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रिटायर हो रहे हैं प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र, पीके सिन्हा बने OSD in PMO

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र ने रिटायर होने की तैयारी कर ली है। तब-नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री के अनुरोध पर रिटायरमेंट से बाहर आकर पदभार संभालने वाले मिश्र को 5 साल से प्रधानमंत्री के सबसे विश्वस्त अफसर, नौकरशाही में उनके आँख-कान माना जाता था। उनकी सेवानिवृत्ति की घोषणा खुद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्विटर पर की।

मोदी ने उनकी सार्वजनिक नीति और सार्वजनिक प्रशासन में दक्षता का विशेष उल्लेख करते हुए उनकी तारीफ़ की।

2 हफ्ते और रुकने का अनुरोध

सरकार के मुख्य प्रवक्ता सितांशु कर ने मीडिया को जानकारी दी कि मोदी ने उनसे दो सप्ताह और अपनी सेवाएँ जारी रखने का अनुरोध किया है। कुछ खबरों के अनुसार वे चुनावों के बाद ही जाना चाहते थे, लेकिन मोदी के अनुरोध पर उस समय उन्होंने तुरंत सेवानिवृत्ति की बात पर अधिक बल नहीं दिया। इस बीच मीडिया में पूर्व कैबिनेट सचिव पीके सिन्हा को प्रधानमंत्री द्वारा पीएमओ में विशेष दायित्व पर तैनात अफसर (OSD) नियुक्त किए जाने की खबरें भी आ रहीं हैं।

ऊर्जा सचिव, सबसे लम्बे तक कैबिनेट सचिव रह चुके हैं सिन्हा

OSD in PMO नियुक्त हुए पीके सिन्हा यूपी कैडर के अफसर हैं। अर्थशास्त्र में स्नातक और परास्नातक करने वाले सिन्हा ऊर्जा और जहाजरानी मंत्रालयों में सचिव भी रह चुके हैं। कैबिनेट सचिव के तौर पर 2017 और 2018 में एक-एक साल का विस्तार पाने के बाद जब उन्हें जून में तीसरा सेवा-विस्तार मिला तो वे भारत के इतिहास में सबसे अधिक समय तक सेवाएँ प्रदान करने वाले कैबिनेट सचिव बन गए थे

कॉन्ग्रेस MLA से उनकी पत्नी ने कहा- ‘मेरे हसबैंड मुझे प्यार नहीं करते’, TikTok वीडियो वायरल

टिकटॉक (TikTOk) नामक मोबाइल एप्प लगातार युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रही है। लेकिन इस मोबाइल एप्प के आकर्षण से नेता भी अछूते नहीं रह गए हैं। ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है बिहार कॉन्ग्रेस MLA बंटी चौधरी और उनकी पत्नी का। जिसमें वो मशहूर कॉमेडियन सुनील ग्रोवर के गाने ‘मेरे हसबैंड मुझको प्यार नहीं करते’ पर एक्टिंग कर रहे हैं।

बिहार के जमुई में इन दिनों स्थानीय कॉन्ग्रेस MLA बंटी चौधरी का एक ऐसा ही वीडियो वायरल हो रहा है। इस वायरल वीडियो में सिकंदरा के विधायक अपनी पत्नी के साथ नजर आ रहे हैं जो शायद उन्होंने ही बनाया भी है।

इस वीडियो के बीच-बीच में विधायक बंटी चौधरी भी इसमें उनका साथ देते नजर आ रहे हैं।

बता दें कि इस वीडियो के वायरल होने के बाद कॉन्ग्रेस विधायक बहुत परेशान चल रहे हैं। विधायक ने दो लोगों पर आरोप लगाते हुए बताया कि जिन लोगो ने हैक कर वीडियो वायरल किया है वो हमारे विरोधी हैं। पर उनकी परेशानी कम नहीं हो रही है क्योंकि तमाम लोग विधायक सुधीर कुमार उर्फ बंटी चौधरी और उनकी पत्नी का टिकटॉक वीडियो सोशल मीडिया पर अभी भी फैला रहे हैं।

योग-वेदांत पढ़ाने वाले स्वामी तत्वबोधानंद की पीट-पीटकर हत्या, ड्रग्स-शराब का कर रहे थे विरोध

अपने घर के पास शराब और ड्रग्स का विरोध कर रहे पुडुचेरी के जाने-माने योग व गीता गुरु और वेदांत विद्वान स्वामी तत्वबोधानंद की मंगलवार-बुधवार (29 अगस्त, 2019) को अपने ही अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। स्वराज्य पत्रिका में स्थानीय मीडिया के हवाले से छपी खबर के अनुसार रात को हुई हत्या का खुलासा उनकी इमारत (गोकुलम अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स) के सिक्योरिटी गार्ड के सुबह आने पर हुआ। हत्यारों का अब तक कोई पता नहीं चला है। वहीं पुलिस के अनुसार यदि उसे समय पर सूचना मिल गई होती तो हत्यारों को जल्दी दबोचा जा सकता था। मिल रही जानकारी के अनुसार स्वामी तत्वबोधानंद अपने अपार्टमेंट के आस-पास ड्रग्स-शराब का विरोध कर रहे थे। पुलिस पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हत्या में उसी धंधे से जुड़े लोगों का हाथ तो नहीं है।

डर के मारे भागा गार्ड

गार्ड के अनुसार हत्या वाली रात वह अपार्टमेंट से ही जुड़ा कोई काम कर रहा था जब दो संदिग्ध शख्स जबरन घुस आए और उसके साथ गुंडागर्दी और दुर्व्यवहार करने लगे। अपने बयान के मुताबिक गार्ड अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़ा हुआ और एक पेट्रोल पम्प में शरण ली। जब वह सुबह लौटा तो अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स के दरवाज़े पर खून के धब्बे थे। अंदर जाकर उसने स्वामी जी की लाश देखी।

CCTV कैमरा क्षतिग्रस्त, पुलिस ने लगाई स्निफर डॉग टीमें

अपार्टमेंट का CCTV कैमरा भी क्षतिग्रस्त पाया गया, इसलिए पुलिस अन्य इमारतों और आसपास के अन्य CCTV कैमरों की फुटेज से हत्यारों की शिनाख्त करने की कोशिश कर रही है। घटनास्थल से फोरेंसिक नमूने इकट्ठे करने के अतिरिक्त पुलिस ने अपने स्निफर डॉग भी इस मामले की जाँच में लगा दिए हैं। हालाँकि, पुलिस ने इस मामले की जाँच के लिए दो टीमें गठित कर दीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि अगर हत्या की जानकारी और जल्दी मिल जाती तो हत्यारों को जल्दी गिरफ्तार करना आसान होता।

फर्जी खबर फैलाने पर ‘The Hindu’ की पत्रकार को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने ट्विटर पर लताड़ा

कश्मीर को लेकर फर्जी खबर फैलाने के आरोप में एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने ‘द हिंदू’ की पत्रकार विजयता सिंह (Vijaita Singh) को सोशल मीडिया पर जमकर लताड़ा। पुलिस अधिकारी ने झूठे दावे वाली द हिंदू की रिपोर्ट पर विजयता को जवाब देते हुए न केवल उनके काम पर सवाल उठाया बल्कि उन्हें पूरे मामले की हकीकत से भी रूबरू करवाया और कहा कि वह पुलिस को काम सिखाने से अच्छा है अपने काम पर ध्यान दें।

दरअसल, घोषित वामपंथी अखबार द हिंदू की पत्रकार विजयता ने ट्विटर पर एक रिपोर्ट शेयर करते हुए दावा किया कि 5 अगस्त से अब तक 36 कश्मीरी पैलेट घावों का शिकार हो चुके हैं। विजयता ने अपनी बात को साबित करने के लिए इस रिपोर्ट में वरिष्ठ सरकारी सूत्रों का हवाला दिया। लेकिन उन्होंने इस रिपोर्ट में किसी अधिकारी का नाम नहीं बताया। उन्होंने बस हवा में दावा कर दिया कि सुरक्षाबलों ने 36 लोगों को प्रदर्शन के दौरान घायल किया।

इस रिपोर्ट के शेयर करने के कुछ देर बाद जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन ने उन्हें दो टूक रिप्लाई दिया और बताया कि जिन लोगों के घायल होने की बात विजयता अपनी रिपोर्ट में कर रही हैं, वह हकीकत में अपने घर में नहीं थे बल्कि घर से बाहर थे। वो आदेशों की अवहेलना कर रहे थे, कानून को अपने हाथ में ले रहे थे, साथ ही गलत ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे और लोगों को उकसा रहे थे।

इसके बाद प्रणव महाजन ने अपने ट्वीट में विजयता पर ये भी आरोप लगाया कि वह कश्मीर के हालातों पर भ्रामक रिपोर्ट लिखने के लिए जानबूझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ रही हैं, जो काफी दुखद है।

मुमकिन था सोशल मीडिया पर एक पुलिस अधिकारी से इतना सुनने के बाद कोई अन्य पत्रकार अपने को सही साबित करने के लिए सबूत पेश करता। लेकिन विजयता ने तो उचित आँकड़े पेश करने की बजाए पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन से कहा कि उन्होंने जो संख्या बताई है वो सटीक है और आधिकारिक सूत्रों द्वारा दी गई है। इसलिए अगर उनको (प्रणव) दिक्कत है तो वो सफाई के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार से संपर्क करें। न कि किसी पत्रकार को कोसें। इसके बाद विजयता यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने आगे लिखा , “तुम पुलिस वाले हो, काम पर जाओ, 9:30 बजे रहे हैं।”

जिसपर प्रणव महाजन ने बड़ी सभ्यता के साथ जवाब देते हुए कहा, “इस ट्वीट से पता चलता है कि आप हमारे काम को लेकर कितनी चिंतित हैं, लेकिन ये 9:30 उनके लिए बज रहे हैं जो सोते हैं, उठते हैं और नाश्ता करते हैं। हम ये सब नहीं करते क्योंकि हमें बाहर रहकर लोगों का ध्यान रखना होता है। यहाँ नहीं का मतलब कुछ नहीं हैं। मैं पहले ही घर से बाहर हूँ। आप कृपया करके हमें बताने से अच्छा है आप अपना काम करें।

गौरतलब है कि इन दिनों कश्मीर के हालातों पर प्रोपेगेंडा परस्त खबरे फैलाने में ‘द हिंदू’ सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभा रहा है। क्योंकि विजयता सिंह से पहले फर्जी खबर फैलाने के लिए द हिंदू की नेशनल एडिटर सुहासिनी हैदर पर भी इल्जाम लगे थे।

काश! कश्मीर में दंगे हो जाते, घरों में आग लगाई जाती, सैकड़ों लोग मारे जाते! कितना मजा आता…

कश्मीर घाटी की आबादी है लगभग सत्तर लाख। जम्मू-कश्मीर-लद्दाख को मिला दें तो 2011 की जनसंख्या लगभग सवा करोड़ की है। केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर से अनुच्छेद 370 के शक्तिहीन बनाने और 35A को हटाने के बाद, बीते दिनों से शांति बहाल करने के प्रयासों के तहत सरकार ने एहतियातन सुरक्षा बलों को तैनात किया हुआ है और कई इलाकों में फोन व इंटरनेट की सुविधा बंद कर रखी है।

ऐसा करना बहुत लोगों को मानवाधिकारों का उल्लंघन लगता है, जो कि लगेगा भी अगर आपको कश्मीर के हालात की जानकारी नहीं है। आप कल्पना कीजिए कि केन्द्र सरकार के फैसले के बाद वहाँ सुरक्षा बल नहीं होते, इंटरनेट और फोन चालू रहते और लोगों की आवाजाही पर कोई नियंत्रण न होता, तो क्या होता। अगर कल्पना करने में समस्या हो रही है तो आप उन दिनों की याद कीजिए जब हर शुक्रवार को पत्थरबाजी होती थी। याद कीजिए सेना के अफसरों द्वारा दिए गए आँकड़ों को जब वो बताते हैं कि हर साल लगभग 200 आतंकी मारे जा रहे हैं। फिर याद कीजिए कि इन सारे आतंकियों में 83% वो थे जो पत्थरबाजी किया करते थे।

अब याद कीजिए कि ये आतंकी क्या करते थे, वो भी तब जब कोई धारा 144 नहीं थी, कर्फ्यू नहीं था। इन्होंने ईद के लिए घर लौटते कश्मीरी जवान मंजूर अहमद बेग को नहीं मारा? या रायफलमैन औरंगजेब अपने आप किडनैप हो गए और उन्होंने आत्महत्या कर ली? ये भी तो कश्मीर के ही थे, इस्लाम के अनुयाई ही थे, ईद पर घर आए थे, फिर इनके मानवाधिकारों का क्या? गिनाने पर आ जाऊँ तो और भी नाम गिना सकता हूँ लेकिन आप मेरा इशारा समझ गए होंगे।

जब आपको पता हो कि एक फैसले से, जो एक बड़ी जनसंख्या के लिए लाभकारी होगी, लेकिन कुछ मुट्ठी भर आतंकी और अलगाववादी एवम् राजनैतिक अस्तित्व गँवाते नेता इस फैसले को आधार बना कर उपद्रव करेंगे और लाशें गिराएँगे, तो आप वृहद समाज की सुरक्षा के लिए क्या उन्हें महीने भर के लिए थोड़ी तकलीफ उठाने नहीं कह सकते? क्योंकि दूसरा उपाय नहीं है इसलिए, इन कश्मीरियों को, बिना किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाए, सरकार ने कुछ लोगों के आतंकी मंसूबों को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ सावधानियाँ बरती हैं। ये मानवाधिकारों का हनन नहीं है, ये मानवों को बचाना है ताकि महीने भर बाद जब स्थिति सामान्य हों तो वो भारतीय संविधान की छाया में अपने नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें।

मानवाधिकारों का हनन वह भी है जब बहुत बड़ी जनसंख्या को आतंकियों के खौफ में रहना पड़ता है। यहाँ तो सड़कों पर खड़ी पुलिस या सेना से आपको किसी भी तरह का डर तो नहीं है कि अपनी बात मनवाने के लिए वो आपको किडनैप कर लेंगे और कहीं कोने में ले जा कर गोली मार देंगे। मानवाधिकारों का हनन क्या होता है वो जा कर सीरिया में, लीबिया में, कई और इस्लामी देशों में, तानाशाही शासनों में, चीन में जा कर पता कीजिए। फोन लाइन बंद होना और इंटरनेट न चलना मानवाधिकारों का हनन नहीं है। अगर ऐसा करने से कुछ लोगों की जान बचती है, तो वो ही समझदारी है।

दिल्ली, लंदन और अमेरिकी मीडिया क्यों फैला रही है झूठ 

हाल ही में बीबीसी कश्मीर के दो लोगों से बातचीत करते हुए, साढ़े आठ बजे सुबह अपने हेडलाइन्स में भारतीय सेना द्वारा क्रूर टॉर्चर के आरोपों की बात करती दिखी। बीबीसी ने कहा कि उन्होंने ढूँढ निकाला कि ऐसा हो रहा है। और भारतीय सेना द्वारा टॉर्चर की खबरों की पुष्टि करने के लिए इन्होंने बात की एक आतंकी के भाई से, और एक अन्य व्यक्ति से। सवा करोड़ लोगों में दो लोगों से बात करते हुए, बीबीसी ने इसे हेडलाइन बना कर चला दिया और इसकी सत्यता की पुष्टि के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

इसके बाद अमेरिकी मीडिया में वाल स्ट्रीट जर्नल ने यह लिख डाला कि कश्मीर में अस्पताल कब्रगाहों में तब्दील होते जा रहे हैं। लिखने की वजह एक कथित ‘हेल्थ क्राइसिस’ थी जो कि इनके पत्रकारों के हिसाब से सरकार द्वारा उठाए कदमों के कारण दवाइयों में सप्लाय की कमी के कारण लोगों के मरने के रूप में दिख रही थी।

इसके पहले प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने ऐसी ही बेहूदी रिपोर्ट चला दी जिसमें यह कहा गया कि कश्मीर में जीवनरक्षक दवाइयों की कमी होती जा रही है। इसका संज्ञान श्रीनगर के डीएम श्री शाहिद चौधरी ने लिया और लिखा कि ऐसी संवेदनाएँ तो ठीक हैं लेकिन पूरे प्रदेश में किसी भी दिन दवाइयों ती कोई कमी नहीं हुई, न ही सप्लाय में किसी भी तरह की समस्या आई। अगर किसी को कोई परेशानी है तो व्यक्तिगत मामलों के बारे में भी मदद के लिए वो उपलब्ध हैं।

इस पर ‘वायर’ के ‘लायर इन चीफ’ अपने रिपोर्टर के पक्ष में बोलने लगे कि उसकी रिपोर्टिंग सारी बातों को सामने लाती है। ‘द वायर’ और सिद्धार्थ वरदराजन जैसे लोगों के साथ समस्या यह हो गई है कि न तो इनके लिखे पर लोगों का कोई विश्वास है, न ही कोर्ट का। हाल ही में इनकी पत्रकारिता को न्यायालय ने ‘यलो जर्नलिज्म’ यानी सनसनी फैलाने वाली कहा था। इसलिए वरदराजन सड़क पर माइक ले कर भी चिल्लाते रहें कि उनके प्रोपेगेंडाबाज रिपोर्टर ने सच लिखा है, कोई विश्वास नहीं करेगा। खास कर तब, जब डीएम शाहिद चौधरी स्वयं ही ऐसे प्रोपेगेंडा को काट रहे हों।

इसके बाद, इसी विषय पर जम्मू-कश्मीर के पुलिस अधिकारी श्री इम्तियाज हुसैन ने वाल स्ट्रीट जर्नल की खबर पर ट्वीट करते हुए कहा कि ये पूरी तरह से एक प्रोपेगेंडा यानी झूठी कहानी गढ़ी गई है कि कश्मीर के अस्पताल कब्रगाह में बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि कश्मीर के सारे अस्पताल सामान्य रूप से काम कर रहे हैं, और दवाई आदि की कोई कमी नहीं है।

‘हेल्थ क्राइसिस’ की खबरों को गढ़ना एक सुनियोजित षड्यंत्र

आपने सोचा है कि अचानक से विदेशी मीडिया को इसमें इतनी रुचि क्यों होने लगी? इनके नाम पढ़ेंगे तो आपको जवाब मिल जाएगा कि ये आदत से मजबूर मीडिया संस्थान हैं जिन्होंने भारत को लेकर हमेशा नकारात्मक खबरें फैलाई हैं। इनका उद्देश्य हर तरह से भारत को ऐसे दिखाना है जैसे यहाँ किसी तानाशाह का शासन चल रहा है और यहाँ की सेना किसी कॉन्गो या इथियोपिया जैसे देश की बेलगाम सेना की तरह सामूहिक नरसंहार में व्यस्त है। इसीलिए बीबीसी और अल जजीरा जैसे लम्पट मीडिया वाले भारतीय सेना को दस हजार लोगों के ऊपर पैलेट गन चलाते दिखा देते हैं।

चूँकि सेना द्वारा अत्याचार की खबर चल नहीं पाई, कोई सबूत मिल नहीं पाया, न कोई सत्यापित विडियो है, न ही किसी तरह की मानवाधिकारों के उल्लंघन की सही खबर, तो अब ये कल्पनाशीलता के आधार पर ये मान कर चल रहे हैं कि कश्मीर में तो स्वास्थ्य समस्या पैदा हो गई है, और लोग दिन-रात मर रहे हैं। इसीलिए, अब मानवाधिकारों की बात को साइड में ‘मिलिट्री क्लेम्पडाउन’ कहते हुए फोकस इस बात पर शिफ्ट किया जा रहा है कि लोग मर रहे हैं क्योंकि दवाई नहीं है।

जबकि सोचने की बात यह है कि जब केन्द्र सरकार इतना बड़ा फैसला ले रही थी, और हजारों की संख्या में जवानों को सुरक्षा व्यवस्था को नियंत्रण में रखने के लिए भेज चुकी थी, पेट्रोल पंप में महीने भर के तेल और सरकारी संस्थानों में राशन से लेकर ईद के लिए बकरे तक का इंतजाम कर रही थी, तो क्या सरकार स्वास्थ्य जैसी सुविधा के लिए तैयार नहीं रही होगी?

श्रीनगर के डीएम शाहिद चौधरी को लगभग हर सप्ताह लिखना पड़ रहा है कि इन झूठी खबरों पर विश्वास न करें, यहाँ स्थिति नियंत्रण में है और किसी भी तरह की हेल्थ क्राइसिस नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ परेशानियाँ ज़रूर हैं जो कि केन्द्र के फैसले के बाद सुरक्षा के लिहाज से जन्मी हैं, लेकिन उसे क्राइसिस नहीं कह सकते। उन्होंने कहा कि लोगों को इन विदेशी मीडिया पर विश्वास होगा और स्थानीय डीएम की बातों को शायद वो गंभीरता से न लें, लेकिन वो हर व्यक्ति की हर संभव मदद को तत्पर हैं।

उन्होंने फिर कुछ आँकड़े दिए जिसमें अलग-अलग अस्पतालों में हुई सर्जरी आदि का ब्यौरा है। उन्होंने बताया कि ये आँकड़े पिछले महीने के औसत के हिसाब से मेल खाते हैं। यानी कि किसी भी तरह की समस्या नहीं है जैसे कि वाल स्ट्रीट जर्नल ने लिख दिया कि लोग हर रोज मर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की रिपोर्टिंग से उन्हें दुःख होता है क्योंकि कुछ परेशानियों से इन्कार नहीं है लेकिन इसे इस तरह से प्रस्तुत करना बहुत ही गलत है।

प्रोपेगेंडा मशीनरी का यही काम है

जब मोदी सरकार ने यह फैसला लिया तो विरोधियों की संख्या दिन-ब-दिन घटती ही चली गई। शुरु में विरोध करने वालों के सुर बदलने लगे कि बाँटना तो ठीक है लेकिन तरीका गलत है। ये बातें भी बस कहने के लिए कही जाती हैं क्योंकि ‘तुमने आम खा लिया वो ठीक बात है लेकिन उसे छीला गलत तरीके से’ कहना बकैती है, तर्क नहीं। कॉन्ग्रेस वाले भी इस पर विभाजित दिखे और जो समझदार थे, उन्होंने जनता का रुख देखते हुए, गोल-गोल बात करते हुए स्थिति को अतंतः स्वीकार ही लिया।

मीडिया के गिद्धों को लगा था कि जो दंगे और रक्तपात मोदी के पहले कार्यकाल में नहीं हुआ, योगी के आने पर नहीं हुआ, मोदी के दूसरी बार आने पर नहीं हुआ, वो इस बार शायद हो जाए क्योंकि बात कश्मीर की है। लेकिन सरकार और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सूझबूझ के कारण किसी भी तरह की बड़ी हिंसा की घटना नहीं हुई। कुछ लोगों के मरने की खबर आई हैं जो कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों का शिकार बने। कहीं किसी ट्रक चालक नूर मोहम्मद पत्थरबाजों का शिकार हुए तो कहीं दो गुर्जर भाइयों को आतंकियों ने हाथ-पाँव बाँध कर बेरहमी से मार डाला।

यानी, जो सोचा गया था कि आंतरिक सुरक्षा के मामले में सरकार फँस जाएगी, वहाँ भी ऐसे ही निर्दोष नूर मोहम्मद या अहमद और कादिर को आतंकियों ने मारा। अपने ही कश्मीरी लोगों को, कश्मीर के आतंकियों ने मारा क्योंकि उनके हाथ बँध चुके हैं। सेना इन आतंकियों को करियर बनाने से पहले ही जहन्नुम भेज रही है, तो बिलबिलाहट में ये किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या कर दे रहे हैं। जिहाद की राह में निर्दोषों की हत्या करना कश्मीरी आतंकियों के लिए कोई पहली घटना नहीं है।

इसलिए, प्रपंच फैलाया जा रहा है कि अस्पतालों में लोग मर रहे हैं, जीवनरक्षक दवाइयाँ नहीं हैं। आप सोचिए कि आखिर यही चार-पाँच मीडिया वाले, इसी एक तरह की रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हैं? आखिर दो लोगों के बयान के आधार पर पूरी सेना को बर्बर कहने की रिपोर्टिंग का लक्ष्य क्या है? अमेरिकी अखबार को भारत के एक हिस्से के अस्पतालों पर झूठ लिखने की क्यों जरूरत पड़ती है?

आखिर कश्मीर के मुद्दे को कट्टरपंथियों का मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? कश्मीर का मुद्दा अगर कुछ है तो वो है गिलगिट बल्तिस्तान का, पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर का, जहाँ से लोग पाकिस्तानी सेना द्वारा गायब कर दिए जाते हैं, आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, ज़िन्दगी कठिनाइयों से भरी हुई है। लेकिन वहाँ की रिपोर्टिंग करने में न तो बीबीसी को रुचि है, न वाल स्ट्रीट जर्नल को। आप सोचिए कि इन चार-पाँच निर्दोष कश्मीरियों की हत्या का, जिनके लाशों की फोटो हर जगह हैं, उसके ऊपर बीबीसी की रिपोर्टिंग, इन-डेप्थ एनालिसिस क्यों गायब है? आप सोचिए कि ‘द वायर’ ने आज तक कश्मीरी आतंकियों द्वारा ली जा रही जानों पर कोई वैचारिक स्तंभ क्यों नही लिखे?

सोचिए… सोचते रहिए… जवाब नहीं मिलेगा क्योंकि प्रोपेगेंडा पत्रकारिता में खबरें गढ़ी भी जाती हैं, दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को सामान्यीकृत उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, एक हिस्से को ही दिखाया जाता है, भविष्य में क्या हो सकता है उसकी नकारात्मक काल्पनिक रिपोर्टिंग होती है, ‘लोगों में डर का माहौल है’ कह कर लोगों को डराया जाता है, अपनी एक खबर के लिए कुछ लोग चाहते हैं कि दस-पचास लोग सड़क पर दंगे में मारे जाएँ ताकि वो आधे घंटे में सरकार, सेना या हिन्दू सवर्णों को इसका जिम्मेदार बता सकें।

दलित, महिला या नाबालिग का जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर होगी 2 से 7 साल की सजा

हिमाचल प्रदेश में अब जबरन धर्मांतरण पर रोक लगेगी। इस बिल को बृहस्पतिवार (अगस्त 29, 2019) को हिमाचल प्रदेश के CM जयराम ठाकुर ने सदन के पटल पर रखा था। मानसून सत्र के दौरान शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को सदन में धर्म की स्वतंत्रता विधेयक-2019 को पारित कर दिया गया। शुक्रवार को विपक्षी दल कॉन्ग्रेस के विरोध के बीच पारित कर दिया गया है।

चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि नया कठोर कानून इसलिए जरुरी हो गया था क्योंकि खासकर रामपुर और किन्नौर में जबरन धर्मांतरण बढ़ता जा रहा है। यह विधेयक हिमाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम-2006 का स्थान लेगा। नए कानून के तहत सात साल तक की कैद का प्रावधान है, जबकि पुराने कानून में तीन साल की कैद की सजा की व्यवस्था थी। अलग-अलग वर्गों और जातियों के लिए यह प्रावधान किए गए हैं।

यह विधेयक बहकाने, जबरन, अनुचित तरीके से प्रभावित करने, दबाव, लालच, शादी या किसी भी धोखाधड़ी के तरीके से धर्म परिवर्तन पर रोक लगाता है। यदि कोई भी शादी बस धर्मांतरण के लिए होती है तो वह इस विधेयक की धारा 5 के तहत इसे अमान्य माना जाएगा।

इस विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कॉन्ग्रेस विधायक आशा कुमारी, सुखविंदर सुखु, जगत सिंह नेगी और एकमात्र माकपा विधायक राकेश सिंह ने कुछ प्रावधानों में बदलाव की माँग की। सुखु के सुझाव पर जवाब देते हुए ठाकुर ने कहा कि 13 साल पुराना कानून इतना प्रभावी नहीं था। क्योंकि पुराने कानून में महज आठ धाराएँ हैं, तथा उसमें करीब दस और धाराएँ जोड़ना बेहतर नहीं होता।

मूल धर्म में वापसी के लिए कोई शर्त नहीं

इस विधेयक के अनुसार, अगर कोई शख्स अपना मजहब बदलना चाहता है तो उसे कम से कम एक महीने पहले जिलाधिकारी को लिखकर देना होगा। उसे यह बताना होगा कि वह स्वेच्छा से ऐसा कर रहा है। धर्मांतरण कराने वाले पुरोहित/पादरी या किसी धर्माचार्य को भी एक महीने पहले इसकी सूचना देनी होगी। अपने मूल धर्म में वापस आने वाले व्यक्ति पर ऐसी कोई शर्त नहीं होगी। अगर दलित, महिला या नाबालिग का जबरन धर्मांतरण कराया जाता है तो दो से सात साल तक की जेल की सजा मिल सकती है।

चिदंबरम को ‘मुँहमाँगी मुराद’: INX मीडिया मामले में 2 सितंबर तक रहेंगे CBI हिरासत में

दिल्ली की विशेष सीबीआई अदालत ने आईएनएक्स मीडिया केस में आरोपित कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की सीबीआई हिरासत 2 सितंबर तक के लिए बढ़ा दी है। विशेष सीबीआई अदालत ने आईएनएक्स मीडिया मामले में पी चिदंबरम रिमांड तीन दिनों के लिए बढ़ा दी है।

पी चिदंबरम को 4 दिन की सीबीआई हिरासत की समाप्ति पर शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को सीबीआई अदालत में पेश किया गया। सुनवाई के दौरान, जाँच एजेंसी ने मामले में चिदंबरम की हिरासत की अवधि 5 दिन बढ़ाने की माँग की थी।

बता दें कि पी चिदंबरम खुद सीबीआई रिमांड में रहना चाहते हैं। उन्होंने एक आप्रत्याशित आवेदन के जरिए 2 सितंबर तक खुद सीबीआई की गिरफ्त में रहने की इच्छा जताई थी। दरअसल, चिदंबरम को लगता है कि अगर रिमांड के बाद उन्हें बेल नहीं मिली तो उन्हें तिहाड़ भेजा जा सकता है। इसलिए वो सीबीआई की रिमांड में ही रहना चाहते हैं।

गौरतलब है कि 20 अगस्त को दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद सीबीआई ने 21 अगस्त को उन्हें गिरफ्तार किया था। तब कोर्ट ने उन्हें 26 अगस्त तक के लिए सीबीआई कस्टडी में पूछताछ के लिए भेज दिया था। बाद में कस्टडी को 4 दिन बढ़ाकर 30 अगस्त तक किया गया था।

गुरुवार (अगस्त 29, 2019) को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आर. भानुमति और जस्टिस ए. एस. बोपन्ना की पीठ ने कहा था कि वह भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई हिरासत में भेजने के निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर 2 सितंबर को सुनवाई करेगी। इसके बाद चिदंबरम के वकीलों ने खुद ही कह दिया था कि वह खुद 2 सितंबर तक सीबीआई हिरासत में ही रहने की पेशकश कर रहे हैं।

‘चाय पर चर्चा’ के लिए निकले पश्चिम बंगाल BJP अध्यक्ष दिलीप घोष पर हमला, 2 कार्यकर्ता घायल

मॉर्निंग वॉक और चाय पे चर्चा के लिए निकले पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष पर लेक टाउन इलाके में हमला हुआ। शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) की सुबह इस हमले के दौरान दो अन्य भाजपा कार्यकर्ता भी घायल हो गए। दिलीप घोष ने इसके लिए तृणमूल कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि वो पार्टी समर्थकों के साथ इलाके में स्थानीय लोगों से चाय पर चर्चा करने गए थे कि तभी तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गए और ‘वापस जाओ’ के नारे लगाने लगे। उन्होंने दिलीप घोष से तुरंत इलाका छोड़ने के लिए कहा। इस दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की भी हुई और भाजपा के झंडे, बैनर को भी तहस-नहस कर दिया गया।

दिलीप घोष सुबह लेक टाउन में कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ मौजूद थे। एक जगह बैठकर वह लोगों से बातचीत कर रहे थे। उसी समय स्थानीय पार्षद के नेतृत्व में करीब 250 तृणमूल कार्यकर्ता एकत्र हुए और उन पर हमला कर दिया। हालाँकि, दिलीप घोष को चोट नहीं आई, लेकिन उन्हें बचाने की कोशिश में भाजपा के दो कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हो गए।

गौरतलब है कि दिलीप घोष पर पहले भी कई बार हमले हो चुके हैं। इस साल मई में जब वह बीजेपी के वरिष्‍ठ नेता हेमंत बिस्‍व सरमा के साथ जा रहे थे तो उनके काफिले पर खेजुरी में हमला हुआ था। हालाँकि तब भी उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ था लेकिन दो वाहनों में तोड़फोड़ की गई थी। घटना की जानकारी होने पर सीआरपीएफ मौके पर पहुँची थी। लेकिन बीजेपी ने आरोप लगाया था कि टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने सड़क पर जाम लगा दिया और सीआरपीएफ को घटनास्थल पर नहीं पहुँचने दिया।

मोदी का नाम लेते ही पाकिस्तानी मंत्री शेख रशीद को लगा माइक से करंट

पाकिस्तान और उसके तमाम नेता इस समय भारत के नाम से बौखलाए हुए हैं। जिस तरह के प्रकरण सामने आ रहे हैं, उन्हें देख कर लगता है कि मानो इस बार कायनात भी उनका साथ देने को तैयार नहीं है।

ऐसा ही एक किस्सा शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को पाकिस्तानी सरकार में रेल मंत्री शेख रशीद के साथ हुआ। इमरान खान के मंत्री शेख रशीद एक सभा को संबोधित कर रह थे, जब वह भाषण दे रहे थे तभी उनके माइक में करंट आ गया और वह डर गए। ये देखकर वहाँ पर खड़े लोग हँसने लगे। इस पर शेख रशीद बोले- “लगता है कि करंट लगा है, लेकिन मोदी इस जलसे को खराब नहीं कर पाएगा।” और इसके बाद उन्‍होंने अपना भाषण रोक दिया।

पकिस्तान के रेल मंत्री शेख रशीद इससे पहले भी कई बार भारत के खिलाफ युद्ध की धमकी देते आए हैं। ये वही नेता हैं जिन्होंने हाल ही में भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि अक्टूबर से नवंबर के बीच भारत-पाकिस्तान के बीच जंग हो सकती है।

पाकिस्तानी मंत्री शेख रशीद का ये करंट लगने वाला वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है और पाकिस्तानी लोग ही उन्हें खरी-खोटी भी सुना रहे हैं।

48 वर्षीय मैकेनिक शाहिद ने बच्चे को खाना खिलाया, काम सिखाया, तीसरे दिन से करने लगा यौन उत्पीड़न

बीते मंगलवार को दिल्ली पुलिस ने एक लड़के के अपहरण और उसका यौन शोषण करने के आरोप में 48 वर्षीय एसी मैकेनिक मोहम्मद शाहिद को गिरफ्तार किया। पूछताछ में आरोपित ने बताया कि वो इससे पहले भी कम से कम 5 बच्चों का यौन उत्पीड़न कर चुका है।

पुलिस के मुताबिक शाहिद दिल्ली में किराए पर रहते हुए एसी ठीक करने का काम करता है। इससे पहले बाल यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार होने पर उसके परिवार ने उसका साथ छोड़ दिया था और फिलहाल वह अकेला रहता था।

20 अगस्त को दर्ज हुई शिकायत पर पुलिस ने जाँच के बाद शाहिद को गिरफ्तार किया। इंडियन एक्प्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक एक अधिकारी ने बताया कि पीड़ित बच्चा अपनी माँ से डाँट खाने के बाद घर से बाहर गया था। जहाँ खाने की एक दुकान पर वो शाहिद से मिला। शाहिद ने बच्चे को खाने का लालच दिया और बाद में उसे अपने साथ अपने घर ले गया।

बच्चे ने बताया कि शाहिद शुरुआती दो दिन उसके साथ सामान्य रहा। यहाँ तक उसने लड़के को एसी ठीक करने का काम भी सिखाया, लेकिन तीसरे दिन से वह उसका यौन उत्पीड़न करने लगा।

इस बीच लड़के के घरवालों ने उसके गायब होने की सूचना पुलिस को दी और पुलिस भी घर जा जाकर बच्चे की फोटो दिखाकर सबसे उसके बारे में पूछताछ करने लगी। तलाशी अभियान के दौरान उन्हें इलाके में एक लड़का मिला जिसने बताया कि उसने बच्चे को शाहिद के घर पर देखा था। इस जानकारी के आधार पर पुलिस ने देर रात शाहिद के घर पर रेड मारी और उसे गिरफ्तार किया। बच्चे को तुरंत पुलिस ने अस्पताल में भर्ती करवाया, जहाँ मेडिकल जाँच के बाद पुष्टि हुई कि शाहिद ने बच्चे का यौन उत्पीड़न किया था। आरोपित ने पूछताछ में इस बात को स्वीकारा कि वो इससे पहले 5 और बच्चों का भी यौन उत्पीड़न कर चुका है।

उल्लेखनीय है कि प्राप्त जानकारी के अनुसार मोहम्मद शाहिद पर 1996 से अब तक 8 मामले दर्ज हैं, जिसमें लड़के/ लड़कियों के बलात्कार के 6 मामले और एक हत्या की कोशिश का मामला दर्ज है।