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मीडिया को सत्ता का गुंडा बताने वाले रवीश के 4P- प्रपंच, पाखंड, प्रोपेगेंडा, प्रलाप

“काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी, तेरी नाल सरोवर पानी।
जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास।”

कबीर के इस दोहे का अर्थ है- “नलिनी तुम क्यों नाहक कुम्हलाई जाती हो, तुम्हारी नाल सरोवर के पानी में है, तुम्हारी उत्पत्ति और निवास ही जल में है, फिर कुम्हलाने की वजह?”

मार्केटिंग में 4’P का कॉन्सेप्ट होता है और यह पूरा उद्योग इन्हीं 4’P’ के आसपास मंडराता रहता है। इसी तरह से रवीश कुमार ने भी कुछ ‘P/प’ ईजाद किए हैं- प्रपंच, पाखंड, प्रोपेगंडा और प्रलाप!

दिन रात इन 4P’s से घिरे होने के बावजूद रवीश कुमार हैं कि कुम्हलाए ही जा रहे हैं। रवीश को जितना जल्दी हो सके कबीर को पढ़ना चाहिए। चाहे तो वो सोशल मीडिया से समय बचा लें लेकिन उन्हें यह दोहा ज़रूर पढ़ना चाहिए।

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इंसान अपनी आँखों को अपनी ही हथेलियों से मूँदकर कहता है कि संसार में कितना अन्धकार है। अफ़सोस कि एक पुरस्कार, जो आजकल पुरस्कार कहलाए जाने के अलावा बाकी सब कुछ है, जैसे- एशिया का नोबेल या फिर ‘ऑस्कर’, भी कुछ नहीं बदल पाया। सुकून इतना है कि आजकल टीआरपी पर बवाल कम हो गया। लेकिन टीआरपी के आँकड़े इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं क्योंकि आजकल निराशा का कारण यह है कि उनके लाडले पाकिस्तान की चारों ओर फजीहत हुई है।

ट्रम्प और मोदी ताली दे रहे हैं, एक-दूसरे को सबके सामने चूँटी काट रहे हैं। उन्होंने ‘मान लिया’ था कि ‘बराक’ के बाद अमेरिका से यह नाता टूट जाएगा, लेकिन नए राष्ट्रपति तो मोदी को चूँटी काट रहे हैं। बिना किसी औपचारिकता के ही यह सब हो रहा है।

जब जब ट्रम्प-मोदी ताली मरते हैं, तब-तब दुनिया के एक कोने में एक ज़ीरो टीआरपी पत्रकार खुद को कहीं अँधेरे में बैठकर कोड़े मारता है। हालाँकि, इसका कोई ऑफ़ दी रिकॉर्ड सूत्र नहीं है, लेकिन फिर भी मैं ‘मानकर’ चल रहा हूँ कि वो ऐसा करते होंगे। क्योंकि यही तो उनके अनुसार पत्रकारिता है।

पत्रकारिता; यानी ‘मान लेना’। गणित के गुरूजी कक्षा छह में समझाते थे कि मान लो, यह है नहीं लेकिन मानना पड़ता है क्योंकि गणित ऐसे ही काम करती है। तब यह नहीं सोचा था कि एक दिन पत्रकारिता में भी यही गणित घुसकर सब कुछ भुसकोल कर देगी।

इसी तरह रवीश कुमार दैनिक कार्यक्रम के तहत काली स्क्रीन वाले स्टूडियो कहते हैं- “भगत जनों, ‘मान लीजिए।” उधर से जवाब में उनके सौ-साठ भगत-जन और ज्यादा ऊँची आवाज में कहते हैं- ‘मान लिया।’

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कितना सुखद अनुभव है कि रवीश कहते हैं और भगत-जन एक ही बार में बिना सवाल किए मान लेते हैं। फिर भी रवीश कहते हैं कि पत्रकारिता नहीं होने दे रहे हैं। इसी क्रम में आज के एक लेख में रवीश ने मीडिया को सत्ता का गुंडा बता दिया है।

इसका सीधा सा मतलब है कि जो आपके एकतरफा पत्रकारिता से सहमत नहीं है वो गुंडा है। चलिए एकबार फिर मान लेते हैं। यदि रवीश से असहमति मीडिया को गुंडा बनाती है तो सोचिए रवीश खुद कितने बड़े खलनायक हैं। उनकी बातों से तो सुप्रीम कोर्ट तक असहमति जता चुका है। कोर्ट कई बार रवीश कुमार से कह चुका है कि उन्होंने संसाधनों का समय बर्बाद किया है।

तो क्या सुप्रीम कोर्ट भी सत्ता का गुंडा है? क्या इस देश में अकेली जो आवाज लोकतंत्र की कहलाई जा सकती है वो रवीश कुमार द्वारा हवा में छोड़े गए तीर हैं? चाहे जस्टिस लोया केस हो या फिर NSA अजीत डोभाल और उनके बेटों को D-कम्पनी बताने का प्रपंच हो, रवीश के सभी इल्जाम झूठे निकल आए हैं। क्या उनके किसी भगत ने उनसे यह पूछा कि टीआरपी के लिए आपने इन सभी बेबुनियाद इल्जामों पर हमें यकीन करने को क्यों कहा?

रवीश कुमार खुद क्यों नहीं उस मीडिया का उदाहरण पेश कर देते हैं जिसकी वो कामना करते देखे जाते हैं?
खुद जिस रवीश कुमार का व्यवसाय दैनिक-प्रलाप और ‘4P’ बन चुका है, वह किस हैसियत से यह कह देता है कि मीडिया मर चुका है? एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार जिनकी टीआरपी सिर्फ उनका रोता हुआ चेहरा देखने की वजह से बढ़ती या घटती हो, वो जब अपने विष के लिए कश्मीर और अर्थव्यवस्था की आढ़ लेने लगे तो इसे सिर्फ कोरा प्रवचन कहते हैं।

अगर ऐसा न होता तो अर्थव्यवस्था से शुरू होने वाले रवीश के लेख मीडिया को कोसते हुए ख़त्म नहीं हो रहे होते।
चुनाव से ठीक पहले रवीश कुमार ने कहा था कि यह सरकार ‘इवेंट’ की सरकार है। हालाँकि, उनका यह तकिया-कलाम चुनावों में उनके मनमुताबिक नतीजे लाने में नाकामयाब रहा लेकिन फिर वो यही बात आज भी कहते सुने जा सकते हैं।

रवीश कुमार के लिए यह जानना आवश्यक है कि एक इवेंट की सरकार कॉन्ग्रेस की उन तमाम लोकसभाओं में से लाख बेहतर है जिसने अपनी जनता को वर्षों तक तुष्टिकरण और घोटालों के दलदल में डुबोकर रखा।

टीआरपी की तलाश में समाजवादी गुंडों के स्टेज पर चढ़ जाने को तैयार होने वाले रवीश कुमार को किसी को पत्रकारिता सिखाने की आवश्यकता नहीं है। उनका दैनिक रुदन देखकर तो इस समय यही लगता है कि अगर किसी को पत्रकारिता सीखने की जरूरत है तो वो खुद रवीश कुमार हैं।

वो हिंदी के दोषी हैं, वो पत्रकारिता के दोषी हैं, वो तमाम उन लोगों के दोषी हैं जिनके साथ वो अपनी कुटिल मुस्कान से रोजाना नए छल कर जाते हैं। वो लोगों को जागरूक करने से ज्यादा उन्हें भ्रम में रखने में यकीन करते हैं।

वो अपने स्टूडियो में बैठकर कहते हैं कि मोदी सरकार की मुद्रा योजना फेल है, जबकि आँकड़े इसके उलट कुछ और ही कह रहे हैं। वो कहते हैं कि स्वरोजगार का वादा इस सरकार का इवेंट है। जबकि ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण मैं स्वयं ये बात जानता हूँ कि मुद्रा बैंक और रोजगार सृजन से लेकर कौशल विकाश जैसे कार्यक्रमों ने देश के युवाओं और छोटे-बड़े व्यापारियों को एक बड़े हद तक प्रभावित किया है।

लेकिन रवीश ने अपने स्टूडियो में बैठकर सब कुछ तय कर लिया है। उन्होंने उसी बीजगणित के अध्याय की तरह सब कुछ अब ‘मान लिया’ है। इससे बड़ी हानि यह है कि वो चाहते हैं कि उनके इसी ‘मान लेने’ को बाकी लोग भी मान लें, जबकि उनका यह बीजगणित एकदम ऊसर है, इससे कुछ भी सृजन नहीं हो सकता है।

अर्थव्यवस्था का टेंशन छोड़िए रवीश बाबू, और उस टीआरपी पर ध्यान दीजिए जो आपको सोने, खाने से लेकर उठने-बैठने तक पर मोदी-स्मरण करवाने लगी है।

आपको कश्मीर का दर्द नहीं है आपका दर्द कश्मीर पर सरकार की होने वाली वाहवाही है। यह समय आत्म चिंतन का है। आपके एक कट्टर-भगत की आपसे यही माँग है। जितना जल्दी हो सके, लौट आइए, आपको कोई कुछ नहीं कहेगा।

दो साल में 65% घटा दिमागी बुखार, अब सड़क हादसों से दो-दो हाथ: योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया है कि उनकी सरकार के दो साल के कार्यकाल में दिमागी बुखार (Japanese Encephalitis) के मामलों में होने वाली मौतों में 65% कमी आई है। मालूम हो कि मार्च 2017 में राज्य की सत्ता संभालने के महज़ कुछ महीनों बाद अपने ‘गृह’-क्षेत्र गोरखपुर के बाबा राघव दास (BRD) मेडिकल कॉलेज में इस बीमारी से हुई मौतों पर योगी को काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। 2017 में इस बीमारी से 5400 लोग ग्रसित हुए, और 748 लोगों की मौत हो गई।

“1998 से लड़ रहा हूँ… पहली मीटिंग इसी पर की थी”

योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि राज्य के मुख्यमंत्री बनने के पहले से, 1998 से गोरखपुर के सांसद बनने के समय से वह इस बीमारी से लोगों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ का लगभग दो दशकों तक निर्वाचन क्षेत्र रहा (और धार्मिक तौर पर गोरखधाम मंदिर, जिसके वे मठाधीश हैं, के कारण उनका सन्यासी के तौर पर घर माना जाने वाला) गोरखपुर इस बीमारी का गढ़ माना जाता है।

इसके अलावा योगी ने दावा यह भी किया कि उन्होंने मुख्यमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद पहली मीटिंग दिमागी बुखार पर ही की थी, और अधिकारियों से इस बीमारी के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिए तत्काल कदम उठाने को कहा। “पहले encephalitis के मरीजों को नज़रंदाज़ कर दिया जाता था क्योंकि इसे एक अनजान बीमारी माना जाता था। उन्होंने बताया कि सरकारी विभागों को इससे निबटने के लिए संयुक्त कदम उठाने को कहा गया और लोगों को समझाया गया कि बचाव इलाज से बेहतर है।”

सड़क हादसे बन रहे महामारी

28 अगस्त को राजधानी लखनऊ के KGMU अस्पताल में ट्रॉमा शल्य चिकित्सा विभाग द्वारा Indian Society of Trauma and Acute Care (ISTAC) के तीन-दिवसीय सेमिनार को सम्बोधित करते हुए योगी ने सड़क हादसों की बढ़ती संख्या पर भी चिंता जताई। इसे “आजकल किसी महामारी से कम नहीं” करार देते हुए मुख्यमंत्री ने इन्हें रोकने के लिए सरकार के युद्ध-स्तर पर काम करने का भरोसा दिलाया। “मैंने खुद कई बार अंतर-विभागीय बैठकें बुलाईं हैं जिनका उद्देश्य सड़क हादसों को रोकना होता है।”

इससे निपटने के लिए उठाए जा रहे सरकारी क़दमों को गिनाते हुए योगी ने कहा कि सरकार लोगों को जागरुक करने के लिए अभियान चलाने के अतिरिक्त बस-ड्राइवरों की आँखों की जाँच और सड़कों पर साइनबोर्ड फिर से लगवाने का काम भी कर रही है।

देवी की साड़ियों पर अर्चक का अधिकार, फिर भी पुलिस ने किया झूठे आरोप में गिरफ्तार

हैदराबाद से सटे सिकंदराबाद स्थित संतोषीमाता मंदिर के अर्चक श्री बी रामशर्मा के पक्ष में राज्य के जाने-माने चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक सीएस रंगराजन उतर आए हैं। रामशर्मा को देवी की साड़ियाँ ‘चुराने’ के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। रंगराजन ने पोर्टल PGurus पर लिखे अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि न केवल मंदिर की धार्मिक परम्पराओं के अनुसार स्वर्ण-रजत (सोने-चाँदी) के अलावा बाकी चढ़ावे पर अंतिम अधिकार अर्चक का होता है, बल्कि इस परम्परा को Endowments Act का भी समर्थन है, जिसके अंतर्गत मंदिर की व्यवस्थाओं का संचालन होता है।

सहायक को “पकड़ा” था 42 साड़ियों के साथ

स्थानीय मीडिया के अनुसार रामशर्मा के सहायक बाबूराव को सावन के महीने में माता को चढ़ी 42 साड़ियाँ रामशर्मा के घर ले जाते हुए मंदिर के पूर्व अध्यक्ष राय वेंकटेश और ट्रस्टी राम मोहन ने “पकड़ा” था। उन्होंने गोपालपुरम थाने की पुलिस को बुला कर बाबूराव को उनके हवाले कर दिया था। साथ ही कुछ मीडिया पोर्टलों ने रिपोर्टिंग के सभी मानकों और मूल्यों का हनन करते हुए “आरोपित”, “accused” आदि का प्रयोग किए बगैर सीधे-सीधे रामशर्मा को “चोर” घोषित करते हुए शीर्षक से खबर चला दी थी।

Endowments Act, Section 144 के संशोधन को क्यों नहीं किया गया है लागू?

मामले में पुलिस और सरकार की ओर से अनियमितताओं की पूरी फेहरिस्त गिनाते हुए चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक सीएस रंगराजन ने हमला बोले है। उन्होंने जानकारी दी कि Endowments Act के Section 144 को बाकायदा संशोधित किया गया था, ताकि सोने-चाँदी के अतिरिक्त अन्य चढ़ावे पर अर्चक के धार्मिक अधिकार को विधिवत अमली जामा पहनाया जा सके। उन्होंने साथ में जोड़ा कि संशोधन में इसे हर मंदिर में लागू करने के तरीके को इस संशोधन के अनुमोदन के समय तय होना था, लेकिन कभी इस संशोधन को अमल में लाया ही नहीं गया। इसी से यह भ्रामक स्थिति उत्पन्न हुई है कि अर्चक को चढ़ावे की साड़ियों पर अधिकार तो है (कानूनी भी, और धार्मिक रूप से भी), लेकिन इस अधिकार के लिए विधिवत तरीका स्थापित नहीं है।

रंगराजन ने अर्चक पर झूठे आरोप को दुर्भाग्यपूर्ण और पुलिस के अधिकार-क्षेत्र के बाहर बताते हुए पुलिस पर उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने राज्य के Endowments विभाग से दो सवाल भी पूछे:

1) अगर कानून यह कहता है कि देवी को चढ़ाई गई साड़ियों पर अर्चक का अधिकार है तो क्या उन साड़ियों की चोरी का मुकदमा विभाग अर्चक रामशर्मा के खिलाफ करेगा?

2) क्या विभाग कम-से-कम अब जाकर मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों यानि अर्चकों की सेवा शर्तों पर स्थिति स्पष्ट करेगा?

रंगराजन ने अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों के तौर पर अर्चकों का ऐसा अपमान बिलकुल अस्वीकार्य है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत क्षमता और चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक की हैसियत के अलावा अपनी अध्यक्षता वाले Temples Protection Movement के तौर पर भी श्री बी रामशर्मा का निलंबन समाप्त करने और उनको उनके पद पर दोबारा ससम्मान स्थापित किए जाने की माँग की। साथ ही उन्होंने अर्चक को उनके द्वारा उठाई गई परेशानी के लिए मुआवजा दिए जाने की भी माँग की।

इसीलिए ज़रूरी है मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त करना

Endowments Act में हुए संशोधन को सरकारी तंत्र द्वारा अब तक न लागू करना ही इस स्थिति का कारण है, जहाँ एक बेगुनाह अर्चक को अपने कानूनी और धार्मिक अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए न केवल अपमानित होना पड़ रहा है, बल्कि जेल की हवा भी खानी पड़ रही है। यह मामला इस बात को और ज़्यादा रेखांकित करता है कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना क्यों ज़रूरी है।

गौरतलब है कि हिन्दू समाज 1954 में शिरूर मठ के जबरन अधिग्रहण के समय से इस बात को लेकर आंदोलनरत है कि हिन्दू मंदिरों में सरकारी हस्तक्षेप न हो; उन्हें वैसे ही स्थानीय और श्रद्धालु-संचालन के लिए दिया जाए जैसे ईसाईयों, मजहब विशेष आदि को यह आज़ादी है। इसी प्रकार की सरकारी उदासीनता के चलते होता यह है कि एक ओर मंदिरों की आय लाखों-करोड़ों (यहाँ तक कि कई बार अरबों) में होती है, और दूसरी ओर मंदिरों के पुजारी/अर्चक और अन्य स्टाफ को कई बार ₹750, ₹1000 से लेकर ₹10,000 जैसी नाकाफी ही नहीं बल्कि अपमानजनक राशियाँ वेतन के रूप में मिलतीं हैं।

इमरान खान की पूर्व पत्नी रेहम भी हुई मोदी की मुरीद, कहा- पाकिस्तान भिखारी जबकि उनकी दुनिया में है इज्जत

पाकिस्तान के कश्मीर प्रलाप के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पूर्व पत्नी का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो पाकिस्तान की नीतियों को कोस रही हैं जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ करते हुए नजर आ रही हैं।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पूर्व पत्नी रेहम खान पीएम मोदी की मुरीद हो गई हैं। वीडियो में उन्होंने अपने पूर्व पति और पाक के पीएम इमरान खान से पाकिस्तान की आर्थिक हालत को लेकर सवाल किया है।

इस वीडियो में रेहम कह रही हैं- “आज मोदी सरकार को क्यों लोग चाहते हैं और क्यों उनसे रिश्ते खराब नहीं करना चाहते हैं? क्योंकि उनकी इकॉनमी स्ट्रॉन्ग हो गई है। सऊदी ने वहाँ इन्वेस्ट किया है, यूके उनके साथ है, अमेरिका की उनमें दिलचस्पी है। जहाँ मोदी जाते हैं तो उनकी इज्जत होती है।”

वीडियो में आगे रेहम ने इमरान खान और पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए कहा, “मोदी को UAE में मेडल मिला है तो आपको तकलीफ हो रही है। आप भीख माँगते फिर रहे हैं। आप बताएँगे कि आप उनके पाँव की जूती हैं तो वो आपकी इज्जत कैसे करेंगे?”

यह वीडियो ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री वहाँ के लोगों से कश्मीर के लोगों के समर्थन में आने की फ़रियाद कर रहे हैं। जबकि हकीकत ये है कि जम्मू-कश्मीर मामले में दुनिया तो दूर की बात, खुद पाकिस्तानियों ने भी अपने प्रधानमंत्री इमरान खान की गप्पों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है।

इसका प्रमाण पाकिस्तान को इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई द्वारा बुलाए गए ‘Kashmir Hour‘ की असफलता है। न केवल ज़मीन पर पाकिस्तानी जनता में इसके प्रति ठंडी प्रतिक्रिया रही, बल्कि ट्विटर पर भी लोगों ने इसकी खिल्ली उड़ाई, जिसमें पाकिस्तानी भी शामिल रहे।

रेहम खान का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं-

रिटायर हो रहे हैं प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र, पीके सिन्हा बने OSD in PMO

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र ने रिटायर होने की तैयारी कर ली है। तब-नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री के अनुरोध पर रिटायरमेंट से बाहर आकर पदभार संभालने वाले मिश्र को 5 साल से प्रधानमंत्री के सबसे विश्वस्त अफसर, नौकरशाही में उनके आँख-कान माना जाता था। उनकी सेवानिवृत्ति की घोषणा खुद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्विटर पर की।

मोदी ने उनकी सार्वजनिक नीति और सार्वजनिक प्रशासन में दक्षता का विशेष उल्लेख करते हुए उनकी तारीफ़ की।

2 हफ्ते और रुकने का अनुरोध

सरकार के मुख्य प्रवक्ता सितांशु कर ने मीडिया को जानकारी दी कि मोदी ने उनसे दो सप्ताह और अपनी सेवाएँ जारी रखने का अनुरोध किया है। कुछ खबरों के अनुसार वे चुनावों के बाद ही जाना चाहते थे, लेकिन मोदी के अनुरोध पर उस समय उन्होंने तुरंत सेवानिवृत्ति की बात पर अधिक बल नहीं दिया। इस बीच मीडिया में पूर्व कैबिनेट सचिव पीके सिन्हा को प्रधानमंत्री द्वारा पीएमओ में विशेष दायित्व पर तैनात अफसर (OSD) नियुक्त किए जाने की खबरें भी आ रहीं हैं।

ऊर्जा सचिव, सबसे लम्बे तक कैबिनेट सचिव रह चुके हैं सिन्हा

OSD in PMO नियुक्त हुए पीके सिन्हा यूपी कैडर के अफसर हैं। अर्थशास्त्र में स्नातक और परास्नातक करने वाले सिन्हा ऊर्जा और जहाजरानी मंत्रालयों में सचिव भी रह चुके हैं। कैबिनेट सचिव के तौर पर 2017 और 2018 में एक-एक साल का विस्तार पाने के बाद जब उन्हें जून में तीसरा सेवा-विस्तार मिला तो वे भारत के इतिहास में सबसे अधिक समय तक सेवाएँ प्रदान करने वाले कैबिनेट सचिव बन गए थे।

कॉन्ग्रेस MLA से उनकी पत्नी ने कहा- ‘मेरे हसबैंड मुझे प्यार नहीं करते’, TikTok वीडियो वायरल

टिकटॉक (TikTOk) नामक मोबाइल एप्प लगातार युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रही है। लेकिन इस मोबाइल एप्प के आकर्षण से नेता भी अछूते नहीं रह गए हैं। ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है बिहार कॉन्ग्रेस MLA बंटी चौधरी और उनकी पत्नी का। जिसमें वो मशहूर कॉमेडियन सुनील ग्रोवर के गाने ‘मेरे हसबैंड मुझको प्यार नहीं करते’ पर एक्टिंग कर रहे हैं।

बिहार के जमुई में इन दिनों स्थानीय कॉन्ग्रेस MLA बंटी चौधरी का एक ऐसा ही वीडियो वायरल हो रहा है। इस वायरल वीडियो में सिकंदरा के विधायक अपनी पत्नी के साथ नजर आ रहे हैं जो शायद उन्होंने ही बनाया भी है।

इस वीडियो के बीच-बीच में विधायक बंटी चौधरी भी इसमें उनका साथ देते नजर आ रहे हैं।

बता दें कि इस वीडियो के वायरल होने के बाद कॉन्ग्रेस विधायक बहुत परेशान चल रहे हैं। विधायक ने दो लोगों पर आरोप लगाते हुए बताया कि जिन लोगो ने हैक कर वीडियो वायरल किया है वो हमारे विरोधी हैं। पर उनकी परेशानी कम नहीं हो रही है क्योंकि तमाम लोग विधायक सुधीर कुमार उर्फ बंटी चौधरी और उनकी पत्नी का टिकटॉक वीडियो सोशल मीडिया पर अभी भी फैला रहे हैं।

योग-वेदांत पढ़ाने वाले स्वामी तत्वबोधानंद की पीट-पीटकर हत्या, ड्रग्स-शराब का कर रहे थे विरोध

अपने घर के पास शराब और ड्रग्स का विरोध कर रहे पुडुचेरी के जाने-माने योग व गीता गुरु और वेदांत विद्वान स्वामी तत्वबोधानंद की मंगलवार-बुधवार (29 अगस्त, 2019) को अपने ही अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। स्वराज्य पत्रिका में स्थानीय मीडिया के हवाले से छपी खबर के अनुसार रात को हुई हत्या का खुलासा उनकी इमारत (गोकुलम अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स) के सिक्योरिटी गार्ड के सुबह आने पर हुआ। हत्यारों का अब तक कोई पता नहीं चला है। वहीं पुलिस के अनुसार यदि उसे समय पर सूचना मिल गई होती तो हत्यारों को जल्दी दबोचा जा सकता था। मिल रही जानकारी के अनुसार स्वामी तत्वबोधानंद अपने अपार्टमेंट के आस-पास ड्रग्स-शराब का विरोध कर रहे थे। पुलिस पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हत्या में उसी धंधे से जुड़े लोगों का हाथ तो नहीं है।

डर के मारे भागा गार्ड

गार्ड के अनुसार हत्या वाली रात वह अपार्टमेंट से ही जुड़ा कोई काम कर रहा था जब दो संदिग्ध शख्स जबरन घुस आए और उसके साथ गुंडागर्दी और दुर्व्यवहार करने लगे। अपने बयान के मुताबिक गार्ड अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़ा हुआ और एक पेट्रोल पम्प में शरण ली। जब वह सुबह लौटा तो अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स के दरवाज़े पर खून के धब्बे थे। अंदर जाकर उसने स्वामी जी की लाश देखी।

CCTV कैमरा क्षतिग्रस्त, पुलिस ने लगाई स्निफर डॉग टीमें

अपार्टमेंट का CCTV कैमरा भी क्षतिग्रस्त पाया गया, इसलिए पुलिस अन्य इमारतों और आसपास के अन्य CCTV कैमरों की फुटेज से हत्यारों की शिनाख्त करने की कोशिश कर रही है। घटनास्थल से फोरेंसिक नमूने इकट्ठे करने के अतिरिक्त पुलिस ने अपने स्निफर डॉग भी इस मामले की जाँच में लगा दिए हैं। हालाँकि, पुलिस ने इस मामले की जाँच के लिए दो टीमें गठित कर दीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि अगर हत्या की जानकारी और जल्दी मिल जाती तो हत्यारों को जल्दी गिरफ्तार करना आसान होता।

फर्जी खबर फैलाने पर ‘The Hindu’ की पत्रकार को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने ट्विटर पर लताड़ा

कश्मीर को लेकर फर्जी खबर फैलाने के आरोप में एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने ‘द हिंदू’ की पत्रकार विजयता सिंह (Vijaita Singh) को सोशल मीडिया पर जमकर लताड़ा। पुलिस अधिकारी ने झूठे दावे वाली द हिंदू की रिपोर्ट पर विजयता को जवाब देते हुए न केवल उनके काम पर सवाल उठाया बल्कि उन्हें पूरे मामले की हकीकत से भी रूबरू करवाया और कहा कि वह पुलिस को काम सिखाने से अच्छा है अपने काम पर ध्यान दें।

दरअसल, घोषित वामपंथी अखबार द हिंदू की पत्रकार विजयता ने ट्विटर पर एक रिपोर्ट शेयर करते हुए दावा किया कि 5 अगस्त से अब तक 36 कश्मीरी पैलेट घावों का शिकार हो चुके हैं। विजयता ने अपनी बात को साबित करने के लिए इस रिपोर्ट में वरिष्ठ सरकारी सूत्रों का हवाला दिया। लेकिन उन्होंने इस रिपोर्ट में किसी अधिकारी का नाम नहीं बताया। उन्होंने बस हवा में दावा कर दिया कि सुरक्षाबलों ने 36 लोगों को प्रदर्शन के दौरान घायल किया।

इस रिपोर्ट के शेयर करने के कुछ देर बाद जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन ने उन्हें दो टूक रिप्लाई दिया और बताया कि जिन लोगों के घायल होने की बात विजयता अपनी रिपोर्ट में कर रही हैं, वह हकीकत में अपने घर में नहीं थे बल्कि घर से बाहर थे। वो आदेशों की अवहेलना कर रहे थे, कानून को अपने हाथ में ले रहे थे, साथ ही गलत ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे और लोगों को उकसा रहे थे।

इसके बाद प्रणव महाजन ने अपने ट्वीट में विजयता पर ये भी आरोप लगाया कि वह कश्मीर के हालातों पर भ्रामक रिपोर्ट लिखने के लिए जानबूझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ रही हैं, जो काफी दुखद है।

मुमकिन था सोशल मीडिया पर एक पुलिस अधिकारी से इतना सुनने के बाद कोई अन्य पत्रकार अपने को सही साबित करने के लिए सबूत पेश करता। लेकिन विजयता ने तो उचित आँकड़े पेश करने की बजाए पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन से कहा कि उन्होंने जो संख्या बताई है वो सटीक है और आधिकारिक सूत्रों द्वारा दी गई है। इसलिए अगर उनको (प्रणव) दिक्कत है तो वो सफाई के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार से संपर्क करें। न कि किसी पत्रकार को कोसें। इसके बाद विजयता यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने आगे लिखा , “तुम पुलिस वाले हो, काम पर जाओ, 9:30 बजे रहे हैं।”

जिसपर प्रणव महाजन ने बड़ी सभ्यता के साथ जवाब देते हुए कहा, “इस ट्वीट से पता चलता है कि आप हमारे काम को लेकर कितनी चिंतित हैं, लेकिन ये 9:30 उनके लिए बज रहे हैं जो सोते हैं, उठते हैं और नाश्ता करते हैं। हम ये सब नहीं करते क्योंकि हमें बाहर रहकर लोगों का ध्यान रखना होता है। यहाँ नहीं का मतलब कुछ नहीं हैं। मैं पहले ही घर से बाहर हूँ। आप कृपया करके हमें बताने से अच्छा है आप अपना काम करें।“

गौरतलब है कि इन दिनों कश्मीर के हालातों पर प्रोपेगेंडा परस्त खबरे फैलाने में ‘द हिंदू’ सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभा रहा है। क्योंकि विजयता सिंह से पहले फर्जी खबर फैलाने के लिए द हिंदू की नेशनल एडिटर सुहासिनी हैदर पर भी इल्जाम लगे थे।

काश! कश्मीर में दंगे हो जाते, घरों में आग लगाई जाती, सैकड़ों लोग मारे जाते! कितना मजा आता…

कश्मीर घाटी की आबादी है लगभग सत्तर लाख। जम्मू-कश्मीर-लद्दाख को मिला दें तो 2011 की जनसंख्या लगभग सवा करोड़ की है। केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर से अनुच्छेद 370 के शक्तिहीन बनाने और 35A को हटाने के बाद, बीते दिनों से शांति बहाल करने के प्रयासों के तहत सरकार ने एहतियातन सुरक्षा बलों को तैनात किया हुआ है और कई इलाकों में फोन व इंटरनेट की सुविधा बंद कर रखी है।

ऐसा करना बहुत लोगों को मानवाधिकारों का उल्लंघन लगता है, जो कि लगेगा भी अगर आपको कश्मीर के हालात की जानकारी नहीं है। आप कल्पना कीजिए कि केन्द्र सरकार के फैसले के बाद वहाँ सुरक्षा बल नहीं होते, इंटरनेट और फोन चालू रहते और लोगों की आवाजाही पर कोई नियंत्रण न होता, तो क्या होता। अगर कल्पना करने में समस्या हो रही है तो आप उन दिनों की याद कीजिए जब हर शुक्रवार को पत्थरबाजी होती थी। याद कीजिए सेना के अफसरों द्वारा दिए गए आँकड़ों को जब वो बताते हैं कि हर साल लगभग 200 आतंकी मारे जा रहे हैं। फिर याद कीजिए कि इन सारे आतंकियों में 83% वो थे जो पत्थरबाजी किया करते थे।

अब याद कीजिए कि ये आतंकी क्या करते थे, वो भी तब जब कोई धारा 144 नहीं थी, कर्फ्यू नहीं था। इन्होंने ईद के लिए घर लौटते कश्मीरी जवान मंजूर अहमद बेग को नहीं मारा? या रायफलमैन औरंगजेब अपने आप किडनैप हो गए और उन्होंने आत्महत्या कर ली? ये भी तो कश्मीर के ही थे, इस्लाम के अनुयाई ही थे, ईद पर घर आए थे, फिर इनके मानवाधिकारों का क्या? गिनाने पर आ जाऊँ तो और भी नाम गिना सकता हूँ लेकिन आप मेरा इशारा समझ गए होंगे।

जब आपको पता हो कि एक फैसले से, जो एक बड़ी जनसंख्या के लिए लाभकारी होगी, लेकिन कुछ मुट्ठी भर आतंकी और अलगाववादी एवम् राजनैतिक अस्तित्व गँवाते नेता इस फैसले को आधार बना कर उपद्रव करेंगे और लाशें गिराएँगे, तो आप वृहद समाज की सुरक्षा के लिए क्या उन्हें महीने भर के लिए थोड़ी तकलीफ उठाने नहीं कह सकते? क्योंकि दूसरा उपाय नहीं है इसलिए, इन कश्मीरियों को, बिना किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाए, सरकार ने कुछ लोगों के आतंकी मंसूबों को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ सावधानियाँ बरती हैं। ये मानवाधिकारों का हनन नहीं है, ये मानवों को बचाना है ताकि महीने भर बाद जब स्थिति सामान्य हों तो वो भारतीय संविधान की छाया में अपने नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें।

मानवाधिकारों का हनन वह भी है जब बहुत बड़ी जनसंख्या को आतंकियों के खौफ में रहना पड़ता है। यहाँ तो सड़कों पर खड़ी पुलिस या सेना से आपको किसी भी तरह का डर तो नहीं है कि अपनी बात मनवाने के लिए वो आपको किडनैप कर लेंगे और कहीं कोने में ले जा कर गोली मार देंगे। मानवाधिकारों का हनन क्या होता है वो जा कर सीरिया में, लीबिया में, कई और इस्लामी देशों में, तानाशाही शासनों में, चीन में जा कर पता कीजिए। फोन लाइन बंद होना और इंटरनेट न चलना मानवाधिकारों का हनन नहीं है। अगर ऐसा करने से कुछ लोगों की जान बचती है, तो वो ही समझदारी है।

दिल्ली, लंदन और अमेरिकी मीडिया क्यों फैला रही है झूठ 

हाल ही में बीबीसी कश्मीर के दो लोगों से बातचीत करते हुए, साढ़े आठ बजे सुबह अपने हेडलाइन्स में भारतीय सेना द्वारा क्रूर टॉर्चर के आरोपों की बात करती दिखी। बीबीसी ने कहा कि उन्होंने ढूँढ निकाला कि ऐसा हो रहा है। और भारतीय सेना द्वारा टॉर्चर की खबरों की पुष्टि करने के लिए इन्होंने बात की एक आतंकी के भाई से, और एक अन्य व्यक्ति से। सवा करोड़ लोगों में दो लोगों से बात करते हुए, बीबीसी ने इसे हेडलाइन बना कर चला दिया और इसकी सत्यता की पुष्टि के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

इसके बाद अमेरिकी मीडिया में वाल स्ट्रीट जर्नल ने यह लिख डाला कि कश्मीर में अस्पताल कब्रगाहों में तब्दील होते जा रहे हैं। लिखने की वजह एक कथित ‘हेल्थ क्राइसिस’ थी जो कि इनके पत्रकारों के हिसाब से सरकार द्वारा उठाए कदमों के कारण दवाइयों में सप्लाय की कमी के कारण लोगों के मरने के रूप में दिख रही थी।

इसके पहले प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने ऐसी ही बेहूदी रिपोर्ट चला दी जिसमें यह कहा गया कि कश्मीर में जीवनरक्षक दवाइयों की कमी होती जा रही है। इसका संज्ञान श्रीनगर के डीएम श्री शाहिद चौधरी ने लिया और लिखा कि ऐसी संवेदनाएँ तो ठीक हैं लेकिन पूरे प्रदेश में किसी भी दिन दवाइयों ती कोई कमी नहीं हुई, न ही सप्लाय में किसी भी तरह की समस्या आई। अगर किसी को कोई परेशानी है तो व्यक्तिगत मामलों के बारे में भी मदद के लिए वो उपलब्ध हैं।

इस पर ‘वायर’ के ‘लायर इन चीफ’ अपने रिपोर्टर के पक्ष में बोलने लगे कि उसकी रिपोर्टिंग सारी बातों को सामने लाती है। ‘द वायर’ और सिद्धार्थ वरदराजन जैसे लोगों के साथ समस्या यह हो गई है कि न तो इनके लिखे पर लोगों का कोई विश्वास है, न ही कोर्ट का। हाल ही में इनकी पत्रकारिता को न्यायालय ने ‘यलो जर्नलिज्म’ यानी सनसनी फैलाने वाली कहा था। इसलिए वरदराजन सड़क पर माइक ले कर भी चिल्लाते रहें कि उनके प्रोपेगेंडाबाज रिपोर्टर ने सच लिखा है, कोई विश्वास नहीं करेगा। खास कर तब, जब डीएम शाहिद चौधरी स्वयं ही ऐसे प्रोपेगेंडा को काट रहे हों।

इसके बाद, इसी विषय पर जम्मू-कश्मीर के पुलिस अधिकारी श्री इम्तियाज हुसैन ने वाल स्ट्रीट जर्नल की खबर पर ट्वीट करते हुए कहा कि ये पूरी तरह से एक प्रोपेगेंडा यानी झूठी कहानी गढ़ी गई है कि कश्मीर के अस्पताल कब्रगाह में बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि कश्मीर के सारे अस्पताल सामान्य रूप से काम कर रहे हैं, और दवाई आदि की कोई कमी नहीं है।

‘हेल्थ क्राइसिस’ की खबरों को गढ़ना एक सुनियोजित षड्यंत्र

आपने सोचा है कि अचानक से विदेशी मीडिया को इसमें इतनी रुचि क्यों होने लगी? इनके नाम पढ़ेंगे तो आपको जवाब मिल जाएगा कि ये आदत से मजबूर मीडिया संस्थान हैं जिन्होंने भारत को लेकर हमेशा नकारात्मक खबरें फैलाई हैं। इनका उद्देश्य हर तरह से भारत को ऐसे दिखाना है जैसे यहाँ किसी तानाशाह का शासन चल रहा है और यहाँ की सेना किसी कॉन्गो या इथियोपिया जैसे देश की बेलगाम सेना की तरह सामूहिक नरसंहार में व्यस्त है। इसीलिए बीबीसी और अल जजीरा जैसे लम्पट मीडिया वाले भारतीय सेना को दस हजार लोगों के ऊपर पैलेट गन चलाते दिखा देते हैं।

चूँकि सेना द्वारा अत्याचार की खबर चल नहीं पाई, कोई सबूत मिल नहीं पाया, न कोई सत्यापित विडियो है, न ही किसी तरह की मानवाधिकारों के उल्लंघन की सही खबर, तो अब ये कल्पनाशीलता के आधार पर ये मान कर चल रहे हैं कि कश्मीर में तो स्वास्थ्य समस्या पैदा हो गई है, और लोग दिन-रात मर रहे हैं। इसीलिए, अब मानवाधिकारों की बात को साइड में ‘मिलिट्री क्लेम्पडाउन’ कहते हुए फोकस इस बात पर शिफ्ट किया जा रहा है कि लोग मर रहे हैं क्योंकि दवाई नहीं है।

जबकि सोचने की बात यह है कि जब केन्द्र सरकार इतना बड़ा फैसला ले रही थी, और हजारों की संख्या में जवानों को सुरक्षा व्यवस्था को नियंत्रण में रखने के लिए भेज चुकी थी, पेट्रोल पंप में महीने भर के तेल और सरकारी संस्थानों में राशन से लेकर ईद के लिए बकरे तक का इंतजाम कर रही थी, तो क्या सरकार स्वास्थ्य जैसी सुविधा के लिए तैयार नहीं रही होगी?

श्रीनगर के डीएम शाहिद चौधरी को लगभग हर सप्ताह लिखना पड़ रहा है कि इन झूठी खबरों पर विश्वास न करें, यहाँ स्थिति नियंत्रण में है और किसी भी तरह की हेल्थ क्राइसिस नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ परेशानियाँ ज़रूर हैं जो कि केन्द्र के फैसले के बाद सुरक्षा के लिहाज से जन्मी हैं, लेकिन उसे क्राइसिस नहीं कह सकते। उन्होंने कहा कि लोगों को इन विदेशी मीडिया पर विश्वास होगा और स्थानीय डीएम की बातों को शायद वो गंभीरता से न लें, लेकिन वो हर व्यक्ति की हर संभव मदद को तत्पर हैं।

उन्होंने फिर कुछ आँकड़े दिए जिसमें अलग-अलग अस्पतालों में हुई सर्जरी आदि का ब्यौरा है। उन्होंने बताया कि ये आँकड़े पिछले महीने के औसत के हिसाब से मेल खाते हैं। यानी कि किसी भी तरह की समस्या नहीं है जैसे कि वाल स्ट्रीट जर्नल ने लिख दिया कि लोग हर रोज मर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की रिपोर्टिंग से उन्हें दुःख होता है क्योंकि कुछ परेशानियों से इन्कार नहीं है लेकिन इसे इस तरह से प्रस्तुत करना बहुत ही गलत है।

प्रोपेगेंडा मशीनरी का यही काम है

जब मोदी सरकार ने यह फैसला लिया तो विरोधियों की संख्या दिन-ब-दिन घटती ही चली गई। शुरु में विरोध करने वालों के सुर बदलने लगे कि बाँटना तो ठीक है लेकिन तरीका गलत है। ये बातें भी बस कहने के लिए कही जाती हैं क्योंकि ‘तुमने आम खा लिया वो ठीक बात है लेकिन उसे छीला गलत तरीके से’ कहना बकैती है, तर्क नहीं। कॉन्ग्रेस वाले भी इस पर विभाजित दिखे और जो समझदार थे, उन्होंने जनता का रुख देखते हुए, गोल-गोल बात करते हुए स्थिति को अतंतः स्वीकार ही लिया।

मीडिया के गिद्धों को लगा था कि जो दंगे और रक्तपात मोदी के पहले कार्यकाल में नहीं हुआ, योगी के आने पर नहीं हुआ, मोदी के दूसरी बार आने पर नहीं हुआ, वो इस बार शायद हो जाए क्योंकि बात कश्मीर की है। लेकिन सरकार और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सूझबूझ के कारण किसी भी तरह की बड़ी हिंसा की घटना नहीं हुई। कुछ लोगों के मरने की खबर आई हैं जो कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों का शिकार बने। कहीं किसी ट्रक चालक नूर मोहम्मद पत्थरबाजों का शिकार हुए तो कहीं दो गुर्जर भाइयों को आतंकियों ने हाथ-पाँव बाँध कर बेरहमी से मार डाला।

यानी, जो सोचा गया था कि आंतरिक सुरक्षा के मामले में सरकार फँस जाएगी, वहाँ भी ऐसे ही निर्दोष नूर मोहम्मद या अहमद और कादिर को आतंकियों ने मारा। अपने ही कश्मीरी लोगों को, कश्मीर के आतंकियों ने मारा क्योंकि उनके हाथ बँध चुके हैं। सेना इन आतंकियों को करियर बनाने से पहले ही जहन्नुम भेज रही है, तो बिलबिलाहट में ये किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या कर दे रहे हैं। जिहाद की राह में निर्दोषों की हत्या करना कश्मीरी आतंकियों के लिए कोई पहली घटना नहीं है।

इसलिए, प्रपंच फैलाया जा रहा है कि अस्पतालों में लोग मर रहे हैं, जीवनरक्षक दवाइयाँ नहीं हैं। आप सोचिए कि आखिर यही चार-पाँच मीडिया वाले, इसी एक तरह की रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हैं? आखिर दो लोगों के बयान के आधार पर पूरी सेना को बर्बर कहने की रिपोर्टिंग का लक्ष्य क्या है? अमेरिकी अखबार को भारत के एक हिस्से के अस्पतालों पर झूठ लिखने की क्यों जरूरत पड़ती है?

आखिर कश्मीर के मुद्दे को कट्टरपंथियों का मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? कश्मीर का मुद्दा अगर कुछ है तो वो है गिलगिट बल्तिस्तान का, पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर का, जहाँ से लोग पाकिस्तानी सेना द्वारा गायब कर दिए जाते हैं, आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, ज़िन्दगी कठिनाइयों से भरी हुई है। लेकिन वहाँ की रिपोर्टिंग करने में न तो बीबीसी को रुचि है, न वाल स्ट्रीट जर्नल को। आप सोचिए कि इन चार-पाँच निर्दोष कश्मीरियों की हत्या का, जिनके लाशों की फोटो हर जगह हैं, उसके ऊपर बीबीसी की रिपोर्टिंग, इन-डेप्थ एनालिसिस क्यों गायब है? आप सोचिए कि ‘द वायर’ ने आज तक कश्मीरी आतंकियों द्वारा ली जा रही जानों पर कोई वैचारिक स्तंभ क्यों नही लिखे?

सोचिए… सोचते रहिए… जवाब नहीं मिलेगा क्योंकि प्रोपेगेंडा पत्रकारिता में खबरें गढ़ी भी जाती हैं, दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को सामान्यीकृत उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, एक हिस्से को ही दिखाया जाता है, भविष्य में क्या हो सकता है उसकी नकारात्मक काल्पनिक रिपोर्टिंग होती है, ‘लोगों में डर का माहौल है’ कह कर लोगों को डराया जाता है, अपनी एक खबर के लिए कुछ लोग चाहते हैं कि दस-पचास लोग सड़क पर दंगे में मारे जाएँ ताकि वो आधे घंटे में सरकार, सेना या हिन्दू सवर्णों को इसका जिम्मेदार बता सकें।

दलित, महिला या नाबालिग का जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर होगी 2 से 7 साल की सजा

हिमाचल प्रदेश में अब जबरन धर्मांतरण पर रोक लगेगी। इस बिल को बृहस्पतिवार (अगस्त 29, 2019) को हिमाचल प्रदेश के CM जयराम ठाकुर ने सदन के पटल पर रखा था। मानसून सत्र के दौरान शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को सदन में धर्म की स्वतंत्रता विधेयक-2019 को पारित कर दिया गया। शुक्रवार को विपक्षी दल कॉन्ग्रेस के विरोध के बीच पारित कर दिया गया है।

चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि नया कठोर कानून इसलिए जरुरी हो गया था क्योंकि खासकर रामपुर और किन्नौर में जबरन धर्मांतरण बढ़ता जा रहा है। यह विधेयक हिमाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम-2006 का स्थान लेगा। नए कानून के तहत सात साल तक की कैद का प्रावधान है, जबकि पुराने कानून में तीन साल की कैद की सजा की व्यवस्था थी। अलग-अलग वर्गों और जातियों के लिए यह प्रावधान किए गए हैं।

यह विधेयक बहकाने, जबरन, अनुचित तरीके से प्रभावित करने, दबाव, लालच, शादी या किसी भी धोखाधड़ी के तरीके से धर्म परिवर्तन पर रोक लगाता है। यदि कोई भी शादी बस धर्मांतरण के लिए होती है तो वह इस विधेयक की धारा 5 के तहत इसे अमान्य माना जाएगा।

इस विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कॉन्ग्रेस विधायक आशा कुमारी, सुखविंदर सुखु, जगत सिंह नेगी और एकमात्र माकपा विधायक राकेश सिंह ने कुछ प्रावधानों में बदलाव की माँग की। सुखु के सुझाव पर जवाब देते हुए ठाकुर ने कहा कि 13 साल पुराना कानून इतना प्रभावी नहीं था। क्योंकि पुराने कानून में महज आठ धाराएँ हैं, तथा उसमें करीब दस और धाराएँ जोड़ना बेहतर नहीं होता।

मूल धर्म में वापसी के लिए कोई शर्त नहीं

इस विधेयक के अनुसार, अगर कोई शख्स अपना मजहब बदलना चाहता है तो उसे कम से कम एक महीने पहले जिलाधिकारी को लिखकर देना होगा। उसे यह बताना होगा कि वह स्वेच्छा से ऐसा कर रहा है। धर्मांतरण कराने वाले पुरोहित/पादरी या किसी धर्माचार्य को भी एक महीने पहले इसकी सूचना देनी होगी। अपने मूल धर्म में वापस आने वाले व्यक्ति पर ऐसी कोई शर्त नहीं होगी। अगर दलित, महिला या नाबालिग का जबरन धर्मांतरण कराया जाता है तो दो से सात साल तक की जेल की सजा मिल सकती है।