पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव से सोमवार (2 सितंबर) को इस्लामाबाद में भारत के उप उच्चायुक्त गौरव अहलूवालिया ने मुलाक़ात की। मुलाकात पाकिस्तान की एक उपजेल में हुई। अंतरराष्ट्रीय अदालत (आईसीजे) के आदेश के अनुसार पाकिस्तान ने जाधव तक राजनयिक पहुँच की दी है।
सूत्रों के अनुसार, 2 घंटे का समय जाधव से मिलने के लिए दिया गया था। जाधव को ईरानी बंदरगाह से अगवा कर पाकिस्तान ने जासूसी और आतंकवाद के जुर्म में 2017 में मौत की सज़ा सुनाई थी। इसके खिलाफ भारत ने आईसीजे का दरवाजा खटखटाया था। भारत की अपील को मानते हुए अंतरराष्ट्रीय अदालत ने सजा के तामील पर रोक लगा दी थी।
जाधव से मुलाक़ात से पहले, अहलूवालिया ने पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता मोहम्मद फ़ैसल से विदेश मंत्रालय में मुलाक़ात की। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता मोहम्मद फ़ैसल ने रविवार को ट्वीट कर जाधव को राजनयिक पहुँच उपलब्ध करने की जानकारी दी थी।
इससे पहले, पाकिस्तान ने एक अगस्त को भी जाधव को राजनयिक पहुँच देने की बात कही थी। लेकिन उस वक़्त राजनयिक पहुँच की शर्तो को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेदों के चलते ऐसा नहीं हो पाया था।
भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के लिए आज (सितंबर 2, 2019) बहुत महत्त्वपूर्ण दिन है। आज चंद्रयान-2 का लैंडर ‘विक्रम’ सफलतापूर्वक अपने ऑर्बिटर से अलग हो गया। इसरो से खुद ट्वीट करके इस बात की पुष्टि की।
#ISRO Vikram Lander Successfully separates from #Chandrayaan2 Orbiter today (September 02, 2019) at 1315 hrs IST.
इसरो ने अपने ट्वीट में जानकारी देते हुए बताया कि भारतीय समय के अनुसार लैंडर ‘विक्रम’ दिन में करीब 1 बजकर 15 मिनट पर अपने ऑर्बिटर से अलग हुआ। जिसके बाद अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इस अलगाव को मायके से ससुराल के लिए रवाना होने जैसा बताया।
ISRO: The Vikram Lander successfully separated from #Chandrayaan2 Orbiter at 1:15 pm today (September 2, 2019). The Vikram Lander is currently located in an orbit of 119 km x 127 km. The Chandrayaan 2 Orbiter continues to orbit the moon in its existing orbit. pic.twitter.com/YVnerza1wC
खुशी की बात ये है कि वैज्ञानिकों ने उच्च स्तरीय बैठक में लैंडर के अलग होने का जो समय बताया था ये अलगाव उसी समय पर हुआ है। इसरो के अनुसार लैंडर विक्रम इस वक्त चन्द्रमा की 119 किमीx127 किमी कक्षा में चक्कर लगा रहा है, वहीं चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर उसी कक्षा में चक्कर लगा रहा है जिसमें वो रविवार को दाखिल हुआ था।
#ISRO The final and fifth Lunar bound orbit maneuver for Chandrayaan-2 spacecraft was performed successfully today (September 01, 2019) at 1821 hrs IST.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसरो के वैज्ञानिकों ने रविवार को शाम 6:21 पर सफलतापूर्वक चंद्रयान-2 की कक्षा में बदलाव किया था। जो चाँद की कक्षा में पहुँचने के बाद से पाँचवा और अंतिम बदलाव था। इस बदलाव में महज 52 सेकंड का वक्त लगा। फिलहाल चन्द्रयान चाँद से महज 109 किलोमीटर की दूरी पर रह गया है।
अपने ऑर्बिटर से अलग होने के बाद लैंडर विक्रम अपने भीतर मौजूद प्रज्ञान रोवर को लेकर चाँद की ओर बढ़ने लगा है। 4 सिंतबर के बाद अगले तीन दिनों तक लैंडर विक्रम चाँद के सबसे नजदीकी कक्षा 35×97 में चक्कर लगाता रहेगा। इस बीच मे लैंडर और रोवर की जाँच चलती रहेगी। और इसके बाद 7 सिंतबर को तड़के 1:55 पर लैंडर विक्रम चन्द्रमा के साउथ पोल पर लैंड करेगा। इस लैंडिंग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इसरो के वैज्ञानिकों की टीम साथ देखेंगे। इस दौरान बंगलुरू स्थित इसरो के ऑडिटोरियम में देश भर से चुने गए 60 बच्चे और उनके अभिभावक भी मौजूद रहेंगे।
जानकारी के लिए बता दें कि इन 60 बच्चों का चयन इसरो द्वारा आयोजित एक ‘स्पेस क्विज़’ जीतने के बाद हुआ है। जिसे 10 अगस्त से 25 अगस्त के बीच आयोजित किया गया था। इसमें भाग लेने वाले सभी बच्चों को भागीदारी के लिए प्रोत्साहन सर्टिफिकेट दिए गए हैं। लेकिन चुनाव सिर्फ़ 60 का ही हुआ है।
चीन के बेल्ट एन्ड रोड से पर्यावरण को ख़तरा है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं और न ही कोई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान कह रही है। ऐसा ख़ुद चीन की ही एजेंसी ने अपनी रिसर्च में पाया है। चीन की एजेंसी का कहना है कि कम क़ीमत में लो-कार्बन मेथड अपनाने पड़ेंगे। कारण यह है कि चीन अभी भी इस आधुनिक मेथड की जगह पुरानी, प्रदूषण पैदा करने वाली तकनीक अपना रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया कि बीआरआई के तहत एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप में बंदरगाहों, रेलवे, सड़क और औद्योगिक पार्क का नेटवर्क बिछाने के लिए 126 देशों में खरबों डॉलर का निवेश होगा। इन परियोजनाओं के लिए चीन पर्याप्त धन मुहैया करा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक केवल बीआरआई योजना के कारण होने वाला कार्बन उत्सर्जन ही पेरिस जलवायु लक्ष्य को पटरी से उतार सकता है।
रिपोर्ट शिन्हुआ सेंटर फॉर फायनेंस एन्ड डेवलपमेंट सिंघुआ ने जारी किया है। वह चीन के नीति-नियंताओं को भी समय-समय पर सलाह देता रहा है। इस रिसर्च में उसके साथ लंदन की विविड इकोनॉमिक्स और अमेरिका की क्लाइमेट वर्क्स भी शामिल थी।
रिसर्च के मुताबिक बेल्ट एन्ड रोड में शामिल 126 देश दुनिया की 28% एमिशन के लिए ज़िम्मेदार हैं और 2050 तक ये आँकड़ा 66% तक चला जाएगा। रिसर्च टीम के मुखिया मा जून चीन के केंद्रीय बैंक के सलाहकार हैं। पेरिस एग्रीमेंट के दौरान यह लक्ष्य तय किया गया था कि कार्बन एमिशन को कम कर के तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने दिया जाए।
ताज़ा आँकड़ों को देखें तो कार्बन एमिशन का जितना लक्ष्य रखा गया है, यह उससे दुगुना बढ़ जाएगा। रिसर्च का कहना है कि डीकार्बनाइज करने की प्रक्रिया के लिए 12 ट्रिलियन डॉलर की ज़रूरत पड़ेगी। एक अन्य रिसर्च के अनुसार, चीन ने बेल्ट एंड रोड के तहत 67.9 गीगावाट कोयला आधारित बिजली में निवेश किया है, जबकि विंड और सोलर जैसे रिन्यूएबल एनर्जी की बात करें तो उसका सिर्फ़ 12.6 गीगावाट में ही निवेश किया गया है।
NEW: The 126 countries involved in China’s Belt and Road infrastructure initiative must slash $12 trillion worth of projects over the next decade, or risk greatly exacerbating global climate change. https://t.co/4fljJfLDD8
रिसर्च के अनुसार, अगर कार्बन एमिशन से बचना है तो 12 ट्रिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट्स की कटौती करनी पड़ेगी। बता दें कि बेल्ट एन्ड रोड चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना है और वह चाहता है कि भारत भी इसका हिस्सा बने।
गौरतलब है कि चीन विश्व का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक है और दुनिया में मानव जनित कार्बन उत्सर्जन में 30 फीसद योगदान उसी का रहता है।
मीडिया में ये बात ज़ोर-शोर से चल रही है कि जेएनयू ने रोमिला थापर से सीवी माँगी है। अगर उन्होंने अपना सीवी नहीं दिखाया तो उन्हें एमेरिटस प्रोफेसर के पद से हटा दिया जाएगा। वामपंथियों ने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि ये थापर का अपमान है। वहीं कुछ अन्य लोगों ने जेएनयू प्रशासन पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जेएनयू थापर से उनकी सीवी कैसे माँग सकता है? हालाँकि, उन्होंने इसका जवाब नहीं दिया कि जेएनयू ऐसा क्यों नहीं कर सकता।
One of the world’s greatest historians Romila Thapar had recently slammed the BJP govt for peddling myths to justify its Hindu Nationalist ideology. Now she is asked to show her CV for continuing as Professor Emeritus at JNU! pic.twitter.com/35TeAAQ67o
क्या रोमिला थापर के माथे पर सींग उगा हुआ है? क्या रोमिला थापर जेएनयू जैसे बड़े संस्थानों के नियम-क़ायदों से ऊपर हैं? क्या रोमिला थापर किसी संस्था में उसके नियम-क़ानून का पालन किए बिना बने रहना चाहती हैं। आख़िर रोमिला थापर के पास ऐसा क्या है कि जेएनयू उनके कहे अनुसार अपना काम करे? मीडिया आउटलेट्स ने यह भी लिखा कि किसी भी एमेरिटस प्रोफेसर से सीवी नहीं माँगी जाती और जानबूझ कर ऐसा किया गया है।
JNU asking Romila Thapar to submit a cv to JNU to continue her Professor Emerita status is worse than an insult, it is a crime against the values & principles of education & respect for intellectual merit. Can JNU sink any lower? https://t.co/mb9widqiNu
वामपंथी मीडिया गुट ने फासिज़्म का रोना रोया। उनका शायद मानना है कि लेफ्ट लिबरल प्रोफेसरों या कथित विशेषज्ञों की योग्यता पाए सवाल नहीं खड़े किए जा सकते और वे जो कह दें, वही दुनिया का अंतिम सत्य होता है।खैर, आप यह जान कर चौंक जाएँगे कि वामपंथियों के इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि जेएनयू प्रशासन द्वारा सीवी माँगने का निर्णय एक रूटीन प्रक्रिया है।
I’m no admirer of Romilla Thapar,but to humiliate her like this & eventually to try and strip her of JNU emeritus post makes @narendramodi look small,vindictive.Will govt relook all Padma awards etc also now? Give it a break, focus on jobs, growth, harmony https://t.co/ycXNC5wDzw
सिर्फ़ रोमिला थापर ही नहीं बल्कि 75 की उम्र पार कर चुके सभी एमेरिटस प्रोफेसरों से जेएनयू प्रशासन द्वारा उनकी सीवी माँगी गई है। जेएनयू ने कुल 25 प्रोफेसरों को आजीवन एमेरिटस प्रोफेसर की मान्यता दी है। अब यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इसकी समीक्षा करने का निर्णय लिया है। अधिकतर एमेरिटस प्रोफेसरों ने पिछले 3 वर्षों में एक बार भी यूनिवर्सिटी में उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है और न ही विश्वविद्यालय के अकादमिक कार्यों में कोई योगदान दिया है। ये रही सच्चाई:
एमेरिटस प्रोफेसरों को लेकर जेएनयू अपने नियम के मुताबिक ही कार्य कर रहा है
इसीलिए, जेएनयू की एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके सभी एमेरिटस प्रोफेसरों की सीवी माँगी है, ताकि उनकी समीक्षा की जा सके। यह जेएनयू के नियम-क़ानून के अंतर्गत किया जा रहा है। जेएनयू के नियम-क़ायदों के मुताबिक़ [Rule-32(g)], जब कोई एमेरिटस प्रोफेसर 75 की उम्र को पार कर जाता है तो यूनिवर्सिटी उनके स्वास्थ्य, उपस्थिति और क्रियाकलापों के आधार पर यह निर्णय लेगा कि उनको मिली मान्यता बरकरार रखी जाए या नहीं।
You can put your entire troll army and bots at work but it will still not be enough to stop any us from asking a simple question: JNU admin how low will you sink? As an admirer of Prof #RomilaThapar ‘s work this is unacceptable, it’s an insult of her deep intellect.
रोमिला थापर 87 वर्ष की हो गई हैं और 75 से ज्यादा उम्र वाले एमेरिटस प्रोफेसरों की समीक्षा होगी तो वह इस सूची में ऑटोमैटिक आ जाती हैं। फिर इतना हंगामा क्यों? क्या जेएनयू रोमिला थापर के लिए अपने नियम-क़ानून बदल ले? वामपंथियों की सोच यह है कि जेएनयू के पास दो नियम-क़ानून होने चाहिए। एक सामान्य लोगों के लिए और एक वामपंथी प्रोफेसरों के लिए।
ऊपर आपने जितनी भी ट्वीट्स देखी, उन सभी में गिरोह विशेष ने मोदी और जेएनयू द्वारा रोमिला थापर को परेशान करने का आरोप लगाया है, जिसकी सच्चाई हमने आपको बताई।
महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (एमएससीबी) घोटाला मामले में राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मुखिया शरद पवार के भतीजे और राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री अजित पवार को राहत देने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने पवार और 70 से अधिक अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के बंबई हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से सोमवार को इनकार करते हुए कहा कि जॉंच को रोका नहीं जा सकता।
जस्टिस अरुण मिश्रा और एमआर शाह की पीठ ने हाई कोर्ट के 22 अगस्त के आदेश के खिलाफ कुछ आरोपितों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। पीठ ने कहा कि यह घोटाला बहुत बड़ा है और इसकी जॉंच को रोका नहीं जा सकता।
Supreme Court today declined to entertain the Special Leave Petitions (SLPs) seeking to quash the investigation against NCP leader, Ajit Pawar and other accused, in a Maharashtra Co-operative bank scam. (file pic) pic.twitter.com/Ai0xx0qesJ
हाई कोर्ट के आदेश के बाद मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने अजित पवार के अलावा 76 अन्य लोगों के खिलाफ घोटाले को लेकर प्राथमिकी दर्ज की थी। कॉन्ग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार के दौरान अजित पवार 10 नवम्बर 2010 से 26 सितम्बर 2014 तक उप मुख्यमंत्री रहे थे।
एमएससीबी को 2007 और 2011 के बीच 1000 एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। इसको लेकर सामाजिक कायर्कर्ता सुरेंद्र अरोड़ा ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की पीठ ने कहा था कि मामले में आरोपियों के खिलाफ ‘ठोस साक्ष्य’ हैं।
भारत के लिए एक और खुशखबरी है। प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के अमेरिकी दौरे के दौरान बिल मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (Bill & Melinda Gates Foundation) द्वारा उन्हें स्वच्छ भारत अभियान के लिए उन्हें सम्मानित करेगा। यह जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री जीतेंद्र सिंह ने दी।
Another award,another moment of pride for every Indian, as PM Modi’s diligent and innovative initiatives bring laurels from across the world. Sh @narendramodi to receive award from Bill & Melinda Gates Foundation for #SwachhBharatAbhiyaan during his visit to the United States. pic.twitter.com/QlsxOWS6jT
उन्होंने ट्विट करते हुए लिखा है- “एक और पुरस्कार, हर भारतीय के लिए गर्व का एक और क्षण क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की मेहनती और उन्नतिशील पहल को दुनियाभर में प्रशंसा मिल रही है। उन्हें अमेरिकी दौरे के दौरान बिल मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन सम्मानित करेगा।”
PM नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन की नई दिल्ली, राजपथ पर शुरूआत करते हुए कहा था कि ‘एक स्वच्छ भारत के द्वारा ही देश 2019 में महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती पर अपनी सर्वोत्तम श्रद्धांजलि दे सकते हैं।’ 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत मिशन देश भर में व्यापक तौर पर राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में शुरू किया गया था। इस अभियान के अंतर्गत 2 अक्टूबर 2019 तक ‘स्वच्छ भारत’ की परिकल्पना को साकार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करने का मामला यूरोपियन पार्लियामेंट (ईपी) में भी उठा। दुनिया भर के देशों की तरह ही ईपी ने भी भारत सरकार के इस कदम का समर्थन किया है। यूरोपियन पार्लियामेंट के सदस्य टॉमस चेकोवस्की ने इसे भारत का आतंरिक मामला बताते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 खत्म होने से कश्मीर में आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने में मदद मिलेगी। टॉमस ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने को प्रधानमंत्री मोदी का आतंकियों के खिलाफ बड़ा फैसला बताया।
ईपी के मासिक अखबार ET टुडे में रविवार (सितंबर 1, 2019) को प्रकाशित खबर के मुताबिक, चेकोवस्की ने कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से कुछ आतंकी संगठन कश्मीर घाटी में आतंक फैला रहे हैं। ये सशस्त्र समूह जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक संगठनों से जुड़े या संबद्ध व्यक्तियों पर हमलों के लिए जिम्मेदार हैं। हाल में कम से कम राजनीतिक दल के 6 कार्यकर्ता और एक अलगाववादी नेता की हत्या में भी ये शामिल रहे हैं।
टॉमस ने आगे कहा कि कश्मीर में अक्टूबर 2018 में स्थानीय चुनावों के दौरान आतंकी हमलों की घटनाएँ सबसे ज्यादा हुई। जो नेता चुनावों में हिस्सा ले रहे थे, उन्हें धमकियाँ मिल रही थी। उन्होंने कहा कि ज्यादातर पाकिस्तानी आतंकी संगठन पीओके से ही संचालित हो रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र के रिपोर्ट का कहना है कि 1990 से लेकर अब तक कश्मीर में कई आतंकी संगठनों का उदय हुआ है। वर्तमान समय में चार बड़े आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिद्दीन और हरकत उल-मुजाहिद्दीन की सक्रियता सबसे ज्यादा है। इन सभी आंतकी संगठनों को पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त है।
जैन मुनि का मजाक उड़ाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। हाई कोर्ट ने संगीतकार व आम आदमी पार्टी के समर्थक विशाल डडलानी और रॉबर्ट वाड्रा के रिश्तेदार तहसीन पूनावाला को जैन समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था।
हाई कोर्ट ने 1 मई, 2019 को दोनों के खिलाफ हरियाणा पुलिस के FIR को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि उन्होंने कोई आपराधिक अपराध नहीं किया था।
ख़बर के अनुसार, अगस्त 2016 में, हरियाणा पुलिस ने दोनों के ख़िलाफ़ धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने के अपराध में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295-A, 153-A और 509 के तहत अंबाला छावनी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया था।
अगस्त 2016 में डडलानी ने हरियाणा विधानसभा को संबोधित करते हुए कुछ नग्न साधु के ‘कोलोस्डल आइडियल’ पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की थी। जैन समुदाय के लोग उनके इस ट्वीट पर आक्रोशित हो गए। स्थिति को क़ाबू में करने के लिए AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को माफ़ी तक माँगनी पड़ी थी। इस बीच, कॉन्ग्रेस समर्थक और रॉबर्ट वाड्रा के रिश्तेदार तहसीन पूनावाला ने भी जैन भिक्षु पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
तरुण सागर का बीते साल निधन हो गया था। वे दिगंबर समुदाय के जैन भिक्षु थे। ऐसे भिक्षु कपड़े नहीं पहनते हैं। बाद में डडलानी ने भी माफ़ी माँग ली थी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से जैन साधु से मुलाक़ात कर माफ़ी माँगी थी। वहीं, पूनावाला ने अपने ट्वीट पर कोई अफ़सोस न जताते हुए तर्क दिया कि उन्होंने कोई आपराधिक अपराध नहीं किया।
उत्तरप्रदेश के जौनपुर से ट्रिपल तलाक का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। अभी तक ट्रिपल तलाक से जुड़ी हर शिकायत में जहाँ हमें महिला के पीड़ित और दुखी होने की खबर मिलती थी, वहीं इस बार मुस्लिम युवक ने अपने इस कदम के पीछे अपनी आप बीती सुनाई है। साथ ही युवक ने कहा है कि वो अपनी बीवी को तीन तलाक देने के लिए सजा भुगतने को भी तैयार है।
31 अगस्त को दीवानी न्यायालय पहुँचकर शिकायत दर्ज कराने वाले इस शख्स ने पुलिस को बताया कि पिता और पत्नी को आपत्तिजनक अवस्था में देखने के बाद उसके पास ट्रिपल तलाक के अलावा कोई और चारा नहीं बचा था। और अब वह इसके लिए नए कानून के तहत सजा भुगतने को भी तैयार है। युवक की मानें तो उसे सबसे बड़ी सजा उसकी पत्नी ने दे दी है।
जनसत्ता में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम युवक की शादी 12 साल पहले हुई थी। लेकिन पिछले कई सालों से वह सऊदी अरब में रहकर पैसे कमाता था। कुछ समय पहले बीमार पड़ने की वजह से वह वापस जौनपुर लौट आया। घरवापसी पर उसे कई लोगों ने बताया कि उसकी पत्नी का उसके पिता से अवैध संबंध हैं।
हालाँकि, उस समय उसने अपने पड़ोसियों की नहीं मानीं। लेकिन बीते 25 अगस्त को वो किसी काम से वाराणसी गया और काम जल्दी खत्म होने के कारण रात में ही घर वापस आ गया। घर आकर उसने देखा कि उसकी पत्नी उसके अब्बू के साथ आपत्तिजनक अवस्था में हैं। जिसके बाद उसने अपनी पत्नी को तीन तलाक दे दिया।
इस घटना के बाद इस शख्स ने एसपी को प्रार्थना पत्र लिखकर अपनी पत्नी और पिता के ख़िलाफ़ केज दर्ज करने का आग्रह भी किया और कहा कि ट्रिपल तलाक पर बने नए कानून के तहत वह सजा भुगतने को भी तैयार है।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में युवक की पत्नी और पिता के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज होने के बाद भी उनपर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिससे परेशान होकर अब इस शख्स ने पुलिस कप्तान से मदद माँगी हैं।
हिन्दू राष्ट्र रहे नेपाल की राजशाही को उखाड़ फेंकने में राजीव गाँधी के सरकार की अहम भूमिका थी। भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने नेपाल में एक गुप्त ऑपरेशन चलाया था जिसका उद्देश्य पड़ोसी राष्ट्र में राजशाही हटाकर लोकतंत्र की स्थापना करना था। रॉ के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर अमर भूषण ने अपनी पुस्तक ‘इनसाइड नेपाल’ में लिखा है कि रॉ ने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि नेपाल में अराजक तत्व राजशाही-विरोधी अभियान का फ़ायदा नहीं उठाएँ।
जनता ने राजतंत्र की अधिकारों में कटौती करने एवं लोकतंत्र की स्थापना के लिए बड़ा अभियान चलाया था। राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली सरकार चाहती थी कि भारत इस कार्य में नेपाल की जनता का सहयोग करे। रॉ ने नेपाल के सभी राजनीतिक दलों व संगठनों के बीच एकता बनाए रखने के लिए मेहनत की। गुप्त ऑपरेशन के लिए रॉ के ईस्टर्न ब्यूरो के चीफ के रूप में भूषण ने भी अपना नाम जीवनाथन रख लिया था। इसी नाम से उन्होंने कई बहुत से लोगों को राजशाही के ख़िलाफ़ अभियान के लिए प्रशिक्षित किया।
नेपाल के राजा बीरेंद्र वीर विक्रम शाह देव पर कोई दबाव काम नहीं कर रहा था। इसके लिए भारत सरकार ने कूटनीतिक तरीके भी अपनाए लेकिन सब बेकार। इसके बाद भारत सरकार ने नेपाल में खाद्य पदार्थों की सप्लाई रोने का निर्णय लिया, ताकि राजा पर दबाव डाल कर जनता के प्रति जिम्मेदार बनाने के प्रयासों को बल मिले। नेपाल के राजा मदद के लिए चीन तक पहुँच गए थे। भारत कभी नहीं चाहता था कि पड़ोसी देशों में साम्राज्यवादी चीन का प्रभाव मजबूत हो।
इसके बाद भारत सरकार ने रॉ प्रमुख एके वर्मा को यह कार्य सौंपा। उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त अधिकारी जीवनाथन को यह दायित्व दिया। इसके बाद जीवनाथन नेपाल में राजशाही के पर कतर कर लोकतंत्र की स्थापना का प्रयासों में जुट गए। जीवनाथन ने सरकार को भरोसा दिलाया कि जो काम कूटनीतिज्ञ और राजनयिक न कर सके, वह कार्य रॉ कर दिखाएगी। इससे पहले रॉ की ईस्टर्न यूनिट को कभी महत्व नहीं मिला था।
रॉ ने माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड को लुभाने के लिए सारी ताक़तें लगा दीं ताकि वह राजशाही के ख़िलाफ़ लड़ाई में बाकी राजनीतिक दलों का साथ दें। प्रचंड आगे चल कर 2 बार (अगस्त 2016 – जून 2017, अगस्त 2008 – मई 2009) नेपाल के प्रधानमंत्री भी बने। कई बैठकों के उपरांत रॉ प्रचंड को मनाने में कामयाब हुआ था, क्योंकि वह छिप कर रहते थे और उन तक पहुँचना मुश्किल होता था। इस प्रक्रिया में महीनों लग गए।
जीवनाथन के साथ हुई एक बैठक में प्रचंड ने सवाल भी पूछा था कि नेपाल राजशाही के अंतर्गत रहे या फिर लोकतंत्र के, इससे भारत को आख़िर क्या मतलब है? खैर, ऑपरेशन ख़त्म होते ही जीवनाथन गायब हो गए। उन्होंने अपने अंतर्गत कार्य कर रहे लोगों से साफ़ कह दिया कि वे ऐसा समझें कि कोई जीवनाथन था ही नहीं। नेपाल के कई नेता जीवनाथन को खोजते हुए भटक रहे थे लेकिन जीवनाथन तो कोई था ही नहीं।