Thursday, September 24, 2020
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लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला (भाग 4)

अंतिम तीर क्या है? ये तीर है अवसाद का, ये तीर है उन्माद के चरम का। ये तीर विपक्ष और उनके समर्थकों ने अपने हाथ में लिया है, और गुस्से में अपने शरीर के तमाम हिस्सों में घुसेड़ लिया है क्योंकि उनके लिए अपने आप को गलत होते देखना, और लोकतंत्र के प्रतिभागी नागरिकों के बड़े प्रतिशत का उनके हिसाब से नहीं चलना, बहुत ही कष्टकारी है।

EVM और चुनाव आयोग की बात

ईवीएम एक मशीन है। मशीनें खराब होती हैं। लेकिन खराब मशीनों से चुनाव नहीं होता। चुनाव आयोग ने कई बार कहा है कि उनके 5% मशीनों के खराब होने की दर है, जिसके लिए वो रिज़र्व में उतनी ही मशीनें लेकर चलते हैं ताकि किसी भी ऐसी स्थिति में चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से कराया जा सके। हम और आप, सबने, फ़लाँ जगह ईवीएम खराब हुआ, एक ही पार्टी को वोट जा रहे हैं, जैसी खबरें सुनी हैं। ये खबरें सच होती हैं।

जो ख़बर आप नहीं सुन पाते वो यह है कि उन मशीनों को बदला गया, और चुनाव सही तरीके से हो गया। जहाँ तक हैकिंग की बात है, तो वो संभव नहीं है। चुनाव आयोग ने सबको बुलाया और कहा कि वो हैक करके दिखा दें, तो लोग पहुँचे ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है क्योंकि वो संतुष्ट हैं।

ईवीएम के तीन हिस्से होते हैं, जिसमें बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और वीवीपैट होते हैं। वीवीपैट में आपको तीन सेकेंड तक एक पर्ची दिखती है कि आपने जो वोट डाला है, वो उसी पार्टी को गया जिसका आपने बटन दबाया था। बैलेट यूनिट पर आप उँगली से दबाते हैं, कंट्रोल यूनिट बाहर अधिकारी के पास होता है जो आपको वोट देने के लिए निर्देश देता है।

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इसकी प्रक्रिया इतनी जटिल है कि पहले के दो स्तर तक किसी को पता नहीं होता कि किस बैलट यूनिट के साथ कौन सी कंट्रोल यूनिट जाएगी। इसलिए आप वहाँ छेड़-छाड़ करके भी कुछ नहीं पाएँगे। फिर, जिला मुख्यालयों में हर ईवीएम से, सारे पार्टियों के पोलिंग एजेंट की मौजूदगी में छद्म-वोटिंग कराई जाती है ताकि सबको तसल्ली हो जाए कि सारी मशीन ठीक हैं। यहाँ कई मशीनें खराब निकलती हैं, जिनको बदल दिया जाता है। उसके बाद, जब बूथ तक मशीन पहुँच जाती हैं, तो वोटिंग शुरु होने से पहले, हर बूथ पर, हर पार्टी के एजेंट की मौजूदगी में फिर से मॉक-वोटिंग होती है कि फिर से देख लिया जाए, सारी मशीनें ठीक काम कर रही हैं।

ये इसलिए होता है कि सबको संतुष्टि भी मिल जाए कि कोई गड़बड़ी नहीं है, और दूसरी बात यह कि मशीन है, आने-जाने में, हो सकता है कि बिगड़ जाए, तो सब लोग जब तक देख न लें, वोटिंग शुरु नहीं होती। इतने स्तर की प्रक्रिया के बाद ईवीएम अपना काम शुरू करती है। जब आम लोगों तक इस तरह की जानकारी पहुँचने लगे, तो उन्होंने भी इस नैरेटिव को नकारना शुरु किया। साथ ही, कई राज्यों में गैर-भाजपा सरकार बनने से भी लोगों ने माना कि हैकिंग की बात गलत है।

नई नौटंकी: स्ट्रॉन्ग रूम के पास लोग घूम रहे हैं

चूँकि, ईवीएम हैकिंग की बात अब विपक्ष की छवि बनाने में व्यस्त मीडिया भी नहीं कर रहा, तो अब नया नैरेटिव बनाने की ज़रूरत पड़ी। नया नैरेटिव मध्य प्रदेश चुनावों के समय में पहली बार जनता के बीच आया था। वो नैरेटिव था कि कुछ लोग स्ट्रॉन्ग रूम, जहाँ चुनावों के बाद ईवीएम रखे जाते हैं, वहाँ घूमते पाए गए। इसमें इनके पास कोई सबूत नहीं होता, बल्कि इन्हें लगता है कि अगर हारेंगे तो यही नैरेटिव चलाया जाएगा ताकि अविश्वास का माहौल बने। बात यह हुई कि कॉन्ग्रेस वहाँ जीत गई और फिर इस नौटंकी को सब भूल गए।

अब लोकसभा चुनावों के सातों चरण निपट गए, एग्जिट पोल में भाजपा को पूर्ण बहुमत की बात हो रही है, तो विपक्ष ने फिर से लोगों में अविश्वास फैलाने की कोशिश की है। ट्विटर और फेसबुक पर तस्वीरों शेयर की जानें लगीं कि गाड़ियों में ईवीएम भर कर कहीं ले जाया जा रहा है। कहीं पर यह कहा गया कि स्ट्रॉन्ग रूम में भाजपा वाले फ़लाँ रात को घुसने वाले हैं, इसलिए चौकसी बढ़ाई जाए।

इसमें दो समस्याएँ हैं। पहली यह है कि स्ट्रॉन्ग रूम में कैमरे से लगातार निगरानी होती है, हर ईवीएम आदि की पूरी विडियो रिकॉर्डिंग होती है, हर पार्टी को प्रतिनिधि की वहाँ मौजूदगी रहती है, अतः ये सब कहना कि वहाँ कुछ होने वाला है, महज़ डर फैलाने की बात है, और कुछ भी नहीं।

दूसरी बात, जब ईवीएम कहीं गए हैं, तो वहाँ से आएँगे भी। उसमें पैर तो हैं नहीं कि बूथों से वो खुद चल कर आएँगे। उन्हें किसी गाड़ी पर रखा जाएगा और वो गाड़ी जिला मुख्यालय जाएगी, वहाँ से कहीं और जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया में, हर तरह की गाड़ियों का प्रयोग होता है। छोटी ट्राली से लेकर ट्रक तक। ये किसी जासूस फिल्म की तरह अंधेरे में नहीं लोड होते। अतः, आपको कुछ लोग ऐसी गाड़ियों की तस्वीरें भी शेयर करते नजर आ जाएँगे।

साथ ही, कई बार जिन गाड़ियों की दलील दी जाती है, उनमें ईवीएम नहीं, उनका खाली बक्सा ही रहता है। अब बक्सों के भीतर क्या है, ये जानने की दिलचस्पी न तो नेता में होती है, न जनता में। आपको किसी ने कह दिया कि देखो ट्रक पर ईवीएम है, ये कहाँ जा रहा है। आप भी पूछने लगते हैं कि देखो ट्रक पर ईवीएम है, ये कहाँ जा रहा है! आप अपने कॉमन सेन्स को कहीं परचून की दुकान पर भेज देते हैं, और फिर जो कुछ कहा जा रहा है, लपक लेते हैं।

ये तीर अब विपक्ष को ही लगा है, वो भी इनकी देख-रेख में

हवाई कैम्पेन और झूठ, सनसनी जैसी 1980 के काल की राजनीति से 2019 का चुनाव जीतने निकले विपक्ष को मीडिया ने नुकसान ही पहुँचाया। मीडिया की क्रेडिबिलिटी अगर खराब भी हुई तो, यहाँ तो दूसरा मीडिया तैयार था, लेकिन विपक्ष ने जो अपनी विश्वसनीयता खोई है, उसे पाने की ये लोग सोच भी नहीं रहे। ये इस फ़िराक़ में हैं कि 23 को कैसे, क्या किया जाए कि परिणाम इनकी तरफ हो जाए, या इन्हें कुछ समय मिल जाए।

इसलिए अब ये अपनी तरकश का अंतिम तीर लिए घूम रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 50 और 100% वीवीपैट वाली याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया, तो ये नई बातें फैला रहे हैं। कुछ लोग यह लिख रहे हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट ही ऐसे कर रहा है तो फिर लोगों का विश्वास टूट जाएगा। कुछ लोग यह लिख रहे हैं कि चुनाव आयोग बिक गया है, मोदी के हिसाब से चल रहा है। जबकि अगर देखा जाए तो राहुल गाँधी ‘आदिवासियों को गोली मार सकती है मोदी सरकार’ पर क्लीन चिट पा जाते हैं, और योगी पर 72 घंटे का बैन लग जाता है, तो चुनाव आयोग तो दूसरी तरह से खेलती नजर आ रही है। बंगाल पर चुनाव आयोग की चुप्पी तो अलग स्तर की ही थी। इसके साथ ही फ़िल्मों पर बैन से लेकर शादी के कार्ड पर पार्टी के लिए सपोर्ट जुटाने वालों पर संज्ञान लेने तक चुनाव आयोग इस बार तो विचित्र तरीके से पेश आया है।

इन लोगों को आशा थी कि सुप्रीम कोर्ट तो चार बजे भी ‘लोकतंत्र की हत्या हो रही है’ के चक्कर में खुल जाएगा, तो इन्हें कुछ और टाइम मिल जाएगा नए प्रपंच गढ़ने में। लेकिन कोर्ट ने नकार दिया तो अब ये लोग कोर्ट और आयोग पर ही हमला बोल रहे हैं। वहीं आयोग जिसने इन्हें कई राज्यों में सत्ता दिलाई, इन्हीं ईवीएम की मदद से, वो भी उन राज्यों में जहाँ भाजपा सत्तारूढ़ थी।

‘मैं नहीं खेल रहा’ से लेकर ‘जनता मूर्ख है’ तक

इसलिए विपक्ष अब उस नकारे, उद्दंड बच्चे की तरह आचरण कर रहा है जो हारते वक्त लूडो की सारी गोटियाँ इधर-उधर फेंक कर भाग जाता है। अब चुनाव आयोग की निष्पक्षता से लेकर सुप्रीम कोर्ट की अथॉरिटी पर सवाल बस इसलिए किए जा रहे हैं कि परिणाम इनके हिसाब से नहीं आ रहे। इन्हें अपनी निकृष्टता पर अभी भी विश्वास नहीं हुआ है, ये डिनायल मोड में हैं कि इनकी हार के लिए ये खुद ज़िम्मेदार नहीं है।

मशीनों पर ज़िम्मा फेंकते हुए असफल रहने पर एक एलीट और एन्टायटल्ड हिस्सा नई बातें करने में व्यस्त है। अब वही हो रहा है जिसे अंतिम (कु)तर्क कह सकते हैं: जनता ही पागल है जो मोदी जैसे को सत्ता दे रही है! दुर्भाग्य से भारत में अभी भी अजीत भारती के भी वोट का उतना ही मान है, जितना एपीजे अबुल कलाम साहब का था।

एक घमंड है इन पार्टियों के समर्थकों और मोदी के विरोधियों के भीतर। वो घमंड यह है कि वो जो सोचते हैं, वो जिन्हें चाहते हैं, उन्हें अगर बहुमत नहीं मिल रहा तो जनता पागल है। ये अभिजात्य मानसिकता, ये निम्न स्तर का दंभ, उसी तरीके से दिमाग में चढ़ता है जैसे सत्ता में होने पर पावर का नशा। दो-चार अक्षर पढ़ जाने वाले लोग, कुछ बड़े नामों की नौकरी करने वाले लोग, सोशल मीडिया पर दस-पचास लाइक से आह्लादित होने वाले लोग, ये घमंडी ब्रीड यह सोचने लगती है कि अगर उनकी बातों से कोई इत्तेफाक नहीं रखता तो वो मूर्ख है, जो आगे भुगतेंगे।

ये मानवीय कमजोरी है जिसे एक मुहावरे में ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे’ से उल्लेखित किया जा सकता है। जब आप किसी चीज को दिल से चाहें, और कायनात मदद के लिए न आए, तो पूरी कायनात ही महामूर्खों की मंडली हो जाती है। तब आप उन्माद में, अपने एरोगेन्स में, इस बात को स्वीकार ही नहीं पाते कि आपने… स्वयं आप ने, आप जैसे समझदार, महान, आदर्श विभूतिए ने, कुछ सोचा और भारत की 42% जनता आपके हिसाब से नहीं चल रही, तो ये देश का, समाज का, ओर पूरी मानवता का दुर्भाग्य हो जाता है।

फिर आप ऐसी बहकी-बहकी बातें करने लगते हैं जिनमें उस व्यक्ति की छवि दिखती है जो अपना काम न होने पर श्राप देने लगता है कि तुम्हारे घर में आग लगे, तुम्हारे बच्चे मर जाएँ, तुम्हें राह चलते कुत्ता काट खाए…

यही है वो अंतिम तीर। ये तीर है अवसाद का, ये तीर है उन्माद के चरम का। ये तीर विपक्ष और उनके समर्थकों ने अपने हाथ में लिया है, और गुस्से में अपने शरीर के तमाम हिस्सों में घुसेड़ लिया है क्योंकि उनके लिए अपने आप को गलत होते देखना, और लोकतंत्र के प्रतिभागी नागरिकों के बड़े प्रतिशत का उनके हिसाब से नहीं चलना, बहुत ही कष्टकारी है। कितना कष्टकारी? बहुत कष्टकारी, बहुत ज़्यादा…

इसलिए, मुन्नी बेगम को सुनिए, और उसे फ़ॉलो कीजिए कि

आवारगी में हद से गुज़र जाना चाहिए
लेकिन कभी-कभार तो घर जाना चाहिए…

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 1: विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है
भाग 2: ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप
भाग 3: वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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