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हसीना ने युनूस की आँखों में झोंका मिर्च पाउडर, चाकू से काटा प्राइवेट पार्ट, आपसी कलह से थी परेशान

आंध्र प्रदेश के करनूल जिले में गुरुवार (सितंबर 19, 2019) को एक बेहद ही अजीब घटना देखने को मिली। करनूल के पयनाम विधानसभा क्षेत्र के गडीवेमुला गाँव में हसीना नाम की एक महिला ने पहले अपने 23 वर्षीय शौहर युनूस पर मिर्च पाउडर से हमला किया और फिर उसका प्राइवेट पार्ट काट दिया। जिसके बाद जख्मी युनूस को नंदयाल जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

गडीवेमुला गाँव के सब इंस्पेक्टर एस. चिरंजीवी ने बताया कि यूनुस ने 2 साल पहले 21 साल की हसीना से शादी की थी। कपल ने अपने विवाहित जीवन का पहला साल खुशी से बिताया, लेकिन इसके बाद उन दोनों के बीच में कई मुद्दों को लेकर मतभेद होने लगे। मतभेद बढ़ते देख दोनों अलग हो गए। हसीना अपने मायके आकर रहने लगी।

सब इंस्पेक्टर ने बताया कि यूनुस 2 दिन पहले अपने ससुराल आया और हसीना को साथ ले जाने की बात कही। हसीना के पिता ने मना कर दिया। जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच बहस होने लगी और ये बहस जल्द ही हाथापाई में बदल गई। कथित तौर पर जब यूनुस ने अपने ससुर पर हमला करने की कोशिश की, तो हसीना ने युनूस की आँखों में मिर्च पाउडर झोंक दिया। इससे युनूस दर्द से तिलमिला उठा और उससे बचने की कोशिश करने लगा। इसी बीच, हसीना रसोईघर से चाकू लाकर आई और दर्द से तड़पते युनूस का प्राइवेट पार्ट काट दिया। जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

एस. चिरंजीवी ने कहा, “हालाँकि, हमारे पास इस घटना की जानकारी है, लेकिन दोनों पक्षों में से किसी ने भी अभी तक शिकायत दर्ज कराने के लिए हमसे संपर्क नहीं किया है। मगर हमने घटना के बारे में पूछताछ करने के लिए अपने स्टाफ को अस्पताल भेजा है। यदि आरोपित या पीड़ित में से कोई भी हमारे पास शिकायत दर्ज करेगा, तो हम मामला दर्ज करेंगे।”


6 साल की मासूम के साथ बलात्कार कर हत्या करने वाले मोहम्मद मुश्ताक को मृत्युदंड

ओडिशा के कटक की विशेष POCSO अदालत ने मोहम्मद मुश्ताक को एक 6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या करने के मामले में मृत्युदंड सुनाया है। 26-वर्षीय मुश्ताक ने सालेपुर के जगन्नाथपुर गाँव में पिछले साल इस नृशंस वारदात को अंजाम दिया था। मुश्ताक को जिन प्रावधानों के अंतर्गत मृत्युदंड की सज़ा हुई है, वे पिछले साल POCSO अधिनियम में संशोधन कर जोड़े गए थे। इनके अंतर्गत 12 साल के कम आयु के अवयस्कों के साथ बलात्कार के मामले में मृत्युदंड को जोड़ा गया था

चौथा मृत्युदंड

मीडिया खबरों के अनुसार ओडिशा में केंद्र द्वारा संशोधित पॉस्को अधिनियम के अंतर्गत मृत्युदंड दिए जाने का यह चौथा मामला है। मोहम्मद मुश्ताक को अतिरिक्त जिला और विशेष पॉक्सो जज वंदना कर ने भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302 (हत्या), 363 (अपहरण), 376 A-B (12 वर्ष से कम की महिला के साथ बलात्कार) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी पाया था

स्कूल में मृतप्राय मिली थी

21 अप्रैल, 2018 की शाम को 6-वर्षीया बच्ची सालेपुर के जगन्नाथपुर गाँव के स्कूल में पड़ी मिली थी। वह बेहोश थी और सर, गर्दन, सीने, और गुप्तांग से भारी रक्तस्राव हो रहा था। 8 दिन कोमा में रहने और वेंटिलेटर पर ज़िंदगी के लिए जूझने के बाद उस बच्ची ने दम तोड़ दिया। 29 अप्रैल, 2018 को हृदयघात के बाद SCB मेडिकल कॉलेज में उसकी मृत्यु हो गई।

परिवार को जानता था मुश्ताक

मुश्ताक बच्ची को चॉकलेट दिलाने के बहाने अपने साथ ले गया था। निर्ममतापूर्वक बलात्कार करने के बाद उसने उसके सिर पर वार किया और गला भी घोंट दिया। वह पीड़िता के ही गाँव का रहने वाला और उसके परिवार की जान-पहचान का ही बताया जा रहा है। अपनी करनी छिपाने के लिए वह लड़की के गायब होने की खबर फैलने के बाद उसे ढूँढ़ने वालों में शामिल हो गया। पुलिस ने मामले में रिकॉर्ड 19 दिन में तहकीकात पूरी कर के चार्जशीट दायर कर दी थी।

मोदी सरकार के दम से बाजार बम-बम, 1800 अंक चढ़ा सेंसेक्स, 10 साल में पहली बार

अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार की ओर से किए जा रहे उपायों का असर दिखने लगा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से शुक्रवार को की गई घोषणाओं से बाजार झूम उठा। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी BSE के सेंसेक्स ने नया रिकॉर्ड बनाया। सेंसेक्स में एक दिन में 1800 से ज्यादा अंकों की उछाल देखी गई। ऐसा इससे पहले करीब 10 साल पहले देखा गया था।

इसी तरह नेशनल स्टाक एक्सचेंज का निफ्टी 362.95 अंक यानी 0.39 प्रतिशत की तेजी के साथ 11,067.75 अंक पर पहुॅंच गया। डॉलर के मुकाबले रुपया भी 66 पैसे मजबूत होकर 70.68 पर पहुॅंच गया।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक वृद्धि दर को गति देने के लिए कॉरपोरेट कर की प्रभावी दर घटाने का ऐलान किया। अब घरेलू कंपनियों के लिये सभी अधिशेषों और उपकर समेत कॉरपोरेट कर की प्रभावी दर 25.17 प्रतिशत होगी। नई दर इसी वित्त वर्ष के एक अप्रैल से प्रभावी होगी।

सीतारमण ने कहा कि घरेलू कंपनियाँ 22% की दर से भी आयकर का भुगतान कर सकती हैं, अगर वो कोई प्रोत्साहन या छूट का लाभ नहीं उठाती हैं। इन कंपनियों की प्रभावी कर दरें सरचार्ज और सेस सहित 25.17% होंगी। उन कंपनियों के लिए जो प्रोत्साहन का लाभ उठाना जारी रखती हैं, न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) को मौजूदा 18.5% से घटाकर 15% कर दिया गया है।

‘मेक इन इंडिया’ अभियान को गति देने के लिए, वित्त मंत्री ने कहा कि 2019-20 से प्रभावी आयकर अधिनियम में एक और प्रविष्टि डाली गई है, जो नई घरेलू कंपनी को 1 अक्टूबर 2019 के बाद नई घरेलू विनिर्माण कंपनियाँ बिना किसी प्रोत्साहन के 15% की दर से आयकर का भुगतान कर सकती हैं।

वित्त मंत्री सीतारमण ने यह भी कहा कि पूंजी बाजार में धन के प्रवाह को स्थिर करने के लिए, जुलाई 2019 के बजट में प्रदान किया गया सरचार्ज, जो नई सरकार के गठन के बाद प्रस्तुत किया गया था, किसी कंपनी में इक्विटी शेयर या इक्विटी ओरिएंटेड फंड की एक इकाई की बिक्री पर होने वाले पूंजीगत लाभ पर लागू नहीं होगा। उन्होंने कहा कि बढ़ा हुआ अधिभार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के हाथों में डेरिवेटिव सहित किसी भी सुरक्षा की बिक्री पर होने वाले पूंजीगत लाभ पर लागू नहीं होगा।

केंद्रीय मंत्री ने सूचीबद्ध कंपनियों को राहत देने की भी घोषणा की। जिन कंपनियों ने 5 जुलाई 2019 से पहले बायबैक की घोषणाएँ की थीं, उन्हें ऐसे शेयरों के बायबैक पर टैक्स नहीं देना होगा।

इन ऐलानों के तुरंत बाद बाजार चढ़ने लगा। कुछ ही देर में मार्केट कैपिटलाइजेशन (MCap) 143.45 लाख करोड़ रुपए पर पहुॅंच गया। यह गुरुवार को 138.54 लाख करोड़ रुपए था। यानी करीब 5 लाख करोड़ की बढ़त।

यूनिवर्सिटी कैम्पसों की वामपंथी हिंसा: लाल सलाम की बत्ती बनाने का समय आ चुका है, वरना ये आग लगा देंगे

याद कीजिए पिछली बार वो समय कब था जब आपने जेएनयू या जादवपुर यूनिवर्सिटी के बारे में कोई सकारात्मक बात सुनी थी कि फलाँ डिपार्टमेंट के विद्यार्थियों ने ऐसा शोध किया, फलाँ डिपार्टमेंट के सर्वेक्षणों के नतीजों से सरकार ने नीतियाँ बनाईं और समाज में बदलाव आया। आपको याद नहीं आएगा क्योंकि एक दिन के छात्र चुनावों के नाम पर ये कैम्पस पूरे साल वामपंथी हिंसा की आग में जलते रहते हैं।

कभी यहाँ अफजल गुरु की बरसी मनाई जाती है, कभी कहीं हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए बीफ फेस्टिवल होता है, कभी किसी फिल्म की स्क्रीनिंग रोकने के लिए उत्पात मचाया जाता है, कभी चुनाव जीतने पर विरोधियों को डंडों और रॉड से पीटा जाता है तो कभी सिर्फ विरोधियों पर दवाब बना कर चुनाव में खड़े होने से रोकने के लिए मोलेस्टेशन का आरोप लगाया जाता है।

दुर्भाग्य से बस इसी में सिमट कर रह गए हैं कुछ विश्वविद्यालय। इनमें जेएनयू और जादवपुर लगातार चर्चा में बने रहते हैं। चर्चा में रहने का कारण हमेशा इनका छात्र संघ होता है। इसी तरह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय भी चर्चा में रहता है, जिसे जिन्ना से अगाध प्रेम है और अलीगढ़ में रेलवे स्टेशन पर कोई ‘शांतिप्रिय’ ट्रेन से बाहर निकलने के लिए किसी से उलझता है तो उसे ये साम्प्रदायिक बनाने लगते हैं।

यूनिवर्सिटी छात्रसंघ नेता के बाप की जागीर नहीं होती

ताजा खबर यह है कि कल भारत सरकार के मंत्री बाबुल सुप्रियो जब जादवपुर यूनिवर्सिटी गए तो वहाँ के वामपंथी छात्र संगठनों ने न सिर्फ काले झंडे दिखाए बल्कि उससे अपना काम न होने पर अपने मूल चरित्र यानी हिंसा पर उतर आए। आप सोचिए कि एक मंत्री अपनी सुरक्षा के घेरे में चलता है लेकिन इन रक्तपिपासु वामपंथियों ने उन सब पर हमला बोल दिया और बाबुल सुप्रियो के बाल खींचे और धक्का-मुक्की की।

इसी तरह, साल भर पहले की बात है, जेएनयू में चारों वामपंथी पार्टियाँ अपने अस्तित्व को बचाने हेतु चार भेड़ियों की तरह नितम्ब चिपका कर साथ चुनाव लड़े और जीते, लेकिन जीत का जश्न मनाया एबीवीपी वालों पर हमला करते हुए। ऐसी खबरें हर महीने आती हैं इन जगहों से जहाँ ये यूनिवर्सिटी को अपने बाप की जागीर समझते हैं, और चुनाव जीतने पर खुद को छात्र संघ का अध्यक्ष कम और पूरे कैम्पस का मालिक ज्यादा मानते हैं।

आप यह सोचिए कि छात्र संघ का काम क्या है? छात्र चुनावों का औचित्य क्या है? दलील दी जाती है कि छात्र अपनी बात रखेंगे और यूनिवर्सिटी में उनकी बातें सुनी जाएँगीं। क्या उनकी बातों को सुनने के लिए प्रशासन नहीं है? या, जहाँ छात्र चुनाव नहीं होते वो कॉलेज या यूनिवर्सिटी चल ही नहीं पा रहे? क्या वहाँ आवाजों को दबाया जा रहा है?

गौर से देखने पर पता चलता है कि कुछ यूनिवर्सिटी में छात्र चुनाव सिर्फ और सिर्फ उत्पात मचाने के लिए, वामपंथी पार्टियों के भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए महज हिंसक काडर तैयार करने का एक जरिया बन कर रहा गया है। विरोध प्रदर्शन का मतलब होता है कि दुनिया के लोगों, हम इस बात के विरोध में हैं, हम नहीं चाहते कि रामदेव हमारे कैम्पस में आए। लेकिन यही छात्र नेता यह बात बहुत आसानी से भूल जाते हैं कि उन्हें भी आधे से कम लोगों का ही वोट मिला है, और चूँकि वो नेता है तो इसका यह कतई मतलब नहीं कि बाकी के विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति या लोकतांत्रिक अधिकार खत्म।

आप यह जताइए कि जेएनयू या जादवपुर का मौजूदा छात्रसंघ रामदेव या बाबुल सुप्रियो के आने का विरोध करता है लेकिन उससे आगे आपको कोई हक नहीं है कार्यक्रम को रोकने का, किसी की फिल्म को दिखाना बंद करने का या हिंसा करने का। आपने आपत्ति की, वो दर्ज हो गई, अब जिसने उन्हें आमंत्रित किया है, उसे पूरा हक है कार्यक्रम को करने का।

यही तो लोकतंत्र है ना? इसी के बारे में तो विरोधी नेता राष्ट्रीय परिदृश्य में बातें करते हैं कि विपक्ष का स्वर कुचला जा रहा है? फिर, अपनी विरोधी विचारधारा द्वारा आमंत्रित फिल्म निर्देशक को, या नेता को, आप कैम्पस में आने से कैसे रोक रहे हैं? विरोध का अर्थ है विरोध दर्ज कराना, न कि यूनिवर्सिटी कैम्पस को अपनी प्राइवेट प्रॉपर्टी समझ कर, अपने छात्र नेता होने के नाम पर वहाँ रक्तपात करना। वामपंथी यही करते हैं ताकि अपने आकाओं की नजर में आ जाएँ कि ‘अरे, ये तो वही है जो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ करवा रहा था, इसको बुलाओ। टिकट दो इसको।’

वामपंथी प्राकृतिक तौर पर चरित्रहीन और हिंसक होते हैं

आईसा पार्टी का अध्यक्ष अनमोल रतन याद ही होगा जिसने एक लड़की को सीडी देने के बहाने बुलाया, और उसका अपने कमरे में बलात्कार किया। इसी तरह वामपंथियों के नए पोस्टर ब्वॉय लिंगलहरी कन्हैया कुमार याद होंगे जो कैम्पस को मूत्र विसर्जन स्थल समझ कर मस्ती में लहराते हुए लघुशंका मिटा रहे थे, और किसी लड़की ने मना किया तो धमकी दे बैठे। बाद में फाइन भी भरा।

इन्हीं की हिंसक राजनीति की बलि नजीब अहमद चढ़ गया जो लापता है। उसकी माँ को ये वामपंथी अपने मतलब साधने के लिए, रोहित वेमुला की माँ की तरह चुनावों के दौरान हर स्टेज पर ले गए, प्रोटेस्ट कराया, लेकिन ज्योंहि चुनाव खत्म हुए, उन्हें छोड़ कर निकल लिए। इनके पापों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है, कुल मिला कर यह मान लीजिए कि वामपंथियों ने कैम्पसों को तबाह कर रखा है।

यूनिवर्सिटी में पढ़ाई होनी चाहिए, शोध होना चाहिए। विरोध के स्वर और समर्थन के स्वर, दोनों को ही, समुचित जगह मिलनी चाहिए क्योंकि यूनिवर्सिटी वैचारिक उन्मुक्तता का केन्द्र होते हैं। यहाँ अगर छात्र-छात्राएँ देश-समाज की बातों पर चर्चा नहीं करेंगे तो फिर उनका दिमाग बंद रह जाएगा, जैसे कि वामपंथियों का हो जाता है। वामपंथी देश-समाज की बातों पर चर्चा नहीं करते, वो दिखाते हैं कि वो चर्चा कर रहे हैं।

इनका शुरू से ही एक ही मकसद रहा है कि किसी भी तरह नक्सलियों का काम चलता रहे, गरीब सैनिकों की, सुरक्षाबलों के गरीब जवानों के सामूहिक नरसंहार होते रहें। ये इन्हीं गरीबों की हत्या करते हैं, और बताते हैं कि सरकार गरीब-विरोधी है, इसलिए ये हथियार उठा रहे हैं। ये किसने कहा कि सरकार अगर गरीब विरोधी है भी, तो हथियार उठा लो और उन्हीं घरों को तबाह कर दो जिन्होंने गरीबी से उबरने के लिए सशस्त्र सेनाओं में नौकरी की थी?

क्या वो लोग गरीब नहीं थे? क्या वो आदिवासी गरीब नहीं होते जिन्हें ये वामपंथी नक्सली आतंकी सुरक्षाबलों से बचने के लिए आगे खड़े कर देते हैं? अंत में पता चलता है कि ये सब एक बहुत बड़ा ढोंग है। ये या तो आतंकी हैं, या आतंकियों के हिमायती हैं। पढ़ने-लिखने से इनको एक पैसा मतलब नहीं है और अपनी हिंसक बातों को ये ‘पीस कम्स थ्रू बैरल ऑफ गन’ से जस्टिफाय करते हैं क्योंकि ये चाहते तो बहुत हैं कि इनके बापों के नाम की जगह ‘लेनिन’ या ‘माओ’ लिख दिया जाए, लेकिन दोनों ही दुर्दान्त आतंकी पहले ही मर चुके हैं।

लोकतंत्र की आड़ में, लोकतंत्र का फायदा उठाने वाली आतंकी विचारधारा है वामपंथ

वामपंथ एक कोढ़ है जो चाहता है कि इस देश का एक-एक अंग गल कर टूटता रहे। इससे इसका कोई फायदा नहीं, ये बस चाहता है कि ऐसा हो। ये उस कुत्ते की तरह है जो कार के पीछे इसलिए भागता है क्योंकि दूसरे कुत्ते के मूत्र की गंध टायर से आती है। उसे यह पता है कि वो सिर्फ भौंक ही सकता है, कार रुक भी जाए तो वो टायर पर दाँत मार कर दाँत ही तोड़ेगा। लेकिन, वो दौड़ना और भौंकना नहीं छोड़ता।

इनका चरित्र तो देखिए कि पहले ये अलग हुए क्योंकि मार्कसवादियों को लेनिनवादियों की बात पसंद नहीं थी, फिर माओवादियों की अपनी समस्या थी, फिर दलित के नाम पर राजनीति चमकाने वाले आए… ‘लाल सलाम’ बस बीड़ी और गाँजा पीने के लिए ही दो-दो रुपए भीख माँगने के लिए प्रयुक्त हुआ करता था, ताकि लगे कि ‘भाई, हम अलग जरूर हैं अपने ‘काश हमारे बाप माओ होते, लेनिन होते, मार्क्स होते’ के नाम पर, लेकिन हमारे नितम्ब लाल हैं, ये ध्यान रहे।’

यही लाल नितम्ब समूह जब देखने लगा कि उसे अब कोई पसंद नहीं करता, तो बेचारे गठबंधन में आ गए। सारे भेड़िए एक साथ, जीभ से खून टपकता हुआ, देश-समाज को बर्बाद करने को आतुर। अचानक से सारे भेद भाव मिट गए। कार की टायर पर लेनिनवंशियों का मूत्र माओवंशियों को अब इत्र जैसा सुगंध दे रहा था, मार्क्स की नाजायज औलादों ने कहा ‘अहो-अहो! ऐसा मूत्र तो न कभी सूँघा, न विसर्जित किया माओनंदन!’ फिर एक साथ आ कर, छात्र-छात्राओं की समस्या देखने-समझने-सुलझाने के लिए नहीं, बल्कि किसी भी तरह चुनाव जीतने को इन्होंने अपना उद्देश्य बना लिया। अचानक से वो सारे सिद्धांत हवा हो गए जिसके आधार पर अलग-अलग बापों के नाम पर अलग-अलग पार्टियाँ बनी थीं।

हिंसा इनका एकसूत्री अजेंडा है

इन सबमें एक ही बात कॉमन है, हिंसा। ये सारी पार्टियाँ हिंसा को बढ़ावा देती हैं, अपने विरोध में उठे स्वर को ये चर्चा से नहीं काटते, बस काट देते हैं। केरल से बंगाल तक देख लीजिए कि वामपंथी हिंसा का शिकार कितने हजार लोग हुए हैं। यूनिवर्सिटी कैम्पसों में इनकी हिंसा बहुत आम है। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब है वामपंथी अभिव्यक्ति की आजादी, बाकियों को तो बोलने ही नहीं आता।

ये हैं हमारे देश के वो लोग जो भारत को तोड़ने की बातें करते हैं, सुनते हैं और कहते हैं कि ये तो विरोध के स्वर हैं, डिस्सेंट है। फिर लोकतंत्र की दुहाई देते हैं कि क्या इस देश में कोई नारा भी नहीं लगा सकता! यही तो फासीवाद है! अगर ये फासीवाद है, तो तुम जो हर बार करते हो अपने विरोधियों के साथ, वो क्या है? क्योंकि तुम भी दूसरों की बात सुनना नहीं चाहते, और जब संख्याबल में अधिक होते हो तो सरिया और हॉकी स्टिक उठाने से तुम एक बार भी नहीं हिचकिचाते।

तुम्हारा विरोध हो गया लोकतंत्र की परिभाषा, दूसरों का विरोध हो गया लोकतंत्र पर हमला! तुम गरीबों को गोली से इसलिए मार देते हो क्योंकि सरकार गरीबों का ध्यान नहीं रख रही। मतलब, सरकार गरीबी उन्मूलन करने में रहे और तुम गरीबों को ही घेर कर मारते रहो। उसके बाद जब तुम्हें घेर कर मारा जाए तो तुम्हें मार्मिक किस्से याद आते हैं कि उसका बाप हेडमास्टर था, उसकी माँ सिलाई मशीन चलाती थी, उसकी बहन स्कूल नहीं जा पाएगी! किस्से तो सारे ही मार्मिक होते हैं, लेकिन जिस रक्तपात को तुम जस्टिफाय करते हो, वो किसी भी तरह से मार्मिक नहीं।

इन यूनिवर्सिटी से निकले लोग, जो आज भी वामपंथ की चरमसुख देने वाली खुमारी में हैं, वो लिखते हैं कि ये फासिस्ट जानवर चर्चा के लायक ही नहीं, ये हमारी बात मानते ही नहीं। तो तुम क्या जज हो कहीं के? तुम हो कौन? तुम इन्हें चर्चा के लायक नहीं समझते इसलिए तुम रॉड निकाल लोगे, सर फोड़ दोगे? आगे कहते पाए जाते हैं कि ये फासिस्ट लॉजिक समझते ही नहीं! शोना बाबू, ऐसा है कि अगर कोई तुम्हारा लॉजिक नहीं समझता तो तुम्हारे लॉजिक में या समझाने के तरीके में खोट है, सामने वाले में नहीं।

अगर लॉजिक यह है कि तुमने कहा कि रामदेव या बाबुल कैम्पस में नहीं आएँगे, और सामने वाले ने पूछ दिया कि क्यों नहीं आएँगे? तो तुम ये नहीं कह सकते कि देखो, ये लॉजिक नहीं समझ रहे और फिर उत्पाती लोगों को लाठी-सरिया ले कर पीटने को छोड़ देते हो। ऐसे चर्चा नहीं होती, तुम्हारी पार्टी में यही चलता होगा, वो बात अलग है क्योंकि तुम तो कम्यून मानते हो न, तुम्हारे लिए जब देश है ही नहीं, तो फिर लोकतंत्र के तरीकों से तुम्हें क्या? तुम्हें तो लाइसेंस है कि ‘हम तो गरीबों की, सर्वहारा की बात कर रहे हैं’ कहते हुए हत्या करो, अपनी ही महिला काडरों का जंगलों में बलात्कार करो, और उसे कहो कि क्रांति में वो अपना सहयोग दे रही है।

कम्यूनिस्टों की लोकतंत्र में कोई जगह नहीं

जो लोग देश के कॉन्सेप्ट को ही नहीं मानते, जिनकी मूल भावना है कि हर क्षेत्र को स्वतंत्र होने का, अलग होने का अधिकार है, जो देश के टुकड़े होते देखना चाहते हैं, जो अपने देश की सशस्त्र सेनाओं पर सवाल खड़े करते हैं, जो चाहते हैं कि नक्सली इलाकों में कभी भी विकास न पहुँचे, जिनकी मंशा है कि उनके विरोधियों को कभी सत्ता मिले ही नहीं, जिनके लिए भारत के वो लोग मूर्ख हैं जो उन्हें नहीं चुनते, वो आखिर लोकतंत्र की दुहाई देते ही क्यों हैं?

जो वामपंथी ये मानने को तैयार ही नहीं कि देश की जनता ने लगातार एक पार्टी को वोट दिया है, जो उनकी समझ पर सवाल उठाते हैं, जनमत की इज्जत नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि मूर्खों ने मोदी को चुन लिया है, वो लोकतंत्र की हत्या या उसके जिंदा होने की बातों में क्यों उलझे हुए हैं?

तुम तो चाहते हो न कि लोगों की आवाज सुनी जाए? लोगों ने तो बार-बार वोट दे कर अपनी आवाज सुनाई है। वो तो हर दिन बताते हैं कि गरीबों को लिए बनाई गई तमाम योजनाओं का लाभ उन्हें लगातार मिल रहा है। वो तो कहते हैं कि सड़कों के पहुँचने से उनके जीवन में बदलाव आया है। तीन लाख करोड़ रुपए तो उन्हीं गरीबों का सीधे दिए जा रहे हैं। फिर तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि गरीबों की बात करने पर तुम्हारा कॉपीराइट है?

तुमने सत्ता में रह कर ऐसा क्या किया कि तुम्हें हर जगह से नकार दिया गया? अभी दो-तीन यूनिवर्सिटी में सिमटे हो, बाद में दो तीन डिपार्टमेंट में सिमट कर रह जाओगे, और अंत में किसी क्लास के मॉनीटर भी बन गए तो कहोगे कि सिर्फ वही लोग समझदार हैं जिन्होंने तुम्हें मॉनीटर चुना, बाकी पूरा क्लास, सारे डिपार्टमेंट, पूरा कॉलेज, पूरी यूनिवर्सिटी, पूरा जिला, राज्य और देश मूर्ख है जिसने उसकी विचारधारा को, उसकी पार्टी को नहीं चुना।

अब कोई मुझे बता दे कि ये कौन सा लोकतांत्रिक तरीका है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई राष्ट्रीय सरकार को तुम खारिज कर देते हो, और जब तुम पर इसी देश का कानून लगाया जाता है तो कहते हो कि तुम्हारी बात को फासीवादी लोग दबा रहे हैं, लेकिन जहाँ तुम छात्रसंघ जैसी संस्था के भी अध्यक्ष बन जाते हो, वहाँ तुम अपने विरोधियों के द्वारा बुलाए लोगों को कैम्पस में घुसने तक नहीं देते, हिंसा पर उतर आते हो! तुम क्या हो? तुम्हें कौन सा वाद कहा जाए! तुम लोकतंत्र के मवाद हो, जिसे पोंछ कर फेंकना बहुत जरूरी है।

CM योगी ने बदल दिया UP का वर्क कल्चर, अब लाव-लश्कर के साथ नहीं चल पाते नौकरशाह

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के गुरुवार (सितंबर 19, 2019) को ढाई साल पूरे हो गए। इस अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कामकाज की बदौलत उनकी सरकार ने जनता का विश्वास हासिल किया है। अब लोगों का नजरिया बदला है।

बता दें कि, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के घंटों तक काम करते रहने और देर रात तक मीटिंग लेने की वजह से नौकरशाहों को हर वक्त अलर्ट रहना पड़ रहा है। इस नए वर्क कल्चर और जवाबदेही की वजह से कई आरामतलब अधिकारियों में नाराजगी भी है। सीएम योगी आदित्यनाथ की करीबी टीम और सीएम ऑफिस में काम करने वालों को तो और भी ज्यादा काम करना पड़ता है। उन्हें मुख्यमंत्री के साथ सुबह से लेकर देर रात तक काम करना पड़ता है।

दरअसल देश की बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही समय बाद योगी आदित्यनाथ को यह समझ आ गया था कि फाइलें निपटाने और जरूरतमंद लोगों से मिलने की जगह ज्यादातर अधिकारियों ने एक के बाद दूसरी मीटिंग में व्यस्त रहने की आदत बना ली है। मोटे तौर पर यह दिन काटने, कड़े निर्णय लेने से बचने और भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों की पहचान करने से बचने का तरीका था।

न्यूज़ 18 से बातचीत में सीएम योगी ने कहा कि उन्हें जल्द ही इस बात का अहसास हो गया कि अधिकारियों को मीटिंग के लिए बुलाए जाने पर मामला और बिगड़ जाता था। सीएम के साथ मीटिंग की तैयारी का बहाना बनाकर पूरा दिन बर्बाद कर देना उनकी आदत बन चुकी थी।

इसके अलवा सीएम की समीक्षा बैठकों में भी ऊपर से नीचे तक के सभी अधिकारियों के साथ लाव-लश्कर भी आते थे, जिसकी वजह से पूरे डिपार्टमेंट का काम ही रुक जाता था। इस पर सीएम योगी ने कहा, “अब मैंने आदेश जारी कर दिए हैं कि सिर्फ प्रिंसिपल सेक्रेटरी या डिपार्टमेंट के हेड, जिन्हें भी बुलाया गया है, वे ही मीटिंग के लिए आएँगे। सभी साथ में नहीं आएँगे। ऐसा करने से अब प्रिंसिपल सेक्रेटरी खुद पूरी तैयारी के साथ आते हैं, बजाए इसके कि वो छोटे से सवाल पर भी अपने डिप्टी की तरफ मुड़कर देखें। इससे दूसरे अधिकारियों को दिन के रेगुलर काम पूरे करने का मौका भी मिल जाता है।”

सीएम योगी द्वारा लाए गए इन परिवर्तनों ने राज्य के अधिकारियों में परिणाम आधारित वर्क कल्चर को बढ़ावा दिया है। इसकी वजह से अधिकारियों के आराम करने की आदत छूट गई है। सीएम के दफ्तर में तैनात एक प्रमुख नौकरशाह ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “योगी जी अत्यधिक काम करने वाले व्यक्ति हैं। वो करीब 17 घंटे प्रतिदिन अपने दफ्तर संबंधी जिम्मेदारियों को निभाते हुए बिताते हैं। वो ये तय करते हैं कि नौकरशाह भी निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरा समय दे रहे हैं या नहीं। हमें अपने सहकर्मियों से ज्यादा काम करना पड़ता है, क्योंकि सीएम सुबह से लेकर देर रात तक काम करते हैं और हमें भी उनके साथ काम करना पड़ता है।”

इस्लाम के ख़िलाफ़ था अनुच्छेद 35A, इसे हिन्दू बनाम मुस्लिम का मुद्दा न बनाएँ : शाहनवाज़ हुसैन

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 35-A को भाजपा के वरिष्ठ नेता सैयद शाहनवाज़ हुसैन ने इस्लाम विरोधी बताया है। इसे निरस्त करने का विरोध कर रहे ‘मुस्लिम बुद्धिजीवियों’ को उन्होंने गुरुवार (19 सितंबर) को आत्ममंथन की सलाह दी। साथ ही कहा कि इसे हिन्दू बनाम मुस्लिम का मुद्दा बनाने की कोशिश न करें।

बिहार के मोतिहारी में प्रेस कॉन्फ्रेन्स को संबोधित करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हुसैन ने कहा कि निरस्त संवैधानिक प्रावधान जम्मू-कश्मीर के बाहर के किसी व्यक्ति से शादी करने की स्थिति में पैतृक संपत्ति पर महिला के अधिकार को छीन लेता था, जो शरिया के ख़िलाफ़ था। उन्होंने कहा कि जो मुस्लिम बुद्धिजीवी जम्मू-कश्मीर को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं और इसे हिन्दू बनाम मुस्लिम मुद्दा बना रहे हैं, उनसे एक सवाल है कि क्या उन्हें लगता है कि अनुच्छेद 35-A इस्लाम के शरिया क़ानून के अनुसार था?

शाहनवाज़ हुसैन ने कहा कि शरिया क़ानून के अनुसार एक बच्ची को उसके माता-पिता से विरासत में मिली संपत्ति पर उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन, अनुच्छेद 35-A ने उसे शर्तिया बना दिया था। निश्चित रूप से संविधान द्वारा दिए गए समानता के अधिकार के उल्लंघन के अलावा यह इस्लाम के भी ख़िलाफ़ था।

इसके आगे उन्होंने कहा कि मुस्लिम बुद्धिजीवियों को इस मुद्दे पर आत्ममंथन करने की ज़रूरत है। प्रेस कॉन्फ्रेन्स में उन्होंने देश में NRC को लागू करने के मुद्दे को भी उठाया और केंद्रीय मंत्री अमित शाह के बयान का बचाव करते हुए पूछा कि लोगों को इससे क्या समस्या है?

उन्होंने कहा कि दुनिया का कोई भी देश नहीं है जो अवैध रूप से अपनी सीमाओं में घुसने वाले लोगों को बर्दाश्त करता हो। ठीक वैसे ही भारत में भी अवैध लोगों को रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा अभी महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा चुनावों की तैयारी में व्यस्त है और संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री पार्टी का चेहरा हैं। हुसैन ने कहा कि ऐसा पहली बार होने जा रहा है जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी धरती पर भारतीय प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा करेंगे। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीत भारत के बढ़े हुए अंतरराष्ट्रीय दबदबे को दिखाता है। हमें इस पर गर्व होना चाहिए।

इस्लामिक बैंक घोटाला: कर्नाटक के पूर्व कॉन्ग्रेस मंत्री ज़मीर अहमद खान से CBI ने की पूछताछ

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने आई-मॉनेटरी एडवायजरी (आईएएम) घोटाले के सिलसिले में कर्नाटक के पूर्व कॉन्ग्रेस मंत्री ज़मीर अहमद खान से गुरुवार (सितंबर 19, 2019) को पूछताछ की। आरोप है कि कंपनी ने कथित तौर पर इस्लामिक तरीके से निवेश करने पर अधिक लाभ देने का वादा कर 40,000 निवेशकों को धोखा दिया। कर्नाटक के पूर्व खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री खान को एजेंसी के कार्यालय में बुलाया गया जहाँ पर आईएमए घोटाले की जाँच कर रही सीबीआई की टीम ने पूछताछ किया।

इस पोंजी स्कीम घोटाले में मंसूर खान मुख्य आरोपित है। जानकारी के मुताबिक, ज़मीर अमहद खान को मंसूर खान से अवैध रूप से वित्तीय मदद मिली थी। सीबीआई ने जमीर से आईएमए के संस्थापक और उसके बीच कथित अवैध वित्तीय लेनदेन के बारे में पूछताछ की। बता दें कि कर्नाटक सरकार के अनुरोध और केंद्र की मंजूरी के बाद सीबीआई ने 30 अगस्त की रात को मामले को अपने हाथ में लिया था।

मामले को हाथ में लेने के 8 दिन के भीतर ही 7 सिंतबर को घोटाले के कथित मास्टर माइंड मंसूर खान और 19 अन्य के खिलाफ आपराधिक साजिश, विश्वासघात और आईपीसी से संबंधित विभिन्न धाराओं के तहत आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है। इसमें आईएमए के निदेशक मंसूर, इसके 7 निदेशकों, 5 सदस्यों, 1 लेखा परीक्षक और आईएमए समूह से जुड़ी 5 कंपनियों का नाम शामिल है।

मंसूर की फर्म पर इस्लामिक निवेश के तरीकों का इस्तेमाल करके उच्च रिटर्न का वादा करके हजारों लोगों को ठगने का आरोप लगाया गया है। इस साल जून में घोटाला सामने आने पर मुख्य आरोपित मंसूर देश छोड़कर भाग गया था। इस मामले में कॉन्ग्रेस नेता और कर्नाटक के मंत्री बीज़ेड ज़मीर अहमद खान भी शक के घेरे में हैं। ईडी को दिए गए एक हलफनामे में ज़मीर ने IMA ज्वेल्स को अपनी एक सम्पत्ति ₹5 करोड़ में बेचने की बात कबूली थी।

जाँच एजेंसियों ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई करते हुए आरोपित कम्पनी की ₹190 करोड़ से अधिक की संपत्ति ज़ब्त कर चुकी है। जाँच एजेंसियों ने कम्पनी के 52 बैंक खातों से ₹12 करोड़ भी ज़ब्त किए हैं। ईडी ने कहा कि आईएमए किसी भी प्रकार का बिजनेस नहीं कर रही थी, बल्कि एक पोंजी स्कीम चला रही थी। मंसूर को जुलाई में दुबई से आने के बाद गिरफ्तार किया गया था।

‘POK पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ हूँ, बालाकोट से हमने दिखा दिया कि हम चुप नहीं रहेंगे’

कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर ने गुरुवार (सितंबर 17, 2019) को केंद्र सरकार से अपने मतभेद का कारण बताते हुए पाकिस्तान के प्रति अपना रोष जाहिर किया। उन्होंने कहा कि POK पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं है और उसने चीन को वह हिस्सा दे दिया जो उसका है ही नहीं।

कॉन्ग्रेस नेता ने इस दौरान स्पष्ट किया कि पीओके को लेकर सरकार के रुख से उन्हें कोई मतभेद नहीं है, लेकिन जिस तरीके से जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद सरकार ने मुद्दे को ‘डील’ किया है वो संविधान के अनुरूप नहीं है।

थरूर ने गुरुवार को ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। जहाँ उन्होंने बताया, ” मेरे केंद्र सरकार के साथ POK पर कोई गंभीर मतभेद नहीं हैं, लेकिन अंदर से मैं (आर्टिकल 370 को लेकर) असहमत हूँ, उन्होंने संविधान की आत्मा को ठेस पहुँचाया है।” आगे पाकिस्तान के लिए उन्होंने कहा, “पाकिस्तान को कोई अधिकार नहीं है, कि वो चीन को वह हिस्सा दें, जो उसका है ही नहीं।”

उन्होंने इस बातचीत में गाय से जुड़े मॉब लिंचिंग के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं से देश की छवि खराब हो रही है। उन्होंने कहा, “जब मैं विदेश जाता हूँ तो वहाँ लोग पूछते है कि भारत में गाय के नाम पर लोगों को मारा जा रहा है, गाय के नाम पर मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं ने एक ऐसा माहौल बना दिया है जिसके कारण निवेशक देश में निवेश करने से कतरा रहे हैं।”

इसके बाद बालाकोट स्ट्राइक पर भी थरूर बात करने से नहीं चूके। उन्होंने कहा कि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स इस बात का खुलासा करती है कि 26 फरवरी को हुई बालाकोट स्ट्राइक में एक भी आतंकी नहीं मारा गया।

उन्होंने कहा “कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने बालाकोट हमले की तस्वीरें प्रकाशित कीं और यह सबूत दिया है कि बालाकोट हवाई हमले में कोई आतंकवादी नहीं मारा गया। जो सबूत उनके पास हैं, वो हमारी सरकार के पास नहीं। अगर सरकार कहती है कि ये स्ट्राइक प्रभावी थी और इसमें आतंकी मारे गए, तो इन्हें सबूत दिखाने चाहिए।”

थरूर के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय माध्यमों का दर्शाया जो भी उन्होंने देखा, उससे लगता है कि कुछ बड़ा नहीं हुआ है लेकिन सिर्फ़ एक संदेश गया है कि हमारे प्लेन पाकिस्तान की हवाई क्षेत्र में गए और उन्होंने लक्ष्य साधा। इसलिए उन्हें लगता है कि ये एक बड़ा संदेश था जो बताता था कि वो चुप नहीं रहेंगे और प्रतिक्रिया देंगे।

पाकिस्तान जितना नीचे गिरेगा, हम उतना ही ऊपर उठते जाएँगे: सैयद अकबरुद्दीन

संयुक्त राष्ट्र में देश के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने दावा किया कि संयुक्त राष्ट्र की आगामी 74वीं महासभा में हिंदुस्तान का अन्य देशों से ‘अभूतपूर्व’ तालमेल देखने को मिलेगा। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान के कश्मीर मुद्दे के बहाने रंग में भंग करने के बारे में कहा कि पाकिस्तान इस मुद्दे पर जितना नीचे स्वयं को गिराता जाएगा, हिंदुस्तान अपने संवाद और कार्रवाई का स्तर उतना उठाएगा

गौरतलब है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधन वाले दिन ही, यानी 27 सितंबर को, कश्मीर मुद्दा महासभा में उठाने की कसम खाई है। अकबरुद्दीन न्यू यॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र में हिंदुस्तान के स्थायी मिशन के मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे।

द्विपक्षीय, बहुपक्षीय वार्ताओं में व्यस्त रहेंगे मोदी

सैयद अकबरुद्दीन ने केवल दार्शनिक जुमलेबाज़ी नहीं की। उन्होंने पाकिस्तान के मुकाबले हिंदुस्तान के अपना स्तर ऊँचा उठाने के मायने भी गिनाए। जिस समय पाकिस्तान हर मंच पर विफल हो रहे अपने कश्मीर प्रोपेगेंडा को एक और बार फैलाने की कोशिश में लगा होगा, उस समय हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना समय शिखर वार्ताओं में लगा रहे होंगे।

अपने एक हफ्ते के कार्यक्रम में मोदी के ट्रम्प के अलावा 20 अन्य नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ताएँ करने की सूचना है। इसके अतिरिक्त बहुपक्षीय बैठकों, गाँधी जयंती कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र को हिन्दुस्तान द्वारा दिए गए सौर ऊर्जा पैनलों का उद्घाटन आदि तमाम कार्यक्रमों में भी पीएम मोदी को शिरकत करना है। इसके अलावा अगर विदेश मंत्री एस जयशंकर और विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन के कार्यक्रम को भी इसमें जोड़ लें तो हिंदुस्तान 75 देशों के राष्ट्राध्यक्षों और विदेश मंत्रियों के साथ वार्ता करेगा

‘ज़हरीले शब्द ज़्यादा समय नहीं चलते’

सैयद अकबरुद्दीन ने मोदी की प्राथमिकताओं को गिनाने के बाद पाकिस्तान के बार में कहा, “वे क्या करना चाहते हैं, यह उनकी इच्छा है। हमने उन्हें आतंक को मुख्यधारा बनाते देखा है। और आप जो मुझे बता रहे हैं, उससे लगता है कि अब वे नफ़रत की भाषा (hate speech) को मुख्यधारा में इस्तेमाल करना चाहते हैं। यह उनकी इच्छा है, अगर वे यही करना चाहते हैं। ज़हरीले शब्द अधिक समय तक नहीं चलते।”

अलगाववादियों-आतंकियों के पक्ष में 7 भाषण, देश के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काना: अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी का कारण

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला पर लोगों को देश के ख़िलाफ़ लामबंद करने और घाटी में सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करने के गंभीर आरोप लगे हैं। इन आरोपों के मद्देनज़र फारुक अब्दुल्ला को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत गिरफ़्तार किया गया है। 

दरअसल, फारुक अब्दुल्ला पर आरोप है कि वो अपने भाषणों के ज़रिए अलगाववादी नेताओं और आतंकवादियों का महिमा मंडन कर रहे थे। इसके अलावा उन पर आरोप है कि वो अनुच्छेद-370 और 35-A के नाम पर लोगों को देश के ख़िलाफ़ भड़का सकते थे, इससे देश की एकता-अखंडता ख़तरे में पड़ सकती थी। उनकी विचारधारा अलगाववाद और आतंकवाद को समर्थन देने की थी, जिससे आम लोगों का जीवन ख़तरे में पड़ सकता था। केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने वाले अनुच्छेद-370 को निष्क्रिय किए जाने के बाद से ही फारुक अब्दुल्ला गुपकार रोड स्थित अपने घर में नज़रबंद हैं।

ख़बर के अनुसार, फारुक के ख़िलाफ़ की गई PSA की कार्रवाई में साल 2016 से अब तक सात ऐसे मौक़ों का हवाला दिया गया है, जिनमें उन्होंने अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ्रेन्स और आतंकी समूहों के पक्ष में भाषण दिए। फारुक अब्दुल्ला के बारे में बता दें कि वो ऐसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री हैं, जिनकी गिरफ़्तारी PSA के तहत की गई और उनके घर को जेल घोषित किया गया।

PSA आदेश के अनुसार, फारुक के पास श्रीनगर और घाटी के अन्य हिस्सों में सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करने की ‘ज़बरदस्त क्षमता’ है। अव्यवस्था पैदा करने की इस ज़बरदस्त क्षमता को देश के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने की कार्रवाई से जोड़ कर देखा जाता है। इसके अलावा फारुक पर राज्य प्रशासन द्वारा क़ानून के विरोध में बयान जारी करने का भी आरोप लगाया गया है, जिसका मक़सद सार्वजनिक तौर पर अव्यवस्था फैलाना था।

ग़ौरतलब है कि फारूक अब्दुल्ला नेशनल कॉन्फ्रेन्स के चेयरमैन हैं, और तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। PSA के प्रावधानों के अनुरूप उन्हें छ: महीने तक जेल में रखा जा सकता है।