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Twitter के CEO जैक डोर्सी का अकाउंट हैक, लिखा – ‘नाजी जर्मनी ने कुछ भी गलत नहीं किया’

ट्विटर के सीईओ जैक डोरसी का आधिकारिक ट्विटर अकाउंट शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) दोपहर को हैक कर लिया गया। जिसके बाद उनके आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से एक के बाद एक कई ट्वीट किए गए, जिनमें से कई पोस्ट में नस्लवाद, धमकी और जबरन वसूली की माँग शामिल है। इसके साथ ही हैकर्स ने कुछ ऐसे पोस्ट को भी रीट्वीट किया जिसमें लिखा था कि नाजी जर्मनी ने कुछ भी गलत नहीं किया है। कई ट्वीट्स आधे घंटे से ज्यादा समय तक उनकी प्रोफाइल पर ही दिखते रहे। बाद में ट्विटर की टेक टीम ने उनके अकाउंट को रिकवर कर लिया। डोर्सी के करीब 42 लाख फॉलोअर्स हैं।

ट्विटर का कहना है कि वो इस घटना की जाँच कर रहा है। कंपनी ने उन अकाउंट्स को सस्पेंड कर दिया, जिन्हें डोर्सी के हैक अकाउंट से रीट्वीट किया गया था। इसके अलावा कुछ अन्य अकाउंट्स को भी शक के आधार पर बंद कर दिया गया। चकल स्क्वाड नाम के एक ग्रुप ने हैकिंग की जिम्मेदारी ली है। जैक का अकाउंट हैक होने के बाद उससे हिटलर के समर्थन और नाजी जर्मनी पर ट्वीट किए गए। इसके अलावा खुद जैक पर नस्लीय टिप्पणी करते हुए मैसेज भी पोस्ट किए गए। एक और ट्वीट में हैकर्स ने ट्विटर के हेडक्वार्टर में बम होने की अफवाह भी उड़ाई। ट्विटर ने बाद में इन सभी मैसेज को डिलीट कर दिया। 

ट्विटर पर यह ऑनलाइन हमला डोर्सी के यूजर्स से उस वादे के बाद हुआ है, जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया से जल्द से जल्द हेट स्पीच खत्म करने की बात कही थी। बता दें कि इससे पहले 2016 में भी डोर्सी का अकाउंट हैक हो चुका है। तब अवरमाइन नाम के एक हैकर ग्रुप ने उनके अकाउंट से कई पोस्ट किए थे।

इमाम नहीं भिखारी बना रहे मदरसे: मौलवी भीख मॅंगवाते हैं, जंजीरों में बॉंध कर रखते हैं और रोज पीटते हैं

मदरसे केवल बच्चों के यौन शोषण के अड्डे ही नहीं हैं। मुल्लों की ज्यादतियों की लिस्ट बेहद लंबी है। झकझोर देने वाली। इंसानियत को शर्मसार करने वाली।

दीनी तालीम के नाम पर चल रहे मदरसे बच्चों को भिखारी बना रहे हैं। मौलवी बच्चों को जंजीरों में बॉंध कर रखते हैं। रोज पीटते हैं। गुलामों सरीखा सलूक करते हैं।

फिर भी समुदाय विशेष के गरीब बच्चों को इस उम्मीद से मदरसे भेजते हैं कि वह बड़ा होकर इमाम बनेगा। अम्मी-अब्बू को जब ज्यादतियों का पता चलता है तो धर्म और मौलवियों के खौफ से वे खामोश हो जाते हैं।

आपको ले चलता हूॅं अफ्रीकी मुल्क सेनेगल। करीब डेढ़ करोड़ की आबादी वाले इस देश के 90 फीसदी लोग समुदाय विशेष से हैं। यहॉं मदरसों को डारा कहते हैं। इनमें पढ़ने वाले बच्चों को तालिब और पढ़ाने वाले मौलवी को माराबू।

डारा में कुरान के अलावा शराफत भी सिखाई जाती है। यूॅं तो शराफत का मतलब विनम्रता होता है, लेकिन डारा शराफत के नाम पर बच्चों को भीख मॉंगने के लिए मजबूर करते हैं।

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक सेनेगल में करीब 1 लाख तालिब भीख मॉंग रहे हैं। ऐसे ज्यादातर तालिब की उम्र 12 साल से कम है। कुछ तो 4 साल के ही हैं। इसी संस्था ने 2010 के अपने अध्ययन में अनुमान लगाया था कि सेनेगल के मदरसों में पढ़ने वाले करीब 50 हजार बच्चे भीख मॉंग रहे हैं। यानी 10 से भी कम साल में इनकी संख्या दोगुनी हो चुकी है।

वैसे, इसके खिलाफ कानून सेनेगल करीब 15 साल पहले ही बना चुका है। ह्यूमन राइट्स वॉच और सेनेगल के मानवाधिकार समूहों के संगठन पीपीडीएच की अपील के बाद हाल में राष्ट्रपति मैकी साल ने बच्चों को सड़कों से वापस लाने और उनसे भीख मॅंगवाने वाले मौलवियों की गिरफ्तारी के आदेश भी दिए हैं। लेकिन, इससे हालात बदलने की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा रही।

मदरसे रेप के अड्डे और मुल्लों का डर!

इसका कारण मुस्लिम बहुल समाज में मुल्लों का दबदबा है। बताया जाता है कि मदरसों में बच्चों को खाना-पीना मिल जाता है। कुछ मदरसे बीमार होने पर इलाज भी करा देते हैं। इसलिए सब कुछ जान कर भी गरीब परिवार के लोग बच्चों को डारा भेज देते हैं।

मौलवियों के खौफ के बारे में बताते हुए एक वकील ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया- एक पीड़ित तालिब को माराबू ने भरी अदालत के सामने मारने की धमकी दी। बाद में पीड़ित पलट गया और मामला खत्म हो गया।

डारा में बच्चे किस हालात में रहते हैं इसके सबूत फोटोग्राफर मारियो क्रूज की फोटो बुक ‘Talibes: Modern Day Slaves‘ में मौजूद हैं। तस्वीरें देख आपकी रूह कॉंप जाएगी। इन तस्वीरों के लिए क्रूज को अपने जान जोखिम में डालने पड़े थे।

हृयूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट बताती है कि बच्चों से भीख मॅंगवाकर कुछ मौलवी साल भर में करीब एक लाख डॉलर कमा लेते हैं। आठ साल के डेम्बा के अनुसार- एक मौलवी ने मुझ से रात भर सड़कों पर भीख मॅंगवाई। सुबह एक नशेड़ी ने सारा पैसा छीन लिया।

मानवाधिकार संगठनों के अनुसार बच्चे भीख में पर्याप्त पैसा नहीं लाते तो उनकी मौलवी बुरी तरह से पिटाई करते हैं। 10 साल के सुलेमान का कहना है- जब तक मैं कुरान सीख नहीं लेता अपने मॉं-बाप से नहीं मिल सकता। मुझे माराबू को 200 फ्रांक लाकर देने होते हैं, नहीं तो मेरी पिटाई होती है। एक अन्य तालिब मूसा ने बताया- मेरे माता पिता को पता है कि मैं माराबू को पैसा देने के लिए भीख मॉंगता हूॅं। वे इसके खिलाफ कुछ नहीं करते। मुझे भीख मॉंगना पसंद नहीं। लेकिन कोई चारा नहीं है।

प्रताड़ना से तंग आकर बहुत सारे बच्चे डारा से भाग भी जाते हैं। लेकिन, इससे उनकी परेशानियों का अंत नहीं होता, क्योंकि मदरसे भीख मॉंगने के अलावा उन्हें कुछ और सिखाते नहीं। हृयूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में डकार के एक डारा से 2018 में भागे तालिब के हवाले से कहा गया है- मुझे डारा पसंद नहीं। वहॉं हमेशा पिटाई होती है। कुरान याद न हो तो भी पिटाई। पैसे लेकर नहीं आएँ तब भी पिटाई। मौलवी तब तक मारते हैं जब तक मौत का एहसास न हो।

डॉयचे वेले के अनुसार राहत संगठन मेसन ड दे ला गार के संस्थापक ईसा कूयाते एक बच्चे की कहानी सुनाते हुए रोने लगते हैं। 8 साल के एक बच्चे ने उन्हें अपनी आपबीती बताई। मदरसे से भागे इस बच्चे का सड़क पर रात में बलात्कार किया गया। कूयाते ने संयोग से उसे बचा लिया। 13 साल का न्गोरसेक डारा से भागने के बाद सेंट लुई शहर में कचरे के डब्बे में खाना खोजता राहत संगठनों को मिला था। उसने कहा- मैं डारा से भाग गया, क्योंकि अब बर्दाश्त नहीं होता।

हृयूमन राइट्स वॉच की ताजा रिपोर्ट में 2017-2018 के बीच डारा में पिटाई, यौन शोषण और भीख मॉंगने से हुई 16 बच्चों की मौत का भी जिक्र है। इसके मुताबिक सजा के तौर पर तालिब को जेल की कोठरी जैसे कमरों में हफ्तों या महीनों तक बंद रखा जाता है। बच्चे भागे नहीं इसलिए उन्हें जंजीर से बॉंध दिया जाता है।

मानवाधिकार संगठनों के अनुसार जब-जब हल्ला होता है पुलिस बच्चों को सड़क से उठाकर ले जाती है। लेकिन, उनको भीख मॉंगने के लिए मजबूर करने वाले मौलवियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। कभी-कभार कार्रवाई होती भी है तो प्रभावशाली मौलवी उसके विरोध में उठ खड़े होते हैं।

ऐसे में मदरसों के इन बच्चों की त्रासदी का अंत होता नहीं दिख रहा। जैसा कि ह्यूमन राइट्स वॉच की एसोसिएट डायरेक्टर (अफ्रीका) कोर्नी डुफका कहती हैं- तालिब गलियों में भटक रहे हैं। भयंकर यातना झेल रहे हैं। शोषण से मर रहे हैं।

मीडिया को सत्ता का गुंडा बताने वाले रवीश के 4P- प्रपंच, पाखंड, प्रोपेगेंडा, प्रलाप

“काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी, तेरी नाल सरोवर पानी।
जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास।”

कबीर के इस दोहे का अर्थ है- “नलिनी तुम क्यों नाहक कुम्हलाई जाती हो, तुम्हारी नाल सरोवर के पानी में है, तुम्हारी उत्पत्ति और निवास ही जल में है, फिर कुम्हलाने की वजह?”

मार्केटिंग में 4’P का कॉन्सेप्ट होता है और यह पूरा उद्योग इन्हीं 4’P’ के आसपास मंडराता रहता है। इसी तरह से रवीश कुमार ने भी कुछ ‘P/प’ ईजाद किए हैं- प्रपंच, पाखंड, प्रोपेगंडा और प्रलाप!

दिन रात इन 4P’s से घिरे होने के बावजूद रवीश कुमार हैं कि कुम्हलाए ही जा रहे हैं। रवीश को जितना जल्दी हो सके कबीर को पढ़ना चाहिए। चाहे तो वो सोशल मीडिया से समय बचा लें लेकिन उन्हें यह दोहा ज़रूर पढ़ना चाहिए।

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इंसान अपनी आँखों को अपनी ही हथेलियों से मूँदकर कहता है कि संसार में कितना अन्धकार है। अफ़सोस कि एक पुरस्कार, जो आजकल पुरस्कार कहलाए जाने के अलावा बाकी सब कुछ है, जैसे- एशिया का नोबेल या फिर ‘ऑस्कर’, भी कुछ नहीं बदल पाया। सुकून इतना है कि आजकल टीआरपी पर बवाल कम हो गया। लेकिन टीआरपी के आँकड़े इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं क्योंकि आजकल निराशा का कारण यह है कि उनके लाडले पाकिस्तान की चारों ओर फजीहत हुई है।

ट्रम्प और मोदी ताली दे रहे हैं, एक-दूसरे को सबके सामने चूँटी काट रहे हैं। उन्होंने ‘मान लिया’ था कि ‘बराक’ के बाद अमेरिका से यह नाता टूट जाएगा, लेकिन नए राष्ट्रपति तो मोदी को चूँटी काट रहे हैं। बिना किसी औपचारिकता के ही यह सब हो रहा है।

जब जब ट्रम्प-मोदी ताली मरते हैं, तब-तब दुनिया के एक कोने में एक ज़ीरो टीआरपी पत्रकार खुद को कहीं अँधेरे में बैठकर कोड़े मारता है। हालाँकि, इसका कोई ऑफ़ दी रिकॉर्ड सूत्र नहीं है, लेकिन फिर भी मैं ‘मानकर’ चल रहा हूँ कि वो ऐसा करते होंगे। क्योंकि यही तो उनके अनुसार पत्रकारिता है।

पत्रकारिता; यानी ‘मान लेना’। गणित के गुरूजी कक्षा छह में समझाते थे कि मान लो, यह है नहीं लेकिन मानना पड़ता है क्योंकि गणित ऐसे ही काम करती है। तब यह नहीं सोचा था कि एक दिन पत्रकारिता में भी यही गणित घुसकर सब कुछ भुसकोल कर देगी।

इसी तरह रवीश कुमार दैनिक कार्यक्रम के तहत काली स्क्रीन वाले स्टूडियो कहते हैं- “भगत जनों, ‘मान लीजिए।” उधर से जवाब में उनके सौ-साठ भगत-जन और ज्यादा ऊँची आवाज में कहते हैं- ‘मान लिया।’

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कितना सुखद अनुभव है कि रवीश कहते हैं और भगत-जन एक ही बार में बिना सवाल किए मान लेते हैं। फिर भी रवीश कहते हैं कि पत्रकारिता नहीं होने दे रहे हैं। इसी क्रम में आज के एक लेख में रवीश ने मीडिया को सत्ता का गुंडा बता दिया है।

इसका सीधा सा मतलब है कि जो आपके एकतरफा पत्रकारिता से सहमत नहीं है वो गुंडा है। चलिए एकबार फिर मान लेते हैं। यदि रवीश से असहमति मीडिया को गुंडा बनाती है तो सोचिए रवीश खुद कितने बड़े खलनायक हैं। उनकी बातों से तो सुप्रीम कोर्ट तक असहमति जता चुका है। कोर्ट कई बार रवीश कुमार से कह चुका है कि उन्होंने संसाधनों का समय बर्बाद किया है।

तो क्या सुप्रीम कोर्ट भी सत्ता का गुंडा है? क्या इस देश में अकेली जो आवाज लोकतंत्र की कहलाई जा सकती है वो रवीश कुमार द्वारा हवा में छोड़े गए तीर हैं? चाहे जस्टिस लोया केस हो या फिर NSA अजीत डोभाल और उनके बेटों को D-कम्पनी बताने का प्रपंच हो, रवीश के सभी इल्जाम झूठे निकल आए हैं। क्या उनके किसी भगत ने उनसे यह पूछा कि टीआरपी के लिए आपने इन सभी बेबुनियाद इल्जामों पर हमें यकीन करने को क्यों कहा?

रवीश कुमार खुद क्यों नहीं उस मीडिया का उदाहरण पेश कर देते हैं जिसकी वो कामना करते देखे जाते हैं?
खुद जिस रवीश कुमार का व्यवसाय दैनिक-प्रलाप और ‘4P’ बन चुका है, वह किस हैसियत से यह कह देता है कि मीडिया मर चुका है? एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार जिनकी टीआरपी सिर्फ उनका रोता हुआ चेहरा देखने की वजह से बढ़ती या घटती हो, वो जब अपने विष के लिए कश्मीर और अर्थव्यवस्था की आढ़ लेने लगे तो इसे सिर्फ कोरा प्रवचन कहते हैं।

अगर ऐसा न होता तो अर्थव्यवस्था से शुरू होने वाले रवीश के लेख मीडिया को कोसते हुए ख़त्म नहीं हो रहे होते।
चुनाव से ठीक पहले रवीश कुमार ने कहा था कि यह सरकार ‘इवेंट’ की सरकार है। हालाँकि, उनका यह तकिया-कलाम चुनावों में उनके मनमुताबिक नतीजे लाने में नाकामयाब रहा लेकिन फिर वो यही बात आज भी कहते सुने जा सकते हैं।

रवीश कुमार के लिए यह जानना आवश्यक है कि एक इवेंट की सरकार कॉन्ग्रेस की उन तमाम लोकसभाओं में से लाख बेहतर है जिसने अपनी जनता को वर्षों तक तुष्टिकरण और घोटालों के दलदल में डुबोकर रखा।

टीआरपी की तलाश में समाजवादी गुंडों के स्टेज पर चढ़ जाने को तैयार होने वाले रवीश कुमार को किसी को पत्रकारिता सिखाने की आवश्यकता नहीं है। उनका दैनिक रुदन देखकर तो इस समय यही लगता है कि अगर किसी को पत्रकारिता सीखने की जरूरत है तो वो खुद रवीश कुमार हैं।

वो हिंदी के दोषी हैं, वो पत्रकारिता के दोषी हैं, वो तमाम उन लोगों के दोषी हैं जिनके साथ वो अपनी कुटिल मुस्कान से रोजाना नए छल कर जाते हैं। वो लोगों को जागरूक करने से ज्यादा उन्हें भ्रम में रखने में यकीन करते हैं।

वो अपने स्टूडियो में बैठकर कहते हैं कि मोदी सरकार की मुद्रा योजना फेल है, जबकि आँकड़े इसके उलट कुछ और ही कह रहे हैं। वो कहते हैं कि स्वरोजगार का वादा इस सरकार का इवेंट है। जबकि ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण मैं स्वयं ये बात जानता हूँ कि मुद्रा बैंक और रोजगार सृजन से लेकर कौशल विकाश जैसे कार्यक्रमों ने देश के युवाओं और छोटे-बड़े व्यापारियों को एक बड़े हद तक प्रभावित किया है।

लेकिन रवीश ने अपने स्टूडियो में बैठकर सब कुछ तय कर लिया है। उन्होंने उसी बीजगणित के अध्याय की तरह सब कुछ अब ‘मान लिया’ है। इससे बड़ी हानि यह है कि वो चाहते हैं कि उनके इसी ‘मान लेने’ को बाकी लोग भी मान लें, जबकि उनका यह बीजगणित एकदम ऊसर है, इससे कुछ भी सृजन नहीं हो सकता है।

अर्थव्यवस्था का टेंशन छोड़िए रवीश बाबू, और उस टीआरपी पर ध्यान दीजिए जो आपको सोने, खाने से लेकर उठने-बैठने तक पर मोदी-स्मरण करवाने लगी है।

आपको कश्मीर का दर्द नहीं है आपका दर्द कश्मीर पर सरकार की होने वाली वाहवाही है। यह समय आत्म चिंतन का है। आपके एक कट्टर-भगत की आपसे यही माँग है। जितना जल्दी हो सके, लौट आइए, आपको कोई कुछ नहीं कहेगा।

दो साल में 65% घटा दिमागी बुखार, अब सड़क हादसों से दो-दो हाथ: योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया है कि उनकी सरकार के दो साल के कार्यकाल में दिमागी बुखार (Japanese Encephalitis) के मामलों में होने वाली मौतों में 65% कमी आई है। मालूम हो कि मार्च 2017 में राज्य की सत्ता संभालने के महज़ कुछ महीनों बाद अपने ‘गृह’-क्षेत्र गोरखपुर के बाबा राघव दास (BRD) मेडिकल कॉलेज में इस बीमारी से हुई मौतों पर योगी को काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। 2017 में इस बीमारी से 5400 लोग ग्रसित हुए, और 748 लोगों की मौत हो गई।

“1998 से लड़ रहा हूँ… पहली मीटिंग इसी पर की थी”

योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि राज्य के मुख्यमंत्री बनने के पहले से, 1998 से गोरखपुर के सांसद बनने के समय से वह इस बीमारी से लोगों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ का लगभग दो दशकों तक निर्वाचन क्षेत्र रहा (और धार्मिक तौर पर गोरखधाम मंदिर, जिसके वे मठाधीश हैं, के कारण उनका सन्यासी के तौर पर घर माना जाने वाला) गोरखपुर इस बीमारी का गढ़ माना जाता है।

इसके अलावा योगी ने दावा यह भी किया कि उन्होंने मुख्यमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद पहली मीटिंग दिमागी बुखार पर ही की थी, और अधिकारियों से इस बीमारी के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिए तत्काल कदम उठाने को कहा। “पहले encephalitis के मरीजों को नज़रंदाज़ कर दिया जाता था क्योंकि इसे एक अनजान बीमारी माना जाता था। उन्होंने बताया कि सरकारी विभागों को इससे निबटने के लिए संयुक्त कदम उठाने को कहा गया और लोगों को समझाया गया कि बचाव इलाज से बेहतर है।”

सड़क हादसे बन रहे महामारी

28 अगस्त को राजधानी लखनऊ के KGMU अस्पताल में ट्रॉमा शल्य चिकित्सा विभाग द्वारा Indian Society of Trauma and Acute Care (ISTAC) के तीन-दिवसीय सेमिनार को सम्बोधित करते हुए योगी ने सड़क हादसों की बढ़ती संख्या पर भी चिंता जताई। इसे “आजकल किसी महामारी से कम नहीं” करार देते हुए मुख्यमंत्री ने इन्हें रोकने के लिए सरकार के युद्ध-स्तर पर काम करने का भरोसा दिलाया। “मैंने खुद कई बार अंतर-विभागीय बैठकें बुलाईं हैं जिनका उद्देश्य सड़क हादसों को रोकना होता है।”

इससे निपटने के लिए उठाए जा रहे सरकारी क़दमों को गिनाते हुए योगी ने कहा कि सरकार लोगों को जागरुक करने के लिए अभियान चलाने के अतिरिक्त बस-ड्राइवरों की आँखों की जाँच और सड़कों पर साइनबोर्ड फिर से लगवाने का काम भी कर रही है।

देवी की साड़ियों पर अर्चक का अधिकार, फिर भी पुलिस ने किया झूठे आरोप में गिरफ्तार

हैदराबाद से सटे सिकंदराबाद स्थित संतोषीमाता मंदिर के अर्चक श्री बी रामशर्मा के पक्ष में राज्य के जाने-माने चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक सीएस रंगराजन उतर आए हैं। रामशर्मा को देवी की साड़ियाँ ‘चुराने’ के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। रंगराजन ने पोर्टल PGurus पर लिखे अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि न केवल मंदिर की धार्मिक परम्पराओं के अनुसार स्वर्ण-रजत (सोने-चाँदी) के अलावा बाकी चढ़ावे पर अंतिम अधिकार अर्चक का होता है, बल्कि इस परम्परा को Endowments Act का भी समर्थन है, जिसके अंतर्गत मंदिर की व्यवस्थाओं का संचालन होता है।

सहायक को “पकड़ा” था 42 साड़ियों के साथ

स्थानीय मीडिया के अनुसार रामशर्मा के सहायक बाबूराव को सावन के महीने में माता को चढ़ी 42 साड़ियाँ रामशर्मा के घर ले जाते हुए मंदिर के पूर्व अध्यक्ष राय वेंकटेश और ट्रस्टी राम मोहन ने “पकड़ा” था। उन्होंने गोपालपुरम थाने की पुलिस को बुला कर बाबूराव को उनके हवाले कर दिया था। साथ ही कुछ मीडिया पोर्टलों ने रिपोर्टिंग के सभी मानकों और मूल्यों का हनन करते हुए “आरोपित”, “accused” आदि का प्रयोग किए बगैर सीधे-सीधे रामशर्मा को “चोर” घोषित करते हुए शीर्षक से खबर चला दी थी।

Endowments Act, Section 144 के संशोधन को क्यों नहीं किया गया है लागू?

मामले में पुलिस और सरकार की ओर से अनियमितताओं की पूरी फेहरिस्त गिनाते हुए चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक सीएस रंगराजन ने हमला बोले है। उन्होंने जानकारी दी कि Endowments Act के Section 144 को बाकायदा संशोधित किया गया था, ताकि सोने-चाँदी के अतिरिक्त अन्य चढ़ावे पर अर्चक के धार्मिक अधिकार को विधिवत अमली जामा पहनाया जा सके। उन्होंने साथ में जोड़ा कि संशोधन में इसे हर मंदिर में लागू करने के तरीके को इस संशोधन के अनुमोदन के समय तय होना था, लेकिन कभी इस संशोधन को अमल में लाया ही नहीं गया। इसी से यह भ्रामक स्थिति उत्पन्न हुई है कि अर्चक को चढ़ावे की साड़ियों पर अधिकार तो है (कानूनी भी, और धार्मिक रूप से भी), लेकिन इस अधिकार के लिए विधिवत तरीका स्थापित नहीं है।

रंगराजन ने अर्चक पर झूठे आरोप को दुर्भाग्यपूर्ण और पुलिस के अधिकार-क्षेत्र के बाहर बताते हुए पुलिस पर उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने राज्य के Endowments विभाग से दो सवाल भी पूछे:

1) अगर कानून यह कहता है कि देवी को चढ़ाई गई साड़ियों पर अर्चक का अधिकार है तो क्या उन साड़ियों की चोरी का मुकदमा विभाग अर्चक रामशर्मा के खिलाफ करेगा?

2) क्या विभाग कम-से-कम अब जाकर मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों यानि अर्चकों की सेवा शर्तों पर स्थिति स्पष्ट करेगा?

रंगराजन ने अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों के तौर पर अर्चकों का ऐसा अपमान बिलकुल अस्वीकार्य है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत क्षमता और चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक की हैसियत के अलावा अपनी अध्यक्षता वाले Temples Protection Movement के तौर पर भी श्री बी रामशर्मा का निलंबन समाप्त करने और उनको उनके पद पर दोबारा ससम्मान स्थापित किए जाने की माँग की। साथ ही उन्होंने अर्चक को उनके द्वारा उठाई गई परेशानी के लिए मुआवजा दिए जाने की भी माँग की।

इसीलिए ज़रूरी है मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त करना

Endowments Act में हुए संशोधन को सरकारी तंत्र द्वारा अब तक न लागू करना ही इस स्थिति का कारण है, जहाँ एक बेगुनाह अर्चक को अपने कानूनी और धार्मिक अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए न केवल अपमानित होना पड़ रहा है, बल्कि जेल की हवा भी खानी पड़ रही है। यह मामला इस बात को और ज़्यादा रेखांकित करता है कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना क्यों ज़रूरी है।

गौरतलब है कि हिन्दू समाज 1954 में शिरूर मठ के जबरन अधिग्रहण के समय से इस बात को लेकर आंदोलनरत है कि हिन्दू मंदिरों में सरकारी हस्तक्षेप न हो; उन्हें वैसे ही स्थानीय और श्रद्धालु-संचालन के लिए दिया जाए जैसे ईसाईयों, मजहब विशेष आदि को यह आज़ादी है। इसी प्रकार की सरकारी उदासीनता के चलते होता यह है कि एक ओर मंदिरों की आय लाखों-करोड़ों (यहाँ तक कि कई बार अरबों) में होती है, और दूसरी ओर मंदिरों के पुजारी/अर्चक और अन्य स्टाफ को कई बार ₹750, ₹1000 से लेकर ₹10,000 जैसी नाकाफी ही नहीं बल्कि अपमानजनक राशियाँ वेतन के रूप में मिलतीं हैं।

इमरान खान की पूर्व पत्नी रेहम भी हुई मोदी की मुरीद, कहा- पाकिस्तान भिखारी जबकि उनकी दुनिया में है इज्जत

पाकिस्तान के कश्मीर प्रलाप के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पूर्व पत्नी का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो पाकिस्तान की नीतियों को कोस रही हैं जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ करते हुए नजर आ रही हैं।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पूर्व पत्नी रेहम खान पीएम मोदी की मुरीद हो गई हैं। वीडियो में उन्होंने अपने पूर्व पति और पाक के पीएम इमरान खान से पाकिस्तान की आर्थिक हालत को लेकर सवाल किया है।

इस वीडियो में रेहम कह रही हैं- “आज मोदी सरकार को क्यों लोग चाहते हैं और क्यों उनसे रिश्ते खराब नहीं करना चाहते हैं? क्योंकि उनकी इकॉनमी स्ट्रॉन्ग हो गई है। सऊदी ने वहाँ इन्वेस्ट किया है, यूके उनके साथ है, अमेरिका की उनमें दिलचस्पी है। जहाँ मोदी जाते हैं तो उनकी इज्जत होती है।”

वीडियो में आगे रेहम ने इमरान खान और पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए कहा, “मोदी को UAE में मेडल मिला है तो आपको तकलीफ हो रही है। आप भीख माँगते फिर रहे हैं। आप बताएँगे कि आप उनके पाँव की जूती हैं तो वो आपकी इज्जत कैसे करेंगे?”

यह वीडियो ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री वहाँ के लोगों से कश्मीर के लोगों के समर्थन में आने की फ़रियाद कर रहे हैं। जबकि हकीकत ये है कि जम्मू-कश्मीर मामले में दुनिया तो दूर की बात, खुद पाकिस्तानियों ने भी अपने प्रधानमंत्री इमरान खान की गप्पों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है।

इसका प्रमाण पाकिस्तान को इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई द्वारा बुलाए गए ‘Kashmir Hour‘ की असफलता है। न केवल ज़मीन पर पाकिस्तानी जनता में इसके प्रति ठंडी प्रतिक्रिया रही, बल्कि ट्विटर पर भी लोगों ने इसकी खिल्ली उड़ाई, जिसमें पाकिस्तानी भी शामिल रहे।

रेहम खान का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं-

रिटायर हो रहे हैं प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र, पीके सिन्हा बने OSD in PMO

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र ने रिटायर होने की तैयारी कर ली है। तब-नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री के अनुरोध पर रिटायरमेंट से बाहर आकर पदभार संभालने वाले मिश्र को 5 साल से प्रधानमंत्री के सबसे विश्वस्त अफसर, नौकरशाही में उनके आँख-कान माना जाता था। उनकी सेवानिवृत्ति की घोषणा खुद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्विटर पर की।

मोदी ने उनकी सार्वजनिक नीति और सार्वजनिक प्रशासन में दक्षता का विशेष उल्लेख करते हुए उनकी तारीफ़ की।

2 हफ्ते और रुकने का अनुरोध

सरकार के मुख्य प्रवक्ता सितांशु कर ने मीडिया को जानकारी दी कि मोदी ने उनसे दो सप्ताह और अपनी सेवाएँ जारी रखने का अनुरोध किया है। कुछ खबरों के अनुसार वे चुनावों के बाद ही जाना चाहते थे, लेकिन मोदी के अनुरोध पर उस समय उन्होंने तुरंत सेवानिवृत्ति की बात पर अधिक बल नहीं दिया। इस बीच मीडिया में पूर्व कैबिनेट सचिव पीके सिन्हा को प्रधानमंत्री द्वारा पीएमओ में विशेष दायित्व पर तैनात अफसर (OSD) नियुक्त किए जाने की खबरें भी आ रहीं हैं।

ऊर्जा सचिव, सबसे लम्बे तक कैबिनेट सचिव रह चुके हैं सिन्हा

OSD in PMO नियुक्त हुए पीके सिन्हा यूपी कैडर के अफसर हैं। अर्थशास्त्र में स्नातक और परास्नातक करने वाले सिन्हा ऊर्जा और जहाजरानी मंत्रालयों में सचिव भी रह चुके हैं। कैबिनेट सचिव के तौर पर 2017 और 2018 में एक-एक साल का विस्तार पाने के बाद जब उन्हें जून में तीसरा सेवा-विस्तार मिला तो वे भारत के इतिहास में सबसे अधिक समय तक सेवाएँ प्रदान करने वाले कैबिनेट सचिव बन गए थे।

कॉन्ग्रेस MLA से उनकी पत्नी ने कहा- ‘मेरे हसबैंड मुझे प्यार नहीं करते’, TikTok वीडियो वायरल

टिकटॉक (TikTOk) नामक मोबाइल एप्प लगातार युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रही है। लेकिन इस मोबाइल एप्प के आकर्षण से नेता भी अछूते नहीं रह गए हैं। ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है बिहार कॉन्ग्रेस MLA बंटी चौधरी और उनकी पत्नी का। जिसमें वो मशहूर कॉमेडियन सुनील ग्रोवर के गाने ‘मेरे हसबैंड मुझको प्यार नहीं करते’ पर एक्टिंग कर रहे हैं।

बिहार के जमुई में इन दिनों स्थानीय कॉन्ग्रेस MLA बंटी चौधरी का एक ऐसा ही वीडियो वायरल हो रहा है। इस वायरल वीडियो में सिकंदरा के विधायक अपनी पत्नी के साथ नजर आ रहे हैं जो शायद उन्होंने ही बनाया भी है।

इस वीडियो के बीच-बीच में विधायक बंटी चौधरी भी इसमें उनका साथ देते नजर आ रहे हैं।

बता दें कि इस वीडियो के वायरल होने के बाद कॉन्ग्रेस विधायक बहुत परेशान चल रहे हैं। विधायक ने दो लोगों पर आरोप लगाते हुए बताया कि जिन लोगो ने हैक कर वीडियो वायरल किया है वो हमारे विरोधी हैं। पर उनकी परेशानी कम नहीं हो रही है क्योंकि तमाम लोग विधायक सुधीर कुमार उर्फ बंटी चौधरी और उनकी पत्नी का टिकटॉक वीडियो सोशल मीडिया पर अभी भी फैला रहे हैं।

योग-वेदांत पढ़ाने वाले स्वामी तत्वबोधानंद की पीट-पीटकर हत्या, ड्रग्स-शराब का कर रहे थे विरोध

अपने घर के पास शराब और ड्रग्स का विरोध कर रहे पुडुचेरी के जाने-माने योग व गीता गुरु और वेदांत विद्वान स्वामी तत्वबोधानंद की मंगलवार-बुधवार (29 अगस्त, 2019) को अपने ही अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। स्वराज्य पत्रिका में स्थानीय मीडिया के हवाले से छपी खबर के अनुसार रात को हुई हत्या का खुलासा उनकी इमारत (गोकुलम अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स) के सिक्योरिटी गार्ड के सुबह आने पर हुआ। हत्यारों का अब तक कोई पता नहीं चला है। वहीं पुलिस के अनुसार यदि उसे समय पर सूचना मिल गई होती तो हत्यारों को जल्दी दबोचा जा सकता था। मिल रही जानकारी के अनुसार स्वामी तत्वबोधानंद अपने अपार्टमेंट के आस-पास ड्रग्स-शराब का विरोध कर रहे थे। पुलिस पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हत्या में उसी धंधे से जुड़े लोगों का हाथ तो नहीं है।

डर के मारे भागा गार्ड

गार्ड के अनुसार हत्या वाली रात वह अपार्टमेंट से ही जुड़ा कोई काम कर रहा था जब दो संदिग्ध शख्स जबरन घुस आए और उसके साथ गुंडागर्दी और दुर्व्यवहार करने लगे। अपने बयान के मुताबिक गार्ड अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़ा हुआ और एक पेट्रोल पम्प में शरण ली। जब वह सुबह लौटा तो अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स के दरवाज़े पर खून के धब्बे थे। अंदर जाकर उसने स्वामी जी की लाश देखी।

CCTV कैमरा क्षतिग्रस्त, पुलिस ने लगाई स्निफर डॉग टीमें

अपार्टमेंट का CCTV कैमरा भी क्षतिग्रस्त पाया गया, इसलिए पुलिस अन्य इमारतों और आसपास के अन्य CCTV कैमरों की फुटेज से हत्यारों की शिनाख्त करने की कोशिश कर रही है। घटनास्थल से फोरेंसिक नमूने इकट्ठे करने के अतिरिक्त पुलिस ने अपने स्निफर डॉग भी इस मामले की जाँच में लगा दिए हैं। हालाँकि, पुलिस ने इस मामले की जाँच के लिए दो टीमें गठित कर दीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि अगर हत्या की जानकारी और जल्दी मिल जाती तो हत्यारों को जल्दी गिरफ्तार करना आसान होता।

फर्जी खबर फैलाने पर ‘The Hindu’ की पत्रकार को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने ट्विटर पर लताड़ा

कश्मीर को लेकर फर्जी खबर फैलाने के आरोप में एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने ‘द हिंदू’ की पत्रकार विजयता सिंह (Vijaita Singh) को सोशल मीडिया पर जमकर लताड़ा। पुलिस अधिकारी ने झूठे दावे वाली द हिंदू की रिपोर्ट पर विजयता को जवाब देते हुए न केवल उनके काम पर सवाल उठाया बल्कि उन्हें पूरे मामले की हकीकत से भी रूबरू करवाया और कहा कि वह पुलिस को काम सिखाने से अच्छा है अपने काम पर ध्यान दें।

दरअसल, घोषित वामपंथी अखबार द हिंदू की पत्रकार विजयता ने ट्विटर पर एक रिपोर्ट शेयर करते हुए दावा किया कि 5 अगस्त से अब तक 36 कश्मीरी पैलेट घावों का शिकार हो चुके हैं। विजयता ने अपनी बात को साबित करने के लिए इस रिपोर्ट में वरिष्ठ सरकारी सूत्रों का हवाला दिया। लेकिन उन्होंने इस रिपोर्ट में किसी अधिकारी का नाम नहीं बताया। उन्होंने बस हवा में दावा कर दिया कि सुरक्षाबलों ने 36 लोगों को प्रदर्शन के दौरान घायल किया।

इस रिपोर्ट के शेयर करने के कुछ देर बाद जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन ने उन्हें दो टूक रिप्लाई दिया और बताया कि जिन लोगों के घायल होने की बात विजयता अपनी रिपोर्ट में कर रही हैं, वह हकीकत में अपने घर में नहीं थे बल्कि घर से बाहर थे। वो आदेशों की अवहेलना कर रहे थे, कानून को अपने हाथ में ले रहे थे, साथ ही गलत ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे और लोगों को उकसा रहे थे।

इसके बाद प्रणव महाजन ने अपने ट्वीट में विजयता पर ये भी आरोप लगाया कि वह कश्मीर के हालातों पर भ्रामक रिपोर्ट लिखने के लिए जानबूझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ रही हैं, जो काफी दुखद है।

मुमकिन था सोशल मीडिया पर एक पुलिस अधिकारी से इतना सुनने के बाद कोई अन्य पत्रकार अपने को सही साबित करने के लिए सबूत पेश करता। लेकिन विजयता ने तो उचित आँकड़े पेश करने की बजाए पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन से कहा कि उन्होंने जो संख्या बताई है वो सटीक है और आधिकारिक सूत्रों द्वारा दी गई है। इसलिए अगर उनको (प्रणव) दिक्कत है तो वो सफाई के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार से संपर्क करें। न कि किसी पत्रकार को कोसें। इसके बाद विजयता यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने आगे लिखा , “तुम पुलिस वाले हो, काम पर जाओ, 9:30 बजे रहे हैं।”

जिसपर प्रणव महाजन ने बड़ी सभ्यता के साथ जवाब देते हुए कहा, “इस ट्वीट से पता चलता है कि आप हमारे काम को लेकर कितनी चिंतित हैं, लेकिन ये 9:30 उनके लिए बज रहे हैं जो सोते हैं, उठते हैं और नाश्ता करते हैं। हम ये सब नहीं करते क्योंकि हमें बाहर रहकर लोगों का ध्यान रखना होता है। यहाँ नहीं का मतलब कुछ नहीं हैं। मैं पहले ही घर से बाहर हूँ। आप कृपया करके हमें बताने से अच्छा है आप अपना काम करें।“

गौरतलब है कि इन दिनों कश्मीर के हालातों पर प्रोपेगेंडा परस्त खबरे फैलाने में ‘द हिंदू’ सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभा रहा है। क्योंकि विजयता सिंह से पहले फर्जी खबर फैलाने के लिए द हिंदू की नेशनल एडिटर सुहासिनी हैदर पर भी इल्जाम लगे थे।