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जस्टिस सुनील गौड़: 2015 में गाँधी परिवार के चहेते थे, अब कॉन्ग्रेस को क्यों बुरे लगते हैं?

पी चिदंबरम आईएनएक्स मीडिया केस में बुरे फँसे हैं। अगस्त 20, 2019 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज़ कर दी थी, जिसके बाद उनकी गिरफ़्तारी का रास्ता साफ़ हो गया था। इसके बाद वह गिरफ़्तारी के भय से गायब हो गए थे। 22 अगस्त को वह कॉन्ग्रेस मुख्यालय पर दिखे, जहाँ उन्होंने अन्य नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इसके बाद वह अपने जोर बाग़ स्थित आवास पर चले गए। घर बंद होने के कारण सीबीआई ने दीवार फाँद कर उन्हें गिरफ़्तार किया। गिरफ़्तारी के बाद उन्हें सीबीआई की कस्टडी में भेज दिया गया और बाद में कस्टडी की समयावधि 30 अगस्त तक बढ़ा दी गई।

यह सारा घटनाक्रम शुरू हुआ हाईकोर्ट द्वारा उनकी अग्रिम ज़मानत अर्जी खारिज़ किए जाने के बाद। जस्टिस (रिटायर्ड) सुनील गौड़ ने उस दिन चिदंबरम की 2 याचिकाएँ खारिज़ की। एक याचिका उनकी अग्रिम ज़मानत को लेकर थी तो दूसरी गिरफ़्तारी से राहत प्रदान करने की। जस्टिस सुनील गौड़ ने दोनों याचिकाओं को खारिज़ कर दिया। इसके बाद जाँच एजेंसियों के लिए चिदंबरम को गिरफ़्तार करने का रास्ता साफ़ हो गया। इसके बाद ख़बरें आईं कि जस्टिस सुनील गौड़ कुछ ही दिनों में रिटायर होने वाले हैं।

आज हम इन सबका जिक्र इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि कॉन्ग्रेस ने जस्टिस सुनील गौड़ पर बड़ा आरोप लगाया है। जब ये ख़बर आई कि जस्टिस गौड़ को रिटायरमेंट के बाद ‘Prevention of Money Laundering Act (PMLA) Appellate Tribunal’ का अध्यक्ष बनाया गया है, कॉन्ग्रेस ने कांस्पीरेसी थ्योरी पर काम करना शुरू कर दिया। कॉन्ग्रेस ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और जस्टिस गौड़, दोनों पर ही आरोप लगाया कि यह लेनदेन का मामला है। लेनदेन का मामला अर्थात जहाँ दो पक्ष एक-दूसरे को फ़ायदा पहुँचाते हैं।

हालाँकि, अभी तक उनकी नियुक्ति को लेकर कोई अधिकारिक बयान या ऑर्डर नहीं आया है लेकिन कॉन्ग्रेस ने ख़बरों के आधार पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोप-प्रत्यारोप के इस खेल में न्यायपालिका को भी घसीट लिया। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता ब्रिजेश कलप्पा ने पूछा कि ऐसा कौन सा जॉब है जहाँ आपको मिली उत्तर पुस्तिका में कॉपी-पेस्ट कर देने पर सबसे ज्यादा मार्क्स मिलते हैं? उन्होंने ख़ुद ही जवाब देते हुए कहा कि जज वाले जॉब में ऐसा होता है। आश्चर्य की बात यह है कि इस तरह की टिप्पणी करने वाले ब्रिजेश सुप्रीम कोर्ट में वकील भी हैं।

जस्टिस गौर विवादित मीट कारोबारी मोईन क़ुरैशी के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग केस से लेकर नेशनल हेराल्ड तक, कई महत्वपूर्ण मामलों में सुनवाई कर चुके हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि जो कॉन्ग्रेस आज जस्टिस गौड़ के पीछे पड़ी है, उसी कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार कभी उनकी ही अदालत में सुनवाई चाहता था। जी हाँ, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी नेशनल हेराल्ड मामले के मुख्य आरोपित हैं। सोनिया-राहुल चाहते थे कि जस्टिस सुनील गौड़ ही उनके मामले की सुनवाई करें। आगे आपको इस बारे में बताएँगे लेकिन पहले जरा समझ तो लें कि कॉन्ग्रेस की खुन्नस का कारण क्या है?

जस्टिस सुनील गौड़ ने साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था कि शुरूआती सबूतों से ऐसा प्रतीत होता है कि पी चिदंबरम न सिर्फ़ इस मामले में मुख्य अभियुक्त हैं बल्कि पूरे मामले में मुख्य साज़िशकर्ता भी हैं। जस्टिस गौड़ ने अपने निर्णय में कहा कि जाँच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत किए गए सबूतों की व्यापकता और स्तर चिदंबरम को प्री-अरेस्ट बेल के लिए योग्य बनाती हैं। हाईकोर्ट ने कहा, “यह एक वित्तीय अपराध है। इसमें मजबूती से कार्रवाई की जानी चहिए। इतने बड़े स्तर के वित्तीय अपराध में सरकारी जाँच एजेंसियों के हाथ बाँध कर नहीं रखे जा सकते।

जस्टिस सुनील गौड़ की इन्हीं बातों ने कॉन्ग्रेस की नज़र में उन्हें विलेन बना दिया। लेकिन, कॉन्ग्रेस नेता उनके रिटायर होने तक चुप रहे क्योंकि उन्हें ‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट’ का डर था। कॉन्ग्रेस को पता था कि जस्टिस गौड़ कुछ ही दिनों में रिटायर होने वाले हैं और इसके बाद उनका नाम लेकर सरकार पर हमला करने में आसानी होगी। और यही हुआ। लेकिन, उससे पहले जानते हैं कि गौड़ ने ऐसा क्या कहा था कि कॉन्ग्रेस और चिदंबरम उनसे खार खाए बैठे हैं। जस्टिस गौड़ ने सपाट शब्दों में साफ़ कर दिया था कि पी चिदंबरम जाँच एजेंसियों के साथ सहयोग करने में अक्षम रहे हैं और प्रतिक्रिया देने में टाल-मटोल करते रहे हैं।

यह भी जानने लायक बात है कि हाईकोर्ट ने अपना जजमेंट इस वर्ष जनवरी में ही सुरक्षित रख लिया था। अब वापस सोनिया-राहुल पर आते हैं। अगर जस्टिस गौड़ पर कॉन्ग्रेस द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं तो फिर आज से 4 वर्ष पहले उसी कॉन्ग्रेस की तत्कालीन मुखिया और भावी मुखिया क्यों जस्टिस सुनील गौड़ की अदालत में ही अपने केस की सुनवाई चाहते थे?

आश्चर्य की बात तो यह भी है कि न सिर्फ़ कॉन्ग्रेस के नेतागण बल्कि दरबारी पत्रकार भी चारों ओर से गौड़ और केंद्र सरकार के बीच साँठ-गाँठ की बातें चला रहे हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस तरफ़ इशारा किया जा रहा है। सच्चाई और तथ्यों में अपना विश्वास खो चुके ये पत्रकार लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए सीधी-सपाट भाषा में ऐसे समझाते हैं, जैसे देश में आपातकाल चल रहा हो और न्यायपालिका को सचमुच काम नहीं करने दिया जा रहा है। यही तो प्रक्रिया होता है नैरेटिव तैयार करने का।

दरअसल, रोस्टर बदलने के बाद जस्टिस पीएस तेजी को इस मामले की सुनवाई करनी थी। फिर क्या था? सोनिया-राहुल यह माँग लेकर पहुँच गए दिल्ली हाईकोर्ट कि इस मामले को जस्टिस सुनील गौड़ को ही असाइन किया जाए क्योंकि उन्होंने इस मामले में कई बार सुनवाई की है। सोनिया-राहुल के अलावा इस केस में आरोपित गाँधी परिवार के अन्य वफादारों ने भी ऐसी ही माँग की। यह भी जानने लायक बात है कि उस दौरान भी आईएनएक्स केस में चिदंबरम के वकील और कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ही सोनिया-राहुल के वकील थे और वे ही इस माँग को लेकर गए थे।

हालाँकि, कोर्ट ने सोनिया-राहुल की इस माँग को नकार दिया था और जस्टिस तेजी ने ही इस मामले की सुनवाई की। लेकिन यह सवाल रह गया कि अगर जस्टिस गौड़ आज से 4 वर्ष पहले अच्छे थे तो आज बुरे कैसे हो गए? खैर, इन सब से बेख़बर कॉन्ग्रेस नेता लगे हुए हैं- भाजपा की आलोचना में, जस्टिस गौड़ की आलोचना में, न्यायपालिका-कार्यपालिका और विधायिका, सब कुछ की आलोचना में। उनके नेताओं के पूर्व के भ्रष्टाचार पर जाँच की आँच आ रही है। चिल्लाना ज़रूरी है। बिना सच जाने, बिना इतिहास जाने, बिना घटनाओं की तह तक गए। चिल्लाना ज़रूरी है।

जाते-जाते बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष परिवार के माँ-बेटे नेशनल हेराल्ड केस में आरोपित हैं और फिलहाल ज़मानत पर बाहर हैं। दिसंबर 2015 में दिल्ली की एक अदालत ने दोनों को 50-50 हज़ार रुपए के पर्सनल बॉन्ड पर ज़मानत दी थी। सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा दर्ज कराए गए इस मामले में आरोप है कि यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (YIL) ने एसोसिएट जर्नल प्राइवेट लिमिटेड (AJL) का अधिग्रहण किया, जिसमें कई अनियमितताएँ बरती गईं।

वाईआईएल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में सोनिया और राहुल भी शामिल हैं। स्वामी के शिकायत में कहा गया है कि वाईआईएल में सोनिया-राहुल की 76% हिस्सेदारी है और एजेएल को कॉन्ग्रेस पार्टी के फंड्स में से लोन दिए गए, जो ग़ैर-क़ानूनी है

अयोध्या मामला: ‘बाबर की जमीन होने के सबूत नहीं तो मुस्लिमों को हिस्सा कैसा’

अयोध्या मामले के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार (अगस्त 29, 2019) को 15 वें दिन सुनवाई हुई। इस दौरान राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के वकील पीएन मिश्रा ने पाँच सदस्यीय बेंच के सामने दलीलें पेश की।

उन्होंने मिश्रा ने कहा कि विवादित जमीन मुस्लिम पक्षकार को नहीं दी जा सकती, क्योंकि वे यह साबित नहीं कर पाए हैं कि बाबर ने ही मस्जिद का निर्माण किया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के हवाले देते हुए कहा कि यह साबित नहीं हो पाया है कि विवादित जमीन पर मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण बाबर ने कराया था या औरंगजेब ने? इसलिए कोई सबूत नहीं होने के कारण मुस्लिम पक्षकार को यह जमीन नहीं दी जा सकती।

मिश्रा ने दलील देते हुए कहा कि यह तो स्पष्ट है कि मस्जिद को मंदिर के ऊपर बनाया गया था। मंदिर के अवशेष उस जगह से मिले हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई।

उन्होंने दलील दी कि बाबर ने मस्जिद का निर्माण नहीं कराया था और न ही वह विवादित जमीन का मालिक था। जब वह जमीन का मालिक ही नहीं था तो सुन्नी वक्फ बोर्ड का मामले में दावा ही नहीं बनता। मुस्लिम पक्षकार यह साबित नहीं कर पाए थे कि मस्जिद का निर्माण बाबर ने करवाया था।

राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद गुम्बद के नीचे……

उन्होंने कहा, “बाबर विवादित जमीन का मालिक नहीं था। ऐसे में मेरा कहना है कि जब कोई सबूत ही नहीं है तो मुस्लिम पक्षकार को विवादित जमीन पर कब्जा या हिस्सेदारी नहीं दी जा सकती।”

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं।

घोघो रानी कित्ता पानी: सुप्रीम कोर्ट ने बता दिया हिंदी मीडिया में कूड़ा परोसने वाले कौन

‘मानहानि- मानहानि: घोघो रानी, कितना पानी’

तो आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने घोघो रानी को बता बता दिया कि कितना पानी था। सुप्रीम कोर्ट ने बता दिया है कि पानी चुल्लू भर है और ‘पीत पत्रकारिता’ के डूब मरने के लिए यह काफी है। माननीय सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद मंगलवार (अगस्त 27, 2019) को प्रोपगेंडा न्यूज पोर्टल The Wire ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह द्वारा दायर किए गए मानहानि के मुक़दमे को निरस्त किए जाने की माँग वाली अपनी याचिका वापस ले ली।

इसके बाद से चुनाव से पहले द वायर के कंधे पर बन्दूक रखकर जहर उगलने वाले अब भूमिगत हो गए हैं। खैर, इनकी चमड़ी इतनी मोटी है कि सालभर बाद प्रोपगेंडा फर्जी निकल भी जाए तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। वे एक नया प्रोपगेंडा गढ़ने में व्यस्त हो जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने ‘द वायर’ को फटकार लगाते हुए जो कुछ कहा वो उन सभी लोगों को दिन में 5 वक़्त पढ़ना चाहिए, जो टीवी स्क्रीन काली कर के पत्रकारिता को कोसते हैं और खुद उसे खोखला करते जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा – “आजकल यह मीडिया की संस्कृति बन गई है कि वह लोगों को जवाब देने के लिए सिर्फ 10-12 घंटे का नोटिस देती है और इसके बाद रिपोर्ट पब्लिश कर देती है!”

‘द वायर’ की ओर से पेश ‘वरिष्ठ वकील’ और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने कोर्ट से अपील की कि वो गुजरात की अदालत में ट्रायल का सामना करने के लिए तैयार हैं, इसलिए उनकी याचिका को वापस लेने की अनुमति दी जाए। इस पर नाराजगी जताते हुए जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि यह एक सभ्य देश है और यह कैसी संस्कृति हम विकसित कर रहे हैं, जिसमें हम रात में किसी को नोटिस भेजते हैं और फिर सुबह रिपोर्ट प्रकाशित कर देते हैं?

कपिल सिब्बल को दिए गए इस जवाब के बाद या तो उन्हें ‘वरिष्ठ’ कहने पर रोक लगनी चाहिए या फिर वरिष्ठ शब्द को एक गाली घोषित कर दिया जाना चाहिए। लेकिन जो भी हो, वह नजीर होना चाहिए।

वर्ष 2017 में ‘द वायर’ में छपे एक लेख के खिलाफ अमित शाह के बेटे जय शाह ने न्यूज पोर्टल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा कर दिया था। इसके बाद द वायर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। मंगलवार को जस्टिस बीआर गवई ने कहा- “यह और कुछ नहीं बल्कि पीत पत्रकारिता है। यह कैसी पत्रकारिता है? प्रेस की स्वतंत्रता सर्वोपरि है, लेकिन यह एकतरफा नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट के इसी वक्तव्य को ध्यान में रख ‘द वायर’ से लेकर ‘द क्विंट‘ और ‘स्क्रॉल‘ के साथ-साथ उन सभी आदरणीय वरिष्ठ पत्रकारों का स्मरण करिए जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता की गरिमा को दफ़न करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखा है।

द वायर, क्विंट, स्क्रॉल का नाम आते ही एक नाम सबसे कॉमन हो जाता है, वो है एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार का! ख़ास बात है कि वो भी वरिष्ठ हैं। इन प्रोपगेंडा न्यूज़ पोर्टल्स को मेनस्ट्रीम करने का सबसे ज्यादा प्रचार यदि किसी ने किया है तो वो सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कुमार हैं। रवीश ने इन सबको अपने जहर उगलने का माध्यम बनाया है और अब अपने आप सीधे किनारे हो गए।

अपने स्टूडियो से लेकर फेसबुक पोस्ट तक में रवीश कुमार ने ‘द वायर’ की इस रिपोर्ट से आदतन खूब बवाल मचाया था। उन्होंने अमित शाह के बेटे जय शाह पर वायर द्वारा लगाए गए आरोपों की आड़ में एक घोघो रानी का भी जिक्र किया और पूछा कि कितनी मानहानि है? लेकिन, आज घोघो रानी चुप है। रवीश बता नहीं रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट जिस ‘द वायर’ के प्रोपगेंडा को ‘पीत पत्रकारिता’ बता दिया है, उस पर घोघो रानी के क्या विचार हैं?

जबकि होना तो यह चाहिए कि आज के प्राइम टाइम में सुप्रीम कोर्ट को भी गोदी बता दिया जाना चाहिए। आज ऑड दिवस है, आज सुप्रीम कोर्ट का निर्णय घोघो रानी के मनमुताबिक़ नहीं है। ऐसा लगता है मानो खेल दिवस पर घोघो रानी खेल कर गई।

सुप्रीम कोर्ट उस द वायर को ‘येलो जर्नलिज़्म’ कहकर दुत्कार चुका है, जिसका हवाला देकर सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कुमार यहाँ-वहाँ लोगों को काटते फिरते हैं। लेकिन क्या अब रवीश कुमार अपने इन्हीं मनगढ़ंत आरोपों के लिए माफी माँगेंगे?

आप रवीश कुमार के ठीक एक साल पुराने इस लेख को जरूर पढ़िए। 2017 में अमित शाह के बेटे जय शाह पर रवीश कुमार ने पूरे आत्मविश्वास के साथ हर तरह के आरोप उन्नत भाषाशैली और मुहावरों के साथ लगाए थे, जो कि सुप्रीम कोर्ट के एक ही फटकार में सब घुस्सड़ घाटी में चले गए।

लेकिन क्या यह धूर्त, पाखण्डी, कुतर्की जर्नलिस्ट अपने पाठकों और श्रोताओं को ये बताएँगे कि उन्होंने उनके सामने झूठ परोसा था, क्या वो स्क्रीन काली कर शोक मनाते हुए अपने ऑडियंस को ये बताएँगे कि हिंदी मीडिया को कोसते हुए जब वो झूठ परोस रहे थे तब किसकी गोदी में बैठे थे?

नहीं, वो नहीं बताएँगे। क्योंकि यही उनके काम करने की शैली है और यही उनकी विचारधारा की नंगई है। इसके बिना घोघो रानी मर जाएगी, उसका यही खाद पानी है। आप आँख मूँदकर अपनी विचारधारा के अहंकार को संतुष्ट करने वाले एक पाखंडी बुद्धिजीवी की बातों को अभी भी ब्रह्मसत्य मानते चलिए, क्योंकि आपने अपना अंधेरा चुना है, इसलिए उसमें लीन रहिए आपको यही शोभा देता है। क्योंकि उनका प्रोपगेंडा ही अब काली स्क्रीन की पहचान है।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय जरा देर से आया है लेकिन ये फैसला आपके कान खड़े जरूर कर देता है कि द वायर को पत्रकारिता का सूर्य कहने वाले रवीश कुमार के दावे साल भर में ही फर्जी निकल जाते हैं। लेकिन, तब तक ऐसे ही कितने ही ‘द वायर’ अपने हिस्से का नुकसान बाजार में बेच चुके होंगे।

यह भी पढ़ें:रवीश कुमार! अपना ‘कारवाँ’ रोक दीजिए, आपको पत्रकारिता का वास्ता 

इसी तरह के आरोप रवीश कुमार की पसंदीदा वेबसाइट ‘कारवाँ’ भी NSA अजीत डोभाल और उनके बेटों पर लगा चुकी है। जब बिना किसी इन्तजार के ही रवीश कमार और ‘कारवाँ’ ने NSA डोभाल के परिवार को ‘D-कम्पनी’ बता दिया था। इसके बाद इस पूरे आरोप पर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया, ना ही कारवाँ की ओर से और ना ही रवीश कुमार की ओर से।

हालाँकि, अजीत डोभाल के बेटे ने जरूर मानहानि का दावा करने की ओर कदम बढ़ाए थे और रवीश कुमार ने इसके बाद ‘मानहानि’ पर ही प्रलाप शुरू करते हुए कहा था कि मानहानि पत्रकारिता को ख़त्म कर देगी। सवाल यह है कि अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए जहर उगलने वाले लोग पत्रकारिता शब्द से अपना नाम आखिर किस हैसियत से जोड़ लेते हैं? वास्तव में होना तो यह चाहिए कि ऐसे अनर्गल आरोप लगाकर अपनी TRP की दुहाई देने वाले लोगों को तो पड़ोसियों पर अपनी खुन्नस निकालने वाले लोगों की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए। जबकि, इसके विपरीत ये लोग पत्रकारिता के स्वघोषित मसीहा बन चुके हैं।

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि ‘बड़े नाम’ जब सोशल मीडिया पर लम्बे लेख लिखते हैं, तो हमें महसूस होना शुरू हो जाता है कि इतना टाइप करने वाला झूठ तो नहीं लिख रहा होगा। हमारे ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती एक लेख में बता चुके हैं कि ऐसे ही ‘प्रोपेगैंडाधीशों’ के ‘भगत’ कितने बड़े स्तर तक ब्रेनवॉश किए जा चुके हैं। वो अब खुलेआम कहने लगे हैं कि रवीश कुमार जैसे हठधर्मी लोग चाहे जो कुछ कहे हम उसे गलत मानेंगे ही नहीं।

समय आ गया है कि रवीश कुमार को उसी ऐतिहासिक काली स्क्रीन वाले स्टूडियो से यह घोषणा कर देनी चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता में जिस कूड़े के परोसे जाने की वो बात करते आए हैं, असल में उस कूड़े की फैक्ट्री खुद रवीश कुमार हैं। यह कूड़ा ‘द वायर’ से लेकर उनके ‘विश्वसनीय सूत्र’ व्हाट्सएप्प मैसेज, कारवाँ से होकर सीधे रवीश के प्राइम टाइम, ब्लॉग और फिर सोशल मीडिया से उड़ेला जाता है।

रवीश को अपने भगत-जनों पर पूरा यकीन रहता है कि अपनी कुटिल मुस्कान के साथ वो अगर पूरब दिशा को ‘हें-हें-हें’ के स्वर के साथ पश्चिम कह दें, तो उनके भगत-जन तुरंत छाती कूटते हुए सबको जाकर बता आएँगे कि आज से यही पश्चिम है, सुप्रीम कोर्ट चाहे कुछ भी कह दे उनको क्या?

द वायर के ‘सनसनीखेज’ खुलासे पर रवीश कुमार का सालभर पुराना सनसनीखेज पोस्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं –

कश्मीरियों पर हो रहा है अत्याचार, नहीं होगा ईद मिलन सेलीब्रेशन, ऐसा इतिहास में पहली बार: AMU

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की टीचर असोसिएशन ने कश्मीर की वर्तमान स्थिति का हवाला देते हुए ऐलान किया है कि उनके यहाँ इस वर्ष ईद-मिलन का कार्यक्रम नहीं आयोजित होगा। दरअसल, यूनिवर्सिटी की टीचर असोसिएशन का मानना है कि कश्मीर की जनता इस समय अप्रत्याशित दमन के दौर से गुजर रही है, तो उनके यहाँ उत्साह कैसे हो सकता है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक टीचर असोसिएशन ने कई मुद्दों पर बात करने के लिए बुधवार (28 अगस्त 2019) को एक मीटिंग रखी थी, जिसमें तमाम विषयों पर विमर्श हुआ। इसमें ईद-मिलन के कार्यक्रम का भी मुद्दा उठा। लेकिन जम्मू-कश्मीर के लोगों के प्रति एकता दिखाने के नाम पर इसे सेलीब्रेट नहीं करने का फैसला लिया गया ।

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार AMUTA के सेक्रेट्री नजमुल इस्लाम ने उनसे बातचीत में बताया कि यूनिवर्सिटी के इतिहास में ऐसा पहली बार है जब यहाँ पर ईद मिलन के सेलीब्रेशन को रोका गया।

उनकी मानें तो वे हर साल ईद मिलन, होली मिलन और एएमयू के स्टाफ के लिए वार्षिक भोज का आयोजन करते थे, लेकिन इस वर्ष उन्होंने कश्मीर के लोगों का साथ देने के लिए ईद मिलन का आयोजन नहीं किया।

नजमुल इस्लाम के मुताबिक “सरकार कह रही है, कश्मीर में हालात सुधर रहे हैं, लेकिन हमें अपने सूत्रों से पता चला है कि घाटी में लोग बहुत पीड़ा में हैं। जब वहाँ लोग सरकारी मशीनरी के हाथों अत्याचार का शिकार हो रहे हैं तो हम जश्न कैसे मना सकते हैं।”

यूनिवर्सिटी में बायोकैमेस्ट्री के टीचर नजमुल का कहना है कि घाटी में लोगों के पास पानी, खाना, दवाई कुछ नहीं है, क्योंकि सुरक्षाबल उन्हें उनके घर से बाहर नहीं निकलने दे रहे। वहाँ अस्पताल भी सुचारू रूप से काम नहीं कर रहे हैं।

इतनी सब बयानबाजी करने के बाद नजमुल इस्लाम कहते हैं कि उन्हें अनुच्छेद 370 के बारे में कुछ नहीं बोलना है, लेकिन हकीकत यही है कि भारत अपने मासूम नागरिकों को पकड़कर उन्हें जेल में डाल रही है। उनके मुताबिक जम्मू-कश्मीर में हर कैदखाना गिरफ्तारी से भर चुका हैं इसलिए अब लोगों को गिरफ्तार करने के बाद उत्तर प्रदेश भेजा रहा है।

अगर हम केवल मुस्लिमों बारे में सोचते तो तीन तलाक पर मोदी का सिर कलम कर देते: TMMK अध्यक्ष मोहम्मद शरीफ़

तमिलनाडु में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की हत्या की धमकी देने वाले एम मोहम्मद शरीफ़ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पेरम्बलूर जिले में बुधवार (28 अगस्त) को हुई इस गिरफ़्तारी के पीछे उनका 5 दिन पहले का भड़काऊ भाषण बताया गया है, जिसमें क्रमशः तीन तलाक और 370 के मुद्दे पर मोदी और अमित शाह की हत्या की धमकी दी गई थी। इस्लामिस्ट संगठन तमिलनाडु मुस्लिम मुन्नेत्र कळगम (TMMK) से जुड़े मोहम्मद शरीफ़ ने यह बयान पार्टी की नुक्कड़ सभा के दौरान पेरम्बलूर के लब्बैकुडिकाडु में दिया था

त्रिची स्थित मारसिंगपेट के रहने वाले शरीफ पर पुलिस ने निषेधाज्ञा उल्लंघन, लोकसेवक (प्रधानमंत्री, गृह मंत्री) को धमकी देने, शांति भंग और आपराधिक धमकी के आरोप लगाए हैं। उनके खिलाफ तमिलनाडु भाजपा ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। 25 अगस्त के अपने भाषण में शरीफ़ ने कहा था, “अगर हम केवल मुस्लिमों की सोच रहे होते, तो अमित शाह इस समय जीवित न होते, नरेंद्र मोदी जीवित न होते और संसद संसद न होती। लेकिन हमने ऐसा नहीं  किया। क्यों? क्योंकि हमारे अंदर भारत के कानून, लोकतंत्र और संविधान के लिए सम्मान है।” 

TMMK के अध्यक्ष एमएच जवाहिरुल्लाह ने शरीफ की  टिप्पणी की निंदा करते हुए जानकारी दी कि शरीफ को TMMK के मूल्यों का उल्लंघन करने के लिए मुख्यालय के वक्ता के पद से हटा दिया गया है। 

TMMK और उसकी समर्थक पार्टियाँ (जिनमें द्रमुक, माकपा, भाकपा जैसे बड़े दल शामिल हैं) मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहीं हैं। उपर्युक्त बड़े दलों के अलावा वीसीके, क्रिश्चियन गुडविल मूवमेंट जैसे छोटे संगठन भी इसमें शामिल हैं।

‘मायावती बिजली के नंगे तार जैसी, बीजेपी ने 3 बार CM बनाया, जान बचाई फिर भी धोखा दिया’

उत्तर प्रदेश के नवनियुक्त राज्य मंत्री गिरिराज सिंह धर्मेश ने बसपा सुप्रीमो मायावती पर तीखे हमले किए हैं। मायावती की तुलना बिजली के नंगे तार से करते हुए उन्होंने कहा है कि जो भी उनके करीब जाएगा उसका अस्तित्व ख़त्म जाएगा।

उन्होंने कहा, “मायावती बिजली के नंगे तार जैसी हैं। उन्हें जो भी छुएगा, मर जाएगा। भाजपा ने उन्हें तीन बार मुख्यमंत्री बनाया, उनकी जान बचाई लेकिन उन्होंने उसे धोखा दिया।” उन्होंने बसपा संस्थापक काशीराम की मौत पर भी संदेह जताया है। उन्होंने कहा, “काशीराम की मौत स्वभाविक नहीं थी। उनकी मौत संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई थी। वे मायावती की निगरानी में थे। काशीराम की बहन ने कहा था कि मायावती ने उनकी हत्या की है। मैं मुख्यमंत्री से इस मामले की सीबीआई जॉंच की गुजारिश करूंगा।”

धर्मेश आगरा छावनी से विधायक हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में वे समाज कल्याण तथा अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति कल्याण राज्यमंत्री हैं। बकौल धर्मेश मायावती विश्वसनीय नहीं हैं और उन्होंने सबको धोखा दिया है।

उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान सपा का इस्तेमाल कर उन्होंने 10 सीटें जीती और नतीजे आने के बाद उसे भी धोखा दे दिया। उनके अनुसार, मायावती के पास अब कोई विकल्प नहीं बच गया। उन्होंने जो अकूत संपत्ति जुटाई है उसकी जॉंच हो रही है। इससे डर कर उन्होंने अपने सुर बदले हैं। उल्लेखनीय है कि केंद्र की मोदी सरकार के प्रति ​हाल के समय में मायावती के रुख में नरमी देखी जा रही है।

पंजाब: 13 साल की बच्ची को अगवा कर दुष्कर्म करने वाला पादरी परवेज गिरफ्तार

पंजाब के गुरदासपुर में बुधवार (अगस्त 28, 2019) को पुलिस ने नाबालिग से बलात्कार के आरोप में एक पादरी को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद आरोपित पादरी को स्थानीय कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

पीड़िता की माँ के मुताबिक उनकी 13 वर्षीय बेटी 9वीं कक्षा की छात्रा है। जो स्कूल जाने के लिए मंगलवार (अगस्त 27, 2019) की सुबह घर से निकली थी, लेकिन दोबारा घर नहीं लौटी।

बच्ची के गायब होने से परेशान परिजनों ने इसकी सूचना पुलिस को दी और स्थानीय चर्च के पादरी परवेज पर शक जताया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने पादरी के घर में छापेमारी की और बच्ची को बरामद किया।

हालाँकि, छापेमारी से पहले परवेज लड़की के घर में होने की बात से इनकार कर रहा था। लेकिन जब पुलिस ने जाँच की तो पाया कि उसने लड़की को चारपाई के नीचे छिपा रखा था।

पुलिस ने तुरंत लड़की को वहाँ से निकाला और लड़की की माँ के बयान पर आरोपित पादरी परवेज के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया।

भूमाफिया आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ डकैती का भी मामला दर्ज, सपा नेता की बढ़ी मुश्किलें

समाजवादी पार्टी के नेता और रामपुर के सांसद आज़म खान का विवादों से गहरा नाता है। इसी कड़ी में अब वो एक नई मुश्किल में फँस गए हैं। भूमाफ़िया घोषित किए जाने के बाद अब आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ कोतवाली थाने में डकैती का मामला दर्ज किया गया है। आरोप के अनुसार, रामपुर पब्लिक स्कूल बनाने के नाम पर ज़मीन  लेकर पीड़ितों को दूसरी जगह बसाया गया। एक पीड़ित के मुताबिक़, उसे दूसरी जगह बसाने के बाद फिर से हटा दिया गया।

इस मामले में सरायगेट घोसियान के रहने वाले नन्हें नामक व्यक्ति ने FIR दर्ज कराई। नन्हें नाम के व्यक्ति और कुछ अन्य लोगों द्वारा शिक़ायत की गई थी, इसमें उन्होंने कहा कि पहले तो उन्हें लालच देकर उनकी ज़मीनें छीनी और उनका घर तोड़ दिया। इस दौरान लूटपाट और मारपीट को भी अंजाम दिया गया।

रामपुर के एसपी अजयपाल शर्मा ने FIR की पुष्टि करते हुए बताया,

“कुछ लोगों के द्वारा ये शिक़ायत की गई थी कि पहले उनको लालच दिया गया, कहा गया कि उनको दूसरी जगह विस्थापित किया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके घरों को तोड़ा गया, मारपीट की गई और सामान आदि को लूट लिया गया। प्रथम दृष्टया जाँच में ये मामले सही पाए गए हैं।”

एसपी ने बताया कि इस मामले में दो FIR दर्ज की गई हैं, जिनमें छ: लोगों को नामज़द किया गया है, इनमें सांसद आज़म खान, पूर्व सीओ आले हसन, फ़साहत शानू, वीरेंद्र गोयल, एसओजी का एक पूर्व सिपाही धर्मेंद्र आदि शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने बताया कि यहाँ एक स्कूल बनाया जाना था और इसी कारण से मकानों को तोड़ा गया।

एसपी ने कहा, “फ़िलहाल साक्ष्य का संकलन किया जा रहा है और जो बातें जाँच में सामने आएँगी उनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी।”

ग़ौरतलब है कि सपा नेता आज़म ख़ान पर किसानों की ज़मीन कब्जाने का आरोप भी लग चुका है। उनके ख़िलाफ़ क़रीब 30 मुक़दमें पहले से ही दर्ज हैं। इसके अलावा हाल ही में, उनके हमसफर रिसॉर्ट की दीवार पर बुलडोजर चलाया गया था। बता दें कि यह रिसॉर्ट उनके बेटे अब्दुल्ला के नाम पर था। रिसॉर्ट की दीवार तोड़ने के संदर्भ में सिंचाई विभाग ने पहले ही उन्हें नोटिस दे दिया था। जानकारी के अनुसार, अखिलेश सरकार में रिसॉर्ट की ज़मीन के लिए आज़म ख़ान ने सिंचाई विभाग के नाले की एक हज़ार वर्ग गज ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा था।

सपा नेता आज़म ख़ान पर ज़मीन हड़पने के अलावा, आलिया मदरसे से किताबें चोरी करने और रामपुर क्लब से शेरों की मूर्तियाँ चोरी करने का आरोप भी लगा है। पुलिस की कार्रवाई में आज़म की अली जौहर यूनिवर्सिटी में छापेमारी के दौरान मुमताज सेंट्रल लाइब्रेरी से चोरी की लगभग दो हज़ार किताबें और पांडुलिपियाँ ज़ब्त की थी। साथ ही कुछ एंटीक फर्नीचर भी ज़ब्त किया गया था।

पी चिदंबरम की गिरफ़्तारी से ख़ुश हूँ, अब कार्ति भी गिरफ़्तार होंगे: इन्द्राणी मुख़र्जी

इन्द्राणी मुखर्जी ने सरकारी जाँच एजेंसियों को आईएनएक्स मीडिया केस में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम के बारे में अहम जानकारियाँ दी थीं। इन्द्राणी इस केस में अप्रूवर बन गई और उनके ही बयानों के कारण पी चिदंबरम की गिरफ़्तारी का रास्ता साफ हुआ। इन्द्राणी ने चिदंबरम की गिरफ़्तारी पर ख़ुशी जताई है। बेटी की हत्या के आरोप में जेल में बंद इन्द्राणी ने पी चिदंबरम की गिरफ़्तारी को अच्छी ख़बर बताया। उन्होंने सेशन कोर्ट में मीडिया से बात करते हुए अपनी बात साझा की।

इन्द्राणी मुखर्जी ने आशा जताई कि कार्ति चिदंबरम की ज़मानत भी कैंसल कर दी जाएगी और वह गिरफ़्तार होंगे। इन्द्राणी ने कहा कि वो इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र रख रही थीं।

इन्द्राणी मुखर्जी और उनके पति पीटर मुखर्जी भी आईएनएक्स मीडिया केस में आरोपित हैं। फिलहाल दोनों ही शीना बोरा हत्याकांड के आरोप में जेल में बंद हैं। शीना इन्द्राणी और उनके पहले पति की बेटी थी। इन्द्राणी ने खुलासा किया था कि आईएनएक्स मीडिया को एफआईपीबी अप्रूवल दिलाने के बदले में चिदंबरम ने उन्हें अपने बेटे के व्यापार में मदद करने को कहा था। कार्ति चिदंबरम ने भी मुखर्जी दम्पति से रिश्वत की माँग की थी। एफआईपीबी क्लीयरेंस में हुई अनियमितताओं को ठीक काटने के लिए कार्ति पर 1 मिलियन डॉलर रिश्वत माँगने का आरोप है।

ज्ञात हो कि पी चिदंबरम को अगस्त 21, 2019 को उनके दिल्ली के ज़ोर बाग़ स्थित आवास से गिरफ़्तार किया गया था। गिरफ़्तारी के बाद कोर्ट ने उन्हें सीबीआई की कस्टडी में भेज दिया। बाद में उनकी कस्टडी की अवधि बढ़ा दी गई। इस तरह से अब चिदंबरम 30 अगस्त तक सीबीआई की कस्टडी में रहेंगे। उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए सीबीआई के अधिकारियों को उनके घर की दीवार लाँघनी पड़ी थी। अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज होने के बाद गायब चिदंबरम अचानक से कॉन्ग्रेस मुख्यालय के प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रकट हुए थे।

जुलाई 2019 में इन्द्राणी मुखर्जी आईएनएस मीडिया केस में अप्रूवर बनी थीं। उन्होंने माँग की थी कि अप्रूवर बनने और सबकुछ सही-सही खुलासा करने के लिए उन्हें सज़ा से माफ़ी दी जाए। 2007 में आईएनएक्स मीडिया को 307 करोड़ के विदेशी निवेश के लिए अप्रूवल मिला था। इस मामले में कार्ति चिदंबरम की भी गिरफ़्तारी हो चुकी है लेकिन उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया गया था।

‘कश्मीर भारतीय लोकतंत्र का आंतरिक मुद्दा, इस मसले पर इमरान का बयान भड़काऊ और बेहूदा’

हाल ही में पाकिस्तान के मुद्दे पर हुई बैठक में शामिल हुए अमेरीकी सांसद ने कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताया है और साथ ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को नसीहत दी कि उन्हें अब अपनी बयानबाजी को शांत करने की जरूरत है।

भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद रो खन्ना ने कहा, “कश्मीर भारतीय लोकतंत्र का आंतरिक मुद्दा है और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को अपने बयानों को शांत करने की जरुरत है एवं उन्हें भारत से युद्ध और संघर्ष को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।” उनकी मानें तो इमरान खान की ऐसी बयानबाजी बहुत हास्यास्पद है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रो खन्ना ने ये बात कैलिफोर्निया के फ्रीकमेंट में भारतीय-अमेरिकी समुदाय से मुखातिब होते हुए कही। उन्होंने इस दौरान इमरान खान द्वारा परमाणु युद्ध की धमकी को बेहूदा और नफरत से भरा बताया, साथ ही कहा कि इमरान खान अपने भड़काऊ बयानों में गुस्से को शांत करें और किसी विवाद या युद्ध की स्थिति को बढ़ावा न दें।

इसके अलावा बता दें कि सिलिकॉन वैली का प्रतिनिधित्व कर रहे रो खन्ना के साथ कार्यक्रम में मौजूद कश्मीरी मूल के लोगों ने गरीबी और आतंकवाद से लोकतांत्रित तरीके से समाधान को लेकर भारत सरकार की तारीफ की है। जिससे साफ़ हो गया है कि भले ही पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के पास पहुँचकर उलटी सीधी बयानबाजी कर रहा है लेकिन वास्तविकता में कश्मीरी मुद्दे पर अमेरिका में न केवल शीर्ष अधिकारी और नेता बल्कि वहाँ की आम जनता भी भारत के ख़िलाफ़ और पाकिस्तान के समर्थन में बोलने को तैयार नहीं हैं।