Home Blog Page 5546

NDTV के पत्रकार की टुच्चागिरी: चंद्रयान-2 के ISRO से संपर्क टूटने के बाद वैज्ञानिकों पर चिल्लाया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पूरा देश जहाँ मून मिशन चंद्रयान-2 के लिए इसरो और भारतीय वैज्ञानिकों पर गर्व कर रहा है, वहीं एनडीटीवी का एक पत्रकार अपनी ओछी हरकतों से बाज नहीं आया। चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम के इसरो से संपर्क टूटने की वजह से पहले से ही हताश वैज्ञानिकों पर चिल्लाकर पत्रकार महोदय ने साबित कर दिया कि पूरे मिशन की 95% सफलता उसके लिए मायने नहीं रखती।

वायरल हुए वीडियो में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करने आए वैज्ञानिकों पर एक पत्रकार को चिल्लाते हुए सुना जा सकता है। पत्रकार वैज्ञानिकों पर चिल्लाते हुए कहता है कि यह एक परंपरा है कि जब कुछ गलत होता है, तो इसरो प्रमुख मीडिया के साथ बातचीत करते हैं, तो फिर वो इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद क्यों नहीं हैं? इतना ही नहीं, उस पत्रकार ने प्रेस ब्रीफिंग के लिए आए वैज्ञानिकों को जूनियर तक कह डाला। उसने कहा कि इसरो प्रमुख को मीडिया से बात करनी चाहिए थी, न कि किसी जूनियर को भेजना चाहिए था।

वीडियो में आप साफ देख सकते हैं कि पत्रकार के इस तरह के अशिष्ट और असभ्य सवाल से मीडिया को ब्रीफ करने आए वैज्ञानिक काफी दुखी और असहज हो जाते हैं। वीडियो में पत्रकार का चेहरा नहीं दिख रहा है, लेकिन बाद में पता चलता है कि इस तरह का अशिष्ट सवाल करने वाला कोई और नहीं बल्कि एनडीटीवी का पत्रकार पल्लव बागला है। 

हालाँकि, पल्लव बागला ने देश की जनता का मूड और मामले को बढ़ता देख माफी माँग ली है। मगर, लोगों ने पल्लव के वैज्ञानिकों के साथ किए गए व्यवहार के लिए खूब खिंचाई की है। लोगों ने तो पल्लव बागला के इसरो चीफ के सिवन के साथ चंद्रयान 2 को लेकर किए गए इंटरव्यू को भी शेयर किया है।

इस वीडियो में आप इसके सवाल का स्तर देखकर हैरान रह जाएँगे! दरअसल, पल्लव बागला इसरो चीफ से पूछता है कि चंद्रयान -2 के साथ कितने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा जा रहा है? बागला के इस तरह के स्तरहीन सवाल पर के सिवन ने बेहद ही धैर्यपूर्वक तरीके से समझाया कि यह एक स्वचालित और मानव रहित मिशन है। इसमें किसी भी अंतरिक्ष यात्री को नहीं भेजा जा रहा है।

गौरतलब है कि भारत के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चंद्रयान-2 का सफर अपनी मंजिल से महज 2.1 किलोमीटर पहले थम गया। चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग से मात्र 2.1 किलोमीटर की दूरी से पहले कंट्रोल रूम से संपर्क टूट गया। मगर इसरो के एक अधिकारी ने बताया कि चंद्रयान-2 मिशन 5 फीसदी ही फेल हुआ है। पीएम मोदी ने भी वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाते हुए कहा था कि देश को उन पर गर्व है। उन्होंने इसे देश की बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। भविष्य में सर्वश्रेष्ठ की उम्मीद करें। एक वीडियो में पीएम मोदी इसरो चीफ के सिवन को गले लगाते हुए उनकी हिम्मत बढ़ाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

#IndiaFailed जिसने भी लिखा, उसे #ProudIndian से मिला करारा वाला जबाव

नून-टिमाटर वाले देश के लोग भी कल रात जाग रहे थे। भूखे पेट भला नींद आए भी तो कैसे! उसी देश का एक मंत्री है – वो भी विज्ञान व तकनीक मंत्री। नाम है फवाद चौधरी। कल रात जब चंद्रयान-2 के लैंडर से संपर्क टूट गया तो उसने एक तंज भरा ट्वीट किया। उसने लिखा – आऊ… जो काम आता नहीं, पंगा नहीं लेते ना… डियर इंडिया। इसके बाद भूखे पेट नींद न आने की बीमारी से ग्रसित पाकिस्तानियों ने #IndiaFailed के साथ ट्वीट करना शुरू कर दिया।

और यहीं वो गलती कर गया। उसे ये याद रखना चाहिए था कि चाहे युद्ध का मैदान हो या साइंस-टेक्नॉलजी… हमने हमेशा तुम्हारी बजाई है। इसलिए सोशल मीडिया पर भी बजाएँगे, और क्या खूब बजाया गया भाई साब! पत्रकारिता और संपादकीय नीति का सम्मान करते हुए नीचे सिर्फ वही ट्वीट लगा सकने में सक्षम हूँ, जिसमें गालियाँ नहीं हैं। वैसे पाठकगण इन ट्वीट को देख कर अंदाजा लगा सकते हैं कि पाकिस्तानियों के कान से खून बह रहा होगा या मवाद!

पाकिस्तानियों के नून-टिमाटर से सहानुभूति रखने वाले कुछ छिछोरे (मतलब लिबरपंथी) भारतीय भी कल रात खुश थे। लेकिन ये अपनी मौत खुद मरेंगे (राजनीतिक रूप से तो लगभग मर ही चुके हैं, सामाजिक छीछालेदर भी समय-समय पर हो ही जाता है) इसलिए इन पर की-बोर्ड क्या ही पीटना!

नोट: पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है। इस्लाम में सूअर हराम है। इसलिए जिन ट्वीट में पाकिस्तानियों को सूअर की तरह दिखाया गया है, ऑपइंडिया की संपादकीय नीति के तहत हम उसकी कड़ी निंदा करते हैं।

पूर्व IAS ऑफिसर को 5 साल की कैद: रखता था अवैध विदेशी हथियार, जमा की थी अकूत संपत्ति

सीबीआई कोर्ट ने मुकदमा दर्ज होने के 32 साल बाद 81 वर्षीय पूर्व आईएएस ऑफिसर को 5 साल कैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही इस पूर्व अफसर पर 1.5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। बता दें कि सुरेंद्र सिंह अहलूवालिया नाम के पूर्व आईएएस अधिकारी के सरकारी आवास पर आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामले की छापेमारी में बड़ी संख्या में हथियार व कारतूस बरामद किए गए थे। सीबीआई ने इस मामले में 31 अगस्त 1987 को एफआईआर दर्ज की थी। उस समय अहलूवालिया नागालैंड में श्रम और रोजगार सचिव और आयुक्त के पद पर तैनात था।

नौकरशाह सुरेंद्र सिंह अहलूवालिया के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप लगने के बाद सीबीआई ने उसके दिल्ली और कोहिमा स्थित आवासोंं पर छापेमारी की थी। इस दौरान सीबीआई ने उसके आवास से एक कारबाइन समेत 5 बंदूक, एक विदेशी राइफल व 328 कारतूस बरामद किए थे।

जाँच एजेंसी ने मामले की जाँच 5 साल में पूरी कर ली थी और 10 अप्रैल 1992 को आरोप पत्र दाखिल कर दिया था। अदालती लड़ाई के चलते आरोप तय होने में 18 साल लग गए और 10 फरवरी 2010 को उसके खिलाफ आरोप तय हो पाए।

मामले में दोषी अहलूवालिया 3 मई 1964 को आपातकालीन कमीशन अधिकारी के तौर पर सेना में शामिल हुआ था। इसके बाद उसने 1971 में भारतीय प्रशासनिक सेवा ज्वाइन की और उसे नागालैंड कैडर मिला था। अपनी सेवा के दौरान अकूत संपत्ति अर्जित करने के चलते यह अधिकारी सीबीआई के निशाने पर आया था। उस समय इसके पास दिल्ली, ग्वालियर और चंडीगढ़ के पॉश इलाकों में कई संपत्ति और एक वातानुकूलित सिनेमा घर भी पाया गया था। अधिकारियों ने बताया कि हथियारों की बरामदगी में सीबीआई ने उसके खिलाफ एक अलग मामला दर्ज किया था।

राउज एवेन्यू अदालत के एडिशनल चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट समर विशाल ने शुक्रवार (सितंबर 6, 2019) को सुरेंद्र सिंह अहलूवालिया को 5 साल की कैद और डेढ़ लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है। सीबीआई के मुताबिक यह सबसे लंबा चलने वाला मुकदमा रहा है।

यह वीडियो बताता है कि हम सफल हुए हैं… हम कामयाब होते रहेंगे!

एक किसान हल-बैल लेकर खेत पर जाता है। दिन भर मेहनत करता है। पूरा खेत फिर भी नहीं जोत पाता है। शाम को वापस घर आता है। रात में खाता है, आराम करता है और सुबह फिर से खेत की ओर चल देता है। एक दिन उसकी मेहनत रंग लाती है। उसकी मेहनत को देख प्रकृति भी मेघ के रूप में उस पर मेहरबान होती है। फिर खेत में फसल लहलहाते हैं और उससे न सिर्फ किसान का घर चलता है बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था भी पटरी पर दौड़ती है।

जरा सोचिए, इस मेहनत के बावजूद भी अगर बारिश न हो और किसान निराश हो जाए तो क्या होगा! रोने लग जाए तो क्या होगा? और जरा सोचिए, उस रोते हुए किसान को अगर एक मजबूत कंधा मिल जाए, जो उसे ढाढस बँधाए तो क्या होगा? दूसरे उदाहरण वाला किसान संबल पाकर पहले से ज्यादा उत्साह के साथ मेहनत में जुट जाएगा जबकि पहले वाला हतोत्साहित होकर टूट जाएगा।

चंद्रयान-2 में पूरे भारतवर्ष को जो 5% विफलता देखने को मिली है, वह दूसरे किसान की ही कहानी है। और इस ‘किसान’ को ढाढस देने आया कौन! देश का मुखिया खुद। इसरो चीफ के सिवन जब टूट रहे थे, तो उनके कंधों पर शाबासी की थपकी मिली किससे – खुद पीएम से। जब पीएम मोदी ने रोते हुए सिवन को गले लगाया तो उसमें यह संदेश छिपा था कि देश को आपकी सफलता पर गर्व है, जबकि आपकी विफलता पर वो आपके साथ और भी मजबूती के साथ खड़ा है।

95% सफल रहा Chandrayaan-2 मिशन, ऑर्बिटर चंद्रमा की कक्षा में सुरक्षित, लगा रहा चक्कर

भारत के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चंद्रयान-2 का सफर अपनी मंजिल से महज 2.1 किलोमीटर पहले थम गया। चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग से मात्र 2.1 किलोमीटर की दूरी से पहले कंट्रोल रूम से संपर्क टूट गया। मगर ये मिशन फेल नहीं हुआ है।

इसरो के एक अधिकारी ने बताया कि 978 करोड़ रुपए के लागत वाले चंद्रयान-2 मिशन का सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि लैंडर विक्रम का संपर्क टूटने से मिशन का सिर्फ 5 फीसदी का नुकसान हुआ है। अधिकारी के मुताबिक, मिशन को सिर्फ लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर का नुकसान हुआ है, जबकि अंतरिक्ष यान का तीसरा खंड ऑर्बिटर अब भी चंद्रमा की कक्षा में चक्कर लगा रहा है।

एक साल की मिशन अवधि वाला ऑर्बिटर चंद्रमा की कई तस्वीरें लेकर इसरो को भेजेगा। अधिकारी ने कहा कि ऑर्बिटर लैंडर की तस्वीरें लेकर भी भेज सकता है, जिससे उसकी स्थिति के बारे में पता चल सकता है।

बता दें कि चंद्रयान-2 में तीन खंड हैं -ऑर्बिटर (2379 किलोग्राम, आठ पेलोड), विक्रम (1471 किलोग्राम, चार पेलोड) और प्रज्ञान (27 किलोग्राम, दो पेलोड)। विक्रम 2 सितंबर को आर्बिटर से अलग हो गया था। विक्रम ने ‘रफ ब्रेकिंग’ और ‘फाइन ब्रेकिंग’ चरणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया, लेकिन ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ से पहले इसका संपर्क धरती पर मौजूद स्टेशन से टूट गया।

इसरो के प्रमुख के सिवन ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि आँकड़ों का विश्लेषण किया जा रहा है। लैंडर विक्रम का संपर्क टूट जाने के बाद पीएम मोदी ने वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाते हुए कहा था कि देश को उन पर गर्व है। उन्होंने इसे देश की बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। भविष्य में सर्वश्रेष्ठ की उम्मीद करें।

गौरतलब है कि चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को भारत के हेवी रॉकेट जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हिकल मार्क-3 (जीएसएलवी एमके-3) के जरिए अंतरिक्ष में लॉन्‍च किया गया था।

NDTV, Reuters और AP के पत्रकारों को आलीशान कश्मीरी बंगलों को खाली करने का आदेश

सरकार ने हाल ही में NDTV के ब्यूरो प्रमुख नाज़िर मसूदी, रॉयटर्स के वरिष्ठ प्रतिनिधि फ़य्याज़ बुखारी और एसोसिएटेड प्रेस के ऐजाज़ हुसैन को जल्दी-से-जल्दी उन्हें श्रीनगर में मिले हुए सरकारी बंगले खाली करने का निर्देश दिया है। कारण बताया गया है कि वे उन बंगलों के आवंटन की न्यूनतम शर्तें पूरी नहीं करते।

आर्गेनाइज़र में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक इन तथाकथित पत्रकारों को यह बंगले पिछली सरकार ने उनकी “पत्रकारिता की सेवाओं” के बदले न्यूनतम शर्तें पूरी न करने पर भी आवंटित कर दिए थे। अब चूँकि वे शर्तों को पूरा नहीं करते थे, तो उन्हें हुआ यह आवंटन सरकार के किसी भी नियम के हिसाब से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। अतः उनका वहाँ निवास करते रहना साफ-साफ अवैध था। इसीलिए सरकार ने उन पत्रकारों को बंगले खाली करने के निर्देश दिए।

ज़ाहिर तौर पर इससे कश्मीर का, और उससे जुड़े देश भर का, पत्रकारिता का समुदाय विशेष नाराज़ तो हो ही गया। इतने साल से पिछली सरकारों से मिलती आ रही सुविधाओं की लत जो लग गई थी। इसीलिए इस समुदाय विशेष की संस्था कश्मीर प्रेस क्लब ने बयान जारी कर राज्य प्रशासन (यानि कि केंद्र सरकार) पर ‘प्रताड़ना’ का आरोप लगाया है- यानि उनके हिसाब से इन पत्रकारों ने जो बंगलों पर अवैध कब्ज़ा कर रखा था, उसे हटाने की कोशिश इन्हें प्रताड़ित करना है। उनके हिसाब से यह प्रताड़ना इसलिए है, ताकि घाटी के पत्रकार एक लाइन विशेष को पकड़ कर ही रिपोर्टिंग करें।

यह समुदाय विशेष वाले पत्रकार केवल कश्मीर के पत्रकारों का समुदाय विशेष हो, ऐसा भी नहीं है। इसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और एडिटर्स’ गिल्ड का पूरा समर्थन रहता है।

यहाँ इन पत्रकारों के बारे में यह जान लेना ज़रूरी है कि इनमें से कई न केवल जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान की ही भाषा बोल रहे हैं, बल्कि उसे हिंदुस्तान के खिलाफ प्रोपेगंडा करने के लिए ‘कच्चा माल’ ही नहीं, पकी-पकाई खीर ही थाली में परोस रहे हैं।

उदाहरण हैं NDTV के नाज़िर मसूदी, जिनकी श्रीनगर से की गई ‘रिपोर्टिंग’ के दम पर इमरान खान की पीटीआई हिंदुस्तान को गालियाँ बकती फिर रही है। मसूदी ने बिना किसी वीडियो सबूत या लोगों के नाम बताए यह दावा किया कि उन्होंने श्रीनगर के स्थानीय लोगों से बात की हैं और वे बस इस इंतज़ार में हैं कि सुरक्षा इंतज़ाम ढीले हों और वे हिंदुस्तान के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन के नाम पर जिहादी हिंसा शुरू करें।

जिहाद के लिए आने-जाने वाले पैसे की जाँच के दौरान NIA ने भी दावा किया था कि कश्मीर प्रेस क्लब और कश्मीर एडिटर्स’ गिल्ड के सदस्यों में से कई ISI से वित्तपोषित होते हैं। कश्मीर में अशांति किसी-न-किसी तरह साबित करने के लिए, बल्कि वहाँ अशांति फ़ैलाने के लिए, कई तरह का प्रोपेगंडा, कई तरह की फेक न्यूज़ वहाँ के पत्रकारों द्वारा फैलाई जा रही है। एक झूठा नैरेटिव बनाने की कोशिश हो रही है कि हिंदुस्तानी सुरक्षा बल कश्मीर में ‘अत्याचार’ कर रहे हैं।

आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे: राखीगढ़ी DNA स्टडी से इतिहास का सबसे बड़ा खुलासा

आर्यों को लेकर कई दावे किए गए लेकिन फिर भी सवाल ज्यों का त्यों रहा कि आर्य बाहर से आए थे या यहीं (भारत) के ही निवासी थे? इस सवाल के जवाब में वामपंथियों ने कई दावे किए जिसका मकसद भारतियों को शायद हीन साबित करना रहा हो लेकिन अब इस सवाल का जवाब स्पष्ट नज़र आने लगा है।

दरअसल, हरियाणा के हिसार जिले के राखीगढ़ी में हुई हड़प्पाकालीन सभ्यता की खोदाई में कई ऐतिहासिक राज से पर्दा उठ गया है। बता दें कि राखीगढ़ी में मिले 5000 साल पुराने कंकालों के डीएनए टेस्ट के बाद जारी की गई रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए बल्कि यहीं अर्थात भारत के ही के मूल निवासी थे। डीएनए स्टडी से यह भी खुलासा हुआ है कि भारत के लोगों के जीन में पिछले हजारों सालों में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखने को मिला है।

इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के एक अंश में यह दावा किया गया है कि इस अध्ययन में सामने आया है कि आर्यन्स भारत के ही मूल निवासी थे। इसे लेकर वैज्ञानिकों ने राखीगढ़ी से प्राप्त नरकंकालों के अवशेषों का डीएनए टेस्ट किया था। डीएनए टेस्ट से स्पष्ट पता चला है कि यह रिपोर्ट प्राचीन आर्यन्स की डीएनए रिपोर्ट से मेल नहीं खाती है। ऐसे में जाहिर आर्यों के बाहर से आने की थ्योरी ही गलत साबित होती है। वैसे पहले भी कई इतिहासकारों का कहना था कि वामपंथियों की आर्यन थ्योरी मनगढंत कल्पना पर आधारित है। जिसकी परतें इस नए शोध से उघड़ती नज़र आ रही हैं।

रिसर्च में यह भी सामने आया है कि 9000 साल पहले भारत के लोगों ने ही कृषि की शुरुआत की थी। इसके बाद ये ईरान व इराक होते हुए पूरी दुनिया में पहुँची। भारत के विकास में यहीं के लोगों का योगदान है।

यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि इतिहास के लिए तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं, इन तथ्यों में भी वैज्ञानिक सबूतों का ज्यादा महत्व होता है। राखीगढ़ी में मिले 5000 साल पुराने कंकालों के अध्ययन के बाद जारी की गई रिपोर्ट में ऐसी कई बातें सामने आई है जिनके अभी तक कयास ही लगाए जा रहे थे।

बता दें कि हिसार के राखीगढ़ी में हड़प्‍पा खोदाई का काम कर रहे पुणे के डेक्कन कॉलेज के पुरातत्वविदों के अनुसार, खोदाई के वक्त युवक (कंकाल) का मुँह युवती की तरफ था। और यह पहली बार है कि जब हड़प्पा सभ्यता की खुदाई के दौरान किसी युगल की कब्र मिली है।

यहाँ हैरानी की बात यह भी है कि अब तक हड़प्पा सभ्यता से संबंधित कई कब्रिस्तानों की जाँच की गई थी लेकिन आज तक किसी भी युगल के इस तरह दफनाने का मामला सामने नहीं आया था।

राखीगढ़ी में खोदाई करने वाले पुरातत्वविदों के अनुसार, युगल कंकाल का मुँह, हाथ और पैर सभी एक समान है। इससे साफ है कि दोनों को जवानी में एक साथ दफनाया गया था। बता दें के ये निष्कर्ष हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका, एसीबी जर्नल ऑफ अनैटमी और सेल बायॉलजी में प्रकाशित किए गए थे।

इस नए शोध और प्रमाणों के साये में इतिहास को देखने और समझने की एक नई दृष्टि मिलती है। और वामपंथियों की हीनता भरे इतिहास को एक चपत भी लगती है। आप इस स्टडी पर एक रिपोर्ट यहाँ Opindia पर भी पढ़ सकते हैं।

चंद्रयान-2: हम वहाँ जा रहे हैं, जहाँ कोई नहीं जाता, ISRO प्रमुख के शिवन का बयान, जानिए पूरा मिशन

“हम वहाँ जाते हैं जहाँ कोई नहीं जा सकता” यह अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी CIA के ट्विटर बायो पर उनका ध्येय-वाक्य है, और सच भी है- वे असम्भव को अपने देशहित में सम्भव करके दिखाते हैं। ISRO के कार्यक्षेत्र का शायद CIA से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन चंद्रयान-2 के बाद इसरो भी यह कहने का पूरी ठसक के साथ हकदार हो गया है कि “हम वहाँ जाते हैं, जहाँ कोई नहीं जाता।” ऐसा इसलिए क्योंकि चंद्रयान-2 चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा, जहाँ किसी और देश ने अपना अभियान नहीं भेजा।

चंद्रमा- और अंतरिक्ष-अभियानों की कायापलट

इसरो को उम्मीद है कि विक्रम नामक मॉड्यूल की सॉफ़्ट लैंडिंग (जोकि भारत चन्द्रमा पर पहली बार करने का प्रयास करेगा) से जो खोजें होंगी, वे न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के लिए लाभकारी होंगी। प्रेस को जारी विस्तृत जानकारी-सामग्री में इसरो ने उम्मीद जताई है कि चन्द्रमा पर भविष्य में होने वाले अभियानों में तो यह अभियान आमूलचूल परिवर्तन लाएगा ही, साथ ही सुदूर अंतरिक्ष की नई सीमाओं को नापने में भी इसका योगदान होगा।

इसरो ने इशारा किया है कि चंद्र-अभियान का मकसद केवल चन्द्रमा की नई गहराईयों में उतरना ही नहीं है, बल्कि सुदूर अंतरिक्ष में अभियानों की तैयारी के लिए भी चन्द्रमा ‘प्रयोगशाला’ है।

सबसे ताकतवर लॉन्चर का इस्तेमाल

भारत ने चंद्रयान के लिए अब तक का सबसे ताकतवर लॉन्चर GSLV Mk-III (जीएसएलवी मार्क-3) इस्तेमाल किया है। 43.43 मीटर लम्बा और 640 टन भारी लॉन्चर चंद्रयान को उसकी निर्धारित कक्षा तक ले जाएगा।

22 जुलाई को भारत से लिफ़्ट-ऑफ़ लेने वाले चंद्रयान का सफ़र कुल 48 दिनों का है। इसके अंत में 6-7 सितंबर की रात को deboosting की प्रक्रिया शुरू कर लैंडिंग पूरी कर लेगा।

महान वैज्ञानिक के नाम पर लैंडर

विक्रम नामक लैंडर का नाम भारतीय अंतरिक्ष प्रोग्राम के जनक माने जाने वाले डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर है। इसका जीवन काल चाँद के एक दिन का है। धरती के लिए यह 14 दिनों के करीब होगा, क्योंकि चाँद अपनी धुरी पर एक घूर्णन (rotation) धरती के मुकाबले करीब 14 गुना धीमी गति से करता है। इसका सम्पर्क बंगलुरु के पास ब्यालालु स्थित Indian Deep Space Network (ISDN) के साथ भी रहेगा।

उपकरण

चंद्रयान के मिशन पेलोड में कई सारे उपकरण हैं, जो चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव की पूरी तस्वीर खींचने में किसी-न-किसी पैमाने पर सहायक होंगे। इसमें इलाके की तस्वीरें लेने के लिए टेरेन मैपिंग कैमरा, सतह पर मौजूद धुल-मिट्टी में रासायनिक तत्वों का अनुपात मापने के लिए लार्ज एरिया सॉफ़्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रॉमिटर, वहाँ पहुँचती सूर्य की किरणों के विश्लेषण के लिए सोलर एक्स-रे मॉनिटर प्रमुख हैं। इसके अलावा जमे हुए पानी को ढूँढ़ने के लिए ड्युअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक एपर्चर रेडार, चन्द्रमा के ऊपरी वातावरण के अध्ययन के लिए ड्युअल फ्रीक्वेंसी रेडियो साइंस एक्स्पेरिमेंट, भूकंप को भाँपने के लिए विशेष उपकरण आदि होंगे।

प्रज्ञान रोवर

चंद्रयान-2 का ज़मीनी उपकरण प्रज्ञान है, जोकि एक 6 पहियों वाला रोबोटिक वाहन है। यह 1 सेंटीमीटर प्रति सेकंड की गति से 500 मीटर (आधा किलोमीटर) तक चल सकता है। साथ ही यह विक्रम लैंडर से संचार माध्यम से सम्पर्क भी स्थापित कर सकता है। चन्द्रमा पर यह सौर-ऊर्जा से काम करेगा।

मासूम कश्मीरी बच्ची को जहरीले साँप ने डसा, सेना ने ऐसे बचाई जान

जम्मू-कश्मीर में जहाँ अनुच्छेद-370 हटने के बाद से ही लगातार वहाँ सेना को दुश्मन के रूप में कुछ छुद्र अलगाववादी-देश विरोधी ताकतों द्वारा विलेन के रूप में जा रहा है वहीं भारतीय सेना पूरी मुस्तैदी के साथ कश्मीरियों का दिल जीतने में लगी है। भारतीय सेना कश्मीरियों को वैसे हर संकट में मदद करती रही है चाहे वह बाढ़ के समय हो, आतंक से लोहा लेना हो या चिकित्सा से जुड़ी ही कोई समस्या क्यों न हो। भारतीय सेना से जुड़ी एक ऐसी ही घटना और सामने आई है जिसमें सेना की सूझ-बूझ के चलते एक मासूम कश्मीरी बच्ची की जान बच गई है।

मामला कुछ यूँ है, 11 साल की कश्मीरी लड़की यास्मीन को एक जहरीले साँप ने डस लिया था लेकिन आर्मी हॉस्पिटल की मेहनत और वक़्त पर इलाज करने के चलते उसकी जान बच गई है। सेना के अस्पताल के अधिकारियों ने कहा कि बच्ची को गंभीर हालत में अस्पताल में लाया गया था। डॉक्टरों के प्रयास से बच्ची खतरे से बाहर है और अगले 72 घंटों के बाद उसे हास्पिटल से छुट्टी दे दी जाएगी।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले आर्टिकल 370 को हटाने के बाद कई तरह की अफवाहें फैलायी जा रही थी और ये सिलसिला अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है। सेना को लेकर मनगढंत और झूठे आरोप लगाने वाली शेहला रशीद के खिलाफ भी आज देश द्रोह का मुकदमा दर्ज किया है।

इतना ही नहीं कई सरकार विरोधी विपक्षी नेता भी पाकिस्तान और अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते नज़र आए बिना यह सोचे कि इससे आखिर सेना के मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी भारतीय सेना कश्मीरी जनता की सेवा में तत्पर है। सेना ने इस दुष्‍प्रचार का जवाब ‘आर्मी फॉर अवाम’ फॉर्मूला से देने की तैयारी की है। जिसमें वह खासी सफल रही है।

बधाई हो रवीश जी, आज आपने विदेशियों को अंग्रेजी में बताया कि भारत नॉर्थ कोरिया बन गया है

रवीश कुमार को कौन नहीं जानता। बिस्कुट का चाय के कप में टूटने पर आपातकाल लाने वाले रवीश जी को हाल ही में मैग्सेसे अवार्ड मिला था जिसे एशिया का नोबेल भी कहते हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं कि आने वाले वक्त में रवीश कुमार की छवि जैसी भी हो जाए, लेकिन वो इस अवार्ड के हकदार हैं। हाँ, जिस कालखंड के लिए यह अवार्ड मिला है उस पर मैंने पहले भी आपत्ति दर्ज की है, आज भी करूँगा। वो इसलिए कि ऐसे साइटेशन देने के बाद आदमी का कद ऊँचा हो न हो, मैग्सेसे अवार्ड का कद फिलिपीन्स के फिल्मफेयर टाइप का हो जाता है।

सिवाय इस बात के कि यह स्पीच अंग्रेजी में अनुवाद की गई थी, मैं दावे के साथ कह देता हूँ कि अगर कल रात भी मुझसे कोई पूछता कि रवीश जी सुबह में क्या-क्या बोलेंगे, तो मैं वो स्पीच एक बार में बिना उँगलियाँ उठाए टाइप कर देता। भले ही कुछ पैराग्राफ ऊपर या नीचे हो जाते, लेकिन मूल बातें तो वही होतीं कि भारत में स्वतंत्र विचारों को दबाया जा रहा है, पत्रकारिता की स्थिति बहुत खराब है, मेरे चैनल को छोड़ कर बाकी जगह घृणा बाँटी जा रही है, व्हाट्सएप्प के ट्रोल मुझे गाली देते हैं, कश्मीर में मानवाधिकारों को हनन हो रहा है, आप सरकार के खिलाफ कुछ भी लिखिए तो आप एंटी-नेशनल बता दिए जाएँगे… आप समझ ही गए होंगे कि ये स्पीच आप भी लिख देते, बस मेरी और आपकी टायपिंग स्पीड या अभिव्यक्ति के माध्यम के चुनाव में अंतर है।

जिस रवीश कुमार को, जिस कारण यह अवार्ड मिला है, वो यह बता रहे हैं कि आवाजों को दबाया जा रहा है। यही दबी आवाज इतनी ज्यादा दब चुकी है कि उनका चैनल बाकायदा चल रहा है, उनके फेसबुक पेज चल रहे हैं, और उनके प्रोग्राम को हजारों लोग देखते हैं। यह बात और है कि उन्होंने आज की स्पीच में भी, और पहले भी यह जिक्र जरूर किया है कि उनके चाहने वालों के घरों के ऊपर अमित शाह या मोदी प्लास लेकर केबल का तार काट देता है, या एंटेना हिला कर भाग जाता है। अगर आप किसी देश में, झूठ बोल कर, प्रपंच फैला कर, ‘मुझे लोगों ने बताया’ और ‘सूत्रों के हिसाब से’, अपने मतलब से मुद्दों को मरोड़ कर रखते हैं, आप पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो मुझे लगता है कि भारत में आवाजों को फलने-फूलने का मौका दिया जा रहा है। हाँ, अगर आपकी व्यूअरशिप घट रही है, और तब आपको लगता है कि लोग आपको सुन नहीं रहे, इसमें मोदी का हाथ है, तो मनीला में ही किसी मनोचिकित्सक से भेंट की जा सकती है।

रवीश जी ने आगे कश्मीर की बात की। वही कश्मीर जो या तो आतंकवाद के कारण जाना जाता है, या फिर कश्मीरी पंडितों के पलायन के बारे में। वही कश्मीर जिसके हिन्दुओं को घाटी से रातों-रात कट्टरपंथियों ने भगाया था और रवीश अपने प्राइम टाइम में एक से बात करते हुए इसे सामान्य घटना की तरह ट्रीट करते हुए, बोलते हैं कि सारे कश्मीरी हिन्दू परेशान नहीं है! ये है उनका सैम्पल साइज।

जब सैम्पल साइज का लोचा हो, तो जाहिर है कि कविता कृष्णन जैसे धूर्त नक्सलियों द्वारा कश्मीर जा कर, चार लोगों के पैर दिखा कर, कल्पनाशीलता से दुखी कहानियाँ लाने को आप पूरे कश्मीर की वस्तुस्थिति के समानांतर रख सकते हैं। तब आपको श्रीनगर के पुलिस अधिकारी श्री इम्तियाज हुसैन या जिलाधिकारी श्री शाहिद चौधरी जी की हर दिन की रिपोर्ट पर भरोसा नहीं होगा। क्योंकि आप वही सुनना चाहते हैं जो कहानी आपने पहले से मन में बना रखी है।

रवीश जी पूछते हैं कि क्या उपस्थित सुधिजन इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि कश्मीरियों को इंटरनेट का एक्सेस नहीं है! मुझे आज पता चला कि जिस इंटरनेट का प्रयोग करके भारत के कई राज्यों में दंगे हुए हैं, कश्मीर में पत्थरबाजों को इकट्ठा किया गया है, उस इंटरनेट को आतंकियों को एक्सेस के लिए सरकार को छोड़ देना चाहिए था क्योंकि रवीश जी की दिली इच्छा थी। यहाँ कश्मीर में हिंसा का इतिहास जिसने 42,000 से ज्यादा लोगों की जानें लीं, वहाँ के हर सप्ताह मरने वाले चार आतंकी, और हर शुक्रवार को होने वाली पत्थरबाजी की बातों को सरकार को इग्नोर करते हुए, इंटरनेट एक्सेस दे देना चाहिए था। क्यों? क्योंकि रवीश जी को लगता है कि किसी को सूचना से दूर रखना गलत बात है!

बोलने का मंच मिले तो नेशनल आदमी इंटरनेशनल हो कर कुछ भी बोल सकता है क्योंकि सुनने वाले कहीं जा नहीं सकते, और उनके भूरे-सफेद चेहरों पर जो भी फेंक दो, गम्भीरता का लबादा ओढ़े, वो लगातार ऐसे सुनते हैं जैसे कि रवीश उत्तरी कोरिया से सुरंग खोद कर, धारीदार गंजी और फटे पैंट के साथ सीधा मनीला में प्रकट हुए हैं।

सोशल मीडिया को पिछले छः सालों तक ट्रोलों का तंत्र और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी कह कर, इसे आईटी सेल से जोड़ने वाले रवीश जी की स्पीच में अचानक से इस माध्यम के प्रति प्रेम उबलता दिख पड़ा। जिस सोशल मीडिया ने इनके हर प्रोपेगेंडा को वहीं के वहीं नकारा है, याद दिलाया है कि उनकी घृणा और आलोचना की परिभाषा में अंतर है, उसी की बात करते हुए रवीश जी बताने लगे कि असली बदलाव यहीं से आएगा।

फर्क बस इतना है कि रवीश जी बदलाव देखना चाहते हैं, जबकि बदलाव आ चुका है। वो दिन गए जब इनके जैसे एंकर एकतरफा संवाद करते हुए जुनैद की हत्या को बीफ की वजह से बता देते थे और सवाल पूछने वालों को जगह नहीं मिलती थी। आज वो इन्हें याद दिलाते हैं कि जुनैद तो सीट के चक्कर में मारपीट का शिकार हुआ था। लेकिन रवीश ने न तो तब नैतिकता दिखाई न आज। इसलिए, वो जब दोबारा कश्मीर को याद करते हुए कहते हैं कि अगर कश्मीर की कोई लड़की ब्लॉग लिखेगी तो उसे एंटी-नेशनल कह दिया जाएगा।

जबकि अजीब बात यह है कि इन्होंने जितनी बार हर छोटी सी बात पर एंटिसिपेटरी बेल लेने जैसा ‘अब आपको एंटी नेशनल कह दिया जाएगा’ वाला पासा फेंका है, उतनी बार तो किसी ने किसी को एंटी नेशनल बोला भी नहीं है। ये तकनीक रवीश पिछले पाँच सालों से अपना रहे हैं, और सफलता भी इनके चरणचुंबन करती रही है। जैसे कि सबको याद होगा कि आपातकाल नामक बैल को ये कितनी बार नाथ से पकड़ कर अपनी घृणा की बैलगाड़ी चलाने के लिए उसके जुए तक लाते रहे हैं, लेकिन वो बैल भी इनके बागों के फर्जी बहार और काली स्क्रीन की नौटंकी को देख कर बोर हो चुका था, और ज्यादा दूर जा न सका।

पत्रकारिता की बात

पत्रकारिता की बात करते हुए उन्होंने श्रोताओं का काफी समय बर्बाद किया। वो बताते रहे कि जन आंदोलनों को कवरेज नहीं मिलती मीडिया में क्योंकि वो चलता नहीं। जबकि, स्थिति इसके उलट ऐसी है कि सारे चैनल कॉलेज की झड़प से लेकर, नेताओं के थप्पड़ मारने तक को लाइव कवर करना चाहते हैं। यूनिवर्सिटी के चुनावों तक राष्ट्रीय मुद्दे की तरह दिखाया जाता रहा है। भीमा कोरेगाँव हिंसा हो या फिर पिछले साल का तथाकथित दलित आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, सवर्ण आंदोलन, विद्यार्थियों का प्रोटेस्ट, हर आंदोलन को टीवी दिखाता है और रवीश कुमार जैसे एंकर उसी के आधार पर घृणा की दुकान चलाते हैं। लेकिन फिलीपीन्स में बैठे आदमी को क्या पता कि जो रवीश अंग्रेजी में ,रिपोर्ताज ऑफ प्रोटेस्ट्स इज नॉट देयर’ फेंक रहा है वो हिन्दी में कितना क्या करता है।

आगे उन्होंने फिर इलाका धुआँ-धुआँ करने वाला माहौल गढ़ते हुए कहा कि सरकार ने मीडिया को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया है। ये सब बस कहने की बातें हैं क्योंकि भाजपा समर्थकों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि दो-तीन चैनल छोड़ बाकी लोग मोदी जी की चालीसा क्यों नहीं पढ़ते। पूरी तरह से नियंत्रण का आखिर क्या मतलब है? अंग्रेजी में इस तरह के वाक्यांश बोलना कूल लगता होगा शायद क्योंकि भारत में मीडिया अगर पक्षपाती है, तो वो दोनों तरीके से है। ये बात और है कि रवीश जी ने दुनिया को टीवी न देखने की सलाह देते हुए शुतुर्मुर्ग टाइप सच में दो-तीन सालों से टीवी देखा ही न हो, और लगता हो कि उनका चैनल छोड़ कर सारे लोग सुबह में ‘अमित शाह जी की जय’ से शुरु करते हैं और शाम में ‘जय मोदी देवा’ कहते हुए सोते हैं।

सब मिले हुए हैं जी

बीच-बीच में लोकतंत्र की जीत और आम तौर पर लोकतंत्र की हत्या का राग छेड़ने वाले रवीश जी ने आज यह भी कह दिया कि सत्ता, पुलिस और न्यायपालिका पूरी तरह से नागरिकों के प्रति शत्रुतापूर्ण आचरण करने लगी है। ये कहने के पीछे रवीश जी, जाहिर तौर पर, अपने ‘जाँच कराने में क्या जाता है’ वाली बात को याद कर रहे होंगे।

रवीश जी की समस्या यह है कि वो सोचते हैं कि जो मुद्दा उन्होंने उठा लिया, उस पर वो जो सोच चुके हैं, न्यायपालिका से लेकर सरकार और पुलिस तक को उन्हीं के आदेशानुसार कार्य करना चाहिए। जैसे कि जस्टिस लोया के केस में परिवार ने जब कह दिया कि उन्हें जाँच नहीं करानी, कोर्ट ने कह दिया कि कुछ गलत नहीं है, तो अंकित सक्सेना के पिता की अपील को सराहने वाले रवीश बिफर गए कि कोर्ट ने ऐसा कैसे कह दिया!

अब, जबकि उनके द्वारा उठाए मुद्दे, उनके द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों को पूरे भारत की जनता अखंड सत्य मान कर कार्य नहीं करती तो उन्हें लगता है कि सब कुछ मैनेज हो गया है। घर में कोई भाई अगर उनका चैनल ऑफ कर देता है तो वो समाज को बाँटने वाली शक्तियों का परिवार के स्तर पर उतरना हो जाता है। आप यह देखिए कि अवसाद का स्तर कितना ज्यादा हो गया है कि इस व्यक्ति के हिसाब से भारत में हर संस्था न सिर्फ कॉम्प्रोमाइज्ड है बल्कि नागरिकों का शत्रु बन बैठी है!

यह कहते हुए रवीश के होंठ नहीं काँपे क्योंकि हर रात जब व्यक्ति इतने ही अवसाद के साथ, समाज को तोड़ने के लिए लोगों को उकसाता रहता हो, उन्हें तैयार करता हो कि हिन्दू तो तुम्हें राह चलते ‘जय श्री राम’ कहने को बोलेगा, तुम नहीं बोलोगे तो तुम्हें तो लिंच कर देगा, तो जाहिर है कि भारत की स्थिति सोमालिया या नॉर्थ कोरिया से भी बदतर बताने में ये आदमी लायडिटेक्टर मशीन को भी धोखा दे देगा। क्योंकि ऐसा करने में इनका कम्फर्ट लेवल बहुत हाय हो चुका है।

व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी का हर दिन मजाक बनाने वाले रवीश ने आज स्वयं ही स्वीकार किया कि उनकी पूरी पत्रकारिता आज कल व्हाट्सएप्प से ही चल रही है। अपने व्हाट्सएप्प पढ़ने के हृदयविदारक अनुभव को उन्होंने चम्पारण में किसानों से बात करते महात्मा गाँधी के समकक्ष रख दिया। ये सही तरीका है कि लोग गाँधी न बोलें तो स्वयं ही गाँधी बन जाओ, वैसे भी गाँधियों में रवीश जी को देश का भविष्य तो हाल के दिनों तक दिखता रहा है। व्हाट्सएप्प को न्यूजरूम मानने वाले रवीश जी इसीलिए बिना सबूत के ‘मुझे मैसेज आते हैं‘ के बल पर प्रोग्राम करते हैं, और 25 लाख लोगों की जाती नौकरियों की बात करते हुए, दो आदमी ढूँढ कर नहीं ला पाते जो सरकार के खिलाफ बोल सके। और हाँ, अंत में ‘सरकार का डर इतना ज्यादा है कि लोग कैमरे पर बोलना नहीं चाहते’ वाली कालजयी लाइन तो है ही।

सूचना, सत्य और रवीश

स्पीच के अंतिम हिस्से में उन्होंने जो-जो बात कही, वो सुन कर तथ्यात्मक पत्रकारिता में विश्वास करने वाला सिर्फ मुस्कुरा सकता है। रवीश कुमार ने बताया कि सूचना को तथ्यात्मक होना चाहिए, जबकि रवीश जी को जिस बात के लिए अवार्ड मिला है, उसमें जो सूचना इन्होंने तथ्य के नाम पर प्रोपेगेंडा की चाशनी में डुबा कर बार-बार परोसा है, उसे देखने वालों को तो यह सुन कर गजब आश्चर्य होगा।

पिछले पाँच सालों में रवीश की पूरी पत्रकारिता, सेलेक्टिव रही है। यह कह कर उन्माद फैलाने की कला सिर्फ रवीश को आती है कि जिसमें बार-बार एक समुदाय को कहा जाता है कि ‘डर का माहौल है’, हिन्दू तुम्हें लिंच कर रहे हैं, संभल कर रहो। जब आप रिपोर्टिंग के नाम पर प्रपंच बाँटते हैं तो यही सारी बातें निकलती हैं जहाँ गोएबल्स की बातें करते हुए, खुद ही उसी की तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों तक झूठ को सत्य बना कर पहुँचाना मुख्य लक्ष्य हो जाता है।

सामाजिक अपराधों को मजहबी रंग दे कर, कट्टरपंथियों को हमेशा पीड़ित की तरह दिखाना, और उसी तरह के वैसे अपराधों पर चुप हो जाना जिसमें पीड़ित हिन्दू हैं, आरोपित समुदाय विशेष से, यह बताता है कि आपके पत्रकारिता की ब्रांड क्या है। चाहे वो हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ने की बात रही हो, काँवड़ियों पर पत्थरबाजी की बात हो, बंगाल के हर जिले में मजहबी दंगों की बात हो, रवीश की चुप्पी बहुत सहज हो जाती है। जब रवीश अपनी स्पीच में यह कहते दिखते हैं कि भारतीय मीडिया घृणा फैलाने में व्यस्त है, तो वो भी उसके बहुत बड़े हिस्सेदार हैं।

अंत में करोड़ों की मनी लॉन्ड्रिंग जैसे आरोप झेलते अपने मालिकों का धन्यवाद करते हुए आपने दोबारा वही एंटिसिपेटरी बेल वाली तकनीक अपनाई जब आपने कहा कि पता नहीं इस स्पीच के बाद उनके साथ क्या हो। आख़िर आपकी स्पीच के कारण उन पर कुछ भी क्यों होगा? आप जब आरोप लगाएँ कि जय शाह ने धाँधली की, डोभाल के बेटे कालाधन छुपा रहे हैं, जस्टिस लोया की हत्या हुई और हर बात में ‘जाँच कराने में क्या जाता है’ कहते रहे तो सब ठीक था, लेकिन आपके मालिकों पर सरकारी एजेंसियाँ पूछताछ कर रही है, जाँच कर रही है, तो आप ऐसा माहौल बना रहे हैं कि मोदी सुबह-सुबह योग करने के बाद टीवी ऑन कर के आपका स्पीच सुन रहा होगा, और खत्म होते ही ईडी वालों को कहा होगा कि जरा देखो तो प्रणय्या क्या कर रहा है, उसको उठा लो।

अपने आपको इतना इम्पॉर्टेंस क्यों देते हैं आप जबकि भाजपा का एक प्रवक्ता भी आपको इम्पॉर्टेंस के लायक नहीं समझता, कारण जो भी हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रणय रॉय-राधिका रॉय के मामले में कुछ पता हो आपको जो सरकार को भी पता चल जाए और जब वो पकड़े तो आप उछल पड़ें कि ‘मैंने तो बोला ही था, मैंने बोला था न…’

लोकतंत्र ही रहे, लेकिन चले बस कुछ लोगों के हिसाब से

जब आप घरों में पिता द्वारा टीवी पर अपने प्रोग्राम के बंद करने के बाद, बेटी द्वारा टीवी ऑन कर लेने को लोकतंत्र के बचने के जैसा मान रहे हैं तो कहीं न कहीं ये दिमागी समस्या है। लोकतंत्र की हत्या लगभग हर दिन करने वाले रवीश जी को यह जानना चाहिए लोकतंत्र को बचाने की जरूरत नहीं है क्योंकि वो सक्षम हाथों में है जिसे तय तरीके से, संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायरे में रह कर भारत की जनता ने सत्ता दी है।

रवीश और उनके गिरोह को यह बात हमेशा खली है कि वो जिसे चाहते हैं वही लोग सत्ता में क्यों नहीं हैं। यह बात पचाना मुश्किल है, और लगभग उनकी पत्रकारिता द्वारा अजेंडा सेटिंग की क्षमता पर सवाल खड़े करता है कि पाँच साल की अनवरत नकारात्मक अजेंडाबाजी के बावजूद भाजपा को ज्यादा सीटें कैसे आ गईं। उनका दम्भ उन्हें इस बात को समझने से मना करता है कि रवीश के वोट का मोल और सड़क के लिए पत्थर ढोने वाले किसी ब्रजेश के वोट का मोल एक ही है।

जबकि इनकी दिली इच्छा रही है कि नाम तो सिस्टम का डेमोक्रेसी ही रहे, लेकिन सत्ता चुनने का हक उनके गिरोह के पास चला जाए क्योंकि कुपोषण से जूझते, गरीबी में पलते, रटंत स्कूलिंग से निकले और टाय लगाकर डिजिटल मजदूरी करने वाले भारतीयों को समझ में ही क्या आता है कि सरकार होती क्या है, और कैसे चलनी चाहिए। वैसे भी इन्होंने यहाँ के युवाओं की सियासी समझ को थर्ड क्लास कहा ही है और उन्हें मुर्दा भी बताया।

इसलिए, जब रवीश कुमार भारत आएँ, तो उन्हें बताया जाए कि उनके वोट की कीमत दस करोड़ हो गई है। उन्हें बस राजदीप, बरखा, सगारिका जैसे पाँच लोगों को ही तैयार करना होगा कि 2024 के चुनावों में वो लोग वोट दे दें, जिससे कि पचास करोड़ वोट मोदी के खिलाफ हों और वो चुनाव हार जाए। उसके बाद फिर स्टूडियो में बैठ कर, फोन करते हुए, कैबिनेट तय हो जाए, भारत दोबारा वैसा हो जाएगा जैसा 2014 के पहले था: मैडिटेरेनियन क्लाइमेट, अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नॉर्डिक शिक्षा-स्वास्थ्य-नौकरी पद्धति का अनूठा संगम!