने देने में प्रदर्शनकारियों के हस्तक्षेप और डेलीगेट्स की मदद करने पर अपने ही सहपाठियों पर प्रदर्शनकारियों के हमले की बात की भी पुष्टि की।