महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस को बड़ा झटका लगा है। कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व गृहराज्यमंत्री कृपाशंकर सिंह ने मंगलवाार (सितंबर 10, 2019) को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। कृपाशंकर ने महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिलकार्जुन खड़गे को अपना इस्तीफा सौंपा। मल्लिकार्जुन खड़गे महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस प्रभारी हैं।
Congress leader Kripashankar Singh resigns from the party. He submitted his resignation to Congress Maharashtra in-charge Mallikarjun Kharge in Delhi, today. pic.twitter.com/HUMR8BSzSZ
इस्तीफे की वजह बताते हुए कृपाशंकर सिंह ने कहा कि वह कश्मीर को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के रुख से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कॉन्ग्रेस छोड़ दी है क्योंकि मैं जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध करने संबंधी पार्टी के रूख से सहमत नहीं हूँ।” कृपाशंकर सिंह कॉन्ग्रेस की मुंबई इकाई के प्रमुख रह चुके हैं और वो 15 वर्षों तक कॉन्ग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार में मंत्री भी रहे थे।
बता दें कि, 3 सितंबर को जब कृपाशंकर ने अपने घर पर गणपति की स्थापना की थी तो दर्शन के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे कृपाशंकर के घर आए थे। ऐसे में सत्तारूढ़ दल के दो बड़े नेताओं का कॉन्ग्रेस के बड़े नेता के घर आना राजनीतिक गलियारे में चर्चा का विषय बन गया था। मंगलवार को कृपाशंकर के इस्तीफे ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। हालाँकि, सिंह का कहना है कि उचित समय पर वो अपने राजनीतिक रुख का खुलासा करेंगे।
गौरतलब है कि, इससे पहले फिल्मों से राजनीति में आई उर्मिला मातोंडकर ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। उर्मिला मातोंडकर लोकसभा चुनाव के समय कॉन्ग्रेस से जुड़ी थीं और उत्तरी मुंबई सीट से चुनाव लड़ा था। हालाँकि, उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। उर्मिला ने पार्टी छोड़ने की वजह पार्टी के भीतर की तुच्छ राजनीति को बताया। उन्होंने इस्तीफा देते हुए कहा था, “मेरी राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता का एक बड़े लक्ष्य पर काम करने के बजाय मुंबई कॉन्ग्रेस में कुछ लोग आपसी लड़ाई के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।”
कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुहर्रम के मौक़े पर समुदाय विशेष के बंधुओं को सलाम पहुँचाया। हालाँकि, उनके सलाम देने का तरीका बिलकुल आम था लेकिन मुहर्रम के मौक़े को ‘पावन अवसर’ लिखने के कारण लोग सोशल मीडिया पर उनकी चुटकी लेने लगे और देखते ही देखते दिग्विजय सिंह केवल ट्विटर पर ही नहीं पूरे सोशल मीडिया पर ट्रोल होने लगे।
मंगलवार को मुहर्रम के मौक़े पर उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल से लिखा,“सभी मुस्लिम भाईयो और बहनों को मुहर्रम के पावन अवसर पर हमारी सलाम।” दिग्विजय के इस ट्वीट के बाद लोगों ने उनका खूब मजाक उड़ाया और कुछ लोग तो इसे वोट की राजनीति तक बताने लगे। वहीं, कुछ लोगों ने समझाने का प्रयास किया कि पावन अवसर जैसे शब्दों का प्रयोग कब किया जाता है और मुहर्म क्या है?
किसी ने लिखा मुस्लिमों का दिल ऐसे जीतना संभव नहीं। जालीदार टोपियाँ लगाकर सेवईंयाँ बहुत खाईं हैं, अब खुद को कोड़े भी मारो तो जानें।
ईद पर जालीदार टोपी लगा कर सेवईयां तो बहुत खाने जाते हो, अब खुद को कोड़े भी मारो तो जाने
लोगों ने दिग्विजय सिंह को समझाया, “जब कोई मरता है तो उसे हर्षोल्लास से नहीं मनाया जाता, क्या तुम पावन अवसर कहकर इसे मनाना चाहते हो? दिग्गी तुम सेकुलर बनने के चक्कर में 10 कोड़े भी खा लोगे।”
#Muharram is not celebrated, it is observed . When somebody dies, do you celebrate his death and called it पावन अवसर ?
एक यूजर ने तो उनकी इस गलती को उनके बुढ़ापे का असर बताया और कहा कि टोपी लगाकर रोजा खुलवाने जाने वालों को समुदाय विशेष के त्यौहार का भी मालूम नहीं है। ये पावन नहीं मातम है।
ये बुढापे का असर है कि डोज ज्यादा हो गयी है……… टोपी लगाकर रोजा खुलवाने जाने वालों को मुसलमानों के त्यौहार का भी मालूम नहीं है। ये पावन नहीं मातम है
गौरतलब है कि इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार मुहर्रम को मातम का महीना कहा जाता है। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने इसे पावन पर्व बताकर खुद ही आफत मोल ले ली। इसकी वजह से उन्हें लोगों की ऐसी तीखी प्रतिक्रिया झेलनी पड़ी। वास्तव में ये दिन कर्बला में मारे गए मुहम्मद के नवासो के बलिदान का दिन है। इस दिन शोक मनाया जाता है न कि सलाम किया जाता है।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करना मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के 100 दिनों की सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि सरकार का अगला एजेंडा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाना है। जितेंद्र सिंह ने मंगलवार (सितंबर 10, 2019) को प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीओके के मुद्दे पर बात करते हुए कहा, “यह केवल मेरी या मेरी पार्टी की प्रतिबद्धता नहीं है, बल्कि यह 1994 में पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा सर्वसम्मति से पारित संकल्प है। यह एक स्वीकार्य रुख है।” उन्होंने कहा कि सरकार का अगला लक्ष्य गुलाम कश्मीर में तिरंगा लहराना है।
#WATCH Union Min Jitendra Singh:Next agenda is retrieving parts (PoK) of Jammu&Kashmir & making it a part of India. It’s not only my or my party’s commitment,but it’s a part of unanimously passed resolution of Parliament in 1994 by Congress govt headed by PM Narasimha Rao (10.09) pic.twitter.com/jcpfNYyafN
इस दौरान उन्होंने मोदी सरकार की उपलब्धियों को बताते हुए पाकिस्तान को भी आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 निरस्त होने का राग अलापने वाला पाकिस्तान अब खुद पूरी दुनिया में एक्सपोज हो गया है। दुनिया भर के देशों में वो भारत का दुष्प्रचार करने में जुटा हुआ है, लेकिन हर बार उसे मुँह की खानी पड़ी है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ बुरा व्यवहार हो रहा है। भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं।
कश्मीर की तत्कालीन स्थिति के बारे में बात करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कश्मीर न तो बंद है और ना ही कर्फ्यू के साए में है, बल्कि वहाँ सिर्फ कुछ पाबंदियाँ लगी हुई हैं। सिंह ने पत्रकारों से कहा, “हमें ऐसे बयानों की निंदा करने की जरूरत है। कश्मीर बंद नहीं है। वहाँ कर्फ्यू नहीं है। अगर कर्फ्यू होता तो लोगों को ‘कर्फ्यू पास’ के साथ बाहर निकलना होता।”
इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्र विरोध गतिविधियों में शामिल होने वालों को चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें अब ये मानसिकता बदलनी होगी कि वो कुछ भी गलत करके निकल जाएँगे। अब इसके लिए उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया लेकिन वहाँ भारत ने क़रारा जवाब देकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने उसकी पोल खोल दी। सुरक्षा परिषद के बाद अब मानवाधिकार परिषद में भी पाकिस्तान की किरकिरी हुई है। भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव विजय ठाकुर ने कहा कि दुनिया ख़ूब समझती है कि जो देश आतंकवाद का मुख्य केंद्र है, वह ग़लत नैरेटिव फैलाता रहता है।
विजय ठाकुर ने साफ़ कर दिया कि जम्मू कश्मीर भारत का आंतरिक मुद्दा है और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने का निर्णय भारत की संसद ने लिया। उन्होंने बताया कि जम्मू कश्मीर में मूलभूत सुविधाएँ सेवाएँ धीरे-धीरे और आसान की जा रही हैं। उन्होंने जानकारी दी कि भारत सरकार सामाजिक-आर्थिक बराबरी को बढ़ावा देने के लिए प्रगतिशील निर्णय ले रही है।
India calls Pakistan epicentre of terrorism, rejects its false narrative on J-K
जेनेवा में यूएनएचआरसी के मुख्यालय में बोलते हुए ठाकुर ने स्पष्ट कर दिया कि ताज़ा निर्णय के बाद से सभी प्रगतिशील फैसले जम्मू कश्मीर और लद्दाख में भी समान रूप से लागू होंगे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जानकारी दी कि इससे लिंगभेद ख़त्म होगा, महिलाओं को उनके अधिकार मिलेंगे और शिक्षा-सूचना के क्षेत्र में उचित विकास होगा।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को याद दिलाया कि राज्य (पाकिस्तान) समर्थित आतंकवाद का भारत को काफ़ी नुकसान हुआ है। भारत ने कहा, “यह सही समय है जब सब मिल कर उन आतंकियों के ख़िलाफ़ सामूहिक रूप सें निर्णायक क़दम उठाते हुए कार्रवाई करें।” भारत ने साफ़ कर दिया कि जम्मू-कश्मीर पर जो भी निर्णय लिया गया है वो सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हुए लोकतान्त्रिक रूप से संवैधानिक दायरे में रह कर किया गया।
दिल्ली में लाखों बच्चों की जान ख़तरे में है। एक आरटीआई के माध्यम से पता चला है कि राज्य की 35% स्कूलों के पास फायर एनओसी नहीं है। अर्थात, ये स्कूल आग लगने से बचने के मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। दिल्ली में 5773 सरकारी स्कूल हैं, जिसमें से 2011 के पास फायर एनओसी नहीं है। नियम है कि फायर एनओसी लेने के बाद हर तीसरे वर्ष इसे रिन्यू कराना होता है। दिल्ली में कई तो वैसे भी स्कूल हैं, जिन्होंने लगभग पिछले एक दशक से फायर एनओसी को रिन्यू ही नहीं कराया है।
साउथ दिल्ली में 32% ऐसे स्कूल हैं, जहाँ अगर आग लग जाए तो बड़ा ख़तरा हो सकता है क्योंकि इनके पास इस आग के ख़तरे ने निपटने के लिए इंतजाम हैं ही नहीं। साउथ वेस्ट दिल्ली के 31% और वेस्ट दिल्ली के 42% स्कूलों के पास फायर एनओसी नहीं है। सेन्ट्रल दिल्ली की तो स्थित और भी दयनीय है, जहाँ लगभग आधे (48%) स्कूल बिना फायर एनओसी लिए संचालित किए जा रहे हैं। इसी तरह वेस्ट दिल्ली के 29% और ईस्ट दिल्ली के 30% स्कूलों के पास फायर एनओसी नहीं है।
आपको सूरत के एक कोचिंग सेंटर में लगी आग वाली ख़बर तो याद ही होगी। मई 2019 के अंतिम सप्ताह में हुई इस त्रासद घटना में 22 छात्रों की मौत हो गई थी। संस्थान के संचालक को गिरफ़्तार किया गया था और बिल्डर भाग खड़ा हुआ था। उसके बाद शिक्षा संस्थानों में आग से बचने के लिए उचित इंतजाम होने की बहस छिड़ गई थी। दिल्ली में जिस तरह के हालात हैं, अगर इन्हें संभालने के लिए किसी अनहोनी का इंतजार किया गया तो वह मासूम छात्रों की जान के साथ खिलवाड़ होगा।
फायर एनओसी तभी दी जाती है जब स्कूल कुछ तय मानकों पर खरे उतरें, इसके लिए बिल्डिंग में ऊपर जाने के लिए 1.5 मीटर से लम्बी सीढ़ी होनी चाहिए। अगर 45 से ज्यादा क्लास हैं तो सभी में 2 दरवाजे होने ही होने चाहिए। 300 स्क्वायर मीटर में आग बुझाने के उपकरणों की व्यवस्था होनी चाहिए। 5 हजार लीटर की टंकी और स्मोक मैनेजमेंट सिस्टम की व्यवस्था भी होनी चाहिए। बिजली के तार फायर प्रूफ होने चाहिए और एग्जिट किधर है, ये साफ़-साफ़ लिखा होना चाहिए।
दिल्ली के 35% स्कूलों में फायर एनओसी नहीं: ABP न्यूज़ की ख़बर
अफ़सोस की बात है कि दिल्ली के हजारों स्कूल इस मानकों को पूरा नहीं करते। इसका अर्थ है कि अगर वहाँ सूरत जैसी घटना होती है तो काफ़ी भयंकर क्षति होगी। इससे अच्छा क्या अभी से ही स्कूलों को एनओसी दिलाने के लिए उचित इंतजाम नहीं किए जा सकते? दिल्ली के स्कूलों की पोल तब खुली, जब पैरेंट्स एसोसिएशन ने एक आरटीआई दाखिल कर इस सम्बन्ध में सवाल पूछे। 2000 से अधिक स्कूलों में फायर एनओसी का न होने का मतलब है कि 2 लाख बच्चे ख़तरे की जद में आ जाते हैं।
कई स्कूल फायर एनओसी को रिन्यू नहीं कराते। असल में जब स्कूल छोटा होता है तो वे फायर एनओसी ले लेते हैं लेकिन जैसे ही उनका स्ट्रक्चर बढ़ता जाता है, फायर एनओसी लेने के लिए मानक भी कठिन हो जाते हैं और इसीलिए वे लापरवाही बरतते हैं। दिल्ली सरकार ऐसे स्कूलों पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही, यह एक बड़ा सवाल है।
बेगूसराय में एक प्राइवेट ट्यूटर द्वारा 6 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार करने का मामला सामने आया है। दलित परिवार से आने वाली छात्रा को मुस्लिम समुदाय से आने वाले एक शिक्षक ने हवस का शिकार बनाया। इस बात का पता परिवार को तब चला जब पीड़ित बच्ची ने ट्यूशन जाने से मना कर दिया। उसके बाद अपनी माँ के पूछने पर उसने असली वजह बताई। इसकी शिकायत घटना के 7 दिन बाद दर्ज कराई गई। एसपी का कहना है कि इतने दिन बाद शिकायत आने से कुछ अहम सबूतों के गायब होने का ख़तरा रहता है।
पुलिस द्वारा सबूत मिटने की आशंका से इस बात को बल मिलता है कि दोषी सज़ा से ही बच जाए। ये घटना खोदावंदपुर की है। मामला दो समुदायों के बीच का होने के कारण क्षेत्र में तनाव व्याप्त है। बच्ची ने अपनी माँ को बताया था कि उसके पेट में दर्द रहता है और फिर उसने शिक्षक के कुकृत्यों के बारे में बताया। आरोपित का नाम मोहम्मद मुर्तुजा है। बच्ची कुछ दिनों से उसके पास पढ़ने जाने में आनाकानी कर रही थी। परिवार द्वारा सख्ती करने के बाद उसने सारी बात बताई।
बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पीड़ित परिवार से मुलाक़ात कर हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। बजरंग दल ने इस घटना के सम्बन्ध में स्पीडी ट्रायल के माध्यम से दोषी को सज़ा देने की माँग की। पुलिस आरोपित की गिरफ़्तारी के लिए छापेमारी कर रही है। अपने ख़िलाफ़ मामला दर्ज होते ही आरोपित परिजनों सहित घर छोड़ कर फरार हो गया है। पीड़ित बच्ची के बयान से पता चला कि शिक्षक मुर्तुजा होमवर्क कराने के बहाने कमरे में ले जाता था और वहाँ उसका यौन शोषण करता था।
Predictably, no other English publication wrote about this case. Here are two local reports pic.twitter.com/OGRl7muOXZ
पीड़िता की माँ की शिकायत के बाद गाँव में पंचायत भी बैठी। पंचायत में न्याय नहीं मिलने पर आक्रोशित परिजन थाना पहुँचे। पीड़ित बच्ची को मेडिकल टेस्ट के लिए सदर अस्पताल भेजा गया है। पुलिस अभी तक आरोपित को गिरफ़्तार नहीं कर पाई है, इसीलिए लोग आक्रोशित हैं। पीड़िता के चाचा ने स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा को बताया कि मुर्तुजा इससे पहले भी कई छात्रों का यौन शोषण कर चुका है लेकिन अपनी इज्जत के कारण पीड़ित परिवारों ने मामले को दबा दिया।
मुर्तुजा के रिश्तेदार अख्तर के घर पर जब पीड़िता गई तो उसने पीड़ित परिवार को सलाह दी कि इस मामले को दबा कर रखो क्योंकि इससे ‘उन लोगों पर ही कींचड़ उछलेगा।’ मुर्तुजा ने गाँव के द्वारा दी जाने वाली किसी भी सज़ा को मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद गाँव में पंचायत बैठी, जिसमें सिर्फ़ हिन्दू ही शामिल हुए। कोई भी मुस्लिम वहाँ नहीं पहुँचा। पीड़िता व उसके परिजन अभी भी न्याय के इन्तजार में हैं।
20 नवम्बर, 1979 की सुबह थी और शेख मुहम्मद अल सुबायिल करीब 50,000 लोगों की नमाज़ की तैयारी में थे। अचानक करीब पाँच बजे सुबह कुछ हथियारबंद लोगों ने उन्हें घेर लिया। मस्जिद के दरवाजे बंद कर दिए और वहाँ मौजूद जो दो पुलिसकर्मी सिर्फ लाठी से लैस थे, उन्हें मार डाला।
फोटो साभार -अरब न्यूज़
करीब 400 से 500 हथियारबंद लोगों ने सभी नमाज अता करने आए लोगों को अपने काबू में कर लिया। इन हथियारबंद लोगों में कई औरतें और बच्चे भी थे। सभी अल कुओंताय्बी नाम के आन्दोलन से जुड़े हुए इन हमलावरों ने मक्का शहर के बड़े मस्जिद पर कब्ज़ा कर लिया।
सऊदी बिन लादेन ग्रुप इस समय मस्जिद में कुछ मरम्मत का काम कर रही थी। इस से पहले की हमलावर टेलिफोन के तार काट पाते उनके एक कर्मचारी ने बाहर इस बात की सूचना पहुँचा दी। थोड़ी देर में हमलावरों ने कई बंधकों को बाहर निकाल दिया और बाकि के बंधकों को अपने कब्ज़े में लेकर अन्दर बंद रहे। अब बाहर कोई नहीं समझ पा रहा था की अन्दर कितने बंधक और कितने हमलावर मौजूद हैं।
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इस समय अरब के क्राउन प्रिंस फहद ट्यूनेशिया में थे, नेशनल गार्ड के मुखिया प्रिंस अब्दुल्ला मोरक्को गए थे। किंग खालिद ने मस्जिद को छुड़ाने की जिम्मेदारी प्रिंस सुलतान को सौंपी, प्रिंस नाएफ भी उनके साथ गए।
हमले के खबर सुनते ही आंतरिक मंत्रालय के कुछ सौ सिपाहियों ने मस्जिद को छुड़ाने का प्रयास किया लेकिन कई लोग मारे गए और उन्हें हमलावरों के हाथ मस्जिद छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। शाम ढलते-ढलते पूरा मक्का खाली करवा लिया गया। सऊदी अरब की आर्मी और सऊदी अरब नेशनल गार्ड ने भी मोर्चा संभाला। सऊदी इंटेलिजेंस अल मखाबरात अल आम्माह के मुखिया तुर्की बिन फैज़ल अल सउद ने आगे की कमान संभाली। अगले कई दिन तक वो वहीं रहने वाले थे। ऐसे माहौल में मदद के लिए पाकिस्तानियों से भी मदद माँगी गई। मगर कई दिन तक पाकिस्तानी कमांडो भी कुछ नहीं कर पाए।
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आखिर में आई Groupe d’Intervention de la Gendarmerie Nationale (GIGN)! जी हाँ, फ़्रांसिसी कमांडो का एक दस्ता मक्का आया। अब मक्का में गैर मुस्लिमों को घुसने की इज़ाजत तो होती नहीं सो एक छोटे से आयोजन में तीन कमांडो ने धर्म परिवर्तन किया। फिर गैस के गोले अन्दर फेंके गए, अन्दर के चैम्बर में से हमलावरों को खुली जगह में आना पड़ा। दीवारों में ड्रिल कर के अन्दर अब बम फेंक दिए गए। फिर आगे की कार्रवाई में मस्जिद आजाद करवाया जा सका।
इस मामले में ख़ास था कि जैसे ही मस्जिद पर हमलावरों के कब्जे की खबर जारी हुई ईरान के इस्लामिक क्रन्तिकारी अयातोल्ला खोमेनी ने रेडियो पर कहा, इसमें कोई शक नहीं की इस हमले के पीछे अमरीकी और यहूदियों का हाथ है। इन अफवाहों के कारण दुनिया भर में अमेरिका विरोधी प्रदर्शन हुए। इस्लामाबाद में 21 नवम्बर को अमेरिकी एम्बेसी जला के राख कर दी गई। एक हफ्ते बाद लीबिया में भी अमेरिकी एम्बेसी जला दी गई।
अल कहताबी मस्जिद पर हमले में ही मारा गया था लेकिन जुहाय्मन और उसके 67 साथी पकड़े गए थे। सभी पुरुषों की गुप्त पेशी हुई। 9 जनवरी, 1980 को 63 को सऊदी के आठ अलग-अलग शहरों में बीच चौराहे पर सर काट कर मौत की सजा दी गई।
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लड़ाई दो हफ्ते से थोड़ी ज्यादा चली। सरकारी तौर पर 255 हाजी, सिपाही और हमलावर मारे गए थे। करीब 560 जख्मी हुए।
4 साल पहले नवम्बर के महीने में इस्लामिक आतंकी हमला झेलकर फ्रांस ने 40 साल पहले मक्का की मस्जिद बचाने, और इसके अलावा अयातोल्ला खोमैनी को शरण देने की कीमत भर चुकाई थी।
अहमदाबाद के कालूपुर इलाके में दो समुदाय के लोगों के बीच पार्किंग को लेकर हुई हिंसा की एक घटना सामने आई है। जहाँ, कथित तौर पर, बोहरा समुदाय के कुछ लोगों ने मिलकर हिंदू कपड़ा व्यापारी को बुरी तरह पीट दिया। साथ ही उनके कपड़े भी फाड़े, मोबाइल भी तोड़ा और गाड़ी को भी नुकसान पहुँचाया गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कालूपुर में बोहरा गली एक समुदाय विशेष बहुल इलाका है जहाँ पर 80-90 हिंदू व्यापारियों की भी दुकानें हैं। यहाँ अक्सर दूसरे समुदाय के लोग हिंदू व्यापारियों की गाड़ियों को नुकसान पहुँचाते हैं। लेकिन कोई उन्हें कुछ नहीं बोल पाता। ऐसे में 4 सितंबर को करीब 11 बजे भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब गाड़ी पार्क करने के मसले पर वहाँ के बोहरा समाज के लोगों ने उनसे बहस करनी शुरू कर दी और थोड़ी देर में इकट्ठा होकर मारपीट करने लगे।
पीड़ित कपड़ा व्यापारी की मानें तो इस कहा-सुनी के समय सिर्फ़ वहाँ 4-5 लोग ही वहाँ मौजूद थे लेकिन अचानक वहाँ 100 लोगों की भीड़ इकट्ठा होकर उन्हें मारने लगे। दिलीप नाम के इस व्यापारी के मुताबिक ये सब साजिश के तहत हुआ था और अगर किसी को उनकी इस बात पर यकीन नही हो तो वो सीसीटीवी फुटेज भी देख सकता है।
हालाँकि दिलीप के बयान और उनके साथ हुए इस वाकये को उनसे बेहतर कोई नहीं जान-समझ सकता, लेकिन सीसीटीवी फुटेज को देखकर लगता है कि वहाँ भीड़ समझौते के लिहाज़ से इकट्ठा हुई थी, न कि उनपर हमले करने की बाबत से। दिलीप पर हमले की बात पुलिस ने स्वीकारी है लेकिन उसमें अभी तक दूसरे समुदाय के 4-5 ही दोषी जान पड़ रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस घटना के बाद वहाँ के बाजार में अजीब-सी शांति हैं। अधिकतर दुकानदार इस बारे में बात करने से भी कतरा रहे हैं। लेकिन फिर भी वहाँ सभी दुकानदारों का एक मत बताएँ तो उनका कहना है, “दिलीपभाई के साथ जो हुआ वो बेहद ही डरावने स्वप्न की तरह था। ये दिलीपभाई का नसीब ही था कि वे उस भीड़ से बच निकलें।”
आपको बता दें अपने साथ हुई इस घटना पर दिलीप को कानून की ओर से बहुत निराशा हाथ लगी। जिसके कारण उन्हें शक है कि उन्हें न्याय मिलेगा या नहीं। उनकी मानें पहले तो पुलिस इस घटना पर एक्शन लेने को ही नहीं तैयार नहीं थी। उनका कहना था कि बोहरा समाज के लोग समुदाय के बाकी लोगों जैसे नहीं है, लेकिन सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद उन्होंने मामले को दर्ज किया।
इस मामले के संबंध में पुलिस ने कहा, “तारीख़ 4/09/2019 की रोज़ पार्किंग के मसले पर कुतबी महोल्ले में सिंधी समाज के व्यापारी के साथ अंजान 4-5 शख़्सों ने मारपीट की है, जिसके अनुसंधान में हमारे यहाँ कंप्लेंट रजिस्टर करवाई गई है। उन अनजान शख़्सों के ख़िलाफ़ छानबीन शुरू है एवं जल्द से जल्द इस पर कार्रवाई की जाएगी।”
लगभग 40 मिनट के CCTV फुटेज में हमने पाया कि एक व्यक्ति अर्धनग्न अवस्था में एक तरफ से दूसरी तरफ जा रहा है। साथ ही, दसियों लोगों की एक भीड़ भी 3-4 बार कैमरे के फ्रेम में इकठ्ठा होती दिखी। हमने दूसरे समुदाय से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा वो मुहर्रम के बाद ही कुछ बयान देंगे। पुलिस लगातार इसे एक झड़प कह रही है और इसमें सांप्रदायिक एंगल के होने से इनकार कर रही है।
एमनेस्टी इंडिया ख़ुद को मानवाधिकार के लिए कार्य करने वाला संगठन बताता है लेकिन ताज़ा ख़ुलासे से पता चला है कि वह एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी है, जो कमर्शियल रूप में कार्य करता है। उसे यूनाइटेड किंगडम स्थित एमनेस्टी इंटरनेशनल से फंड्स मिलते हैं। इन फंड्स का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए किया जाता है, जिसे मीडिया लपक कर भारत के प्रति नकारात्मक माहौल बनाती है। एमनेस्टी इंडिया ऐसे रिपोर्ट्स तैयार करता है, जिसमें सारा कंटेंट पहले से साज़िश के तहत तैयार रखा जाता है।
रिपब्लिक टीवी द्वारा एक्सेस किए गए डॉक्युमेंट्स के अनुसार, एमनेस्टी इंडिया को पिछले कुछ वर्षों में एमनेस्टी इंटरनेशनल से 5,29,87,663 रुपए मिले हैं। यानी लगभग 5.3 करोड़ रुपयों का इस्तेमाल सिर्फ़ जम्मू कश्मीर के बारे में रिपोर्ट्स तैयार करने के लिए किया गया। 2010 में यह ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया फाउंडेशन ट्रस्ट’ के नाम से शुरू हुआ था लेकिन उन्हें ‘विदेशी योगदान नियंत्रण अधिनियम (FCRA, 2010)’ के तहत गृह मंत्रालय से इजाजत नहीं मिली।
इसके बाद उन्होंने ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नामक एक व्यापारिक अधिष्ठान (कमर्शियल एंटिटी) बनाया ताकि FCRA को बाईपास किया जा सके। ऐसा इसीलिए भी किया गया क्योंकि एक एनजीओ बन कर लाभ नहीं कमाया जा सकता। इसके बाद एमनेस्टी इंडिया को कमर्शियल रास्तों से तरह-तरह के फंड्स मिलने लगे। रिपब्लिक टीवी के अनुसार, आंतरिक लेनदेन की जो प्रक्रिया एमनेस्टी इंडिया द्वारा आजमाई गई, वह एफडीआई के नियमों का सीधा-सीधा उल्लंघन है।
#RepublicExposesAmnesty | Amnesty was paid millions to malign India: 50-page report accessed by Republic TV
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, उसने ख़ुद को एक कंसल्टेंसी सर्विस का जामा पहना कर रुपयों के लेनदेन किया है। ये रुपए एमनेस्टी इंडिया को बाहर से मिले। ख़ुद को ‘एक्सपोर्ट्स एन्ड गुड्स सर्विसेज’ बता कर एमनेस्टी इंडिया ने जम्मू कश्मीर पर नकारात्मक, नकली और झूठे रिपोर्ट्स प्रकाशित किए। एमनेस्टी इंडिया को जम्मू कश्मीर पर अधकचरे झूठ का पुलिंदा प्रकाशित करने के लिए कुख्यात रहा है। एमनेस्टी इंडिया से जुड़े जो दस्तावेज सामने आए हैं, उसमें साफ़ दिख रहा है कि जम्मू कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करते समय क्या-क्या लिखना है और क्या करना है, यह सब पहले से तैयार कर लिया जाता है।
एमनेस्टी इंडिया को 2015 में 65,000 पाउंड्स मिले। इसका इस्तेमाल ‘जम्मू कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा पीड़ित लोगों को न्याय नहीं मिला’ जैसे नकारात्मक और भारत-विरोधी टॉपिक पर रिपोर्ट लिखने के लिए किया गया। ऐसा डॉक्यूमेंट के ‘Deliveries’ वाले सेक्शन में किया गया। रिपोर्ट में कौन सी चीजें हाइलाइट करनी है और क्या नहीं, यह सब बिना ग्राउंड रिपोर्ट जाने किया जाता है, जो सच्चाई से बिलकुल भी मेल नहीं खाता। नीचे दिए गए डाक्यूमेंट्स में आप और भी ऐसे पहले से तैयार किए गए टॉपिक्स और उसके बदले हुए पेमेंट्स का विवरण देख सकते हैं:
डॉक्युमेंट का पेज-1 (फोटो साभार: रिपब्लिक टीवी)
जैसे ऊपर डॉक्यूमेंट के अमाउंट वाले सेक्शन में आप देख सकते हैं कि एमनेस्टी इंडिया को 46,868 पाउंड्स का पेमेंट किया गया है। यह पेमेंट क्यों किया गया? इसके लिए आपको ‘Deliverables’ वाले सेक्शन में देखना पड़ेगा। इसमें 10 ऐसे व्यक्तिगत मामलों को निकालने की बात कही गई है, जहाँ लोगों को न्याय नहीं मिल पाया। क्यों नहीं मिल पाया, इसका कारण ढूँढने को कहा गया है। साथ ही यह मान लिया गया है कि जम्मू कश्मीर में मानवाधिकार हनन (भारत की तरफ़ से) होता है।
इसमें एक फ्रेमवर्क बनाने का टास्क दिया गया है। इस फ्रेमवर्क में विस्तृत तरीके से यह बताया जाएगा कि भारत का सुप्रीम कोर्ट जम्मू कश्मीर में ‘मानवाधिकार हनन’ के ख़िलाफ़ क्या-क्या कर सकता है?
डॉक्यूमेंट का पेज-2 (फोटो साभार: रिपब्लिक टीवी)
इसी तरह ऊपर दिए गए डॉक्यूमेंट के दूसरे पेज में 90,000 डॉलर का पेमेंट देकर कोल रिसर्च प्रोजेक्ट के बारे में नकारात्मकता फैलाने का टास्क दिया गया है।
डॉक्यूमेंट का 11वाँ पेज
इस डॉक्यूमेंट के 11वें पेज पर जम्मू कश्मीर में ‘लोगों पर भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा अत्याचार’ की बात कही गई है, जो पाकिस्तान का वर्षों पुराना प्रोपेगेंडा रहा है। इसमें ऐसे महिलाओं को ढूँढ कर लाने और उनका अनुभव प्रकाशित करने को कहा गया है, जिन्हें यौन शोषण का सामना करना पड़ा। इसके अलावा ऐसे परिवारों के बारे में पता करने को कहा गया है, जिसका कोई सदस्य गायब हो गया। इसी तरह प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए विभिन्न तरीकों की बात की गई है।
जालियाँवाला बाग़ नरसंहार के बारे में तो आपने पढ़ा ही होगा। अप्रैल 1919 में ब्रिटिश जनरल डायर और उसके सैनिकों ने यहाँ ऐसा आतंक मचाया था कि जान बचाने के लिए कई महिलाएँ और बूढ़े-बच्चे तक भी कुँए में कूद गए थे। स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं के मुताबिक़, इस हत्याकांड में कम से कम 1000 लोग मारे गए और इससे काफ़ी ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए। अमृतसर के हरमिंदर साहिब के नजदीक स्थित जालियाँवाला बाग़ के बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर के अंग्रेजों ने वैशाखी मना रहे लोगों का नरसंहार किया था।
अब इंग्लैंड के सबसे वरिष्ठ पादरी ने इस घटना को लेकर माफ़ी माँगी है। जलियाँवाला नरसंहार के 100 वर्ष पूरे होने के बाद उन्होंने माफ़ी माँगते हुए कहा कि वे इसके लिए शर्मिंदा हैं। दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड के कैंटरबरी चर्च के 105वें आर्चबिशप जस्टिन पोर्टल वेबली ने जालियाँवाला बाग़ पहुँच कर उस नरसंहार को याद करते हुए दुःख जताया।
‘चर्च ऑफ इंग्लैंड’ के सबसे वरिष्ठ पादरी वेबली ने कहा कि जलियाँवाला बाग़ में जो अपराध हुआ था, उसके लिए वह शर्मिंदा हैं और एक धार्मिक नेता होने के तौर पर वह इस त्रासदी की निंदा करते हैं। उन्होंने माफ़ी माँगते हुए कहा कि इसकी यादें हमेशा रहेंगी। उन्होंने ज़मीन पर लेट कर प्रार्थना भी की। बिशप जस्टिन अपनी पत्नी कैरोलिन वेबली के साथ 2 दिवसीय अमृतसर दौरे पर पहुँचे हुए हैं।
Punjab: Archbishop of Canterbury, Justin Welby lies on floor during his visit to Jallianwala Bagh in Amritsar. Says, “You have remembered what they have done and their memory will live. I’m ashamed and sorry for the crime committed here, as a religious leader I mourn the tragedy” pic.twitter.com/CyPho3lFYC
वेबली ने कहा कि वह ब्रिटिश सरकार की तरफ से नहीं बोल सकते हैं क्योंकि वह सरकार के आदमी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वह जीसस क्राइस्ट के नाम पर बोल सकते हैं। उन्होंने कहा कि वह मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए और इंग्लैंड-भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए प्रार्थना करने आए हैं। इस दौरान उन्होंने भारत की तारीफ करते हुए कहा कि यह दौरा एक तीर्थयात्रा के समान रहा है।