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POK को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाना, वहाँ तिरंगा लहराना हमारा अगला लक्ष्य: केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करना मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के 100 दिनों की सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि सरकार का अगला एजेंडा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाना है। जितेंद्र सिंह ने मंगलवार (सितंबर 10, 2019) को प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीओके के मुद्दे पर बात करते हुए कहा, “यह केवल मेरी या मेरी पार्टी की प्रतिबद्धता नहीं है, बल्कि यह 1994 में पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा सर्वसम्मति से पारित संकल्प है। यह एक स्वीकार्य रुख है।” उन्होंने कहा कि सरकार का अगला लक्ष्य गुलाम कश्मीर में तिरंगा लहराना है।

इस दौरान उन्होंने मोदी सरकार की उपलब्धियों को बताते हुए पाकिस्तान को भी आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 निरस्त होने का राग अलापने वाला पाकिस्तान अब खुद पूरी दुनिया में एक्सपोज हो गया है। दुनिया भर के देशों में वो भारत का दुष्प्रचार करने में जुटा हुआ है, लेकिन हर बार उसे मुँह की खानी पड़ी है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ बुरा व्यवहार हो रहा है। भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं। 

कश्मीर की तत्कालीन स्थिति के बारे में बात करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कश्मीर न तो बंद है और ना ही कर्फ्यू के साए में है, बल्कि वहाँ सिर्फ कुछ पाबंदियाँ लगी हुई हैं। सिंह ने पत्रकारों से कहा, “हमें ऐसे बयानों की निंदा करने की जरूरत है। कश्मीर बंद नहीं है। वहाँ कर्फ्यू नहीं है। अगर कर्फ्यू होता तो लोगों को ‘कर्फ्यू पास’ के साथ बाहर निकलना होता।”

इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्र विरोध गतिविधियों में शामिल होने वालों को चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें अब ये मानसिकता बदलनी होगी कि वो कुछ भी गलत करके निकल जाएँगे। अब इसके लिए उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

UNSC के बाद अब मानवाधिकार परिषद में भी पाकिस्तान की किरकिरी, विजय ठाकुर ने बखिया उधेड़ी

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया लेकिन वहाँ भारत ने क़रारा जवाब देकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने उसकी पोल खोल दी। सुरक्षा परिषद के बाद अब मानवाधिकार परिषद में भी पाकिस्तान की किरकिरी हुई है। भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव विजय ठाकुर ने कहा कि दुनिया ख़ूब समझती है कि जो देश आतंकवाद का मुख्य केंद्र है, वह ग़लत नैरेटिव फैलाता रहता है।

विजय ठाकुर ने साफ़ कर दिया कि जम्मू कश्मीर भारत का आंतरिक मुद्दा है और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने का निर्णय भारत की संसद ने लिया। उन्होंने बताया कि जम्मू कश्मीर में मूलभूत सुविधाएँ सेवाएँ धीरे-धीरे और आसान की जा रही हैं। उन्होंने जानकारी दी कि भारत सरकार सामाजिक-आर्थिक बराबरी को बढ़ावा देने के लिए प्रगतिशील निर्णय ले रही है।

जेनेवा में यूएनएचआरसी के मुख्यालय में बोलते हुए ठाकुर ने स्पष्ट कर दिया कि ताज़ा निर्णय के बाद से सभी प्रगतिशील फैसले जम्मू कश्मीर और लद्दाख में भी समान रूप से लागू होंगे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जानकारी दी कि इससे लिंगभेद ख़त्म होगा, महिलाओं को उनके अधिकार मिलेंगे और शिक्षा-सूचना के क्षेत्र में उचित विकास होगा।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को याद दिलाया कि राज्य (पाकिस्तान) समर्थित आतंकवाद का भारत को काफ़ी नुकसान हुआ है। भारत ने कहा, “यह सही समय है जब सब मिल कर उन आतंकियों के ख़िलाफ़ सामूहिक रूप सें निर्णायक क़दम उठाते हुए कार्रवाई करें।” भारत ने साफ़ कर दिया कि जम्मू-कश्मीर पर जो भी निर्णय लिया गया है वो सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हुए लोकतान्त्रिक रूप से संवैधानिक दायरे में रह कर किया गया।

दिल्ली के 35% स्कूलों के पास नहीं है फायर NOC, 2 लाख बच्चे जद में: अनहोनी के इन्तजार में केजरी सरकार?

दिल्ली में लाखों बच्चों की जान ख़तरे में है। एक आरटीआई के माध्यम से पता चला है कि राज्य की 35% स्कूलों के पास फायर एनओसी नहीं है। अर्थात, ये स्कूल आग लगने से बचने के मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। दिल्ली में 5773 सरकारी स्कूल हैं, जिसमें से 2011 के पास फायर एनओसी नहीं है। नियम है कि फायर एनओसी लेने के बाद हर तीसरे वर्ष इसे रिन्यू कराना होता है। दिल्ली में कई तो वैसे भी स्कूल हैं, जिन्होंने लगभग पिछले एक दशक से फायर एनओसी को रिन्यू ही नहीं कराया है।

साउथ दिल्ली में 32% ऐसे स्कूल हैं, जहाँ अगर आग लग जाए तो बड़ा ख़तरा हो सकता है क्योंकि इनके पास इस आग के ख़तरे ने निपटने के लिए इंतजाम हैं ही नहीं। साउथ वेस्ट दिल्ली के 31% और वेस्ट दिल्ली के 42% स्कूलों के पास फायर एनओसी नहीं है। सेन्ट्रल दिल्ली की तो स्थित और भी दयनीय है, जहाँ लगभग आधे (48%) स्कूल बिना फायर एनओसी लिए संचालित किए जा रहे हैं। इसी तरह वेस्ट दिल्ली के 29% और ईस्ट दिल्ली के 30% स्कूलों के पास फायर एनओसी नहीं है।

आपको सूरत के एक कोचिंग सेंटर में लगी आग वाली ख़बर तो याद ही होगी। मई 2019 के अंतिम सप्ताह में हुई इस त्रासद घटना में 22 छात्रों की मौत हो गई थी। संस्थान के संचालक को गिरफ़्तार किया गया था और बिल्डर भाग खड़ा हुआ था। उसके बाद शिक्षा संस्थानों में आग से बचने के लिए उचित इंतजाम होने की बहस छिड़ गई थी। दिल्ली में जिस तरह के हालात हैं, अगर इन्हें संभालने के लिए किसी अनहोनी का इंतजार किया गया तो वह मासूम छात्रों की जान के साथ खिलवाड़ होगा।

फायर एनओसी तभी दी जाती है जब स्कूल कुछ तय मानकों पर खरे उतरें, इसके लिए बिल्डिंग में ऊपर जाने के लिए 1.5 मीटर से लम्बी सीढ़ी होनी चाहिए। अगर 45 से ज्यादा क्लास हैं तो सभी में 2 दरवाजे होने ही होने चाहिए। 300 स्क्वायर मीटर में आग बुझाने के उपकरणों की व्यवस्था होनी चाहिए। 5 हजार लीटर की टंकी और स्मोक मैनेजमेंट सिस्टम की व्यवस्था भी होनी चाहिए। बिजली के तार फायर प्रूफ होने चाहिए और एग्जिट किधर है, ये साफ़-साफ़ लिखा होना चाहिए।

दिल्ली के 35% स्कूलों में फायर एनओसी नहीं: ABP न्यूज़ की ख़बर

अफ़सोस की बात है कि दिल्ली के हजारों स्कूल इस मानकों को पूरा नहीं करते। इसका अर्थ है कि अगर वहाँ सूरत जैसी घटना होती है तो काफ़ी भयंकर क्षति होगी। इससे अच्छा क्या अभी से ही स्कूलों को एनओसी दिलाने के लिए उचित इंतजाम नहीं किए जा सकते? दिल्ली के स्कूलों की पोल तब खुली, जब पैरेंट्स एसोसिएशन ने एक आरटीआई दाखिल कर इस सम्बन्ध में सवाल पूछे। 2000 से अधिक स्कूलों में फायर एनओसी का न होने का मतलब है कि 2 लाख बच्चे ख़तरे की जद में आ जाते हैं।

कई स्कूल फायर एनओसी को रिन्यू नहीं कराते। असल में जब स्कूल छोटा होता है तो वे फायर एनओसी ले लेते हैं लेकिन जैसे ही उनका स्ट्रक्चर बढ़ता जाता है, फायर एनओसी लेने के लिए मानक भी कठिन हो जाते हैं और इसीलिए वे लापरवाही बरतते हैं। दिल्ली सरकार ऐसे स्कूलों पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही, यह एक बड़ा सवाल है।

प्राइवेट ट्यूटर मोहम्मद मुर्तुजा ने किया 6 वर्षीय दलित बच्ची का बलात्कार, FIR दर्ज, आरोपित फरार

बेगूसराय में एक प्राइवेट ट्यूटर द्वारा 6 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार करने का मामला सामने आया है। दलित परिवार से आने वाली छात्रा को मुस्लिम समुदाय से आने वाले एक शिक्षक ने हवस का शिकार बनाया। इस बात का पता परिवार को तब चला जब पीड़ित बच्ची ने ट्यूशन जाने से मना कर दिया। उसके बाद अपनी माँ के पूछने पर उसने असली वजह बताई। इसकी शिकायत घटना के 7 दिन बाद दर्ज कराई गई। एसपी का कहना है कि इतने दिन बाद शिकायत आने से कुछ अहम सबूतों के गायब होने का ख़तरा रहता है।

पुलिस द्वारा सबूत मिटने की आशंका से इस बात को बल मिलता है कि दोषी सज़ा से ही बच जाए। ये घटना खोदावंदपुर की है। मामला दो समुदायों के बीच का होने के कारण क्षेत्र में तनाव व्याप्त है। बच्ची ने अपनी माँ को बताया था कि उसके पेट में दर्द रहता है और फिर उसने शिक्षक के कुकृत्यों के बारे में बताया। आरोपित का नाम मोहम्मद मुर्तुजा है। बच्ची कुछ दिनों से उसके पास पढ़ने जाने में आनाकानी कर रही थी। परिवार द्वारा सख्ती करने के बाद उसने सारी बात बताई।

बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पीड़ित परिवार से मुलाक़ात कर हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। बजरंग दल ने इस घटना के सम्बन्ध में स्पीडी ट्रायल के माध्यम से दोषी को सज़ा देने की माँग की। पुलिस आरोपित की गिरफ़्तारी के लिए छापेमारी कर रही है। अपने ख़िलाफ़ मामला दर्ज होते ही आरोपित परिजनों सहित घर छोड़ कर फरार हो गया है। पीड़ित बच्ची के बयान से पता चला कि शिक्षक मुर्तुजा होमवर्क कराने के बहाने कमरे में ले जाता था और वहाँ उसका यौन शोषण करता था।

पीड़िता की माँ की शिकायत के बाद गाँव में पंचायत भी बैठी। पंचायत में न्याय नहीं मिलने पर आक्रोशित परिजन थाना पहुँचे। पीड़ित बच्ची को मेडिकल टेस्ट के लिए सदर अस्पताल भेजा गया है। पुलिस अभी तक आरोपित को गिरफ़्तार नहीं कर पाई है, इसीलिए लोग आक्रोशित हैं। पीड़िता के चाचा ने स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा को बताया कि मुर्तुजा इससे पहले भी कई छात्रों का यौन शोषण कर चुका है लेकिन अपनी इज्जत के कारण पीड़ित परिवारों ने मामले को दबा दिया।

मुर्तुजा के रिश्तेदार अख्तर के घर पर जब पीड़िता गई तो उसने पीड़ित परिवार को सलाह दी कि इस मामले को दबा कर रखो क्योंकि इससे ‘उन लोगों पर ही कींचड़ उछलेगा।’ मुर्तुजा ने गाँव के द्वारा दी जाने वाली किसी भी सज़ा को मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद गाँव में पंचायत बैठी, जिसमें सिर्फ़ हिन्दू ही शामिल हुए। कोई भी मुस्लिम वहाँ नहीं पहुँचा। पीड़िता व उसके परिजन अभी भी न्याय के इन्तजार में हैं।

जब फ़्रांस ने कीमत चुकाई थी मक्का बचाने की…

20 नवम्बर, 1979 की सुबह थी और शेख मुहम्मद अल सुबायिल करीब 50,000 लोगों की नमाज़ की तैयारी में थे। अचानक करीब पाँच बजे सुबह कुछ हथियारबंद लोगों ने उन्हें घेर लिया। मस्जिद के दरवाजे बंद कर दिए और वहाँ मौजूद जो दो पुलिसकर्मी सिर्फ लाठी से लैस थे, उन्हें मार डाला।


फोटो साभार -अरब न्यूज़

करीब 400 से 500 हथियारबंद लोगों ने सभी नमाज अता करने आए लोगों को अपने काबू में कर लिया। इन हथियारबंद लोगों में कई औरतें और बच्चे भी थे। सभी अल कुओंताय्बी नाम के आन्दोलन से जुड़े हुए इन हमलावरों ने मक्का शहर के बड़े मस्जिद पर कब्ज़ा कर लिया।

सऊदी बिन लादेन ग्रुप इस समय मस्जिद में कुछ मरम्मत का काम कर रही थी। इस से पहले की हमलावर टेलिफोन के तार काट पाते उनके एक कर्मचारी ने बाहर इस बात की सूचना पहुँचा दी। थोड़ी देर में हमलावरों ने कई बंधकों को बाहर निकाल दिया और बाकि के बंधकों को अपने कब्ज़े में लेकर अन्दर बंद रहे। अब बाहर कोई नहीं समझ पा रहा था की अन्दर कितने बंधक और कितने हमलावर मौजूद हैं।


फोटो साभार -अरब न्यूज़

इस समय अरब के क्राउन प्रिंस फहद ट्यूनेशिया में थे, नेशनल गार्ड के मुखिया प्रिंस अब्दुल्ला मोरक्को गए थे। किंग खालिद ने मस्जिद को छुड़ाने की जिम्मेदारी प्रिंस सुलतान को सौंपी, प्रिंस नाएफ भी उनके साथ गए।

हमले के खबर सुनते ही आंतरिक मंत्रालय के कुछ सौ सिपाहियों ने मस्जिद को छुड़ाने का प्रयास किया लेकिन कई लोग मारे गए और उन्हें हमलावरों के हाथ मस्जिद छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। शाम ढलते-ढलते पूरा मक्का खाली करवा लिया गया। सऊदी अरब की आर्मी और सऊदी अरब नेशनल गार्ड ने भी मोर्चा संभाला। सऊदी इंटेलिजेंस अल मखाबरात अल आम्माह के मुखिया तुर्की बिन फैज़ल अल सउद ने आगे की कमान संभाली। अगले कई दिन तक वो वहीं रहने वाले थे। ऐसे माहौल में मदद के लिए पाकिस्तानियों से भी मदद माँगी गई। मगर कई दिन तक पाकिस्तानी कमांडो भी कुछ नहीं कर पाए।


फोटो साभार -अरब न्यूज़

आखिर में आई Groupe d’Intervention de la Gendarmerie Nationale (GIGN)! जी हाँ, फ़्रांसिसी कमांडो का एक दस्ता मक्का आया। अब मक्का में गैर मुस्लिमों को घुसने की इज़ाजत तो होती नहीं सो एक छोटे से आयोजन में तीन कमांडो ने धर्म परिवर्तन किया। फिर गैस के गोले अन्दर फेंके गए, अन्दर के चैम्बर में से हमलावरों को खुली जगह में आना पड़ा। दीवारों में ड्रिल कर के अन्दर अब बम फेंक दिए गए। फिर आगे की कार्रवाई में मस्जिद आजाद करवाया जा सका।

इस मामले में ख़ास था कि जैसे ही मस्जिद पर हमलावरों के कब्जे की खबर जारी हुई ईरान के इस्लामिक क्रन्तिकारी अयातोल्ला खोमेनी ने रेडियो पर कहा, इसमें कोई शक नहीं की इस हमले के पीछे अमरीकी और यहूदियों का हाथ है। इन अफवाहों के कारण दुनिया भर में अमेरिका विरोधी प्रदर्शन हुए। इस्लामाबाद में 21 नवम्बर को अमेरिकी एम्बेसी जला के राख कर दी गई। एक हफ्ते बाद लीबिया में भी अमेरिकी एम्बेसी जला दी गई।

अल कहताबी मस्जिद पर हमले में ही मारा गया था लेकिन जुहाय्मन और उसके 67 साथी पकड़े गए थे। सभी पुरुषों की गुप्त पेशी हुई। 9 जनवरी, 1980 को 63 को सऊदी के आठ अलग-अलग शहरों में बीच चौराहे पर सर काट कर मौत की सजा दी गई।

फोटो साभार -अरब न्यूज़

लड़ाई दो हफ्ते से थोड़ी ज्यादा चली। सरकारी तौर पर 255 हाजी, सिपाही और हमलावर मारे गए थे। करीब 560 जख्मी हुए।

4 साल पहले नवम्बर के महीने में इस्लामिक आतंकी हमला झेलकर फ्रांस ने 40 साल पहले मक्का की मस्जिद बचाने, और इसके अलावा अयातोल्ला खोमैनी को शरण देने की कीमत भर चुकाई थी।

फ्रांस अटैक जिसकी जिम्मेदारी ISIS ने ली थी।

हिन्दू हूँ, दूसरे समुदाय के 100 लोगों ने लिंच करने की कोशिश की: अहमदाबाद कपड़ा व्यापारी

अहमदाबाद के कालूपुर इलाके में दो समुदाय के लोगों के बीच पार्किंग को लेकर हुई हिंसा की एक घटना सामने आई है। जहाँ, कथित तौर पर, बोहरा समुदाय के कुछ लोगों ने मिलकर हिंदू कपड़ा व्यापारी को बुरी तरह पीट दिया। साथ ही उनके कपड़े भी फाड़े, मोबाइल भी तोड़ा और गाड़ी को भी नुकसान पहुँचाया गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कालूपुर में बोहरा गली एक समुदाय विशेष बहुल इलाका है जहाँ पर 80-90 हिंदू व्यापारियों की भी दुकानें हैं। यहाँ अक्सर दूसरे समुदाय के लोग हिंदू व्यापारियों की गाड़ियों को नुकसान पहुँचाते हैं। लेकिन कोई उन्हें कुछ नहीं बोल पाता। ऐसे में 4 सितंबर को करीब 11 बजे भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब गाड़ी पार्क करने के मसले पर वहाँ के बोहरा समाज के लोगों ने उनसे बहस करनी शुरू कर दी और थोड़ी देर में इकट्ठा होकर मारपीट करने लगे।

पीड़ित कपड़ा व्यापारी की मानें तो इस कहा-सुनी के समय सिर्फ़ वहाँ 4-5 लोग ही वहाँ मौजूद थे लेकिन अचानक वहाँ 100 लोगों की भीड़ इकट्ठा होकर उन्हें मारने लगे। दिलीप नाम के इस व्यापारी के मुताबिक ये सब साजिश के तहत हुआ था और अगर किसी को उनकी इस बात पर यकीन नही हो तो वो सीसीटीवी फुटेज भी देख सकता है।

हालाँकि दिलीप के बयान और उनके साथ हुए इस वाकये को उनसे बेहतर कोई नहीं जान-समझ सकता, लेकिन सीसीटीवी फुटेज को देखकर लगता है कि वहाँ भीड़ समझौते के लिहाज़ से इकट्ठा हुई थी, न कि उनपर हमले करने की बाबत से। दिलीप पर हमले की बात पुलिस ने स्वीकारी है लेकिन उसमें अभी तक दूसरे समुदाय के 4-5 ही दोषी जान पड़ रहे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस घटना के बाद वहाँ के बाजार में अजीब-सी शांति हैं। अधिकतर दुकानदार इस बारे में बात करने से भी कतरा रहे हैं। लेकिन फिर भी वहाँ सभी दुकानदारों का एक मत बताएँ तो उनका कहना है, “दिलीपभाई के साथ जो हुआ वो बेहद ही डरावने स्वप्न की तरह था। ये दिलीपभाई का नसीब ही था कि वे उस भीड़ से बच निकलें।”

आपको बता दें अपने साथ हुई इस घटना पर दिलीप को कानून की ओर से बहुत निराशा हाथ लगी। जिसके कारण उन्हें शक है कि उन्हें न्याय मिलेगा या नहीं। उनकी मानें पहले तो पुलिस इस घटना पर एक्शन लेने को ही नहीं तैयार नहीं थी। उनका कहना था कि बोहरा समाज के लोग समुदाय के बाकी लोगों जैसे नहीं है, लेकिन सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद उन्होंने मामले को दर्ज किया।

इस मामले के संबंध में पुलिस ने कहा, “तारीख़ 4/09/2019 की रोज़ पार्किंग के मसले पर कुतबी महोल्ले में सिंधी समाज के व्यापारी के साथ अंजान 4-5 शख़्सों ने मारपीट की है, जिसके अनुसंधान में हमारे यहाँ कंप्लेंट रजिस्टर करवाई गई है। उन अनजान शख़्सों के ख़िलाफ़ छानबीन शुरू है एवं जल्द से जल्द इस पर कार्रवाई की जाएगी।”

लगभग 40 मिनट के CCTV फुटेज में हमने पाया कि एक व्यक्ति अर्धनग्न अवस्था में एक तरफ से दूसरी तरफ जा रहा है। साथ ही, दसियों लोगों की एक भीड़ भी 3-4 बार कैमरे के फ्रेम में इकठ्ठा होती दिखी। हमने दूसरे समुदाय से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा वो मुहर्रम के बाद ही कुछ बयान देंगे। पुलिस लगातार इसे एक झड़प कह रही है और इसमें सांप्रदायिक एंगल के होने से इनकार कर रही है।

J&K पर फेक रिपोर्ट्स बनाने के लिए एमनेस्टी इंडिया को विदेश से मिले करोड़ों रुपए: डाक्यूमेंट्स से ख़ुलासा

एमनेस्टी इंडिया ख़ुद को मानवाधिकार के लिए कार्य करने वाला संगठन बताता है लेकिन ताज़ा ख़ुलासे से पता चला है कि वह एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी है, जो कमर्शियल रूप में कार्य करता है। उसे यूनाइटेड किंगडम स्थित एमनेस्टी इंटरनेशनल से फंड्स मिलते हैं। इन फंड्स का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए किया जाता है, जिसे मीडिया लपक कर भारत के प्रति नकारात्मक माहौल बनाती है। एमनेस्टी इंडिया ऐसे रिपोर्ट्स तैयार करता है, जिसमें सारा कंटेंट पहले से साज़िश के तहत तैयार रखा जाता है।

रिपब्लिक टीवी द्वारा एक्सेस किए गए डॉक्युमेंट्स के अनुसार, एमनेस्टी इंडिया को पिछले कुछ वर्षों में एमनेस्टी इंटरनेशनल से 5,29,87,663 रुपए मिले हैं। यानी लगभग 5.3 करोड़ रुपयों का इस्तेमाल सिर्फ़ जम्मू कश्मीर के बारे में रिपोर्ट्स तैयार करने के लिए किया गया। 2010 में यह ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया फाउंडेशन ट्रस्ट’ के नाम से शुरू हुआ था लेकिन उन्हें ‘विदेशी योगदान नियंत्रण अधिनियम (FCRA, 2010)’ के तहत गृह मंत्रालय से इजाजत नहीं मिली।

इसके बाद उन्होंने ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नामक एक व्यापारिक अधिष्ठान (कमर्शियल एंटिटी) बनाया ताकि FCRA को बाईपास किया जा सके। ऐसा इसीलिए भी किया गया क्योंकि एक एनजीओ बन कर लाभ नहीं कमाया जा सकता। इसके बाद एमनेस्टी इंडिया को कमर्शियल रास्तों से तरह-तरह के फंड्स मिलने लगे। रिपब्लिक टीवी के अनुसार, आंतरिक लेनदेन की जो प्रक्रिया एमनेस्टी इंडिया द्वारा आजमाई गई, वह एफडीआई के नियमों का सीधा-सीधा उल्लंघन है।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, उसने ख़ुद को एक कंसल्टेंसी सर्विस का जामा पहना कर रुपयों के लेनदेन किया है। ये रुपए एमनेस्टी इंडिया को बाहर से मिले। ख़ुद को ‘एक्सपोर्ट्स एन्ड गुड्स सर्विसेज’ बता कर एमनेस्टी इंडिया ने जम्मू कश्मीर पर नकारात्मक, नकली और झूठे रिपोर्ट्स प्रकाशित किए। एमनेस्टी इंडिया को जम्मू कश्मीर पर अधकचरे झूठ का पुलिंदा प्रकाशित करने के लिए कुख्यात रहा है। एमनेस्टी इंडिया से जुड़े जो दस्तावेज सामने आए हैं, उसमें साफ़ दिख रहा है कि जम्मू कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करते समय क्या-क्या लिखना है और क्या करना है, यह सब पहले से तैयार कर लिया जाता है।

एमनेस्टी इंडिया को 2015 में 65,000 पाउंड्स मिले। इसका इस्तेमाल ‘जम्मू कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा पीड़ित लोगों को न्याय नहीं मिला’ जैसे नकारात्मक और भारत-विरोधी टॉपिक पर रिपोर्ट लिखने के लिए किया गया। ऐसा डॉक्यूमेंट के ‘Deliveries’ वाले सेक्शन में किया गया। रिपोर्ट में कौन सी चीजें हाइलाइट करनी है और क्या नहीं, यह सब बिना ग्राउंड रिपोर्ट जाने किया जाता है, जो सच्चाई से बिलकुल भी मेल नहीं खाता। नीचे दिए गए डाक्यूमेंट्स में आप और भी ऐसे पहले से तैयार किए गए टॉपिक्स और उसके बदले हुए पेमेंट्स का विवरण देख सकते हैं:

डॉक्युमेंट का पेज-1 (फोटो साभार: रिपब्लिक टीवी)

जैसे ऊपर डॉक्यूमेंट के अमाउंट वाले सेक्शन में आप देख सकते हैं कि एमनेस्टी इंडिया को 46,868 पाउंड्स का पेमेंट किया गया है। यह पेमेंट क्यों किया गया? इसके लिए आपको ‘Deliverables’ वाले सेक्शन में देखना पड़ेगा। इसमें 10 ऐसे व्यक्तिगत मामलों को निकालने की बात कही गई है, जहाँ लोगों को न्याय नहीं मिल पाया। क्यों नहीं मिल पाया, इसका कारण ढूँढने को कहा गया है। साथ ही यह मान लिया गया है कि जम्मू कश्मीर में मानवाधिकार हनन (भारत की तरफ़ से) होता है।

इसमें एक फ्रेमवर्क बनाने का टास्क दिया गया है। इस फ्रेमवर्क में विस्तृत तरीके से यह बताया जाएगा कि भारत का सुप्रीम कोर्ट जम्मू कश्मीर में ‘मानवाधिकार हनन’ के ख़िलाफ़ क्या-क्या कर सकता है?

डॉक्यूमेंट का पेज-2 (फोटो साभार: रिपब्लिक टीवी)

इसी तरह ऊपर दिए गए डॉक्यूमेंट के दूसरे पेज में 90,000 डॉलर का पेमेंट देकर कोल रिसर्च प्रोजेक्ट के बारे में नकारात्मकता फैलाने का टास्क दिया गया है।

डॉक्यूमेंट का 11वाँ पेज

इस डॉक्यूमेंट के 11वें पेज पर जम्मू कश्मीर में ‘लोगों पर भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा अत्याचार’ की बात कही गई है, जो पाकिस्तान का वर्षों पुराना प्रोपेगेंडा रहा है। इसमें ऐसे महिलाओं को ढूँढ कर लाने और उनका अनुभव प्रकाशित करने को कहा गया है, जिन्हें यौन शोषण का सामना करना पड़ा। इसके अलावा ऐसे परिवारों के बारे में पता करने को कहा गया है, जिसका कोई सदस्य गायब हो गया। इसी तरह प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए विभिन्न तरीकों की बात की गई है।

इंग्लैंड के सबसे वरिष्ठ पादरी ने जलियाँवाला नरसंहार के लिए माँगी माफ़ी, लेट कर की प्रार्थना

जालियाँवाला बाग़ नरसंहार के बारे में तो आपने पढ़ा ही होगा। अप्रैल 1919 में ब्रिटिश जनरल डायर और उसके सैनिकों ने यहाँ ऐसा आतंक मचाया था कि जान बचाने के लिए कई महिलाएँ और बूढ़े-बच्चे तक भी कुँए में कूद गए थे। स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं के मुताबिक़, इस हत्याकांड में कम से कम 1000 लोग मारे गए और इससे काफ़ी ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए। अमृतसर के हरमिंदर साहिब के नजदीक स्थित जालियाँवाला बाग़ के बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर के अंग्रेजों ने वैशाखी मना रहे लोगों का नरसंहार किया था।

अब इंग्लैंड के सबसे वरिष्ठ पादरी ने इस घटना को लेकर माफ़ी माँगी है। जलियाँवाला नरसंहार के 100 वर्ष पूरे होने के बाद उन्होंने माफ़ी माँगते हुए कहा कि वे इसके लिए शर्मिंदा हैं। दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड के कैंटरबरी चर्च के 105वें आर्चबिशप जस्टिन पोर्टल वेबली ने जालियाँवाला बाग़ पहुँच कर उस नरसंहार को याद करते हुए दुःख जताया।

‘चर्च ऑफ इंग्लैंड’ के सबसे वरिष्ठ पादरी वेबली ने कहा कि जलियाँवाला बाग़ में जो अपराध हुआ था, उसके लिए वह शर्मिंदा हैं और एक धार्मिक नेता होने के तौर पर वह इस त्रासदी की निंदा करते हैं। उन्होंने माफ़ी माँगते हुए कहा कि इसकी यादें हमेशा रहेंगी। उन्होंने ज़मीन पर लेट कर प्रार्थना भी की। बिशप जस्टिन अपनी पत्नी कैरोलिन वेबली के साथ 2 दिवसीय अमृतसर दौरे पर पहुँचे हुए हैं।

वेबली ने कहा कि वह ब्रिटिश सरकार की तरफ से नहीं बोल सकते हैं क्योंकि वह सरकार के आदमी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वह जीसस क्राइस्ट के नाम पर बोल सकते हैं। उन्होंने कहा कि वह मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए और इंग्लैंड-भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए प्रार्थना करने आए हैं। इस दौरान उन्होंने भारत की तारीफ करते हुए कहा कि यह दौरा एक तीर्थयात्रा के समान रहा है।

पिछले 1 महीने में सुरक्षाबलों ने एक भी गोली नहीं चलाई: कश्मीर पर फेक न्यूज़ फैलाने पर पाकिस्तान को फटकार

जम्मू-कश्मीर राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सलाहकार फारूक खान ने पाकिस्तान पर झूठ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद कश्मीर में कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने में प्रशासन सफल रहा है। पिछले एक महीने से अधिक समय से सुरक्षा बलों की ओर से एक भी गोली नहीं चलाई गई है। कश्मीर में लोगों की जान की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। धीरे-धीरे घाटी में सामान्य स्थिति लौट रही है।

उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि एक महीने से अधिक समय बीत गया, लेकिन सुरक्षा बलों तथा पुलिस की ओर से कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए एक भी गोली नहीं चलाई गई। यह बड़ी बात है। यह सच्चाई है। उन्होंने कश्मीरियों से अपील की है कि पाकिस्तानी दुष्प्रचार से वो किसी भी प्रकार के उकसावे में न आए।

पूर्व आईएएस ऑफिसर ने कहा कि केंद्र सरकार ने पाकिस्तानी दुष्प्रचार को नाकाम कर दिया, जिसकी वजह से झूठ के सहारे कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का पाकिस्तान का प्रयास नाकाम हो गया। उन्होंने कहा कि घाटी में कारोबारी तथा व्यापारिक गतिविधियाँ जल्द ही बहाल हो जाएँगी। कश्मीर के हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। आप जल्द देखेंगे कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं तथा कारोबारी गतिविधियाँ भी सामान्य हो जाएँगी। सोपोर में एक परिवार पर आतंकी हमले को उन्होंने हताशा में की गई कार्रवाई बताया, जिसमें ढाई साल का बच्चा घायल हो गया था।

इसके अलावा, फारूक खान ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित सभी फर्जी खबरों को खारिज कर दिया, जो पाकिस्तानी प्रचार चैनलों, पाकिस्तानी अधिकारियों और भारतीय मीडिया के भीतर पाकिस्तान के लिए सहानुभूति रखने वाले कुछ समर्थकों द्वारा फैलाए जा रहे हैं।

5 अगस्त को केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर पर लिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद ट्विटर और फेसबुक जैसी विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइटों पर फर्जी खबरों और अफवाहों की बाढ़ सी आ गई। इसी वजह से पिछले महीने गृह मंत्रालय को इस तरह की फर्जी खबर फैलाने वाले तकरीबन 8 लाख अकाउंट को ब्लॉक करने के लिए कहना पड़ा।

रवीश जी को पुरस्कार मिलने पर मोदी (नरेंद्र) ने क्यों नहीं दी बधाई? जलते हैं क्या?

रवीश कुमार को पुनः बधाई समेत उनसे गुजारिश करना चाहूँगा कि भक्त और चाटुकार आपके भी कम नहीं हैं और ऐसे में आप इस बात के लिए मोदी या किसी और को दोषी ठहराते हुए नंगे हो जाते हैं। हाँ, ये बात सही है कि मोदी के भक्त अक्ल से थोड़े अधिक पैदल हैं जबकि आपके वाले पढ़े-लिखे, सभ्य और अधिक तिकड़मी हैं।जहाँ गाली-गलौज में दोनों ही एक समान हैं, वहीं एक विशेष अंतर जो इनके मेन्टल स्टेट का है – जहाँ मोदी भक्त तृप्त और संतुष्ट हैं वहीं रवीश जी के भक्त अधिकतर अंदर से जले-भुने, कुढ़े, चिड़चिड़े, असंतुष्ट और कुछ अचीव न कर पाने का क्षोभ लिए।

खैर, तो रवीश जी को पुरस्कार मिल गया। बधाई बधाई बधाई। मेरी समझ से संभवतः यह ब्रह्मांड का पहला पुरस्कार होगा जो उसे उस चीज के लिए मिला है, जिसको वही आदमी गलत ठहराता और झूठ कहता रहा है। देश में असहिष्णुता है, डर का माहौल है और अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, ऐसा कहने वाले रवीश जी को अपनी अभिव्यक्ति के लिए ही पुरस्कार मिल गया।

फ़िलहाल संभ्रांत रवीश भक्तों की तंग गली में ताजा विषय है पुरस्कार पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या फिर किसी और ने बधाई क्यों नहीं दी? जबकि रवीश जी अपनी पहचान वाली पत्रकारिता 2014 में छोड़ चुके थे और तब तक एक पत्रकार के तौर पर मध्यम वर्ग के दिलों में राज करते थे – उन्हें नरेंद्र मोदी और उनके कारण उत्पन्न असहिष्णुता का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिसकी वजह से यह सब संभव हुआ।

वैसे भी मध्यम वर्ग के दिलों पर राज करने से ठुल्लू मिलता आया है, सो आदमी वर्ग विशेष का चहेता क्यों कर न बने भला! तब यह और आसान हो जाता है जबकि देश में विपक्ष के नाम पर शून्य हो! हमें विरोध करने को, अपनी कुत्सित मानसिकता दर्ज करने को, अपने आप को भीड़ से अलग साबित करने को और बस विरोध के लिए विरोध करने को कोई तो अड्डा चाहिए न। सो रवीश जी की वॉल यह शून्य भरता (अंडा) अड्डा बना।

अपने सोशल मीडिया के अनुभव से कह सकता हूँ कि प्रसंशा या (बड़ी वाली) शुभकामनाएँ उसे अधिक मिलती हैं जो सकारात्मक हो, एक धड़े को पकड़ कर रहे, आदर्श बातें करने के बजाय उसे अपने चरित्र में दिखाए और कभी एकतरफा या चुनिंदा सोच लिए न हो। यह भारतीय पत्रकारिता की बदकिस्मती से रवीश जी इनमें कहीं भी फिट नहीं बैठते हैं। यह दुनिया के आठवें आश्चर्य से क्या कम है कि जो सरकार अपना कार्यकाल पूरा करके पहले से अधिक बहुमत लाती है, उस सरकार में रवीश जी को कोई सकारात्मक बात नहीं दिखी?

2007 के एक आलेख में रवीश जी लिखते हैं – “मनमोहन सिंह किसी जात बिरादरी के नेता की तरह अंतिम संस्कार के भोज, शादी, विदाई के वक्त संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। सरकार के मुखिया की तरह कुछ कर नहीं रहे हैं। रिलायंस के कार्टेल के सामने क्या मनमोहन सिंह खड़े हो सकते हैं? राजनीति में भी परिवारों का कार्टेल बन रहा है। क्या उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं? मनमोहन सिंह व्यक्तिगत जीवन में संयम से रहते हैं। उनकी बेटियां आज भी साधारण रूप से कॉलेजों में पढ़ाने जाती हैं। कोई अहंकार नहीं। मगर क्या वो इस व्यक्तिगत कामयाबी को सामाजिक या राष्ट्रीय कामयाबी में बदल सकते हैं? नहीं।”

“वो भाषण दे सकते हैं। सो दे रहे हैं। बहुत ही बेकार भाषण देते हैं। खुद ईमानदार होने पर बधाई। मगर अपराधी, भ्रष्ट नेताओं को मंत्री बनाने की बेबसी पर लानत। मनमोहन सिंह जैसे बेबस ईमानदारों से ऐसे ही भाषणों की उम्मीद की जा सकती है। मर्दाना कमजोरी से बचने के लिए हस्तमैथुन से संयम बरते की सलाह देने वाले सड़क छाप बाबाओं की तरह मनमोहन सिंह के इस भाषण पर बहुत गुस्सा आया है।”

ऐसा लिखने वाले रवीश आज चिदंबरम की गिरफ़्तारी पर मौन ओढ़ ले रहे हैं। यदि सिर्फ सत्ता को गाली देने की बातें ही सही मान लें तो कल को क्या ऐसा होगा कि रवीश जी पदच्युत होने के बाद मोदी के खिलाफ कुछ नहीं कहेंगे?

दरअसल अब ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहाँ रवीश अपनी एक आँख बंद करके रिपोर्टिंग करते दिखे हैं। और तो और अब वो अच्छा दिखने और इमेज बनाने के लिए भी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। ताजा उदाहरण है कशिश टीवी द्वारा मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड पर किए कार्य की सराहना पर। रवीश खुद तो इस पर कोई कार्यक्रम नहीं कर पाए किन्तु इस कांड के कवरेज के लिए पत्रकार की खूब तारीफ की, बिना मेहनत इस न्यूज को कवर कर फुटेज ली।

आज जबकि यह चैनल और वो पत्रकार इस खबर को किसी मज़बूरी में कवर करना छोड़ चुका है, रवीश जी नहीं पूछते। क्योंकि रवीश जी को इससे फुटेज नहीं मिलेगा। उनका यह आदर्शवाद का ढोंग वहाँ भी दिखता है, जहाँ वो एक तरफ ऐसा कार्यक्रम करते हैं जिसमें कहा जाता है कि देश में बात सुनी नहीं जा रही, सब गलत हो रहा है और दूसरी तरफ वो यह कार्यक्रम भी करते हुए दिखते हैं कि – हें, हें, हें!!! मेरी रिपोर्टिंग की वजह से (मोदी राज में ही) ट्रेन समय पर हो गई, लोगों को नौकरियाँ मिल गईं, विश्वविद्यालय में सुधार हो गया!!!

ऐसे में जबकि देश की अर्थव्यवस्था को एड्स हो जाने की ख़बरें आ रही हैं, देश के आम आदमी को अब (मोदी राज में भी) सब कुछ ठीक कर देने वाले सिर्फ और सिर्फ रवीश जी के उस प्राइम टाइम का इंतजार है, जिसमें वो कहेंगे कि देखिए मेरे प्राइम टाइम का असर हुआ – अर्थव्यवस्था का एड्स भी ठीक होने को है!!! हें हें हें हें!

यह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं गर रवीश जी आपको प्राइम टाइम में कहते सुनाई दें – “हमें रोजगार को सिर्फ नौकरी की नजर से नहीं देखना चाहिए, बिजनेस भी तो रोजगार ही है!!! और आप देखिए कि 10 साल पहले के मेरे ट्वीट की वजह से आज का युवा अपना बिजनेस कर स्वावलंबी हो रहा है।” 

शायद विषयांतर हो गया है और यह हो ही जाता है। क्योंकि हमारे बिहारी बाबू ने इतना रायता फैलाया हुआ है कि उसे समेटने में विषयांतर हो ही जाता है! वो भी तब जबकि वो रायते में रंग मिलाकर रंग बदलने के माहिर हों। तो रवीश जी को पुरस्कार मिला और जैसा कि ऊपर लिख चुका हूँ, इसके लिए सबसे बड़े बधाई के पात्र हैं देश में उनकी आवाज दबाने वाले मोदी जी। इस पुरस्कार के लिए बधाई के दूसरे सबसे बड़े पात्र प्रणय रॉय हैं जिन्होंने खुद की इमेज से बचाते हुए, विपरीत समय में भी रवीश कुमार को NDTV का प्लेटफॉर्म दिया।

मैं नरेंद्र मोदी और प्रणय रॉय को साधुवाद देता हूँ और इसी लाइन में रवीश जी को बधाई नहीं लिखता हूँ क्योंकि किसी बड़े आदमी ने न तो आज की क्रांति – सोलर पावर के काम के लिए हरीश हंडे को मैग्सेसे पुरस्कार के लिए बधाई दी थी और न ही रूरल डेवलेपमेंट के लिए मैग्सेसे पाने वाले दीप जोशी को। रेमन मैग्सेसे पाने वाले गूँज वाले अंशुल गुप्ता और संजीव चतुर्वेदी को कितने लोगों ने बधाई दी थी! क्या उनके मुकाबले का कोई काम है रवीश जी का?