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Breaking News: NDA संसदीय दल के नेता चुने गए नरेंद्र मोदी

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बीजेपी संसदीय दल के नेता के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी ने समर्थन किया। इसके बाद औपचारिक रूप से अध्यक्ष अमित शाह ने एक बार फिर से नरेंद्र मोदी के बीजेपी संसदीय दल के नेता चुने जाने की घोषणा की।

बीजेपी संसदीय दल के नेता चुने जाने के बाद नरेंद्र मोदी ने पार्टी संरक्षक लालकृष्ण आडवाणी से आशीर्वाद लिया।

लोकसभा चुनाव में एनडीए को ऐतिहासिक बहुमत मिला है। एक बार फिर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। जानकारी के मुताबिक, नरेंद्र मोदी 30 मई को शपथ ले सकते हैं। शपथ से पहले पीएम अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी जाएँगे, लेकिन उससे पहले वह अपने गृह राज्य गुजरात जाएँगे। यहाँ मोदी अपनी माँ से जीत का आशीर्वाद लेने भी जाएँगे। इससे पहले शुक्रवार को पीएम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की और अपना इस्तीफा सौंपा था। इस इस्तीफे को राष्ट्रपति कोविंद ने मंजूर कर लिया और लोकसभा को भंग कर दिया। राष्ट्रपति ने 16वीं लोकसभा भंग कर दी है।

इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए एनडीए गठबंधन के सभी दलों के नेता पहुँचे हैं। अमित शाह, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह समेत सभी नेता मौजूद हैं।

यह बैठक संसद के सेंट्रल हॉल में शाम 5 बजे शुरु हुई। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा 303 सीटें मिली हैं और राजग (एनडीए) गठगबंधन को 353 सीटें हासिल हुई है। बैठक में शामिल होने के लिए शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी पहुँचे।

लोकसभा चुनाव में करारी हार से दुखी ममता बनर्जी ने की इस्तीफे की पेशकश

लोकसभा चुनाव नतीजों में टीएमसी की करारी हार के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफे की पेशकश कर दी है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वो अब मुख्यमंत्री के रूप में कार्य जारी नहीं रखना चाहती हैं और पार्टी अध्यक्ष के रुप में अपनी सेवा देना चाहती हैं।

ममता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस्तीफे की पेशकश कर दी है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद ममता बनर्जी ने यह निर्णय लिया है। हालाँकि, खबरों के मुताबिक ममता बनर्जी की इस्तीफा बैठक में स्वीकार नहीं किया गया है।
टीएमसी पार्टी की आपात बैठक में ममता बनर्जी ने ये बातें कही। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बल ने उनके खिलाफ कार्रवाई की, एक आपात स्थिति पैदा की गई। साथ ही उन्होंने कहा कि हिंदू-मुस्लिम के बीच भेदभाव किया गया साथ ही वोटों की हेराफेरी हुई। ममता दीदी ने कहा कि उन्होंने चुनाव आयोग में शिकायत की, लेकिन कोई भी कदम नहीं उठाया गया।

बता दें कि भाजपा ने इस चुनाव में बंगाल में बड़ी सेंध लगाई है और 42 में से 18 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की है। इस हार की वजह से ममता बनर्जी बौखलाई हुई हैं।

Fact Check: राहुल गाँधी ने साढ़े 8 लाख वोट से जीतकर 542 सीटों में सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड बनाया?

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आ चुके हैं। जनता कॉन्ग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गाँधी को खदेड़कर भगा चुकी है, लेकिन लग ये रहा है कि जनता के सन्देश को कॉन्ग्रेस अभी भी स्वीकार कर पाने में असमर्थ है। इसीलिए अभी भी कॉन्ग्रेस की आई टी सेल और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी अपने युवराज को मसीहा बनाने के कार्यक्रम में तत्परता से जुटी हुई है।

दावा : राहुल गाँधी की जीत 542 सीटों में सबसे बड़ी जीत है

लोकसभा चुनाव 2019 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी जहाँ उत्तर प्रदेश के अमेठी सीट पर स्मृति इरानी से हार गए, वहीं केरल की वायनाड सीट पर उन्हें लाखों वोट से जीत मिली। हालाँकि, अब सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि राहुल गाँधी को वायनाड से 8 लाख 54 हजार 297 वोटों से जीत मिली है, जो कि लोकसभा की 542 सीटों में सबसे बड़ी जीत है।

फेसबुक पेज ‘Ramesh Sharma, Sanganer’ पर 24 मई को राहुल गाँधी की एक फोटो पोस्ट की गई, जिसके साथ कैप्शन लिखा गया, “कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी जी वायनाड से रिकॉर्ड 8 लाख 54 हजार 297 वोट से जीते। 542 सीटों में से ये सबसे बड़ी जीत है।”

यही पोस्ट फेसबुक पर राहुल गाँधी के भक्तों द्वारा बड़ी मात्रा में शेयर किया जा रहा है ताकि चुनाव में हुई फजीहत के बीच राहुल गाँधी की लहर को जैसे-तैसे कायम किया जा सके।

क्या है सच?

सोशल मीडिया पर किए जा रहे इस रिकॉर्ड के दावे की सच्चाई ये है कि ना तो राहुल गाँधी 542 सीटों में से सबसे ज्यादा मार्जिन से जीतने वाले नेता हैं और न ही उन्होंने वायनाड में 8 लाख 54 हजार 297 वोटों से जीत हासिल की है।

चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक, केरल की वायनाड सीट पर राहुल गाँधी को कुल 7 लाख 6 हजार 367 वोट मिले हैं। इनमें से 7 लाख 5 हजार 34 EVM वोट हैं और 1333 पोस्टल वोट। राहुल गाँधी को कुल वोट का 64.67% मिला है। वहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के प्रत्याशी को 25.14% वोट मिले।

रही बात रिकॉर्ड की तो लोकसभा चुनाव 2019 में गुजरात के नवसारी सीट से बीजेपी के प्रत्याशी सीआर पाटिल को सबसे ज्यादा 9 लाख 69 हजार 430 वोट मिले हैं। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी कॉन्ग्रेस प्रत्याशी पटेल धर्मेशभाई भीमाभाई को 6 लाख 89 हजार 668 वोट से हराया है। सीआर पाटिल को कुल वोट का 74.37% हासिल हुआ।

निष्कर्ष

राहुल गाँधी के भक्तों द्वारा सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावे में कोई लहर नहीं है। पूरे देश में सबसे ज्यादा वोटों से जीतने वाला दावा पूरी तरह गलत है। 542 सीटों पर हुए चुनाव में सबसे ज्यादा वोट बीजेपी प्रत्याशी सीआर पाटिल को मिले हैं।

केजरीवाल के हारने की ‘खुशी’ में हुआ भंडारे का आयोजन, लोगों ने कहा Amazing!

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों ने भाजपा और उसके सहयोगी दलों को छोड़कर लगभग हर राजनैतिक पार्टी को निराश किया। बिहार से लेकर बंगाल तक कई नेताओं की जमानत जब्त हो गई। यही हाल आम आदमी पार्टी के नेताओं का भी हुआ। दिल्ली और पंजाब मिलाकर आम आदमी पार्टी को सिर्फ़ एक सीट मिली। लोगों के मुताबिक पार्टी की ये दशा केजरीवाल के घमंड के कारण हुई है।

दिल्ली से लेकर पंजाब में लोगों के भीतर उनके प्रति कड़ी नाराज़गी देखने को मिलती थी। जनता को तो छोड़ दीजिए उनकी अपनी पार्टी के नेता ही उनके रवैये के कारण उनसे मुँह मोड़ने लगे थे। केजरीवाल के प्रति गुस्सा सोशल मीडिया पर तो देखने को मिलता ही था लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा था कि केजरीवाल से जनता इतनी खिन्न है कि उनकी हार की खुशी में भंडारा करवा देगी।

जी हाँ! दिल्ली में केजरीवाल की हार पर भंडारे का आयोजन किया गया। सोशल मीडिया पर जैसे ही एक यूजर ने इस भंडारे की तस्वीर को ट्वीट किया बाकी लोगों ने मजे लेने शुरू कर दिए। भंडारे के पोस्टर पर लिखा था कि दिल्ली व पंजाब के मतदाताओं ने केजरीवाल के घमंड को किया चकनाचूर।

पोस्टर के मुताबिक भंडारे का आयोजन कराने वाली समाज सेविका सिमरनजीत कौर बेदी हैं। हालाँकि सिर्फ़ इस पोस्टर से भंडारे के आयोजन की खबर की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है, लेकिन तस्वीर को देखते ही सोशल मीडिया पर लोग इसपर चुटकी ले रहे हैं। पोस्टर में केजरीवाल के भ्रष्ट होने के मामले को उठाया गया है। इसमें लिखा है कि भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर दिल्ली की सत्ता में आए केजरीवाल खुद भ्रष्ट हो गए हैं।

इस ट्वीट पर कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। किसी ने कहा कि भंडारे का प्रसाद केजरीवाल को जरूर पहुँचा देना। तो किसी ने केजरीवाल के शब्दों को रिट्वीट कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था, “Just amazing response. Unbelievable. कुछ अद्भुत ही हो रहा है। Its all divine” इस पोस्ट पर अभी तक 273 रिट्वीट हो चुके हैं और हजार से ज्यादा लोगों ने इसे लाइक किया है।

EVM 100% सही पाए गए: 20,625 VVPAT से मिलान करने पर कोई गड़बड़ी नहीं

लोकसभा चुनाव-2019 के दौरान EVM की विश्वसनीयता पर भी विपक्षी दलों की तरफ से कई सवाल उठाए जा रहे थे। लगभग सभी विपक्षी दलों ने अपनी हार के लिए EVM को ही मुख्य दोषी बताने की कोशिश की थी। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों की मिलान की माँग भी की थी।

बता दें कि सभी राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारियों के अनुसार, 20,625 वीवीपैट में से एक में भी EVM मशीन के मिसमैच होने की कोई सूचना नहीं मिली। इस साल लोकसभा चुनाव में 90 करोड़ मतदाताओं को अपना मत देना था, जिसके लिए चुनाव आयोग ने कुल 22.3 लाख बैलेट यूनिट, 16.3 लाख कंट्रोल यूनिट और 17.3 लाख वीवीपैट का उपयोग किया था।

इस बार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, 17.3 लाख वीवीपैट में से 20,625 वीवीपैट का ईवीएम से मिलान किया गया। जबकि पिछली बार महज 4125 वीवीपैट का ही ईवीएम से मिलान किया गया था। चुनाव आयोग के आँकड़ों से स्पष्ट है कि ईवीएम और वीवीपैट का मिलान पूरी तरह से सही निकला और विपक्ष की शंका गलत साबित हुई है।

बता दें कि 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने हर लोकसभा सीट के कम से कम 5 पोलिंग बूथ पर ईवीएम और वीवीपैट के मिलान की व्यवस्था का आदेश दिया था। ईवीएम में पड़े वोटों की सही जानकारी और रिकॉर्ड के लिए वीवीपैट की व्यवस्था 2013-14 में शुरू की गई थी।

बता दें कि देश की 543 में से 542 लोकसभा सीटों पर चुनाव सम्पन्न कराए गए थे जबकि एक सीट (वेल्लोर) पर धन बल के अत्यधिक इस्तेमाल को देखते हुए चुनाव रद्द कर दिया गया था। वेल्लोर सीट पर अभी चुनाव की नई तारीख की घोषणा आयोग ने नहीं की है।

वर्तमान लोकसभा का कार्यकाल तीन 3 जून 2019 को समाप्त हो रहा है। इससे पहले केंद्रीय कैबिनेट ने शुक्रवार (मई 24, 2019) को 16वीं लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर दी है। नए सदन का गठन 3 जून से पहले हो जाना चाहिए।

मैनाज़ ने अपने बच्चे का नाम ‘नरेंद्र मोदी’ रखा, समाज क्या कहेगा इसकी फ़िक्र नहीं

लोकसभा चुनाव 2019 में पीएम मोदी ने ऐतिहासिक जीत प्राप्त करके यह स्पष्ट कर दिया कि भारतवासी उनके नेतृत्व से प्रसन्न हैं। वहीं, दूसरी तरफ़ उनकी जीत की एक और तस्वीर सामने आई है, जिसमें एक मुस्लिम परिवार ने अपने नवजात बच्चे का नाम ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी’ रखा।

ख़बर के अनुसार, गुरूवार (23 मई) को वज़ीरगंज के एक मुस्लिम परिवार का आंगन एक नवजात की किलकारियों से गूँज उठा। अगले दिन, बात जब उस बच्चे के नाम रखने की बात आई, तो उसकी माँ मैनाज़ बेगम ने बच्चे का नाम ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी’ रखने की बात कहकर घर के सभी सदस्यों को चौंका दिया। मैनाज़ बेगम ने PM मोदी के नाम पर अपने बच्चे का नाम रखने की ज़िद्द इस हद तक पकड़ी कि ससुराल वालों को उसकी बात माननी पड़ी। महिला के ससुर इदरिस ने बहु के फ़ैसले पर अपनी सहमति जताते हुए इस बाबत, दुबई में रह रहे अपने बेटे मुश्ताक अहमद से फोन पर बात करके उसकी रज़ामंदी ली, जिसके बाद बच्चे का नाम नरेंद्र दामोदर दास मोदी रख दिया गया।

मैनाज़ बेगम ने अपने बच्चे का नाम PM मोदी के नाम पर रखने की वजह तमाम विकास कार्यों को बताया। मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक़ पर बनाए गए क़ानून से वो काफ़ी प्रभावित थीं। उनका कहना है कि मोदी जी मुस्लिम महिलाओं का सहारा साबित हुए हैं, और इसीलिए उन्होंने यह प्रण लिया था कि अगर मोदी जी सत्ता में दोबारा वापसी करेंगे तो वो अपने बच्चे का नाम उन्हीं (PM मोदी) के नाम पर रखेंगी।

बता दें कि मैनाज़ बेगम ने डीएम के नाम एक शपथ पत्र बनवाया है और इसे उनके ससुर मोहम्मद इदरीस ने डीएम कैम्प कार्यालय में शुक्रवार को रिसीव करा लिया है। इस शपथ-पत्र की पुष्टि एडीओ पंचायत घनश्याम पाण्डेय ने कर दी है। इस पत्र को वीडीओ परसापुर महरौर को भेजा जा चुका है। परिवार रजिस्टर में नवजात बच्चे का नाम नरेंद्र दामोदर दास मोदी दर्ज हो जाएगा।

परिवार द्वारा उठाए गए इस क़दम पर बच्चे के दादा मोहम्मद इदरिस का कहना है कि वो ख़ुद भी व्यक्तिगत रूप से मोदी जी के प्रति आस्था रखते हैं। पोते के नाम पर समाज क्या कहेगा इससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि यह एक पारिवारिक फ़ैसला है, इसमें किसी को दखल नहीं देना चाहिए।

राहुल गाँधी ने दोहराया इतिहास, 2014 के बाद 2019 में फिर हुआ उनका इस्तीफा नामंजूर

23 मई को लोकसभा चुनावी नतीजों की तस्वीर साफ होते ही एक बार फिर कॉन्ग्रेस की बुरी हार देखने को मिली। इसके बाद एक बार फिर कॉन्ग्रेस के अंदर इस्तीफ़ा देने और अस्वीकार करने का कार्यक्रम किसी रिवाज की तरह दोहराया जाना स्वाभाविक है। एक बार फिर कॉन्ग्रेस में वर्ष 2014 की तरह ही इस्तीफ़ा देने और अस्वीकार कर दिए जाने का शिष्टाचार निभाया गया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी समिति को इस्तीफ़ा को इस्तीफ़ा सौंपा गया और कमेटी द्वारा इसे नामंजूर कर दिया गया है।

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के कॉन्ग्रेस की हार की जिम्मेदारी स्वीकार की थी। उसके कुछ देर बाद ही मीडिया में खबर आई कि राहुल गाँधी ने सोनिया गाँधी के सामने इस्तीफे की पेशकश की है और सोनिया गाँधी ने उनके इस्तीफे को ठुकरा दिया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने इस खबर का खंडन किया था और कहा कि पूरी पार्टी अपने नेतृत्व के साथ मजबूती के साथ खड़ी है।

राहुल गाँधी के इस्तीफे को नामंजूर कर के कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर सन्देश देने का प्रयास किया है कि चाहे वो कॉन्ग्रेस के वंशवाद की नीति को कितनी ही बार क्यों न ठुकरा दे, लेकिन कॉन्ग्रेस और उनके कार्यकर्ताओं के लिए राजनीति के इस खानदान विशेष से बाहर सोच पाना अभी भी मुश्किल है। इस प्रकार जनता के सन्देश को नकारने की मानसिकता अभी भी कॉन्ग्रेस में मौजूद नजर आ रही। सोशल मीडिया पर लोगों को यह भी कहते देखा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस में खुद को खुद ही भारत रत्न देना और खुद ही खुद को इस्तीफ़ा देकर नामंजूर कर देने का इतिहास बहुत पुराना है।

संख्याबल में खेलता लोकतंत्र: जानिए किसको मिले वोटों की मार्जिन है सबसे कम और सबसे ज्यादा

लोकसभा चुनाव 2019 में बाजपा ने प्रचंड बहुमत के साथ वापसी की है। गुजरात में तो भाजपा का ऐसा जादू चला कि यहाँ के नवसारी लोकसभा क्षेत्र के प्रत्याशी सी आर पाटिल ने सबसे ज्यादा वोटों से जीतने का रिकॉर्ड बना दिया। सी आर पाटिल ने इस रेस में पीएम मोदी को भी पीछे छोड़ दिया है। प्रधानमंत्री को इस बार वाराणसी में 4 लाख 80 हजार वोटों से जीत मिली है, जबकि सीआर पाटिल ने कॉन्ग्रेस प्रत्याशी पटेल धर्मेंशभाई भीमभाई को 6,89,668 वोटों के अंतर से हराकर ऐतिहासिक जीत हासिल की। 2009 से लगातार जीतते आ रहे सी आर पाटिल को भाजपा ने तीसरी बार नवसारी सीट से उम्मीदवार बनाया था।

ख़ास बात यह भी है कि वोटों का ये अंतर 2019 में सबसे ज्यादा है, मगर भारत के चुनावी इतिहास में यह दूसरी सबसे बड़ी जीत है। पूर्व केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे की बेटी प्रीतम मुंडे ने अक्टूबर 2014 में उप चुनाव के दौरान महाराष्ट्र की बीड सीट पर 6.96 लाख वोटों से जीत हासिल की थी। पाटिल के जीत का आँकड़ा इससे थोड़ा सा ही कम है।

सबसे अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल करने वाले उम्मीदवारों में दूसरा नाम संजय भाटिया का है। संजय करनाल लोकसभा सीट से भाजपा के उम्मीदवार थे। इन्होंने 6,56,142 वोटों के अंतर से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार कुलदीप शर्मा को हराया।

तीसरे नंबर पर रहे हरियाणा की फरीदाबाद लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार कृष्णपाल गुर्जर। इन्होंने 6,38,239 वोटों के अंतर से अपने प्रतिद्वंदी कॉन्ग्रेस उम्मीदवार अवतार सिंह को हराया। कृष्णपाल के बाद चौथे नंबर पर सबसे ज्यादा वोटों से जीतने का अंतर राजस्थान के भिलवाड़ा सीट से सुभाष चंद्र बहेरिया रहे। इन्होंने 6,12,000 वोटों के अंतर से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार रामपाल शर्मा को मात दी। इस क्रम में पाँचवें नंबर पर भाजपा प्रत्याशी रंजनबेन भट्ट का नाम आता है। इन्होंने गुजरात के वडोदरा सीट से 5,89,177 वोटों के कॉन्ग्रेस के प्रशांत पटेल को हराया।

वहीं अगर बात करें, सबसे कम मार्जिन से हारने का, तो इसमें सबसे पहला नाम आता है भाजपा प्रत्याशी बी पी सरोज का। ये उत्तर प्रदेश के मछलीशहर से भाजपा उम्मीदवार थे। इन्होंने महज 181 वोट के अंतर से बसपा के त्रिभुवन राम को मात दी। सबसे कम वोटों के अंतर से जीत हासिल करने वाले उम्मीदवारों में दूसरा नाम लक्षद्वीप से नेशलिस्ट कॉन्ग्रेस पार्टी के उम्मीदवार पीपी मोहम्मद फैजल का है। इन्होंने मात्र 823 वोट के अंतर से कॉन्ग्रेस के हमीदुल्ला सईद को हरा दिया।

पश्चिम बंगाल की आरामबाग लोकसभा सीट से तृणमूल कॉन्ग्रेस की प्रत्याशी अपरुपा पोद्दार ने 1,142 वोट के अंतर से जीत हासिल की। वो इस चुनाव में सबसे कम वोटों के अंतर से जीतने वाली तीसरी उम्मीदवार हैं। इस सीट पर उन्हें भाजपा के तपन कुमार रॉय से कड़ी टक्कर मिली।

इस क्रम में चौथे नंबर पर आते हैं कुलदीप राय शर्मा। अंडमान निकोबार से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी कुलदीप ने भाजपा के विशाल जोली को 1,407 वोट के अंतर से अपने प्रतिद्वंदी को मात देकर जीत हासिल की। इसके साथ ही झारखंड के खुंटी से भाजपा उम्मीदवार अर्जुन मुंडा ने 1,445 वोटों के अंतर से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी कालीचरण मुंडा को हराकर जीत हासिल की।

अपनी जीत पर सीआर पाटिल कहते हैं, “पहली बार वोट डालने वाले वोटरों तक पहुँचने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रयास रंग लाया है। जीत की मार्जिन में इतनी बड़ी बढ़त के पीछे वोट देने के लिए उमड़े पहली बार के वोटरों की भीड़ जिम्‍मेदार है। युवाओं ने बीजेपी को उसकी सशक्‍त और निर्णायक नेतृत्‍व क्षमता, चहुँमुखी विकास और राष्‍ट्रीय सुरक्षा के नाम पर वोट दिया।”

पश्चिम बंगाल में Nothing is Left of ‘Left’: एक को छोड़कर सबकी जमानत जब्त

एक बार अरुण जेटली ने संसद में कहा था कि ‘If Economy is Left to Left, then nothing is Left of Economy’. उनका अभिप्राय था कि यदि अर्थव्यवस्था को वामपंथियों के भरोसे छोड़ दिया जाए तो अर्थव्यवस्था का कुछ भी नहीं बचेगा। जेटली की यह उक्ति लोकतंत्र के महापर्व लोकसभा निर्वाचन 2019 में भी सटीक बैठ गई। चुनाव के नतीजे स्पष्ट होने के साथ ही पश्चिम बंगाल में वामदलों को बहुत बड़ा झटका लगा है। यहाँ सिर्फ़ माकपा के एक उम्मीदवार बिकास रंजन भट्टाचार्या ही अपनी जमानत बचाने लायक वोट हासिल कर पाए हैं जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तो सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई

गौरतलब है कि चुनावों में प्रत्येक उम्मीदवार को जमानत राशि बचाने के लिए कुल पड़े वोटों में से 16% मत प्राप्त करना अनिवार्य होता है। निर्वाचन आयोग के नियम के अनुसार सामान्य वर्ग के प्रत्याशी के लिए जमानत राशि 25,000 की तय है। वहीं अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के लिए ये राशि 12,500 है और अनुसूचित जनजाति से आने वाले उम्मीदवार के लिए 5,000 रुपए तय हैं।

हैरान करने वाली बात ये है कि इन चुनावों में पश्चिम बंगाल में माकपा के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम भी अपनी जमानत बचाने में असफल हो गए। सलीम 34 साल सत्ता में रहे हैं और इस बार उन्हें सिर्फ़ 14.25% वोट मिले। जमानत गंवाने वालों में सलीम के अलावा मुर्शिदाबाद के मौजूदा सांसद बदरुद्दोजा खान, दमदम से नेपालदेब भट्टाचार्य और दक्षिणी कोलकाता से उम्मीदवार नंदिनी मुखर्जी शामिल हैं।

पिछले 6 दशकों में वाम दलों का ये चुनावी प्रदर्शन सबसे खराब रहा। माकपा और भाकपा ने मिलकर सिर्फ़ 5 सीटों पर जीत हासिल की। इनमें दोनों पार्टियों को तमिलनाडु में 2-2 सीटें मिली हैं, जबकि माकपा को केरल में भी 1 सीट मिली। बता दें 1952 के बाद यह पहला मौक़ा है जब लोकसभा चुनावों में वामदलों को इतनी कम संख्या पर सिमटना पड़ा। 2004 में वामदल का प्रदर्शन सबसे बेहतर था, उस दौरान उन्हें लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक 59 सीट मिली थी और मौजूदा लोकसभा में उनके पास 12 सीट थी।

NOTA दबाने में बिहारी मतदाता सबसे आगे, गोपालगंज रहा टॉप पर

इस बार के लोकसभा चुनाव में नोटा (NOTA) दबाने के मामले में बिहार सबसे आगे रहा। बिहार के 40 संसदीय क्षेत्रों में से 13 सीटों पर जनता ने नोटा को तीसरे विकल्प के रुप में चुना। यानी देश में सबसे ज्यादा बिहार के मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाकर अपने उम्मीदवारों को नकार दिया। ऐसा लगता है कि इन मतदाताओं को न भाजपा या जदयू पसंद है और न ही कॉन्ग्रेस, राजद या फिर कोई अन्य पार्टियाँ। तभी तो यहाँ के 8.17 लाख मतदाताओं ने नोटा का प्रयोग किया।

पूरे बिहार की बात करें, तो नोटा का बटन सर्वाधिक गोपालगंज लोकसभा क्षेत्र में 51,660 मतदाताओं ने दबाया, जो देश में सबसे ज्यादा है। इस सीट पर जदयू के आलोक कुमार सुमन को जीत मिली, जिन्होंने राजद उम्मीदवार सुरेंद्र राम को 2.86 लाख वोटों से शिकस्त दी। इसके अलावा बिहार के अररिया में 20,618 मतदाताओं ने तो वहीं, कटिहार में 20,584 मतदाताओं ने नोटा बटन दबाकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

दूसरे नंबर पर पश्चिम चंपारण के मतदाताओं ने नोटा के बटन का इस्तेमाल किया। यहाँ के तकरीबन 45,669 मतदाताओं ने नोटा दबाया। भाजपा सांसद संजय जायसवाल ने रालोसपा के ब्रजेश कुशवाहा को 2.93 लाख वोटों से हराकर इस जीत पर अपनी जीत बरकरार रखी।

इसके बाद तीसरे नंबर पर आता है समस्तीपुर। यहाँ के 35,417 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए नोटा के विकल्प को चुना। लोजपा के रामचंद्र पासवान ने कॉन्ग्रेस के अशोक कुमार को 1.52 लाख मतों से मात देकर ये सीट अपने नाम कर ली। वहीं, सारण में 28267, पूर्वी चंपारण में 22706, जमुई में 39496, दरभंगा में 20468, भागलपुर में 31528, आरा में 21825, गया में 30030, नवादा में 35147 मतदाताओं ने किसी पार्टी को वोट देने की बजाय नोटा बटन दबाना पसंद किया।

हालाँकि, इस बार के चुनाव परिणाम को देखें तो ऐसा लगता है कि इस बार बिहार के लोगों ने जात-पात से ऊपर उठकर वोट किया है मगर इसके साथ ही नोटा का प्रयोग करने में भी प्रथम स्थान पर रहा। खैर, ये तो लोगों की अपनी-अपनी पसंद होती है। यही तो लोकसंत्र की खूबसूरती है। लेकिन मतदाताओं को ये समझना चाहिए कि नोटा दबाने से किसी समस्या का हल नहीं निकलने वाला है। इससे सिर्फ वोट ही बर्बाद होता है और कुछ नहीं।