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सद्गुरु के ईशा फाउंडेशन ने प्रोपेगेंडा वेबसाइट के फर्जी आरोपों का दिया करारा जवाब

सद्गुरु जग्गी वासुदेव और उनकी आध्यात्मिक-सामाजिक संस्था ईशा फाउंडेशन ने Coalition for Environmental Justice in India के आरोपों पर करारा जवाब दिया है। Environment Support Group नामक वेबसाइट पर प्रकाशित एक खुले पत्र में ‘populism’ से लेकर ‘हाथियों की जमीन चुराई, आदिवासियों की ज़मीन चुराई’ जैसे वाहियात, पुराने, घिसे-पिटे आरोपों को ही दोहराया गया, जिनके जवाब सद्गुरु और ईशा फाउंडेशन से लेकर तमिलनाडु सरकार तक कई बार, कई मौकों और मंचों पर दे चुके हैं। The Wire की एक हिट जॉब रिपोर्ट भी इस ‘खुले पत्र’ में चस्पा थी। यह पत्र सद्गुरु के ‘Cauvery Calling’ (‘कावेरी की पुकार’) अभियान से जुड़े हॉलीवुड अभिनेता लियोनार्डो डि कैप्रियो को लिखा गया था, जिसमें उनसे इस अभियान से अलग हो जाने की अपील की गई थी। ईशा फाउंडेशन ने उन्हीं आरोपों पर अपना जवाब अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया है।

क्यों पुकार रही है कावेरी?

उत्तर भारत में जैसे गंगा-यमुना बदहाल हैं, वैसा ही हाल दक्षिण भारत में कावेरी का है। कभी कर्नाटक-तमिलनाडु दोनों प्रदेशों के बड़े हिस्से को आवश्यकता से अधिक जल देने वाली यह नदी आज जनसंख्या दबाव और बेतहाशा दोहन से लगभग 40% पानी खो चुकी है और यह दोनों राज्य पानी की कमी से जूझ रहे हैं। चेन्नै और बंगलुरु में हाल में दिखे जल-संकट महज़ बानगी भर हैं पूरी समस्या की गंभीरता के। सद्गुरु इसी नदी में पानी वापिस लाने के लिए ‘कावेरी की पुकार’ (Cauvery Calling) अभियान चला रहे हैं, जिसके अंतर्गत कावेरी के आस-पास की कृषि-भूमि पर अनाज और नकदी फसलों के अलावा पेड़-पौधे भी लगाने पर ज़ोर दिया जा रहा है, बाकायदा कृषि के एक प्रकार, वन्य-कृषि (Agroforestry), के रूप में।

इसके लिए न केवल किसानों के बीच जागरुकता का अभियान चलाया जा रहा है, बल्कि उन्हें ईशा फाउंडेशन अन्न- और फसल-कृषि से वन्य-कृषि पर जाने के लिए एक सहायता का ढाँचा खड़ा कर रहा है, जिसमें 242 करोड़ पेड़ निजी कृषि भूमि पर लगाने के लिए देना शामिल है। इसी अभियान के लिए 62-वर्षीय सद्गुरु ने 2-3 सितंबर से शुरू कर 17 सितंबर तक 3,500 किलोमीटर की सड़क यात्रा भी की थी, जिसके एक बड़े हिस्से में उन्होंने खुद बाइक रैली की थी।

सरकारी भूमि की बात कहाँ से आई?

अपने ‘खुले पत्र’ में Coalition for Environmental Justice in India ने सबसे पहले सरकारी भूमि के इस्तेमाल का आरोप लगाया है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने पूछा है कि सरकारी भूमि के इस्तेमाल की बात कहाँ से आ गई? यह अभियान तो, ईशा के मुताबिक, निजी किसानों को अपनी कृषि भूमि पर पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करने का है। फाउंडेशन का कहना है कि उनकी वेबसाइट, उनके कार्यक्रमों, सरकार को दिए गए दस्तावेज़ों (अभियान का एक हिस्सा अपनी भूमि पर पेड़ लगाने वाले किसानों को अपनी ज़रूरत के मुताबिक लालफ़ीताशाही के हस्तक्षेप के बिना पेड़ काट सकने की इजाज़त दिलाने का भी है, जिसके लिए जरूरी क़ानूनी बदलाव के लिए फाउंडेशन प्रयासरत है) आदि में कहीं भी सरकारी भूमि का तो नाम भी नहीं है।

इसे निजी भूमि पर कराने के पीछे फाउंडेशन का तर्क है कि इस अभियान को अंततः जिन किसानों को सफ़ल बनाना है, निजी भूमि पर होने वाली पैदावार का आर्थिक लाभ उन्हें प्रोत्साहित और प्रेरित करेगा। इसके अलावा आरोप का एक हिस्सा एक ही तरह के पेड़ों को लगाकर एकल कृषि के प्रोत्साहन का है। इसे भी काटते हुए ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि इसमें पहली बात तो केवल वृक्षारोपण ही नहीं, झाड़ियाँ, पौधे और हरियाली के अन्य प्रकार शामिल हैं, और पेड़ों का चयन भी स्थानीय पर्यावरण और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और वन्य विभाग से सलाह लेने के पश्चात् ही किया गया है।

दर्जन-भर सरकारी-गैर सरकारी संस्थाएँ शामिल, सभी अनभिज्ञ हैं?

अगला आरोप लगाया गया है कि ईशा फाउंडेशन को नदी और उसके आसपास की भूमि, जलवायु आदि का कोई ज्ञान ही नहीं है; और वे वृक्षारोपण के अति-सरलीकृत (over-simplified) समाधान को थोपना चाहते हैं। इसके जवाब में ईशा ने पीएमओ, कर्नाटक-तमिलनाडु राज्य सरकारों, जल शक्ति मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु-परिवर्तन मंत्रालय, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अरिजित पसायत, बायोकॉन की किरण मजूमदार शॉ, उद्योग चैंबर Confederation of Indian Industries (CII) के महानिदेशक चन्द्रजित बनर्जी, इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. एएस किरण कुमार आदि का नाम गिनाते हुए पूछा कि क्या यह सभी ऐसे लोग और संस्थान हैं जो बिना जाने-समझे किसी भी मसले पर किसी व्यक्ति या मुद्दे के पीछे खड़े हो जाएँगे?

ईशा फाउंडेशन ने यह भी बताया कि सद्गुरु को United Nations Convention to Combat Desertification (UNCCD) के COP14 शिखर सम्मेलन में Cauvery Calling अभियान के बारे में बोलने के लिए निमंत्रित किया गया था। वे भारत में इस अभियान की सफलता से प्रभावित हो इसे दुनिया-भर में करने के बारे में जानना चाहते थे।

इसके अलावा ईशा फाउंडेशन और Cauvery Calling अभियान लगातार देश के चोटी के आर्थिक थिंक टैंक नीति आयोग से भी लगातार सलाह ले रहा है।

नौसिखिये नहीं हैं हम, 18 साल का अनुभव है वन्य-कृषि का

अगला आरोप था कि ईशा फाउंडेशन अंधाधुंध, बिना सोचे-समझे पेड़ लगाना चाहता है- उसे न तो इसके पर्यावरणीय असर के बारे में समझ है, न ही इसके सामाजिक पहलुओं के बारे में पता है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि उनकी वेबसाइट पर कावेरी के आस-पास की भूमि को उचित खंडों (सेग्मेंट्स) में बाँटते हुए उस खंड में लगने लायक पेड़ों की सूची अपनी वेबसाइट पर डाली है। यह सूची कर्नाटक वन विभाग, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय समेत आधा दर्जन संस्थाओं और दशकों तक वन्य-कृषि और पेड़ों के साथ काम कर चुके विशेषज्ञों के साथ सलाह-मशविरे के बाद तैयार की गई है।

यही नहीं, ईशा फाउंडेशन ने यह भी दावा किया है कि उनके प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स को 18 वर्ष वन्य-कृषि के क्षेत्र में तमिलनाडु में काम करने का अनुभव है। गौरतलब है कि प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स देश के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार ‘इंदिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार’ से सम्मानित हो चुका है। इसके अलावा ईशा ने दावा किया है कि तमिलनाडु में कई जिलों में, जिनमें कावेरी के आसपास के जिले भी शामिल हैं, वन्य-कृषि को सफलतापूर्वक आज़माया जा चुका है।

इसके सामाजिक पहलू को लेकर भी ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि ‘कावेरी की पुकार’ अभियान में यह भी अछूता नहीं है। अभियान के लिए ईशा फाउंडेशन के स्वयंसेवक 7,000 से अधिक गाँवों में जाकर करीब 2,70,000 लोगों से अभियान की आधिकारिक शुरूआत के पहले ही मिले थे। लाखों किसानों के जल-संकट से जूझ रहे होने के चलते पंचायतों के नेतृत्व ने इसमें बेहद रुचि दिखाई है।

पंचायत स्तर पर होगा काम

इस मुद्दे पर आगे ईशा फाउंडेशन ने अपने उत्तर में लिखा है कि इस अभियान का क्रियान्वन ग्राम पंचायतों के स्तर पर पर ही होना है। जहाँ जैवविविधता प्रबंधन समितियाँ (Biodiversity Management Committees) पहले से सक्रिय हैं, वहाँ फाउंडेशन उनकी सहायता बेशक लेगा क्योंकि वन्य-कृषि से जैवविविधता में वृद्धि होती है।

पर्यावरण और विकास/अर्थव्यवस्था को दुश्मन बनाने से काम नहीं चलेगा

ईशा फाउंडेशन ने सद्गुरु के कथन “Ecology और economics को साथ लेकर चलना होगा, एक-दूसरे की कीमत पर नहीं” को दोहराते हुए इस बात पर बल दिया कि Cauvery Calling आर्थिक प्रोजेक्ट है, जो पर्यावरणीय परिणाम को ध्यान में रखकर चलाया जा रहा है। संस्था ने दावा किया है कि यह वन्य-कृषि मॉडल तमिलनाडु के 69,760 किसानों के साथ आज़माया गया है। इसे अपनाने वालों की आय में 300%-800% बढ़ोतरी देखी गई है।

इसके अलावा फाउंडेशन का कहना है कि उसने यह कभी दावा नहीं किया कि पेड़ लगाना ही नदी-संकट के निदान का इकलौता उपाय है। उसने वृक्षारोपण इसलिए चुना क्योंकि वृक्ष नदियों की समस्या के सबसे सस्ता और प्रकृति पर आधारित समाधान हैं।

‘हाथियों की ज़मीन’, ‘आदिवासियों की ज़मीन’ का प्रोपेगंडा

अगला आरोप ईशा फाउंडेशन पर वही घिस-घिस कर बदरंग हो चुका “हाथियों की जमीन चुराई”, “आदिवासियों की ज़मीन चुराई” का प्रोपेगंडा है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने एक बार फिर दोहराया कि पर्यावरण मंत्रालय और तमिलनाडु के राज्य वन विभाग ने यह बहुत पहले साफ़ कर दिया है कि ईशा फाउंडेशन का आश्रम जिस ज़मीन पर है, उस पर हाथियों का कोई कॉरिडोर कभी नहीं रहा। इसके अलावा ईशा फाउंडेशन ने फिर दोहराया कि उस पर आदिवासियों को आवंटित की गई जो 44 एकड़ ज़मीन हथियाने का आरोप है, उस ज़मीन से ईशा फाउंडेशन का कभी कोई नाता नहीं रहा।

सरल भाषा में समझना ‘पॉपुलिस्ट’ होना होता है तो हो

‘Populism’ के आरोप के जवाब में ईशा फाउंडेशन ने लिखा कि इसके पहले ऐसे जटिल विषय को जनता की समझ में आने लायक सरल भाषा में समझाने वाला जनांदोलन कभी नहीं हुआ है। अगर ऐसा करना ‘पॉपुलिस्ट’ होना होता है तो हो। पूरे देश के नदियों के विषय पर उठ खड़े होने का तो स्वागत किया जाना चाहिए।

PIL अगंभीर, सद्गुरु को पैसा कमाने के लिए ऐसे तरीकों की ज़रूरत नहीं

‘कावेरी की पुकार’ आंदोलन के लिए पैसे जुटाने के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका को ईशा फाउंडेशन ने अगंभीर करार देते हुए इस बात का खंडन किया कि यह पैसा कर्नाटक की राज्य सरकार से विमर्श किए बगैर इकट्ठा किया जा रहा है। ‘जलपुरुष’ माने जाने वाले राजेंद्र सिंह के “पैसे और शोहरत के लिए” काम करने के आरोप पर ईशा फाउंडेशन ने कहा कि यह उनकी अपनी राय है, लेकिन साथ में जोड़ा कि पद्मविभूषण से सम्मानित जग्गी वासुदेव को पैसा कमाने के लिए ऐसे हथकण्डे अख्तियार करने पड़ें, ऐसा आरोप हास्यास्पद है।

अपने बयान के अंत में ईशा फाउंडेशन ने सभी विरोधियों को एक निष्पक्ष वार्तालाप के लिए निमंत्रित किया, ताकि फाउंडेशन को ‘Cauvery Calling’ के असली स्वरूप को प्रस्तुत करने का अवसर मिले।

अब अगर खराब सड़क बनाई तो ठेकेदारों का भी कटेगा ‘ट्रैफिक चालान’: नितिन गडकरी

केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने नए मोटर व्हीकल एक्ट-2019 के तहत ठेकेदारों पर भी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। आज उन्होंने एक ट्वीट कर कहा कि नए मोटर व्हीकल एक्ट-2019 के तहत सिर्फ आम लोगों के लिए पेनल्टीज और जुर्माने की राशि ही नहीं बढ़ाई गई है, बल्कि सड़क के ठेकेदारों द्वारा फॉल्टी सड़क डिजाइन, निम्न स्तर का निर्माण और रख-रखाव में लापरवाही करने पर 1 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है।

बता दें कि एक सितंबर से पूरे देश में नया मोटर व्हीकल एक्ट लागू हो गया है। इस विधेयक से प्राप्त अधिकारों के जरिए यातायात के विभिन्न नियमों का उल्लंघन किए जाने के मामले में भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। संशोधित विधेयक में नाबालिग द्वारा गाड़ी चलाने के दौरान हुई दुर्घटना पर गाड़ी के मालिक को तीन साल जेल की सजा तथा दुर्घटना का शिकार हुए पीड़ित को 10 गुना अधिक मुआवजा प्रदान करने का भी प्रावधान है।

मोटर व्हीकल एक्ट का उल्लंघन करने पर वाहन चालकों पर तो जुर्माने का प्रावधान है ही साथ ही अब केंद्रीय परिवहन मंत्री ने सड़क बनाने वाले ठेकेदारों पर जुर्माने का जो प्रावधान किया है। उससे उम्मीद जताई जा रही है कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। बता दें कि नए नियम के तहत अब किसी ठेकेदार ने खराब सड़क बनाई तो उसे जुर्माना देना पड़ेगा। शायद अब सड़क पर मोटर चालकों को कुछ हद तक गड्ढों से मुक्ति मिले।

‘मेरे क्लासमेट जुबैर* खान ने अपने दोस्त सलीम* खान के साथ मेरा रेप किया’ – रतलाम कांड की 8 डिटेल

स्कूल के दोस्तों के साथ आप पढ़ते हैं, खेलते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं। साथ घूमने जाते हैं, जो साथ नहीं होते तो उनकी चुगली भी करते हैं। सोशल मीडिया के आ जाने से यही दोस्ती एक कदम आगे तक बढ़ जाती है। यहाँ ये दोस्त अच्छा-खासा टाइम बिताते हैं, एक-दूसरे के पोस्ट को लाइक करते हैं, कॉमेंट करते हैं, खिंचाई भी करते हैं। यह सब कुछ होता है स्कूली दोस्तों के बीच। अगर कुछ नहीं होता है, तो वह है भरोसे का न होना। लेकिन रतलाम की घटना ने इस भरोसे को तोड़ दिया है।

रतलाम जिले के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक है सेंट जोसेफ कॉन्वेंट स्कूल। यहाँ 10वीं क्लास में एक लड़की पढ़ती है – गायत्री (बदला हुआ नाम)। एक दिन गायत्री का बलात्कार होता है और रतलाम में इस कदर का विरोध-प्रदर्शन होता है कि पूरा प्रशासनिक महकमा हिल जाता है। आखिर क्यों? रेप तो हर घंटे होते हैं! फिर ऐसा विरोध क्यों? यह इसलिए होता है क्योंकि गायत्री का जिस जुबैर खान (बदला हुआ नाम) ने रेप किया, वो उसका क्लासमेट है। आज पूरा रतलाम सुलग रहा है, क्योंकि इस रेप ने स्कूली छात्र-छात्राओं के भरोसे को तोड़ा है।

छात्र-छात्राएँ-अभिभावक-वकील-दुकानदार… रतलाम का शायद ही कोई ऐसा समूह है, जो इस घटना के विरोध में सड़क पर नहीं उतरा हो। सब न सिर्फ रेप आरोपितों के खिलाफ बल्कि इसके पीछे अगर कोई बड़ी साजिश है, तो उसका पता लगाने के लिए भी प्रशासन के आगे डट कर खड़े हैं। आइए समझते हैं वो 11 घटनाक्रम, वो प्रशासनिक चूक, जिससे रतलाम की जनता सड़कों पर उतर चुकी है।

छात्र नहीं, शातिर है जुबैर खान

जुबैर अपनी सहपाठी गायत्री की फोटोशॉप की गई तस्वीरों को उसके इंस्टाग्राम पर भेजकर ब्लैकमेल करता है। बदले में अपने दोस्त सलीम खान (बदला हुआ नाम, सन ऐंड शाइन स्कूल का छात्र) के साथ गायत्री के घर पैसे लेने आता है लेकिन उसे घर पर अकेला पाकर दोनों उसका गैंगरेप करते हैं। इसके बाद ब्लैकमेल का यह सिलसिला थमने के बजाय और बढ़ता चला जाता है।

दैनिक भास्कर के रतलाम संस्करण में प्रकाशित रिपोर्ट

दोबारा पैसे माँगने और गायत्री के द्वारा असमर्थता जताने के बाद होटल में बुलाता है। यहाँ सलीम खान (सन ऐंड शाइन स्कूल वाला छात्र) फिर से रेप करता है। लेकिन इसके बदले जुबैर ने सलीम से 2000 रुपए लिए। शातिर दिमाग जुबैर होटल का कमरा भी बुक करता है तो किसी शकील उर्फ फरहान (असली नाम) के नाम पर।

बेटी के दर्द को माँ समझ रही थी मासिक धर्म की तकलीफ रिपोर्ट साभार: दैनिक भास्कर

स्कूल की एक शिक्षिका और एक अन्य छात्रा पर भी थी नजर

पीड़ित गायत्री की माँ ने दावा किया है कि जब पुलिस ने जुबैर के फोन की तलाशी ली तो उसमें से एक टीचर और एक अन्य छात्रा के भी फोटो मिले। वो इनको भी ब्लैकमेल कर पैसे ऐंठने की फिराक में था।

पीड़िता की आपबीती FIR में पढ़कर स्कूली बच्चों का भरोसे पर से भरोसा उठ जाएगा, रिपोर्ट साभार: दैनिक भास्कर

क्या है सच में है कॉन्ग्रेस कनेक्शन?

दरअसल जिस होटल में पीड़िता का दोबारा रेप किया गया, वो होटल एक कॉन्ग्रेसी नेता का है। इसे महज एक संयोग कह कर खारिज किया जा सकता था लेकिन विरोध-प्रदर्शन को दबाने और पीड़िता के परिवार पर मामले को रफा-दफा करने की जो कोशिशें कुछ कॉन्ग्रेसी नेताओं द्वारा की गई, उससे शक गहराता है।

वो होटल जहाँ पीड़िता का दूसरी बार किया गया रेप, रिपोर्ट साभार: दैनिक भास्कर

20000 लोग सड़क पर, वकील धरने पर

सारा काम-धाम छोड़ रतलाम की जनता सड़क पर उतर आई। पॉक्सो ऐक्ट के विशेष न्यायाधीश साबिर अहमद खान के आदेश को लेकर वकील लोग कोर्ट के अंदर ही धरने पर बैठ गए।

पीड़िता किसी एक परिवार की बहन-बेटी लेकिन गुस्सा पूरे शहर में, रिपोर्ट साभार: दैनिक भास्कर
यह भाड़े की भीड़ नहीं! रिपोर्ट साभार: दैनिक भास्कर

SP ने जताया सेक्स रैकेट का अंदेशा

जिस ढंग से यह पूरा मामला आगे बढ़ा है और जिस शातिराने ढंग से जुबैर ने गायत्री को ब्लैकमेल किया है, रतलाम के एसपी ने इस गैंगरेप मामले में किसी सेक्स रैकेट के होने का अंदेशा जताया है। अगर पुलिस की शंका सच हुई तो आरोपितों की संख्या बढ़ सकती है।

क्या दिन, क्या रात… चलता रहा विरोध-प्रदर्शन, रिपोर्ट साभार: दैनिक भास्कर

पहली बार इतना बड़ा विरोध प्रदर्शन

पुलिस के द्वारा बल प्रयोग की धमकी 20000 लोगों के विरोध-प्रदर्शन के सामने गीदड़-भभकी साबित हुई।

हर वर्ग, हर स्तर पर किया गया विरोध-प्रदर्शन, रिपोर्ट साभार: दैनिक भास्कर

पुलिस ने क्यों नहीं माँगी आरोपितों की रिमांड

भारी पुलिस बल के बीच आरोपितों को पॉक्सो की विशेष अदालत में पेश किया गया। पुलिस ने इनकी रिमांड की माँग नहीं की। पॉक्सो न्यायालय ने भी रेप आरोपितों को सीधे न्यायिक हिरासत में भेज दिया। वकील इस बात से खफा हो गए और कोर्ट के भीतर ही धरने पर बैठ गए।

कोर्ट में पुलिस की भूमिका संदिग्ध, क्या सच में रहा कोई राजनीतिक दबाव? रिपोर्ट साभार: दैनिक भास्कर

न्यायाधीश साबिर अहमद खान से वकीलों की नाराजगी!

वकीलों की नाराजगी पॉस्को अदालत के विशेष न्यायाधीश साबिर अहमद खान से रही। वकीलों का कहना है कि बिना सरकारी वकील की मौजुदगी में न्यायाधीश से न्यायिक हिरासत की माँग की गई, तो उन्होंने यह माँग मानी क्यों? और तो और न्यायाधीश के सामने पुलिस ने केस डायरी भी नहीं दिखाई, फिर भी न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश क्यों दिया गया?

UNGA को सम्बोधित करते प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद पर चीन की पाक परस्ती पर साधा निशाना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 74वें सत्र को संबोधित कर रहे हैं। पीएम मोदी अपने भाषण की शुरुआत में महात्मा गाँधी को याद किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में लोगों ने सबसे ज्यादा वोट देकर मुझे और मेरी सरकार को जनादेश दिया, जनादेश का संदेश इससे बड़ा व्यापक और प्रेरक है।

पीएम मोदी ने कहा जब एक विकासशील देश दुनिया का सबसे बड़ा सोशल इंक्लूजन कार्यक्रम चलाता है, अपने नागरिकों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पहचान का कार्यक्रम चलाता है, करप्शन को रोककर 20 बिलियन डॉलर से ज्यादा बचाता है तो इससे दुनिया कुछ सीखती है।

आप उनका पूरा स्पीच यहाँ लाइव देख सकते हैं

जैसा अपेक्षित था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण में वैश्विक चिंताओं पर गंभीरता दर्शाते हुए बगैर नाम लिए पाकिस्तान और उसे आँख बंद कर समर्थन देने वाले चीन पर भी निशाना साधा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंक के खिलाफ भारत की आवाज में दुनिया को सतर्क करने की गंभीरता भी है और आक्रोश भी। पीएम नरेंद्र मोदी का साफ कहना था कि इस वैश्विक समस्या से निपटने के लिए समग्र दुनिया को न सिर्फ एकमत होना होगा बल्कि एकजूट भी।

भारतीय कूटनीतिक हलकों में पहले से तय माना जा रहा था कि अपने संबोधन में प्रधानमंत्री वैश्विक मसलों पर ही बोलेंगे, कश्मीर के मुद्दे पर नहीं। हुआ भी यही और पीएम मोदी ने कश्मीर का बगैर जिक्र किए आतंकवाद के नाम पर दुनिया को आगाह कर दिया कि किस तरह पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद समग्र विश्व के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। उन्होंने कहा कि यह किसी एक देश की नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर खतरा है, जिससे सभी को निपटने की जरूरत है।

मोदी सरकार का सख्त कदम: भ्रष्टाचार में लिप्त 15 CBDT अधिकारियों को जबरन किया रिटायर

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार पर बड़ा कदम उठाते हुए 15 इनकम टैक्स अधिकारियों को जबरन रिटायर कर दिया है। बता दें कि इस साल जून महीने में भी ऐसा ही एक फैसला लिया गया था। उसमें हाई रैंक वाले भारतीय राजस्व सेवा के 27 अधिकारियों को जबरन रिटायर कर दिया गया था। इनमें केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के 12 अधिकारी भी शामिल थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिन टैक्स अधिकारियों के खिलाफ अनियमितता के आरोप हैं, उनके खिलाफ यह कड़ी कार्रवाई की है। बता दें कि सेंट्रल सिविल सर्विसेज 1972 के नियम 56(J) के तहत 30 साल तक सेवा पूरी कर चुके या 50 साल की उम्र पर पहुँच चुके अधिकारियों की सर्विस सरकार समाप्त कर सकती है। सीबीआई ने यह कार्रवाई जनहित में सीआईटी, सीआईटी, जेसीआईटी, एडल सीट, एसीआईटी के मौलिक नियम 56 (J) के तहत की है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेन्स की बात करते प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को दिए अपने संबोधन में भी कही थी और एक प्रमुख आर्थिक दैनिक को दिए अपने इंटरव्यू में भी कहा था कि “कुछ काले भेड़ कर प्रशासन में अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं और करदाताओं को परेशान किया जाता रहा है ऐसे अधिकारियों पर हम कार्रवाई कर उन्हें दंडित करेंगे।”

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सभी केंद्रीय संस्थानों से इस बारे में मासिक रिपोर्ट मँगाना शुरू कर दिया है। क्योंकि सरकार के जरिए ऐसे अधिकारियों को अनिर्वाय रिटायरमेंट दिया जा सकता है। ऐसा करने के पीछे सरकार का मकसद नॉन-फॉर्मिंग सरकारी सेवक को रिटायर कर प्रशासन में पारदर्शिता और फुर्ती लाना है।

‘सूअर’ लिखने पर फेसबुक करेगा ब्लॉक और ‘जय श्री राम’ कहने पर भी! यही है कम्युनिटी गाइडलाइन्स

परसों (25 सितंबर, 2019) को ऑपइंडिया पर एक दलित बच्ची के सामूहिक बलात्कार की खबर आई थी, जिसे फेसबुक पेज के माध्यम से शेयर किया गया। थोड़ी देर में फेसबुक ने ‘कम्यूनिटी गाइडलाइन्स’ का हवाला देते हुए उसे पेज से हटा दिया। हमें अगले दो दिन तक यह भी नहीं बताया गया कि कारण क्या था। हमने फेसबुक से बातचीत करने की कोशिश की तो बताया गया कि हमारे द्वारा शेयर की गई तस्वीर में समस्या है।

यूँ तो तस्वीर को आप देखें तो उससे किसी भी तरह की समस्या नहीं दिखती। फेसबुक का मानना है कि उसकी नीति के हिसाब से अगर कोई नाबालिग किसी भी यौनहिंसा का शिकार हुई है, तो उसकी तस्वीर हम धुँधली कर के भी नहीं दिखा सकते। ये नीति आपको सतही तौर पर सही लगेगी कि पीड़िता बच्ची है, उसे हमें सार्वजनिक तौर पर नहीं दिखाना चाहिए।

लेकिन, इस नीति की वजह क्या रही होगी? वजह यह होती है कि पीड़िता के साथ अन्याय न हो, लोग उसकी पहचान के कारण उसे परेशान न करें, उसकी निजता का हनन न हो, उसे किसी भी तरह से नीचा न दिखाया जाए। अब आप ये तस्वीर देखिए, और सोचिए कि इस तस्वीर से क्या पीड़िता की पीली ड्रेस के सिवाय किसी भी और बात का पता चलता है? क्या यह तस्वीर पीड़िता को नकारात्मक रूप में दिखा रहा है?

ख़ैर, अगर फेसबुक यहाँ अपना दोगलापन त्याग कर बात कर रहा होता तो हम मान लेते कि सच में ये लोग इस बात को लेकर संवेदनशील हैं, और इनकी AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), मशीन लर्निंग तकनीकों से ऐसी तस्वीरों को फैलने से रोका जा सकता है। लेकिन ऐसी बात नहीं है। यही तस्वीर, और यही खबर दूसरे वेबसाइट के फेसबुक पेज पर देखी जा सकती है। वहाँ इन्होंने दो अलग-अलग खबरों में इस्तेमाल हुई तस्वीरों को रहने दिया, वो पोस्ट फेसबुक द्वारा डिलीट नहीं किए गए।

SwarajyaMag पोर्टल के फेसबुक पेज के तीन स्क्रीनशॉट

इसका अर्थ यह हुआ कि किसी खास संस्था पर इनका काँटा ज्यादा संवेदनशील हो जाता है, और वो भी शायद तब जब किसी खास पहचान वाले लोग एक साथ ऐसी खबरों को रिपोर्ट करते हैं। क्योंकि, अगर एक फेसबुक पेज पर उसी तस्वीर पर आप एक चेतावनी लगाते हैं कि ‘ये तस्वीर हिंसा या अप्रिय जानकारी के साथ है’, लेकिन दूसरे पेज को आप कोई चेतावनी नहीं देते, उस पोस्ट को डिलीट कर देते हैं। उसके बाद भी आपका दिल नहीं भरता तो उसके संपादक की निजी प्रोफाइल को 24 घंटे के लिए ब्लॉक कर देते हैं।

फेसबुक हिन्दुओं को मामले में कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो जाता है

जब मैंने इसके बारे में फेसबुक पर लिखा तो पता चला कि कई लोगों को ‘सूअर’ लिखने से लेकर ‘जय श्री राम’ को अभिवादन स्वरूप लिखने तक के लिए ब्लॉक किया गया है। एक यूजर ने बताया कि आप अगर संस्कृत में कोई मंत्र लिखते हैं, और कोई उसे ‘हेट स्पीच’ कह कर रिपोर्ट कर दे, तो फेसबुक त्वरित कार्रवाई करते हुए आपका अकाउंट सस्पेंड कर देगा। (हर यूजर का स्क्रीनशॉट पोस्ट के अंत में है।)

एक यूजर तरुण कुमार ने अल्लामा इकबाल और ‘सारे जहाँ से अच्छा’ गीत के बारे में कुछ लिखा था जिसमें बताया गया था कि इकबाल जैसे लोगों को दार्शनिक कहा गया जबकि उसका पूरा दर्शन दूसरे धर्म के खिलाफ घृणा फैलाने पर आधारित था। इसके साथ ही इस्लामी जिहाद और कट्टरपंथ की बात की गई थी। ये आज के दौर की सच्चाई है। पोस्ट में सच लिखा गया था और कहीं से भी किसी को भड़काने की बात नहीं थी, लेकिन फेसबुक ने उसे हटावाया और प्रतिबंध लगा दिया।

एक यूजर सुमित ने किसी को ‘सूअर’ कह कर गाली दी। वो व्यक्ति समुदाय विशेष से नहीं था जिससे लगे कि उसके मजहब को निशाना बनाया जा रहा है। फेसबुक ने उसे भी सस्पेंड कर दिया। मैं गाली को डिफेंड नहीं कर रहा, लेकिन मुझे नहीं लगता फेसबुक के पास इतनी शक्ति है कि वो गालियों को अपने प्लेटफॉर्म से हटा दे। गाली देना बहुत आम बात है, और अधिकांश लोग देते हैं। फेसबुक बेशक, अगर उसे पादरीगीरी करनी है, तो हर ‘फक’ और ‘शिट’ को हटा दे, और पोप के प्रवचन चलाया करे, लेकिन इसके लिए अकाउंट सस्पेंड करना, समझ से बाहर है।

एक अन्य यूजर राजन धर्मेश बताते हैं कि जब ‘सूअर’ लिखने पर अकाउंट ब्लॉक हो सकता है तो किसी दूसरे यूजर ने राम मंदिर के संदर्भ में ‘चूतिया’ शब्द का प्रयोग किया, तो उसे क्यों नहीं हटाया गया? जबकि अगर आपके कम्यूनिटी स्टैंडर्ड के हिसाब से ‘सूअर’, जो कि एक जानवर का नाम है, और गाली के रूप में प्रयुक्त होता है, वो हटाने योग्य है, तो फिर ‘चूतिया’ तो गाली के रूप में ही प्रयोग में आता है, वो कैसे किसी भी नीति को वायलेट नहीं करता?

अभिनव बताते हैं कि उन्होंने किसी बच्ची के बलात्कार और हत्या के संदर्भ में एक पोस्ट लिखा था और उसके लिए न्याय की गुहार लगा रहे थे। उस पोस्ट में उस घटना की विस्तृत जानकारी थी कि लाश कैसे मिली, दरिंदों ने क्या किया था, लेकिन किसी ने रिपोर्ट कर दिया और अकाउंट सस्पेंड हो गया। उसमें भी पीड़िता बच्ची थी और आरोपित खास मजहब से ताल्लुक रखते थे।

सुदर्शन ने ‘पुरबा’ और ‘पछुआ’ हवाओं के बारे में कुछ लिखा, जिसका और कोई संदर्भ नहीं, लेकिन उसके पोस्ट को हटा दिया गया। सबसे मजेदार बात तो यह है कि अंकुर त्रिपाठी ने कहीं ‘जय श्री राम’ और ‘श्री अंजनेयम’ लिखा तो उसे कम्यूनिटी स्टैंडर्ड के खिलाफ बता हटा दिया गया। गुलशन पाहूजा की बात करें तो उन्होंने अनुच्छेद 370 हटने पर कश्मीर की स्थिति पर कुछ लिखा था और उनका अकाउंट तीन दिन के लिए सस्पेंड कर दिया गया।

यानी, फेसबुक में बैठा आदमी जो चाहे कर सकता है

ये तो बस चंद उदाहरण हैं जहाँ फेसबुक की फर्जी बातें फट कर फ्लावर हो जाती हैं कि वो रिपोर्ट हुए पोस्ट को जाँचते हैं, उसके बाद कार्रवाई करते हैं। अगर ये इन्हें जाँचते हैं, तो मेरी समझ में यही बात आती है कि इनकी टीम में नकारे लोग बैठे हुए हैं। अगर ये लोग नकारे और निकम्मे नहीं हैं, जिन्हें अपना काम ठीक से नहीं आता, तो फिर ये लोग धूर्त और पूर्वग्रहों से ग्रस्त कर्मचारी हैं।

दिखाने के लिए बिलकुल इनकी एक पॉलिसी है, उसकी टीम है, उस टीम का मुखिया भारत आता है तो मंत्री जी से मिलता है, बताता है कि वो ऐसा कुछ नहीं होने देंगे जिससे वैचारिक विविधता खतरे में पड़े, लेकिन भीतर में ये बहुत ही शातिर लोग हैं जो जानते हैं कि एक यूजर उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आप अपील कर सकते हैं, लेकिन अपील पर भी अगर यह कहा जाए कि आपने जो कहा वो तो ठीक है, और फलाँ पोस्ट हमारी गाइडलाइन्स के खिलाफ हैं लेकिन हम उसे नहीं हटाएँगे।

या, यह कह दें कि आपने जो ‘जय श्री राम’ लिखा है उससे किसी दूसरे की भावनाएँ आहत हो गई हैं, इसलिए हम पोस्ट तो हटाएँगे ही, आपको ब्लॉक भी करेंगे एक दिन के लिए। यही हो रहा है। ऐसा बार-बार सुनने में आया है कि फेसबुक पर आप हिन्दू देवताओं को अपमान की बात, उनके धार्मिक प्रतीकों को अश्लील तरीके से दिखाने की बात करें, तस्वीरें लगाएँ, आपको कुछ नहीं होगा। वो पोस्ट वहीं रहेगा।

लेकिन, आप ने किसी ‘मजहबी’ नाम वाले बलात्कारी का नाम लिख दिया, किसी ‘मजहबी’ बलात्कारी के कुकृत्यों को लिख कर पीड़िता के लिए न्याय की गुहार लगाई तो फेसबुक में बैठा कोई कर्मचारी आपको ब्लॉक कर देगा। उसे सिर्फ एक रिपोर्ट चाहिए किसी से भी, और आपको लम्बे-चौड़े कम्यूनिटी गाइडलाइन्स का हवाला दे कर ब्लॉक कर दिया जाएगा।

इसकी कोई सुनवाई नहीं होती

मैंने फेसबुक के आला अधिकारियों से बात करने की कोशिश की तो मुझे कहा गया कि पोस्ट हटा लीजिए। हमने हटा लिया। मेरा सवाल उनसे यह था कि अगर फेसबुक को लगा कि इस तस्वीर में दिक्कत है, तो एक बेहद अस्पष्ट भाषा में ‘कम्यूनिटी गाइडलाइन्स’ का हवाला देने की जगह, यह क्यों नहीं कहा कि तस्वीर में समस्या है। पहली ही बार की जा रही कथित गलती पर आपने अकाउंट सस्पेंड कर दिया और कारण तब बताया जब हमने आप पर दबाव बनाया।

दूसरी बात यह कि जब हमने पूछा कि आपका ‘अपील’ कर पाने का बटन क्यों नहीं काम कर रहा था, तो कहा गया कि वो पता करेंगे कि आखिर ऐसी क्या बात हुई कि उस दिन, उस पोस्ट पर ये बटन बंद हो गया! वो कहते रहे कि वो मेरी सारी बातों का जवाब दे देंगे और वो हर संभव कोशिश करते हैं कि हर तरह के विचारों का सम्मान हो, लेकिन फेसबुक के कृत्य तो ऐसे नहीं लगते।

राइट विंग के विचारों को, इनके फेसबुक पेजों को, इनके ट्विटर हैंडलों को, यूट्यूब वीडियो को हर तरह से ज्यादा लोगों तक पहुँचने से रोका जा रहा है। ये शिकायत सैकड़ों लोगों की है, जो सिर्फ मेरे सम्पर्क में हैं। जब आप इन्हें यह बात कहिए तो कहते हैं कि ये महज गलतफहमी है, कम्पनी तो हर तरह के विचारों का सम्मान करती है।

ये तो बस चंद उदाहरण हैं जो दो घंटे में फेसबुक पर मुझे कुछ लोगों ने भेज दिए, लेकिन यह सत्य है कि हर हिन्दू नाम वाला व्यक्ति, हर वो आईडी जिसने कश्मीर पर ये नहीं लिखा कि वहाँ मानवाधिकारो का हनन हो रहा है, जिन्होंने इस्लामी आतंक के ऊपर लिखा है, किसी को कमेंट में जवाब दे कर कुछ वैसा लिखा जो सच हो लेकिन पोलिटिकली करेक्ट न हो, कोई भी अदरक-लहसुन आपको रिपोर्ट कर देगा और आपका नाम, आपकी विचारधारा देखते ही फेसबुक में बैठे एक निठल्ले कर्मचारी की बाँछें खिल जाएँगी, और आपको बिना अपनी बात रखने का मौका दिए ब्लॉक कर दिया जाएगा।

मैं तो फेसबुक के अधिकारियों से बात कर सकता हूँ, लेकिन जिस लोकतांत्रिक प्लेटफॉर्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दम्भ फेसबुक का मालिक अमेरिका की संसद में भरता है, और आम जनता की निजता, उसकी वैचारिक विविधता के सम्मान की बात उस संसद को मानने को कहता है, वो प्लेटफॉर्म भारत में हिन्दूफोबिया के समर्थन में और दक्षिणपंथी लोगों के विरोध में हमेशा खड़ा दिखता है।

आम आदमी के पास झुकने के अलावा, या यहाँ से जाने के अलावा कोई चारा नहीं। बात यह नहीं है कि कोई यहाँ है ही क्यों, बात यह है कि कोई अगर यहाँ है तो प्लेटफॉर्म अपनी ही नीतियों से कैसे मुकर सकता है? इस पर लगातार आवाज उठाने की ज़रूरत है क्योंकि वैचारिक विविधता के प्रति यह रवैया आज के दौर में अस्वीकार्य है।

यूजर स्क्रीनशॉट्स

अटारी बॉर्डर के पास मिला पाकिस्तानी ड्रोन, तरनतारन में भी आतंकियों ने छिपा रखे हैं 4 और ड्रोन

पाकिस्तान पंजाब में आतंकी वारदात कराने के मंसूबे से बाज नहीं आ रहा है। दरअसल, पंजाब पुलिस ने अटारी बॉर्डर पर पाकिस्तान से हथियारों की आपूर्ति के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक और ड्रोन बरामद किया है। इससे पहले पुलिस को सीमावर्ती इलाक़ों में चार और पाकिस्तानी ड्रोन के छिपे होने की सूचना मिली थी।
दूसरी ओर, तरनतारन के बॉर्डर एरिया में आतंकियों द्वारा चार और ड्रोन छिपाए जाने का खुलासा हुआ है। पाकिस्‍तानी ड्रोन से भारतीय सीमा क्षेत्र में हथियार पहुँचाने की यह एक बड़ी साजिश है। रिपोर्ट्स के अनुसार, खेमकरण क्षेत्र में भी ड्रोन से हथियार भेजे जाने के लगातार खुलासे हो रहे हैं।

ख़बर के अनुसार, प्रदेश के तरनतारन के चोहला साहिब गाँव के पास चार दिन पहले गिरफ़्तार किए गए खालिस्तान ज़िंदाबाद फ़ोर्स के आतंकियों ने पूछताछ के दौरान कई ख़ुलासे किए थे। इस पूछताछ में पता चला था कि झब्बाल इलाक़े में ड्रोन छिपाए गए हैं। इसी इनपुट पर पंजाब पुलिस की काउंटर इंटेलीजेस की टीम ने शुक्रवार (27 सितंबर) की सुबह आतंकवादियों के साथी आकाशदीप को साथ लेकर अटारी इलाक़े में सर्च अभियान शुरू किया।

बता दें कि खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स के आतंकियों की निशानदेही पर पंजाब पुलिस की खुफिया शाखा ने अटारी के पास से जो ड्रोन बरामद किया है वह ड्रोन आतंकियों ने झाड़ियों में छुपा कर रखा था। पुलिस अटारी के पास केे नालों की भी जाँच कर रही है।

सर्च अभियान के दौरान अमृतसर के महाभा गाँव में एक ड्रोन के मिलने की सूचना मिली। फ़िलहाल, पुलिस इसकी जाँच-पड़ताल में जुट गई है और इसकी सूचना मिलते ही बीएसएफ़ के आला अधिकारियों ने भी आपात बैठक बुलाकर मामले को गंभीरता से लेते हुए सर्च अभियान में तेज़ी ला दी है। इस तरह पुलिस और बीएसएफ़ दोनों मिलकर छिपे हुए चार ड्रोन को खोजने में जुट गए हैं।

पिछले दिनों पंजाब सरकार ने कहा था कि पाकिस्तान, ड्रोन के ज़रिए हथियार और विस्फोटक भेजने का काम कर रहा है। पंजाब पुलिस के सूत्रों के अनुसार, AK-47 राइफ़ल्स और ग्रेनेड की भारी मात्रा को ड्रोन के माध्यम से अमृतसर भेजा गया।

ग़ौरतलब है कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण स्थिति के बावजूद पाकिस्तान, भारत में घुसपैठ की कोशिशें कर रहा है। लेकिन, भारतीय सेना की सतर्कता के चलते घुसपैठ की हर कोशिश को असफल कर दिया गया। इसलिए पाकिस्तान ने ड्रोन के ज़रिए हथियार और विस्फोटक भेजने का तरीका खोज निकाला है। निश्चित तौर पर पाकिस्तान की इस कोशिश को भी भारतीय सेना मुँहतोड़ जवाब देगी।

निखत बानो को गर्भपात का विरोध करना पड़ा भारी, शौहर सलमान और ससुर लाल खान ने घसीटकर पीटा

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मौदहा इलाके के नराइज ग्राम में निखत बानो नाम की महिला को गर्भपात का विरोध करने पर उसके पति सलमान और ससुर लाल खान ने बेहरमी से सड़क पर घसीट-घसीटकर पीटा। घटना गुरुवार की है।

न्यूज 18 की खबर की मुताबिक निखत के गर्भवती होने की सूचना मिलते ही उसके शौहर और ससुर उसपर गर्भपात करवाने का दबाव बनाने लगे। महिला ने इसका विरोध किया तो उसको सड़क पर घसीट-घसीट कर पीटा गया। जिसके बाद इस घटना की वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि निखत पर उसका पति और ससुर लाठी-डंडे बरसा रहे हैं। बीच में उसकी सास उसको बचाने आती है, लेकिन ये दोनों उन्हें भी नहीं बख्शते और निखत की सास पर लाठी-डंडे चलाने लगते हैं।

जानकारी के मुताबिक इस घटना में महिला और उसकी सास को इतना पीटा गया कि दोनों औरतें लहू-लुहान हो गईं। इस कारण दोनों को स्थानीय अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा।

न्यूज 18 पर घटना का वीडियो

हालाँकि, पुलिस ने इस मामले को सामान्य धाराओं में दर्ज किया है। लेकिन, निखत का कहना है कि उसके पति, ससुर ने उसपर पहले गर्भपात का दबाव बनाया और उसके गहने छीन लिए। जब उसने इनका विरोध किया तो उसे बेहरमी से पीटा गया।

खबर के अनुसार, एसएसपी संतोष सिंह ने बताया कि मौदहा कोतवाली क्षेत्र के नराइज गाँव का ये मामला है। यहाँ का निवासी सलमान रायपुर में काम करता था, उसने वहीं एक लड़की (निखत) से निकाह कर लिया। कुछ दिन बाद अनबन हुई तो लड़का अपने घर वापस लौट आया। महिला जब अपने भाई और परिजनों के साथ लड़के के घर में घुसने की कोशिश करने लगी, तो मारपीट हुई। पीड़ित पक्ष ने मामले को दर्ज करवाया है और गर्भपात के आरोप पर उन्होंने कहा है कि ये जाँच का विषय है। जाँच में जो तथ्य सामने आएँगे उसपर उसी अनुसार कार्रवाई होगी।

बाबरी मस्जिद विध्वंस: कल्याण सिंह पर आरोप तय, ₹2 लाख के निजी मुचलके पर मिली जमानत

राजस्थान के पूर्व राज्यपाल और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बाबरी विध्वंस मामले में सीबीआई की विशेष कोर्ट से जमानत मिल गई है। कल्याण सिंह को 2 लाख रुपए के निजी मुचलके पर जमानत मिली। कल्याण सिंह शुक्रवार (सितंबर 27, 2019) को करीब 12:00 बजे कोर्ट में पेश हुए थे। कल्याण सिंह की तरफ से वकीलों ने कोर्ट में सरेंडर एप्लीकेशन दाखिल की थी। साथ ही कल्याण सिंह की तरफ से मामले में जमानत अर्जी भी दाखिल की गई थी। वकीलों ने उनकी खराब सेहत का हवाला देते हुए जमानत अर्जी दाखिल की थी।

साथ ही कोर्ट ने कल्याण सिंह पर आरोप तय कर दिए हैं। उन पर आईपीसी की धारा 153a, 153b और 295 समेत कई धाराओं में आरोप दर्ज किए गए हैं। पेशी के लिए जाने से पहले पत्रकारों से बातचीत में कल्याण सिंह ने कहा था, “सीबीआई कोर्ट ने मुझे आज तलब किया था इसलिए मैं जा रहा हूँ। मैंने हमेशा न्यायालय का सम्मान किया है और करता रहूँगा।”

गौरतलब है कि 6 दिसंबर 1992 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराया गया था। तब कल्याण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री थे। उन पर आरोप है कि उन्होंने बाबरी मस्जिद को नुकसान न होने देने का वादा किया था, लेकिन इसके बाद भी मस्जिद को गिरा दिया गया था। घटना के बाद सिंह ने मामले की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

कल्याण सिंह को 3 सितंबर 2014 को राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया था। 5 साल तक संवैधानिक पद पर होने के कारण सिंह को अदालत की ओर से तलब नहीं किया गया। अनुच्छेद 361 के तहत पेशी से छूट मिली हुई थी। संवैधानिक पद पर होने के कारण न्यायालय ने उन पर बाद में आरोप तय करने को कहा था। अब कल्याण सिंह के राज्यपाल के पद से हटने के बाद सीबीआई कोर्ट ने उन्हें तलब किया है।

चीन में उइगरों की हालत बदतर, कश्मीर से पहले पाक उनकी चिंता करे: अमेरिका की इमरान को दो-टूक

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को निष्क्रिय किए जाने के बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। पाकिस्तान पिछले दो महीने से कश्मीर में मजहब विशेष के मानवाधिकारों के उल्लंघन का रोना रो रहा है। इसके लिए वो ग़लत बयानबाज़ी का कुचक्र तक रच रहा है। इस पर दक्षिण और मध्य एशिया के अमेरिकी कार्यवाहक सहायक सचिव ऐलिस वेल्स ने फ़टकार लगाते हुए कहा कि वो कश्मीर से ध्यान हटाकर चीन में उइगरों पर इलाज के नाम पर हो रहे अत्याचार की चिंता करे। वहाँ उन्हें नज़रबंदी शिविरों में रखा जा रहा है। पाकिस्तान इस विषय पर कोई चिंता ज़ाहिर नहीं करता। 

वेल्स ने कहा,

“ट्रम्प प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में चीन द्वारा उइगरों के नज़रबंदी शिविरों के भयानक हालात के मामलों को उठाया है। उइगरों के लिए ऐसे हालात पूरे चीन में हैं। हम आगे भी इस मसले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना जारी रखेंगे।”

उन्होंने अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के मद्देनज़र परमाणु-हथियारबंद दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच बढ़े तनाव के मुद्दे को संबोधित करते हुए दोनों देशों से बयानबाज़ी को कम करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर पर इमरान ख़ान की टिप्पणियाँ गैरजरूरी थीं।

चीन द्वारा 1 मिलियन से अधिक उइगरों की नज़रबंदी पर पाकिस्तान की चुप्पी पर निशाना साधते हुए वेल्स ने कहा, “मैं पश्चिमी चीन में हिरासत में लिए जा रहे उइगरों के विषय पर पाकिस्तान की ओर से वही प्रतिक्रिया देखना चाहूँगा। उनके मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा सिर्फ़ कश्मीर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक रूप से दुनिया भर में लागू है।”

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान संयुक्त राष्ट्र महासभा के साथ-साथ अन्य कई मंचों से भी कश्मीर मुद्दा उठा चुके हैं। लेकिन उन्हें किसी भी कोशिश में सफलता नहीं मिली। हाल ही में यूएन महासभा में इमरान ने ख़ुद मान लिया कि वे कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में असफल रहे। इमरान ने कहा था कि वे मामले की गंभीरता न समझ पाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से खफ़ा हैं।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अब तक सिर्फ़ चीन ने ही पाक का समर्थन किया है। यूएन में बंद कमरे में कश्मीर समस्या पर बहस कराने के लिए चीन ने ही पाक का साथ दिया था। हालाँकि, उसकी कोशिशें असफल रहीं। 57 देशों के इस्लामिक कोऑपरेशन आर्गनाइजेशन (आईओसी) ने भी पाक का साथ नहीं दिया।

चीन में क़ैद उइगरों के विषय पर इमरान ख़ान पहले भी पर चुप्पी साध चुके हैं। अलजजीरा के एक साक्षात्कार के दौरान पत्रकार मोहम्मद जमजूम ने जब उसने सवाल किया, “पाकिस्तान चीन के साथ घनिष्ठ संबंध रखता है, क्या आपने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कभी उइगरों के उत्पीड़न के मुद्दे पर चर्चा की है?”

इस पर इमरान ने जवाब दिया था कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता इसलिए उन्होंने कोई बात नहीं की। आंतरिक समस्याओं से जूझने का हवाला देकर उन्होंने कहा था कि फ़िलहाल वो देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने में लगे हुए हैं, इसलिए चीन में नज़रबंद उइगरों के मुद्दे पर उन्हें वास्तव में कोई जानकारी नहीं है। इस साक्षात्कार में इमरान ख़ान ने इस बात को भी स्वीकारा था कि अगर भारत के साथ परंपरागत युद्ध हुआ तो उनके देश को मुँह की खानी पड़ेगी।