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नारदा स्टिंग ऑपरेशन: तृणमूल सांसद ने मैथ्यू सैमुएल से पैसे लेने की बात कबूली

तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद काकोली घोष दास्तीदार ने मीडिया से बातचीत में नारदा न्यूज़ पोर्टल के प्रमुख मैथ्यू सैमुएल से पैसे लेने की बात स्वीकार की है। उन्होंने इसे राजनीतिक चंदा करार देते हुए अपने पास उसकी रसीदें भी होने की बात कही है। उन्होंने दावा किया कि निर्वाचन आयोग को भी इस बात की जानकारी है।

2014 में किए गए स्टिंग में नारदा के प्रमुख मैथ्यू सैमुएल ने एक बिज़नेसमैन के भेष में तृणमूल नेताओं और मंत्रियों से सम्पर्क किया था और बदले में नकद की पेशकश की थी। 2016 विधानसभा चुनावों के ठीक पहले जारी फुटेज में बशीरहाट की सांसद दास्तीदार को भी सैमुएल से पैसे लेते देखा गया था।

लेकिन आज तक के अनुसार दास्तीदार ने इसे ‘रिश्वत’ मानने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि उन्होंने सैमुएल से जो धनराशि ली, वह तो चंदा था, जिसकी उनके पास रसीदें भी हैं। उन्होंने कहा, “सभी राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए पैसा लेते हैं। मैंने भी चुनाव लड़ने के लिए पैसा लिया और निर्वाचन आयोग को इसकी सूचना भी दी।”

सांसदों और पश्चिम बंगाल राज्य सरकार के मंत्रियों समेत चोटी के 12 तृणमूल कॉन्ग्रेस नेताओं पर आपराधिक षड्यंत्र की FIR करने के बाद सीबीआई अब तृणमूल नेताओं की आवाज़ के नमूने इकट्ठे कर रही है। इसे सैमुएल के वीडियो से मिला कर उनके दावों की जाँच की जाएगी। पिछले दो हफ्तों में CBI की भ्रष्टाचार-रोधी विंग ने सुब्रत मुखर्जी, सौगात रॉय, मदन मित्रा आदि की आवाज़ों के नमूने लिए हैं। 12 सितंबर को दास्तीदार की आवाज़ का नमूना भी लिया गया था। FIR रिश्वत और आपराधिक कदाचार रोकने के लिए बने भ्रष्टाचार-विरोधी अधिनियम के प्रावधानों में दर्ज की गई है।

26 सितंबर को इसी मामले में आईपीएस अधिकारी एसएमएच मिर्ज़ा गिरफ्तार किए गए थे। मिर्ज़ा स्टिंग ऑपरेशन के समय पश्चिम बंगाल के बर्दवान में एसपी थे। उन पर कथित तौर पर तृणमूल नेताओं के मध्यस्थ के तौर पर रिश्वत लेने का आरोप है।

सीबीआई ने पिछले महीने इस मामले में दास्तीदार के अलावा दो और सांसदों सौगात रॉय और प्रसून बनर्जी पर मुकदमा चलाने की इजाज़त के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला से इजाजत माँगी थी। इसके अलावा पूर्व सांसद एवं वर्तमान में राज्य सरकार के मंत्री सुवेंदु अधिकारी भी एजेंसी के रडार पर हैं। अगर ज़रूरी अनुमति मिल जाती है, तो चारों का नाम आरोप-पत्र में मिल सकता है।

कपिल सिब्बल और ‘पत्रकारों को Bitch कहने वाली’ उनकी पत्नी कोर्ट में तलब, बरखा दत्त ने किया है केस

पत्रकार बरखा दत्त ने तिरंगा टीवी के प्रमोटर्स कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल और उनकी पत्नी प्रोमिला सिब्बल के ख़िलाफ़ सिविल सूट दायर किया है। इस मामले में दोनों पति-पत्नी को समन जारी किया गया है। बरखा दत्त की तरफ से पटियाला हाउस कोर्ट में वकील राघव अवस्थी पेश हुए। उन्होंने सिब्बल दम्पति को समन जारी किए जाने का स्वागत किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह तो बस एक शुरुआत है और आगे इस केस में उन्हें और भी सफलता मिलने वाली है। अवस्थी ने एक ट्वीट के माध्यम से यह जानकारी साझा की।

बरखा दत्त ने कहा कि यह सिद्धांतों की लड़ाई है। उन्होंने वकील राघव अवस्थी को धन्यवाद दिया और कहा कि अब गेंद कोर्ट के पाले में है। इससे पहले बरखा दत्त ने तिरंगा टीवी पर आरोप लगाया था कि तिरंगा टीवी के सभी कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व-सूचना के और बिना कम्पनशेटरी सैलरी दिए निकाल बाहर किया गया।

बरखा दत्त ने पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल को निशाना बनाते हुए लिखा था कि वे और उनकी पत्नी द्वारा चलाए जा रहे तिरंगा टीवी में भयावह स्थिति है। उन्होंने बताया था कि चैनल द्वारा 200 से ज्यादा कर्मचारियों को बिना 6 महीने की सैलरी दिए निकाल दिया गया है। उनका कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल को लेकर कहना था कि एक व्यक्ति जो जनता के बीच में खुद को बिलकुल साफ़ दिखाता है, वो पत्रकारों के साथ घिनौना बर्ताव कर रहा है।

कपिल सिब्बल की पत्नी के रवैए को बरखा ने आधार बनाकर कहा था कि मीट फैक्टरी चलाने वाली प्रोमिला सिब्बल तिरंगा TV के ऑफिस में चिल्लाकर कहती थीं कि उन्होंने मजदूरों को एक पैसा दिए बिना फैक्टरी बंद कर दी थी तो ये पत्रकार कौन होते हैं 6 महीने की सैलरी माँगने वाले! बरखा ने आरोप लगाया था कि कपिल सिब्बल की पत्नी महिला कर्मचारियों को “बिच (Bitch या कुतिया)” कह कर बुलाती थीं।

नाम: गुलालाई इस्माइल, उम्र: 32 साल: पाकिस्तानी फौज से बचीं, अब दुनिया को दिखा रहीं उसका बर्बर चेहरा

गुलालाई इस्माइल पाकिस्तानी फौज की प्रताड़ना को झेल रहे लोगों की नई उम्मीद हैं। जिस वक्त संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कश्मीर राग अलाप रहे थे, उसी वक्त 32 साल की गुलालाई दुनिया को पाकिस्तानी सेना के बर्बर चेहरे से रूबरू करा रहीं थी।

कुछ समय पहले तक महिला अधिकार कार्यकर्ता गुलालाई के पीछे पाकिस्तानी सेना और पूरा प्रशासन पड़ा था। किसी तरह जान बचाकर वह न्यूयॉर्क पहुॅंचने में कामयाब हुईं। न्यूयॉर्क आए उन्हें महज़ एक महीने हुआ है और वे दोबारा पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने न्यूयॉर्क की सड़कों पर हैं।

शुक्रवार सुबह (भारतीय समयानुसार शुक्रवार शाम, 27 सितंबर) से वे अमेरिका के लोगों को पाकिस्तान की करतूतों और पश्तूनों पर उसके ज़ुल्म की कहानियाँ घूम-घूम कर सुना रहीं हैं। उन्होंने शहर के संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पर भी महासभा में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के भाषण के समय विरोध प्रदर्शन किया।

गुलालाई इस्माइल पर पाकिस्तान देशद्रोह का मुकदमा चलाने की तैयारी कर रहा था। वह भी इसलिए कि वे पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा देश के अंदर किए जा रहे बलात्कार की खबरें उजागर कर रहीं थीं। इस साल मई में उन्होंने फेसबुक और ट्विटर पर पाकिस्तानी सेना पर पाकिस्तानी महिलाओं के बलात्कार का आरोप लगाया।

32-वर्षीया गुलालाई फ़िलहाल न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में अपनी बहन के साथ रह रहीं हैं और आधिकारिक राजनीतिक शरण के लिए अमेरिकी विदेश विभाग के पास अर्ज़ी दाखिल कर दी है। उन्होंने ANI से बात करते हुए अपने परिवार और पाकिस्तान छोड़ने में सहायता करने वाले “अंडरग्राउंड नेटवर्क” के लोगों की सुरक्षा के लिए भी चिंता जताई। उन्होंने कहा, “मेरी आवाज़ दबाने और मुझे टॉर्चर करने के लिए पाकिस्तानी सरकार ने हर हथकंडा अपनाया। मेरे परिवार को भी मेरा विरोध करने के लिए धमकाया, लेकिन वे नहीं माने। अंत में उन्होंने मेरे माता-पिता पर झूठे आरोप मढ़ दिए।”

कुछ दिन पहले मशाल रेडियो के अफगान पत्रकार बशीर अहमद ग्वाख को बताया कि वे 6 महीने तक पाकिस्तान के अंदर ही छिपते-छिपाते रहीं और उसके बाद अमेरिका आने के लिए उन्हें पहले श्रीलंका जाना पड़ा।

‘जिहाद मिटा रहे थे या पश्तून?’

मीडिया से बाते करते हुए गुलालाई इस्माइल ने बताया कि जिहादी आतंकवाद से निबटने, उसे मिटाने के नाम पर पाकिस्तान (यानी पाकिस्तानी पंजाबी मुस्लिम) अल्पसंख्यक पश्तूनों की सामूहिक हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं। उनके साथ UN के बाहर इस विरोध-प्रदर्शन में पाकिस्तान के अन्य अल्पसंख्यक समुदाय जैसे सिंधी, बलूची, अन्य पश्तून, मुहाजिर (मध्य भारत से विभाजन के समय पाकिस्तान गए मुख्यतः हिन्दीभाषी प्रवासी) भी शामिल थे। प्रदर्शनकारी “पाकिस्तान को ब्लैंक चेक (यानी बिना शर्त आर्थिक सहायता) अब और नहीं”, “पाकिस्तानी सेना, राजनीति में हस्तक्षेप बंद करो” आदि नारे लगा रहे थे।

गुलालाई इस्माइल का कहना है कि आतंकवाद मिटाने के नाम पर पाकिस्तानी सेना बेगुनाह पश्तूनियों का क़त्ल कर रही है। पाकिस्तानी सेना के टॉर्चर सेलों और नज़रबंदी कैम्पों में हज़ारों लोग बंदी हैं। उन्होंने पाकिस्तानी सेना द्वारा मानवाधिकारों (“इंसानी हुकूक”) का हनन तुरंत बंद करने और बंदियों को रिहा करने की माँग की। साथ आरोप लगाया कि पाकिस्तानी सेना और अन्य उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को ही दहशतगर्दी का ख़िताब दे दिया जाता है। पाकिस्तानी सेना की खैबर पख्तूनख्वा में तानाशाही चलती है।

ISI के इशारे पर पासपोर्ट जब्त

16 साल की उम्र से पाकिस्तानी महिलाओं के मानवाधिकारों के लिए लड़ रहीं इस्माइल के लिए ISI ने पिछले नवंबर में गृह मंत्रालय से अनुशंसा की थी कि उनका नाम Exit Control List (ECL) में डाल दिया जाए, ताकि वे देश छोड़कर न जा सकें। हालाँकि अदालत में चुनौती दिए जाने पर अदालत ने ECL से तो इस्माइल का नाम हटवा दिया, लेकिन उनका पासपोर्ट गृह मंत्रालय ने जब्त कर लिया।

गुलालाई इस्माइल पश्तून नेता मंज़ूर पश्तीन द्वारा चलाए जा रहे पश्तून आंदोलन का भी हिस्सा हैं। पाकिस्तानी सेना ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं, लेकिन असफ़ल रही। इस्माइल का कहना है कि अमेरिका में पश्तूनों के बारे में बहुत सी भ्रांतियाँ फैली हुईं हैं। उन्हें दूर करते हुए वे दुनिया को बताएँगी कि कैसे पश्तून खुद एक युद्ध के पीड़ित हैं।

कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की बीवी को अग्रिम ज़मानत नहीं: दिव्यांगों की रकम हड़पने का मामला

कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की बीबी लुईस खुर्शीद की मुश्किलें बढ़ सकती है। उनकी संस्था पर गड़बड़ी के आरोप में चल रहे मुक़दमे में उनकी ज़मानत याचिका स्थानीय अदालत ने ख़ारिज कर दी है। शुक्रवार (27 सितंबर) को ज़मानत याचिका एडीजे कोर्ट में दाखिल की गई थी। इसमें सलमान खुर्शीद की बीवी के वकील हाज़िर हुए थे। साथ ही लुईस की तरफ़ से बचाव के लिए बाहर से आए दो अधिवक्ता भी मौजूद थे।

यह मामला 2009 में सामने आया था। तत्कालीन प्रदेश सरकार से डॉक्टर ज़ाकिर अली मेमोरियल ट्रस्ट को 71 लाख रुपए के उपकरण दिव्यांग जनों को बांटने के लिए दिए गए थे। मुरादाबाद में भी संस्था को कैंप लगाकर दिव्यांगों को ट्राईसाइकिल आदि बांटने के लिए ढाई लाख रुपए मिले थे। आरोप है कि संस्था ने उपकरण नहीं बांटकर सरकारी रकम हड़प ली। इस मामले में FIR तो दर्ज हुई, लेकिन मामले की पूरी हक़ीकत 2017 के बाद सामने आई।

शुक्रवार को कोर्ट में लुईस खुर्शीद और संस्था के मैनेजर फारूकी की ओर से राहत के लिए अग्रिम ज़मानत याचिका दाखिल की गई। शुक्रवार को ज़िला जज शशिकांत शुक्ला ने कोर्ट में ज़मानत याचिका दी। लेकिन, कोर्ट ने वो याचिका एडीजे (पाँच) अनिल कुमार की कोर्ट में ट्रांसफर कर दी।

स्थानीय अधिवक्ता इमरान आदि ने तर्क दिए पर कोर्ट ने अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया। कॉन्ग्रेस से जुड़े नेता अधिवक्ता इमरान का कहना है कि मुरादाबाद में उपकरण बांटे गए थे, इस बात के गवाह ज़िला विकलांग अधिकारी भी हैं। जबकि दिव्यांगों को उपकरण के बांटने में दर्ज FIR में लुईस खुर्शीद का नाम नहीं था, पर बाद में तफ़्तीश के दौरान उनका नाम जोड़ा गया। शुक्रवार को अग्रिम ज़मानत याचिका रद्द होने के बाद उन्होंने कहा कि अब वो हाईकोर्ट जाएँगे।

₹25000 करोड़ के बैंक घोटाले में फॅंसे अजित पवार हुए इमोशनल, राजनीति से संन्यास के दावों पर नहीं तोड़ी चुप्पी

महाराष्ट्र के महत्वपूर्ण सियासी परिवार का राजनीतिक ड्रामा हर बीतते पल के साथ नया मोड़ ले रहा है। अपने इस्तीफे पर रहस्यमयी चुप्पी साधने वाले अजित पवार शनिवार को आखिरकार मीडिया के सामने आए। विधायक पद से इस्तीफा देने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता से माफ़ी माँगी।

महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री ने कहा कि उन्होंने अपने अंतःकरण की आवाज़ सुन कर इस्तीफा दिया है, क्योंकि उनके चाचा शरद पवार का नाम इस घोटाले में घसीटा जा रहा है। बता दें कि 25,000 करोड़ रुपए के घोटाले में ईडी ने शरद और अजित के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

अजित पवार ने परिवार में किसी तरह का टकराव होने की बात से इनकार कर दिया। महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन ने आरोप लगाया था कि पवार परिवार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और इसीलिए अजित पवार ने इस्तीफा दे दिया है। उनका मानना था कि अजित इसीलिए नाराज़ हैं, क्योंकि उनकी पार्टी शरद पवार को बचाने के लिए तो आगे आई है लेकिन उनके लिए किसी नेता ने आवाज़ नहीं उठाई। हालाँकि, अब अजित ने इन आरोपों से इनकार किया है। हॉलांकि राजनीति से संन्यास लेने के दावों को लेकर उन्होंने स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अजित पवार इमोशनल हो गए। उन्होंने कहा कि उनके चाचा शरद पवार का महाराष्ट्र कोऑपरेटिव घोटाले से दूर-दूर तक कुछ लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि बैंक या चीनी मिल से सम्बंधित किसी भी लेन-देन से शरद पवार का कोई नाता नहीं है। उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई कि इस मामले में 78 वर्षीय शरद पवार का नाम मीडिया में घूम रहा है। अजित पवार ने कहा:

“शरद पवार के कारण ही मैं उप-मुख्यमंत्री के पद तक पहुँचा। आज मेरे कारण इस उम्र में उनकी बदनामी हो रही है। मैं इस बात से क्षुब्ध हूँ। अगर मेरे क्रियाकलापों से पार्टी कार्यकर्ताओं को ठेस पहुँची है तो मैं इसके लिए उनसे माफ़ी माँगता हूँ। जहाँ तक घोटाले की बात है तो कई पार्टियों के नेता कोऑपरेटिव बैंक के बोर्ड के सदस्य थे और क़र्ज़ देने या फिर इससे सम्बंधित कोई भी निर्णय उन सब की सहमति के बाद ही लिया गया।”

उन्होंने पूछा कि बैंक के पास जब 12,000 करोड़ से ज्यादा का डिपॉजिट ही नहीं था तो 25,000 करोड़ रुपए के घोटाले होने की बात कहाँ से आ गई? इकनोमिक टाइम्स के सूत्रों के अनुसार, अजित पवार ने शरद पवार से मुलाक़ात करने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की और उस बैठक में शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले भी उपस्थित थीं। इस बैठक में केवल पवार परिवार के सदस्य ही शामिल थे। इससे पहले एनसीपी मुखिया ने कहा था कि उनके ख़िलाफ़ लगे आरोपों से क्षुब्ध होकर अजित ने राजनीति से सन्यास लेने का निर्णय लिया है।

पवार सहित अन्य के ख़िलाफ़ एफआईआर बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद दर्ज किया गया है। शरद पवार महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन थे और अजित पवार भी बोर्ड के सदस्य थे। आरोप है कि बैंक द्वारा चीनी मिलों को क़र्ज़ दिया गया और बाद में जब मिलें ठप्प होने लगीं तो उन्हें आने-पौने दाम में बेच डाला गया। कई अधिकारियों व नेताओं द्वारा इस मामले में अपने सगे-सम्बन्धियों व परिचितों को लाभ पहुँचाने का आरोप है।

साल भर बाद भी सबरीमाला के सवाल बरकरार, आस्था को भौतिकतावादी समाजशास्त्र से बचाने की ज़रूरत

ट्विटर पर आज #SaveOurSabarimala ट्रेंड कर रहा है। एक साल पहले आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में चंद घंटों के भीतर 23,000 से अधिक बार लोगों ने ट्वीट किया। शीर्ष अदालत ने स्वामी अय्यप्पा के मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दी थी। उस समय भी अदालत में फैसले लेते वक्त श्रद्धालुओं की भावना और परंपरा की अनदेखी का आरोप लगा था।

सबसे पहले तो इस मामले का प्रस्तुतिकरण ही गलत तरीके से किया गया। आधी से अधिक समस्या की यही जड़ है। अज्ञान और हिन्दूफ़ोबिया के सम्मिश्रण से सबरीमाला मंदिर में रजस्वला आयु (10-50 वर्ष) की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को महिला-विरोधी, पृथक्करण-कारी (exclusivist and alienating), सामाजिक और समाजशास्त्रीय समस्या (social and sociological problem) के रूप में चित्रित किया गया।

असल में यह कोई ‘समस्या’ थी ही नहीं। यह नियम है मंदिर का, जो आस्था के अनुसार मंदिर के देवता का बनाया हुआ है। ऐसा भी नहीं है कि यह केवल ज़बानी किंवदंती है। ‘भूतनाथ उपाख्यानं’ और ‘तंत्र समुच्चयं’ में बाकायदा इसका लिखित वर्णन है। जिसे मंदिर के देवता का नियम नहीं मानना, मंदिर उसके लिए होता ही नहीं है। मंदिर सार्वजनिक स्थल नहीं होते। यहाँ तक कि वे मंदिर भी, जिन पर सरकारी गुंडई से कब्ज़ा होता है। मंदिर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आध्यात्मिक पवित्रता के स्रोत होते हैं।

सबरीमाला मंदिर की परम्परा महिलाओं के विरुद्ध भेदभावकारी भी नहीं थी। यदि ऐसा होता तो सभी महिलाएँ प्रतिबंधित होतीं। लेकिन ऐसा नहीं था। केवल एक आयु विशेष की महिलाएँ अपने अंदर मौजूद ‘रजस’ तत्व के चलते प्रतिबंधित थीं, क्योंकि मंदिर के देवता की अपनी तपस्या का सामंजस्य उस राजसिक तत्व के साथ नहीं बैठता।

आस्था, समाजशास्त्र और कानून

आस्था नितांत निजी विषय है। सार्वजनिक जीवन और समाज जिस तर्क और भौतिक नियम से चालित होते हैं (और होने भी चाहिए), उनसे आस्था समेत निजी विषयों के नियम-कानून नहीं बन सकते। नियम सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए होते हैं जो समाज और सार्वजनिक क्षेत्र में लागू होते हैं।

समाज और तर्क किसी स्त्री या पुरुष को यह नहीं बता सकते हैं कि किसके साथ सेक्स करना चाहिए। अपने घर में किसके सामने कैसे कपड़े पहने। इसी तरह निजी जमीन पर बने मंदिर जिनके निर्माण में सरकारी पैसा नहीं लगा हो उसे भी यह नहीं बताया जा सकता कि वह किसी प्रवेश दे और किसे नहीं। खासकर, जब किसी का प्रवेश उस मंदिर के प्रयोजन के साथ असंगत हो। जबर्दस्ती सरकारी नियंत्रण के बावजूद मंदिरों की धार्मिक प्रथाओं को हॉंका नहीं जा सकता।

कानून भी चूँकि समाज और तर्क के आधार पर बनते हैं तो यह लाजमी है कि उनका अधिकार क्षेत्र सार्वजनिक जीवन तक न हो। निजी जीवन में जैसे सरकारी अधिकारियों को यह ताक-झाँक करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि कौन अपने बेडरूम में क्या कर रहा है, उसी तरह कानून किसी मंदिर में घुसकर यह नहीं बता सकता है कि पूजा कैसे होनी चाहिए, किसे करनी चाहिए।

मंदिरों ने समाज-सुधार का ठेका नहीं लिया है

एक तर्क यह दिया जाता है कि भले ही यह सब बातें सही हों, लेकिन समाज में महिलाओं की बुरी स्थिति को देखते हुए मंदिरों को ‘उदाहरण’ बनना चाहिए। यह एक बार फिर भौतिकतवादी समाजशास्त्र की राय है, जिसका मंदिर, आस्था और धर्म के क्षेत्र में कोई काम नहीं है।

सबसे पहली बात तो यह राय मंदिर के ‘क्षेत्र’ को हुए नुकसान को तुला के दुसरे पलड़े पर रख कर तुलना नहीं करती, क्योंकि उसके लिए महिलाओं के प्रवेश से होने वाला नुकसान ‘असल में’ अस्तित्व में ही नहीं है- यह, भौतिकतावादी गणित के हिसाब से, आभासी (imaginary) नुकसान है, जबकि ‘महिला वहाँ गई जहाँ जाना कल तक वर्जित था’ से हुआ फायदा निस्संदेह शून्य से तो अधिक ही है।

लेकिन यह गणित ही गलत है। आध्यात्मिक क्षति, ‘क्षेत्र’ की पवित्रता की हानि बिलकुल असली हैं- भले ही भौतिक रूप से उनकी गणना नहीं हो सकती।

दूसरी बात, यदि इस आध्यात्मिक क्षति को असली मान लें, और तुला के पलड़े पर रख कर तुलना महिलाओं को होने वाले संभावित सामाजिक लाभ से करें, तो फिर से यह सवाल बन सकता है कि क्या मंदिर को यह नुकसान उठाना चाहिए। तो यहाँ सवाल आएगा, “क्यों? क्या महिलाओं को सामाजिक रूप से सबरीमाला मंदिर ने गिराया है? क्या इसमें अय्यप्पा स्वामी का हाथ है? अगर है तो इसे साबित करिए। अगर नहीं, तो लाभ किसी और को होना है और उसकी कीमत कोई और क्यों चुकाए? वह भी उन महिलाओं के लिए, जिनकी अय्यप्पा में, सबरीमाला में आस्था ही नहीं है- क्योंकि अगर आस्था होती, तो वे शास्त्रों में उल्लिखित देवता की आस्था और मंदिर के नियम का उल्लंघन न करतीं।

समाज सुधार के, महिला सशक्तिकरण के और भी रास्ते हैं। मंदिर और देवता को ही बलि का बकरा क्यों बनाना? वह भी तब, जब पहले ही सरकारी नियंत्रण में बँधे और अपना खजाना सरकारों को देने को मजबूर इकलौते पंथ/मज़हब/आस्था के रूप में मंदिर ‘Disadvantaged’ स्थिति में हैं।

आगे क्या होना चाहिए

इसका कोई लघुकालिक उपाय नहीं है- कोई पार्टी, सरकार, अदालत या संविधान हिन्दुओं के पक्ष में प्रतिबद्ध नहीं हैं। इसलिए इसका उपाय केवल दीर्घकालिक संघर्ष है- पीढ़ी-दर-पीढ़ी, एक सभ्यता के रूप में, भक्तों के रूप में। जैसे बाबरी मस्जिद बन जाने के बाद भी 500 साल से हिन्दुओं ने राम मंदिर के लिए संघर्ष नहीं छोड़ा, उसकी याद नहीं छोड़ी। वैसे ही चाहे इसे लिखने वाला मैं और पढ़ने वाले आप जीवित रहें या न रहें, यह लौ, सबरीमाला दोबारा पाने की ललक जीवित रखनी होगी। हर पीढ़ी को यह विरासत सौंपनी होगी कि सबरीमाला का संघर्ष उसका भी संघर्ष है। सबरीमाला पर हमला उस पर भी हमला है, उसे भी क़ानूनी रूप से दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जाना और उसकी आस्था को महत्वहीन घोषित किया जाना है।

इस हर जगह भौतिकतावादी समाजशास्त्र को इकलौते चश्मे के रूप में ‘घुसेड़ने’ की वृत्ति को भी रोकना होगा। यह रोक लगेगी शिक्षा व्यवस्था में हिंदू पक्ष, हिन्दू नज़रिए को उतनी ही वैधता के साथ प्रतिनिधित्व दिए जाने से, जैसा नास्तिक/अनीश्वरवादी या ईसाई या मुस्लिम नज़रिए को मिलता है। अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों को बचपन से केवल और केवल “सारी आस्थाएँ/पंथ/उपासना पद्धतियाँ (क्योंकि गैर-हिन्दू पंथों में ‘धर्म’ की धारणा ही नहीं है) एक ही होतीं हैं”, “राम और अल्लाह एक ही चीज़ हैं”, “जो भी वैज्ञानिक नहीं है, वह न केवल गलत है, बल्कि दूसरों को उस ‘गलत’ से (चाहे जबरन ही) ‘मुक्ति’ दिलाना तुम्हारा ‘कर्त्तव्य’ है” ही पढ़ाया जाएगा, तो 50-55 की उम्र में जस्टिस बनने के बाद ऐसा मामला अपनी अदालत में आने पर 2-3 हफ़्ते में हिन्दू धर्म की गूढ़ता और सूक्ष्मता, हर कर्म-कांड और प्रथा का पूर्व पक्ष समझना ज़ाहिर तौर पर असम्भव होगा।

ऐसी सबको एक ही डाँड़ी से हाँकने वाली, एक ही ‘वैज्ञानिकता और भौतिकतावादी तार्किकता” के बुलडोजर से सब कुछ समतल कर देने की इच्छा रखने वाली शिक्षा से पढ़े लोग तो कल को “मंदिर की ज़रूरत ही क्या है? क्या घर में पूजा नहीं हो सकती? सोचो ‘समाज की भलाई’ के लिए कितना सारा धन और ज़मीन मिल जाएगा!” का फ़ैसला न लिख दें, वही गनीमत होगी।

नेहरू की आँखों में आँसू लाने वाली लता मंगेशकर का ‘भारत रत्न’ क्यों छीनना चाहती थी कॉन्ग्रेस?

आज स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्मदिन है। 1929 में 28 सितंबर को उनका जन्म हुआ था। इस मौके पर आम से लेकर खास तक उन्हें बधाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया में आमजन उनके गाए गाने शेयर कर रहे। जन्मदिन की बधाई देते हुए उन्हें लोग भारत का गर्व बता रहे। लेकिन, एक ऐसा वाकया भी है जो कॉन्ग्रेस कभी याद नहीं करना चाहेगी। पार्टी ने उन्हें दिए गए ‘भारत रत्न’ अवॉर्ड छीनने की माँग की थी।

हम सब को पता है कि किस तरह लता मंगेशकर से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक प्रभावित थे। वो जनवरी 27, 1963 का दिन था। जगह था दिल्ली का नेशनल स्टेडियम (मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम)। तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन भी वहाँ पर मौजूद थे। हालाँकि, लता ने पहले परफॉर्म करने से मना कर दिया था लेकिन कवि प्रदीप के कहने पर उन्होंने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। लता मंगेशकर ने जब ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाना शुरू किया, तब नेहरू की आँखों में आँसू आ गए। नेहरू ने कहा कि जो इस गाने से प्रभावित और प्रेरित नहीं हो, उसे हिंदुस्तानी कहलाने का कोई हक़ नहीं है।

लता मंगेशकर को 1969 में इंदिरा गाँधी की सरकार ने पद्म भूषण से नवाजा। उन्हें 1989 में दादासाहब फाल्के अवॉर्ड देने की घोषणा की गई। हालाँकि, यह अवॉर्ड उन्हें 1990 में मिला। फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण और भारत रत्न से नवाजा। सार यह कि कॉन्ग्रेस और भाजपा, दोनों की ही सरकारों के दौरान उन्हें अवॉर्ड्स मिले और नेहरू ने उनकी प्रशंसा भी की थी। इन सबके बावजूद 2013 में एक ऐसा लम्हा आया, जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने लता मंगेशकर को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

लता मंगेशकर ने बस अपने विचार जाहिर किए थे। उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। जनार्दन चांदुरकर उस समय मुंबई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष थे। उन्होंने तत्काल केंद्र सरकार से माँग कर दी कि लता मंगेशकर को दिया गया ‘भारत रत्न’ अवॉर्ड छीन लेना चाहिए। लता मंगेशकर ने कहा था कि सभी की इच्छा है कि नरेंद्र मोदी पीएम बनें और वह ईश्वर से इसके लिए प्रार्थना करती हैं। उन्होंने दीनानाथ मंगेशकर हॉस्पिटल के उद्घाटन के मौके पर ऐसा कहा था। उस समय मोदी भी वहाँ पर मौजूद थे।

मुंबई कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष ने न सिर्फ़ लता मंगेशकर बल्कि उन सभी लोगों को दिए गए सरकारी मेडल्स और अवॉर्ड्स छीन लेने की बात कही थी, जो मोदी की प्रशंसा करते हैं या उनके साथ मंच साझा करते हैं। उन्होंने इसके लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखने की बात भी कही थी। उस समय मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र में यूपीए की सरकार थी और सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस की सर्वेसर्वा थीं। जनार्दन ने बाद में सफ़ाई देते हुए कहा था कि उन्होंने लता के लिए ये बात नहीं कही थी बल्कि समाज के ऐसे लोगों के लिए कही है, जो सरकार से अवॉर्ड लेकर सांप्रदायिक ताक़तों का समर्थन करते हैं।

हनी ट्रैप: बरखा ने लगाए थे कॉन्ग्रेस मुख्यालय के कई चक्कर, पुलिस को मिले ब्लैकमेलिंग के 90 वीडियो

मध्य प्रदेश का हनीट्रैप कांड सुर्ख़ियों में छाया हुआ है। इस मामले में आए दिन नए ख़ुलासे हो रहे हैं। ताज़ा समाचार के तहत इस मामले में कॉलेज छात्राओं के इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आ रही है। हनी ट्रैप रैकेट की मुख्य आरोपित श्वेता जैन ने पूछताछ के दौरान SIT को बताया कि मध्यवर्गीय परिवार से आने वाली 20 से अधिक छात्राओं को ऑफ़िसर्स के पास भेजा गया।

श्वेता ने यह भी बताया कि हनी ट्रैप का मुख्य उद्देश्य सरकारी ठेके, एनजीओ को फंडिंग करवाना और हाई प्रोफ़ाइल लोगों को अपने जाल में फँसाना था। श्वेता ने बताया कि उसने कई बड़ी कंपनियों को ठेके दिलवाने में मदद की। श्वेता के इस काम में उसकी साथी आरती दयाल ने अहम भूमिका निभाई। 

इसके अलावा, श्वेता की एक और सहेली बरखा सोनी का नाम सामने आया है जो सेक्स रैकेट के रुपए को सुरक्षित रखने के लिए समर्थ समाज सेवा संस्थान समिति नाम की एनजीओ चलाती थी। बरखा सोनी नई दिल्ली में कॉन्ग्रेस मुख्यालय के बार-बार चक्कर लगाती थी और इस बात का सबूत उसकी फेसबुक वॉल को देखकर लग जाएगा, जो कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रमुख चेहरों के साथ ली गई तस्वीरों से भरी हुई है।

एमपी पुलिस की विशेष जाँच टीम (SIT) ने ख़ुलासा किया कि इस साल 19 जनवरी को श्वेता ने एक रियल एस्टेट और निर्माण कंपनी, दीप्तिमंथम एंटरप्राइज प्राइवेट लिमिटेड को बड़ी निर्माण परियोजनाओं में शामिल कराने के लिए लॉन्च की थी। इसके लिए उसे कुछ आईएएस अधिकारियों का संरक्षण भी प्राप्त था। छ: महीने बाद, 26 जुलाई को, उसने सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर हार्डवेयर से संबंधित कॉन्ट्रैक्ट के लिए एक और कंपनी लॉन्च की। आरती दयाल को इस कंपनी का निदेशक नियुक्त किया गया, जबकि श्वेता इस फर्म की प्रबंध निदेशक बन गई।

हाई प्रोफ़ाइल हनी-ट्रैप रैकेट की जाँच के लिए SIT गठित किए जाने के बाद, इस मामले में एक पूर्व कॉन्ग्रेस आईटी सेल के उपाध्यक्ष की पत्नी समेत पाँच महिलाओं को गिरफ़्तार किया गया था।

इससे पहले इस सेक्स रैकेट मामले में भोपाल के कई मीडियाकर्मियों के नाम सामने आए थे, जो दलाली का काम करते थे। मीडियाकर्मियों ने कथित तौर पर पीड़ित नौकरशाहों, मंत्रियों और रैकेट की श्वेता जैन के बीच दलाल के तौर पर सौदे करवाने में मदद की थी। इन मीडियाकर्मियों में एक हिंदी समाचार पत्र के क्षेत्रीय संपादक, एक समाचार चैनल के कैमरामैन और क्षेत्रीय सैटेलाइट चैनल के मालिक का नाम शामिल था।

ग़ौरतलब है कि इस पूरे कांड में जाँच टीम के हाथों एक एक हिट लिस्ट हाथ लगी थी, जिसमें 13 आइएस अधिकारियों के नाम सामने आए थे, जिन्हें लड़कियों ने प्रेम में फँसाया था और उनकी सेक्स वीडियो दिखाकर उनसे पैसे माँगने वाले थे। पुलिस को इस ब्लैकमेल करने वाले गिरोह से अभी तक 90 वीडियो मिल चुके हैं। इनमें सियासत से जुड़े लोगों से लेकर कई ब्यूरोक्रेट्स के चेहरे उजागर हुए। गिरोह में शामिल महिलाओं के पास से 8 सिम कार्ड भी मिले थे।

J&K में सुरक्षा बलों ने मार गिराए 4 आतंकी: भारतीय सेना की वर्दी पहन हमले की फिराक में थे

जम्मू-कश्मीर में शनिवार (सितंबर 28, 2019) की सुबह दो मुठभेड़ और एक ग्रेनेड हमला हुआ। पहली मुठभेड़ रामबन जिले के बोटोट में शुरू हुई जब 5 आतंकवादियों ने जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर आम नागरिकों से भरी एक यात्री बस को रोकने की कोशिश की। ऑपरेशन अभी भी जारी है।

जानकारी के मुताबिक, आतंकवादी भारतीय सैनिकों की पोशाक में थे। आतंकवादियों ने ड्राइवर से बस रोकने के लिए कहा, मगर ड्राइवर पहले से सतर्क था। उसने बस नहीं रोकी और वहाँ से तेज़ी से निकल गया। ड्राइवर ने वहाँ से भाग निकलने के बाद इसकी सूचना निकटतम पुलिस चौकी को दी। इसके बाद सुरक्षा बलों ने इलाके को घेर लिया और तलाशी अभियान शुरू किया।

ताज़ा सूचना के अनुसार, सुरक्षा बलों ने 3 आतंकियों को मार गिराया है। वहीं, एक जवान वीरगति को प्राप्त हुआ है। आतंकियों द्वारा बंधक बनाए गए सभी लोगों को छुड़ा लिया गया है। पुलिस ने अपने बयान में बताया कि रामबन में ऑपरेशन ख़त्म हो चुका है। पूरे ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ा।

इलाके में हो रही भारी बारिश के कारण तलाशी अभियान को चलाने में काफी मुश्किलें आ रही थीं। बताया जा रहा है कि 5 आतंकी ग्रेनेड हमला करने के बाद एक घर में घुसकर लोगों को बंधक बना लिया था और कुछ-कुछ देर पर वो सुरक्षाकर्मियों पर फायरिंग कर रहे थे। सुरक्षाबलों ने उनलोगों का पीछा करते हुए पूरे इलाके को घेर लिया था, ताकि आतंकी सेना से बचकर न निकल पाएँ। सेना ने आतंकवादियों से आत्मसमर्पण करने के लिए कहा। अतिरिक्त क्षति से बचने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा अत्यधिक सावधानी बरती जा रही थी।

दूसरी घटना, जम्मू-कश्मीर के गांदरबल के इलाके में हुई जो कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) के निकट है। सेना के उत्तरी कमांड ने ट्वीट करते हुए बताया कि सुरक्षाबलों के साथ हुए इस मुठभेड़ में एक आतंकवादी को मार गिराया गया। ऐसा अंदेशा जताया जा रहा है कि जिस आतंकवादी को मार गिराया गया, वह एलओसी के रास्ते गुरेज़ की तरफ से भारत में घुसपैठ करने वाले एक बड़े समूह का हिस्सा हो सकता था।

वहीं, तीसरी घटना श्रीनगर की बताई जा रही है। यहाँ आतंकवादियों ने आबादी वाले इलाके में ग्रेनेड फेंका। हालाँकि, इस दौरान किसी के घायल होने की खबर नहीं है, क्योंकि क्षेत्र में वापस से प्रतिबंध लग जाने की वजह से उस समय कम ही लोग सड़कों पर थे। फिलहाल, पुलिस जाँच कर रही है।

भारत और RSS एक, दोनों को अलग-अलग न समझे दुनिया: इमरान के बयान पर संघ का पलटवार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने पाक पीएम इमरान ख़ान के बयान पर पलटवार किया है। इमरान ने संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में संघ को भला-बुरा कहा था और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री शुशील कुमार शिंदे के हवाले से इसे आतंकवादी संगठन तक करार दिया था। ख़ान समय-समय पर हिटलर की तुलना मोदी से करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि संघ की भी वही विचारधारा है, जो नाजियों की थी। इमरान ने यूएनजीए को सम्बोधित करते हुए कहा कि पीएम मोदी आरएसएस के आजीवन सदस्य हैं और संघ मुस्लिमों का ख़ात्मा करना चाहता है।

आरएसएस के सह सरकार्यवाह डॉक्टर कृष्ण गोपाल शर्मा ने इमरान ख़ान के बयान का जवाब देते हुए कहा कि पाक पीएम द्वारा संघ की आलोचना करने का मतलब है कि उन्होंने भारत की आलोचना की है। उन्होंने भारत और आरएसएस को पर्यायवाची करार देते हुए दुनिया को संदेश किया कि दोनों को अलग कर के न देखा जाए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सिर्फ़ भारत के लिए है और दुनिया में कहीं और इसकी कोई भी शाखा नहीं है। उन्होंने कहा कि आरएसएस का अस्तित्व सिर्फ़ भारत में है।

आरएसएस नेता ने पूछा कि आखिर पाकिस्तान संघ से क्यों नाराज़ है? उन्होंने कहा कि अगर पाकिस्तान संघ से नाराज़ है तो इसका सीधा अर्थ है कि वह भारत से नाराज़ है। डॉक्टर कृष्ण गोपाल ने कहा:

“आरएसएस और भारत अब पर्यायवाची हो गए हैं। हम भी यही चाहते थे कि दुनिया इन दोनों को अलग-अलग न समझे बल्कि एक ही समझे। इमरान साहब ने हमारा ये कार्य काफ़ी अच्छे तरीके से किया है। वह बिना कुछ करे-धरे हमारे नाम को दुनिया भर में पहुँचा रहे हैं। दुनिया भर में जो भी आतंकवाद से पीड़ित लोग हैं, उन्हें इस बात का एहसास हो रहा है कि आरएसएस कहीं न कहीं आतंकवाद के विरोध में है। “

आरएसएस नेता ने कहा कि बिना अतिरिक्त मेहनत किए अगर संगठन को इतनी प्रसिद्धि मिल रही है तो यह अच्छी बात है। पाक पीएम के बारे में बोलते हुए डॉक्टर शर्मा ने कहा कि वह भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि इमरान अपनी वाणी को विराम न दें और ऐसे ही लगातार बोलते रहें। संघ के सह सरकार्यवाह ने भारत और आरएसएस के एक होने की बात कही, तब लोगों ने तालियाँ बजा कर उनके बयान का स्वागत किया।

पाकिस्तान के कई नेता आजकल आरएसएस को लेकर कुछ ज्यादा ही मुखर हैं। इमरान ख़ान ने एक के बाद एक कई ट्वीट्स कर के ‘संघ और हिटलर की विचारधारा के बीच समानता’ की बातें की थीं। संघ को लेकर पाकिस्तान के कई मंत्री भी ज़हर उगलते रहे हैं।