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ED मामले में चिदंबरम को फिलहाल गिरफ्तारी से राहत, सुप्रीम कोर्ट 5 सितंबर को सुनाएगा फैसला

पूर्व गृह और वित्त-मंत्री पी. चिदंबरम को INX मीडिया घोटाले में 5 सितंबर तक की अंतरिम राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उनकी गिरफ़्तारी के लिए अनुमति याचिका पर फैसला उसी तारीख तक के लिए सुरक्षित कर लिया है। कॉन्ग्रेस नेता फ़िलहाल सीबीआई हिरासत में चल रहे हैं, और ED राष्ट्र-विरोधी गंभीरता के अपराध और चिदंबरम के तीक्ष्ण दिमाग और वृहद् कानूनी अनुभव आदि का हवाला देकर उनसे हिरासत में लेकर पूछताछ की अनुमति पाने के लिए जद्दोजहद कर रही है।

“सील-बंद लिफ़ाफ़े किसी की आज़ादी सील नहीं कर देते”

इसके पहले सुप्रीम कोर्ट में बहस करते हुए चिदंबरम के वकील और कॉन्ग्रेस में उनके साथी नेता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया, “सील-बंद लिफ़ाफ़े किसी की आज़ादी सील नहीं कर देते। अगर वे (ED) चार साल तक अपना मुकदमा दायर न करें यह कहकर कि अभी जाँच जारी है, तो क्या मुझे 4 साल तक ज़मानत ही नहीं मिल पाएगी?” वह ED द्वारा सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ को सील-बंद लिफ़ाफ़े में दस्तावेज़ देने के बारे में बात कर रहे थे।

“मैं यह नहीं कह रहा कि (एजेंसियों को) मुझे (पी. चिदंबरम को) गिरफ्तार ही नहीं करना है। हम केवल इतना कह रहे हैं कि यदि आपके पास हमारे विरुद्ध कोई ऐसा सबूत है जो चिदंबरम के सामने आपने सामने रखा, जोकि आपने अपने प्रति-हलफ़नामे में दावा किया है (ED ने अपने काउंटर-एफिडेविट में दावा किया था कि उन्होंने चिदंबरम को मामले में फँसने वाले दस्तावेज़ रखे थे, लेकिन वे गोलमोल जवाब दे कर उनका सीधा जवाब देने से बचते फिरे), तो आप उन्हें अदालत को दिखा दें।”

चिदंबरम ने सीबीआई हिरासत खुद ही मंजूर की

ED की हिरासत से बचने के लिए चिदंबरम किस कदर व्यग्र हैं, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने खुद ही सोमवार तक सीबीआई की हिरासत में रहने की पेशकश कर डाली। लेकिन सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सीबीआई रिमांड को विस्तार केवल सीबीआई अदालत में ही दिया जा सकता है। इसके बाद बेंच ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से मना कर दिया।

जम्मू-कश्मीर के नाम पर IAS छोड़ने वाले गोपीनाथन के मामले में नया मोड़ वजह कारण-बताओ नोटिस

सिविल सेवाओं से “जम्मू-कश्मीर में सरकार के खिलाफ बोलने की आज़ादी के लिए” त्यागपत्र देने वाले आईएएस अफसर कन्नन गोपीनाथन के खिलाफ कदाचार के मामलों में कारण-बताओ नोटिस लंबित था। जुलाई में गृह-मंत्रालय के अवर सचिव राकेश कुमार सिंह की ओर से उन्हें थमाए गए कारण-बताओ नोटिस में उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के पाँच कारण गिनाए गए थे। 2012 बैच के गोपीनाथन उस समय दादरा और नगर हवेली में ऊर्जा, शहरी विकास, कस्बाई और ग्रामीण योजना विभागों के सचिव थे। उन पर लगे आरोपों में पिछले साल अपने गृह-राज्य केरल में आई बाढ़ के समय उनके द्वारा वहाँ जाकर किए गए राहत-कार्यों की कोई रिपोर्ट लौटकर जमा न करने का भी है।

उनपर लगे अन्य आरोपों में अवज्ञा, कर्त्तव्य-पालन में लापरवाही और जान-बूझकर सरकारी प्रक्रिया धीमी करने की पैंतरेबाज़ी (dilatory tactics) भी शामिल हैं। उन्हें नोटिस का अगल दस दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था। इसके अलावा सार्वजनिक प्रशासन (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) में नवाचार (innovation) के लिए प्रधानमंत्री अवार्ड की विभिन्न श्रेणियों में नामांकन के बाबत भी निर्देशों की अवहेलना का आरोप भी केंद्र ने उनपर लगाया था

किया खण्डन

हालाँकि इंडिया टुडे टीवी से बात करते हुए गोपीनाथन ने दावा किया है कि उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला गृह-मंत्रालय के इस दो पन्नों के मेमोरेंडम के डर से नहीं, जम्मू-कश्मीर में लाखों लोगों के मूलभूत अधिकारों का कई हफ्ते तक उल्लंघन होने से क्षुब्ध होकर ही किया है।

उन्होंने दावा यह भी किया कि उनकी वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट (APR) में 2017-2018 के लिए उन्हें 10 में से 9.95 अंक मिले थे। तत्कालीन गृह सचिव ने उनके बारे में की गई इस रिपोर्ट को स्वीकार भी कर लिया था।

5 कश्मीरियों ने फेसबुक पर पोस्ट की थी फर्जी-संवेदनशील जानकारी, शांति भंग की आशंका पर मामला दर्ज

जम्मू-कश्मीर के राजौरी और पुंछ इलाके के रहने वाले 5 लोगों पर ‘फर्जी जानकारी’ और ‘संवेदनशील टिप्पणियाँ’ करने के आरोप में पुलिस ने मामला दर्ज किया है। जानकारी के मुताबिक इन 5 लोगों ने अपने फेसबुक पर ऐसी आपत्तिजनक चीजें पोस्ट की थी जिससे राज्य की शांति बाधित हो सकती थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राजौरी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक युगल मन्हास ने बताया सोशल मीडिया पर नियमित रूप से निगरानी रखने के दौरान उन्हें कुछ ऐसे लोगों के बारे में पता चला जो राज्य की शांति को बाधित करने का काम कर रहे थे। इसके बाद पुलिस ने उनके बारे में जानकारी जुटाई और उनपर मामला दर्ज किया।

पुलिस के मुताबिक इन 5 आरोपितों पर आईपीसी की धारा 153 ए और आईटी एक्ट की 66 बी के तहत मामला दर्ज हुआ है। इनकी पहचान जाकिर शाह बुखारी, जहिर चौधरी, नाजिक हुसैन, इमराम काजी और सरदार तारिक खान के रूप में की गई है।

पुलिस का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया के तहत जल्द ही इन सभी के पासपोर्ट रद्द किए जाएँगे। एसएसपी ने बताया है कि ये पाँचो युवा राज्य के बाहर काम करते थे और कश्मीर पर लगातार सोशल मीडिया पर अफवाह फैला रहे थे।

इसके अलावा बता दें कि इस घटना के बाद पुलिस ने जम्मू-कश्मीर के सभी लोगों के साथ-साथ राज्य के बाहर रह रहे यहाँ के सभी लोगों से सोशल मीडिया के जरिए अपील की है कि वह ऐसे पोस्ट न डालें जिससे कश्मीर में हालात खराब होने की आशंका हो।

क्या कोर्ट ने लियो टॉलस्टॉय की ‘वॉर एंड पीस’ पुस्तक को लेकर आपत्ति जताई? जानिए सच

भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने अर्बन नक्सल वर्नोन गोंजाल्विस से पूछा कि उनके घर में पुस्तक ‘वॉर एंड पीस इन जंगल महल- पीपल, स्टेट एंड माओइस्ट्स‘ क्या कर रही थी? दरअसल, अदालत ने केवल इसी पुस्तक को लेकर उनसे सवाल नहीं पूछे बल्कि उनके पास कई अन्य आपत्तिजनक पुस्तकें और सीडी पड़ी हुई थीं, जिसे लेकर कोर्ट ने आपत्ति जताई। इनमें से एक सीडी तो ‘सरकार द्वारा किए जा रहे दमन का विरोध’ के बारे में था।

इसके बाद सोशल मीडिया पर दरबारी पत्रकारों व वामपंथी ठेकेदारों ने जज का ही मज़ाक बनाना शुरू कर दिया। न सिर्फ़ जज का मज़ाक बनाया गया बल्कि भीमा कोरेगाँव हिंसा जैसी गंभीर घटना के मामले में असंवेदनशीलता दिखाई गई। इतना ही नहीं, ठेकेदारों, दरबारियों और वामपंथियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक वीडिओ निकाल कर लाया, जिसमें दावा किया गया कि वह भी ‘वॉर एंड पीस‘ पुस्तक पढ़ते दिख रहे हैं। सवाल पूछे जाने लगे कि क्या नरेन्द्र मोदी भी अर्बन नक्सल हैं? क्या उनसे भी अदालत सवाल पूछेगी?

इसे लेकर भ्रामक चीजें फैलाई गई। आगे आपको हम ऐसी सच्चाई बताएँगे, जिसे जान कर आप इनके प्रोपेगंडा को समझ कर इन्हें लताड़ेंगे लेकिन उससे पहले जरा देख लीजिए कि किस तरह से झूठ फैलाया गया और कौन-कौन लोग इसमें शामिल हैं।

ऊपर आपने देखा कि कुछ लोग जहाँ जज के विवेक पर सवाल खड़े कर रहे हैं, वहीं कुछ अन्य लोग नरेन्द्र मोदी वाला विडियो शेयर कर पूछ रहे हैं कि क्या वह भी अर्बन नक्सल हैं? अब आपको सच्चाई बताते हैं।

यह पुस्तक लियो टॉलस्टॉय वाली नहीं है, अर्बन नक्सल गोंजाल्विस के घर में यही मिली थी

कोर्ट ने जिस पुस्तक को लेकर आपत्ति जताई, उसका नाम है- “वॉर एंड पीस इन जंगलमहल- पीपल, स्टेट्स एंड माओइस्ट्स” और यही पुस्तक अर्बन नक्सल गोंजाल्विस के पास मिली थी।

नरेन्द्र मोदी ये क्लासिक पुस्तक पढ़ रहे थे, कोर्ट ने इसे लेकर आपत्ति नहीं जताई

और नरेन्द्र मोदी जो ‘वॉर एंड पीस’ पुस्तक पढ़ रहे हैं, वह लियो टॉलस्टॉय की क्लासिक कृति है। दिमाग के अभाव में वामपंथियों ने समझ लिया कि अर्बन नक्सल गोंजाल्विस भी यही क्लासिक कृति अपने घर में रखे हुआ था और कोर्ट ने इसी को लेकर आपत्ति जताई है। लेकिन अफ़सोस, वह पुस्तक विश्वजीत रॉय द्वारा एडिटेड है। देखिए सच्चाई:

अब आप समझ गए होंगे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो पुस्तक पढ़ रहे थे और अर्बन नक्सल गोंजाल्विस के घर में जो पुस्तक पड़ी थी, दोनों अलग-अलग हैं लेकिन दोनों के नाम कमोबेश समान हैं, जिसका फ़ायदा सोशल मीडिया के ठेकेदारों ने उठाया।

मी लॉर्ड यहाँ 400 साल पहले झील था, हाई काेर्ट ने कहा- समाज सेवा जाकर अफराेज शाह के साथ कराे

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने आदतन और बेवजह जनहित याचिका लगा कर निर्माण कार्य रोकने वाले याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि समाजसेवी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील व्यक्ति के तौर पर अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए वह मशहूर शहर के पर्यावरणविद और वकील अफ़रोज़ शाह के साथ मिलकर “कुछ असली समाजसेवा करके दिखाए”। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग और जस्टिस भारती डांगरे की डिवीजन बेंच ने इसके अलावा राज्य सरकार को निर्देश दिया है वह सुनिश्चित करे कि याचिकाकर्ता राकेश चव्हाण सच में अफ़रोज़ शाह के दफ्तर पहुँचे, और काम करे।

400 साल पहले की झील के लिए बिल्डिंग न बनाई जाए

चव्हाण ने याचिका दायर कर गोरेगाँव में चल रहे NESCO नामक कम्पनी के निर्माण कार्य को रोकने की याचिका लगाई थी। उन्होंने याचिका में महाराष्ट्र सरकार, उसके विभिन्न विभागों और NESCO को प्रतिवादी बनाया था। उनके अनुसार NESCO ने वहाँ मौजूद एक झील को भर दिया था और उसके ऊपर एक इमारत का अवैध निर्माण चालू था। न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग को पहले तो समझ में ही नहीं आया कि याचिकाकर्ता चव्हाण आखिर कहना क्या चाहते हैं।  

फिर उन्होंने NESCO के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रसाद ढाकेफलकार से पूरा मामला समझाने के लिए कहा। तो ढाकेफलकार ने बताया कि PIL के अनुसार जहाँ NESCO का निर्माण कार्य चल रहा है, उस जगह पर पहले एक झील और कुआँ हुआ करते थे। “याचिकाकर्ता की आदत है कि जब कभी नया निर्माण कार्य शुरू होता है, वह याचिका दायर कर देता। है यह भूखंड कम्पनी ने 70 के दशक में पूरी तरह से कानूनी रूप से खरीदा था। उस पर झील थी तो ज़रूर, लेकिन 400 साल पहले!” ढाकेफलकार ने अदालत को बताया। 

इस पर याचिकाकर्ता चव्हाण ने जवाब दिया कि वे उस साइट पर झील और कुएँ की वापसी चाहते हैं। उन्होंने दावा किया कि वे “समाज के उद्धार और भलाई के लिए” काम करते हैं

‘एक हफ़्ते समाज सेवा करो’

इस पर अदालत ने कहा, “आप समाज के भले के लिए काम करना चाहते हैं, तो जाइए और अब कुछ असली समाजसेवा करिए। जाइए और कोई बीच साफ़ करिए, या फिर और कोई काम एक हफ़्ते तक करिए जो अफ़रोज़ शाह आपको सौंपें।” बेंच ने राज्य को निर्देश भी दिया कि वह सुनिश्चित करे कि चव्हाण 2 सितंबर को शाह के दफ्तर पहुँचें, और जो भी काम उन्हें सौंपा जाए, वह करें। अदालत ने कहा कि इस बीच वह चव्हाण की याचिका को लंबित रखेगी

पहले भी हाईकोर्ट दे चुका है ‘शाह के साथ काम करो’ की रचनात्मक सज़ा

पिछले साल अक्टूबर में भी आपराधिक धमकी देने के दो आरोपितों को अदालत ने वर्सोवा बीच की सफाई के अफ़रोज़ शाह के अभियान का हिस्सा बनने को कहा था। अपने इस ‘बीच एक्टिविज़्म’ के लिए शाह को ‘चैंपियन ऑफ़ अर्थ’ का ख़िताब संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम से मिल चुका है। अपने 84-वर्षीय पड़ोसी के साथ शुरू हुए शाह के इस यह साप्ताहिक अभियान के बारे में कहा जाता है कि इसने वर्सोवा बीच की कायापलट कर दी। उनके काम की सराहना प्रधानमंत्री के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में भी हो चुकी है।

अरुंधति रॉय: धूर्त, कपटी और प्रपंची वामपंथन

कल रात से अरुंधति रॉय फिर से चर्चा में हैं। चर्चा में रहना ही तो नक्सलियों का जीवनध्येय होता है, चाहे सही बात के लिए रहें, या देशविरोधी बयानों के लिए। ताजा समाचार यह है कि इन्होंने नौ महीने पहले जो बेहूदगी की थी उसका विडियो फिर से वायरल हो रहा है और लोग दोबारा इन्हें लताड़ रहे हैं। ये विडियो 2 जून, 2011 को यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिन्स्टर के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, ह्यूमैनिटीज़ एंड लैंग्वेजेज के तत्वावधान में आयोजित एक लेक्चर का हिस्सा है। यहाँ यह बात भी गौरतलब है कि इसी साल उनकी तीन ‘नॉन-फिक्शन’ किताबें आई थीं जिनके नाम ‘ब्रोकन रिपब्लिक: थ्री एस्सेज़’, ‘वाकिंग विद कॉमरेड्स’ और ‘कश्मीर: द केस फॉर फ्रीडम’ हैं।

कथित विडियो में आप अरुंधति रॉय को यह कहते सुन सकते हैं कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत ने एक तरह से उपनिवेशवाद ही किया है और आज तक भारत के लोग भारतीय सेना की बर्बरता झेल रहे हैं। रॉय ने आगे यह कहा कि हर जगह के कबीलाई लोग, एवम् समुदाय विशेष और ईसाई भारतीय राष्ट्र के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं। आजादी के बाद भारत ने इन सारे राज्यों को उपनिवेश बना लिया और वो अपनी आजादी के लिए संघर्षरत हैं। ये कहते हुए रॉय ने कश्मीर से शुरुआत की और पंजाब, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, गोवा होते हुए तेलंगाना और हैदराबाद तक पहुँच गई। साथ ही, रॉय ने बिना झिझक के यह भी कहा कि इस तरह की बर्बरता तो पाकिस्तान की फौज भी नहीं करती। आगे इन्होंने बताया कि अपर कास्ट हिन्दू राष्ट्र लगातार युद्ध की स्थिति में रहा है।

अब इस धूर्त महिला ने माफी माँगी है कि आठ साल पहले जो विडियो आया था, उसमें कुछ बातें जो उसने कही थीं वो गलत और मूर्खतापूर्ण है। लेकिन जो माफी माँगी गई है वो इस बात पर है कि बलूचिस्तान और बंग्लादेश के लोगों द्वारा लताड़ने पर माँगी है जहाँ उन्होंने बताया कि पाकिसाानी सेना ने बलात्कार से लेकर हवाई बमबारी तक अपने ही लोगों पर की है, और आज भी करती है।

‘द प्रिंट’ को दिए गए बयान में रॉय ने कहा कि उस विडियो क्लिप में वह जो भी कहती दिख रही हैं, वो उनकी सोच, विचारों और रचनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वे लोगों से किसी बातचीत के दौरान कही अपनी बातों बजाय अपने लिखे पर विश्वास करने की सलाह देती है। वह कहती हैं अगर इस विडियो क्लिप से कोई भी कन्फ्यूजन पैदा हुआ है तो वह माफ़ी माँगती हैं। अरुंधति रॉय ने कहा:

“पाक फौज बलूचिस्तान में जो कुछ भी कर रही है या बांग्लादेश में उसने जो नरसंहार किया- इस बारे में मेरी राय कभी भी अस्पष्ट नहीं रही है। मैंने इस बारे में काफ़ी कुछ लिखा है। हिन्दू राष्ट्रवादी मेरे पुराने विडियो क्लिप को निकाल कर हंगामा मचा रहे हैं। जिसने भी मुझे पढ़ा है वो इन बातों पर एक सेकंड के लिए भी विश्वास नहीं करेगा। नैतिक रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में से कोई भी एक-दूसरे से बढ़ कर नहीं है। भारत में अभी फासिज्म का वातावरण तैयार हो रहा है। जो इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे बदनाम होने, ट्रोल किए जाने, जेल में भेजे जाने और पिटाई किए जाने का डर है।”

रॉय जैसों की नौटंकी चलती रहेगी क्योंकि भारतीय सेना न तो आज वो सब कर रही है जो इसने आठ साल पहले कहा, न ही आठ साल पहले कर रही थी। ये नक्सलियों, वामपंथी लम्पटों, छद्मबुद्धिजीवियों और गरीबों की रीढ़ पर लात रख कर, उनके घर के कमाने वालों के नरसंहार करने वाले नक्सली आतंकियों के हिमायतियों की पूर्वनिर्धारित, राष्ट्रविरोधी योजना का हिस्सा है जहाँ अगर कोई परपेचुअल वॉर, यानी सतत युद्ध की स्थिति में है तो यही हैं जो भारत को टुकड़ों में बाँटने की मंशा रखते हैं।

एक कुत्सित प्रयास है जहाँ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जा कर फर्जी बातें बता कर भारतीय सेना को किसी तानाशाही सुरक्षाबल की तरह दिखाया जा रहा है जो भारत के हर जिले में युद्ध लड़ रही है। आपको एक मंच मिलता है, सामने माइक है और बाल में हाथ घुमाते हुए, आप कुछ भी बोलती हैं, एक्सेंटेड अंग्रेजी है ही, आपको बुकर प्राइज मिल चुका है तो लेजिटिमेसी का अभाव भी नहीं है। ऐसे लोग इतने घाघ और बेगैरत होते हैं कि किताब बेचने के लिए ये अपना जमीर, अगर हो तो, सहजता से बेच देते हैं।

ऐसा इसलिए होता है कि सामने जो अंग्रेजी जनता बैठी हुई है वो इन्हें दोबारा सवाल नहीं पूछती। वो अपने ही दादाओं के कुकर्म भूल चुकी है तो उसकी अपनी ग्लानि को छुपाने के लिए ये मसाला काफी है कि भारतीय सेना तो अंग्रेजों से भी बुरा बर्ताव कर रही है। लेकिन, तथ्य और अरुंधति रॉय के मौखिक दस्त से निकली टुटपुँजिया बातों में बहुत अंतर होता है। ये अतिसार अरुंधति रॉय इसलिए सार्वजनिक तौर पर कर सकती हैं क्योंकि कुछ लोगों को उल्टी और दस्त से निकले अपशिष्ट पदार्थ ही सुगंधित और सुरूचिपूर्ण लगते हैं।

क्या आपको इंग्लैंड के दस जगहों का भी नाम पता है? क्या आपको अमेरिका के दस जगहों का नाम पता है? अब मैं आपको पाँच रैंडम जगहों का नाम लेकर यह कहने लगूँ कि इग्लैंड की सेना लगातार बाहर से आए लोगों पर अत्याचार कर रही है, अमेरिका में ट्रम्प के खिलाफ बोलने वालों को हर दिन जेलों में भरा जा रहा है। आप सोचेंगे कि आप इंटरनेट पर सर्च कर लेंगे लेकिन तभी आप पर मैं परमज्ञान की बिजली का आघात यह कह कर कर दूँगा कि मीडिया में ये बातें आती भी नहीं। इसका मतलब है कि आपको सिर्फ मेरी कही गई बातों पर ही विश्वास करना पड़ेगा।

आप विदेशी हैं, आपको भारत के नाम पर आज भी साँप और बाघ दिखा कर उसे बेकार-सा, स्लम में रहने वाले लोगों का देश दिखाया जाता रहा है। आप जब कहते हैं कि भारत तो चंद्रयान और मंगलयान भी भेज रहा है तो आपको ये चिरकुट विचारक यह कह कर रोक लेंगे कि वही तो स्टेट का प्रोपेगेंडा है कि एक-दो बड़ी चीजें कर लो, बाकी सब छुपा डालो। आपके हर सूचना के स्त्रोत पर ये नक्सली सवाल खड़े कर देंगे कि आपको तो जो भी मिल रहा है वो गलत ही है, और आप अंधेरे में जी रहे हैं।

इस तकनीक का अंग्रेजी या फ्रेंच नाम बता कर मैं भी, आपको अपनी बात में दो किलो वजन जोड़ कर, विश्वसनीय बना देता, लेकिन मुझे नहीं लगता कि तर्क और तथ्य को अंग्रेजी या फ्रेंच के मुहावरों या थ्योरी के नामों की जरूरत होती है। ये तरीका है इनका, बार-बार आजमाया हुआ, जहाँ आपके द्वारा संकलित हर ज्ञान को झुठलाना, उनके विचारों पर सवाल उठाने वाली पुस्तकों को खारिज करना, दूसरे पंथ के विचारकों का उपहास करना एक सुनियोजित और वांछित फलदायक रास्ता माना जाता है।

फासीवाद आ गया है, या तैयार हो रहा है?

आप यह तो देखिए कि यह गिरोह इसी बात पर ठीक से एक साथ नहीं हो पा रहा कि जिस फासीवाद की बात ये लोग दिन-रात, हर साँस और धड़कन में करते हैं, वो आ चुका है या ‘मोनिका… ओ माय डार्लिंग’ ही कर रहा है। एक आदमी रोज रात में कहता है कि यही तो फासीवाद है, दूसरी कह रही है कि फासीवाद का वातावरण तैयार किया जा रहा है।

फासीवाद का एक रूप तो अरुंधति जैसे छद्मलिबरलों ने अख्तियार कर लिया है जहाँ हर यूनिवर्सिटी या सार्वजनिक मंच पर ये विशुद्ध झूठ बोलते हैं, फिर इनका गिरोह सक्रिय हो जाता है और ऐसे दिखाता है कि ब्रो, अरुंधति रॉय ने बोला है ब्रो… ब्रो… समझ रहे हो ब्रो? अरुंधति फ्रीकिंग रॉय ब्रो! ये ब्रो-ब्रो इतना ज्यादा होने लगता है कि वो ब्रोहाहा कॉलेज के 22-25 साल के युवा विद्यार्थियों के लिए तथ्य का रूप ले लेता है।

प्रोपेगेंडा तुम फैला रही हो, झूठ बोल कर भीड़ को उन्मादी बनाना तुम्हारा काम है, किसी खास वर्ग के प्रति हिंसा फैलाने को उकसाना तुम्हारा काम है, और फासीवादी वो सरकार है जो इतनी कल्याणकारी योजनाएँ चला रही है कि सब्सिडी और सोशल वर्क के चक्कर में इकॉनमी पर धक्के झेल रही है, जिस पर बाद में तुम्हीं जैसे लोग गरियाते हैं। ये कितनी महीन धूर्तता है आप समझ नहीं सकते। आपको क्या लगता है कि पचास करोड़ लोगों के लिए आयुष्मान योजना का पैसा कहीं पड़ा हुआ था और वो आ गया? आखिर ऊपर चढ़ती अर्थव्यवस्था धीमी सिर्फ वैश्विक मंदी से ही हुई है या फिर लगातार लोककल्याणकारी योजनाओं में पैसे लगाने का भी असर पड़ा है?

आपको ये बातें कोई नहीं बताता। अम्बानी का स्टॉक ऊपर जाए तो आसानी से कह देते हैं कि क्रॉनी कैपिटलिज्म चल रहा है, नीचे जाए तो कहते हैं कि लोगों के रोजगार जा रहे हैं। फिर सरकार अगर कॉरपोरेट को बैंक से लोन राइट ऑफ कराए, किसी तरह की सहायता दे तो वापस सरकार पूँजिपतियों की जेब में चली जाती है, और अगर जेट एयरवेज डूबता रहे, सरकार कुछ न करे तो कहेंगे कि हजारों लोगों का रोजगार जा रहा है। पहले सोच लीजिए कि कहना क्या चाहते हैं।

यही धूर्तता इन वामपंथियों को हर जगह से भागने पर मजबूर कर रही है। ये दोनों तरफ से बैट पकड़ कर छक्के मारने की फिराक में रहते हैं। आप इनकी करामातें देखिए कि ये कब-कब संवेदनशील होते हैं। आप याद कीजिए कि चुनावों के समय मीडिया हिट जॉब करते हुए इन्होंने कैसी-कैसी खबरें प्लांट की और साल भर बाद वो मीडिया वाले कोर्ट से लताड़ पा रहे हैं कि ये सनसनी फैलाने वाली बेहूदी पत्रकारिता है। उस समय लगातार प्राइम टाइम में ‘द वायर’ की रिपोर्ट के अनुसार कहने वाले ‘घोघो रानी कितना पानी’ कहते हुए अब ‘आदा-पादा’ खेल रहे हैं।

चोर की दाढ़ी में तिनका

हिन्दी में एक कहावत है कि ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’। अब अरुंधति जी की दाढ़ी तो है नहीं, लेकिन घुँघराले बालों में परजीवी अमरलत्ती के कुछ तिनके जरूर फँसे हैं। ये तिनके किसी वैसे पेड़ पर अपनी दसियों जड़ो से पोषण पाते उस परजीवी लता के हैं जो बेचारा दिन-रात अपने लिए ऊर्जा जुटाता है, फल और फूल बनाता है, लेकिन ये अमरबेल उसे सोखता जाता है, खुद को हरा रखता है।

वामपंथी और नक्सली कुछ ऐसे ही लोग हैं। ये गरीबों की बात करते हैं और गरीबों की ही हत्याएँ भी करते हैं। इनके हरे रहने के लिए उन लाखों किसानों और करोड़ों गरीबों की वो कहानी ज़रूरी है जहाँ एक निरीह किसान के ऊपर आर्मी जवान की बंदूक तनी हुई हो, और वो अपनी टेढ़ी-मेढ़ी उँगलियों से नमस्कार की मुद्रा में क्षमायाचना करता दिखे। आप भी द्रवित हो जाएँगे लेकिन सत्य यह है कि ऐसा नहीं होता। वो बंदूक अगर तनती भी है तो वो किसी नक्सली की ही होती है जो जंगलों के आदिवासियों, गरीब किसानों पर तनती ही नहीं, गोली भी उगलती है अगर वो किसान वैसा न करे जैसा वो चाहते हैं।

ये जो तिनका है, वो अरुंधित रॉय जैसे लोगों पर चल रहे केस का भी हो सकता है। बात यह है कि 1999 से ही श्री प्रदीप किशन और अरुंधति जी ने पंचमढ़ी के बरियाम झील के किनारे एक ‘वेकेशन होम’ बनाया। ये जंगल की जमीन थी, आदिवासियों की जमीन थी। उन्हीं आदिवासियों की जिस पर रॉय साहिबा किताबें लिखती रहती हैं। 2010 में कोर्ट ने इसे गैरकानूनी करार दे दिया। इस घर के पास जब पंचमढ़ी को टूरिस्ट अट्रेक्शन आदि बनाने के लिए होटल खोलने के प्रस्ताव आए तो सरकार की कमिटी में श्री प्रदीप किशन जी थे और उन्होंने कहा कि ‘लोग’ नहीं चाहते कि लालची पूंजीवादी लोग यहाँ आएँ।

ये बात और है कि ये ‘लोग’ कौन थे, वो सबको पता है। अब आप ही बताइए कि झील का किनारा हो, जंगल की हरियाली हो, फिर आदिवासियों की जमीन पर पूँजीवादी दखल की बात लिखने में तो फर्स्ट हैंड एक्सपीरिएंस आएगा ना! आप नहीं समझेंगे क्योंकि आपकी पूरी दुनिया दिन का दाल और रात की रोटी जुटाने में जाती है।

आप ही बताइए कि ये अगर फासीवाद-फासीवाद नहीं चिल्लाएगी तो फिर इसके जैसों पर चल रहे केस में जब फैसला आएगा तो कोर्ट के जजों को ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक और अपर कास्ट हिन्दू बोल कर लोग कैसे खारिज करेंगे? कोर्ट तो वही सही होता है न जो चार बजे सुबह में भी बाईस साल की कानूनी लड़ाई के बाद फाँसी पर चढ़ाए जा रहे आतंकी के लिए खुले। लोकतंत्र की रक्षा तो कोर्ट तभी तक करता है न जब इस गिरोह के पक्ष में फैसले जाते हों। बाकी टाइम तो कोर्ट मोदी की जेब में और अमित शाह के गले में लटक कर चुम्मियाँ देता रहता है।

इसलिए तुम दंगा करते रहो साथी…

अरुंधति रॉय आज ट्रोल हो रही हैं तो इन्हें दर्द उठ रहा है। ट्रोलिंग से आपका बहुत ज्यादा नुकसान होगा भी तो थोड़ी देर आप परेशान हो सकती हैं। लेकिन आप उन बातों को तौलिए कि किसी राष्ट्र की अनुशासित सेना पर पूरे देश में हर जगह युद्ध करने वाली बर्बर सेना होना का आरोप लगाने से उसकी छवि का क्या होता है। आप उस बात को तौलिए जहाँ एक लेखिका प्रपंच गढ़ते हुए, स्वयं को भारत की अस्सी करोड़ गरीब आबादी का प्रतिनिधि मान कर यह बोलने लगती है कि उन्हें सताया जा रहा है। आप इस बात को तौलिए जहाँ ये स्वघोषित वीरांगना लोगों को यह बताती है कि भारत का पूरा उत्तरपूर्व, कश्मीर, गोवा, हैदराबाद और तेलंगाना इस देश से अलग होने की लड़ाई लड़ रहा है।

हम वाकई बहुत नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। हमें हर दिन ऐसे झूठे लोगों का मुँह बंद करने की ज़रूरत है। क्योंकि इनका प्रयास और प्रपंच सतत चलता रहेगा। अगर इन प्रपंचों को लगातार काटा नहीं गया तो ये देश नक्सली आतंकियों की लाल पट्टी के रक्त से लाल हो जाएगा। ये लोग हर दिन दंगे भड़काना चाहते हैं। ये चाहते हैं कि दलित लोग सड़कों पर आ कर सवर्णों को उस पाँच हजार साल के अत्याचार के नाम पर काट दें जिसका सबूत इतिहास की किसी किताब में नहीं मिलता। ये चाहते हैं कि यूपी का कट्टरपंथी तलवार लेकर बगल के घर के हिन्दू को इसलिए काट दे क्योंकि मोदी हिन्दू है और कश्मीर को केन्द्रशासित प्रदेश बना दिया है।

ये नहीं चाहते कि देश का अल्पसंख्यक या दलित स्वयं अपने दिमाग से सोचे। ये चाहते हैं कि वो इनके अजेंडे का सैनिक बने और आगजनी करते हुए, दंगे करते हुए कारसेवकों की बॉगी में आग लगा दे, या आंदोलन के नाम पर 11 लोगों की हत्या कर दे ताकि ये अपने वेकेशन होम में, झील की तरफ देखते हुए, बिल्ली की आँत से होते हुए उसके मलद्वार से बाहर आई दुनिया की सबसे महँगी कॉफी की घूँट लेते हुए कह दें कि सामाजिक न्याय हो रहा है, आंदोलन सफल हो रहा है, तुम लड़ते रहो साथी, हम तुम्हारे साथ हैं।

हरामी नाले से दाखिल हो सकते हैं पाकिस्तानी ‘कमांडो’, खुफिया इनपुट के बाद हाई अलर्ट जारी

भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान हर रोज़ नए षणयंत्र रच रहा है। अब नौसेना को इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB) ने गुरुवार (29 अगस्त) को अलर्ट जारी किया है। अलर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के अंडरवाटर कॉम्बेट (पानी के अंदर युद्ध) में प्रशिक्षित कमांडो अब समुद्र के ज़रिए आतंकी वारदात को अंजाम दे सकते हैं। पाकिस्तानी कमांडो के संबंध में ख़ुफ़िया सूचना है कि वो पानी के अंदर हमला करने में माहिर हैं और बंदरगाह के साथ जहाजों को भी निशाना बना सकते हैं। दूसरी आशंका है कि कच्छ के रण में सरक्रीक के हरामी नाले के सहारे पाक‍िस्तानी कमांडो घुसपैठ कर सकते हैं।

बता दें कि भारत और पाकिस्‍तान से लगे सरक्रीक में हरामी नाला है। हालाँकि, यह आम लोगों के लिए प्रतिबंधित है। इस क्षेत्र में 8 किमी लंबा खतरनाक दलदल है और यह वाटर चैनल करीब 500 वर्ग किमी में फैला हुआ है। कुछ वर्षों से इस इलाके में पाकिस्तानी मछुआरे अक्सर जल सीमा का उल्‍लंघन करते रहे हैं।

गुजरात में पूर्वी कच्छ के डेप्युटी एसपी डीएस वाघेला ने बताया कि उन्हें राज्य सरकार से एक आतंकी ख़तरे के बारे में सूचना प्राप्त हुई है। संपूर्ण कच्छ ज़िला हाई अलर्ट पर है, सभी लैंडिंग पोर्ट पर सुरक्षा की व्यवस्था की गई है।

ख़बर के अनुसार, इस ख़ुफ़िया सूचना के मिलने बाद कांदला बंदरगाह पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। IB सूत्रों के हवाले से न्यूज़ एजेंसी ANI ने बताया कि ख़ुफ़िया एजेंसी की यह रिपोर्ट है कि पाकिस्तान के प्रशिक्षित एसएसजी कमांडों या फिर आतंकी गल्फ खाड़ी या सरक्रीक इलाक़े से छोटे नावों के ज़रिए घुसपैठ कर सकते हैं, बीएसएफ और भारतीय तटरक्षक बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट कर दिया गया है। इसके अलावा, निगरानी रखने के लिए इलाक़े में पेट्रोलिंग बढ़ा दी गई है। 

इससे पहले, सोमवार (26 अगस्त) को ही नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने कहा था कि पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद की एक समुद्री शाखा लोगों को हमले करने के लिए प्रशिक्षित कर रही है, लेकिन भारतीय नौसेना इस तरह के हर प्रयास को मुँहतोड़ जवाब देने में सक्षम है।

एडमिरल सिंह ने जानकारी दी कि लश्कर द्वारा समुद्री रास्तों के जरिए आतंकी हमले की योजना बनाए जाने की ख़ुफ़िया सूचना मिली है। बता दें कि 26/11 मुंबई हमले के दौरान भी आतंकियों ने भारत में घुसने के लिए समुद्री रास्तों का ही उपयोग किया था। इसके बाद भारत ने समुद्री मार्गों व तटीय इलाक़ों में सुरक्षा के लिए विशेष योजनाएँ तैयार की।

एडमिरल सिंह ने कहा था कि तटवर्ती पुलिस और नौसेना मिल कर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि समुद्र के द्वारा भारत में घुसपैठ की हर कोशिश नाकाम साबित हो। हाल ही में मध्य प्रदेश और राजस्थान में आईएसआई समर्थित आतंकियों के घुसने की ख़बर आई थी, जिसके बाद इन राज्यों की पुलिस को हाई अलर्ट पर रखा गया। तमिलनाडु में कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया।

ग़ौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने के बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। इसलिए वो भारत को लगातार युद्ध की धमकी दे रहा है। भारत-पाकिस्तान के बीच इस तनावपूर्ण स्थिति में पाकिस्तान ने गुरुवार (29 अगस्त) को अपनी मध्यम दूरी की सतह से सतह में मार करने वाली बैलिस्टिक  मिसाइल गजनवी का भी परीक्षण किया है, जिसकी रेंज 290 किलोमीटर है। पाकिस्तान की ओर से आतंकियों की घुसपैठ की लगातार कोशिशें जारी है।

जस्टिस सुनील गौड़: 2015 में गाँधी परिवार के चहेते थे, अब कॉन्ग्रेस को क्यों बुरे लगते हैं?

पी चिदंबरम आईएनएक्स मीडिया केस में बुरे फँसे हैं। अगस्त 20, 2019 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज़ कर दी थी, जिसके बाद उनकी गिरफ़्तारी का रास्ता साफ़ हो गया था। इसके बाद वह गिरफ़्तारी के भय से गायब हो गए थे। 22 अगस्त को वह कॉन्ग्रेस मुख्यालय पर दिखे, जहाँ उन्होंने अन्य नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इसके बाद वह अपने जोर बाग़ स्थित आवास पर चले गए। घर बंद होने के कारण सीबीआई ने दीवार फाँद कर उन्हें गिरफ़्तार किया। गिरफ़्तारी के बाद उन्हें सीबीआई की कस्टडी में भेज दिया गया और बाद में कस्टडी की समयावधि 30 अगस्त तक बढ़ा दी गई।

यह सारा घटनाक्रम शुरू हुआ हाईकोर्ट द्वारा उनकी अग्रिम ज़मानत अर्जी खारिज़ किए जाने के बाद। जस्टिस (रिटायर्ड) सुनील गौड़ ने उस दिन चिदंबरम की 2 याचिकाएँ खारिज़ की। एक याचिका उनकी अग्रिम ज़मानत को लेकर थी तो दूसरी गिरफ़्तारी से राहत प्रदान करने की। जस्टिस सुनील गौड़ ने दोनों याचिकाओं को खारिज़ कर दिया। इसके बाद जाँच एजेंसियों के लिए चिदंबरम को गिरफ़्तार करने का रास्ता साफ़ हो गया। इसके बाद ख़बरें आईं कि जस्टिस सुनील गौड़ कुछ ही दिनों में रिटायर होने वाले हैं।

आज हम इन सबका जिक्र इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि कॉन्ग्रेस ने जस्टिस सुनील गौड़ पर बड़ा आरोप लगाया है। जब ये ख़बर आई कि जस्टिस गौड़ को रिटायरमेंट के बाद ‘Prevention of Money Laundering Act (PMLA) Appellate Tribunal’ का अध्यक्ष बनाया गया है, कॉन्ग्रेस ने कांस्पीरेसी थ्योरी पर काम करना शुरू कर दिया। कॉन्ग्रेस ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और जस्टिस गौड़, दोनों पर ही आरोप लगाया कि यह लेनदेन का मामला है। लेनदेन का मामला अर्थात जहाँ दो पक्ष एक-दूसरे को फ़ायदा पहुँचाते हैं।

हालाँकि, अभी तक उनकी नियुक्ति को लेकर कोई अधिकारिक बयान या ऑर्डर नहीं आया है लेकिन कॉन्ग्रेस ने ख़बरों के आधार पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोप-प्रत्यारोप के इस खेल में न्यायपालिका को भी घसीट लिया। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता ब्रिजेश कलप्पा ने पूछा कि ऐसा कौन सा जॉब है जहाँ आपको मिली उत्तर पुस्तिका में कॉपी-पेस्ट कर देने पर सबसे ज्यादा मार्क्स मिलते हैं? उन्होंने ख़ुद ही जवाब देते हुए कहा कि जज वाले जॉब में ऐसा होता है। आश्चर्य की बात यह है कि इस तरह की टिप्पणी करने वाले ब्रिजेश सुप्रीम कोर्ट में वकील भी हैं।

जस्टिस गौर विवादित मीट कारोबारी मोईन क़ुरैशी के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग केस से लेकर नेशनल हेराल्ड तक, कई महत्वपूर्ण मामलों में सुनवाई कर चुके हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि जो कॉन्ग्रेस आज जस्टिस गौड़ के पीछे पड़ी है, उसी कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार कभी उनकी ही अदालत में सुनवाई चाहता था। जी हाँ, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी नेशनल हेराल्ड मामले के मुख्य आरोपित हैं। सोनिया-राहुल चाहते थे कि जस्टिस सुनील गौड़ ही उनके मामले की सुनवाई करें। आगे आपको इस बारे में बताएँगे लेकिन पहले जरा समझ तो लें कि कॉन्ग्रेस की खुन्नस का कारण क्या है?

जस्टिस सुनील गौड़ ने साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था कि शुरूआती सबूतों से ऐसा प्रतीत होता है कि पी चिदंबरम न सिर्फ़ इस मामले में मुख्य अभियुक्त हैं बल्कि पूरे मामले में मुख्य साज़िशकर्ता भी हैं। जस्टिस गौड़ ने अपने निर्णय में कहा कि जाँच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत किए गए सबूतों की व्यापकता और स्तर चिदंबरम को प्री-अरेस्ट बेल के लिए योग्य बनाती हैं। हाईकोर्ट ने कहा, “यह एक वित्तीय अपराध है। इसमें मजबूती से कार्रवाई की जानी चहिए। इतने बड़े स्तर के वित्तीय अपराध में सरकारी जाँच एजेंसियों के हाथ बाँध कर नहीं रखे जा सकते।

जस्टिस सुनील गौड़ की इन्हीं बातों ने कॉन्ग्रेस की नज़र में उन्हें विलेन बना दिया। लेकिन, कॉन्ग्रेस नेता उनके रिटायर होने तक चुप रहे क्योंकि उन्हें ‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट’ का डर था। कॉन्ग्रेस को पता था कि जस्टिस गौड़ कुछ ही दिनों में रिटायर होने वाले हैं और इसके बाद उनका नाम लेकर सरकार पर हमला करने में आसानी होगी। और यही हुआ। लेकिन, उससे पहले जानते हैं कि गौड़ ने ऐसा क्या कहा था कि कॉन्ग्रेस और चिदंबरम उनसे खार खाए बैठे हैं। जस्टिस गौड़ ने सपाट शब्दों में साफ़ कर दिया था कि पी चिदंबरम जाँच एजेंसियों के साथ सहयोग करने में अक्षम रहे हैं और प्रतिक्रिया देने में टाल-मटोल करते रहे हैं।

यह भी जानने लायक बात है कि हाईकोर्ट ने अपना जजमेंट इस वर्ष जनवरी में ही सुरक्षित रख लिया था। अब वापस सोनिया-राहुल पर आते हैं। अगर जस्टिस गौड़ पर कॉन्ग्रेस द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं तो फिर आज से 4 वर्ष पहले उसी कॉन्ग्रेस की तत्कालीन मुखिया और भावी मुखिया क्यों जस्टिस सुनील गौड़ की अदालत में ही अपने केस की सुनवाई चाहते थे?

आश्चर्य की बात तो यह भी है कि न सिर्फ़ कॉन्ग्रेस के नेतागण बल्कि दरबारी पत्रकार भी चारों ओर से गौड़ और केंद्र सरकार के बीच साँठ-गाँठ की बातें चला रहे हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस तरफ़ इशारा किया जा रहा है। सच्चाई और तथ्यों में अपना विश्वास खो चुके ये पत्रकार लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए सीधी-सपाट भाषा में ऐसे समझाते हैं, जैसे देश में आपातकाल चल रहा हो और न्यायपालिका को सचमुच काम नहीं करने दिया जा रहा है। यही तो प्रक्रिया होता है नैरेटिव तैयार करने का।

दरअसल, रोस्टर बदलने के बाद जस्टिस पीएस तेजी को इस मामले की सुनवाई करनी थी। फिर क्या था? सोनिया-राहुल यह माँग लेकर पहुँच गए दिल्ली हाईकोर्ट कि इस मामले को जस्टिस सुनील गौड़ को ही असाइन किया जाए क्योंकि उन्होंने इस मामले में कई बार सुनवाई की है। सोनिया-राहुल के अलावा इस केस में आरोपित गाँधी परिवार के अन्य वफादारों ने भी ऐसी ही माँग की। यह भी जानने लायक बात है कि उस दौरान भी आईएनएक्स केस में चिदंबरम के वकील और कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ही सोनिया-राहुल के वकील थे और वे ही इस माँग को लेकर गए थे।

हालाँकि, कोर्ट ने सोनिया-राहुल की इस माँग को नकार दिया था और जस्टिस तेजी ने ही इस मामले की सुनवाई की। लेकिन यह सवाल रह गया कि अगर जस्टिस गौड़ आज से 4 वर्ष पहले अच्छे थे तो आज बुरे कैसे हो गए? खैर, इन सब से बेख़बर कॉन्ग्रेस नेता लगे हुए हैं- भाजपा की आलोचना में, जस्टिस गौड़ की आलोचना में, न्यायपालिका-कार्यपालिका और विधायिका, सब कुछ की आलोचना में। उनके नेताओं के पूर्व के भ्रष्टाचार पर जाँच की आँच आ रही है। चिल्लाना ज़रूरी है। बिना सच जाने, बिना इतिहास जाने, बिना घटनाओं की तह तक गए। चिल्लाना ज़रूरी है।

जाते-जाते बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष परिवार के माँ-बेटे नेशनल हेराल्ड केस में आरोपित हैं और फिलहाल ज़मानत पर बाहर हैं। दिसंबर 2015 में दिल्ली की एक अदालत ने दोनों को 50-50 हज़ार रुपए के पर्सनल बॉन्ड पर ज़मानत दी थी। सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा दर्ज कराए गए इस मामले में आरोप है कि यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (YIL) ने एसोसिएट जर्नल प्राइवेट लिमिटेड (AJL) का अधिग्रहण किया, जिसमें कई अनियमितताएँ बरती गईं।

वाईआईएल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में सोनिया और राहुल भी शामिल हैं। स्वामी के शिकायत में कहा गया है कि वाईआईएल में सोनिया-राहुल की 76% हिस्सेदारी है और एजेएल को कॉन्ग्रेस पार्टी के फंड्स में से लोन दिए गए, जो ग़ैर-क़ानूनी है

अयोध्या मामला: ‘बाबर की जमीन होने के सबूत नहीं तो मुस्लिमों को हिस्सा कैसा’

अयोध्या मामले के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार (अगस्त 29, 2019) को 15 वें दिन सुनवाई हुई। इस दौरान राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के वकील पीएन मिश्रा ने पाँच सदस्यीय बेंच के सामने दलीलें पेश की।

उन्होंने मिश्रा ने कहा कि विवादित जमीन मुस्लिम पक्षकार को नहीं दी जा सकती, क्योंकि वे यह साबित नहीं कर पाए हैं कि बाबर ने ही मस्जिद का निर्माण किया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के हवाले देते हुए कहा कि यह साबित नहीं हो पाया है कि विवादित जमीन पर मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण बाबर ने कराया था या औरंगजेब ने? इसलिए कोई सबूत नहीं होने के कारण मुस्लिम पक्षकार को यह जमीन नहीं दी जा सकती।

मिश्रा ने दलील देते हुए कहा कि यह तो स्पष्ट है कि मस्जिद को मंदिर के ऊपर बनाया गया था। मंदिर के अवशेष उस जगह से मिले हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई।

उन्होंने दलील दी कि बाबर ने मस्जिद का निर्माण नहीं कराया था और न ही वह विवादित जमीन का मालिक था। जब वह जमीन का मालिक ही नहीं था तो सुन्नी वक्फ बोर्ड का मामले में दावा ही नहीं बनता। मुस्लिम पक्षकार यह साबित नहीं कर पाए थे कि मस्जिद का निर्माण बाबर ने करवाया था।

राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद गुम्बद के नीचे……

उन्होंने कहा, “बाबर विवादित जमीन का मालिक नहीं था। ऐसे में मेरा कहना है कि जब कोई सबूत ही नहीं है तो मुस्लिम पक्षकार को विवादित जमीन पर कब्जा या हिस्सेदारी नहीं दी जा सकती।”

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं।

घोघो रानी कित्ता पानी: सुप्रीम कोर्ट ने बता दिया हिंदी मीडिया में कूड़ा परोसने वाले कौन

‘मानहानि- मानहानि: घोघो रानी, कितना पानी’

तो आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने घोघो रानी को बता बता दिया कि कितना पानी था। सुप्रीम कोर्ट ने बता दिया है कि पानी चुल्लू भर है और ‘पीत पत्रकारिता’ के डूब मरने के लिए यह काफी है। माननीय सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद मंगलवार (अगस्त 27, 2019) को प्रोपगेंडा न्यूज पोर्टल The Wire ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह द्वारा दायर किए गए मानहानि के मुक़दमे को निरस्त किए जाने की माँग वाली अपनी याचिका वापस ले ली।

इसके बाद से चुनाव से पहले द वायर के कंधे पर बन्दूक रखकर जहर उगलने वाले अब भूमिगत हो गए हैं। खैर, इनकी चमड़ी इतनी मोटी है कि सालभर बाद प्रोपगेंडा फर्जी निकल भी जाए तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। वे एक नया प्रोपगेंडा गढ़ने में व्यस्त हो जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने ‘द वायर’ को फटकार लगाते हुए जो कुछ कहा वो उन सभी लोगों को दिन में 5 वक़्त पढ़ना चाहिए, जो टीवी स्क्रीन काली कर के पत्रकारिता को कोसते हैं और खुद उसे खोखला करते जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “आजकल यह मीडिया की संस्कृति बन गई है कि वह लोगों को जवाब देने के लिए सिर्फ 10-12 घंटे का नोटिस देती है और इसके बाद रिपोर्ट पब्लिश कर देती है!”

‘द वायर’ की ओर से पेश ‘वरिष्ठ वकील’ और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने कोर्ट से अपील की कि वो गुजरात की अदालत में ट्रायल का सामना करने के लिए तैयार हैं, इसलिए उनकी याचिका को वापस लेने की अनुमति दी जाए। इस पर नाराजगी जताते हुए जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि यह एक सभ्य देश है और यह कैसी संस्कृति हम विकसित कर रहे हैं, जिसमें हम रात में किसी को नोटिस भेजते हैं और फिर सुबह रिपोर्ट प्रकाशित कर देते हैं?

कपिल सिब्बल को दिए गए इस जवाब के बाद या तो उन्हें ‘वरिष्ठ’ कहने पर रोक लगनी चाहिए या फिर वरिष्ठ शब्द को एक गाली घोषित कर दिया जाना चाहिए। लेकिन जो भी हो, वह नजीर होना चाहिए।

वर्ष 2017 में ‘द वायर’ में छपे एक लेख के खिलाफ अमित शाह के बेटे जय शाह ने न्यूज पोर्टल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा कर दिया था। इसके बाद द वायर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। मंगलवार को जस्टिस बीआर गवई ने कहा- “यह और कुछ नहीं बल्कि पीत पत्रकारिता है। यह कैसी पत्रकारिता है? प्रेस की स्वतंत्रता सर्वोपरि है, लेकिन यह एकतरफा नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट के इसी वक्तव्य को ध्यान में रख ‘द वायर’ से लेकर ‘द क्विंट‘ और ‘स्क्रॉल‘ के साथ-साथ उन सभी आदरणीय वरिष्ठ पत्रकारों का स्मरण करिए जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता की गरिमा को दफ़न करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखा है।

द वायर, क्विंट, स्क्रॉल का नाम आते ही एक नाम सबसे कॉमन हो जाता है, वो है एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार का! ख़ास बात है कि वो भी वरिष्ठ हैं। इन प्रोपगेंडा न्यूज़ पोर्टल्स को मेनस्ट्रीम करने का सबसे ज्यादा प्रचार यदि किसी ने किया है तो वो सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कुमार हैं। रवीश ने इन सबको अपने जहर उगलने का माध्यम बनाया है और अब अपने आप सीधे किनारे हो गए।

अपने स्टूडियो से लेकर फेसबुक पोस्ट तक में रवीश कुमार ने ‘द वायर’ की इस रिपोर्ट से आदतन खूब बवाल मचाया था। उन्होंने अमित शाह के बेटे जय शाह पर वायर द्वारा लगाए गए आरोपों की आड़ में एक घोघो रानी का भी जिक्र किया और पूछा कि कितनी मानहानि है? लेकिन, आज घोघो रानी चुप है। रवीश बता नहीं रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट जिस ‘द वायर’ के प्रोपगेंडा को ‘पीत पत्रकारिता’ बता दिया है, उस पर घोघो रानी के क्या विचार हैं?

जबकि होना तो यह चाहिए कि आज के प्राइम टाइम में सुप्रीम कोर्ट को भी गोदी बता दिया जाना चाहिए। आज ऑड दिवस है, आज सुप्रीम कोर्ट का निर्णय घोघो रानी के मनमुताबिक़ नहीं है। ऐसा लगता है मानो खेल दिवस पर घोघो रानी खेल कर गई।

सुप्रीम कोर्ट उस द वायर को ‘येलो जर्नलिज़्म’ कहकर दुत्कार चुका है, जिसका हवाला देकर सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कुमार यहाँ-वहाँ लोगों को काटते फिरते हैं। लेकिन क्या अब रवीश कुमार अपने इन्हीं मनगढ़ंत आरोपों के लिए माफी माँगेंगे?

आप रवीश कुमार के ठीक एक साल पुराने इस लेख को जरूर पढ़िए। 2017 में अमित शाह के बेटे जय शाह पर रवीश कुमार ने पूरे आत्मविश्वास के साथ हर तरह के आरोप उन्नत भाषाशैली और मुहावरों के साथ लगाए थे, जो कि सुप्रीम कोर्ट के एक ही फटकार में सब घुस्सड़ घाटी में चले गए।

लेकिन क्या यह धूर्त, पाखण्डी, कुतर्की जर्नलिस्ट अपने पाठकों और श्रोताओं को ये बताएँगे कि उन्होंने उनके सामने झूठ परोसा था, क्या वो स्क्रीन काली कर शोक मनाते हुए अपने ऑडियंस को ये बताएँगे कि हिंदी मीडिया को कोसते हुए जब वो झूठ परोस रहे थे तब किसकी गोदी में बैठे थे?

नहीं, वो नहीं बताएँगे। क्योंकि यही उनके काम करने की शैली है और यही उनकी विचारधारा की नंगई है। इसके बिना घोघो रानी मर जाएगी, उसका यही खाद पानी है। आप आँख मूँदकर अपनी विचारधारा के अहंकार को संतुष्ट करने वाले एक पाखंडी बुद्धिजीवी की बातों को अभी भी ब्रह्मसत्य मानते चलिए, क्योंकि आपने अपना अंधेरा चुना है, इसलिए उसमें लीन रहिए आपको यही शोभा देता है। क्योंकि उनका प्रोपगेंडा ही अब काली स्क्रीन की पहचान है।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय जरा देर से आया है लेकिन ये फैसला आपके कान खड़े जरूर कर देता है कि द वायर को पत्रकारिता का सूर्य कहने वाले रवीश कुमार के दावे साल भर में ही फर्जी निकल जाते हैं। लेकिन, तब तक ऐसे ही कितने ही ‘द वायर’ अपने हिस्से का नुकसान बाजार में बेच चुके होंगे।

यह भी पढ़ें:रवीश कुमार! अपना ‘कारवाँ’ रोक दीजिए, आपको पत्रकारिता का वास्ता 

इसी तरह के आरोप रवीश कुमार की पसंदीदा वेबसाइट ‘कारवाँ’ भी NSA अजीत डोभाल और उनके बेटों पर लगा चुकी है। जब बिना किसी इन्तजार के ही रवीश कमार और ‘कारवाँ’ ने NSA डोभाल के परिवार को ‘D-कम्पनी’ बता दिया था। इसके बाद इस पूरे आरोप पर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया, ना ही कारवाँ की ओर से और ना ही रवीश कुमार की ओर से।

हालाँकि, अजीत डोभाल के बेटे ने जरूर मानहानि का दावा करने की ओर कदम बढ़ाए थे और रवीश कुमार ने इसके बाद ‘मानहानि’ पर ही प्रलाप शुरू करते हुए कहा था कि मानहानि पत्रकारिता को ख़त्म कर देगी। सवाल यह है कि अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए जहर उगलने वाले लोग पत्रकारिता शब्द से अपना नाम आखिर किस हैसियत से जोड़ लेते हैं? वास्तव में होना तो यह चाहिए कि ऐसे अनर्गल आरोप लगाकर अपनी TRP की दुहाई देने वाले लोगों को तो पड़ोसियों पर अपनी खुन्नस निकालने वाले लोगों की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए। जबकि, इसके विपरीत ये लोग पत्रकारिता के स्वघोषित मसीहा बन चुके हैं।

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि ‘बड़े नाम’ जब सोशल मीडिया पर लम्बे लेख लिखते हैं, तो हमें महसूस होना शुरू हो जाता है कि इतना टाइप करने वाला झूठ तो नहीं लिख रहा होगा। हमारे ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती एक लेख में बता चुके हैं कि ऐसे ही ‘प्रोपेगैंडाधीशों’ के ‘भगत’ कितने बड़े स्तर तक ब्रेनवॉश किए जा चुके हैं। वो अब खुलेआम कहने लगे हैं कि रवीश कुमार जैसे हठधर्मी लोग चाहे जो कुछ कहे हम उसे गलत मानेंगे ही नहीं।

समय आ गया है कि रवीश कुमार को उसी ऐतिहासिक काली स्क्रीन वाले स्टूडियो से यह घोषणा कर देनी चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता में जिस कूड़े के परोसे जाने की वो बात करते आए हैं, असल में उस कूड़े की फैक्ट्री खुद रवीश कुमार हैं। यह कूड़ा ‘द वायर’ से लेकर उनके ‘विश्वसनीय सूत्र’ व्हाट्सएप्प मैसेज, कारवाँ से होकर सीधे रवीश के प्राइम टाइम, ब्लॉग और फिर सोशल मीडिया से उड़ेला जाता है।

रवीश को अपने भगत-जनों पर पूरा यकीन रहता है कि अपनी कुटिल मुस्कान के साथ वो अगर पूरब दिशा को ‘हें-हें-हें’ के स्वर के साथ पश्चिम कह दें, तो उनके भगत-जन तुरंत छाती कूटते हुए सबको जाकर बता आएँगे कि आज से यही पश्चिम है, सुप्रीम कोर्ट चाहे कुछ भी कह दे उनको क्या?

द वायर के ‘सनसनीखेज’ खुलासे पर रवीश कुमार का सालभर पुराना सनसनीखेज पोस्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं –