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सरकारी आवास कब्जाए बैठे 50 पूर्व सांसदों को दिल्ली पुलिस की मदद से निकाल बाहर करने की प्रक्रिया शुरू

केंद्र सरकार ने उन सभी पूर्व सांसदों को सरकारी आवासों से निकाल बाहर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो नियमों को ताक पर रख कर डेरा जमाए हुए थे। ये सभी पूर्व सांसद सरकार द्वारा दिए गए समय की अवधि होने के बावजूद सरकारी आवासों में टिके हुए थे। अब सरकार ने दिल्ली पुलिस की मदद से उन्हें निकाल बाहर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इन पूर्व सांसदों ने आवास खाली न करने के पीछे कई बहाने बनाए थे।

कुछ पूर्व सांसदों ने कहा था कि उनके बच्चे दिल्ली में पढ़ रहे हैं, इसीलिए वे सरकारी आवास खाली नहीं कर सकते। कुछ सांसदों ने अपने किसी परिवारजन के स्थानीय अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होने का बहाना बनाया था। कुछ अन्य पूर्व सांसदों ने तो अजोबोग़रीब तर्क देते हुए कहा था कि वे दिल्ली में कहीं और आवास नहीं ढूँढ पा रहे हैं, इसीलिए वे सरकार आवास खाली नहीं कर सकते। शहरी मामलों के मंत्रालय ने अंत में दिल्ली पुलिस की मदद ली है और कुछ पूर्व सांसदों द्वारा कब्जाए गए सरकारी आवास खाली करा भी लिया गया है।

शुक्रवार (अक्टूबर 4, 2019) तक की बात करें तो कुल 50 पूर्व सांसद ऐसे थे, जिन्होंने अपने सरकारी बंगले खाली नहीं किए थे। इन लोगों को कई बार लीगल नोटिस दिया जा चुका था। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के सूत्रों के अनुसार, इस लिस्ट में जन अधिकार पार्टी के संस्थापक पप्पू यादव, उनकी पत्नी और कॉन्ग्रेस नेता रंजीता रंजन, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, मेघालय के मुख्यमंत्री कोर्नाड संगमा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम शामिल है।

अभी इस बात पर स्थिति साफ़ नहीं है कि पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और पूर्व भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी अपने सरकारी आवासों में बने रह सकते हैं या नहीं। 91 वर्षीय आडवाणी और 85 वर्षीय जोशी के सुरक्षा की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार इस सम्बन्ध में निर्णय लेगी। अधिकारियों ने कहा है कि पूर्व सांसद जिस तरह से सरकारी आवासों में डेरा जमा कर बैठे हैं, उससे नए सांसदों को आवास उपलब्ध कराने में काफ़ी दिक्कतें आ रही हैं।

20 अगस्त को ख़बर आई थी कि जो भी पूर्व सांसद सरकारी आवास खाली करने में आनाकानी कर रहे हैं, उनके घर में बिजली और पानी की सप्लाई काट दी जाएगी। ऐसा करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दे दिया गया था। उस समय 200 ऐसे पूर्व सांसद थे जो सरकारी आवासों में जमे हुए थे। नियमानुसार, दोबारा चुन कर न आए सांसदों को लोकसभा भंग होने के एक महीने के भीतर अपना सरकारी आवास खाली करना होता है। राष्ट्रपति कोविंद ने 25 मई को ही पिछली लोकसभा भंग कर दी थी। इस हिसाब से देखें तो अब तक लगभग साढ़े 4 महीने हो चुके हैं।

Aarey में काटे जाने थे कुल 2185 पेड़, 2 दिनों में काट डाले 2141 पेड़: मुंबई मेट्रो

आरे क्षेत्र में पेड़ों की कटाई के मामले में हाईकोर्ट से कथित पर्यावरण एक्टिविस्ट्स को निराशा हाथ लगी थी। इसके बाद उन्होने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को यथास्थिति बरक़रार रखने का आदेश देते हुए कहा कि अब एक भी पेड़ नहीं काटे जाने चाहिए। इसके बाद मामले को सुप्रीम कोर्ट की फॉरेस्ट बेंच के पास भेज दिया गया। इसके बाद एक्टिविस्ट्स अपनी जीत का जश्न मनाने लगे। मुंबई मेट्रो कार शेड के लिए आरे क्षेत्र में 2185 पेड़ काटे जाने थे, जिसके लिए हंगामा किया जा रहा था। कई बॉलीवुड सेलेब्स ने भी इस विरोध प्रदर्शन को अपना समर्थन दिया था।

अब मुंबई मेट्रो का नया बयान आया है, जिससे कथित पर्यावरणविदों को निराशा हाथ लग सकती है। मुंबई मेट्रो ने जानकारी दी है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने से पहले ही 2,185 पेड़ों में से 2,141 पेड़ काटे जा चुके हैं। शुक्रवार (अक्टूबर 4, 2019) और शनिवार को इन पेड़ों को काटा गया।

अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद काटे गए पेड़ों को वहाँ से हटाया जाएगा और मेट्रो का कंस्ट्रक्शन कार्य शुरू हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो का कंट्रक्शन कार्य रोकने की बात नहीं कही है। उसने सिर्फ़ पेड़ों को न काटने का आदेश दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ़्तार किए गए सभी लोगों को छोड़ा गया या नहीं, इस सम्बन्ध में सरकार से जानकारी माँगी।

मुंबई मेट्रो ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करता है। उसने साफ़ किया कि आरे मिल कॉलोनी क्षेत्र में अब एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। हालाँकि, काटे गए पेड़ों, लड़कियों व अन्य चीजों को वहाँ से साफ़ करने और हटाने का काम अनवरत चालू रहेगा। साथ ही मुंबई मेट्रो ने हरियाली के प्रचार-प्रसार के लिए किए गए कार्यों को गिनाते हुए बताया कि ‘मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन’ पहले ही 23,846 पेड़ लगा चुका है और 25,000 पौधे वितरित कर चुका है।

हालाँकि, मुंबई मेट्रो का प्रोजेक्ट पहले से ही 6 महीने देरी से चल रहा है, क्योंकि तमाम विरोध-प्रदर्शनों और न्यायिक लड़ाइयों के कारण मेट्रो के कंस्ट्रक्शन सम्बन्धी कामकाज पर असर पड़ा है। इन सबके बावजूद मुम्बई मेट्रो ने आशा जताई है कि निर्धारित समय पर कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

13 महीने में ही उतावले हो गए पाकिस्तानी, इतने कम समय में Pak को मदीना कैसे बनाऊँ: इमरान खान

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने ही देश के लोगों को अधीर करार दिया है। एक कार्यक्रम के दौरान ख़ान ने कहा कि उनकी सरकार ने ग़रीबों के उत्थान के लिए जितने रुपए ख़र्च किए हैं, उतना पिछली किसी भी
सरकार ने नहीं किया। इस दौरान ख़ान ने पाकिस्तान को मदीना बनाने के वादे के बारे में बात करते हुए कहा कि पाकिस्तान के लोग 13 महीने में ही उतावले हो उठे हैं। उन्होंने कहा कि अभी 13 महीने ही हुए हैं और लोग पूछते हैं कि मदीना कहाँ है? ख़ान ने कहा, “मैं बताना चाहता हूँ कि मदीना कोई एक दिन में नहीं बन गया था।

इमरान ख़ान ने अपने देश की जनता के सवालों से परेशान होकर ये बातें कही। उन्होंने चुनाव के दौरान ‘नया पाकिस्तान’ बनाने का वादा किया था और सरकार बनने के बाद भी वह कई बार ‘नया पाकिस्तान’ की बात करते रहे हैं। अब जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है और महँगाई लगातार आसमान छू रही है, इमरान ख़ान को लोगों के सवालों ने परेशान कर दिया है। वो बड़े-बड़े वादे पूरा करने में नाकाम सिद्ध हुए हैं, इसलिए अपने देश की जनता को ही उन्होंने बेसब्र बता दिया।

इमरान ने ये बातें इस्लामाबाद में ‘अहसास लंगर योजना’ के उद्घाटन के मौके पर कही। ‘सैलानी ट्रस्ट’ के साथ मिल कर शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य ग़रीबों को भोजन उपलब्ध कराना है। पाकिस्तान सरकार इसके पहले चरण में 112 किचन की स्थापना करने जा रही है। इसके तहत इस्लामाबाद में रोजाना 600 लोगों को भोजन उपलब्ध कराए जाने की योजना है। प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का दावा है कि वो एक भी व्यक्ति को भूखे सोने नहीं देंगे। ‘सैलानी ट्रस्ट’ ने दावा किया कि इस योजना के तहत पहले किचन को सिर्फ़ 10 दिन में ही स्थापित कर लिया गया।

इसी कार्यक्रम के दौरान इमरान ख़ान अपने ही वादों के बोझ तले दबे नज़र आए और उन्होंने कह दिया कि मदीना कोई एक दिन में नहीं बन गया था। हालाँकि, उन्होंने कहा कि वह मदीना की तर्ज पर विकास और जनकल्याण की सुविधाएँ उपलब्ध करा कर पाकिस्तान को मदीना ज़रूर बनाएँगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बदलाव होगा लेकिन इसमें समय लगेगा।

साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी सरकार कारोबारियों को अच्छा माहौल देने के लिए काम कर रही है। उनसे टैक्स लेकर गरीबों के लिए काम करने की दिशा में भी लगी हुई है। इसके बावजूद लोगों से सब्र नहीं होता और वे पूछने लगते हैं कि तेरह महीने हो गए हैं, कहाँ है नया पाकिस्तान।

जुलाई 2018 में मतगणना के बाद सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद तहरीक-ए-इंसाफ प्रमुख इमरान ख़ान ने कहा था कि वे मदीना की तरह पाकिस्तान में सरकार चलाएँगे। उन्होंने मदीना की तर्ज पर लोगों को बराबरी देने के लिए उनके वित्तीय हितों की रक्षा करने का वादा किया था। उन्होंने कहा था कि जिस तरह से मदीना में ग़रीबों और विधवाओं का ख्याल रखा जाता है, वैसा पाक में भी होगा।

स्विस बैंक ने दिए 31 लाख खातों के डिटेल, काला धन रखने वालों के उतरेंगे नक़ाब

कालेधन के ख़िलाफ़ लड़ाई में मोदी सरकार को बड़ी सफलता मिली है। स्विस बैंक में भारतीय खातों का विवरण प्राप्त करने के लिए भारत काफ़ी दिनों से प्रयास कर रहा था। अब पहले दौर का विवरण स्विट्जरलैंड ने भारत को सौंप दिया है। इसमें बैंक में भारतीयों के सक्रिय खातों से सम्बंधित जानकारियाँ शामिल हैं। स्विट्जरलैंड के संघीय कर प्रशासन ने 75 देशों को वैश्विक मानदंडों के तहत ऐसे वित्तीय खातों का विवरण दिया है। भारत भी इन देशों में शामिल है।

स्विट्जरलैंड ने इन सभी देशों को 31 लाख खातों का विवरण मुहैया कराया है और बदले में उसे भी इन देशों से 24 लाख जानकारियाँ मिली हैं। विवरण में खाताधारक की पहचान, खाते में जमा रकम और अन्य जानकारियाँ शामिल हैं। इसमें खाताधारक का नाम, पता, राष्ट्रीयता, टैक्स आइडेंटिफिकेशन नंबर और वित्तीय संस्थानों से जुड़ी अन्य सूचनाएँ शामिल हैं। स्विट्जरलैंड के अधिकारियों ने बताया कि पहली बार भारत को इस तरह की जानकारियाँ मुहैया कराई गई हैं।

इन सूचनाओं में न सिर्फ़ सक्रिय खातों की जानकारियाँ बल्कि 2018 में बंद किए जा चुके बैंक एकाउंट्स से सम्बंधित सूचनाएँ भी शामिल हैं। इसी कड़ी में स्विट्जरलैंड अब सितम्बर 2020 में स्विस बैंक में भारतीयों के बैंक एकाउंट्स से सम्बंधित अन्य जानकारियाँ भारत के साथ साझा करेगा। स्विट्जरलैंड ने भारत को क्या जानकारी दी है, इस सम्बन्ध में अधिकारियों ने कुछ कहने से मना कर दिया। उन्होंने बताया कि यह गोपनीयता का मामला है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कई अन्य देशों में रह रहे भारतीय व्यवसायियों से सम्बंधित जानकारियाँ इसमें शामिल हैं। स्विस बैंक दशकों से अपनी गोपनीयता के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों से इसके ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान चला, जिससे उसे ये जानकारियाँ अन्य देशों के साथ साझा करनी पड़ी। इस अभियान के कारण कई लोगों ने जल्दबाजी में बैंक से रुपया निकालना शुरू कर दिया। यही कारण है कि 2018 में बंद किए जा चुके बैंक एकाउंट्स से सम्बंधित जानकारियाँ भी दी जा रही हैं।

स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार, स्विस बैंक में भारतीयों द्वारा जमा रकम 2018 में लगभग 6% घटकर 6,757 करोड़ रुपए हो गई थी। पिछले 2 दशक में जमा रकम का यह दूसरा सबसे निचला स्तर है। साल 2018 में कई विदेशी ग्राहकों द्वारा स्विस बैंक में जमा रकम 4% से ज्यादा घटकर 99 लाख करोड़ रुपए रही थी।

गौरतलब है कि लोकसभा में इसी साल जून में वित्त मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 1980 से लेकर साल 2010 के बीच भारतीयों ने 246.48 अरब डॉलर से लेकर 490 अरब डॉलर के बीच काला धन देश के बाहर भेजा था। एनआईपीएफपी, एनसीएईआर और एनआईएफएम के अध्ययन के आधार पर समिति ने यह आकलन किया था।

हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ कब तक: त्रिपुरा हाईकोर्ट ने बलि-प्रथा बैन करने के पीछे दिए अजीब तर्क

त्रिपुरा राज्य के पश्चिमी छोर पर उदयपुर शहर में हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार 51 शक्ति पीठों में से एक त्रिपुरेश्वरी मंदिर विराजमान है जिसे लोग त्रिपुर सुंदरी मंदिर के नाम से भी जानते हैं। यहाँ देवी की पूजा-अर्चना में देवी की स्तुति में बलि देने की प्रथा प्रचलित है। ठीक ऐसा ही एक मंदिर कमलेश्वरी देवी भी है, जो कि भारत-बांग्लादेश सीमा के किनारे बसे कस्बा गाँव में पड़ता है। बीते सितम्बर माह के आखिरी हफ्ते में राज्य के हाईकोर्ट ने बलि प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाने का फैसला सुनाया।

इस फैसले के खिलाफ त्रिपुरा की राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पेटीशन (एसएलपी) के तहत अपील करने का फैसला किया है। प्रदेश कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रद्योत किशोर देब बर्मन ने भी उच्च न्यायालय के फैसले को धार्मिक गतिविधियों में दखल बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही है।

यह फैसला देने वालों की सोच में हिन्दू रीति-रिवाजों को न समझ पाने की असमर्थता साफ़ झलकती है। किसी भी सूरत में यह कहना गलत नहीं होगा कि उच्च न्यायालय का यह निर्णय पूरी तरह से निरर्थक और हास्यास्पद है। इसमें सिर्फ हिन्दू सभ्यता और उसकी मान्यताओं के प्रति भीषण असंवेदनशीलता दिखती है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यह फैसला देने वाले उन लोगों से कतई अलग नहीं हैं जिन्हें हिन्दुओं की भावनाओं, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को अपने पूर्वाग्रह के चश्मे से देखने में ख़ुशी मिलती है।

पूर्वाग्रह से ग्रसित अपने इस जजमेंट में कोर्ट ने पूछा- कौन सा धर्म या संप्रदाय जानवर पर बेवजह दर्द और पीड़ा डालने की बात करता है? किस धर्म में कहा गया है कि वध से पहले जानवर को मानसिक या शारीरिक कष्ट मुक्त नहीं करना चाहिए? कौन सा ऐसा धर्म है जो अपने अनुयायियों को जानवरों पर इंसानियत के नाते दया दृष्टि न रखने के लिए कहता होगा?

दरअसल, इन सभी प्रश्नों पर चिंतन किया जाना बेहद ज़रूरी है। सबसे पहले प्रश्न में तो ‘बेवजह’ शब्द का उपयोग ही पूरी तरह से अनुचित है। ऐसा कई बार देखा गया है कि सामाजिक सुधार को लेकर कई मामलों में अदालतों का रुख सिर्फ एक ही धर्म को निशाना बनाता है, जबकि अदालत को यह भी समझना होगा कि धर्म और आस्था के क्षेत्र में तार्किकता का कोई स्थान नहीं है। यह लोगों की भावनाओं से जुदा मामला है जिसमे कोर्ट को उनकी आस्था और उनकी भावनाओं पर चोट नहीं बल्कि कद्र करनी चाहिए। हालाँकि, देखा यह भी गया है कि कैसे इस प्रकार के मामलों में सिर्फ हिन्दुओं को ही निशाना बनाया जाता है, जबकि अन्य मजहबों की उद्दंडता पर कोई नकेल नहीं कसी जाती इसलिए यह अपने आप में ही एक विवादित प्रश्न है।

किसी भी अदालत का काम धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और उसमे लोगों की आस्था से छेड़छाड़ करना नहीं है। पशुओं पर अत्याचार की बात करने वाले पहले देखें कि मांस उद्योग के लिए जानवरों पर होने वाला क्रूरतापूर्ण व्यवहार कितना जायज़ है? यदि वास्तव में किसी को पशुओं पर होने वाले अत्याचार को रोकना है तो उसे पहले मांस उद्योग रुकवाने पर ध्यान देना चाहिए, जहाँ व्यवस्थित ढंग से जानवरों की नृशंस हत्या की जाती है। व्यवस्थित क़त्लखाने की बजाय जानवरों को अत्याचार से बचाने के नाम पर पशुबलि पर रोक लगाना ठीक वैसे ही है जैसे चारों ओर और आग लगी हो और कोई मूर्ख पर्यावरण बचाने की दुहाई देकर घर मोमबत्ती जलाए।

फैसले के सम्बन्ध में देखें तो दूसरे और तीसरे सवाल पर यह याद रखना चाहिए कि ‘हलाल’ एक ऐसी इस्लामिक प्रथा है जिसमें जानवर को तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतार दिया जाता है मगर इसपर किसी भी अदालत का मुँह तक नहीं खुलता। सबको पता है कि इसके पीछे के कारण क्या हैं?

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि ऐसा कौन सा धर्म है जो इतनी शर्मिंदगी के बावजूद हठ करके रूढी परंपराओं को लिए बैठा रहेगा ताकि संवैधानिक मूल्यों का ह्रास हो और समाज में होने वाले सुधारों में देरी हो?
संवैधानिक नैतिकता जजों का बनाया हुआ एक तमाशा है जिसे अक्सर वे अपनी सीमाएँ लाँघने के लिए इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि, संविधान देश और उसके नागरिकों के बीच एक कानूनी अनुबंध से ज्यादा और कुछ नहीं है। मगर यदि संवैधानिक नैतिकता का सिद्धांत एक तमाशा नहीं भी होता तो यह कहना गलत नहीं होगा कि त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने संवैधानिक ध्येय को इस मामले में घुसेड़ कर पूरे मसले को एक मज़ाक बनाकर रख दिया है।

देश के एक अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग न्यायपालिका ने कैसे “संवैधानिक नैतिकता” शब्द का अविष्कार किया और इसके क्या मायने हैं, इसके बारे में एक बार केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अपने एक बयान में कहा था कि “हम संवैधानिक नैतिकताओं के बारे में सुनते हैं, इसमें हुए बदलावों की सराहना जायज़ हो सकती है, बशर्ते इसकी बारीकियाँ व्यक्ति-दर-व्यक्ति बदलनी नहीं चाहिए साथ ही इसमें सभी को एकमत होना चाहिए।”

कोर्ट के पहले प्रश्न के विषय में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि “क्या यह भी अदालत तय करेंगी कि किस व्यक्ति की लाश को जलाया जाएगा और किस व्यक्ति की लाश को दफनाया जाएगा? क्या अदालत बताएगी कि जीसस कहाँ जन्मे थे?” भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने सबरीमाला पर बात करते हुए यही बयान दिया था। इसी विषय पर विस्तार से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि यह विषय कोर्ट के तय करने का नहीं है।

धर्म और रीति-रिवाज प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आस्था का विषय है। अगर इन सबको सिर्फ इस तर्क पर देखें कि क्या सही है और क्या गलत तो सारे ही धर्म गैर-ज़रूरी रह जाएँगे, इसीलिए इन्हें आवश्यकता के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अगर ऐसा होता तो सभी धर्मों को भ्रम या अंधविश्वास करार दे दिया जाएगा। समाज को सुधारने का जो बीड़ा न्यायपालिका ने उठाया है उसे हिन्दू धर्म को तोड़ने-मरोड़ने और पटकने के रवैये से उसकी आतुरता को साफ़ समझा जा सकता है। फैसले में कहा गया है कि “एक प्रगतिशील समाज की स्तिथि तब तक हासिल नहीं की जा सकती जब तक कि समाज का व्यक्ति धार्मिक क्रिया-कलापों में उलझा है, भ्रम और भ्रामकता से भरे समाज में प्रत्येक व्यक्ति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।” इसके आगे बात और भी विचित्र हो जाती है।

यह सब काफी नहीं था तो अदालत ने यहाँ तक सिद्धन्तवादी बनने का निश्चय कर लिया और दलील में कहा कि बच्चों को बलि देखने नहीं देना चाहिए, जबकि इसके पीछे कोई ठोस आधार पेश करती रिपोर्ट भी नहीं रखी गई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकार के वीभत्स दृश्य देखने से छोटे बच्चों में दया, प्रेम और संवेदना जैसे नैतिक मूल्य ख़त्म हो जाते हैं अथवा उनकी नींव ही नहीं पड़ पाती। साथ ही यह भी कहा यह भी गया कि मंदिर में चढ़ाई जाने वाली बलि धर्म के नाम पर एक ऐसा अन्धविश्वास है जो न सिर्फ देखने में अप्रिय है, बल्कि बच्चों के मनोवैज्ञानिक संरचना पर बुरा प्रभाव डालता है।

निश्चित रूप से यह उन जजों की अपनी निजी राय हो सकती है जो हो सकता है कि देखने और सुनने में अच्छा लगे मगर यह मुद्दा पर्सनल नहीं है और इसीलिए इस पर कोई भी एक पक्षीय राय थोपना भी किसी प्रकार से उचित नहीं। यह पूर्णतया चकित कर देने वाली बात है कि ऐसा जजमेंट दिया कैसे गया?

पशुबलि एक शताब्दियों पुरानी प्रथा है जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी मनाया जाता रहा है। इसमें लोगों की बड़ी दिलचस्पी इसलिए भी है क्योंकि बंगाली समुदाय में यह बड़े स्तर पर मनाई जाती है और साथ ही इसे प्रगतिशील होने का भी सूचक माना जाता है। निश्चित तौर पर पशुबलि की प्रथा ने बंगाली बच्चों को कभी भी बड़े होकर प्रगतिशील बनने से नहीं रोका, इसलिए यह दावा भी कमज़ोर हो जाता है जिसमें कोर्ट ने कहा है कि बच्चों के ऊपर इसका विपरीत असर पड़ता है।

जजमेंट में कोर्ट की ओर से उन अभिभावकों पर भी टिप्पणी की गई है जो कि पशुबलि के क्रिया-कलापों में संलिप्त होते हैं। इसके जरिए इशारा था कि अभिभावकों से ज्यादा कोर्ट जजों को उनके बच्चों की फ़िक्र है। इसके मुताबिक बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों की ठीक से परवरिश करने में असमर्थ हैं और उनके मुकाबले वे (जज) बच्चों के लालन-पालन को लेकर उनसे ज्यादा चिंतित हैं।

जजमेंट में महानुभावों ने अपने लिखे को जायज़ ठहराने के लिए इन्सान और जानवर के बीच अंतर की खाई को भी पाट दिया, जजों ने अपनी टिप्पणी में यहाँ तक कह दिया कि पुरातन काल में इन्सान की भी बलि दी जाती थी जिसे कई शताब्दियों पहले बंद कर दिया लिहाज़ा पशुओं की भी बलि नहीं होनी चाहिए।

यहाँ बता दें कि पहला तथ्य यह है कि इंसान और जानवर दोनों में दूर-दूर तक किसी तरह की कोई सी भी समानता नहीं है, क्योंकि Cannibalism यानी नर-भक्षण (मनुष्य का मांस खाना) और जानवर का मांस खाने में बहुत फर्क है। किसी इन्सान को मारना गुनाह है मगर किसी जानवर जैसे मवेशी को मारने पर ऐसा कुछ भी नहीं। यह किसी तरह का कोई गुनाह नहीं है, बल्कि दुनियाभर में अपना पेट पालने के लिए लोग इस पर आश्रित हैं।

कोर्ट की अतिविस्तृत टिप्पणी में हिन्दुओं की बलि प्रथा से खीझ खाकर माननीयों ने यहाँ तक कह दिया कि अधिकतर शक्ति पीठों में पशुबलि की प्रथा को नहीं मनाया जाता, मगर इसकी पड़ताल में एक ही तथ्य देख कर कोर्ट का यह दावा भी फेल साबित होता है वह यह कि तारापीठ और कामख्या देवी मंदिर दो ऐसी शक्ति पीठ हैं जहाँ आज भी बलि चढ़ाई जाती है। साथ ही देश भर में ऐसी कई शक्ति पीठ मौजूद हैं जिनमें बलि प्रथा को मनाया जाता है। गौरतलब है कि अपने इस पूरे स्टेटमेंट को डिफेंड करने के लिए तथ्यात्मक तौर पर कई भ्रामक बातों को भी बढ़ावा दिया गया है जिसमें कई बातें गलत कही गई हैं।

इसके आगे न्यायालय की ओर से कहा गया है कि “यदि इस बलि प्रथा का अनुष्ठान कर लिया जाता है तो पूजा समारोह को किसी भी तरीके से बाधित नहीं कहा जा सकता और न ही इसका अभ्यास करने अधिकार कहा जा सकता है।” यहाँ पुनः यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि किसी भी तरीके से धार्मिक रीति-रिवाजों में अथवा आस्था के विषयों में दखल देना न्यायालय का काम नहीं है, न ही उसे इसके लिए सरकारी तंत्र में रखा गया।

कोर्ट की भाषा को देखकर एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि इन्हें हिन्दुओं की भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं है, इनके लिए हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलना ही समाज सुधार का पर्याय है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए कोर्ट की टिप्पणी को पढ़कर यह और भी ज्यादा साफ़ हो जाता है। बता दें कि हिन्दू धर्म एकमात्र ऐसी संस्कृति का पोषक है जिसमें विविधता और सहिष्णुता का संगम देखने को मिलता है। विभिन्न सम्प्रदाय और जातियों को अपने अन्दर समेटे यह धर्म कतई संकुचित नही हो सकता, यह सिर्फ कुछ पाखंडी लिबरल हिन्दू हैं जो अपनी ही सभ्यता की जडें खोदने में लगे हुए हैं।

हाईकोर्ट यह भी कहता है कि पशुबलि न मानने वालों के अधिकार उनसे ऊपर हैं जो इसे मानते हैं। यानी कुल मिलाकर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि भारत को न्यायिक सुधार की बहुत जरूरत है। यही समय है कि देश की न्याय व्यवस्था में नई जान फूँकी जानी चाहिए, साथ ही उसे खुद भी इसपर विचार भी करना चाहिए कि लोकतंत्र के चार खम्भों में से एक न्यायपालिका कितनी मजबूती से खड़ा है? खड़ा भी है या खोखलेपन का शिकार हो गया है। इससे पहले कि देश का ढाँचा तथाकथित बुद्धिजीवियों और वामी लिबराल्स के चंगुल से बर्बाद हो, हमें संभल जाना चाहिए।

कोई एक कारण ऐसा नहीं दिखता जो वास्तव में समाज-सुधार की परिभाषा में फिट बैठता हो, क्योंकि समाज में सभी धर्म बसते हैं। लेकिन अगर इसके लिए सिर्फ एक ही धर्म पर चोट करने से बदलाव लाने का सपना देखा जा रहा है तो भविष्य में आने वाली नस्लों को वह सिर्फ भयावह अन्धकारमय दलदल की ओर धकेलने जैसा है। इससे भारत की अतिप्राचीन विश्वप्रसिद्ध सभ्यता का ह्रास ही होगा। निश्चित रूप से संवैधानिक नैतिकता की आड़ में लोगों के धर्म और आस्था के प्रति कलुषित रवैया देश को शून्य की धकेल रहा है। किसी भी अराजक अव्यवस्थित राष्ट्र का रास्ता संवैधानिक नैतिकता से होकर ही जाता है।

पुलवामा में जैश, लश्कर और हिज़्बुल की गुप्त बैठक, Pak ने आतंकियों को सौंपे अलग-अलग टास्क

पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई की शह पर लश्कर-ए-तैयबा, हिज़्बुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद ने कई आतंकियों को जम्मू-कश्मीर सहित भारत के अन्य हिस्सों में हमला करने के लिए अलग-अलग टास्क दिया है। इनके निशाने पर राजनेता से लेकर पुलिस और सुरक्षा बलों के कर्मी हैं। एएनआई ने एक डॉक्यूमेंट के हवाले से ये खुलासा किया है।

इस डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि पुलवामा में एक अज्ञात जगह पर तीनों बड़े आतंकी समूहों की पिछले हफ्ते गुप्त बैठक हुई। बैठक में उन्हें पाकिस्तान से मिले टास्क और भविष्य में क्या-क्या किया जाना है, इस पर चर्चा हुई। ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आगाह किया है कि आतंकी संगठन कुछ राजनेताओं और सुरक्षा बलों के जवानों व अधिकारियों की हत्या की साजिश रच रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी वारदातों को अंजाम देने की योजना बनाई जा रही है।

जैश को नेशनल हाइवे पर हमले करने का टास्क दिया गया है। लश्कर को सुरक्षा बलों और उनके कैम्पों पर हमला करने का टास्क मिला है। हिज़्बुल को जम्मू-कश्मीर में शटडाउन कराने और राजनेताओं व सुरक्षा बलों को निशाना बनाने का टास्क दिया गया है। यह सब कुछ पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई की सहमति के बाद किया गया। हिज़्बुल मुजाहिदीन को स्थानीय लोगों को निशाना बनाने और घाटी में अशांति पैदा करने का टास्क भी दिया गया है।

इन आतंकी संगठनों को डर है कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद से घाटी में कई विकास कार्य हो सकते हैं और सरकार जिस तरह से राज्य की जनता की भलाई के लिए काम कर रही है, इससे वहाँ शांति बहाल हो सकती है। इन्होंने योजना बनाई है कि जब भी कोई अच्छी ख़बर आएगी, किसी आतंकी वारदात द्वारा उसे दबाने और नकारात्मकता फैलाने की कोशिश की जाएगी। सुरक्षा बलों को आतंकियों के मंसूबे को नाकाम करने के लिए भारतीय सेना, स्थानीय पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग से तालमेल बिठा कर रखने को कहा गया है।

लश्कर, जैश और हिज़्बुल लगातार जम्मू-कश्मीर में दुकानें बंद रखने के लिए दुकानदारों को धमका रहे हैं। ये चाहते हैं कि बाजार बाजार ठप्प हो जाए और लोग ज़रूरी समान भी न ख़रीद पाएँ। ऐसा कर के ये वहाँ की जनता के बीच सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाना चाहते हैं। आतंकी पेट्रोल पम्प मालिकों को भी धमकी दे रहे हैं।

कॉन्ग्रेस का सफाया हो चुका है, सबसे अच्छा कैल्शियम इंजेक्शन भी इसे नहीं बचा सकता: ओवैसी

महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के लिए पहुँचे असदुद्दीन ओवैसी ने कॉन्ग्रेस पर जम कर निशाना साधा। पुणे में एक चुनावी सभा को सम्बोधित करते हुए एआईएमआईएम अध्यक्ष ने कहा कि कॉन्ग्रेस का अब सफाया हो चुका है और पार्टी इतनी ज्यादा कमज़ोर हो गई है कि अब दुनिया का सबसे प्रभावशाली कैल्सियम इंजेक्शन भी उसे नहीं बचा सकता। महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव होना है और ओपिनियन पोल्स में भाजपा-शिवसेना की ‘महायुति’ विपक्ष पर भारी पड़ती दिख रही है। राज्य में कॉन्ग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है और उसकी सहयोगी एनसीपी के कई नेता भाजपा से जा मिले हैं।

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने दावा किया कि कॉन्ग्रेस पार्टी का आलाकमान हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों को नज़रअंदाज़ कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश के राजनीतिक नक़्शे से कॉन्ग्रेस साफ़ हो चुकी है और उसे सबसे अच्छा कैल्शियम इंजेक्शन देकर भी नहीं बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस अब धीरे-धोरे नीचे जा रही है और कोई उसे बचा नहीं सकता क्योंकि पार्टी ख़ुद ही लड़ाई लड़ने के लिए तैयार नहीं है।

ओवैसी ने कहा कि हिमाचल में भाजपा सरकार ने धर्मान्तरण करने वाले व्यक्ति को एक महीने पहले नोटिस देना अनिवार्य कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि उन्हें आश्चर्य नहीं होगा अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यही नियम पूरे देश में लागू कर दें। इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर के बहुजन संघ के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था। चुनावी विश्लेषकों का मानना था कि इस गठबंधन के कारण दलितों और मुस्लिमों का थोड़ा-बहुत वोट बँटा और इसका नुकसान कॉन्ग्रेस को उठाना पड़ा। 2014 विधानसभा चुनाव में ओवैसी की एआईएमआईएम को 2 सीटें मिली थीं

आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भी प्रकाश आंबेडकर और ओवैसी की पार्टी में बातचीत चल रही थी लेकिन सीट शेयरिंग के मामले में अब तक बात नहीं बन पाई है। एआईएमआईएम ने आरोप लगाया कि बहुजन संघ उसे काफ़ी कम सीटें ऑफर कर रहा है। हालाँकि, प्रकाश आंबेडकर का कहना है कि उनकी पार्टी ने अभी सभी दरवाजे बंद नहीं किए हैं और बातचीत का स्कोप है।

अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत हराम, नाम बदल लें नुसरत जहाँ: देवबंदी उलेमा

बंगाली अभिनेत्री और तृणमूल सांसद नुसरत जहाँ से इस्लामी उलेमा एक बार फिर नाराज़ हो गए हैं। नुसरत कोलकाता के एक दुर्गा पूजा पंडाल में सिन्दूर लगा कर पहुँची थी। इस दौरान उनके पति निखिल जैन भी साथ में थे। दुर्गा पूजा पंडाल में पहुँच कर उन्होंने पूजा-अर्चना भी की। नुसरत जहाँ से नाराज देवबंद के उलेमा ने कहा है कि अगर उन्हें ग़ैर-मज़हबी कार्यों में इतनी ही रुचि है तो वो अपना नाम बदल लें। उलेमा ने पूछा कि अभिनेत्री नुसरत आख़िर ग़ैर-मज़हबी काम कर क्यों रही हैं?

तृणमूल कॉन्ग्रेस की नेता नुसरत जहाँ फ़िलहाल पश्चिम बंगाल के बसीरहाट से सांसद हैं। अब तक 20 से भी अधिक बंगाली फ़िल्मों में नज़र आ चुकीं नुसरत जब संसद में शपथ लेने पहुँची थीं तब भी उनके माथे के सिन्दूर को देख उलेमा नाराज़ हो गए थे। सोशल मीडिया में उन्हें खरी-खोटी सुनाई थी। अब देवबंदी उलेमा ने कहा कि है अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत करना हराम है। उलेमा ने कहा कि इस तरह दुर्गा पूजा में सम्मिलित होकर वह इस्लाम की तौहीन कर रही हैं।

नुसरत जहाँ ने दुर्गा पूजा पंडाल में फेसबुक पर अपने पति का फ़िल्टर वाला फोटो शेयर किया

नुसरत ने उलेमा के बयान का जवाब देते हुए कहा कि वह विवादों पर ध्यान नहीं देती हैं। उन्हें जो सही लगता है वह करती हैं। दुर्गा पूजा के दौरान नुसरत और उनके पति निखिल ने माँ दुर्गा को पहली बार साथ में ‘अंजलि’ अर्पित की। इसी वर्ष जून में उनकी शादी हुई है। नुसरत ने कहा कि बंगाल में सभी लोग एक परिवार की तरह दुर्गा पूजा मनाते हैं।

जब नुसरत से पूछा गया कि वो दूसरे मजहब की होकर भी पूजा कर रही हैं तो उन्होंने कहा कि वह जिस बंगाल में रहती हैं, वहाँ की परंपरा और संस्कृति का अनुसरण कर रही हैं। वहीं, उनके पति निखिल ने कहा कि देश के सभी धर्मों के लोगों को सभी धार्मिक त्योहारों में हिस्सा लेना चाहिए। नुसरत और उनके पति निखिल ने इस दौरान नृत्य भी किया और साथ में ‘ढाक’ बजाया।

अगले 3 महीनों में कर्ज चुकाना चाहती है ZEE: निवेशकों को MD पुनीत गोयनका ने दिलाया भरोसा

जी अगले तीन महीने के भीतर अपना पूरा कर्ज चुकाना चाहती है। कंपनी के एमडी पुनीत गोयनका ने ET Now के साथ बातचीत में कहा कि कंपनी का लक्ष्य अगले तीन महीनों में बकाया राशि का भुगतान करना है। निवेशकों को भरोसा दिलाते हुए उन्होंने कहा कि कर्ज देने वालों की ओर दी गई छह महीने की मियाद से पहले ही कंपनी ने अपनी कुछ संपत्तियों को बेच कर कर्ज चुकाने का फैसला किया है।

बता दें कि जनवरी 2019 में शेयर और दूसरे सिक्योरिटीज के बदले ज़ी एंटरटेनमेंट पर 13,500 करोड़ रुपए का कर्ज था। अब यह कर्ज घटकर 7,000 करोड़ रुपए हो गया है। ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) के प्रमोटर Essel Group ने अपने निवेशकों को सूचित किया है कि सितंबर 2017 में फर्मों के बीच संरचित ऋण व्यवस्था में ZEEL के शेयर रूस के VTB कैपिटल पीएलसी को नहीं दिया गया था।

ऐसी खबरें सामने आई थी कि Essel Media ने VTB Capital के पास अपनी 10.71 फीसदी हिस्सेदारी गिरवी रखी है। इसके बाद गुरुवार से ही जी एंटरटेनमेंट के शेयरों में गिरावट शुरू हो गई। दोनों कंपनियों के बीच यह लोन एग्रीमेंट 4 सितंबर 2017 को हुआ था।

पुनीत गोयनका ने कंपनी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा, “VTB की देनदारी हमेशा कुल ऋण का हिस्सा रही है। जनवरी में कंपनी के कुल कर्ज 13,000 करोड़ रुपए में यह शामिल था। आज यह रकम लगभग 7,000 करोड़ रुपए है। VTB की देनदारी इसका भी हिस्सा है। VTB का कर्ज 2,000 करोड़ रुपए और डोमेस्टिक मार्केट का 5,000 करोड़ रुपए है। VTB को अगली किश्त लौटाने की दिशा में हम काम कर रहे हैं।”

गोयनका ने बताया कि घरेलू ऋण को चुकता करने के लिए कंपनी अपनी संपत्तियों को बेचने की दिशा में आगे बढ़ रही है। 205 मेगावाट के सोलर प्लांट की ब्रिकी से 1,300 करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद है। 80 मेगावाट पावर प्लांट सहित अन्य संपत्तियों की ब्रिकी को लेकर भी बातचीत चल रही है। इन संपत्तियों की ब्रिकी से कर्ज चुकाने के अलावा कंपनी के संचालन के लिए पर्याप्त रकम जुटने की उम्मीद है।

‘वन्दे भारत’ के बाद अब तेजस एक्सप्रेस पर पत्थरबाजी, 3 खिड़कियों के शीशे चटके

देश की पहली कॉर्पोरेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस को भी पत्थरबाजों ने निशाना बनाया है। असामाजिक तत्वों ने तेजस एक्सप्रेस पर पत्थरबाजी की। शनिवार (अक्टूबर 5, 2019) को ट्रेन जब कानपुर और इटावा के बीच थी, तब यह घटना हुई। पत्थरबाजी के कारण तेजस एक्सप्रेस की 3 खिड़कियों खिड़की के शीशे चटक गए। हालाँकि, सुपर क्वालिटी डबल लेयर और अनब्रेकेबल तकनीक के प्रयोग के कारण शीशे टूटे नहीं, जिससे यात्रियों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। मंगलवार को ट्रेन के चटके हुए शीशों को बदल दिया जाएगा

रविवार को तेजस एक्सप्रेस का नियमित रन शुरू हो गया। इस दौरान लखनऊ से नई दिल्ली तक एक अधिकारी भी साथ भेजा गया। इसी रेलखंड पर वन्दे भारत एक्सप्रेस ट्रेन पर भी पत्थरबाजी की गई थी।

फ़रवरी 2019 में जब ‘वन्दे भारत’ के नाम से लोकप्रिय ‘ट्रेन 18’ का ट्रायल किया जा रहा था, तब इस पर भी पत्थर फेंके गए थे। उस घटना में ट्रेन का साइड विंडो क्षतिग्रस्त हो गया था। मार्च में यूपी के बदायूँ में इस ट्रेन पर फिर पत्थरबाजी हुई, जिसमें बाद 10 साइड विंडो टूट गए थे। इस घटना को लेकर कई लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया था। इस ट्रेन पर एक ही दिन में 2 बार पत्थरबाजी की घटना हुई थी।

तेजस एक्सप्रेस में अगले कुछ दिनों के लिए सभी सीटों की बुकिंग लगभग फुल चल रही है। पहले दिन 740 लोगों ने इस ट्रेन में सफर किया। बुधवार (अक्टूबर 9, 2019) को भी ट्रेन की बुकिंग फुल है।