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‘सांसद रमा देवी मेरी बहन की तरह हैं’ – भद्दी टिप्पणी करने के बाद आज़म ख़ान ने माँगी माफ़ी

25 जुलाई को लोकसभा में ट्रिपल तलाक बिल पर पर चर्चा के दौरान सदन की अध्यक्षता कर रहीं बीजेपी सांसद रमा देवी पर सपा नेता आज़म ख़ान ने अभद्र टिप्पणी की थी। उन्होंने रमा देवी से कहा था, “आप मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि मेरा मन करता है कि आपकी आँखों में आँखें डाले रहूॅं।” इस तरह की टिप्पणी से अध्यक्षता कर रहीं सांसद थोड़ी देर के लिए असहज हो गई थीं। आज़म ख़ान की इस भद्दी टिप्पणी से उनकी किरकिरी होना तय था, जो हुई भी।

इस मामले में ताज़ा समाचार यह है कि सपा नेता आज़म ख़ान ने सांसद रमा देवी के ख़िलाफ़ की गई अपनी भद्दी टिप्पणी के लिए माफ़ी माँग ली है और कहा कि सासंद रमा देवी मेरी बहन हैं।

औरत ही औरत की दुश्मन: आजम खान के बचाव में बोली बीवी- उर्दू की मिठास से गलतफहमी

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी आज़म खान के बयान की आलोचना करते हुए इसे शर्मनाक बताया था। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “आज़म खान द्वारा दिया गया शर्मनाक बयान उनके चरित्र का प्रतिबिंब है; उनका बचाव करके अखिलेश यादव ने भी प्रमाणित कर दिया कि उनकी सोच में भी कोई फ़र्क़ नहीं। जो सदन में महिला के साथ निंदनीय व्यवहार कर सकता है वह साधारण महिला से किस प्रकार का व्यवहार करता होगा, यह सोचने वाली बात है।” इसके साथ ही एक और ट्वीट में स्मृति ने आज़म खान को सभी पुरुष सांसदों पर धब्बा बताया।

जब मॉं-बेटे का चुम्मा सेक्स नहीं तो आजम खान गलत कैसे?

‘कॉन्ग्रेस-NCP के 50+ MLA हमारे सम्पर्क में’ – BJP के दावे के बाद महाराष्ट्र में सियासी उठापटक तेज़

पिछले एक महीने से कर्नाटक में लगातार सियासी उठापटक देखने को मिल रही है। इस उठापटक का नतीजा यह रहा कि सूबे में कॉन्ग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार गिर गई और इसका फ़ायदा बीजेपी को मिला। ऐसे ही कुछ बनते-बिगड़ते समीकरण महाराष्ट्र की राजनीति में भी देखने को मिल रहे हैं। ख़बर है कि महाराष्ट्र में बीजेपी, कॉन्ग्रेस-NCP (राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी) गठबंधन को एक बड़ा झटका देने की तैयारी में है।

सूबे में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन ने दावा किया है कि कॉन्ग्रेस और NCP के क़रीब 50 विधायक उनके सम्पर्क में हैं। ग़ौरतलब है कि महाराष्ट्र में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और ऐसे में इस दावे से सियासी गलियारे में हलचल तेज़ होना तय है।

बता दें कि गिरीश महाजन का यह बड़ा बयान ऐसे समय में आया है जब NCP के कई नेता पहले से ही पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। हाल ही में, NCP की वरिष्ठ नेता चित्रा वाघ का बयान आया था कि वो बीजेपी में शामिल होना चाहती हैं क्योंकि NCP का अब कोई भविष्य नहीं है। उन्होंने यह ख़ुलासा भी किया था कि उनसे कई अन्य विधायकों ने अनुरोध किया था कि वो विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल होना चाहते हैं।

इन दिनों NCP में इस्तीफ़ों का दौर भी जारी है। एक के बाद एक पार्टी के कई नेताओं ने अपना इस्तीफ़ा दिया, ज़ाहिर सी बात है इससे पार्टी कमज़ोर हुई है। 26 जुलाई को पार्टी की महिला विंग की अध्यक्ष चित्रा वाघ ने पार्टी के अंधकारमय भविष्य को देखते हुए इस्तीफ़ा दिया था। वहीं, पार्टी के मुंबई प्रमुख सचिन अहीर ने पहले से ही शिवसेना का दामन थाम लिया था। ख़बर तो यह भी है कि पूर्व मंत्री मधुकर पिचड के बेटे और NCP विधायक वैभव पिचड भी बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं। इन हालातों के मद्देनज़र यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि गिरीश महाजन के दावों में कितनी सच्चाई है।

फ़िलहाल, महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के पाँव डगमगा रहे हैं और अगर यह स्थिति लगातार बनी रही तो निश्चित तौर पर NCP भी कमज़ोर हो जाएगी। इसके अलावा राज्य मंत्री गिरीश महाजन ने शरद पवार के उस दावे को भी ख़ारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि बीजेपी सरकार एजेंसियों का इस्तेमाल करके कॉन्ग्रेस और NCP के नेताओं को अपने खेमे में शामिल करने की कोशिश कर रही है।

नाम- सौरभ शुक्ला, काम: लश्कर-ए-तैयबा के लिए फंड जुटाना, UP पुलिस ने किया गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में रविवार (जुलाई 26, 2019) को एंटी टेरेरिस्ट स्क्वॉड ने लश्कर-ए-तैयबा के लिए काम करने के आरोप में सौरभ शुक्ला नाम के शख्स को गिरफ्तार किया। जानकारी के अनुसार सौरभ भारत में रहकर लश्कर के कहने पर उनके लिए फंड जुटाने का काम कर रहा था।

मीडिया खबरों के मुताबिक सौरभ मध्य प्रदेश के सीधी जिले का रहने वाला है। वह प्रयागराज में रहकर बीए की पढ़ाई कर रहा था। सौरभ के पिता टीचर हैं। रविवार को हुई सौरव की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने बताया कि वो भारत से जानकारी जुटाकर पाकिस्तान के सक्रिय आतंकी संगठन लश्कर-ए तैयबा को दिया करता था। इसके अलावा वह भारत से रुपए जमा करके पाकिस्तान भी भेजता था, ताकि आतंकी अपने मनसूबों को अंजाम दे सकें।

सौरभ फोन और इंटरनेट के माध्यम से लश्कर के सदस्यों से संपर्क करता था। इनसे अलग-अलग बैंक खाताओं में पैसे मंगवाकर आतंकियों तक सप्लाई भी करता था। अधिकारियों के मुताबिक उत्तर प्रदेश पुलिस को काफ़ी समय से सौरभ की तलाश थी। पुलिस ने इसे पकड़ने के लिए बीते दिनों इस पर 25 हजार रुपए का इनाम भी रखा था। साथ ही इस मामले में पुलिस ने मध्य प्रदेश एटीएस की भी मदद ली थी। अब फिलहाल, गिरफ्तारी के बाद अधिकारियों का कहना है कि सौरभ से इस मामले में पूछताछ जारी है।

मुख्तार अपनी बेटियों से करता था जबरदस्ती: पत्नी ने शराब पिला, नशे की गोली खिला, गला घोंट कर मार डाला

बिजनौर में हुए मुख्तार अहमद हत्याकांड में पुलिस ने रविवार (जुलाई 28, 2019) को एक बड़ा खुलासा किया है। दरअसल, पुलिस ने इस हत्याकांड के पीछे मृतक की पत्नी को ही दोषी पाया है। पुलिस के अनुसार महिला ने खुद बताया कि उसका पति नशे की हालत में अपनी बेटियों के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता था। जिससे तंग आकर एक दिन महिला ने गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। मामले की गुत्थी सुलझने के बाद अब पुलिस ने मुख्तार की पत्नी को हिरासत में ले लिया है। साथ ही जाँच को आगे बढ़ाया है।

नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार बिजनौर के एसपी संजीव त्यागी ने इस मामले पर बताया कि 8 जुलाई को धामपुर निवासी मुख्तार अहमद की हत्या हुई थी। जिसके बाद मुख्तार के भाई इरफान ने अपने भाई की पत्नी फिरदौस पर पहले दिन से हत्या करने का शक जताते हुए पुलिस में शिकायत की थी।

जाँच के बाद फिरदौस को हिरासत में लिया गया, जहाँ पूछताछ के दौरान उसने हत्या करने की बात स्वीकार ली। लेकिन जब उसने अपने इस कदम के पीछे का कारण बताया तो सबके होश उड़ गए।

इस पूछताछ में फिरदौस ने बताया कि उसका निकाह मुख्तार से 8 साल पहले 26 अप्रैल 2011 को हुआ था। वो मुख्तार की दूसरी पत्नी थी। मुख्तार का पहला निकाह नगीना की रजिया से हुआ था, लेकिन रजिया ने मुख्तार के हँगामे करने और मारपीट से तंग आकर ससुराल छोड़ दिया था। हालाँकि इसके बाद भी मुख्तार की आदतों में सुधार नहीं हुआ और जब उसकी शादी फिरदौस से शादी हुई वह तब भी मारपीट करता रहा।

फिरदौस के मुताबिक मुख्तार नशे की हालत में अपनी बेटियों को हवस का शिकार बनाने की कोशिश करता था और उसके विरोध करने पर उससे मारपीट करता था। इसलिए एक दिन उसने अपनी बेटियों को मुख्तार से बचाने के लिए पहले उसे शराब पिलाई, फिर खाने में नशे की गोलियाँ दी और फिर बेहोश होने पर उसने (फिरदौस ने) प्लॉस्टिक की रस्सी से उसका (मुख्तार) गला घोंटकर मार दिया।

जिस जगह पर दलित महिला MLA ने किया विरोध-प्रदर्शन, कॉन्ग्रेसियों ने उसे गोबर से धोया

केरल में एक विचित्र घटना हुई। वो भी एक महिला विधायक के साथ। केरल के त्रिशूर जिले के युवा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने यह अपमानजनक काम किया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की विधायक गीता गोपी ने इस मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई है। उनका कहना है कि वह मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के साथ-साथ विधानसभा अध्यक्ष पी श्रीरामकृष्णन से भी शिकायत दर्ज करेंगी।

शनिवार (27 जुलाई 2019) को त्रिशूर में नत्तिका निर्वाचन क्षेत्र की विधायक गीता गोपी ने चेरपु मिनी सिविल स्टेशन के परिसर में विरोध-प्रदर्शन किया। यह विरोध-प्रदर्शन त्रिपयार से चेरपु राज्य राजमार्ग पर रखरखाव से संबंधित था। जब उन्हें लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों से इस मामले में आश्वासन मिल गया तो उन्होंने अपना विरोध-प्रदर्शन समाप्त कर दिया। असली ड्रामा इसके बाद युवा कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने किया।

चेरपु मिनी सिविल स्टेशन के परिसर में जिस जगह पर विधायक गीता गोपी ने विरोध-प्रदर्शन किया था, उस जगह को युवा कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने गोबर से लेपा। ऐसा करने के पीछे उनका मकसद “स्पॉट को शुद्ध करने” से था। आपको बता दें कि विधायक गीता गोपी दलित समुदाय से आती हैं। आपको यह भी जानना चाहिए कि केरल में साक्षरता दर भारत के किसी भी राज्य की तुलना में सबसे अधिक है।

केरल की स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और महिला एवं बाल विकास मंत्री केके शैलजा ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस अपने कार्यों के माध्यम से पार्टी की संस्कृति दिखा रही है। शैलजा ने कहा, “विधायक गीता गोपी के खिलाफ जातिवादी भेदभाव चौंकाने वाला है। यह आपराधिक और बेहद निंदनीय है कि कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उस स्थान पर गाय का गोबर-मिश्रित पानी डाला, जहाँ लोकतांत्रिक ढंग से विरोध-प्रदर्शन किया गया।”

शैलजा ने जोर देकर कहा, “केरल पुनर्जागरण में बहुत आगे रहा है, यहाँ ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसे कृत्य को अंजाम देने वाले लोग अपनी संस्कृति दिखा रहे हैं। इससे वे अस्पृश्यता का डर वापस ला रहे हैं। उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।”

कृष्ण स्वयं शैतान, गोपियाँ मूल रूप से उनकी वेश्याएँ: रूस में ईसाई कट्टरपंथियों के निशाने पर हिंदू धर्म

रूस में ईसाई कट्टरपंथियों द्वारा एक हिन्दू आश्रम (श्री प्रकाश धाम) से जुड़े लोगों को लंबे समय से लगातार सताया जा रहा है। हाल ही में, ऑपइंडिया ने इस मामले से संबंधित एक ख़बर भी प्रकाशित की थी। इस आश्रम के आध्यात्मिक गुरू ने बताया कि रूस में वो 1990 से शांति से रह रहे थे, लेकिन स्थिति तब बिगड़ गई थी जब हिन्दू-विरोधी अलेक्जेंडर दोर्किन (Alexander Dvorkin) की नज़र उनके आश्रम पर पड़ी।

रूस में कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दू आश्रम

इस मामले में ताज़ा समाचार यह है कि अलेक्जेंडर दोर्किन जो कि धार्मिक संगठनों और समूहों पर हमला करने के लिए जाना जाता है, उसने अपनी वेबसाइट iriney.ru पर खुले तौर पर हिंदू धर्म के देवी-देवताओं का अपमान किया है। हिन्दू धर्म और देवी-देवताओं के बारे में दोर्किन द्वारा की गईं अभद्र टिप्पणियों के कुछ अंश इस प्रकार हैं:

  • हिंदू धर्म एक धर्म नहीं है, बल्कि एक राक्षसी, बुतपरस्त पंथ है, जिसमें हज़ारों सम्प्रदाय मौजूद हैं।
  • इसके सार में, हिंदू धर्म शैतानवाद के अलावा और कुछ नहीं है।
  • हिंदू धर्म जादू टोना और मूर्तिपूजक दर्शन का मिश्रण है।
  • कृष्ण स्वयं शैतान हैं।
  • हिंदू धर्म जंगली बुतपरस्ती है।
  • श्री प्रकाश जी एंटीक्राइस्ट हैं।
  • श्री प्रकाश जी शैतानवाद फैला रहे हैं, हिंदू धर्म नहीं।
  • उनके चेहरे पर लगा तिलक मल के समान है, मानो शैतान ने उसे लगाया हो।
  • योग राक्षसी प्रथाओं का एक सेट है।
  • योग मृत्यु का मार्ग है।
  • योग का उद्देश्य स्थायी रूप से मरना है।
  • ध्यान के दौरान, एक योगी शैतान के साथ मिलकर रहता है।
  • कृष्ण की गोपियाँ मूल रूप से उनकी वेश्याएँ थीं।
  • काली शैतान का राक्षसी स्त्री रूप है।
  • हिंदू धर्म मानव जाति के लिए सबसे घातक दर्शन है।

आध्यात्मिक गुरू श्री प्रकाश ने हिंदू धर्म की इस अवहेलना को जब चुनौती दी, तो अलेक्जेंडर दोर्किन ने उन्हें और उनके परिवार को ‘विदेशी मैल’ तक कहा। 1 नवंबर 2018 को कुछ रूसी असामाजिक तत्वों ने पुलिस के कपड़े पहनकर उनके आश्रम में अनाधिकृत छापेमारी भी की थी। उन लोगों के साथ वहाँ की पुलिस ने श्री प्रकाश को रूस छोड़ने का दबाव बनाया और कभी वापस न लौटने को कहा। इस मामले में श्री प्रकाश के दूसरे वकील ने साबित कर दिया कि ये छापेमारी अवैध थी और 10 दिसंबर 2018 को उन्हें अलेक्जेंडर दोर्किन के ख़िलाफ़ मुक़दमा जीतने में मदद मिली। तब अदालत के आदेश में यह कहा गया कि दोर्किन की वेबसाइट पर मौजूद सभी जानकारी बेहुदी है, जो मानहानि के तहत आती है।

ईसाई कट्टरपंथी अलेक्जेंडर दोर्किन

आध्यात्मिक गुरू श्री प्रकाश ने रूस में पहले हिंदू मंदिर के निर्माण के लिए नरेंद्र मोदी से अपील की है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त 12 बड़े NGO ने नरेंद्र मोदी और एस जयशंकर को पत्र भेजकर रूस में ईसाई कट्टरपंथी अलेक्जेंडर दोर्किन को सज़ा देने और रूस में हिंदुओं व आध्यात्मिक गुरू श्री प्रकाश की मदद करने के लिए कहा है।

अलेक्जेंडर दोर्किन को सज़ा देने और रूस में हिंदुओं व आध्यात्मिक गुरू श्री प्रकाश की मदद के लिए संयुक्त राष्ट्र से मान्यता प्राप्त जो 12 बड़े NGO उनके समर्थन में आए, उसकी लिस्ट नीचे दी गई है।

आध्यात्मिक गुरू के समर्थन में आए 12 बड़े NGO

दरअसल, हिन्दू आश्रम ‘श्री प्रकाश धाम’ रूस, यूरेशिया, यूरोप और यूके में मौजूद केंद्रों का एक समूह है। इस हिन्दू आश्रम को ईसाई कट्टरपंथियों ने न सिर्फ़ बदनाम करने की कोशिश की बल्कि इसके संरक्षकों पर शारीरिक हमले भी करवाए। इसकी जानकारी आश्रम के निदेशक प्रसून प्रकाश ने ख़ुद दी।

उन्होंने इस मामले में एक याचिका भी दायर की है, जिस पर उन्होंने लोगों से मदद की गुहार लगाते हुए इस पर हस्ताक्षर करने और इसे अधिक से अधिक शेयर करने की अपील की है।

आसिफ गफूर ने 2015 के वीडियो में छेड़छाड़ कर ढूँढा बालाकोट, सोशल मीडिया पर हुई छीछालेदर

सलमान खान की फिल्म ‘दबंग-2’ में मनोज पाहवा का किरदार सलमान खान के किरदार को समझाता है कि ‘दबाव बने रहना चाहिए।’ ऐसा लग रहा है कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के पाँच महीने बाद भी पाकिस्तानी सेना ऐसे ही ‘दबाव’ में है, और अब तक हिन्दुस्तानी वायु सेना के ‘पेड़ उखाड़ने’ वाली एयर स्ट्राइक के सदमे से बाहर नहीं आ पाई है। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने अपने ट्विटर अकाउंट से 1962 के भारत-चीन युद्ध के नायकों में एक एयर मार्शल डेन्ज़िल कीलोर का डॉक्टर्ड (छेड़-छाड़ किया हुआ) वीडियो शेयर किया है। इसमें 62 के युद्ध में हिंदुस्तानी फ़ौज को हुई कुछ ऐसी जान की हानि के किस्सों की बात की जा रही है, जिनसे शायद बचा जा सकता था।

एयर मार्शल कीलोर इस वीडियो में कहते हुए सुने जा सकते हैं कि हिंदुस्तानी सेना को हुई जन-क्षति कुछ हद तक रणनीतिक चूक और अनुभवहीनता के कारण थी। “आप बिना अनुभव के लड़ाई नहीं लड़ सकते। इसकी हमने भारी कीमत चुकाई है।” उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तानी सेना के पास हिन्दुस्तानियों से बेहतर हथियार थे। लेकिन यह वीडियो असल में बालाकोट से साढ़े तीन साल पहले 2015 का है।

इस वीडियो पर गफ़ूर की टिप्पणी में भी साफ तौर पर यह 27 फ़रवरी, 2019 को हुई बालाकोट एयर स्ट्राइक के संदर्भ में किए गए कमेंट होने का दावा किया गया है। शायद अपने देश की सेना को एयर स्ट्राइक में लगे झटके में मेजर गफ़ूर यह भूल गए कि 2015 के वीडियो में बालाकोट एयर-स्ट्राइक की बात हो ही नहीं सकती।

चार घंटे और ट्विटर पर पड़ी लताड़ के बाद जब मेजर गफूर को यह ‘समझ’ में आ गया कि उन्होंने क्या हरकत की है तो वह प्रवक्ता मोड में स्पष्टीकरण वाले ट्वीट करने लगे।

लेकिन इसमें भी अपनी पाकिस्तानी (तुच्छ) सोच दिखाना वह जब्र नहीं कर पाए। उनके ट्वीट के मुताबिक वह कन्फ्यूज़ इसलिए हो गए क्योंकि जिन गलतियों की बात एयर मार्शल कर रहे थे, जिन हालातों की वह बात कर रहे थे, और जैसे कर रहे थे, वह एक जैसे हैं (1965 और 2019 में)। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दुस्तानी वायु सेना के लिए परिस्थितियाँ (उनके हिसाब से असफलता की) 1965 से लेकर अब तक कमोबेश समान हैं।

नगर निगम चलाने का भी अनुभव नहीं, फिर भी योगी को क्यों बनाया CM? अमित शाह ने बताया

भारतीय जनता पार्टी के अध्‍यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने रविवार को लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में बताया कि गोरक्षपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री क्यों बनाया गया? वैसे दक्षिण पंथ के पोस्टर बॉय योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद पर चुनने के बीजेपी के फैसले ने कई लोगों को चौंका दिया था। सबसे बड़ा सवाल यह था कि जिसे कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है, उसे देश के सबसे बड़े राज्य की कमान क्यों दे दी गई है?

गृहमंत्री अमित शाह ने आज एक कार्यक्रम में इस बात का खुलासा किया है कि पीएम मोदी और उन्होंने योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे ज्यादा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री क्यों बनाया है। अमित शाह ने कहा, “किसी ने सोचा भी नहीं था कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनेंगे। कई लोगों ने मुझसे कहा कि योगी को तो नगर निगम चलाने का भी अनुभव नहीं है, आप उन्हें सीएम क्यों बना रहे हैं। हाँ यह सही है कि उनको नगर निगम चलाने का भी अनुभव नहीं था। वह एक मंदिर के प्रमुख थे।”

कार्यक्रम के दौरान सीएम योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में अमित शाह ने आगे कहा, “लोगों ने मुझसे कहा आप उनको इतने बड़े राज्य की कमान क्यों सौंप रहे हैं। लेकिन पीएम मोदी और मैंने उन्हें सीएम बनाने का फैसला किया क्योंकि वह कर्मठ हैं और उन्होंने अपने कम अनुभव को कठोर परिश्रम से कभी बाधा नहीं बनने दिया।”

आपको बता दें कि साल 2017 में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत मिला था। जनता के इस फैसले को पीएम मोदी के विकास कार्यों को लेकर किए गए वादों के प्रति जनता का अटूट विश्वास माना गया। लेकिन इस चुनाव में पार्टी ने किसी को भी सीएम पद का चेहरा नहीं घोषित नहीं किया था। नतीजों के बाद यह एक बड़ा मुद्दा बन गया था कि बीजेपी किसे उत्तर प्रदेश का सीएम बनाया जाए। कई नामों पर चर्चा थी।

मीडिया ने भी कई नामों पर लम्बी बहस की थी, कयास लगाए थे मनोज सिन्हा का नाम ज़्यादा चर्चा में था। लेकिन बाद में योगी के नाम पर फैसला शायद इसलिए किया गया क्योंकि वह पार्टी कैडर में बहुत ज्यादा लोकप्रिय थे। योगी के मुख्यमंत्री बनते ही ऐसे सभी कयासों पर विराम लग गया था। लेकिन क्यों वाला सवाल रह गया था। जिसका जवाब आज केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दे दिया।

35A उन्मूलन: 370 हटाने का वह ‘द्वार’, जिस पर ‘कश्मीरियत’ के जिहादी नेता दे रहे पहरा

घाटी में 10,000 अतिरिक्त जवानों की तैनाती के साथ ही 35A के हटने को लेकर नए सिरे से अटकलबाज़ियाँ शुरू हो गई हैं। हालाँकि कुछ मीडिया रिपोर्टें सैन्य गतिविधि के आतंक से जुड़े होने का दावा कर रही हैं, लेकिन जानकारों की मानें तो नई सरकार के निर्वाचन के तुरंत बाद गृह मंत्री और सत्तारूढ़ भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह, और उसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल का कश्मीर दौरा संयोग नहीं है। और यह बात 35A के कश्मीरी खैरख्वाह भी जानते हैं, इसीलिए महबूबा मुफ़्ती की भाषा आग उगलने से आगे बढ़कर सीधी हिंसक हो गई है।

राष्ट्रपति भी नहीं ले सकते ‘एक इंच जमीन’…

संविधान के अनुच्छेद 35A की शब्दावली अपने आप में कम चिंताजनक नहीं है। लेकिन डान्टे (Dante) के काव्य ‘इन्फर्नो’ में जैसे नर्क के भी तल या परतें होती हैं, वैसे ही इसकी ‘चिंताजनक’ शब्दावली से भी ज़हरीला इस अनुच्छेद का इस्तेमाल है। जिहादी और उनके हिमायती इस अनुच्छेद का इस्तेमाल संविधान के दूसरे अनुच्छेद, अनुच्छेद 370 को हटने से रोकने के लिए करते हैं। अगर 35A न हो तो संभव है एक बार 370 के शांतिपूर्ण तरीके से हटने की परिस्थिति बनाई जा सकती है।

35A में जम्मू कश्मीर की राज्य सरकार और विधानसभा को यह ताकत मिली हुई है कि वह अपने नागरिक का ‘चुनाव’ करे- तय करे कि किसे वह ‘राज्य का नागरिक’ और माने किसे नहीं। अन्य राज्यों को यह ताकत नहीं है। पहली नज़र में यह महाराष्ट्र, तमिलनाडु या दिल्ली में दिखाए जा रहे बाहरी बनाम स्थानीय के क्षेत्रवाद से बहुत अलग नहीं लगता। हम रोज़ “मुंबई मराठों की”, “दिल्ली की नौकरियों कर कॉलेजों की सीटों पर पहला हक दिल्ली वालों का”, या जगन मोहन रेड्डी का “70% नौकरियाँ ‘हमारे लोगों’ को ही”, इत्यादि सुनते ही रहते हैं।

लेकिन अगर ठहर कर गौर किया जाए तो 35A की गंभीरता दिखने लगती है। हालाँकि हर राज्य में क्षेत्रवाद दबे-छिपे रूप में भाषाई आधार पर भेदभाव के लिए ही होता है, लेकिन जब यह अर्ध-अलगाववादी भावना कानून बनती है तो कमज़ोर पड़ जाती है। इसमें राज्य के जिन स्थाई निवासियों के अतिरिक्त कल्याण की बात होती है, वह स्थाई निवासी कोई भी व्यक्ति किसी भी राज्य में जा कर लम्बा समय बिताकर बन सकता है।

यानी जगन रेड्डी ने भले ही आरक्षण “राज्य के स्थाई निवासियों” की आड़ में तेलुगु-भाषियों के लिए शुरू किया हो, लेकिन अगर आप आंध्र में जाकर, एक दशक (या आंध्र विधानसभा की ‘मूल/स्थाई निवासी’ की परिभाषा के अनुसार जो भी न्यूनतम आवश्यक समय हो) का समय बिताकर, सरकारी नौकरी करते हुए या ज़मीन खरीदकर आंध्र के स्थाई निवासी बनना चाहें, तो कानून आपको नहीं रोकेगा- रोक ही नहीं सकता।

लेकिन यही अगर आप कश्मीर में 14 मई, 1954 के बाद रहने गए हों, या उसके पहले आपने वहाँ ज़मीन नहीं ले ली थी, तो आप वहाँ ज़मीन नहीं खरीद सकते, सरकारी नौकरी नहीं कर सकते, पंचायत या विधानसभा चुनाव में वोट नहीं कर सकते। आपके बच्चे जम्मू-कश्मीर सरकार के कॉलेजों में दाखिला नहीं ले सकते। आप क्या, 35A के अनुसार इस देश के ‘महामहिम’ राष्ट्रपति भी कश्मीर में सूई की नोंक बराबर भूमि अपने नाम पर नहीं खरीद सकते हैं।

आप जिस भी हालत में हों, कश्मीर सरकार के कोष से आपके लिए एक नया पैसा जारी नहीं हो सकता। इसके अलावा 35A के तहत स्थाई नागरिकों का दर्जा-प्राप्त लोगों को मिले उपरोक्त विशेष अधिकारों को राज्य के बाहर के लोग सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी इस आधार पर नहीं दे सकते कि यह संविधान-प्रदत्त कहीं भी बसने, कार्य करने, जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है।

370 को कवच

केवल इतना ही नहीं, 35A हिन्दुस्तान की संसद को हिन्दुस्तान का हिस्सा होते हुए भी कश्मीर में सबसे बड़ी ताकत होने से रोकने वाले अनुच्छेद 370 के लिए ‘कवच’ का काम करता है। बकौल कश्मीरी पक्ष, 370 को हिन्दुस्तान के किसी ‘प्रेजिडेंशियल नोटिफिकेशन’ से नहीं हटाया जा सकता, भले ही यह 370 अपनी शब्दावली में खुद के अस्थाई होने की बात करता है।

तो हिन्दुस्तान की संसद की तरफ से 370 का हटाया जाना जिहादी मानसिकता वाले ‘अलगाववादी’ स्वीकार नहीं करेंगे, और अपनी तरफ से उसे हटने देने से रोकने के लिए 35A है। 35A से जिहादियों और उनके समर्थकों का बहुमत सुनिश्चित होता है-विधानसभा में सीटों की गिनती में, और घाटी के विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों की संख्या में।

अगर 35A हट जाए तो ऐसा हो सकता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति वाली कोई केंद्र सरकार वहाँ हिन्दुओं, सिखों और अन्य गैर मुस्लिमों की कॉलोनियों को पूरी सुरक्षा के साथ बसाकर जिहादियों से बहुमत छीन ले। फिर ऐसा सम्भव है कि विधानसभा 370 को खुद ही हटा दे और सही अर्थों में कश्मीर का हिन्दुस्तान में पूर्ण-विलय हो जाए। और इसी से रोकने के लिए 35A के पक्ष में ‘कश्मीरियत’ के तीनों गुट हार्डकोर जिहादी (लश्कर, जमाते-इस्लामी), ‘सॉफ़्ट’ जिहादी (हुर्रियत, आसिया अंद्राबी) और जिहादियों के हिमायती (अब्दुल्ला-मुफ़्ती खानदान, इंजीनियर रशीद) एक सुर में खड़े हैं।

अंबेडकर ने कहा गद्दारी, बिना संसद के आया 35A

वर्तमान ही नहीं, हर काल में राष्ट्रीय स्तर पर लगभग सभी देश के हितचिंतक नेताओं ने कश्मीर के विशेष दर्जे का विरोध किया है। अंबेडकर ने संविधान सभा के अध्यक्ष होते हुए भी 370 को लिखने वाली कलम चलाने से भी मना कर दिया, क्योंकि उनकी नज़र में यह मुल्क से गद्दारी थी। उसके बाद संविधान सभा से लेकर कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी तक हर जगह उसे ख़ारिज कर दिया गया। तब नेहरू ने विदेश में बैठे-बैठे सरदार पटेल को फोन किया और 370 पास कराने की अपील की। यह जानते हुए भी कि पटेल मनसा-वाचा-कर्मणा इस अनुच्छेद, और इसके पीछे के वृहद्तर ‘अभिप्राय’ मुस्लिम तुष्टिकरण के विपरीत ध्रुव पर खड़े थे। सरदार ने खून का घूँट पीकर संविधान सभा सत्र में इसे पास कराया

अगर 370 आपको संवैधानिक रूप से ‘अपवित्र’ लग रहा है, तो 35A आपके लिए ‘अधार्मिक’ होगा। यह संविधान का अनुच्छेद तो है, लेकिन इसे संसद से कभी भी पास ही नहीं किया गया है। यह राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा दिए गए एक ‘प्रेजिडेंशियल नोटिफिकेशन’ से लाया गया है। उसमें भी राजेंद्र प्रसाद ने पत्र लिखकर इस पर आपत्ति प्रधानमंत्री नेहरू से जताई थी, लेकिन पत्र के जवाब में नेहरू ने कहा कि वह इस बारे में ‘अनौपचारिक’ रूप से राजेंद्र प्रसाद को समझा देंगे। राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद 28 फरवरी 1963 को राजेंद्र प्रसाद की मृत्यु हो गई, 1964 में नेहरू की। कोई नहीं जानता कि उन्होंने कभी राजेंद्र प्रसाद को संसद को बाईपास कर, “लोकतंत्र की हत्या” कर संविधान में बदलाव करने का कारण समझाया या नहीं समझाया। लेकिन इसका दुष्प्रभाव हिन्दुस्तान आज भी झेल रहा है।

(अधिकाँश संभावित रूप से विवादास्पद तथ्यों के लिए संदर्भ की लिंक दे दी गई है। बाकी के लिए कश्मीरी हिन्दुओं के मानवाधिकार कार्यकर्ता सुशील पंडित के नीचे एम्बेड किए वीडियो और इस विषय पर उनके अन्य वक्तव्यों को देखें।)

‘भगवा चोला पहन अराजकता फैलाना, मुस्लिमों पर धौंस जमाना कुछ लोगों की आदत बन गई है’

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने यूपी में लोगों को सड़कों पर नमाज पढ़ने से मना किया है। AIMPLB के महासचिव मौलाना वली रहमानी ने रविवार (जुलाई 28, 2019) को मुस्लिम धर्म गुरुओं से अपील की है कि वे सड़क पर नमाज पढ़ने से परहेज करें। उन्होंने कहा कि शरीयत के हिसाब से खाली जगह पर नमाज अदा की जा सकती है। खाली जगह पर नमाज पढ़ना जायज है। सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर उन्होंने कहा कि नमाज अल्लाह की इबादत है और किसी को तकलीफ देकर इबादत करना ठीक नहीं है। जब उनसे सवाल किया गया कि सड़क तो कोई खाली जगह नहीं है, तो मौलाना ने इसके जवाब में कहा कि इसके आगे वो कुछ नहीं कहना चाहते, उनकी बात का मतलब निकालने का काम सुनने और पढ़ने वालों पर छोड़ दिया जाए।

साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि ऐसा हर रोज नहीं होता है, सिर्फ जुमे (शुक्रवार) वाले दिन होता है और वो भी चंद मस्जिदों के बाहर। मौलाना ने कहा कि जब मस्जिदों में भीड़ बढ़ जाती है, तो मजबूरी में लोग सड़क पर नमाज पढ़ते हैं, लेकिन यदि इससे किसी को कोई ऐतराज है तो नमाजियों को थोड़ी जहमत उठाकर दूसरी मस्जिद में चले जाना चाहिए। सड़क पर हनुमान चालीसा पढ़ने को लेकर उन्होंने दोहरा रवैया अपनाते हुए कहा कि भगवा चोला पहनकर अराजकता फैलाना और मुस्लिमों पर धौंस जमाना कुछ लोगों की आदत बन गई है। 

गौरतलब है कि, उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर हिन्दू संगठनों ने कड़ा विरोध जताया था। इसके विरोध में उन्होंने सड़क पर हनुमान चालीसा और महाआरती करना शुरू कर दिया था। हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं का कहना था कि जब सड़क पर नमाज पढ़ी जा सकती है, तो हनुमान चालीसा क्यों नहीं? उन्होंने प्रशासन से भी इसको लेकर दोहरा रवैया अपनाने पर सवाल किया था।

जिसके बाद इस मामले का संज्ञान लेते हुए प्रशासन ने अलीगढ़ में सड़कों पर नमाज और हनुमान चालीसा पर बैन लगा दिया है। अलीगढ़ के डीएम ने कहा था कि जिले में सड़क पर नमाज पढ़ना प्रतिबंधित किया गया है। जिला मजिस्ट्रेट का कहना है कि ये प्रतिबंध ईद के मौके पर पढ़े जाने वाले नमाज को लेकर भी है। डीएम ने कहा कि हर व्यक्ति को धर्म का पालन करने का अधिकार है, लेकिन वह सिर्फ अपने व्यक्तिगत जगहों या धार्मिक जगहों पर ही धार्मिक गतिविधि कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी को भी किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि सड़क पर करने की अनुमति नहीं है।