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कोई भी महिला सड़क पर नहीं दिखनी चाहिए, स्कूल-दुकानें खुलीं तो जला देंगे: J&K में आतंकी संगठन

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35-A के निरस्त होने के बाद से ही घाटी में दहशत और आतंक फैलाने वाले आतंकी बौखला गए हैं। इसी बौखलाहट में आतंकियों ने जम्मू कश्मीर के लोगों को धमकी दी है। भारतीय सेना के अनुसार, आतंकवादी समूहों ने कश्मीर घाटी में दुकानें और स्कूल खोले जाने के विरोध में कई जगहों पर पोस्टर्स लगाकर स्थानीय लोगों को धमकी दी है। इन पोस्टर्स में महिलाओं को बाहर न निकलने की धमकी दी गई है और उन्हें घरों के भीतर रहने को कहा गया है।

ग़ौरतलब है कि अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद से ही जम्मू-कश्मीर कड़े सुरक्षा घेरे में है। सुरक्षा के मद्देनज़र अभी भी घाटी के अधिकांश क्षेत्रों में संचार लाइन्स की बहाली नहीं की गई है।

सेना के अधिकारियों ने कहा कि आतंकी संगठनों हिज़बुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा से संबंधित पोस्टर बरामद किए गए हैं। कुलगाम ज़िले से बरामद हिज़बुल मुजाहिदीन के एक पोस्टर में स्थानीय लोगों को अपने निजी वाहनों को चलाने से मना किया गया है, इसके उन्हें चेतावनी दी गई है।

इनमें से एक पोस्टर में लिखा था,

“हमारे पास कुछ निजी वाहनों के पंजीकरण नंबर हैं जो अभी भी सड़कों पर चल रहे हैं और हम उनके मालिकों को एक अंतिम चेतावनी जारी कर रहे हैं। कोई भी रास्ता नहीं खोला जाना चाहिए। कोई भी महिला सड़क पर नहीं दिखनी चाहिए। महिलाएँ अपने घर में रहें।” 

अधिकारियों के अनुसार, आतंकवादियों ने विशेष रूप से व्यापारियों को चेतावनी दी है कि वो अपनी दुकानें न खोलें, घाटी में बाज़ार बंद रहने चाहिए। अधिकारियों ने बताया कि 21 अगस्त को तीन आतंकवादियों ने अनंतनाग के ऐशमुकम बाज़ार में व्यापारियों को अपनी दुकानें खोलने के ख़िलाफ़ धमकी दी थी। उसी दिन, चार आतंकवादियों ने पुलवामा ज़िले में व्यापारियों को धमकाया था कि वो कश्मीर के बाहर फल न भेजें।

इसके अलावा, आतंकवादियों ने 24 अगस्त को अनंतनाग में व्यापारियों को दुकानें खोलने से मना किया और अगले दिन, तीन आतंकवादियों ने नाशपाती बेचने वालों के बाग मालिकों को भी धमकी दी। 27 अगस्त को, आतंकवादियों ने व्यापारियों को धमकी दी थी कि अगर वे अपनी दुकानें खोलेंगे तो उनकी दुकानें जला दी जाएँगी।

श्रीनगर के परिमपोरा इलाके में शुक्रवार (30 अगस्त) को अज्ञात बाइक सवार आतंकवादियों ने एक दुकानदार पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चला दी थीं। इसके बाद, 65 वर्षीय पीड़ित, गुलाम मोहम्मद ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था।

‘मुझे सिर्फ चाकू चलाना आता है इसलिए… बम बनाना सिखा दो, तो उससे लोगों को मारूँगा’

वॉशिंगटन में इस्लामिक स्टेट (आईएस) से प्रेरित हमले की योजना बनाने के आरोप में पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक अवैस चौधरी को गिरफ्तार कर लिया गया है। न्यायिक विभाग ने शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को यह जानकारी दी। कोर्ट ने अवैस को आतंकी संगठन का समर्थन करने और हमले की योजना बनाने के आरोप में बिना जमानत के जेल भेजने का आदेश दिया है।

न्यू यॉर्क सिटी पुलिस कमिश्नर जेम्स ओ’नील ने कहा कि अवैस चौधरी शहर में कई लोगों की हत्या करने की योजना बना रहा था। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। दोषी पाए जाने पर 20 की सजा हो सकती है। उन्होंने कहा कि इस गिरफ्तारी से कई लोगों की जान बची है।

न्यूयॉर्क पुलिस विभाग ने बताया कि अवैस चौधरी वर्ल्ड फेयर मरीना और लागार्डिया हवाई अड्डे के पास फ्लशिंग बे प्रोमेनेड पर अकेले ही चाकू से हमले की योजना (Lone Wolf स्टाइल में) बना रहा था। लेकिन अवैस चौधरी ने एक गलती कर दी। उसने अपनी योजना अंडरकवर एजेंट को अपना साथी समझ बताना शुरू कर दिया। 23 अगस्त को उसने उस जगह के बारे में बताना शुरू किया, जहाँ वो हमला करने वाला था। फिर अगले दिन उसने जगह का मुआयना किया और वहाँ से भागने के संभावित मार्गों के बारे में पता लगाया। इसके बाद उसने रविवार (अगस्त 25, 2019) और सोमवार (अगस्त 26, 2019) को हमले से संबंधित चीजों (जिनकी मदद से वो हमले को अंजाम देता) का ऑर्डर दिया।

दिलचस्प बात ये है कि आरोपित अवैस ने अंडरकवर एजेंट को आईएस का आदमी का समझकर उसे अपने हमले की रणनीति के बारे में बताया। अवैसी ने कहा कि वो लोगों के ऊपर चाकू से हमला करने वाला है, क्योंकि उसे सिर्फ चाकू चलाना ही आता है। लेकिन यदि वो (अंडरकवर एजेंट) उसे बम बनाने का तरीका सिखा देंगे, तो वो बमबारी करके भी हमला कर सकता है। 

अभियोजन पक्ष ने बताया कि अवैस ने एक अन्य अंडरकवर एजेंट को “इस्लामिक स्टेट” शीर्षक के एक दस्तावेज़ का एक स्क्रीनशॉट दिखाया। जिसमें हमला करने की जगह और उसकी रुपरेखा के बारे में बताया गया था। उस दस्तावेज में बताया गया था कि लोगों के ऊपर चाकू से हमला किस तरह से करना है और इस दौरान खुद को कैसे चाकू से बचाना है।

फारुख ने खुद करवाई शेविंग लेकिन धर्म के डर से फैलाई अफवाह – मुझे ट्रेन में मारा, काट डाली दाढ़ी

उत्तर प्रदेश में झूठी कहानी बनाकर सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने के लगातार मामले सामने आ रहे हैं। ताजा मामला बागपत का है, जहाँ एक मुस्लिम युवक ने सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश की। मुस्लिम युवक ने उसके साथ ट्रेन में मारपीट करने और जबरदस्ती दाढ़ी को काटने की अफवाह फैलाकर माहौल खराब करने की कोशिश की। जिसकी जाँच में जुटी पुलिस ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया।

दरअसल, बागपत के मुगलपुरा मोहल्ले के रहने वाले मुस्लिम युवक फारुख ने जबरन दाढ़ी काटने की अफवाह फैलाने की कोशिश की। फारुख ने वीडियो बनाया और उसके एक दोस्त साजिद ने इसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। उसने वीडिया के साथ लिखा कि फारुख को बागपत में ट्रेन में खींचकर पीटा गया और जबरन उसकी दाढ़ी काट दी गई। साजिद ने पीड़ित के लिए मदद माँगी थी। पोस्ट में यूजर ने यूपी पुलिस, बागपत पुलिस, रेल मंत्रालय, सीएम योगी आदित्यनाथ और अमित शाह को टैग किया था। इसके अलावा पोस्ट में एक फोन नंबर भी लिखा था, जो पीड़ित के भाई का बताया गया था।

दैनिक जागरण में छपी खबर का स्क्रीनशॉट

जब पुलिस ने इस संवेदनशील मामले की जाँच शुरू की तो मामला कुछ और ही निकला। बागपत के एसपी प्रताप गोपेंद्र यादव ने बताया कि फारुख को विश्वास में लेकर जब पूछताछ की गई तो उसने झूठी अफवाह फैलाने की बात कबूल कर ली। उसने बताया कि वह कुछ साल पहले एक इज्तमा में शामिल हुआ था। इसमें तकरीर से प्रभावित होकर उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी। अब कुछ दिन से गर्मी अधिक होने के कारण वह दाढ़ी से परेशान था और दाढ़ी कटवाना चाह रहा था। लेकिन, समाज व धर्म का भय था। इसलिए उसने जबरदस्ती दाढ़ी कटवाने की झूठी कहानी बनाई। फारुख ने बताया कि उसने लोनी में रहने वाले अपने एक दोस्त के पास पहुँचकर अपनी दाढ़ी कटवा ली और घर लौटते वक्त खुद ही अपने कपड़े फाड़कर ये अफवाह फैलाई कि ट्रेन में उसके साथ मारपीट की गई और दाढ़ी काट दी गई।

अगवा सिख लड़की पहुँची घर, हाफ़िज़ सईद के आतंकी संगठन के मो. हसन से करवाया गया था निकाह

पाकिस्तान में सिख समुदाय की लड़की को अगवा किए जाने के बाद जबरन इस्लाम क़बूल करवाने और निक़ाह करवाने के मामले में नया मोड़ आया है। भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर से पाकिस्तान पर बने दवाब के चलते पीड़िता को सुरक्षित उसके घर पहुँचा दिया गया है। वहीं, पंजाब प्रांत की ननकाना साहिब पुलिस ने इस मामले में आठ आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया है।

गुरुवार (29 अगस्त) को सामने आए इस मामले में भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज की थी। केंद्र सरकार ने शुक्रवार (30 अगस्त) को इस मामले में पाकिस्तान सरकार से बात कर तत्काल प्रभाव से ठोस क़दम उठाने की माँग की थी। ख़बर के अनुसार, अगवा की गई सिख लड़की का जबरन निक़ाह जिससे करवाया गया था, उसका नाम मोहम्मद हसन है और वो हाफ़िज़ सईद के आतंकवादी संगठन जमात-उद-दावा का सदस्य है।

दरअसल, पाकिस्तान के ननकाना साहिब गुरुद्वारा तंबी साहिब के एक ग्रन्थि (सिख पुजारी) की बेटी पिछले चार दिनों से लापता थी। इसके बाद गुरुवार को लड़की के धर्मांतरण और निक़ाह की बात सामने आई। इस मामले में अगवा (लड़की के परिवार वालों द्वारा लगाए गए आरोप के अनुसार) की गई सिख लड़की के निक़ाह का एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें वो साफ़ तौर पर डरी-सहमी दिख रही थी। इस वीडियो में एक मौलवी उसे उसके इस्लामी नाम आइशा से बुलाता नज़र आया।

इस मामले पर शिरोमणि अकाली दल के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने सोशल मीडिया पर दो वीडियो शेयर किए। इन वीडियो में लड़की के मजबूर परिजन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से मदद की गुहार लगाते दिखे। रहे हैं। इस वीडियो में लड़की एक भाई मनमोहन सिंह ने बताया कि उसकी बहन को धमकी दी गई थी कि अगर उसने इस्लाम क़बूल नहीं किया तो उसके भाई और पिता को गोली मार दी जाएगी।

इसके अलावा, अगवा लड़की के दूसरे भाई सुरेंद्र सिंह ने बताया कि रात के समय उनकी छोटी बहन को गुंडे घसीटकर ले गए, ज़बरदस्ती इस्लाम क़बूल करवाया। इस मामले को लेकर जब परिजन पुलिस स्टेशन गए तो वहाँ उनकी न तो किसी ने कोई बात ही सुनी और न ही किसी तरह की कोई मदद की। 

घर आने पर वही गुंडे वापस उनके घर आए और उन्हें डराया-धमकाया और उन्हें कोई कार्रवाई न करने के लिए कहा। ऐसा न करने पर सभी को इस्लाम क़बूल करवाने की धमकी दी गई। सुरेंद्र सिंह ने इमरान ख़ान और चीफ़ जस्टिस से इंसाफ़ की माँग करते हुए कहा था कि अगर उनकी छोटी बहन को सुरक्षित वापस नहीं लाया गया तो वो 31 अगस्त को गवर्नर हाउस के सामने पूरे परिवार के साथ आत्मदाह कर लेगा।

Twitter के CEO जैक डोर्सी का अकाउंट हैक, लिखा – ‘नाजी जर्मनी ने कुछ भी गलत नहीं किया’

ट्विटर के सीईओ जैक डोरसी का आधिकारिक ट्विटर अकाउंट शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) दोपहर को हैक कर लिया गया। जिसके बाद उनके आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से एक के बाद एक कई ट्वीट किए गए, जिनमें से कई पोस्ट में नस्लवाद, धमकी और जबरन वसूली की माँग शामिल है। इसके साथ ही हैकर्स ने कुछ ऐसे पोस्ट को भी रीट्वीट किया जिसमें लिखा था कि नाजी जर्मनी ने कुछ भी गलत नहीं किया है। कई ट्वीट्स आधे घंटे से ज्यादा समय तक उनकी प्रोफाइल पर ही दिखते रहे। बाद में ट्विटर की टेक टीम ने उनके अकाउंट को रिकवर कर लिया। डोर्सी के करीब 42 लाख फॉलोअर्स हैं।

ट्विटर का कहना है कि वो इस घटना की जाँच कर रहा है। कंपनी ने उन अकाउंट्स को सस्पेंड कर दिया, जिन्हें डोर्सी के हैक अकाउंट से रीट्वीट किया गया था। इसके अलावा कुछ अन्य अकाउंट्स को भी शक के आधार पर बंद कर दिया गया। चकल स्क्वाड नाम के एक ग्रुप ने हैकिंग की जिम्मेदारी ली है। जैक का अकाउंट हैक होने के बाद उससे हिटलर के समर्थन और नाजी जर्मनी पर ट्वीट किए गए। इसके अलावा खुद जैक पर नस्लीय टिप्पणी करते हुए मैसेज भी पोस्ट किए गए। एक और ट्वीट में हैकर्स ने ट्विटर के हेडक्वार्टर में बम होने की अफवाह भी उड़ाई। ट्विटर ने बाद में इन सभी मैसेज को डिलीट कर दिया। 

ट्विटर पर यह ऑनलाइन हमला डोर्सी के यूजर्स से उस वादे के बाद हुआ है, जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया से जल्द से जल्द हेट स्पीच खत्म करने की बात कही थी। बता दें कि इससे पहले 2016 में भी डोर्सी का अकाउंट हैक हो चुका है। तब अवरमाइन नाम के एक हैकर ग्रुप ने उनके अकाउंट से कई पोस्ट किए थे।

इमाम नहीं भिखारी बना रहे मदरसे: मौलवी भीख मॅंगवाते हैं, जंजीरों में बॉंध कर रखते हैं और रोज पीटते हैं

मदरसे केवल बच्चों के यौन शोषण के अड्डे ही नहीं हैं। मुल्लों की ज्यादतियों की लिस्ट बेहद लंबी है। झकझोर देने वाली। इंसानियत को शर्मसार करने वाली।

दीनी तालीम के नाम पर चल रहे मदरसे बच्चों को भिखारी बना रहे हैं। मौलवी बच्चों को जंजीरों में बॉंध कर रखते हैं। रोज पीटते हैं। गुलामों सरीखा सलूक करते हैं।

फिर भी समुदाय विशेष के गरीब बच्चों को इस उम्मीद से मदरसे भेजते हैं कि वह बड़ा होकर इमाम बनेगा। अम्मी-अब्बू को जब ज्यादतियों का पता चलता है तो धर्म और मौलवियों के खौफ से वे खामोश हो जाते हैं।

आपको ले चलता हूॅं अफ्रीकी मुल्क सेनेगल। करीब डेढ़ करोड़ की आबादी वाले इस देश के 90 फीसदी लोग समुदाय विशेष से हैं। यहॉं मदरसों को डारा कहते हैं। इनमें पढ़ने वाले बच्चों को तालिब और पढ़ाने वाले मौलवी को माराबू।

डारा में कुरान के अलावा शराफत भी सिखाई जाती है। यूॅं तो शराफत का मतलब विनम्रता होता है, लेकिन डारा शराफत के नाम पर बच्चों को भीख मॉंगने के लिए मजबूर करते हैं।

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक सेनेगल में करीब 1 लाख तालिब भीख मॉंग रहे हैं। ऐसे ज्यादातर तालिब की उम्र 12 साल से कम है। कुछ तो 4 साल के ही हैं। इसी संस्था ने 2010 के अपने अध्ययन में अनुमान लगाया था कि सेनेगल के मदरसों में पढ़ने वाले करीब 50 हजार बच्चे भीख मॉंग रहे हैं। यानी 10 से भी कम साल में इनकी संख्या दोगुनी हो चुकी है।

वैसे, इसके खिलाफ कानून सेनेगल करीब 15 साल पहले ही बना चुका है। ह्यूमन राइट्स वॉच और सेनेगल के मानवाधिकार समूहों के संगठन पीपीडीएच की अपील के बाद हाल में राष्ट्रपति मैकी साल ने बच्चों को सड़कों से वापस लाने और उनसे भीख मॅंगवाने वाले मौलवियों की गिरफ्तारी के आदेश भी दिए हैं। लेकिन, इससे हालात बदलने की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा रही।

मदरसे रेप के अड्डे और मुल्लों का डर!

इसका कारण मुस्लिम बहुल समाज में मुल्लों का दबदबा है। बताया जाता है कि मदरसों में बच्चों को खाना-पीना मिल जाता है। कुछ मदरसे बीमार होने पर इलाज भी करा देते हैं। इसलिए सब कुछ जान कर भी गरीब परिवार के लोग बच्चों को डारा भेज देते हैं।

मौलवियों के खौफ के बारे में बताते हुए एक वकील ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया- एक पीड़ित तालिब को माराबू ने भरी अदालत के सामने मारने की धमकी दी। बाद में पीड़ित पलट गया और मामला खत्म हो गया।

डारा में बच्चे किस हालात में रहते हैं इसके सबूत फोटोग्राफर मारियो क्रूज की फोटो बुक ‘Talibes: Modern Day Slaves‘ में मौजूद हैं। तस्वीरें देख आपकी रूह कॉंप जाएगी। इन तस्वीरों के लिए क्रूज को अपने जान जोखिम में डालने पड़े थे।

हृयूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट बताती है कि बच्चों से भीख मॅंगवाकर कुछ मौलवी साल भर में करीब एक लाख डॉलर कमा लेते हैं। आठ साल के डेम्बा के अनुसार- एक मौलवी ने मुझ से रात भर सड़कों पर भीख मॅंगवाई। सुबह एक नशेड़ी ने सारा पैसा छीन लिया।

मानवाधिकार संगठनों के अनुसार बच्चे भीख में पर्याप्त पैसा नहीं लाते तो उनकी मौलवी बुरी तरह से पिटाई करते हैं। 10 साल के सुलेमान का कहना है- जब तक मैं कुरान सीख नहीं लेता अपने मॉं-बाप से नहीं मिल सकता। मुझे माराबू को 200 फ्रांक लाकर देने होते हैं, नहीं तो मेरी पिटाई होती है। एक अन्य तालिब मूसा ने बताया- मेरे माता पिता को पता है कि मैं माराबू को पैसा देने के लिए भीख मॉंगता हूॅं। वे इसके खिलाफ कुछ नहीं करते। मुझे भीख मॉंगना पसंद नहीं। लेकिन कोई चारा नहीं है।

प्रताड़ना से तंग आकर बहुत सारे बच्चे डारा से भाग भी जाते हैं। लेकिन, इससे उनकी परेशानियों का अंत नहीं होता, क्योंकि मदरसे भीख मॉंगने के अलावा उन्हें कुछ और सिखाते नहीं। हृयूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में डकार के एक डारा से 2018 में भागे तालिब के हवाले से कहा गया है- मुझे डारा पसंद नहीं। वहॉं हमेशा पिटाई होती है। कुरान याद न हो तो भी पिटाई। पैसे लेकर नहीं आएँ तब भी पिटाई। मौलवी तब तक मारते हैं जब तक मौत का एहसास न हो।

डॉयचे वेले के अनुसार राहत संगठन मेसन ड दे ला गार के संस्थापक ईसा कूयाते एक बच्चे की कहानी सुनाते हुए रोने लगते हैं। 8 साल के एक बच्चे ने उन्हें अपनी आपबीती बताई। मदरसे से भागे इस बच्चे का सड़क पर रात में बलात्कार किया गया। कूयाते ने संयोग से उसे बचा लिया। 13 साल का न्गोरसेक डारा से भागने के बाद सेंट लुई शहर में कचरे के डब्बे में खाना खोजता राहत संगठनों को मिला था। उसने कहा- मैं डारा से भाग गया, क्योंकि अब बर्दाश्त नहीं होता।

हृयूमन राइट्स वॉच की ताजा रिपोर्ट में 2017-2018 के बीच डारा में पिटाई, यौन शोषण और भीख मॉंगने से हुई 16 बच्चों की मौत का भी जिक्र है। इसके मुताबिक सजा के तौर पर तालिब को जेल की कोठरी जैसे कमरों में हफ्तों या महीनों तक बंद रखा जाता है। बच्चे भागे नहीं इसलिए उन्हें जंजीर से बॉंध दिया जाता है।

मानवाधिकार संगठनों के अनुसार जब-जब हल्ला होता है पुलिस बच्चों को सड़क से उठाकर ले जाती है। लेकिन, उनको भीख मॉंगने के लिए मजबूर करने वाले मौलवियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। कभी-कभार कार्रवाई होती भी है तो प्रभावशाली मौलवी उसके विरोध में उठ खड़े होते हैं।

ऐसे में मदरसों के इन बच्चों की त्रासदी का अंत होता नहीं दिख रहा। जैसा कि ह्यूमन राइट्स वॉच की एसोसिएट डायरेक्टर (अफ्रीका) कोर्नी डुफका कहती हैं- तालिब गलियों में भटक रहे हैं। भयंकर यातना झेल रहे हैं। शोषण से मर रहे हैं।

मीडिया को सत्ता का गुंडा बताने वाले रवीश के 4P- प्रपंच, पाखंड, प्रोपेगेंडा, प्रलाप

“काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी, तेरी नाल सरोवर पानी।
जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास।”

कबीर के इस दोहे का अर्थ है- “नलिनी तुम क्यों नाहक कुम्हलाई जाती हो, तुम्हारी नाल सरोवर के पानी में है, तुम्हारी उत्पत्ति और निवास ही जल में है, फिर कुम्हलाने की वजह?”

मार्केटिंग में 4’P का कॉन्सेप्ट होता है और यह पूरा उद्योग इन्हीं 4’P’ के आसपास मंडराता रहता है। इसी तरह से रवीश कुमार ने भी कुछ ‘P/प’ ईजाद किए हैं- प्रपंच, पाखंड, प्रोपेगंडा और प्रलाप!

दिन रात इन 4P’s से घिरे होने के बावजूद रवीश कुमार हैं कि कुम्हलाए ही जा रहे हैं। रवीश को जितना जल्दी हो सके कबीर को पढ़ना चाहिए। चाहे तो वो सोशल मीडिया से समय बचा लें लेकिन उन्हें यह दोहा ज़रूर पढ़ना चाहिए।

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इंसान अपनी आँखों को अपनी ही हथेलियों से मूँदकर कहता है कि संसार में कितना अन्धकार है। अफ़सोस कि एक पुरस्कार, जो आजकल पुरस्कार कहलाए जाने के अलावा बाकी सब कुछ है, जैसे- एशिया का नोबेल या फिर ‘ऑस्कर’, भी कुछ नहीं बदल पाया। सुकून इतना है कि आजकल टीआरपी पर बवाल कम हो गया। लेकिन टीआरपी के आँकड़े इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं क्योंकि आजकल निराशा का कारण यह है कि उनके लाडले पाकिस्तान की चारों ओर फजीहत हुई है।

ट्रम्प और मोदी ताली दे रहे हैं, एक-दूसरे को सबके सामने चूँटी काट रहे हैं। उन्होंने ‘मान लिया’ था कि ‘बराक’ के बाद अमेरिका से यह नाता टूट जाएगा, लेकिन नए राष्ट्रपति तो मोदी को चूँटी काट रहे हैं। बिना किसी औपचारिकता के ही यह सब हो रहा है।

जब जब ट्रम्प-मोदी ताली मरते हैं, तब-तब दुनिया के एक कोने में एक ज़ीरो टीआरपी पत्रकार खुद को कहीं अँधेरे में बैठकर कोड़े मारता है। हालाँकि, इसका कोई ऑफ़ दी रिकॉर्ड सूत्र नहीं है, लेकिन फिर भी मैं ‘मानकर’ चल रहा हूँ कि वो ऐसा करते होंगे। क्योंकि यही तो उनके अनुसार पत्रकारिता है।

पत्रकारिता; यानी ‘मान लेना’। गणित के गुरूजी कक्षा छह में समझाते थे कि मान लो, यह है नहीं लेकिन मानना पड़ता है क्योंकि गणित ऐसे ही काम करती है। तब यह नहीं सोचा था कि एक दिन पत्रकारिता में भी यही गणित घुसकर सब कुछ भुसकोल कर देगी।

इसी तरह रवीश कुमार दैनिक कार्यक्रम के तहत काली स्क्रीन वाले स्टूडियो कहते हैं- “भगत जनों, ‘मान लीजिए।” उधर से जवाब में उनके सौ-साठ भगत-जन और ज्यादा ऊँची आवाज में कहते हैं- ‘मान लिया।’

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कितना सुखद अनुभव है कि रवीश कहते हैं और भगत-जन एक ही बार में बिना सवाल किए मान लेते हैं। फिर भी रवीश कहते हैं कि पत्रकारिता नहीं होने दे रहे हैं। इसी क्रम में आज के एक लेख में रवीश ने मीडिया को सत्ता का गुंडा बता दिया है।

इसका सीधा सा मतलब है कि जो आपके एकतरफा पत्रकारिता से सहमत नहीं है वो गुंडा है। चलिए एकबार फिर मान लेते हैं। यदि रवीश से असहमति मीडिया को गुंडा बनाती है तो सोचिए रवीश खुद कितने बड़े खलनायक हैं। उनकी बातों से तो सुप्रीम कोर्ट तक असहमति जता चुका है। कोर्ट कई बार रवीश कुमार से कह चुका है कि उन्होंने संसाधनों का समय बर्बाद किया है।

तो क्या सुप्रीम कोर्ट भी सत्ता का गुंडा है? क्या इस देश में अकेली जो आवाज लोकतंत्र की कहलाई जा सकती है वो रवीश कुमार द्वारा हवा में छोड़े गए तीर हैं? चाहे जस्टिस लोया केस हो या फिर NSA अजीत डोभाल और उनके बेटों को D-कम्पनी बताने का प्रपंच हो, रवीश के सभी इल्जाम झूठे निकल आए हैं। क्या उनके किसी भगत ने उनसे यह पूछा कि टीआरपी के लिए आपने इन सभी बेबुनियाद इल्जामों पर हमें यकीन करने को क्यों कहा?

रवीश कुमार खुद क्यों नहीं उस मीडिया का उदाहरण पेश कर देते हैं जिसकी वो कामना करते देखे जाते हैं?
खुद जिस रवीश कुमार का व्यवसाय दैनिक-प्रलाप और ‘4P’ बन चुका है, वह किस हैसियत से यह कह देता है कि मीडिया मर चुका है? एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार जिनकी टीआरपी सिर्फ उनका रोता हुआ चेहरा देखने की वजह से बढ़ती या घटती हो, वो जब अपने विष के लिए कश्मीर और अर्थव्यवस्था की आढ़ लेने लगे तो इसे सिर्फ कोरा प्रवचन कहते हैं।

अगर ऐसा न होता तो अर्थव्यवस्था से शुरू होने वाले रवीश के लेख मीडिया को कोसते हुए ख़त्म नहीं हो रहे होते।
चुनाव से ठीक पहले रवीश कुमार ने कहा था कि यह सरकार ‘इवेंट’ की सरकार है। हालाँकि, उनका यह तकिया-कलाम चुनावों में उनके मनमुताबिक नतीजे लाने में नाकामयाब रहा लेकिन फिर वो यही बात आज भी कहते सुने जा सकते हैं।

रवीश कुमार के लिए यह जानना आवश्यक है कि एक इवेंट की सरकार कॉन्ग्रेस की उन तमाम लोकसभाओं में से लाख बेहतर है जिसने अपनी जनता को वर्षों तक तुष्टिकरण और घोटालों के दलदल में डुबोकर रखा।

टीआरपी की तलाश में समाजवादी गुंडों के स्टेज पर चढ़ जाने को तैयार होने वाले रवीश कुमार को किसी को पत्रकारिता सिखाने की आवश्यकता नहीं है। उनका दैनिक रुदन देखकर तो इस समय यही लगता है कि अगर किसी को पत्रकारिता सीखने की जरूरत है तो वो खुद रवीश कुमार हैं।

वो हिंदी के दोषी हैं, वो पत्रकारिता के दोषी हैं, वो तमाम उन लोगों के दोषी हैं जिनके साथ वो अपनी कुटिल मुस्कान से रोजाना नए छल कर जाते हैं। वो लोगों को जागरूक करने से ज्यादा उन्हें भ्रम में रखने में यकीन करते हैं।

वो अपने स्टूडियो में बैठकर कहते हैं कि मोदी सरकार की मुद्रा योजना फेल है, जबकि आँकड़े इसके उलट कुछ और ही कह रहे हैं। वो कहते हैं कि स्वरोजगार का वादा इस सरकार का इवेंट है। जबकि ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण मैं स्वयं ये बात जानता हूँ कि मुद्रा बैंक और रोजगार सृजन से लेकर कौशल विकाश जैसे कार्यक्रमों ने देश के युवाओं और छोटे-बड़े व्यापारियों को एक बड़े हद तक प्रभावित किया है।

लेकिन रवीश ने अपने स्टूडियो में बैठकर सब कुछ तय कर लिया है। उन्होंने उसी बीजगणित के अध्याय की तरह सब कुछ अब ‘मान लिया’ है। इससे बड़ी हानि यह है कि वो चाहते हैं कि उनके इसी ‘मान लेने’ को बाकी लोग भी मान लें, जबकि उनका यह बीजगणित एकदम ऊसर है, इससे कुछ भी सृजन नहीं हो सकता है।

अर्थव्यवस्था का टेंशन छोड़िए रवीश बाबू, और उस टीआरपी पर ध्यान दीजिए जो आपको सोने, खाने से लेकर उठने-बैठने तक पर मोदी-स्मरण करवाने लगी है।

आपको कश्मीर का दर्द नहीं है आपका दर्द कश्मीर पर सरकार की होने वाली वाहवाही है। यह समय आत्म चिंतन का है। आपके एक कट्टर-भगत की आपसे यही माँग है। जितना जल्दी हो सके, लौट आइए, आपको कोई कुछ नहीं कहेगा।

दो साल में 65% घटा दिमागी बुखार, अब सड़क हादसों से दो-दो हाथ: योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया है कि उनकी सरकार के दो साल के कार्यकाल में दिमागी बुखार (Japanese Encephalitis) के मामलों में होने वाली मौतों में 65% कमी आई है। मालूम हो कि मार्च 2017 में राज्य की सत्ता संभालने के महज़ कुछ महीनों बाद अपने ‘गृह’-क्षेत्र गोरखपुर के बाबा राघव दास (BRD) मेडिकल कॉलेज में इस बीमारी से हुई मौतों पर योगी को काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। 2017 में इस बीमारी से 5400 लोग ग्रसित हुए, और 748 लोगों की मौत हो गई

“1998 से लड़ रहा हूँ… पहली मीटिंग इसी पर की थी”

योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि राज्य के मुख्यमंत्री बनने के पहले से, 1998 से गोरखपुर के सांसद बनने के समय से वह इस बीमारी से लोगों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ का लगभग दो दशकों तक निर्वाचन क्षेत्र रहा (और धार्मिक तौर पर गोरखधाम मंदिर, जिसके वे मठाधीश हैं, के कारण उनका सन्यासी के तौर पर घर माना जाने वाला) गोरखपुर इस बीमारी का गढ़ माना जाता है

इसके अलावा योगी ने दावा यह भी किया कि उन्होंने मुख्यमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद पहली मीटिंग दिमागी बुखार पर ही की थी, और अधिकारियों से इस बीमारी के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिए तत्काल कदम उठाने को कहा। “पहले encephalitis के मरीजों को नज़रंदाज़ कर दिया जाता था क्योंकि इसे एक अनजान बीमारी माना जाता था। उन्होंने बताया कि सरकारी विभागों को इससे निबटने के लिए संयुक्त कदम उठाने को कहा गया और लोगों को समझाया गया कि बचाव इलाज से बेहतर है।”

सड़क हादसे बन रहे महामारी

28 अगस्त को राजधानी लखनऊ के KGMU अस्पताल में ट्रॉमा शल्य चिकित्सा विभाग द्वारा Indian Society of Trauma and Acute Care (ISTAC) के तीन-दिवसीय सेमिनार को सम्बोधित करते हुए योगी ने सड़क हादसों की बढ़ती संख्या पर भी चिंता जताई। इसे “आजकल किसी महामारी से कम नहीं” करार देते हुए मुख्यमंत्री ने इन्हें रोकने के लिए सरकार के युद्ध-स्तर पर काम करने का भरोसा दिलाया। “मैंने खुद कई बार अंतर-विभागीय बैठकें बुलाईं हैं जिनका उद्देश्य सड़क हादसों को रोकना होता है।”

इससे निपटने के लिए उठाए जा रहे सरकारी क़दमों को गिनाते हुए योगी ने कहा कि सरकार लोगों को जागरुक करने के लिए अभियान चलाने के अतिरिक्त बस-ड्राइवरों की आँखों की जाँच और सड़कों पर साइनबोर्ड फिर से लगवाने का काम भी कर रही है।

देवी की साड़ियों पर अर्चक का अधिकार, फिर भी पुलिस ने किया झूठे आरोप में गिरफ्तार

हैदराबाद से सटे सिकंदराबाद स्थित संतोषीमाता मंदिर के अर्चक श्री बी रामशर्मा के पक्ष में राज्य के जाने-माने चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक सीएस रंगराजन उतर आए हैं। रामशर्मा को देवी की साड़ियाँ ‘चुराने’ के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। रंगराजन ने पोर्टल PGurus पर लिखे अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि न केवल मंदिर की धार्मिक परम्पराओं के अनुसार स्वर्ण-रजत (सोने-चाँदी) के अलावा बाकी चढ़ावे पर अंतिम अधिकार अर्चक का होता है, बल्कि इस परम्परा को Endowments Act का भी समर्थन है, जिसके अंतर्गत मंदिर की व्यवस्थाओं का संचालन होता है।

सहायक को “पकड़ा” था 42 साड़ियों के साथ

स्थानीय मीडिया के अनुसार रामशर्मा के सहायक बाबूराव को सावन के महीने में माता को चढ़ी 42 साड़ियाँ रामशर्मा के घर ले जाते हुए मंदिर के पूर्व अध्यक्ष राय वेंकटेश और ट्रस्टी राम मोहन ने “पकड़ा” था। उन्होंने गोपालपुरम थाने की पुलिस को बुला कर बाबूराव को उनके हवाले कर दिया था। साथ ही कुछ मीडिया पोर्टलों ने रिपोर्टिंग के सभी मानकों और मूल्यों का हनन करते हुए “आरोपित”, “accused” आदि का प्रयोग किए बगैर सीधे-सीधे रामशर्मा को “चोर” घोषित करते हुए शीर्षक से खबर चला दी थी।

Endowments Act, Section 144 के संशोधन को क्यों नहीं किया गया है लागू?

मामले में पुलिस और सरकार की ओर से अनियमितताओं की पूरी फेहरिस्त गिनाते हुए चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक सीएस रंगराजन ने हमला बोले है। उन्होंने जानकारी दी कि Endowments Act के Section 144 को बाकायदा संशोधित किया गया था, ताकि सोने-चाँदी के अतिरिक्त अन्य चढ़ावे पर अर्चक के धार्मिक अधिकार को विधिवत अमली जामा पहनाया जा सके। उन्होंने साथ में जोड़ा कि संशोधन में इसे हर मंदिर में लागू करने के तरीके को इस संशोधन के अनुमोदन के समय तय होना था, लेकिन कभी इस संशोधन को अमल में लाया ही नहीं गया। इसी से यह भ्रामक स्थिति उत्पन्न हुई है कि अर्चक को चढ़ावे की साड़ियों पर अधिकार तो है (कानूनी भी, और धार्मिक रूप से भी), लेकिन इस अधिकार के लिए विधिवत तरीका स्थापित नहीं है।

रंगराजन ने अर्चक पर झूठे आरोप को दुर्भाग्यपूर्ण और पुलिस के अधिकार-क्षेत्र के बाहर बताते हुए पुलिस पर उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने राज्य के Endowments विभाग से दो सवाल भी पूछे:

1) अगर कानून यह कहता है कि देवी को चढ़ाई गई साड़ियों पर अर्चक का अधिकार है तो क्या उन साड़ियों की चोरी का मुकदमा विभाग अर्चक रामशर्मा के खिलाफ करेगा?

2) क्या विभाग कम-से-कम अब जाकर मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों यानि अर्चकों की सेवा शर्तों पर स्थिति स्पष्ट करेगा?

रंगराजन ने अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों के तौर पर अर्चकों का ऐसा अपमान बिलकुल अस्वीकार्य है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत क्षमता और चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक की हैसियत के अलावा अपनी अध्यक्षता वाले Temples Protection Movement के तौर पर भी श्री बी रामशर्मा का निलंबन समाप्त करने और उनको उनके पद पर दोबारा ससम्मान स्थापित किए जाने की माँग की। साथ ही उन्होंने अर्चक को उनके द्वारा उठाई गई परेशानी के लिए मुआवजा दिए जाने की भी माँग की।

इसीलिए ज़रूरी है मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त करना

Endowments Act में हुए संशोधन को सरकारी तंत्र द्वारा अब तक न लागू करना ही इस स्थिति का कारण है, जहाँ एक बेगुनाह अर्चक को अपने कानूनी और धार्मिक अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए न केवल अपमानित होना पड़ रहा है, बल्कि जेल की हवा भी खानी पड़ रही है। यह मामला इस बात को और ज़्यादा रेखांकित करता है कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना क्यों ज़रूरी है।

गौरतलब है कि हिन्दू समाज 1954 में शिरूर मठ के जबरन अधिग्रहण के समय से इस बात को लेकर आंदोलनरत है कि हिन्दू मंदिरों में सरकारी हस्तक्षेप न हो; उन्हें वैसे ही स्थानीय और श्रद्धालु-संचालन के लिए दिया जाए जैसे ईसाईयों, मजहब विशेष आदि को यह आज़ादी है। इसी प्रकार की सरकारी उदासीनता के चलते होता यह है कि एक ओर मंदिरों की आय लाखों-करोड़ों (यहाँ तक कि कई बार अरबों) में होती है, और दूसरी ओर मंदिरों के पुजारी/अर्चक और अन्य स्टाफ को कई बार ₹750, ₹1000 से लेकर ₹10,000 जैसी नाकाफी ही नहीं बल्कि अपमानजनक राशियाँ वेतन के रूप में मिलतीं हैं।

इमरान खान की पूर्व पत्नी रेहम भी हुई मोदी की मुरीद, कहा- पाकिस्तान भिखारी जबकि उनकी दुनिया में है इज्जत

पाकिस्तान के कश्मीर प्रलाप के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पूर्व पत्नी का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो पाकिस्तान की नीतियों को कोस रही हैं जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ करते हुए नजर आ रही हैं।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पूर्व पत्नी रेहम खान पीएम मोदी की मुरीद हो गई हैं। वीडियो में उन्होंने अपने पूर्व पति और पाक के पीएम इमरान खान से पाकिस्तान की आर्थिक हालत को लेकर सवाल किया है।

इस वीडियो में रेहम कह रही हैं- “आज मोदी सरकार को क्यों लोग चाहते हैं और क्यों उनसे रिश्ते खराब नहीं करना चाहते हैं? क्योंकि उनकी इकॉनमी स्ट्रॉन्ग हो गई है। सऊदी ने वहाँ इन्वेस्ट किया है, यूके उनके साथ है, अमेरिका की उनमें दिलचस्पी है। जहाँ मोदी जाते हैं तो उनकी इज्जत होती है।”

वीडियो में आगे रेहम ने इमरान खान और पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए कहा, “मोदी को UAE में मेडल मिला है तो आपको तकलीफ हो रही है। आप भीख माँगते फिर रहे हैं। आप बताएँगे कि आप उनके पाँव की जूती हैं तो वो आपकी इज्जत कैसे करेंगे?”

यह वीडियो ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री वहाँ के लोगों से कश्मीर के लोगों के समर्थन में आने की फ़रियाद कर रहे हैं। जबकि हकीकत ये है कि जम्मू-कश्मीर मामले में दुनिया तो दूर की बात, खुद पाकिस्तानियों ने भी अपने प्रधानमंत्री इमरान खान की गप्पों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है।

इसका प्रमाण पाकिस्तान को इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई द्वारा बुलाए गए ‘Kashmir Hour‘ की असफलता है। न केवल ज़मीन पर पाकिस्तानी जनता में इसके प्रति ठंडी प्रतिक्रिया रही, बल्कि ट्विटर पर भी लोगों ने इसकी खिल्ली उड़ाई, जिसमें पाकिस्तानी भी शामिल रहे।

रेहम खान का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं-