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श्रीनगर, पठानकोट, अमृतसर समेत कई एयरपोर्ट पर फिदायीन हमले की आशंका, बढ़ाई गई सुरक्षा

आतंकी हमले को रोकने के लिए जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर, और पंजाब के अमृतसर एवं पठानकोट समेत कई हवाई अड्डों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। हाई अलर्ट जारी हुआ है। सुरक्षा ड्रिल कराई गई है। हर आने-जाने वाली गाड़ी की अच्छी तरह चेकिंग हो रही है। एयरपोर्ट के लिए जाती गाड़ियों को भी तीन बार चेक किया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सुरक्षा एजेंसियों ने अमृतसर के श्री गुरु रामदास अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट, पठानकोट एयरबेस और जम्मू-कश्मीर एयरफोर्स बेस पर फिदायीन हमले की आशंका जताई है। उन्हें मिले खुफिया इनपुट के आधार पर जैश के आतंकी भारतीय सेना के जवानों पर आत्मघाती हमला करने की फिराक में है। सुरक्षा व्यवस्था की देख-रेख आला अधिकारियों द्वारा की जा रही है।

उल्लेखनीय है कि खुफिया एजेंसियों ने 8 से 10 जैश-ए-मोहम्मद के फिदायीन हमले की चेतावनी जारी की थी। जिसके बाद श्रीनगर, अवंतिपोरा, जम्मू, पठानकोट और हिंडन एयररबेस पर ऑरेंज अलर्ट भी जारी कर दिया गया है। कहा जा रहा है कि इस बार आतंकियों के मंसूबे बेहद खतरनाक हैं और वे किसी बड़ी कार्रवाई को अंजाम देने वाले हैं।

हालाँकि, गुरु रामदास हवाई अड्डे पर यात्रियों की आवाजाही सामान्य है और जनता में भी किसी तरह का पैनिक नहीं हैं। अमृतसर के कमिश्नर ने कहा है कि पठानकोट हवाई अड्डे पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

बता दें कि ये खबर आर्मी प्रमुख बिपिन रावत के उस बयान के ठीक कुछ दिन बाद आई है, जिसमें उन्होंने तलब किया था कि पाकिस्तान ने भारत द्वारा ध्वस्त बालाकोट स्थित जैश के आतंकियों का ठिकाना फिर से सक्रिय कर दिया है और कम से कम 500 आतंकी POK के जरिए जम्मू-कश्मीर में घुसने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत एक हिन्दू राष्ट्र और इससे कोई समझौता नहीं, हनुमान और शिवाजी RSS के आदर्श: भागवत

सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार को (अक्टूबर 1, 2019) को एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि भारत की भक्ति करने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है। संघ की विचारधारा के बारे में बात करते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा कि यह स्थानीय नहीं है, अपितु प्रगतिशील है। एबीवीपी से जुड़े वरिष्ठ प्रचारक सुनील आंबेकर की पुस्तक ‘द आरएसएस: रोडमैप फॉर 21 सेंचुरी’ के विमोचन के मौके पर उन्होंने ये बातें कही। पाकिस्तान और उसके प्रधानमंत्री इमरान ख़ान लगातार संघ पर हमलावर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी आरएसएस को लेकर भला-बुरा कह चुके हैं।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संघ ने हिन्दू नहीं बनाए बल्कि यह तो हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है। उन्होंने बताया कि संघ ने बाहर से आए लोगों को भी अपनाया है। उन्होंने कहा कि देश, काल या परिस्थिति के अनुरूप अब तक संघ में बदलाव होता आया है और यह प्रगतिशील संगठन है। उन्होंने कहा कि जो भी भारत की भक्ति करता है और उसमें भारतीयता बनी हुई है तो वह हिन्दू है। संघ प्रमुख ने इसे संघ की सतत विचारधारा बताते हुए कहा कि इस बात को लेकर कोई भरम न पाला जाए।

मोहन भागवत ने संघ द्वारा किए गए कार्यों की भी चर्चा की। आरएसएस में लोकतंत्र के बारे में उन्होंने बात करते हुए कहा कि यहाँ सभी की सहमति के बाद ही किसी दिशा में आगे बढ़ा जाता है। उन्होंने लोगों को यह न सोचने की सलाह दी कि संघ ही सब कुछ करे। उन्होंने कहा कि यह विचार नहीं बनना चाहिए कि संघ के कारण ही सबकुछ हो रहा। उन्होंने कहा कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और इससे कोई समझौता नहीं हो सकता। आरएसएस के मुखिया ने कहा:

“संघ को यदि समझा जा सकता है तो इसके संस्थापक डॉ. हेडगेवार के जीवन से। हमारे लिए झंडा महत्वपूर्ण है। भगवान हनुमान और छत्रपति शिवाजी हमारे आदर्श हैं। हमारे यहाँ देशकाल, समय और परिस्थिति की कसौटी पर सामूहिक सहमति से फ़ैसले लिए जाते हैं। विचारों में मतभेद हो सकता है, लेकिन मनभेद नहीं होता। लोग अपने विचार रखने और लिखने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई भी स्वयंसेवक अपना मत रख सकता है। लेकिन, जब निर्णयों की बात आती है तो वह सहमति से होते हैं। मेरे पास भी संघ की व्याख्या के लिए शब्द नहीं है। मैं भी यह दावा नहीं कर सकता कि संघ को समझ पाया हूँ।”

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संघ में शामिल होने के लिए शर्तें नहीं थोपी जाती हैं। उन्होंने समलैंगिकों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वे सभी मनुष्य हैं और उन सभी का समाज में स्थान है। उन्होंने महाभारत युद्ध की चर्चा करते हुए शिखंडी की बात की। उन्होंने कहा कि उस समय भी अर्जुन को उसके पीछे खड़ा होना पड़ा था। यह दिखाता है कि समाज में सबका अपना-अपना स्थान है।

गोरक्षा के लिए जान भी जाए तो ठीक: जानिए गाँधी क्यों करते थे मुस्लिमों के पैर पर गिरने की बात?

गोहत्या को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की माँग उठती रहती है। भारत जैसे देश में गाय को माता के रूप में देखा जाता है और न सिर्फ़ हिन्दू संस्कृति बल्कि भारतीय पुरातन परंपरा में गाय की पूजा का सिद्धांत रहा है। यहाँ हमें यह देखना ज़रूरी हो जाता है कि हमारे राष्ट्रपिता इस सम्बन्ध में क्या सोचते थे। महात्मा गाँधी गाय को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और उपयोगी जानवर मानते थे। वह कहते थे कि वह गाय को स्नेहपूर्ण आदर के भाव से देखते हैं। वह मानते थे कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गाय हमारी रक्षक है।

लेकिन, जब बात गोहत्या की आती थी, तब गाँधी क्या सोचते थे? गाँधी क्या गोहत्या पर पूर्णतया प्रतिबन्ध का समर्थन करते थे? क्या महात्मा हिन्दू भावनाओं को प्रतिबिंबित करते थे? आइए जानते हैं। एक बातचीत के दौरान उन्होने कहा था कि वह गाय का सम्मान करते हैं लेकिन उसी प्रकार से वह मनुष्य का भी सम्मान करते हैं। गाँधी इस दौरान यह याद दिलाना नहीं भूले कि वह किसी भी मनुष्य का सम्मान करते हैं, भले ही वह हिन्दू हो या मुस्लिम। इस दौरान महात्मा गाँधी ने एक सवाल भी पूछा, जिसकी प्रासंगिकता पर बहस होनी चाहिए।

अगर कोई मुस्लिम गोहत्या करता है तो?

गाँधी का सवाल था कि क्या उन्हें गाय को बचाने के लिए किसी मुस्लिम के साथ मारपीट करना चाहिए या फिर उसे मार डालना चाहिए? फिर गाँधी उत्तर देते हुए कहते हैं कि इस तरह से तो वह मुस्लिमों के भी दुश्मन हो जाएँगे और गाय के भी। तो फिर उपाय क्या है? गोरक्षा के लिए मोहनदास करमचंद गाँधी ने क्या सुझाया था? पढ़िए उन्हीं के शब्दों में:

“गोरक्षा को रोकने का एकमात्र उपाय यही है कि मैं मुस्लिम भाइयों के पास जाऊँ और देश की ख़ातिर उनसे अनुरोध करूँ कि गोरक्षा में हमारी मदद करो। अगर मुस्लिम मेरी बात नहीं सुनते हैं तो फिर गाय को मरने देना चाहिए क्योंकि तब यह कार्य मेरे बूते से बाहर हो जाएगा। अगर गाय को लेकर मेरे मन में कुछ ज्यादा ही दया है तो मुझे उसके लिए अपनी जान दे देनी चाहिए लेकिन अपने मुस्लिम भाई की जान नहीं लेनी चाहिए। अगर मैं कुछ करूँगा तो मुस्लिम लोग भी जवाब में कुछ करेंगे।”

गाँधी ने कहा था कि अगर वह मुस्लिमों के सामने अपने सिर झुकाएँगे, तो वह उससे भी ज्यादा अच्छे तरीके से अपना सिर झुकाएँगे। गाँधी के अनुसार, अगर मुस्लिम ऐसा नहीं भी करते हैं तो भी मेरे द्वारा उनके सामने अपने सिर झुकाने को ग़लत नहीं माना जाना चाहिए। गाँधी का यह मानना था कि जब हिन्दू ज्यादा हठी हो गए, हिन्दू अपनी माँगों को लेकर ज्यादा अडिग हो गए, तो गोहत्या के मामलों में बढ़ोतरी हुई। इसके बाद गाँधी ने मुस्लिमों की तुलना अपने सगे भाई से करते हुए पूछा कि अगर उनका अपना भाई अगर किसी गाय की हत्या कर रहा होगा तो वह क्या करेंगे?

गाँधी इस परिस्थिति की कल्पना करते हुए दो विकल्प सुझाते हैं। अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के अनुसार, पहला विकल्प यह है कि वह अपने भाई को मार डालें ताकि वह गोहत्या करने में सफल न हों। वह दूसरा विकल्प सुझाते हैं कि वह अपने भाई के पैरों में गिर कर उससे विनती करें की कृपया ऐसा मत करो। महात्मा गाँधी आगे सुझाते हैं कि अगर उन्हें अपने भाई के पैरों पर गिर कर विनती करनी चाहिए, तो उन्हें मुस्लमान भाइयों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए। अर्थात, अगर कोई मुस्लिम गोहत्या कर रहा है तो उसके पैरों पर गिर कर विनती करनी चाहिए कि ऐसा न किया जाए।

गोहत्या बनाम गोरक्षा: महात्मा गाँधी के विचार

महात्मा गाँधी गोरक्षक सोसाइटीज को ही गोहत्या करने वाले सोसाइटीज मानते थे। गाँधी मानते थे कि देश को ऐसी सोसाइटीज की कोई ज़रूरत नहीं है और गोरक्षक सोसाइटीज की ज़रूरत ही भारत के लिए अपमान की बात है। महात्मा गाँधी का पूछना था कि गायों को तब कौन बचाने आता है जब हिन्दू लोग ख़ुद उसे परेशान करते हैं और उसके साथ क्रूरता से बुरा व्यवहार करते हैं? महात्मा गाँधी का यह सवाल भी था कि जब हिन्दू लोग ही गाय के बछड़ों की लाठी से निर्दयतापूर्वक पिटाई करते हैं, तब उनकी रक्षा के लिए कौन आगे आता है? महात्मा गाँधी ने कहा था कि यह सब होता रहता है लेकिन बावजूद इसके भारत को एक राष्ट्र होने से कोई नहीं रोक पाता।

महात्मा गाँधी अहिंसा के पुजारी थे। उन्होंने कहा था कि गोहत्या को रोकने के लिए किसी मुस्लिम की जान लेना ठीक नहीं है क्योंकि अगर हिन्दू अहिंसा में विश्वास रखते हैं और मुस्लिम ऐसा नहीं करते, फिर भी हिन्दुओं का कर्त्तव्य है कि वह मुस्लिमों से सिर्फ़ निवेदन करे। महात्मा गाँधी ने गोरक्षा और हिन्दुओं द्वारा इसके लिए प्रदर्शित किए जाने वाले भावनाओं की बात करते हुए अपना अनुभव कुछ इस तरह साझा किया था:

“मेने देश भर में अपने भ्रमण के दौरान कई बार देखा है कि हिन्दू लोग गोरक्षा के लिए काफ़ी जल्दबाजी में हैं। मैं उन्हें एक सीधी-सादी अंग्रेजी कहावत याद दिलाना चाहूँगा- ‘Haste Is Waste (हड़बड़ी से हानि)’। लाहौर सहित कई इलाक़ों में मैंने देखा है कि हिन्दू लोग गोहत्या प्रतिबंधित करने के लिए क़ानून लाने की बात करते हैं लेकिन मैं बता दूँ कि ऐसा कोई भी निर्णय बहुसंख्यकों द्वारा नहीं लिया जा सकता। ये मुस्लिमों के ऊपर है कि वे पहल करें। हिन्दू उन पर दबाव नहीं डाल सकते। हिन्दू अपने दोनों हाथ में लड्डू नहीं रख सकते।”

महात्मा गाँधी चाहते थे कि हिन्दू कोऑपरेटर्स गोरक्षा के लिए चलाए जा रहे किसी भी आंदोलन से ख़ुद को अलग करें क्योंकि ये काम मुस्लिम काफ़ी सराहनीय ढंग से कर रहे हैं। हमारे राष्ट्रपिता मानते थे कि मुस्लिम हिन्दुओं की भावनाओं का सम्मान करने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। वो मानते थे कि गोरक्षा क़ानून के लिए हिन्दुओं के पास दो ही विकल्प हैं- या तो मुस्लिमों की अच्छाइयों पर निर्भर रहो या फिर हथियार उठाओ। गाँधी मानते थे कि हिन्दुओं को पहला विकल्प आजमाना चाहिए और दूसरे के आसपास भी नहीं फटकना चाहिए।

चम्पारण के बिना गाँधी की बात अधूरी है

मैं चम्पारण की धरती से हूँ। इसीलिए महात्मा गाँधी की कर्मभूमि में उनके पदचिह्नों का साक्षी रहा हूँ। गाँधी के चम्पारण में पूरा बचपन बिताने के बाद गाँधी पर लिखे लेख में चम्पारण की बात न आए, ये हो नहीं सकता। आख़िर यह हमारी धरती के किसान राजकुमार शुक्ल का कमाल था कि वो गाँधी को चम्पारण खींच लाए, जहाँ से देश की स्वतंत्रता को नई दिशा मिली। चम्पारण यात्रा के दौरान भी वहाँ के लोगों ने महात्मा गाँधी से गोरक्षा को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा। महात्मा गाँधी ने हमारे पूर्वजों को कुछ सलाह दी थी।

गाँधी ने चम्पारण की धरती पर कहा था कि अगर कोई भी व्यक्ति गोरक्षा के लिए कुछ ज्यादा ही उत्सुक है तो उसे सबसे पहले अपने मन से इस भ्रम को दूर करना पड़ेगा कि उसे इसके लिए मुस्लिमों और ईसाईयों को गोहत्या से रोकने की ज़रूरत है। महात्मा गाँधी ने चम्पारणवासियों को बताया था कि गोरक्षा का मतलब मुस्लिमों को बीफ खाने से मना करना या गोहत्या से रोकना नहीं है। महात्मा गाँधी कहते थे कि गोहत्या से उनकी आत्मा को जो पीड़ा होती है, उस व्यथा को कोई नहीं समझ सकता। लेकिन, फिर यही सवाल खड़ा हो जाता था कि आखिर किया क्या जा सकता है?

महात्मा गाँधी का सीधा मानना था कि मुस्लिमों को गोहत्या से अलग रखने का अर्थ है उनसे जबरन हिन्दू धर्म कबूल करवाना। वह कहते थे कई आज़ादी मिलने के बाद भी हिन्दू बहुसंख्यकों द्वारा गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए कोई क़ानून नहीं बनाना चाहिए। महात्मा गाँधी के बयानों पर उस वक़्त भी हड़कंप मचा था, जिसके बाद उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा था कि उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा कि वह गोहत्या पर प्रतिबन्ध वाले क़ानून के ख़िलाफ़ हैं। मैसूर स्टेट से सम्बंधित एक पत्र में गाँधी ने कहा था कि ऐसा तभी किया जाना चाहिए, जब मुस्लिमों का बहुमत भी इसके पक्ष में हो।

इससे पहले कि गाँधी की बातों को लेकर कोई भ्रामक राय बना ले…

हालाँकि, यह भी मान कर चलिए कि गाँधी ज़िंदगी भर गोरक्षा की बातें करते रहे और गाय के प्रति सम्मान के कारण सबसे निवेदन भी करते रहे कि गोहत्या न की जाए। जैसा कि वह ख़ुद मानते थे, उन्होंने गोहत्या को रोकने के लिए सच में सबसे, यहाँ तक कि मुस्लिमों से भी निवेदन किया। गाय को लेकर उनकी भावनाएँ और विचार ठीक ऐसे ही थे, जो किसी अन्य हिन्दू व्यक्ति के। इसीलिए, उनके उपर्युक्त विचारों से यह अनुमान कतई न लगाएँ की गाँधी गोहत्या के पक्ष में थे। वह गोहत्या के विरोधी थे, गोरक्षा के समर्थक थे और चाहते थे कि मुस्लिम गोहत्या न करें।

SC ने पूछा- राम का जन्म कब? मुस्लिम पक्ष के वकील बोले- मैं शनि के प्रभाव में हूँ

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अयोध्या मामले की 35वें दिन की सुनवाई हुई। जन्मस्थान को न्यायिक व्यक्ति मानने और अयोध्या में खुदाई पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट पर हिंदू पक्ष की ओर से दलीलें रखी गई। रामलला विराजमान के वकील के पराशरण और सीएस वैद्यनाथन ने दलीलें पेश की।

पराशरण ने कहा कि यदि लोगों को किसी जगह पर दिव्य शक्ति के होने का यकीन हो तो उसे न्यायिक व्यक्ति माना जा सकता है। जस्टिस एसए बोबडे ने उनसे पूछा कि क्या ज्योतिष ग्रंथों में भी राम के जन्म के समय और स्थान को लेकर कोई जिक्र है? यह सुनते ही सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा, “कौन-सा ज्योतिष? वो ज्योतिष जो सूर्य से या वो जो चंद्र की चाल से माना जाता है?” उन्होंने कहा कि कुछ ज्योतिषी सूर्य से तो कुछ चंद्रमा के हिसाब से ग्रह-गोचर की गणना करते हैं। सबका अपना-अपना तरीका है। धवन ने कहा, “अभी मेरा समय राहु और केतु के बीच फॅंसा है। यह मुझे मुश्किल में डाल रहा है। जन्मकाल के अनुसार मैं फिलहाल शनि के प्रभाव में हूँ।”

बोबडे के सवाल के जवाब में पराशरण ने कहा कि चैत की नवमी को अभिजीत नक्षत्र में अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ। उस नवमी को हिंदू रामनवमी का उत्सव मनाते हैं। इस उत्सव और विशेष पूजा के लिए जन्मस्थान और वहाँ बने मन्दिर में पूजा का विधान है।

उन्होंने पीठ के सामने गीता के कुछ श्लोक पढ़े और न्यायिक व्यक्ति को परिभाषित करने का प्रयास किया। पराशरण ने कहा कि अगर लोगों को विश्वास है कि किसी जगह पर दिव्य शक्ति है तो इसे न्यायिक व्यक्ति माना जा सकता है। उन्होंने कुड्डालोर मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है और केवल एक दीया जलता है जिसकी पूजा की जाती है। उन्होंने कहा कि लोगों के विश्वास के साथ पूजा स्थल को मंदिर कहा जा सकता है। मंदिर पूजा स्थान के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक सामान्य शब्द है।

इससे पहले जब वैद्यनाथन पीठ के सामने दलील रख रहे थे तो मुस्लिम पक्ष के वकील धवन और मीनाक्षी अरोड़ा ने दखल देने की कोशिश की। सीजेआई ने इस पर नाराजगी जताई। इसके बाद धवन ने खेद जताया। गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली संविधान पीठ मामले की रोजाना सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस बोबडे के अलावा डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं।

हलाल मांस का एक हिस्सा जाता है जिहाद में, यह खाना मतलब अपनी सुपारी खुद देना: ‘डॉ. झटका’

‘Dr. झटका’ और ‘King of झटका revolution’ जैसे उपनामों से नवाज़े जा चुके Live Values Foundation के अध्यक्ष और झटका सर्टिफिकेशन अथाॅरिटी के चेयरमैन रवि रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बात की। इस बातचीत में उन्होंने हलाल और झटका मांस में अन्तर, हलाल मांस के जबरन हिन्दुओं पर थोपे जाने और इसको लेकर हमारी खुद की अनभिज्ञता, इसके जिहाद कनेक्शन जैसे विभिन्न पहलुओं पर मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव को बताया। साक्षात्कार के मुख्य बिंदुओं का सारांश निम्न है:

इस्लाम का हलाल-हराम दूसरों पर क्यों?

रवि रंजन सिंह बताते हैं कि हलाल का शाब्दिक अर्थ है “जिसकी इजाज़त हो”, अंग्रेजी में “permissible”। वे सवाल उठाते हैं कि भला मुस्लिमों का हलाल-हराम (यानी वैध-अवैध) गैर-मुस्लिमों के लिए भी उसी तरह वैध या अवैध कैसे हो सकता है। वे पहली माँग यह करते हैं कि इस्लामिक शब्दावली का सामान्यीकरण कर सबके ऊपर थोपने की बजाय “इस्लामिक हलाल” अलग से बताया जाए- ताकि पता रहे कि यह इस्लामिक पद्धति है, नॉर्म नहीं।

उन्होंने बताया कि अरबी भाषा में ‘हलाल’ का शब्द और ‘अनुमति है/नहीं है’ का सिद्धांत इस्लाम से भी पुराना है। हलाल की सटीक परिभाषा को लेकर भी इस्लाम के विभिन्न फिरकों में आपसी मतभिन्नता है- जैसे सुन्नियों का हलाल और हराम शियाओं के हलाल और हराम से कुछ अलग होता है, इत्यादि।

झटका‘ हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।

रवि रंजन बताते हैं कि उनकी मुहिम और झटका को वैधता की कोशिशें न ही शाकाहारी लोगों में माँस का प्रचार करने के लिए है, न ही हलाल माँस क्या है, यह जानते हुए हलाल का सेवन करने की इच्छा रखने वालों को रोकने के लिए। वे केवल यह चाहते हैं कि लोगों को एक तो पता हो कि हलाल मांस के मायने क्या-क्या हैं, और दूसरे कि लोगों के सामने हलाल के अलावा झटका मांस का विकल्प भी उपलब्ध हो।

फ़िलहाल हो रहा भेदभाव, सरकार भी ‘हलाल-सर्टिफाइड’

रवि रंजन बताते हैं कि व्यवहारिक बराबरी तो दूर की बात, सैद्धांतिक रूप से भी सरकार झटका मांस के साथ सौतेला व्यवहार करती है। अधिकाँश सरकारी, यानी जनता के, टैक्स के पैसे से खड़े किए गए और चल रहे, सेक्युलरता की डुगडुगी पीटने वाले, संस्थान असल में ‘हलाल- सर्टिफाइड’ हैं- यानी उनमें केवल हलाल मांस ही परोसा जाता है। इन संस्थानों में राष्ट्रपति भवन, भारतीय संसद की IRCTC* कैंटीन (इसका स्पष्टीकरण नीचे फुटनोट में है) से लेकर भारतीय रेल तक शामिल हैं।

रवि रंजन के अनुसार इस बाबत 2009 से उनकी एक याचिका संसद के सामने लम्बित है, जिसमें माँग की गई है कि संसद या तो हलाल-झटका दोनों तरह के मांस परोसे, या दोनों में से कोई भी नहीं। “ये भारतीय रेल है, कोई मुस्लिम रेल नहीं है। और हम कहीं सीरिया में नहीं बैठे हुए… आप मुझे मजबूर नहीं कर सकते कि अगर मीट खाना है तो इस्लामिक पद्धति का ही खाना है- ये मजबूरी मुझ पर न लादी जाए।”

केवल मांस या जीव-हत्या का तरीका नहीं, हलाल के कई आयाम

रवि रंजन ने बातचीत में बताया कि हलाल के कई आयाम हैं। पहली बात तो यह है कि इस्लाम के पहले भी जीव-हत्या का लगभग यही तरीका ‘कोशर’ यहूदियों का भी था- जानवर की नसें काट कर उसे रक्तस्राव से मारना; इसे भी वे और उनका संगठन पसंद नहीं करते, लेकिन इसका विरोध भी इसलिए नहीं करते क्योंकि यहूदी अपना ‘कोशर’ किसी दूसरे पर नहीं थोपते। जबकि हलाल लादा जाता है।

इसके अलावा मारे जाते समय जानवर को मुस्लिमों के पवित्र स्थल मक्का की तरफ़ ही चेहरा करना होगा। लेकिन सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल मांस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, गैर-मुस्लिम, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यह आर्थिक पक्ष हलाल को केवल एक भोजन पद्धति ही नहीं, एक पूरी समानांतर अर्थव्यवस्था बना देता है, जो गैर-मुस्लिमों को न केवल हाशिये पर धकेलती है, बल्कि परिदृश से ही बाहर कर देती है।

पैसा ज़कात में गया या जिहाद में? हलाल मांस खाना अपनी सुपारी खुद देना

वे इसका अगला आर्थिक पहलू बताते हैं कि किसी भी भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए- जिसे वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के ही बराबर मानते हैं, क्योंकि हमारे पास यह जानने का कोई ज़रिया नहीं है कि ज़कात के नाम पर गया पैसा ज़कात में ही जा रहा है या जिहाद में। और जिहाद काफ़िर के खिलाफ ही होता है- जब तक यह इस्लाम स्वीकार न कर ले!

यानी जब कोई गैर-मुस्लिम हलाल वाला भोजन खरीदता है, तो वह उसका एक हिस्सा अपने ही खिलाफ होने जा रहे जिहाद को आर्थिक सहायता देने में खर्च करता है। इसे वह ‘हलालो-नॉमिक्स’ यानी हलाल का अर्थशास्त्र कहते हैं। “हलालो-नॉमिक्स का अर्थ है आप अपनी सुपारी खुद दे रहे हैं।”

इसके अलावा मांस का काम करने वाले हिन्दुओं में भी आम तौर पर खटिक आदि अनुसूचित जातियाँ ही होतीं हैं- यानी किसी मांस का हलाल होना अगर गैर-मुस्लिम को, हिन्दू को, उस कार्य में कोई आर्थिक भागीदारी करने से रोकता है, तो यह दलितों के साथ आर्थिक अस्पृश्यता ही हुई।

लन्दन के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों से निकला ‘हलाल सर्टिफिकेशन’

रवि रंजन सिंह बताते हैं कि हलाल सर्टिफिकेशन’ की शुरुआत लन्दन में मुस्लिम प्रवासियों की बड़ी संख्या के इकट्ठे होने से बने मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों से हुई। वहाँ पर पहली Halal Certification Society स्थानीय मुस्लिमों को हलाल मांस उपलब्ध कराने के लिए बनी।

आज दुनिया में विभिन्न स्रोतों से आ रहे आँकड़ों के मुताबिक हलाल-सर्टिफाइड भोजन की अर्थव्यवस्था का आकार 1 से 4 ट्रिलियन डॉलर के बीच बताया जा रहा है। यह भारत के किसी बजट से तो बड़ी संख्या है ही, अधिकतम स्तर पर यह भारत की अर्थव्यवस्था ($2.61 ट्रिलियन) से भी बड़ा है। यही नहीं, ऑपइंडिया को मिली रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 तक, यानी महज़ 6 वर्ष के भीतर, इसका आकार बढ़कर $9 ट्रिलियन हो जाने की उम्मीद जताई जा रही है।

झटका प्लांटों में भी हलाल मांस?

रवि रंजन सिंह एक संगीन दावा यह भी करते हैं कि दिल्ली के झटका मांस के प्लांट चलाने वाली संस्था असल में उस प्लांट में भी हलाल तरीके से ही जानवरों को मार रही है, मांस भी हलाल ही बेच रही है, और उस पर झूठा तमगा ‘झटका’ का लगा होता है। इसका कारण उनके मुताबिक उस प्लांट के ठेकेदार का मुस्लिम होना है।

‘क्यों नहीं ले लेते यार झटका सर्टिफिकेट’?

रवि रंजन सिंह आरोप यह भी लगाते हैं कि जब कोई हलाल से अलग झटका मांस बेचने या उसका उत्पादन करने की कोशिश करता है, तो और लोगों की बात तो अलग, सरकारी अमला भी उसे गैर-क़ानूनी रूप से हतोत्साहित करने में जुट जाता है। इसका उदाहरण वे पुणे में लगे पहले झटका स्लॉटर हाउस के रूप में देते हैं।

स्थानीय अधिकारियों ने कहा कि प्लांट को मान्यता और सर्टिफिकेट तभी मिलेगा जब वह हलाल सर्टिफिकेट लेकर आएगा- जबकि कानून में स्लॉटर हाउस खोलने के लिए हलाल सर्टिफिकेशन की बाध्यता नहीं है। “[यानी अगर आप हलाल तरीके से स्लॉटर नहीं करेंगे तो] आपको कोई अधिकार नहीं है मांस खाने का।” रवि रंजन ने यह आरोप भी लगाया कि यह सर्टिफिकेट लेने के लिए बाध्य करने वाले सरकारी अधिकारी ने ‘बड़े-बड़े लोगों’ जैसे शरद पवार (NCP अध्यक्ष, पूर्व केन्द्रीय मंत्री), गोदरेज (भारत के अग्रणी व्यवसायी) आदि का नाम लेते हुए कहा कि अगर ऐसे लोगों ने हलाल सर्टिफिकेट ले रखा है तो “आपको क्या प्रॉब्लम है?”

उस अधिकारी ने अंत में अपनी टेक रखते हुए ही उन्हें कहा कि अगर हलाल न सही तो कम-से-कम झटके का ‘सर्टिफिकेट’ तो लगाना ही होगा (ताकि मुस्लिमों और हलाल परोसने वालों को पता रहे कि यहाँ का मांस हलाल नहीं है)- जबकि कानून में ऐसे किसी सर्टिफिकेट की बाध्यता का प्रावधान नहीं है।

जल्दी शुरू होगी ट्रेनिंग भी

रवि रंजन सिंह ने बताया कि हालाँकि अभी तो उनकी संस्था केवल खुद से ‘झटका’ के तरीके से मांस-उत्पादन करने वालों को सर्टिफिकेट भर ही दे रही है, लेकिन जल्दी ही वे कसाईयों के लिए झटका तरीके से जानवरों को मारना सिखाने का प्रशिक्षण देना भी चालू करेंगे। इसके लिए ढाँचा खड़ा करने के प्रयास चल रहे हैं।

आर्थिक सफ़लता हिन्दुओं पर निर्भर है

क्या कभी झटका हलाल जितना प्रचलित या आर्थिक रूप से सफ़ल होगा? यह पूछे जाने पर रवि रंजन सिंह बिना लाग-लपेट के इसकी सफलता के पीछे के कारकों के लिए – हिन्दुओं की इसमें आस्था, इसके पीछे के सिद्धांत में उनका भरोसा, उनकी रुचि और इस मुद्दे पर उनका समर्थन बताते हैं। उन्होंने बताया कि कई बड़े-बड़े रेस्तरां मालिकों ने उनसे अनाधिकारिक बातचीत में बताया कि उनके प्रतिष्ठानों में आने वाले ग्राहक बहुसंख्या में हिन्दू या गैर-मुस्लिम ही होते हैं (रवि रंजन सिंह का दावा इस संख्या के कुछ मामलों में 95% तक होने का है, लेकिन ऑपइंडिया इसकी पुष्टि नहीं कर पाया है), लेकिन वे किसी ख़ास प्रकार (झटका या हलाल) पर जोर नहीं देते, जबकि मुस्लिम ग्राहक केवल हलाल पर ही जोर देते हैं- अतः इसे आर्थिक रूप से लाभकारी बनाने के लिए हिन्दुओं को झटका या गैर-हलाल के सर्टिफिकेट पर जोर देना होगा। अभी तो उन प्रतिष्ठानों को यह डर है कि झटका/गैर-हलाल न होने से कोई बिजनेस नहीं जा रहा, लेकिन उसका सर्टिफिकेट लगा लेने से मुस्लिम ग्राहक न चले जाएँ। 

झटका ही नहीं, ‘Values Certification’ भी दे रहे हैं

अपनी संस्थाओं Live Values Foundation और ‘झटका सर्टिफिकेशन अथॉरिटी’ के बारे में रवि रंजन सिंह बताते हैं कि जहाँ ‘झटका सर्टिफिकेशन अथॉरिटी’ का काम केवल मांस व्यवसायियों और विक्रेताओं के यहाँ बिक रहे मांस को ‘झटका’ पद्धति से पाया गया प्रमाणित करना है, वहीं Live Values Foundation का कार्य-क्षेत्र इससे कहीं व्यापक है।

वे इसे ऐसे समझाते हैं कि जैसे हलाल में आर्थिक, सांस्कृतिक आदि पक्ष भी होते हैं, और यह एक पूरी व्यापक संस्कृति है, लेकिन ठीक उसी तरह ‘झटका’ नहीं हो सकता- क्योंकि झटका मात्र जानवर की हत्या का एक तरीका है, इसलिए कोई एयरलाइन्स कभी झटका नहीं हो सकती, लेकिन वह ‘हलाल एयरलाइन्स’ हो सकती है। यहाँ पर Live Values Foundation की भूमिका आती है कि जैसे हलाल इंस्पेक्शन होता है, वैसी ही उनका यह फाउण्डेशन जाँच कर के यह सर्टिफिकेट जारी करता है कि सर्टिफिकेट धारक प्रतिष्ठान के यहाँ ‘हलाल’ जैसी जानवरों को तकलीफ़ देने वाली कोई भी पद्धति नहीं अपनाई जाती, साथ ही उनका पैसा (सांस्थानिक तौर पर) जकात के रास्ते जिहाद में नहीं भेजा जाता है, आदि।

यही नहीं, Live Values Foundation व्यक्तियों को भी ‘values pledge’ (शपथ) दिलाता है, और इसके लिए एक प्रमाणपत्र बाकायदा जारी किया जाता है। इससे एक आम आदमी में ‘झटका’ संस्कृति का हिस्सा बनने की प्रेरणा जगती है, उसे यह महसूस होता है कि उसे किसी ऐसी अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं बनना “जो मेरे विरोध में जा रहा है।”

झटका के चलते राजनीति में आया, राजनीति से झटका नहीं

अपने राजनीतिक रुझान की बारे में बात करते हुए रवि रंजन सिंह ने कहा कि हालाँकि वे हिंदू महासभा के सदस्य अवश्य हैं, लेकिन उनका झटका अभियान हिन्दू महासभा की देन नहीं, बल्कि उनकी हिन्दू महासभा की सदस्यता महासभा सदस्यों द्वारा झटका मुहिम को समर्थन के चलते है। उन्होंने एक और हैरतअंगेज बात यह बताई कि उनका महासभा के भीतर भी समर्थन करने वाले सबसे पहले लोग मांसाहारी नहीं, बल्कि विशुद्ध शाकाहारी थे। वे पंडित जिनका मांस तो दूर, प्याज-लहसुन से भी लेना-देना नहीं था, वे उनकी पूरी बात पहले समझे, स्वयं मांसाहार का सेवन करने वाले बाद में।

रवि रंजन 4-5 साल की उम्र में झटका मांस के प्रति अपना पहला रुझान बताते हैं। उनके अनुसार वे जब 4-5 साल के ही थे, तभी उन्होंने पहला जानवर हलाल होते हुए देखा। इसके बाद से ही वे इस पद्धति के विरुद्ध हो गए। मुस्लिमों के विरोध के बारे में उनका कहना है कि हालाँकि ज़बानी विरोध तो बहुत हुआ और धमकियाँ भी मिलीं, लेकिन शारीरिक हिंसा की नौबत नहीं आई। अपने हाथों में पड़ी लोहे की रॉडों पर खुद चुटकियाँ लेते हुए वे कहते हैं कि वे ‘लौह पुरुष’ हैं, इसीलिए सब उनसे घबराते हैं।

नोट- *गौरतलब है कि जब हमने रेलवे से इस संदर्भ में बात की तो रेलवे के एक अधिकारी ने इस पर स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि IRCTC खुद से झटका या हलाल में कोई अंतर नहीं करता। वह अंतरराष्ट्रीय मानककीकरण संस्था (International Organization for Standardization, ISO) और HACCP (Hazard Analysis and Critical Control Point, भोजन सामग्री में निहित जोखिमों को कम करने की प्रणाली) के मानकों के अनुसार फ्रोज़ेन चिकन के सप्लायर्स की छँटाई (shortisting) करती है। वह माँस के झटका या हलाल ही होने की शर्त अपने टेंडर दस्तावेज़ों में नहीं लिखती। भारत के भोज्य पदार्थ नियामक FS&SAI (Food Safety and Standards Authority of India) के मानकों में भी झटका या हलाल का ज़िक्र नहीं है।

अपडेट: अक्टूबर 4, 2019, 08:00 PM

‘केवल हलाल मांस बेचना SC/ST एक्ट का उल्लंघन’: मैक्डॉनल्ड्स इंडिया को लीगल नोटिस

केवल हलाल मांस बेचना मैक्डॉनल्ड्स इंडिया को भारी पड़ सकता है। इस संबंध में मिले लीगल नोटिस का जवाब देने से वह बच रहा है। कानून के जानकारों के मुताबिक मैक्डॉनल्ड्स इंडिया का यह बिजनेस मॉडल न केवल संवैधानिक मूलभूत अधिकारों का, बल्कि एससी/एसटी एक्ट का भी उल्लंघन है।

इसी साल अगस्त में ग्लोबल फ़ास्ट-फ़ूड चेन मैक्डॉनल्ड्स ने कबूल किया था कि गैर-मुस्लिमों के साथ भेदभाव भारत में उसके बिज़नेस मॉडल का हिस्सा है। उसने अपने सभी रेस्तरां में केवल हलाल मांस बेचने और उनके हलाल प्रमाणित होने की बात कही थी। हलाल पशु वध का एक इस्लामी तरीका है, जो बेहद क्रूर होता है। साथ ही इसकी पूरी प्रक्रिया में गैर मुस्लिम शामिल नहीं हो सकते।

इस कबूलनामे के बाद सामाजिक कार्यकर्ता हरीश शर्मा की तरफ से वकील ईशकरण भंडारी ने मैक्डॉनल्ड्स इंडिया को लीगल नोटिस भेजा था। नोटिस मैक्डॉनल्ड्स इंडिया के ज्वाइंट वेंचर पाटर्नर और मैनेजिंग डायरेक्टर द्वय अमित जाटिया तथा विक्रम बख्शी को भेजा गया था।

नोटिस में मैक्डॉनल्ड्स इंडिया के अगस्त के कबूलनामे का हवाला देते हुए उससे झटका मांस की नीति के बारे में स्पष्टीकरण मॉंगा गया था। पशु वध का यह तरीका कम क्रूर होता है। ज्यादातर हिंदू और सिख इसी तरीके के मांस का उपयोग करते हैं।

हलाल से जुड़े मैक्डॉनल्ड्स के गाइडलाइन के मुताबिक पशु वध की पूरी प्रक्रिया और उसके पैकेजिंग में केवल मुस्लिमों को ही शामिल किया जाता है। इस व्यवसाय से जुड़े अन्य धर्म के लोगों के साथ भेदभाव करने की बात मानते हुए वह उन्हें कारोबार के लिए बराबरी का मौका मुहैया कराने से इनकार करता रहा है।

नोटिस में केवल हलाल मांस बेचने के ट्वीट का जिक्र करते हुए कहा गया है कि एक खास तरह का ही मांस परोसना सामाजिक, नस्लीय और धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं करने के संविधान के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि कई समुदाय के लोग हलाल मांस का इस्तेमाल नहीं करते। ऐसे में केवल हलाल मांस परोस मैकडॉनल्ड्स उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत कर रहा है। लीगल नोटिस में मैकडोनॉल्डस यूके और कनाडा के बयान का भी उल्लेख है, जो कहते हैं कि उनके रेस्तरां में हलाल मांस नहीं परोसा जाता और इसकी सेवा शुरू करने की उनकी कोई योजना भी नहीं है।

फूड चेन से 15 दिनों के भीतर नोटिस का जवाब मॉंगा गया था। मैकडॉनल्ड्स ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए विस्तार से जवाब देने के लिए और वक्त मॉंगा। लेकिन, मैकडॉनल्ड्स की खत्म होती नहीं दिख रही। इसे देखते हुए वकील भंडारी ने बताया कि वे रिमांइडर भेजने की तैयारी कर रहे हैं। भंडारी ने ऑप इंडिया को बताया कि केवल हलाल मांस बेच कर मैकडॉनल्ड्स एससी/एसटी एक्ट का भी उल्लंघन कर रहा है। झटका मांस की प्रोसेसिंग से जुड़े ज्यादातर लोग एससी और एसटी ही हैं।

लापता BSF सब इंस्पेक्टर का शव 3 दिन बाद हुआ PAK सीमा क्षेत्र से बरामद

28 सितंबर से लापता चल रहे बीएसएफ जवान पारितोष मंडल का शव पाकिस्तान रेंजर्स ने बरामद कर लिया है। बताया जा रहा है भारत-पाक अंतराष्ट्रीय सीमा पर शनिवार को गश्त करते हुए सीमा सुरक्षा बल के पारितोष नाले में बह गए थे। खबरों की मानें तो वह अइक नल्लाह इलाके में गिर गए थे। उनके लापता होने की खबर मिलते ही सर्च ऑपरेशन चलाया गया था लेकिन अगले तीन दिन तक उनका कोई पता नहीं लग पाया था।

इसके बाद खबर आई थी कि पाक रेंजर्स और भारतीय ग्रामीण, बीएसएफ के लापता जवान की तलाश में सहयोग करने आगे आए। लेकिन, अब मंगलवार (1 अक्टूबर, 2019) को पता चला है कि जवान को सुरक्षित ढूँढने की उम्मीदें खत्म हो गई हैं। पाकिस्तान की ओर से सीमा सुरक्षाबल को सूचित कर दिया गया है कि उनके क्षेत्र में पारितोष मंडल का एक शव बरामद हुआ है। ताजा जानकारी के मुताबिक पाक रेंजर्स ने कागजी औपचारिकताओं को पूरा करते हुए पारितोष का शव भारत को सौंप दिया है।

पारितोष बीएसएफ की 36वीं बटालियन में तैनात थे। वे पश्चिम बंगाल के निवासी थे। उनकी गुमशुदगी का पता लगाने के लिए सीमा पार संपर्क किया गया था।

तस्वीर साभार: BSF का ट्विटर अकॉउंट

यहाँ उल्लेखनीय है कि शनिवार की शाम अग्रिम पोस्ट तक जाने के लिए पारितोष के साथ अन्य तीन जवान नाव पर सवार हुए थे। लेकिन जैसे ही नाव नाले के मध्य पहुँची, तो तेज बहाव में नाले का संतुलन बिगड़ गया और पारितोष नाले में जा गिरे। इसके बाद आज उनके बारे में दुखद सूचना पाकिस्तान की ओर से दी गई।

बीएसएफ के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से पारितोष मंडल की ड्यूटी के दौरान हुई मौत पर डीजी और अन्य रैंक अधिकारियों की ओर से उन्हें सलाम दिया गया और उनके परिवार के प्रति शोक व्यक्त किया गया। बीएसएफ की ओर से जानकारी दी गई है कि 28 सितंबर 2019 को पट्रोलिंग के दौरान सब इंस्पेक्टर पारितोष मंडल अइक नल्लाह में अपने दो साथियों को बचाते हुए बह गए।

तिहाड़ में चिदंबरम को चाहिए घर का खाना: अदालत में दाखिल की अर्जी

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने ट्रायल कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की है। इस अर्जी में उन्होंने न्यायिक हिरासत में घर का बना खाना खाने की इजाजत मॉंगी है। अर्जी पर सुनवाई 3 अक्टूबर को होगी। चिदंबरम फिलहाल आईएनएक्स मीडिया केस में तिहाड़ जेल में बंद हैं।

उल्लेखनीय है कि सोमवार को पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम उच्च न्यायालय से किसी भी तरह की राहत पाने में नाकामयाब रहे। अदालत ने इस मामले में उनकी जमानत याचिका खारित करते हुए कहा था कि जाँच अग्रिम चरण में है और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वह गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। सीबीआई ने यह कहते हुए चिदंबरम की जमानत का विरोध किया था कि यह एक गंभीर अपराध है और चिदंबरम को इस बात का अहसास है कि उन्हें दोषी ठहराया जा सकता है। ऐसे में चिदंबरम भागने की कोशिश कर सकते हैं।

आईएनएक्स मीडिया केस में चिदंबरम को सीबीआई ने 21 अगस्त को गिरफ्तार किया था। उन पर वित्त मंत्री रहते आईएनएक्स मीडिया ग्रुप को 2007 में 305 करोड़ रुपये का विदेशी धन हासिल करने के लिए विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड की मंजूरी में अनियमितता बरततने का आरोप है।

काले जादू से बच्चे की मौत, जिम्मेदार था मुस्लिम आलिम… NDTV और मीडिया गिरोह ने लिखा तांत्रिक

ऐसा अमूमन देखा गया है कि ज्यादातर मीडिया हाउसों ने अक्सर मुस्लिम समुदाय के ढाल बनने की प्रवृत्ति दिखाई है। गुनहगार मुस्लिम होने पर प्राय: ये मीडिया हाउस अपने रिपोर्ट में उसका नाम छुपा लेते हैं और कई बार तो इसे हिन्दू अपराध के साथ जोड़ देते हैं।

ऐसे कई उदाहरण हैं, जब ये मीडिया हाउस मुस्लिमों द्वारा किए गए अपराध को ‘हिन्दू स्पिन’ दे देते हैं। ऐसा ही एक मामला फिर से सामने आया है। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में मुस्लिम आलिम द्वारा काले जादू का उपयोग करके किए गए इलाज में 10 साल के बच्चे की मौत हो गई। मगर मीडिया गिरोह ने इस अपराध को हिन्दू द्वारा किए गए अपराध के रूप में फैलाया।

नकाशीपारा पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने बताया कि अर्फिना बीबी नाम की एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई कि कंथलबेरिया गाँव के मुस्लिम आलिम अल्पना बीबी द्वारा किए गए इलाज के दौरान आई गंभीर चोट के कारण उनका 10 साल का बेटा जान नबी शेख की मौत हो गई और 6 साल के बेटे जहाँगीर शेख हॉस्पिटल में भर्ती है। 

ऑफिसर ने बताया कि अर्फिना बीबी और हलंधर शेख 22 सितंबर को अपने बेटों को लेकर मुस्लिम आलिम के पास इलाज के लिए गए थे। जिसमें से एक की मौत हो गई है और दूसरा अस्पताल में भर्ती है। अधिकारी ने बताया कि अर्फिना बीबी जब 25 सितंबर को वहाँ पहुँची थी, तो उन्होंने देखा कि उनके बेटों का पीठ गर्म तेल, घी और मिर्च पाउडर लगाने की वजह से जला हुआ था।

मुस्लिम आलिम के गिरफ्तार होने पर मीडिया हाउस ने इसे हिन्दू स्पिन देने के लिए मुस्लिम आलिम की जगह ‘तांत्रिक’ लिखा। NDTV, India Today, The Tribune और कई अन्य  मीडिया हाउसों ने PTI द्वारा प्रकाशित की गई उस खबर को आगे फैलाया। जिसमें लिखा गया था कि तांत्रिक द्वारा पारंपरिक तरीके से इलाज के दौरान पश्चिम बंगाल में 10 साल के बच्चे की मौत हो गई।

NDTV की हेडलाइन

बता दें कि तांत्रिक से मतलब तंत्र विद्या अभ्यास करने से जुड़ा है। ये मुख्य रूप से हिन्दू धर्म से जुड़ा हुआ है। मीडिया द्वारा की गई रिपोर्ट से ये संदेश जा रहा है कि अपराध हिन्दू व्यक्ति द्वारा किया गया था। जबकि ये अपराध मुस्लिम आलिम द्वारा किया गया था। पीटीआई की रिपोर्ट में हेडलाइन के बारे में स्पष्ट हिंदू शब्द दिया गया है और मुस्लिम आलिम को ‘तांत्रिक’ कहा गया है। इसके बाद कई मीडिया हाउसों ने इस हेडलाइन में बिना कोई बदलाव किए शब्दशः इस्तेमाल किया।

India Today की खबर

इंडिया टुडे ने इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ते हुए खबर की हेडलाइन में ऐसा फीचर इमेज लगाया, जो कि हिन्दू रीति रिवाज की तरह दिखता है। इसमें सिंदूर, फूल और कलावा को प्रदर्शित किया गया है। इसके माध्यम से उसने ये दिखाने की कोशिश की कि ये हिन्दू द्वारा किया गया।

गौरतलब है कि इससे पहले भी इस तरह के आलिमों को बचाने की काफी कोशिश की जा चुकी है। द हिन्दू की एक रिपोर्ट के अनुसार एक महिला ने अजमेर में एक “तांत्रिक” पर दरगाह में नमाज़ अदा करने के बहाने ले जाने के बाद उसके साथ बलात्कार करने का आरोप लगाया था। उसी महीने, टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक लेख प्रकाशित किया था, जिसका शीर्षक था, “तांत्रिक को बलात्कार और जबरन वसूली के लिए 10 साल की जेल” इसमें आरोपित का नाम वारसी था।

यहाँ तक कि वर्नाक्यूलर मीडिया को भी उसी ट्रिक का इस्तेमाल करते हुए पकड़ा गया है। दैनिक जागरण ने किसी कारण से एक उत्पीड़न मामले में आरोपित को हेडलाइन में  “तांत्रिक सूफी बाबा” के रूप में प्रदर्शित किया। हालाँकि, उसके कंटेंट में आरोपित का नाम आफताब बताया गया था। इसी तरह Hindi News18 ने अपने लेख में लिखा, “भूत भगाने के बहाने नाबालिग के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में तांत्रिक गिरफ्तार।” बाद में तांत्रिक की पहचान हाफिज साजिद के रूप में हुई थी।

हिंदू नहीं जाएँगे देश से बाहर, अब कोई रामनवमी पर रोक लगाकर दिखाए: अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार (अक्टूबर 1, 2019) को कोलकाता में एक जनसभा को सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि एनआरसी से हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई शरणार्थियों को डरने की ज़रूरत नहीं है। एनआरसी से नागरिकता संशोधन विधेयक आएगा, जो यह सुनिश्चित करेगा कि इन लोगों को भारत की नागरिकता मिले। शाह ने लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जिताने के लिए बंगाल की जनता का आभार भी व्यक्त किया।

भाजपा अध्यक्ष ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बंगाल का महान सबूत बताते हुए याद दिलाया कि किस तरह जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार किया, जिसके बाद संदेहास्पद स्थिति में उनकी मृत्यु हो गई। शाह ने कॉन्ग्रेस को चेतावनी देते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस समझती थी कि मामला ख़त्म हो गया लेकिन उनको मालूम नहीं है कि हम जनसंघ और भाजपा वाले जिसको पकड़ते हैं, उसको छोड़ते नहीं हैं।” शाह ने लोगों को याद दिलाया कि आज़ादी के वक़्त जब पूरा का पूरा बंगाल पाकिस्तान के अंदर जाने वाला था, तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंग-भंग करा कर पश्चिम बंगाल की रचना की भी।

उन्होंने ममता बनर्जी के उस बयान का जवाब दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि एनआरसी लागू होने के बाद लाखों हिन्दू शरणार्थियों को बाहर जाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि वह यहाँ विशेषकर हिन्दू शरणार्थियों को आश्वस्त करने आए हैं, क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है। शाह ने कहा कि किसी भी हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख और ईसाई शरणार्थी को देश छोड़ने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि बंगाल में वामपंथियों के शासन के दौरान घुसपैठिए उन्हें वोट देते थे और तब विपक्षी नेता रहीं ममता बनर्जी उन्हें बाहर निकालने की बात करती थीं।

शाह ने कहा कि किसी भी शरणार्थी को जाने नहीं देंगे और किसी भी घुसपैठिए को रहने नहीं देंगे। उन्होंने ममता बनर्जी को चेतावनी देते हुए कहा कि वह बंगाल में दुर्गा पूजा में भाग लेने आए हैं लेकिन किसी की हिम्मत नहीं है कि दुर्गा पूजा को रोक ले क्योंकि अब पहले जैसे हालात नहीं हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा को 18 सीटें देने का कमाल है कि आज किसी की वसंत पंचमी, रामनवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर प्रतिबन्ध लगाने की हिम्मत नहीं रही। उन्होंने भ्रष्टाचार पर बात करते हुए कहा:

“ममता बनर्जी बंगाल में आयुष्मान भारत योजना नहीं पहुँचने दे रही हैं। ग़रीबों का इलाज नहीं हो पा रहा है। मेरा ममता और तृणमूल को चुनौती है, आप जितना रोकना चाहो रोक लो, बंगाल में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमें जीत मिलेगी। अगर उनकी लोकप्रियता देखना हो तो ‘हाउडी मोदी’ का वीडियो देख लीजिए, विदेशों में भी उनकी कितनी प्रसिद्धि है। उन्होंने आज तक एक भी दिन की छुट्टी नहीं ली है। हमारा कार्यकर्ता एक-एक शरणार्थी के घर जाकर समझाएगा कि उनके साथ कुछ बुरा नहीं होने वाला।”

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कोलकाता में एनआरसी को लेकर स्थिति स्पष्ट की

भाजपा अध्यक्ष ने इस दौरान कार्यकर्ताओं से कहा कि वे सभी एक-एक घुसपैठियों को निकाल बाहर करने का संकल्प दोहराएँ। बता दें कि बंगाल में दुर्गा पूजा को लेकर सीएम ममता अचानक से सक्रिय हो उठी हैं और पंडाल-पंडाल घूम कर उद्घाटन कर रही हैं। बंगाल के एक मंत्री का तो दावा है कि उन्हें 30,000 दुर्गा पूजा महोत्सवों से निमंत्रण आए हैं और उनमें से 75 का उद्घाटन वह ख़ुद अपने हाथों से करेंगी।