बात श्री-श्री 1008 श्री रवीश कुमार और उनके अखंड (आपको पता ही है) भक्तों की

रवीश भक्त रवीश चालीसा पढ़ते रहे क्योंकि वो साकार भी है, निराकार भी; वो प्रपंचों का आदि भी है, अंत भी; वो तरल भी है, ठोस भी; वो छुपाता भी है, दिखाता भी; वो टीवी पर भी है, फेसबुक पर भी; वो स्क्रीन पर भी बोलता है, भक्तों के दिल में भी…

कहते हैं कि कलि काल में एक महान व्यक्ति का अभ्युदय हुआ जो हर मामले का जानकार हुआ करता था। वो जो कह देता था, वही परम सत्य हुआ करता था। वो टीवी नामक यंत्र से रात के नौ बजे प्रवचन किया करता था। उसके भक्तों की संख्या बढ़ती गई और एक समय आया कि वो हर भक्त की जेब में घुस गए। भक्तों के मन में और भी उन्माद भरा, वो और भी आनंदित होते गए। फिर महान व्यक्ति ने फेसबुक नामक जगह पर अपने प्रवचन लिखने शुरु किए और कमेंट में ‘आह ब्रो-वाह ब्रो’ की कामुक आहें लिखी जाने लगीं।

चूँकि भक्तों ने इनकी हर बात को परम सत्य जाना, तो कालांतर में श्री कुमार ने अपने प्रवचन में प्रपंच का प्रतिशत बढ़ाना शुरु किया। पहले पाँच प्रतिशत, फिर दस और कभी-कभी तो पूरा का पूरा प्रवचन ही प्रलाप हुआ करने लगा। भक्त मग्न थे। जबकि श्री-श्री 1008 श्री रवीश कुमार जी महाराज के विरोधियों ने उनके हर पोस्ट और प्राइम टाइम पर कमेंट सेक्शन में लिख कर भक्तों को रवीशिया अफ़ीम की ख़ुमारी से बाहर लाने की कोशिश की लेकिन भक्त तो परमअज्ञान की अवस्था पा चुके थे, उनका उस प्रपंच सागर से बाहर आना नामुमकिन हो चुका था। वो बेचारे सूअरों की तरह कीचड़ में ही आनंद पा रहे थे। कोई निर्मल जल डाल कर उन्हें सत्य से अवगत कराना चाहता था, तो वो उसे सामूहिक रूप से काट खाने को दौड़ते थे।

प्रपंच की मिलावट चलती रही और चौवनिया मुसकान से लाखों भक्तों के दिल में तीर भोंक कर नित-प्रतिदिन छेद करने वाले रवीश कुमार जी महाराज दिन दूनी, रात चौगुनी प्रगति करते रहे। उनके गिरोह के सदस्यों ने अपने ही द्वारा बनाए गए अवार्डों से उन्हें नवाजना शुरु किया। वो जैसे कम पड़ गया हो तो समुद्र के पार, दूर देश के एक शासक की याद में चलता आ रहा मेडल भी उन्हें मिला। हालाँकि मेडल अगर उन्हें पहले के दिनों के लिए दिया जाता, तो सबको स्वीकार्य होता। लेकिन, मेडल वालों ने लिखा कि ये मेडल तो उन्हें 2014 के बाद वाली प्रपंचकारी पत्रकारिता के लिए दिया गया है, जिसमें उन्होंने तथ्यों को छुपाने, परिभाषाओं को घुमाने और जान-बूझ कर बातों को मरोड़ कर पेश करने के बाद उसे सत्य की तरह प्रस्तुत करने की अनूठी और अप्रतिम कला का प्रदर्शन पूरी नियमितता के साथ किया है।

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इससे श्री कुमार जी महाराज को और बल मिला। वो दुगुने जोश के साथ मैदान में आए। उनके भक्तों पर विरोधियों ने जल डालना जारी रखा ताकि किसी की आँख पर पड़े और वो सत्य का अन्वेषण कर सके। लेकिन भक्तों ने कहा कि ये अवार्ड सिर्फ महाराज रवीश कुमार जी को ही नहीं मिला, ये अवार्ड उनके अखंड (आपको पता ही है) भक्तों को भी मिला है। इसलिए, वो आँख मूँद कर कीचड़ में तैरते रहे। उन्हें पता भी नहीं चला कि अब उस कीचड़ में कुछ सहयोगी ‘कुछ नया किया जाए’ के चक्कर में विष्ठा और मानव मल मिलाने लगे। रवीश भक्तों को और मजा आने लगा क्योंकि अब कीचड़ की बोरिंग गंध में नयापन आ चुका था। भक्तों ने महाराज को धन्यवाद किया।

ऐसा नहीं था कि ये सारे भक्त पहले से ही मूर्ख थे। जी नहीं, यहाँ एक से एक धुरंधर और पढ़ाकू लोग थे जिन्होंने आरती की थाल में अपने दिमाग का कपूर रख कर उसे ऊर्ध्वपाती बनाने में कभी भी लेशमात्र संकोच नहीं किया और रवीश चालीसा पढ़ते रहे क्योंकि वो साकार भी है, निराकार भी; वो प्रपंचों का आदि भी है, अंत भी; वो तरल भी है, ठोस भी; वो छुपाता भी है, दिखाता भी; वो टीवी पर भी है, फेसबुक पर भी; वो स्क्रीन पर भी बोलता है, भक्तों के दिल में भी…

कब रवीश कुमार प्रपंच में लीन हो कर एकाकार हो गए, उस दिवस की याद किसी को नहीं है। वो दौर सबको याद है, लेकिन वो एक दिन किसी को याद नहीं। उनके कुछ कालजयी प्रपंचों में गिरोह के सदस्यों ने खूब साथ दिया। एक प्रपंच था कि अमित शाह पुत्र जय शाह ने करोड़ों की हेराफेरी कर दी। ये दावा ‘द वायर’ का था। आज सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ लगाते हुए उन्हें कहा कि सीधे शब्दों में ये ‘पीत पत्रकारिता’ यानी ‘यलो जर्नलिज्म’ यानी ‘सनसनी फैलाने वाली पत्रकारिता’ है। ऐसे ही जस्टिस लोया वाले मामले में गिरोह के दूसरे सदस्य ‘कारवाँ’ मैग्जीन की बातें झूठी साबित हो चुकी हैं, उनके परिवार वालों ने किसी भी साजिश से इनकार करते हुए कहा कि इस पर बवाल न करें, लेकिन प्रपंचसखा रवीश कोर्ट और परिवार के बाद भी लगे रहे कि जाँच तो होनी चाहिए।

रवीश जी महाराज ने कल एक और प्रपंच फेंका, जिसमें उन्होंने रिज़र्व बैंक के कन्टिनजेन्सी फ़ंड को ही पूरा सरप्लस बता दिया। रिज़र्व बैंक के इस मामले पर आप पूरी बात यहाँ पढ़ सकते हैं। आम जनता को ऐसे बड़े टर्म्स से मतलब नहीं होता। वो विश्वास करते हैं कि कोई कहता है कि मोदी ने पैसा चुरा लिया। किसी को यह नहीं पता, या बताया भी नहीं जाता, कि रिज़र्व बैंक का यह फ़ंड क्या है। महाराज रवीश कुमार ने भी बताया कि आकस्मिक निधि से ही सरकार को पैसा दिया जाता है जो कि सरासर गलत है। रिज़र्व बैंक भी कारोबार करती है, उससे मुनाफ़ा कमाती है। बैंक के बैलेंस शीट का एक हिस्सा (मात्र 5.5-6.5%) कंटिन्जेन्सी फ़ंड होता है।

इस फ़ंड का मतलब है कि बुरे दिनों के लिए यह पैसा बचा कर रखना। यह प्रतिशत कितना होगा, यह बात रिज़र्व बैंक की कमिटी तय करती है, यह देखते हुए कि वैश्विक आर्थिक स्थिति कैसी है, हम पर कितना असर पड़ सकता है। अगर असर हुआ तो हमारे पास कितना पैसा होने से हम उसके असर को झेल लेंगे। रवीश ने धूर्तता से लोगों को यह बताया कि पूरा मुनाफ़ा ही कंटिन्जेन्सी फ़ंड है और उसी से पैसा निकाल कर सरकार ने ले लिया है। जबकि सरकार ने पैसा ज़बरदस्ती नहीं लिया है, रिज़र्व बैंक को क़ानूनन वो पैसा सरकार को ही देना होता है। क्योंकि बैंक सरकार की है, प्राइवेट लिमिटेड नहीं।

श्रीयुत रवीश जी ने चुपके से कह दिया और गंभीर चेहरा बना कर कहते रहे कि विमल जालान कमिटी के एक सदस्य ने साइन करने से इनकार कर दिया था तो उन्हें कहीं और भेज दिया गया। यहाँ श्री कुमार ने यह नहीं बताया कि कमिटी में कितने लोग थे और बाकी लोगों की राय क्या थी? क्या यह बात सामान्य नहीं है कि कई लोगों में से एक व्यक्ति किसी बात पर अलग राय रखता हो? फिर उसी की राय को सबसे ज़रूरी या सबसे सही किस आधार पर मान लिया गया? वो इसलिए मान लिया गया क्योंकि प्रपंच ऐसे ही फैलाया जाता है। आपके मन में संदेह छोड़ दिया जाएगा और आपको लगने लगेगा कि आख़िर एक आदमी को हटाया क्यों गया! आपको अगर सही कारण भी दे दिया जाएगा तो भी आप मानेंगे ही नहीं क्योंकि आप अंत में यह कह देंगे कि उससे यही कारण कहलवाया गया है, वो दबाव में होगा। इस कुतर्क का कोई अंत नहीं।

रवीश का RBI पर प्रपंच

बाहरहाल, रिज़र्व बैंक पर आते हैं जहाँ श्री रवीश कुमार जी महाराज ने बल दे कर, बार-बार कहा कि इतना पैसा चीन से युद्ध के समय से ले कर किसी भी समय मे नहीं दिया गया था। वो यह नहीं बता रहे कि पिछले साल कितना मुनाफ़ा और कारोबार किया रिज़र्व बैंक ने। क्योंकि वो बता देंगे तो फिर आप पूछ बैठेंगे कि रवीश जी पैसा जब ज्यादा कमाया है, तो मुनाफ़ा भी ज्यादा होगा, तो सरकार को मिलेगा भी ज्यादा।

इसमें एक और बात आती है कन्टिन्जेन्सी फ़ंड के प्रतिशत की। प्रतिशत बहुत कमाल की चीज है। यह फ़ंड बैंक के कारोबार के बैलेंस शीट का 6.5% से 5.5% तक होता है। अब मानिए कि बैलेंस शीट है 100 रुपया तो 6.5% के हिसाब से फ़ंड बनेगा 6.5 रुपया। बैंक का कारोबार ज्यादा हुआ तो बैलेंश शीट मान लीजिए 120 रुपए तक पहुँच गया। वित्तीय स्थिति में अगर बहुत ज्यादा बदलाव न हुआ हो तो इसी बैंलेंस शीट पर 6.5 की जगह 5.5% भी कंटिन्जेन्सी फ़ंड रखेंगे, तो भी फ़ंड की वैल्यू 6.6 रुपए हो जाएगी, जो कि पिछले साल के ऊपरी मानक से ज्यादा ही है। इसलिए प्रतिशत का खेल खेलने वाले यह नहीं बता रहे कि रिज़र्व बैंक के बैलेंश शीट में दो सालों में क्या वृद्धि हुई या अंतर आया है।

रवीश जी महाराज आधी बात छुपा लेते हैं क्योंकि उससे प्रपंच सामने नहीं आता और अनभिज्ञ लोग इतने डिटेल में जाते ही नहीं। वो जब 6.5 और 5.5% देखते हैं और सुनते हैं कि इस बार कमिटी ने कहा कि 5.5% ही काफी है तो लोगों को लगता है कि एक प्रतिशत ज्यादा पैसा मोदी ने मार लिया। अब मोदी ने ये पैसा मार कर कहाँ रिसॉर्ट खुलवा लिए, किस देश में उसके टेनिस क्लब चल रहे हैं, वेगस का कौन सा कसीनो उसका है, इसकी जानकारी सिर्फ रवीश भक्तों के पास ही है।

रवीशभक्तों का क्यूट लॉजिक

अंत में इन अखंड (आपको पता ही है) भक्तों से जुड़ा एक ताज़ा वाक़या भी सुनाता चलूँ। हुआ यूँ कि स्कूल के दोस्तों के एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में यह बात चली कि रिज़र्व बैंक के साथ मोदी जी ने गलत किया या सही। तो, एक मित्र ने बताया कि बैंक तो कानूनन सरप्लस देने के लिए बाध्य है। थोड़ी देर बाद एक रवीश भक्त मित्र ने लिंकबाजी करते हुए लिखा कि ‘ये रवीश कुमार का व्यू है… थोड़ा डिटेल में… देख सकते हो’। देखने के बाद एक ने बताया कि ये गलत है क्योंकि बुनियादी परिभाषा में ही रवीश ने बातें गलत लिखी हैं, और छुपाई हैं।

भक्त बिगड़ गया और कहने लगा, “हर किसी का अपना व्यू होता है भाई। मुझे पता है ये सरकारी हड्डी पर नहीं दौड़ा अब तक तो उसके व्यूज मेरे लिए मैटर करते हैं।” मित्र को समझाने की कोशिश हुई कि व्यू गलत हो सकते हैं, तथ्य गलत नहीं होते। फिर भक्त ने लिखा, “मीडिया को मीडिया की तरह काम करना चाहिए, प्रचारक नहीं बनना चाहिए।” भक्त का टार्गेट वह मित्र था जो मीडिया में काम करता था। लेकिन करे तो क्या करे, स्कूल का दोस्त है उसे कैसे बाक़ियों की तरह लताड़ दे।

एक कोशिश और की समझाने की कि बात रिज़र्व बैंक पर हो रही है, मीडिया क्या है और कैसे है, उस पर नहीं। तब भक्त ने ब्रह्मास्त्र चला दिया, “उसे ऐसे ही वर्ल्ड रिकगनिशन नहीं मिला अगर वो गलत ही रहा करता तो।” उस मित्र को फिर बताया गया कि इस बात का उसकी महानता से कोई मतलब नहीं। अगर ऐसे ही डिबेट करना है तब तो उसके भाई को भी सेक्स रैकेट चलाने वाला बता दिया जाएगा लेकिन मुद्दा वो है ही नहीं।

तब भक्त बिलकुल डिफेंसिव हो गया और बोल बैठा, “जो भी हो। मुझे वो पसंद है और उसकी रिपोर्टिंग भी। बाकी बातों से मुझे फर्क नहीं पड़ता कि वो सही है या गलत।”


व्हाट्सएप्प का स्क्रीनशॉट

इस लाइन पर गौर कीजिए। ये लाइन एक व्यक्ति की नहीं है, ये लाइन बस एक व्यक्ति ने बोली है। यह लाइन रवीश कुमार जी महाराज के हर अंधभक्त की है जो तर्क से जब हार जाता है तो अंत में यही बोलता है कि उसको अवार्ड मिले हैं, तुम संघी हो, उसको दुनिया में लोग बुलाते हैं, तुम जलते हो।

ये सारी बातें सही होतीं अगर सामने वाला तर्क की जगह सिर्फ गाली दे रहा होता रवीश कुमार को। जबकि सत्य
यह है कि उसके हर प्राइम टाइम के झूठों के पुलिंदों पर चार-चार लेख लिखे जा सकते हैं। मैं नहीं लिखता क्योंकि मुझे और बातों पर भी लिखना होता है, और भी मुद्दे हैं। ये जगज़ाहिर है कि रवीश कुमार हर मुद्दे पर प्रपंच ही फैलाएँगे। इसलिए उन्हीं मुद्दों को उठाता हूँ जहाँ वो बिलकुल ही गलत बोल कर लोगों को बरगलाते हैं।

क्या बँट चुका है व्हाट्सएप्प ग्रुप भी

इस पूरे व्हाट्सएप्प चैट से एक और बात याद आ गई। हाल ही में रवीश जी का एक विडियो घूम रहा था, जहाँ उन्होंने कहा कि किसी ने उन्हें मैसेज किया कि वो जब अपने घर में उनका शो देखने बैठता है तो उसका भाई टीवी बंद कर देता है। ये एक सामान्य सी घटना है, जो हर घर में होती है जहाँ एक ही टीवी हो या फिर आने वाला प्रोग्राम इतना बेकार हो कि कोई इरिटेट हो जाता है। रवीश जी का प्रोग्राम वैसा ही होता है। तो बड़े भाई ने बंद करा दिया होगा।

लेकिन, रवीश जी इसे कैसे देखते हैं? सुनिए विस्तार से। वो वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ पता नहीं रेनेसाँ ह्यूमैनिज्म जैसी थ्योरी भी पानी माँगने लगे। वो बताते हैं कि आज की सरकार ने लोगों को घरों में बाँट दिया है। पहले समाज के स्तर पर यह विभाजन था, अब घरों में हो गया है। यह सामाजिक पतन है जहाँ परिवार बँट चुका है।

अब कहीं मेरा वो मित्र रवीश जी को फोन न कर दे कि व्हाट्सएप्प में उसके तर्कों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं और रवीश जी यह न कहते मिलें किसी प्रोग्राम में, “स्कूल के लम्बे समय के दोस्तों के बीच विभाजन हो रहा है, लोग ग्रुप में लड़ रहे हैं, मेरी बात आती है तो लोग बँट जाते हैं। मोदी सरकार ने पहले राजनीति को बाँटा, फिर देश बँटा, फिर राज्यों में लोग बँटे, फिर समाज में फूट डाली गई, फिर घरों में लोग मेरा प्रोग्राम देखने से मना करने लगे और अब यह बात मोबाइल तक पहुँच गई, जो कि हमारी-आपकी जान बन चुकी है। अब लोग वहाँ भी बँट चुके हैं।”

रवीश जी, यही ख़ूबसूरती है हमारे समाज की कि एक ही परिवार के लोग एक ही विषय पर दो विचार रख सकते हैं। पूरा परिवार हर बात पर एक ही बात कहेगा तो आप ही कहेंगे कि बाप की तानाशाही चल रही है। आपको जब ऐसे मैसेज आएँ तो भक्तों को बताएँ कि मोबाइल में भी प्राइम टाइम आता है। इयरफोन लगा कर देख ले।

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