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रामजन्मभूमि: SC ने मध्यस्थता कमेटी का कार्यकाल 15 अगस्त तक बढ़ाया

अयोध्या रामजन्मभूमि मामले में आज (10 मई) को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस कलीफुल्ला कमिटी की रिपोर्ट पेश की गई। कमिटी की रिपोर्ट देखकर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुआई वाली संविधान पीठ ने कहा कि कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में मध्यस्थता को लेकर सकारात्मक प्रगति की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त तककमिटी का कार्यकाल बढ़ा दिया है।

इस मामले में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा, “हमें मध्यस्थता कमिटी की रिपोर्ट मिली है और हमने इसे पढ़ा है। अभी समझौते की प्रक्रिया जारी है। हम रिटायर्ड जस्टिस कलीफुल्ला की रिपोर्ट पर विचार कर रहे हैं। रिपोर्ट में सकारात्मक विकास की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है।” इसके अलावा उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट यह नहीं बताएगा कि मध्यस्थता कितनी प्रगति हुई है, यह गोपनीय रखा गया है।

सुनवाई के दौरान कुछ हिन्दू पक्षकारों ने मध्यस्थता की प्रक्रिया पर अपनी आपत्ति दर्ज की। उन्होंने कहा कि पक्षकारों के बीच कोई समन्वय नहीं है। वहीं मुस्लिम पक्षकारों की ओर से राजीव धवन ने कहा कि हम मध्यस्थता प्रक्रिया का पूरी तरह से समर्थन करते हैं। अयोध्या मामले में मध्यस्थता पैनल द्वारा सीलबंद लिफ़ाफे में पेश की गई रिपोर्ट को देखने के बाद कोर्ट ने अतिरिक्त समय देने की उनकी माँग को सहमति दी।

बता दें की अयोध्या में राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट का पिछले दिनों एक बड़ा फैसला आया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अयोध्या मसले का समाधान मध्यस्थता से निकाला जाए। मध्यस्थता के लिए पूर्व जस्टिस कलीफुल्ला की अध्यक्षता में एक पैनल बनाया गया था। इस पैनल में श्री श्री रविशंकर, वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू को शामिल किया गया था। मध्यस्थता की प्रक्रिया फैज़ाबाद में होनी थी और यह पूरी तरह से गोपनीय थी।

अयोध्या मामले के इतिहास पर नज़र डाले तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला घड़ी को उल्टी दिशा में घुमाकर 30 साल पीछे ले जाता दिखता है। क्योंकि, इससे पहले ऐसी ही कोशिश 1990 में की गई थी। अंतर बस इतना है कि उस समय यह पहल केंद्र सरकार ने की थी और इस बार इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है।

अरबी न पढ़ पाने पर मौलाना ने 6 साल की बच्ची को बेहरहमी से पीटा

नोएडा के सोरखा गाँव में एक 6 साल की बच्ची को बेल्ट से पीटने के आरोप में मदरसे के मौलाना पर मामला दर्ज़ हुआ है। मौलाना के ख़िलाफ़ बच्ची के माता-पिता ने शिकायत दर्ज करवाई है। जानकारी के मुताबिक अरबी शब्द न पढ़ पाने के कारण बच्ची को इतनी बेरहमी से पीटा गया कि वह बेहोश हो गई।

बच्ची के पिता के मुताबिक उनकी दो बेटियाँ मदरसे में पढ़ती हैं। वो अपनी दोनों बेटियों को मदरसे से हर 14वें दिन दो दिन के लिए घर लाते थे। 4 मई को जब उनकी पत्नी अपनी छोटी बच्ची को नहला रही थीं तब उसके शरीर पर उन्हें निशान दिखाई दिए। बेटियों से पूछने पर बड़ी लड़की ने पूरी घटना के बारे में बताया। परिवार का कहना है कि मौलाना ने अपनी यह हैवानियत तब दिखाई जब मासूम किसी अरबी के शब्द को नहीं पढ़ पा रही थी जिसके कारण मौलाना ने उसे बेल्ट से इतना पीटा कि वो 2 घंटों के लिए बेहोश हो गई।

बच्ची की बड़ी बहन ने बताया कि ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है। इससे पहले भी जब वो मौलाना के सवालों का जवाब नहीं दे पाते थे, तो मौलाना उनकी ऊंगलियों को मोड़ देता था और फिर गुस्से में बेल्ट से पीटता था। ऐसा सिर्फ़ इन दोनों बहनों के साथ नहीं होता था, बल्कि वह ऐसी हरकत सब बच्चों के साथ करता था।

बच्ची के साथ हुई इस घटना का विरोध करने के लिए जब माता-पिता मदरसा पहुँचे तो उन्हें वहाँ से भगा दिया गया। परिजनों ने 100 नंबर पर पुलिस को सूचना दी। पुलिस के पहुँचते ही मौलाना भाग निकला।

जी न्यूज़ की ख़बर के मुताबिक सेक्टर-49 थाने के एसएचओ अजय कुमार अग्रवाल ने बताया मौलाना नवाब हुसैन के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज किया है। पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 323, 504 के तहत मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

आतिशी ने कहा गौतम ने मेरे नाम के ‘गंदे’ पर्चे बाँटे, गौतम ने भेजा मानहानि नोटिस

पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी ने गुरुवार (मई 9, 2019) को भाजपा के उम्मीदवार गौतम गंभीर पर संगीन आरोप लगाए। आतिशी ने अपने खिलाफ ‘आपत्तिजनक और अपमानजनक’ टिप्पणियों वाला एक पर्चा पढ़ते हुए दावा किया कि गंभीर ने निर्वाचन क्षेत्र में ऐसे पर्चे बँटवाए हैं। इस पर गौतम ने आतिशी पर मानहानि का केस करने का फैसला किया।

गौतम गंभीर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और प्रत्याशी आतिशी को मानहानि का नोटिस भिजवाया। गंभीर ने कहा कि वे बिना शर्त, माफ़ी माँगे और अपना झूठा बयान वापस लें, नहीं तो मानहानि का केस किया जाएगा।

इससे पूर्व गौतम गंभीर ने अपने ऊपर लगे कथित आरोपों पर ट्वीट करते हुए लिखा था, “मैं घोषणा करता हूँ कि केजरीवाल और आतिशी अगर साबित कर दें कि मैंने कुछ गलत किया है तो मैं अभी अपनी उम्मीदवारी वापस ले लूँगा, लेकिन वह अगर ऐसा न कर पाए तो क्या वे राजनीति छोड़ देंगे?”

अपने ऊपर लगे आरोपों पर गंभीर ने एक के बाद एक ट्वीट किए। गंभीर ने केजरीवाल पर ट्वीट करते हुए लिखा, “मैं किसी महिला की इज्जत उछालने के कृत्य से घृणा करता हूँ। अरविंद केजरीवाल, अपनी सहयोगी के साथ ऐसा काम आपने केवल चुनाव जीतने के लिए किया? श्रीमान मुख्यमंत्री आप गंदे हैं और आपके दिमाग को साफ करने के लिए आपकी झाड़ू की जरूरत पड़ेगी”

बता दें इन सब के बीच आप के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने अपने ट्विटर पर एक स्क्रीनशॉट ट्वीट किया है। इसमें लोगों से उस पैम्पलेट को ट्वीट के जरिए शेयर करने को कहा जा रहा है, जिसमें आतिशी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इस स्क्रीनशॉट में एक ट्वीट करने पर 200 रुपए दिए जाने का भी दावा है। कपिल मिश्रा का कहना है कि इस सबूत को कोर्ट में ‘आप’ के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है।

शरद पवार का दावा, मैंने खुद देखा कि मेरी पार्टी को दिया वोट भाजपा में चला गया

राकांपा प्रमुख शरद पवार ने चुनावों में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के प्रयोग पर बृहस्पतिवार को चिंता जताते हुए दावा किया कि उन्होंने खुद एक प्रस्तुति के दौरान देखा था कि उनकी पार्टी के पक्ष में डाला गया वोट, भाजपा के पक्ष में चला गया। बहरहाल, पवार ने यह भी कहा कि वह इस बात का दावा नहीं कर रहे हैं कि सभी ईवीएम इसी प्रकार काम करती हैं।

पवार ने सतारा में संवाददाताओं से कहा, ‘‘मैं भी मशीन के बारे में चिंतित हूँ। हैदराबाद एवं गुजरात में कुछ लोगों ने एक ईवीएम मेरे सामने रखी और मुझसे एक बटन दबाने को कहा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने घड़ी (राकांपा का चुनाव चिन्ह) पर बटन दबाया और वोट कमल (भाजपा का चुनाव चिन्ह) के पक्ष में गया। मैंने खुद ऐसा होते देखा है।’’ 

पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं अन्य विपक्षी दल ईवीएम के प्रयोग को लेकर चिंता जताते रहे हैं। उनका दावा है कि इस मशीन में गड़बड़ी की जा सकती है।

‘द हिन्दू’ की ‘फ्रंटलाइन’ और TV9 ने 20 लाख EVM गायब होने की फेक न्यूज़ लगाने की बात स्वीकारी

भारतीय चुनाव आयोग (EC) ने कुछ मीडिया हाउसेस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के बारे में स्पष्टीकरण जारी किया है जिसमें आरोप लगाया गया था कि 20 लाख इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) ECI के कब्जे से गायब हो गए थे। शेफाली बी. शरण, ईसीआई की प्रवक्ता ने आयोग की ओर से फ्रंटलाइन पत्रिका और टीवी 9 भारतवर्ष चैनल के संपादकों को संबोधित करते हुए एक आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें उनके झूठे दावों का खंडन किया गया है।

वेंकटेश रामाकृष्णन द्वारा लिखित “मिसिंग ईवीएम” शीर्षक की स्टोरी ‘24 मई, 2019’ फ्रंटलाइन पत्रिका के प्रिंट संस्करण में प्रकाशित हुई थी। फ्रंटलाइन एक पाक्षिक अंग्रेजी भाषा की पत्रिका है जिसका प्रकाशन चेन्नई के द हिंदू ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन द्वारा किया जाता है। टीवी चैनल TV9 भारतवर्ष ने यही आरोप दोहराते हुए एक रिपोर्ट प्रसारित की थी।

रिपोर्ट में बंबई उच्च न्यायालय में एक आरटीआई-आधारित जनहित याचिका के स्रोतों का हवाला देते हुए अपने दावे को सही ठहराने की कोशिश की गई थी। इस रिपोर्ट के माध्यम से, लेखक ने बताया है कि 2019 के आम चुनावों में ईवीएम के प्रति अविश्वसनीयता थी। इसी संदेह के दायरे में ECI को भी बदनाम करने की कोशिश की गई थी।

फ्रंटलाइन मैगज़ीन को जारी नोटिस

यह ध्यान देने योग्य है कि इस रिपोर्ट में आरटीआई आवेदन के माध्यम से प्राप्त की गई कुछ सूचनाओं को चुनिंदा रूप से उद्धृत किया है, जो कई सार्वजनिक प्राधिकरणों और बॉम्बे उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका का हिस्सा है। पूरी रिपोर्ट में केवल आंशिक और एकतरफा जानकारी दी गई है, जो कि गलत तथ्यों पर आधारित है और आम जनता के मन में EVM एवं ECI के प्रति संदेह पैदा करने की कोशिश की गई है।

TV9 भारतवर्ष को जारी नोटिस

ईसीआई के बयान में EVM के रखरखाव से लेकर परिवहन तक के लिए कोई उचित प्रणाली और बुनियादी ढाँचे की अनुपस्थिति की रिपोर्ट में की गई अटकलों को खारिज कर दिया गया है, इन दावों को खारिज करते हुए, बयान में कहा गया है कि ईसीआई ईवीएम और वीवीपीएटी के सम्बन्ध में सख्त प्रोटोकॉल और अनुपालन प्रक्रियाओं का पालन करता है और कोई भी मशीन चुनाव आयोग की पूर्व अनुमति के बिना ईसीआई गोदाम से कहीं भी नहीं ले जाया जा सकता है।

बयान में इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला गया कि राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) स्वतंत्र संवैधानिक निकाय हैं जो स्थानीय निकाय चुनाव कराते हैं और ईसीआई के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं। बयान में मतदाताओं के मन में संदेह पैदा करने के लिए ईवीएम के बारे कुछ मीडिया हाउसेस द्वारा झूठ फैलाने के लिए ऐसी फेक रिपोर्ट को दुर्भावनापूर्ण प्रयास बताया गया।

ईसीआई के प्रवक्ता ने बताया कि फ्रंटलाइन के संपादक ने स्वीकार किया है कि उनकी रिपोर्ट झूठी है और इस सम्बन्ध में एक अन्य रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी। वहीं दूसरी ओर, TV9 Bharatvarsh ने अपनी वेबसाइट और Youtube से अपनी रिपोर्ट हटा दी है।

यह पहली बार नहीं है जब हिंदू समूह के प्रकाशनों से जुड़ी पत्रिका झूठी और फर्जी खबर फैलाते हुए पकड़ी गई है। हमने पहले भी बताया था कि कस्तूरी एंड संस लिमिटेड के अध्यक्ष एन. राम और द हिंदू के प्रकाशक ने राफेल सौदे के बारे में भी झूठ बोला था।

हालाँकि, TV9 भारतवर्ष ने अपनी रिपोर्ट को डिलीट कर दिया है, लेकिन इस फर्जी रिपोर्ट को सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से अभी भी फैलाया जा रहा है। भले ही वे रिपोर्ट और वीडियो ईसीआई द्वारा झूठ करार दिए गए हों। मीडिया हाउसेस के अपनी फर्जी रिपोर्ट वापस लेने के बाद भी, वे सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों पर तेजी से वायरल होते हैं, और इस तरह से ऐसी फर्जी रिपोर्ट बनाने का उद्देश्य पूरा हो जाता है।

प्रिय मीडिया गिरोह, हर दलित जीतेन्द्र की मौत जातिवाद के कारण नहीं होती

हाल ही में उत्तराखंड से के एक जनजातीय क्षेत्र से आई एक खबर ने देशभर में दलित-सवर्ण के मुद्दे को नई चिंगारी देने का काम किया। यदि मीडिया में बैठे गिद्द-गिरोह के शब्दों में कहें तो इस घटना ने दलित-सवर्ण मुद्दे को एक दिशा देने का काम किया। इस सारे प्रकरण में सबसे हैरान करने वाली बात ये देखने को मिली, कि जो भी मीडिया गिरोह इस खबर को, जिस लिबास में बेचकर अपनी विकृत मानसिकता को बेच सकता था, उसने वही किया। जौनसार-जौनपुर क्षेत्र में ‘जौनपुर में एक दलित युवक की पिटाई’ के नाम से खबर पढ़ते ही मैं शंका से इस मामले को देखता रहा और हुआ भी यही। जिस प्रकार देशभर के तमाम प्रमुख मीडिया चैनल्स से लेकर, निष्पक्ष पत्रकारों और हिटलर के लिंग नापने वाले मीडिया गिरोह के पत्थरकारों ने बिना ‘दलित’ शब्द के नहीं पढ़ाया या सुनवाया, एक बार के लिए मैं भी इस प्रकरण को संदेह की दृष्टि से देखने को मजबूर हो गया।

मीडिया के गिद्ध-गिरोहों को ‘दलित’ की मृत्यु से फ़र्क़ पड़ता है?

निस्संदेह, टिहरी जिले के जौनपुर-जौनसार जैसे जनजातीय क्षेत्र में घटी यह घटना हैरान करने वाली है। हैरान इसलिए, क्योंकि मैं इसी जगह में पला-बढ़ा हूँ और इस समाज में किसी व्यक्ति की मृत्यु को ‘दलित की मृत्यु’ बताना सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात थी। हालाँकि, किसी व्यक्ति की मृत्यु को कोई भी तर्क सही साबित नहीं करता है। लेकिन, जब इस सम्पूर्ण प्रकरण को एक ‘दलित’ की मृत्यु में समेट दिया गया, तब यह जरूरी हो जाता है कि हम इस बात की समीक्षा करें।

यह समीक्षा खासकर मीडिया में हर वक़्त इस प्रकार की घटनाओं के इन्तजार में लार टपकाने वाले उस गिद्ध-गिरोह के कारण आवश्यक हो जाती है, जो दलित की मृत्यु में ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे विशेषणों के साथ अपनी पूर्वग्रही मानसिकता के कीर्तिमान स्थापित करने का प्रयास करता है। ब्राह्मण और हिन्दू जैसे शब्दों से भी घृणा करने वाले कुछ लोग जब कुछ विकृत मानसिकता के लोगों को अपना हथियार बनाकर, एक युवक की मृत्यु पर ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे कैप्शन बेचते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि वो पूरे देश भर में अपनी घृणित मानसिकता से निकलने वाले टार की मार्केटिंग में जुटे हुए हैं।

कुछ इसी प्रकार का उदाहरण मीडिया के इस समुदाय विशेष ने तब दिया था, जब पुलवामा आतंकी घटना के बाद JNU की  फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद के जरिए देहरादून में बैठे प्रेमनगर के जंगलों में छुपकर हर नशा करने वाले, जिहाद पढ़ने वाले, आतंकवादियों का समर्थन करने और दंगाई मानसिकता वाले कश्मीरी, कथित विद्यार्थियों के बारे में पेश किया था। यह गिरोह है, जो बस इस इन्तजार में रहता है कि आखिर कब मौका मिले और कब वो अपनी विषैली मानसिकता का बीजारोपण वहाँ पर कर सकें।

हिंसात्मक मानसिकता का शिकार सवर्ण और दलित कोई भी हो सकता है

यह भी जानना आवश्यक है कि इस घटना में जीतेन्द्र की जाति को दलित बताकर ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे प्रसंग चलाने वाले वही लोग हैं, जो आज तक आतंकवाद का मजहब पता लगा पाने में नाकाम रहे हैं। यह सही भी है, यदि हर दूसरी आतंकवादी घटना का मजहब ढूँढा जाने लगे और घटना की संगीनता से ज्यादा हमारी चिंता का विषय धर्म-जाति और सम्प्रदाय ही बन जाए, तो ऐसे में श्री लंका में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के पीछे तो स्पष्ट रूप से मुस्लिम संगठन का हाथ है और न्यूजीलैंड में मस्जिद में मारे गए लोगों के पीछे एक क्रिश्चियन का हाथ है। लेकिन, हम सभी जानते हैं कि आतंकवाद का मजहब तलाशने से ज्यादा जरूरी उस मानसिकता द्वारा हुई हानि को कवर करना है। ठीक इसी प्रकार, यदि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है, तो फिर एक शादी समारोह के दौरान हिंसात्मक मानसिकता से उपजे विवाद में किसी ‘दलित’ की मृत्यु कैसे हो जाती है?

अमेरिका में बैठकर जनजातीय समाज पर चिंतन से बेहतर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है

शादी में जिस जीतेन्द्र के साथ मारपीट हुई, वह दलित था या नहीं से पहले उन लोगों पर विचार किया जाना चाहिए, जिन्होंने उन्माद में एक व्यक्ति को पीट दिया और उसने अवसाद में घर जाकर मिर्गी की दवाएँ एक साथ निगल ली थीं, जिस कारण उसे अगली सुबह अस्पताल ले जाना पड़ा। लेकिन क्या गिद्ध मीडिया के अमेरिका के कनेक्टिकट के न्यू हेवन में बैठी, येल में पीएचडी कर रही सामाजिक विचारक को यह पता है कि जिस घटना को वो एक AC कमरे में बैठकर सिर्फ अपने संगठन की विचारधारा को  खुश करने के लिए ‘देवभूमि में दलित की मृत्यु’ मात्र में समेट रही हैं, उस समाज में तो दलित-सवर्ण-अगड़ा-पिछड़ा जैसे शब्द महत्वहीन हैं?

लेकिन यह आम चलन है कि अपना कोई विदेशी सम्बन्ध बताकर भारत जैसे देश में अपने पाठकों और सम्पादकों की बौद्धिक क्षमता को चकमा देते हुए आसानी से अपनी विश्वसनीयता साबित की जाए। फिर चाहे वह अमेरिका में बैठा EVM एक्सपर्ट सैयद शूजा हो, या फिर NDTV द्वारा जर्मनी से उठाकर लाए गए प्रॉपेगैंडा पत्रकार ध्रुव राठी हो।

जौनपुर-जौनसार में नहीं है जातिगत भेदभाव

जनजातीय इलाका होने के कारण, जौनपुर-जौनसार में जातिगत भेदभाव मामूली स्तर पे भी नहीं है। यदि सामान्य शब्दों में कहूँ तो लोग आपस में एकदूसरे को खुलकर औजी-ओड-भामण-खस कहकर बुलाते हैं। यदि किसी खेत में बैल चोरी करने घुस जाए तो पूरा गाँव एक स्वर में आवाज लगाकर बुलाता है कि फलां खेत में ‘ल्वार-ओड-भामण’ की गाय-बैल घुस गई है। यहाँ के लोग वर्षों अशिक्षित जरूर रहे, नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव गाँधी के ऐतिहासिक नेतृत्व के समय भी। लेकिन, यहाँ पर सभी सामाजिक समीकरणों और जिम्मेदारियों से बँधे हुए जाति व्यवस्था को निभाते आए हैं। और किसी का, कभी भी इस आधार पर दमन या शोषण नहीं किया गया। ब्राह्मण-राजपूत-दलित, सभी यहाँ पर ‘जिमदार’ यानी भूमि के स्वामी हैं। ‘डोम’ यदि गाँव के लोगों की कृषि और पशुधन को संभालता है, तो औजी के बिना कोई भी पारम्परिक अनुष्ठान और कार्यक्रम संभव ही नहीं है, बदले में सारे गाँव के लोग उसे हर माह अनाज से लेकर, कपड़े, जमीन और धन देते हैं।

बढ़ई का काम करने वाले ‘ओड’, मकान बनाने से लेकर मिस्त्री कामों में पीढ़ी दर पीढ़ी इस परम्परा को सिखाते आए हैं। यह भी बताना जरूरी है कि इस इलाके में घरों की नक्काशी और लकड़ी का काम बेहद उम्दा किस्म का है। लोहार से लेकर तमाम अन्य जातियाँ, अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए रहते हैं। यह तालमेल भी मैंने शायद ही कहीं देखा होगा कि जितनी जमीन एक दलित परिवार के पास है, लगभग उतनी ही ब्राह्मण और राजपूतों के पास भी हैं। आर्थिक असमानता इस इलाके में नगण्य है।

जनजातीय क्षेत्रों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ पर बिना नारीवाद और प्रगतिशील होने का आडंबर किए ही, हर किसी को बराबर अधिकार और सम्मान प्राप्त हैं। यहाँ तक कि जौनपुर-जौनसार में पारिवारिक व्यवस्था मातृसत्तात्मक ही है। सभी जातियाँ एक ही गाँव में रहती हैं, सभी के मकान एक-दुसरे से चिपककर बसे हुए हैं। बिना किसी भेदभाव के लोग एक-दूसरे के साथ उठते-बैठते हैं। और शादी-विवाह और अन्य समारोह में भी सभी जातियाँ एक ही लंगर में खाना खाने बैठा करती हैं। ऐसे में इस बात की विश्वसनीयता स्वतः शून्य हो जाती है कि बसाण-गों में किसी युवक को उसकी जाति की वजह से मार दिया गया। लेकिन, आदत से मजबूर मीडिया गिरोहों के गिद्धप्रमुखों ने अपनी मक्कारी को खूब बेचा है। अब इनके निशाने पर उत्तराखंड भी है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

मिर्गी की दवाएँ एक साथ निगलने के कारण हुआ था जीतेन्द्र बेहोश

स्थानीय लोगों का कहना है कि जीतेन्द्र मिर्गी का मरीज था और लम्बे समय से दवाएँ ले रहा था। शादी के दौरान खाने के वक़्त हुई झड़प के बाद जीतेन्द्र ने अवसाद में घर जाकर सभी दवाएँ एकसाथ निगल ली जिस कारण सुबह उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। हालाँकि,अभी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स का आना बाकी है। सामाजिक समारोह में इस प्रकार की झड़प और हिंसा जौनपुर-जौनसार में आम बात है और यही वजह है कि समय-समय पर यहाँ पर 10-15 गाँव मिलकर शादी-विवाह में शराब और DJ को प्रतिबंधित करते आए हैं लेकिन ऐसे में किसी व्यक्ति की मृत्यु होना बेहद चौंकाने वाला प्रकरण है।

यह दुर्भाग्य है कि इस घटना में जिस जीतेन्द्र की मृत्यु हुई वह दलित था और मीडिया ने इसे ही मुद्दा बनाकर उत्तराखंड के सर पर जातिवाद जैसे शब्द स्थापित करने के हर सम्भव प्रयास कर रही है। यह मैं अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से कहना चाहूँगा की यह घटना हिंसात्मक है, सामजिक उन्माद का उदाहरण है लेकिन इसकी वजह यदि मीडिया आपको पीड़ित की जाति दलित होना बता रही है, तो आपको आज ही उनसे किनारा कर लेना चाहिए क्योंकि वो उस विष को बेच रहे हैं, जिसे शायद आप पढ़ना चाहते हैं।

निष्पक्ष मीडिया के पत्थरकारों से सावधान

इस समय के महान निष्पक्ष पत्रकार रविश कुमार पांडेय जी अपने हालिया प्राइम टाइम के प्रेम्बल में कलेजे पर चोट खाए आशिक़ की भाँति उत्तराखंड में हुई जातिगत हत्या पर बोले। लेकिन, ध्यान देने वाली बात ये है कि रवीश बाबू बनारस में चुनाव कवर करने गए थे। प्राथमिकताओं का अंदाजा और विमर्श का केंद्र इसी एक हरकत से समझा जा सकता है कि किस तरह ‘डर का माहौल’ का राग अलाप उत्तराखंड में बची खुची, रही सही शांति के भी भंग करने का प्रोपगंडा चलाया जा रहा है। अपवादों को छोड़ दें, तो यह वही उत्तराखंड है, जो लोकपाल को सबसे पहले लागू करता है, कन्या धन योजना और ऐसे ही न जाने कितनी चीजों को सबसे आगे रखता है। इसी उत्तराखंड से सबसे ज्यादा प्रतिभाएँ संगीत और कला से लेकर तमाम अन्य क्षेत्रों में खूब नाम कमा रही हैं और यह बताना भी जरूरी हो जाता है कि उनमें से अधिकांश दलित ही हैं।

ये उसी देवभूमि की बात है, जिसमें धर्म-सम्प्रदाय, जाति आज भी चुनाव का मुद्दा नहीं हैं। यदि समकालीन परिदृश्य में ही बात करें तो वो सभी मुद्दे, जिन पर अन्य राज्यों में राजनीतिक दल हमेशा से ही हार-जीत के समीकरण का जायजा करती है, इस उत्तराखंड राज्य से नदारद मिलती है।

सवर्ण, अगड़ा, पिछड़ा या फिर दलितों के विषय पर ही आ जाएँ,  तो उत्तराखंड के हर पारम्परिक अनुष्ठान, छोटे-बड़े कार्यों, जागर (जगार) में भी ऐसा व्यक्ति जो कागजों और गिद्ध मीडिया  की नजर में ‘दलित’ है, उसके बिना कोई मंगलकार्य पूरा नहीं होता है। मात्र रस्मी तौर पर ही नहीं, अपितु पूर्ण भागीदारी के साथ उसका होना अनिवार्य होता है।

शादी समारोह के दौरान घटित हुई इस घटना में धूर्तता के साथ ‘देवभूमि’ शब्द जोड़ने वाले दी लल्लनटॉप जैसे निकृष्ट मीडिया गिरोहों को लार टपकाने से पहले यह बात मालूम होनी चाहिए कि भले ही वो सम-विषम नारी किस्म के पत्थरकारों से जितना भी उन्माद मचवाने की कोशिश कर लें, लेकिन इस राज्य की संरचना को वो और उनके सहयोगी पत्थरकार कोई हानि नहीं पहुँचा सकते हैं।

लार टपकाती मीडिया के ‘पत्थरकारों’ के उदाहरण इन तस्वीर में आप देख सकते हैं


राजीव ने ‘शाही छुट्टियों’ के लिए तो नेहरू ने लेडी माउंटबेटन के ‘सम्मान’ में किया था नेवी वॉरशिप का निजी उपयोग

प्रधानमंत्री मोदी के कल एक खुलासे ने चुनावी माहौल में तब हलचल मचा दी जब उन्होंने उल्लेख किया कि कैसे राजीव गाँधी ने अपने निजी उपयोग के लिए भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस विराट का इस्तेमाल किया। युद्धपोत का उपयोग गाँधी परिवार को 10 दिनों की लंबी छुट्टी के लिए लक्षदीप द्वीप समूह के एक छोटे से निर्जन द्वीप पर एक निजी टैक्सी की तरह ले जाने के लिए किया गया था।

पीएम ने 1987 में गाँधी परिवार की छुट्टी का जिक्र किया। मेहमानों की सूची में राजीव गाँधी के साथ, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, प्रियंका और उनके चार दोस्त, सोनिया गाँधी की माँ, उनके भाई और एक मामा शामिल थे। साथ ही तब के सांसद अमिताभ बच्चन, उनकी पत्नी जया बच्चन और उनके बच्चे, अमिताभ के भाई अजिताभ की बेटी और पूर्व मंत्री अरुण सिंह के भाई बिजेंद्र सिंह की पत्नी और बेटी भी मौजूद थे। छुट्टी का स्थान बंगारम था, जो लक्षद्वीप द्वीपसमूह में एक छोटा निर्जन द्वीप है। उस समय भारतीय नौसेना के एकमात्र वाहक आईएनएस विराट का इस्तेमाल गाँधी परिवार और उनके साथियों के परिवहन के लिए किया गया था, जो इस छुट्टी के लिए 10 दिनों के लिए अरब सागर में चले गए थे। बता दें कि एक विमान वाहक युद्धपोत अकेले समुद्र में नहीं चलता है, यह हमेशा कई युद्धपोतों से घिरा रहता है। यहाँ तक ​​कि एक पनडुब्बी भी यात्रा के दौरान मौजूद थी। इसका मतलब इस शाही छुट्टी का खर्च बहुत तगड़ा था।

जैसा कि द्वीप निर्जन था, मेहमानों के लिए आवश्यक सभी चीजों को अन्य स्थानों से ले जाने की भी आवश्यकता थी। लक्षद्वीप प्रशासन ने 10-दिवसीय अवकाश के लिए सभी शाही इंतज़ाम किए, और इस उद्देश्य के लिए लक्षद्वीप प्रशासन के हेलीकॉप्टर को सेवा में लगाया गया।

नई पीढ़ी के लिए यह खुलासा ही अपने आप में आश्चर्यजनक है। लेकिन आपको जानकर और हैरानी होगी कि अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए नौसेना की संपत्ति का उपयोग करने की परंपरा राजीव गाँधी द्वारा शुरू नहीं की गई थी। कायदे से जवाहरलाल नेहरू ने इस चलन की शुरुआत की थी। राजीव ने तो इस ‘पुश्तैनी’ परंपरा को बस आगे बढ़ाया था।

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सबसे पहले ऐसी शाही परंपरा की शुरुआत करते हुए INS देल्ही (INS Delhi) का इस्तेमाल अपने परिवार के साथ छुट्टियाँ मनाने के लिए किया था। उसकी अब जो तस्वीरें सामने आई हैं, उनसे भी यह बात साफ पता चलती है कि नेहरू ने उस आईएनएस देल्ही का इस्तेमाल किया था, जो 1933 में नौसेना के लिए बनाया गया एक हल्का क्रूजर था। इसे ब्रिटिश राज में एचएमएस अकिलिस के नाम से जाना जाता था। 1950 में अपने परिवार के साथ छुट्टी मनाने के लिए इसी वॉरशिप का इस्तेमाल नेहरू ने किया था।

इन फोटोज में नेहरू के साथ इंदिरा गाँधी और उनके बच्चों संजय गाँधी और राजीव गाँधी की मौजूदगी को देखा जा सकता है।

1950 में ही भारतीय नौसेना की संपत्ति का दुरुपयोग करने की परंपरा जवाहरलाल नेहरू के साथ शुरू हुई थी। यह एक ऐसी घटना है, जिस पर शायद ही कभी बात की गई हो, जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह नेहरू के पूरे परिवार ने अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए भारतीय संपत्ति के निजी इस्तेमाल की अनोखी परंपरा की शुरुआत की थी।

जवाहरलाल नेहरू और एडविना माउंटबेटन के बीच का संबंध कोई रहस्य नहीं है। एक लेख में माउंटबेटन को “आदमखोर” तक कहा गया था। यहाँ “आदमखोर” से संबंध उनके पर-पुरुष प्रेम से था। डेली मेल ने अपने इस आर्टिकल में बताया है कि कैसे माउंटबेटन को नेहरू से प्यार हो गया था और कैसे उनके बच्चों के प्रति वो समय-समय पर प्रेम प्रदर्शित करते रहते थे।

माँ एडविना को लेकर उनकी बेटी पामेला ने कहा, “वह पंडितजी (नेहरू) में साहचर्य और समझ को देखती है, जिसके लिए वह तरसती थी। दोनों ने एक-दूसरे के अकेलेपन को दूर करने में मदद की।”

एडविना की इच्छा समुद्र में दफन होने की थी और जब 1960 में उनकी मृत्यु हुई, तो उनके शव को पोर्ट्समाउथ लाया गया। प्रिंस फिलिप की माँ, ग्रीस की राजकुमारी एंड्रयू सहित परिवार के लोगों के साथ ताबूत को एचएमएस “वेकफुल” पर सवार किया गया था। कैंटरबरी के आर्कबिशप, लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी दो बेटियाँ भी राजकुमार प्रिंस फिलिप के साथ थीं। पोर्ट्समाउथ से 12 मील की दूरी पर, ‘वेकफुल के’ इंजनों को रोक दिया गया था, और अंतिम शब्द बोले गए। फिर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

जब 59 वर्ष की आयु में एडविना की मृत्यु 1960 में हुई तो सरकारी खर्चे पर लेडी माउंटबेटन को ऐसी श्रद्धांजलि देने की व्यवस्था की गई थी। उनकी इच्छा के अनुसार लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा उन्हें समुद्र में दफन किया गया। ऐसे में नेहरू भी पीछे नहीं रहे। नेहरू ने भारतीय नौसेना के फ्रिगेट आईएनएस त्रिशूल को एस्कॉर्ट के रूप में और साथ ही उनकी याद में पुष्पांजलि देने के लिए भेजा।

लेडी माउंटबेटन की बेटी लेडी पामेला हिक्स का कहना है, “1960 में उनकी मृत्यु पर, एडविना को उनकी इच्छा के अनुसार समुद्र में दफनाया गया था। जब उनका शोक संतप्त परिवार घटनास्थल पर माल्यार्पण के बाद हट गया, तो भारतीय फ्रिगेट आईएनएस त्रिशूल उस जगह पर आया और पंडितजी के निर्देशों के अनुसार मैरीगोल्ड के फूलों से उस पूरे एरिया को आच्छादित कर दिया गया था।”

दिलचस्प बात यह है कि पीएम मोदी द्वारा राजीव गाँधी का उल्लेख किए जाने के बाद भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ऐसी ही एक कहानी के बारे में ट्वीट किया।

स्वामी ने कहा कि उनके ससुर, जेडी कपाड़िया 1950 के दशक में रक्षा सचिव थे। उन्होंने नेहरू के ‘यूरोपीय महिला मित्र’ को एयरफोर्स के विमान का उपयोग करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। स्वामी ने कहा कि इस घटना के बाद उनके ससुर का तबादला कर दिया गया था और अगले रक्षा सचिव ने ऐसा करने की अनुमति दे दी थी।

नेहरू-गाँधी परिवार ने लंबे समय से भारत और उसकी संपत्ति को अपनी निजी संपत्ति माना है। चाहे राजीव गाँधी छुट्टी के लिए नौसेना के जहाज का उपयोग कर रहे हों, या जवाहरलाल नेहरू ऐसा ही कर रहे हों, या फिर उन्होंने एडविना की मृत्यु के बाद समुद्र में मेरीगोल्ड बिखेरने के लिए नौसेना के जहाज का उपयोग किया हो। सरकारी और देश की संपत्ति को अपनी बपौती समझ कर इस्तेमाल करने का इस परिवार का इतिहास बहुत पुराना है। और भी सच्चाइयाँ हैं जो इतिहास के आगोश में हैं। जब भी उन्हें कुरेदा जाएगा, गाँधी परिवार के ‘कुकर्मों’ का अंगार फूट पड़ेगा।

प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने दिए थे सिखों की हत्या के आदेश: सीनियर एडवोकेट फूलका

दिल्ली उच्च न्यायालय में सीनियर एडवोकेट हरविंदर सिंह फूलका ने दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पर संगीन आरोप लगाए हैं। फूलका ने कहा कि 1984 दंगों के समय सिखों की हत्या करने के लिए आदेश सीधा प्रधानमंत्री कार्यालय से आते थे।

फूलका ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि शांति भूषण (जो मोरारजी देसाई के समय मंत्री थे) ने नानावटी आयोग के सामने बयान दिया था कि उन्होंने 1 नवंबर 1984 को तत्कालीन गृह मंत्री नरसिम्हा राव से सेना बुलाने का आग्रह किया था जो राव ने स्वीकार कर लिया था।

फूलका ने ANI को बताया कि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि सिखों को मारने के आदेश सीधा राजीव गाँधी के कार्यालय से आते थे और जानबूझकर दंगों को रुकवाने के लिए सेना नहीं बुलाई गई थी। फूलका के अनुसार उन्होंने दंगों की जाँच कर रहे नानावटी आयोग और मिश्रा आयोग के सामने भी यह बात कही थी।

नरसिम्हा राव ने शांति भूषण के आग्रह पर RAX फोन द्वारा किसी मंत्री से बात की थी लेकिन उधर से दंगों को रोकने के लिए सेना की तैनाती के संबंध में कोई उत्तर नहीं मिला जिसके बाद राव चुप हो गए थे तब शांति भूषण वहाँ से चले गए थे।

उस समय चरण सिंह, देवी लाल, शरद यादव, और रामविलास पासवान ने भी सिखों के कत्लेआम को रोकने के लिए सेना बुलाने का आग्रह राष्ट्रपति से किया था। लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने सेना नहीं बुलाई और दंगे होने दिए। सेना की एक टुकड़ी सफदरजंग पहुँच चुकी थी और सैनिकों ने दंगे रोकने की कोशिश की थी लेकिन तभी एक सैन्य अधिकारी ने उनसे कहा कि हमें दंगे रोकने के आदेश नहीं मिले हैं, और फिर सेना की टुकड़ी वापस कैंटोनमेंट चली गई।

फूलका के अनुसार ये सभी बातें दंगों की जाँच कर रहे आयोग के सामने दर्ज की गई थीं। फूलका ने कहा कि 1 नवंबर 1984 को सिखों का नरसंहार हो रहा था और 5000 सैनिक दिल्ली में मौजूद थे लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने उन्हें दंगे रोकने के आदेश नहीं दिए जिसके कारण 2000 सिखों की जान गई।

फूलका ने कहा कि कमलनाथ रकाबगंज गुरुद्वारा गए थे। गुरुद्वारा जल रहा था और गुरुद्वारे में दो सिखों को ज़िंदा जला दिया गया था। यह पुलिस रिपोर्ट में दर्ज है कि कमलनाथ गुरुद्वारा गए थे और उन्हें प्रधानमंत्री ने भेजा था। फूलका के अनुसार कॉन्ग्रेस पार्टी के लोगों ने सत्ता का लाभ उठाते हुए सभी सबूत मिटा दिए लेकिन अभी भी बहुत से साक्ष्य ऐसे हैं जो 1984 के सिख नरसंहार में राजीव गाँधी की प्रत्यक्ष संलिप्तता को सिद्ध करते हैं।   

सिद्धू की रैली में गूँजा ‘मोदी-मोदी’ का स्वर, महिला ने फेंकी चप्पल

लोकसभा चुनाव 2019 की सरगर्मी लगभग हर दिशा में देखने को मिल रही है। कहीं जुमलेबाजी का दौर है तो कहीं व्यक्तिगत हमले थमने का नाम नहीं ले रहे। अभी हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को थप्पड़ मारने की ख़बर सामने आई थी, इसी बीच कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू पर एक महिला द्वारा अपनी चप्पल (स्लीपर) फेंकने की ख़बर का ख़ुलासा हुआ है।

दरअसल, रोहतक में एक रैली को संबोधित करते हुए, एक महिला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बोलने पर पंजाब के मंत्री पर अपनी चप्पल फेंकी। हालाँकि, उस महिला का निशाना चूक गया और मौक़े पर मौजूद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया। महिला ने पुलिस को बताया कि उसने चप्पल इसलिए फेंकी थी क्योंकि वो पीएम मोदी के ख़िलाफ़ बात कर रहे थे।

हालाँकि, इस घटना को दिखाने वाला कोई वीडियो तो सामने नहीं आया है, लेकिन एक छोटा वीडियो सामने आया है जिसमें हिरासत में ली गई महिला पुलिस कर्मियों से बात कर रही है, जिसमें सुना जा सकता कि उसने अपनी चप्पल इसलिए फेंकी थी क्योंकि सिद्धू, नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बात कर रहे थे।

चप्पल फेंकने वाली महिला एकमात्र ऐसी नहीं थी जो सिद्धू की रैली के विरोध में थी, बल्कि वहाँ मौजूद कई लोग मोदी-मोदी के नारे भी लगा रहे थे।

₹33 का रिफंड, 2 साल की लंबी कानूनी लड़ाई: IRCTC ने आखिरकार मानी हार, लौटाए पैसे

भारतीय रेलवे के नियमानुसार जब हम अपनी बुक हुई टिकट को कैंसिल कराते हैं तो हमें रिफंड मिलता है। इस रिफंड में रेलवे हमसे टिकट कैंसिल करने का चार्ज काट लेता है और बाकी पैसे हमें लौटा दिए जाते हैं। लेकिन, दो साल पहले कोटा के सुजीत स्वामी नामक इंजीनियर के साथ ऐसा नहीं हुआ। इसके कारण सुजीत को अपने रुपयों के लिए दो साल की लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।

दरअसल, सुजीत ने साल 2017 में कोटा से दिल्ली जाने के लिए 765 रुपए की टिकट बुक कराई थी लेकिन किसी कारणवश उन्हें अपनी टिकट कैंसिल करनी पड़ी। कैंसिलेशन चार्ज कटने के बाद उन्हें 700 रुपए मिलने चाहिए थे, लेकिन उन्हें सिर्फ़ 665 रुपए वापस रिफंड किए गए। 35 रुपए को सर्विस टैक्स बताकर काटा गया।

सुजीत ने अपना पैसा वापस लेने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। उन्होंने अपनी शिकायत को लोक अदालत में दर्ज कराया लेकिन लोकअदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताकर मामले को ख़ारिज कर दिया।

सुजीत ने अपने हक के लिए RTI के जरिए जानकारी हासिल करने की ठानी। इसके लिए उन्हें दिसंबर 2018 से अप्रैल 2019 तक में कई बार एक विभाग से दूसरे विभाग के चक्कर भी लगाने पड़े। आखिरकार लंबी लड़ाई के बाद बैंक ने 4 मई को उनके बैंक अकॉउंट में 33 रुपए भेजे। मीडिया खबरों के मुताबिक सुजीत कहते हैं कि इस लंबी लड़ाई के कारण उन्हें काफ़ी परेशानी झेलनी पड़ी, और आईआरसीटीसी ने उन्हें क्षतिपूर्ति देने की बजाए 2 रुपए रिफंड में से काट लिए।