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वीर सिंह ही नहीं, इसहाक और शफ़ी खान भी त्रस्त हैं मवेशी-डकैतों से, कॉन्ग्रेस सरकार में अलवर के किसान बेहाल

पिछले पाँच साल से जब भी हम मवेशियों के बारे में कोई भी चर्चा करते हैं, अवश्यंभावी रूप से उसका अवसान शशि थरूर के “आज भारत में गाय होना मुस्लिम होने से ज्यादा सुरक्षित है” में ही होता है (यह बात वह संसद, ट्विटर, और गुप्ता जी के द प्रिंट में कह चुके हैं) एक नैरेटिव की जकड़ बन गई है कि दुष्ट (खासकर कि अमीर, उच्च-वर्गीय अथवा अगड़ी जातियों के) हिन्दू सड़कों पर पूरा दिन इसीलिए खलिहर घूम रहे हैं कि कोई दूसरे मजहब का मिल जाए मवेशी या मीट के साथ, उसे वहीं पीट-पीट कर मार डाला जाए। और यह नैरेटिव है कि टूटता ही नहीं है- तब भी नहीं टूटा जब यह साफ़ हो गया कि कि जुनैद सीट के झगड़े में मारा गया था, बीफ के नहीं; अब भी नहीं टूटेगा जब स्वराज्य पत्रिका ग्राउंड रिपोर्ट ले आई है कि केवल हिन्दू ही नहीं, समुदाय विशेष का किसान भी मवेशी डाका डाल कर लूटने वाले गुंडों से त्रस्त हैं, और कानून हाथ में तब लेते हैं जब पुलिस कह देती है कि हमारे पास फ़ोर्स नहीं है, खुद देख लो!

अलवर से ग्राउंड रिपोर्ट, चोरी और डकैती ही नहीं, फिरौती भी है मवेशियों की

स्वराज्य संवाददाता स्वाति गोयल-शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के अलवर में मवेशी चोरी और डकैती का बाकायदा संगठित माफिया गिरोह चल रहा है। पुरानी फिल्मों में जैसे डाकू गिरोह और झुण्ड बनाकर आते हैं, निहत्थे किसानों के मुकाबले उनके पास असलहे की कमी नहीं होती, और किसानों को धमकी दे देते हैं कि घर से बाहर मत निकलना- और यह केवल हिन्दुओं के ही साथ नहीं, मुस्लिम किसानों के साथ भी होता है। शफी खान को भी ₹2.5 लाख के मवेशियों से हाथ धोना पड़ा। किसान की कमर, और उसका ‘कानून में विश्वास’ तोड़ने के लिए यह राशि काफी है।  हिन्दू किसान ही नहीं ,रहीस खान ने भी संवाददाता से कहा कि अगर मवेशी-डकैत उनके हाथ लग गए तो पुलिस तो बाद में, वह खुद पहले उन डकैतों को ‘सबक सिखाएँगे’।

जिला अलवर, थाना क्षेत्र रामगढ़ (जो कि 60 गाँवों का थाना है) के अलावड़ा गाँव के इसहाक खान का कहना है कि तीन-तीन भैंसों के रूप में एक झटके में ₹3 लाख से हाथ धो देने के बाद भी वह पुलिस के पास नहीं जाते। कैमरे पर, ऑन-रिकॉर्ड वह और अलावड़ा के ही निवासी शफ़ी खान बताते हैं कि पुलिस के हस्तक्षेप के बाद मवेशियों का मिलना नामुमकिन हो जाता है; ऐसे बिना पुलिस के तो यह उम्मीद बनी रहती है कि शायद मवेशियों की कीमत का कुछ हिस्सा (जोकि 80% तक भी हो सकता है, यानि ₹50,000 की भैंस पर ₹40,000 तक भी हो सकता है) देकर मवेशी वापिस मिल जाएँ। पुलिस में ऐसी ही विश्वास की कमी के चलते 60 गाँवों के थाने में पिछले तीन साल में एक भी मवेशी-चोरी की रिपोर्ट नहीं है- क्योंकि पता है कि पुलिस न केवल मदद नहीं कर सकती, बल्कि पुलिस के आने के बाद मामला बिगड़ ही जाना है। और फर्जी-लिबरल मीडिया गिरोह ऐसे ही हालात में ‘बने’ आँकड़ों को उठा कर “कहाँ होती है मवेशी की चोरी? सब झूठ है।” का नैरेटिव रचता है।

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यहाँ मवेशी-डकैतों के पास पुलिस से ज्यादा असलहा होता है  

शफ़ी खान आगे और भी भौंचक्का कर देने वाली जानकारी देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक रुँध स्थित अपने अड्डे पर इन मवेशी-डकैतों ने भारी मात्रा में असलहा जमा कर रखा है। बताते हैं कि कैसे पास के छंगलकीगाँव के थानेदार की भी बकरियाँ और भैंसों को मवेशी-डकैत उठा ले गए तो पुलिस ने वहाँ (रूँध स्थित मवेशी-डकैतों के ठिकाने पर) धावा बोल दिया। दोनों तरफ से भारी गोलीबारी हुई लेकिन अंत में पुलिस के पास मवेशी-डकैतों से पहले गोला-बारूद खत्म हो गया। किसी तरह जान बचाकर वहाँ से निकलना पड़ा। उसके बाद से पुलिस ने उस इलाके का रुख करना ही छोड़ दिया।

‘कॉन्ग्रेस की वजह से मेवे मुस्लिम ले गए गाय, भाजपा के राज में ऐसा कभी नहीं हुआ’

डाइका गाँव के वीर सिंह के हवाले से रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अधिकाँश मवेशी-डकैत मेवे (मेवाती) मुस्लिम हैं जिन्हें कॉन्ग्रेस के कोर वोट-बैंकों में से एक होने के चलते सरकारी संरक्षण प्राप्त है; इससे स्थिति पूरी तरह से बेकाबू हो गई है, और मवेशी-डकैतों के हौसले बुलंद हैं। मेवाती पट्टी राजस्थान के अलवर और हरियाणा के नूह जिलों में स्थित है, और इसे मवेशियों की डकैती और उनकी अवैध हत्या का ‘हब’ माना जाता है। वीर सिंह ने यह भी कहा कि राजस्थान में पिछले साल तक रही वसुंधरा राजे की भाजपा सरकार के समय में हालात बेहतर थे।

‘पुलिस मदद करने की बजाय हम ही पर केस ठोंक रही है’

अलवर के मवेशी किसान चक्की के दो नहीं, कई पाटों में पिस रहे हैं। एक तरफ मवेशी-डकैतों के आतंक से गाढ़ी कमाई से खरीदे मवेशी चले जाते हैं, जिससे भूखे मरने और बेरोजगारी की नौबत आ जाती है। दूसरी ओर से पुलिस हाथ खड़े कर रही है कि उसके हाथ में कुछ नहीं है।

लेकिन जब यही किसान खुद चार-पाँच का दल बनाकर सड़कों पर, हाइवे पर पहरा देते हैं कि अपने मवेशियों को यूपी के अलीगढ़ या हरियाणा के मोहम्मदपुर में कटने के लिए ले जा रहे मवेशी-डकैतों से छुड़ा लें तो शेर बनती वही पुलिस ‘कानून हाथ में लेने’ के जुर्म में उन गरीब किसानों को गिरफ्तार करने दौड़ी आती है, क्योंकि उस पर सरकार का दबाव होता है, और सरकार पर मेवाती मुस्लिमों के वोट बैंक का और फर्जी-लिबरल गैंग का दोहरा दबाव।

स्वाति गोयल-शर्मा लिखतीं हैं कि भूखे किसानों का गुस्सा किसी भी दिन फूट सकता है- किसान मवेशी-चोरों को जान से मारकर उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए भी तैयार हैं । समाज रात-दिन तोते की तरह ‘अहिंसा-अहिंसा’ रटाने से अहिंसक नहीं हो जाता, बल्कि सरकार और तंत्र के इस भरोसे से अहिंसक होता है कि उसे अन्याय से लड़ने के लिए हथियार उठाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। राजस्थान की गहलोत सरकार अलवर के डेयरी किसानों के बीच चौपाल में बैठकर, उनसे आँख मिलाकर यह भरोसा दे सकती है?


गुरुग्राम मुस्लिम युवक के दावे झूठ साबित होने के बावजूद ‘The Wire’ उसे लेकर फैला रहा ज़हर

पूरे लोकसभा चुनाव के दौरान 100 से भी अधिक ग़लत राजनीतिक विश्लेषण कर के अपना एक्यूरेसी रेट शून्य से भी नीचे रखने वाली प्रोपेगैंडा-परस्त वेबसाइट ‘द वायर’ ने अब फेक न्यूज़ के सहारे अपनी बात साबित करने की कोशिश की है। वेबसाइट ने गुरुग्राम वाली उस घटना को उठा कर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ अत्याचार के रूप में साबित करने की कोशिश की है, जिसमें शिकायत दर्ज कराने वाले मुस्लिम युवक के दावे झूठे पाए गए थे। बता दें कि गुरुग्राम में मोहम्मद बरकत आलम ने आरोप लगाया था कि ‘जय श्री राम’ न बोलने पर उसके साथ मारपीट की गई और उसकी इस्लामी टोपी को उछाल कर फेंक दिया गया था। बाद में पुलिस की जाँच और सीसीटीवी फुटेज खंगालने के बाद ये दावे झूठे पाए गए थे। यह एक सामान्य मारपीट की घटना थी।

“Simply Being Muslim” पर क्लिक करते ही गुरुग्राम वाली न्यूज़ खुल जाती है (नीचे देखें)

‘द वायर’ के लेख में फेक दावों वाली न्यूज़ का जिक्र कर ‘डर का माहौल’ साबित करने की कोशिश की गई

‘द वायर’ ने एक लेख छापा है, जिसके शीर्षक है- “दक्षिणपंथ ऊपर: लिबरल भारत के लिए रास्ते हुए बंद”। इस लेख में कई सारे आधारहीन कारण गिनाए गए हैं ताकि भारत में असहिष्णुता और डर के माहौल साबित किए जा सकें और उसके लिए गुरुग्राम वाली घटना का भी सहारा लिया गया है। इसमें लिखा गया है कि इस सप्ताह कई हिंसक घटनाएँ हुई, जैसे गुरुग्राम में में पीड़ित के मुस्लिम होने की वजह से घटी घटना। इस लेख में राईट विंग का बताते हुए कुछ ऐसे लेखों के हिस्सों को जगह दी गई, जिसमें लिबरलों के बारे कुछ बातें कही गई थीं।

मोदी जी सॉरी, शपथ ग्रहण में नहीं आऊँगी: 54 राजनीतिक हत्याएँ बनी ममता बनर्जी के U-टर्न का कारण

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी ने ट्वीट कर बताया है कि वह नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं होंगी। उन्होंने ट्वीट कर यह आरोप लगाया कि पीएम मोदी ने मुझे मजबूर किया है कि मैं उनके शपथ ग्रहण समारोह में ना शामिल होऊँ।

बता दें कि ममता बनर्जी इस बात से नाराज हैं कि पीएम मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान मौत के घाट उतार दिए जाने वाले बीजेपी कार्यकर्ताओं के परिवार वालों को आमंत्रित किया गया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी शपथ ग्रहण का भी राजनीतिक लाभ उठा रही है।

ममता बनर्जी ने बकायदा एक चिट्ठी जारी कर लिखा है कि भाजपा ने इस कार्यक्रम में मृत बीजेपी कार्यकर्ताओं के परिवार वालों को बुलाया है और इसे राजनीतिक हत्या करार दिया है। ममता का कहना है कि ये राजनीतिक हत्या नहीं है, बल्कि आपसी रंजिशों के मामले हैं।

ममता बनर्जी ने चिट्ठी में लिखा है, “बधाई, नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, आपके संवैधानिक आमंत्रण को मैंने स्वीकार कर लिया था और आपके शपथ ग्रहण समारोह में मैं आने को तैयार थी। लेकिन पिछले कुछ समय में मैंने रिपोर्ट्स देखी हैं कि भारतीय जनता पार्टी कह रही है कि उन्होंने भाजपा के उन 54 कार्यकर्ताओं के परिवार को भी न्योता दिया है जिनकी बंगाल में राजनीतिक हत्या कर दी गई है।”

बता दें कि इससे पहले खबरें आई थीं कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 30 मई को प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के शपथ-ग्रहण समारोह का हिस्सा होंगी। राज्य सचिवालय में पत्रकारों से बातचीत में ममता ने कहा था कि शपथ-ग्रहण समारोह के लिए मंगलवार को न्योता आया है और वह संवैधानिक शिष्टाचार के नाते इसमें शिरकत करेंगी। लेकिन एक दिन बीतते ही मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया और ममता ने राजनीतिक नफा-नुकसान का हिसाब लगाते हुए, शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया।

वहीं, बंगाल बीजेपी के कैलाश विजय वर्गीय का कहना है कि यह पार्टी का निर्णय है कि किसे शपथ ग्रहण में बुलाए, किसे नहीं।

रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी ने ढूँढ निकाले कॉन्ग्रेस के हत्यारे, कहा – ‘इसी कमरे में बैठे हैं’

लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन पर CWC की समीक्षा बैठक के दौरान कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के इस्तीफे की पेशकश के बाद मनी लॉन्ड्रिंग मामले में रोजाना ED ऑफिस के चक्कर काट रहे रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी और कॉन्ग्रेस पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा का गुस्सा कुछ शीर्ष नेताओं पर फूटा और उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस के हत्यारे इसी कमरे में बैठे हैं।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गत शनिवार (मई 25, 2019) को हुई कार्यकारिणी समिति की बैठक में राहुल गाँधी की बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा ने कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया और बैठक में मौजूद पार्टी के कुछ शीर्ष नेताओं पर बरसते हुए इशारों में ही उन्हें चुनाव में हुई कॉन्ग्रेस की फजीहत का जिम्मेदार ठहराया। इसी बैठक में राहुल गाँधी ने भी वरिष्ठ नेताओं द्वारा अपने बेटों के लिए टिकट माँगने की जिद पर नाराजगी जाहिर की थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गाँधी परिवार ने इस बैठक में कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा राहुल गाँधी को जरूरी समर्थन ना देने पर नाराजगी जाहिर की थी। परिवार की नाराजगी स्पष्ट थी, क्योंकि सोनिया भी पूरी बैठक के दौरान नहीं बोलीं और यह जाहिर किया कि उन्हें भी अपने विश्वस्त साथियों से निराशा हासिल हुई।

बताया जा रहा है कि राहुल की बहन प्रियंका वाड्रा गाँधी ही पहली नेता थीं, जिन्होंने यह सुझाव दिया कि राहुल को अपने इस्तीफे पर विचार के लिए एक महीने का समय दिया जाए। कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ अपनी बातचीत में भी प्रियंका और राहुल ने कई नेताओं की कार्यप्रणाली को सही नहीं ठहराया।

CWC की इस बैठक में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम चुपचाप थे। वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ‘गो-भक्त’ कमलनाथ इस बैठक में शामिल नहीं हुए। कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा और चिदंबरम के बेटे कार्ति तमिलनाडु की शिवगंगा सीट से लोकसभा चुनाव जीते हैं। जबकि, अशोक गहलोत के बेटे वैभव जोधपुर सीट से चुनाव हार गए हैं।

टीचर रमीज़ राजा ने किया 50 से ज़्यादा बच्चों का यौन शोषण, POCSO कोर्ट ने दी आजीवन कारावास की सजा

जयपुर में एक प्राइवेट स्कूल के टीचर रमीज़ राजा को 50 से अधिक बच्चों के ब्लैकमेलिंग, सेक्सुअल एब्यूज और रेप के आरोप सिद्ध होने के बाद, स्पेशल पॉक्सो कोर्ट के जज ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

न्यायालय ने पीडोफाइल शिक्षक (बाल यौन अपराधी) पर ₹50,000 का जुर्माना भी लगाया है, जिसे यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम, भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत POCSO अदालत-3 के द्वारा दोषी ठहराया गया है। यह केस उन पर वर्ष 2017 से चल रहा है।

पीड़ितों में से एक के वकील असलम खान ने कहा, “राजा ने उन छात्रों को यौन शोषण का शिकार बनाया, जो ट्यूशन कक्षाओं के लिए उसके घर आते थे। उसने अपराध की वीडियो क्लिपिंग भी बनाई और ऐसा उसने बच्चों से उसके लिए पैसे लाने के लिए किया था।”

मामले का पता तब चला, जब उसने कुछ वीडियो क्लिपिंग्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया और जब इसे एक पीड़ित बच्चे के पेरेंट्स ने देखा, तो आरोपित शिक्षक रमीज़ राजा पर फरवरी 2017 में FIR दर्ज़ कराई।

रमीज़ राजा को फरवरी 09, 2017 को रामगंज पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। आरोपित ने 2011-2017 के दौरान, 6 साल की अवधि में 50 से ज़्यादा बच्चों को अपना शिकार बनाया था और उसने बच्चों के 50 पोर्नोग्राफिक क्लिपिंग भी रिकॉर्ड किए थे।  

जहाँ पर रमीज़ पढ़ाता था वह स्कूल रामगंज के चार दरवाजा में स्थित था। तमाम रैलियों और विरोध के बाद भी स्कूल प्रशासन ने रमीज़ पर कोई एक्शन लेने के बजाए उसे स्कूल से निकाल बाहर किया। हालाँकि, बाद में पुलिस ने स्कूल के मालिक सरवर आलम को सबूत छुपाने के जुर्म में गिरफ्तार किया था।

राहुल गाँधी का ‘मौनव्रत’: कॉन्ग्रेसियों से मिलने से इनकार, बहन प्रियंका ही कर रही हैं सब बातचीत

लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी एकदम एकांतप्रिय होते नजर आ रहे हैं। एक ओर राहुल गाँधी जहाँ चुनाव से पहले लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर जनसभाओं में चौकीदार चोर है जैसे नारे लगाते नहीं थक रहे थे, वहीं नतीजों के बाद उन्होंने अचानक से इतनी चुप्पी कैसे साध ली है यह सबके लिए हैरान कर देने वाला प्रश्न हो चुका है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार मई 28, 2019 को भी राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं से मिलने से साफ़ मना कर दिया। ऐसे में उनके जीजा जी रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी वाड्रा ही सभी मेहमानों से मिल रही हैं।

हालाँकि, कुछ सूत्रों का यह भी कहना है कि अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने की जिद पर अड़े हुए राहुल गाँधी ने किसी बेहतर विकल्प की तलाश तक अध्यक्ष पद पर बने रहने का निर्णय भी लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो राहुल गाँधी ने अपनी पार्टी को नया अध्यक्ष चुनने के लिए एक महीने का समय दिया है। जून के प्रथम सप्ताह में कॉन्ग्रेस पार्टी की बैठक होनी है, हो सकता है कि राहुल गाँधी उसमें बताएँ कि वो पार्टी में किस पद पर बने रहना चाहते हैं।

नेहरू-गाँधी परिवार की करीबी मानी जाने वाली कॉन्ग्रेस नेता शीला दीक्षित का कहना है कि यह दुखद है कि उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा है। साथ ही उन्होंने आशा जताई है कि वरिष्ठ नेता मिलकर राहुल गाँधी को मनाने में कामयाब रहेंगे। लालू प्रसाद यादव से लेकर एमके स्टालिन तक, सभी लोग राहुल गाँधी को फोन द्वारा यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें इस्तीफ़ा देने का विचार त्याग देना चाहिए। लालू यादव ने राहुल गाँधी को समझाते हुए यह भी कहा कि उन सभी का सपना भाजपा को डूबते हुए देखना है।

राहुल गाँधी के नजदीकियों का कहना है कि उन्होंने मंगलवार को तुगलक लेन स्थित उनके आवास पर मिलने गए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सचिन पायलट और AICC के जनरल सेक्रेटरी केसी वेणुगोपाल से भी मिलने से साफ इनकार कर दिया। ऐसे में उनकी बहन प्रियंका गाँधी ने ही सभी वरिष्ठ नेताओं से बातचीत की।

देखना यह है कि राहुल गाँधी का यह मौन व्रत आखिर कब तक जारी रहता है। यह भी हो सकता है कि राहुल गाँधी चुनाव के बाद बस अपनी थकान उतारना चाह रहे हों। फ़िलहाल उन्हें अकेले छोड़ देना चाहिए, वैसे भी अगले चुनाव में अभी लगभग 5 साल और बाकी है।

कार्ति ने सुप्रीम कोर्ट से वापस माँगे ₹10 करोड़, जवाब मिला- ‘संसदीय क्षेत्र पर ध्यान दो’

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को सुप्रीम कोर्ट ने अपने संसदीय क्षेत्र पर ध्यान देने की सलाह दी है। दरअसल, आइएनएक्स मीडिया केस और एयरटेल मैक्सिस केस में आरोपित कार्ति चिदंबरम ने अपने 10 करोड़ रुपए वापस पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। ये रुपए इस वर्ष की शुरुआत में उनके द्वारा विदेश जाने से पहले जमानत राशि के तौर पर जमा कराए गए थे। उन्होंने इसे वापस रिफंड कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी। हालाँकि, भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने उनकी याचिका खारिज़ कर दी।

कार्ति चिदंबरम की दलील थी कि उन्हें ये रुपए वापस किए जाने चाहिए क्योंकि वो बताई गई तारीख पर विदेश से वापस लौट आए। कॉन्ग्रेस के नव-निर्वाचित सांसद कार्ति चिदंबरम का प्रतिनिधित्व कर रहे उनके काउंसल को जस्टिस गोगोई ने कहा, “अपने संसदीय क्षेत्र पर ध्यान दीजिए।” कार्ति के ख़िलाफ़ सरकारी एजेंसियाँ जाँच चला रही हैं और इससे पहले वह 2 बार अदालत से विदेश जाने की इज़ाज़त माँग चुके हैं।

इससे पहले जनवरी 2019 में कार्ति चिदंबरम ने फरवरी और मार्च में विदेश दौरे की इजाज़त माँगी थी। इसके बाद अप्रैल में उन्होंने फिर से इजाज़त माँगी कि उन्हें मई व जून में विदेश जाने दिया जाए। मई के शुरुआत में उन्होंने अपने द्वारा डिपोजिट की गई राशि वापस पाने के लिए याचिका दाखिल की। जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ के समक्ष कार्ति चिदंबरम की तरफ़ से दलील दी गई थी कि उन्होंने क़र्ज़ लेकर सिक्यूरिटी डिपोजिट की व्यवस्था की थी। उन्होंने अदालत को कहा था कि उन्हें उस कर्ज़े का ब्याज भी देना पड़ रहा है।

मोदी कैबिनेट में शामिल नहीं होंगे अरुण जेटली, PM मोदी को पत्र लिखकर बताया अपना फैसला

पूर्व वित्तमंत्री अरुण जेटली ने शपथ ग्रहण से एक दिन पूर्व ही नई सरकार में स्वास्थ्य कारणों से कोई भी पद स्वीकार करने में अपनी असमर्थता जता दी है। अरुण जेटली ने अपने फैसले की जानकारी नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर दे दी है। उन्होंने इस फैसले के पीछे स्वास्थ्य कारणों को ही बताया है।

सोशल मीडिया में कई दिनों से उनके ख़राब स्वास्थ्य की खबरें बहुत तेजी से फैलाई जा रही थीं। जिसका दो दिन पहले PIB ने खंडन भी किया था। उसके एक दिन पहले ही उन्हें AIIMS से डिस्चार्ज किया गया था। लेकिन शायद डॉक्टर्स की सलाह पर अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह निर्णय लिया है।

हालाँकि, खबर लिखे जाने तक सरकार की तरफ से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। अब ये भी देखना लाज़मी होगा कि अरुण जेटली की अनुपस्थिति में अगला वित्तमंत्री किसे बनाया जाता है।

लता मंगेशकर को तो छोड़ दो कॉन्ग्रेसियों, सावरकर की तारीफ़ कर उन्होंने ऐसा क्या गुनाह कर दिया भाई!

हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय पार्श्व गायिका लता मंगेशकर ने वीर सावरकर की प्रशंसा की है, जिसके बाद वह कॉन्ग्रेस के निशाने पर आ गईं। आठ दशकों से हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में सक्रिया लता मंगेशकर ने कहा कि वीर सावरकर की आलोचना करने वालों को राष्ट्रवाद की समझ नहीं है। बता दें कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा था कि सावरकर राष्ट्र के विभाजन का विचार लेकर आने वाले पहले व्यक्ति थे, जिस पर जिन्ना ने अमल किया और परिणाम स्वरूप भारत दो हिस्सों में बँट गया। सावरकर की आलोचना से आहत लता ने उनकी जयंती पर मंगलवार (मई 29, 2019) को एक ट्वीट के माध्यम से लिखा:

“नमस्कार, आज स्वातंत्र्य वीर सावरकर की जयंती है। मैं इस अवसर पर उनके व्यक्तित्व को, उनकी देशभक्ति को प्रणाम करती हूँ। आजकल कुछ लोग सावरकर जी के विरोध में बातें करते हैं। वे लोग यह नहीं जानते कि सावरकर जी कितने बड़े देशभक्त और स्वाभिमानी थे।”

लता मंगेशकर के इस बयान के बाद कॉन्ग्रेस ने उनका विरोध किया। मुंबई कॉन्ग्रेस के उपाध्यक्ष चरण सिंह सापरा ने कहा कि लता मंगेशकर को सावरकर के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है। पूर्व विधान पार्षद सापरा ने कहा कि लता मंगेश्कर को यह भी नहीं पता होगा कि सावरकर ने महात्मा गाँधी के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का विरोध किया था। उन्होंने दावा किया कि सावरकर ने हिन्दुओं को उस आन्दोलन में शामिल न होने के लिए एक ‘फतवा’ भी जारी किया था। कॉन्ग्रेस के मीडिया पैनलिस्ट चरण ने आगे कहा कि लता मंगेशकर को इतिहास नहीं पता है। उन्होंने एक ट्वीट के माध्यम से नाथूराम गोडसे और सावरकर की तुलना भी की। सपरा ने लिखा कि सावरकर उतने ही ‘देशभक्त’ थे, जितने नाथूराम गोडसे थे।

लता मंगेशकर ने एक विडियो शेयर किया, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सावरकर पर अपने विचार रख रहे हैं। भाजपा की जीत के बाद 23 मई को लता मंगेशकर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अलग-अलग ट्वीट कर के बधाई भी दी थी।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब मुंबई कॉन्ग्रेस के नेताओं द्वारा भारत रत्न से सम्मानित गायिका लता मंगेशकर को लेकर बुरा-भला कहा गया हो। इससे पहले जब नवम्बर 2013 में लता मंगेशकर ने नरेन्द्र मोदी का समर्थन किया था, तब जनार्दन चांदुरकर ने कहा था कि उनका भारत रत्न पुरस्कार छीन लेना चाहिए। उन्होंने लता मंगेशकर को देशहित में सोचने की सलाह दी थी। नरेन्द्र मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे और लता मंगेशकर ने कहा था कि वह नरेन्द्र मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती हैं। इस पर बौखलाए कॉन्ग्रेस नेता जनार्दन ने कहा था कि लताजी को ‘सांप्रदायिक व्यक्ति’ का समर्थन करना है तो पहले अपना सम्मान वापस करें।

लता मंगेशकर स्वास्थ्य और उम्र की वजह से अब गायिकी में सक्रिय नहीं रहती हैं लेकिन कुछ अवसरों पर ट्विटर के माध्यम से अपने प्रशंसकों से जुड़ी रहती हैं। लता मंगेशकर बताती हैं कि वह इस उम्र (89 वर्ष) में रियाज करना नहीं भूलतीं और युवा गायकों को भी ऐसा करने की सलाह देती हैं। भारतीय म्यूजिक इंडस्ट्री के अपने पुराने साथियों, जैसे किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी इत्यादि के जन्मदिवस पर लता मंगेशकर उनसे जुड़ी यादें शेयर करती रहती हैं।

TIME का U-Turn: अब PM मोदी को बताया सबसे बड़ा Unite करने वाला, गिनाई उपलब्धियाँ

अंतरराष्ट्रीय मैगज़ीन ‘टाइम’ ने एक महीने के भीतर बड़ा यू-टर्न लिया है। कुछ दिनों पहले प्रकाशित संस्करण में टाइम ने मोदी को ‘Divider In Chief’ कहा था। इसका अर्थ हुआ- विभाजित करने वालों या बाँटने वालों का मुखिया। पूर्वग्रह से भरे उस लेख में नरेन्द्र मोदी पर समाज को बाँटने के आरोप लगाए गए थे। चुनाव के दौरान इस लेख की ख़ूब चर्चा हुई थी और कई विपक्षी नेताओं ने मोदी पर भारत की छवि बिगाड़ने का आरोप भी लगाया था। अब एक ताज़ा लेख में टाइम ने पलटी मारी है। अब मोदी के लिए ‘Divide’ की जगह ‘Unite’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इंडिया इंक के सीईओ मनोज लडवा द्वारा लिखे इस लेख में कहा गया है कि भारतीय मतदाताओं को आज तक इस तरह किसी ने ‘Unite’ नहीं किया, जैसे नरेन्द्र मोदी ने किया है।

टाइम के इस लेख में लिखा है कि मोदी का दोबारा जीत कर आना प्रतिभा की जीत है, अवसरों की जीत है और ग़रीबों के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों की वजह से यह संभव हो पाया है। इस लेख में बताया गया है कि मोदी ने हिन्दू-मुस्लिम में भेदभाव किए बिना दोनों ही समाज के ग़रीबों को उनकी बुरी अवस्था से पिछली पीढ़ियों के मुकाबले काफ़ी तेज़ी से बाहर निकाला, दोनों के लिए ही सामाजिक रूप से विकासपरक योजनाएँ बनाई गईं। लेख में बताया गया है कि मोदी द्वारा टेक्नोलॉजी को आत्मसात करने के कारण यूनिवर्सल हेल्थकेयर, हाउसिंग, वित्तीय समरसता और क्लाइमेट के क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव हुए हैं। इस लेख में आगे लिखा गया है:

“नोटबंदी से भले ही कुछ तात्कालिक परेशानियाँ हुईं लेकिन इसके लॉन्ग-टर्म फायदे हुए हैं। लोगों पर टैक्स का भार कम हुआ है लेकिन टैक्स कलेक्शन दोगुना से भी अधिक हो चुका है। ज्यादा टैक्स रेवेन्यु का फायदा यह हुआ कि जनहित के कार्यों को ज्यादा फंडिंग मिली और इससे बिजली एवं स्वच्छता के क्षेत्र में काफ़ी अच्छे कामकाज हुए। 20 करोड़ नए बैंक खातों के खुलने से वो लोग भी भारत की औपचारिक वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा बने, जिन्होंने कभी बैंकों का मुँह तक नहीं देखा था। डायरेक्ट ट्रान्सफर से सरकारी योजनाओं में दलाली कम हुई है और लाभार्थियों तक वित्तीय सहायता या अनुदान सीधे पहुँच रही है। जीएसटी से पूरे भारत में सामान टैक्स व्यवस्था है।”

टाइम के इस लेख में मोदी सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। मनमोहन काल में 12% रही महंगाई को सीधे 3% पर लाने के लिए मोदी सरकार की पीठ थपथपाई गई है। लिखा गया है कि मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे सभी कार्य अभी ‘Work In Progress’ हैं, यानी इन सभी क्षेत्रों में और भी कार्य होने बाकी हैं। टाइम के इस लेख में मोदी को भारत में समाज के विभाजन की मूल समस्या को हल करने वाला बताया गया है, यानी मोदी ने इस चुनाव में जाति के बैरियर को तोड़ दिया। भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी को रास्ते पर लाने के लिए मोदी की प्रशंसा की गई है। कुल मिला कर देखें तो टाइम के पिछले पूर्वग्रह से ग्रसित लेख में आँकड़ों व तथ्यों का अभाव था, इस लेख को आँकड़ों, योजनाओं व तुलनात्मक अध्ययन के जरिए तथ्यपरक बनाया गया है।

Time के पिछले लेख पर ऑपइंडिया ने आपत्ति जताते हुए यह लेख लिखा था।