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ध्रुव त्यागी हत्याकांड: मीडिया, मज़हब और परिवार में पलती जिहादी सोच

दिल्ली के मोती नगर में जो हुआ, आपके साथ भी हो सकता है, किसी के साथ भी हो सकता है। अनमोल, जिसने आतताइयों को अपने पिता पर ताबड़तोड़ चाकू चलाते देखा और उनकी जान बचाने के लिए अपने पिता के ऊपर लेट गया, उसकी जगह हम या आप में से भी कोई हो सकता था। आरोपितों ने बाप के ऊपर लेटे बेटे को भी नहीं बख़्शा और चाकू चलाते रहे। परिणाम यह कि अनमोल आज आईसीयू में भर्ती है, अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है। कारोबारी ध्रुव त्यागी, जो अब इस दुनिया में नहीं रहें, जिन्हें मार दिया गया, उनकी जगह कोई भी बेटी का बाप हो सकता था, आगे भी अगर ऐसे वारदात नहीं रुके तो उनकी जगह कोई और हो सकता है। वो लड़की, जो ये सोच कर रोए जा रही होगी कि सबकुछ उसके कारण हुआ, उसकी जगह कोई भी युवती हो सकती है। लेकिन नहीं, कारण वह नहीं थी।

मोती नगर हत्याकांड और तीन अन्य घटनाएँ

ये ऐसी सोच है, जो धर्म नहीं देखती, जाति नहीं देखती। लेकिन, साथ ही इस ख़ास मामले में एक ऐसी जिहादी मानसिकता समाहित है, जिसका एक ख़ास समूह से लेना-देना है। ये समूह एक ख़ास मानसिकता से प्रेरित है। इसके लिए तीन घटनाओं को समझना पड़ेगा। यहाँ हम ये दावा नहीं कर रहे कि ध्रुव त्यागी की हत्या करने वाले जिहादी थे। मीडिया ज़ोर-ज़ोर से इसमें धार्मिक एंगल न ढूँढने की अपील कर रहा है। मीडिया की पोल तो नीचे खोलेंगे ही लेकिन इस घटना से मिलती-जुलती अन्य घटनाओं के पीछे भी रही कुछ इसी तरह की सोच की पड़ताल कर हम देखेंगे कि ऐसा क्या था, जो नीचे वर्णित तीन घटनाओं में समान है। मोती नगर की घटना, श्री लंका में हुए ईस्टर ब्लास्ट्स और कश्मीर में चल रहे आतंकवाद में कुछ समानता है। इसके बाद हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाते हुए एक इजराइल की एक घटना का भी जिक्र करेंगे।

ये तीनों ही अलग-अलग प्रकृति की घटनाएँ हैं। जहाँ मोती नगर में जो हुआ, वह एक निर्मम आपराधिक वारदात है, श्री लंका में हुआ हमला भीषण आतंकी नरसंहार है और कश्मीर में जो चल रहा है वह लोकतंत्र के ख़िलाफ़ आतंक को स्थापित करने की एक जिहादी प्रक्रिया है। सबसे पहले बात श्री लंका की। श्री लंका में ईस्टर पर चर्चों को निशाना बनाया गया, 250 से भी ज्यादा लोग मारे गए और द्वीपीय देश ने कड़ी कार्रवाई करते हुए इसमें सम्मिलित आतंकियों को या तो मार गिराया या उन्हें पुलिस शिकंजे में ले लिया। यहाँ कुछ गिरफ्तारियाँ ऐसी हुईं, जिससे पता चलता है कि एक समाज विशेष के भीतर यह आम है कि अगर परिवार का कोई सदस्य आतंकी बन जाए तो बाकी लोग उसे वापस मुख्यधारा में लौटाने का प्रयास नहीं करते।

श्री लंका में इल्हाम और इंसाथ ने आतंकी ब्लास्ट्स को अंजाम दिया। ये दोनों ही भाई हैं। इस सम्बन्ध में दोनों ही आतंकियों के पिता को गिरफ़्तार किया गया। ये लोग श्री लंका के एक धनाढ्य परिवार से आते हैं। जब पुलिस इनके घरों पर पहुँची तो एक भाई की पत्नी ने ख़ुद को बच्चों सहित मार डाला और तीन सुरक्षाकर्मियों की भी जान ले ली। दोनों भाइयों के पिता को इस सम्बन्ध में गिरफ़्तार कर लिया गया है। अगर आपको लगता है कि आतंकियों द्वारा की गई घटनाओं के लिए उनके पिता को सज़ा दी जा रही है तो आप ग़लत हैं। असल में उन दोनों के पिता ने ही अपने बेटों को आतंकी घटना अंजाम देने के लिए उकसाया था और उनके कुकृत्यों को बढ़ावा दिया था। अर्थात, पूरा परिवार जिहादियों के संरक्षण और मदद देने में लगा हुआ था।

अब आते हैं कश्मीर पर। जम्मू कश्मीर में पुलवामा हमले के बाद सेना ने एक सलाह जारी की। यह सलाह आतंकियों के लिए नहीं थी, उनके परिवारों के लिए थी, ख़ासकर उनकी माँओं के लिए। लेफ्टिनेंट जनरल कँवलजीत सिंह ढिल्लों ने आतंकियों की माँओं से निवेदन किया कि या तो वे अपने बेटों को मुख्यधारा की तरफ़ लाने में भूमिका निभाएँ, प्रयास करें, या फिर बाद में सेना ऐसे आतंकी तत्वों को साफ़ करेगी। सेना ने साफ़-साफ़ कहा कि माँएँ अपने बेटों को सरेंडर कराए नहीं तो सेना अब उन्हें बख़्शने नहीं जा रही है। आख़िर सेना को ऐसी सलाह देने की नौबत क्यों आन पड़ी? कहीं न कहीं कश्मीर में आतंकी बने युवकों के परिवारों के मन में उनके प्रति सहानुभूति रहती है और वे कहीं न कहीं ऐसे ‘भटके हुए नौजवानों (जैसा कि कई मेन स्ट्रीम मीडिया वाले कहते हैं)’ का समर्थन करते हैं, उन्हें बचाते हैं।

एक बाप का फ़र्ज़ निभाया, मिली मौत

अब आते हैं इजराइल की एक ख़बर पर। बरकन इंडस्ट्रियल जोन आतंकी हमले में नामजद 2 आतंकियों की माँ को अपने बेटों की योजनाओं और इरादों की भनक थी, उन्हें सबकुछ पता था। अदालत में आतंकी बेटों की इस हरकत के लिए उसकी माँ को भी जिम्मेदार ठहराने के लिए याचिका दाख़िल की गई। अब वापस लौटते हैं, मोती नगर की घटना पर। आलम शमशेर नशे में था। जब इस तरह का कोई “भटका हुआ मनचला” नशे में हो तो उसके परिवार की ज़िम्मेदारी बनती है कि समाज को विषाक्त करने वाले ऐसे कोढ़ को घर में रखें, उन पर नियंत्रण रखें। उसने जहाँगीर व अन्य मनचलों के साथ मिल कर ध्रुव त्यागी की 26 वर्षीय बेटी के साथ छेड़खानी की। नाराज़ त्यागी ने उससे झगड़ा नहीं किया बल्कि उसे समझाया।

त्यागी ने उससे बस इतना पूछा कि क्या इस तरह से लड़कियों को छेड़ने में उसे शर्म नहीं आती? इतना सुनते ही शमशेर और जहाँगीर ख़ान सहित सभी मनचले भड़क गए और उन्होंने अपने परिवार वालों को बुलाकर उनसे मारपीट शुरू कर दी। क्या आपको पता है कि आलम ने घर में से चाकू लाने के लिए किसे भेजा? अपनी माँ को। उसकी माँ ने घर से चाकू लेकर अपने बेटे को दिया, बाद में उस चाकू से त्यागी की हत्या की गई। उन्हें पत्थरों से मारा गया, उनका मुँह कुचल दिया गया, उनके नाखून उखड़ गए और तड़पते हुए त्यागी की बाद में मौत हो गई। अगर आलम की माँ चाहती तो इस घटना को रोक सकती थी। अगर वह चाहती तो अपने बेटे को किसी युवती को छेड़ने के लिए फटकार लगा सकती थी। अगर इतना न सही तो कम से कम चाकू अपने बेटे तक पहुँचाने से ख़ुद को रोक सकती थी।

लेकिन, उसने अपने बेटे को न सिर्फ़ हत्या करने के लिए बढ़ावा दिया बल्कि उसकी मदद भी की। हम में से अधिकतर लोग अगर अपना बचपन याद करें तो पता चलता है कि जब किसी बाहरी लड़के या दोस्त से हमारा झगड़ा हुआ करता था तो पेरेंट्स पहले यह नहीं पूछते थे कि ग़लती किसकी है, पहले हमें ही डाँट पड़ती थी। अगर माँ-बाप चाहें तो अपने बेटे-बेटियों को ऐसे अपराध करने से रोक नहीं सकते तो रोकने का प्रयास तो कर ही सकते हैं, जिनमें उन्हें कुछ न कुछ सफलता तो मिलेगी ही, क्योंकि उन्हें अपने बच्चों की भावनाओं व इरादों की सबसे ज्यादा भनक होती है। कश्मीर, श्री लंका, इजराइल और मोती नगर में यही समान है कि इन चारों वारदातों में आतंकियों, आरोपितों या अपराधियों को अपने परिवारों से अपने कुकृत्यों में सहयोग, संरक्षण और बढ़ावा मिला। अब मीडिया पर आते हैं।

मीडिया का मज़हब को लेकर दोहरा रवैया

‘आज तक’ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट का टाइटल है- “मोतीनगर हत्याकांडः मुस्लिमों ने हमलावरों से लड़कर बचाया था पिता-पुत्र को।” जब हमने ‘आज तक’ द्वारा मोती नगर हत्याकांड की कवरेज को खंगाला तो पता चला कि आज तक ने ऐसा कहीं नहीं लिखा था कि “मुस्लिमों ने मिल कर ध्रुव त्यागी की हत्या की।” असल में, मारने वाले न हिन्दू थे और न मुस्लिम बल्कि सोच में कहीं न कहीं महिला विरोधी और जिहादी सोच का मिश्रण था। अगर ऐसा नहीं होता तो आरोपित आलम शमशेर शायद अपराध को अंजाम देकर मस्जिद में नहीं भागता। अपराधी जानबूझ कर मस्जिद में भागा क्योंकि उसे पता था कि यह एक ऐसी जगह है, जहाँ पर बैठ कर किसी भी अपराध को सांप्रदायिक रंग देकर बचने की कोशिश की जा सकती है।

दिवंगत त्यागी की बेटी के बयान मीडिया में चलाए जा रहे हैं। अपने बयान में उन्होंने कहा है कि इस घटना को सांप्रदायिक रंग न दिया जाए और इसे सांप्रदायिक कोण से न देखा जाए। पीड़िता का बयान बिलकुल सही है लेकिन यहाँ सवाल तो उठता है कि इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश किसने की? जब आरोपित इतना बड़ा अपराध कर के मस्जिद भागता है, इसका अर्थ है कि अपराध को अंजाम देने वाले अपने मजहब के तले छिप कर बचना चाहते थे। ये सोच उनके भीतर कहाँ से आई? इस सोच के पीछे कौन सी मानसिकता थी? अगर 11 आरोपितों का कोई धर्म नहीं है, तो फिर बीच-बचाव करने वाले का धर्म हाइलाइट करना कैसी पत्रकारिता है? मारने वाले जहाँगीर और आलम का कोई मज़हब नहीं है, बचाने वाले रियाज अहमद मुर्तजा ‘मुस्लिम’ हैं। यह दोहरा रवैया क्यों?

पहले वाले पैराग्राफ में हमने इसीलिए कहा कि मृत ध्रुव त्यागी, उनकी पीड़िता बेटी और घायल अनमोल, इन सबकी जगह हम-आप में से कोई भी हो सकता है क्योंकि हमें समाज में ऐसे कृमियों को बढ़ावा देने से रोकना होगा जो लड़कियों को बुरी नज़र से देखते हैं और साथ ही, ऐसे आत्मविश्वास से लड़ना होगा जिसमें अपराधी समझता है कि अगर भाग कर वह मस्जिद चला गया तो उसे सजा नहीं मिलेगी। अगली बात, हमें दोहरे रवैये वाले मीडिया रिपोर्ट्स का विरोध करना पड़ेगा, जहाँ मारने वालों का मजहब नहीं होता और बचाने वालों का रिलिजन हाइलाइट करना ज़रूरी होता है। ये वही ट्रेंड है, जिसमें आतंकवादी कश्मीर की मस्जिदों में छिपते रहे हैं और मज़हब की आड़ में बचते रहे हैं।

इस घटना के बाद गाँव में पंचायत बैठी। ऐसी चर्चाएँ चली कि मुस्लिमों को गाँव में कोई किराए पर घर नहीं देगा। इस चर्चा के जन्म लेने के पीछे का कारण क्या है? आम जनता उसी पर विश्वास करती है, जो वह देखती और सुनती है। उन्हें कहीं न कहीं से कुछ ऐसी गड़बड़ी की बू तो आई होगी, जिस कारण ऐसी चर्चा चली। सचमुच में डर का माहौल इसे कहते हैं। ये डर आम जनता के बीच पैदा हुआ, इसके लिए न मोदी ज़िम्मेदार है और न केजरीवाल। जनता के सामने एक ऐसी घटना हुई। बाद में अगर उस क्षेत्र में कोई व्यक्ति किसी समुदाय विशेष के व्यक्ति को घर किराए पर देने से मना करता है तो उसे घृणा का पात्र बना देने और वायरल कर देने से पहले इन सभी कोणों पर भी विचार होना चाहिए।

JD(U) अपने नेताओं पर करेगा कार्रवाई: NDA प्रत्याशियों के विरोध में प्रचार करने का आरोप

लोकसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच बिहार से खबर है कि चुनाव के बाद जदयू ने अपने कम से कम छह नेताओं पर कार्रवाई का मन बना लिया है। उनपर एनडीए उम्मीदवारों के विरोध में खुले तौर पर प्रचार करने का आरोप है। जदयू के अनुसार इन नेताओं ने पार्टी लाइन से अलग जाकर गठबंधन धर्म का उल्लंघन किया है।

गौरतलब है कि जदयू के इन नेताओं ने उन्हीं क्षेत्रों में विरोध किया, जहाँ राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह, मुन्ना शुक्ला, अनु शुक्ला और जदयू के प्रदेश महासचिव देव कुमार चौरसिया पार्टी की अनुशासनिक कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह भी कहा जा रहा है कि इन नेताओं को लेकर लोजपा ने जदयू के समक्ष अपनी नाराजगी दर्ज कराई है। बता दें कि जदयू नेता नरेंद्र सिंह ने जमुई में लोजपा उम्मीदवार चिराग पासवान के खिलाफ खुलेआम प्रचार किया। इतना ही नहीं उनके पुत्र अजय सिंह भी चिराग के विरोध में शामिल थे। नरेंद्र सिंह इस बात से नाराज हैं कि लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने विधानसभा के पिछले चुनाव में उनके पुत्र की उम्मीदवारी का विरोध किया था।

रिपोर्ट के अनुसार, हाजीपुर में मतदान के दिन जदयू के पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला ने नोटा का बटन दबाया और उन्होंने इसे स्वीकार भी किया। उन्होंने वैशाली लोकसभा क्षेत्र के अपने जाति के मतदाताओं से भी नोटा का बटन दबाने की अपील की। बता दें कि वैशाली में लोजपा उम्मीदवार वीणा देवी चुनाव लड़ रही थीं। जदयू के प्रदेश महासचिव देव कुमार चौरसिया पर भी आरोप है कि उन्होंने हाजीपुर में लोजपा के बदले राजद उम्मीदवार के लिए वोट देने की अपील की।

रिपोर्ट के अनुसार, कहा जा रहा है कि देव कुमार चौरसिया ने प्रदेश नेतृत्व को जानकारी देकर लोजपा उम्मीदवार पशुपति कुमार पारस का विरोध किया। विरोध का कारण यह बताया जा रहा है कि 2014 में चौरसिया हाजीपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उपचुनाव लड़ रहे थे। उस समय पारस ने उनके खिलाफ वोट देने की अपील की थी। चौरसिया ने इस चुनाव में उसी का बदला लिया है।

पार्टी में ही इस तरह से खुलेआम विरोध को देखते हुए जदयू का अपने इन बागी नेताओं पर कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है। अब देखना यह है कि लोकसभा चुनाव के बाद क्या होता है।

बेंगलुरु में स्थापित होगी Defence Space Agency: AVM धारकर होंगे एजेंसी के चीफ

भारत ने कुछ दिन पहले ही अंतरिक्ष में सैटेलाइट मार गिराने की तकनीक विकसित की है जिसके बाद से ही सशस्त्र सेनाओं की एक संयुक्त एजेंसी की माँग तेज हो गई थी जो अंतरिक्ष विभाग और मिलिट्री दोनों के साथ मिलकर काम कर सके।

भारत में एक संयुक्त स्पेस कमान की बात बहुत पहले से होती रही है क्योंकि अब अंतरिक्ष भी युद्ध का क्षेत्र बन चुका है। हाल ही में भारत सरकार ने डिफेन्स साइबर एजेंसी और स्पेशल ऑपरेशन डिवीज़न का गठन किया है। इसी क्रम में ANI के हवाले से खबर आई है कि डिफेंस स्पेस एजेंसी बेंगलुरु में बनाई जाएगी तथा भारतीय वायु सेना के उच्च अधिकारी एयर वाईस मार्शल सुजीत पुष्पकर धारकर इस एजेंसी के चीफ होंगे।

सरकार ने डिफेन्स स्पेस एजेंसी, स्पेशल ऑप्स डिवीजन और डिफेंस सायबर एजेंसी (डीसीए) को पिछले साल मंजूरी दी थी। डीसीए की जिम्मेदारी नौसेना के अधिकारी रीयर एडमिरल मोहित गुप्ता को सौंपी गई है। डिफेन्स स्पेस एजेंसी अंतरिक्ष में होने वाले मिलिट्री मिशन को अंजाम देगी। यह सभी संयुक्त ट्राई सर्विस एजेंसियाँ हैं।

साइबर के अतिरिक्त स्पेस अर्थात अंतरिक्ष भी आज के समय में युद्ध का अखाड़ा बना हुआ है। जनवरी 2007 में चीन ने अपनी ही सैटेलाइट को मार गिराया था और दुनिया के सामने इसे एक दुर्घटना बताया था। वास्तव में चीन किसी सैटेलाइट को मार गिराने की अपनी क्षमता को जाँच रहा था। डीआरडीओ के अध्यक्ष वी के सारस्वत ने 2010 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस में अपने संबोधन में कहा था कि भारत भी शत्रु के सैटेलाइट मार गिराने की तकनीक विकसित कर रहा है।

आज भारत ने स्पेस एक्सप्लोरेशन ASTROSAT से लेकर नेविगेशन सैटेलाईट IRNSS तक अंतरिक्ष में स्थापित की है। देश में पूरी संचार व्यवस्था इन्हीं सैटेलाइट की सुरक्षा पर टिकी है। थलसेना, वायुसेना और नौसेना के उपकरण इस संचार व्यवस्था पर कार्य करते हैं इसलिए डिफेन्स स्पेस एजेंसी का गठन स्वागतयोग्य निर्णय है।

विष्णु पर पेट्रोल डाल लगाई आग: हमलावर इमरान, तुफ़ैल, रमज़ान, निज़ामुद्दीन गिरफ़्तार

लखनऊ में गोंडा के चिस्तीपुर गाँव में एक व्यक्ति को आग लगाकर जान से मारने की कोशिश करने वाले चार अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर उनके ख़िलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। पुलिस ने इस मामले में इमरान, तुफ़ैल, रमजान उर्फ़ मास्टर व निज़ामुद्दीन के ख़िलाफ़ जानलेवा हमले समेत कई धाराओं के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली है।

ख़बर के अनुसार, पुलिस ऑफ़िसर जितेन्द्र दूबे ने बताया कि विष्णु कुमार गोस्वामी अपने पिता रामदी गोस्वामी को बुलाने के लिए जमुनिया बाग बाज़ार गए थे। वापसी के दौरान दोनों पिता-पुत्र गोंडा-अयोध्या राजमार्ग पर स्थित क़स्बे में सड़क किनारे लगे नल पर पानी पीने लगे। इसी दौरान किसी बात को लेकर पिता-पुत्र की बहस इन्हीं चारों लोगों से हो गई। आपसी बहस इतनी बढ़ गई कि नौबत मारपीट तक आ पहुँची।

विवाद बढ़ता देख विष्णु गोस्वामी ने पिता को अलग छोड़ दिया और ख़ुद चारों से उलझ गया। इस बीच इमरान, तुफ़ैल, रमजान उर्फ़ मास्टर व निज़ामुद्दीन में से किसी एक ने पास खड़े टैंकर से पेट्रोल निकाला और विष्णु पर डालकर उसे आग के हवाले कर दिया। इस जानलेवा हमले में वो काफ़ी अधिक झुलस गया। इसके बाद उसे गंभीर हालत में ज़िले के अस्पताल में भर्ती किया गया। इसके बाद पुलिस की सुरक्षा में विष्णु को लखनऊ भेज दिया गया है।

बता दें कि यह आपसी विवाद दो समुदायों के बीच हुआ था, ऐसे में यह घटना साम्प्रदायिक हिंसा का सबब ना बन जाए, इसलिए क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल के साथ-साथ पीएसी की भी तैनाती की गई है।

विष्णु के बयान के आधार पर पुलिस अधीक्षक आरपी सिंह ने घटना स्थल पर पहुँचकर चारों आरोपितों की गिरफ़्तारी के लिए चार टीमें गठित की और उनकी गिरफ़्तारी के निर्देश जारी किए। गिरफ़्तारी के निर्देश जारी होने के बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और साथ ही उस टैंकर को भी बरामद कर लिया जिससे पेट्रोल निकाला गया था।

फ़िलहाल, विष्णु गोस्वामी का ईलाज लखनऊ के केजीएमयू अस्पताल में चल रहा है, जहाँ अभी भी उनकी हालत नाज़ुक बनी हुई है। बुधवार को नगर मजिस्ट्रेट आलमबाग ने अस्पताल में पहुँचकर उनका बयान दर्ज कर लिया है। अपने बयान में विष्णु ने बताया कि वो अपने पिता को बुलाने गया था, तभी किसी बात को लेकर उसकी बहस इन चारों से हो गई। आपसी बहस इतनी बढ़ गई कि उस पर पेट्रोल छिड़ककर उसे मारने की मंशा से आग लगा दी।

राहुल तोप हैं और मैं AK-47: कॉन्ग्रेस नेता ने दी PM मोदी को मुकाबले की चुनौती

कॉन्ग्रेस नेता और पंजाब में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने आज (मई 16, 2019) हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने प्रधानमंत्री के बारे में बात करते हुए कहा कि साल 2014 में मोदी गंगा के बेटे बनकर आए थे, लेकिन अब इन चुनावों में वह राफेल के एजेंट बनकर जाएँगे।

चुनावी रैली को संबोधित करते हुए सिद्धू ने कहा कि वह नरेंद्र मोदी से पूछना चाहते हैं कि उन्होंने राफेल सौदे में दलाली की है या नहीं…। सिद्धू ने इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी को खुली चुनौती देते हुए कहा कि मोदी उनसे देश में कहीं भी बहस कर सकते हैं। उनका कहना है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी तो बहुत बड़ी बात हैं। उनकी मानें तो राहुल एक तोप हैं और वह एके-47 हैं।

इसके अलावा नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा, “मैं (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी को ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ वाले बयान को लेकर चुनौती देता हूँ। अगर मैं हार गया, तो हमेशा के लिए राजनीति छोड़ दूँगा। मैं कहना चाहता हूँ, (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी वर्ष 2014 में ‘गंगा पुत्र’ बनकर आए थे, लेकिन 2019 में वह ‘राफेल सौदे के एजेंट’ बनकर जाएँगे…”

गौरतलब है इससे पहले सिद्धू प्रधामंत्री की तुलना उस नई दुल्हन से भी कर चुके हैं जो रोटियाँ कम बेलती है और चूड़ियाँ ज्यादा खनकाती है ताकि मोहल्ले वालों को पता चले कि वो काम कर रही है। इस बयान के दौरान भी सिद्धू ने प्रधानमंत्री को चुनौती दी थी कि प्रधानमंत्री उन्हें अपनी एक भी उपलब्धि गिनवा दें।

MP: महिलाओं को पेड़ से बाँध कर पीटा, कपड़े फाड़े, गुप्तांगों पर मारी लात, Video बनाते रहे लोग

मध्य प्रदेश में क़ानून व्यवथा तार-तार होती नज़र आ रही है। यहाँ के एक गाँव में एक व्यक्ति को उसकी कथित ग़लती के लिए ‘सज़ा’ दी गई। न सिर्फ़ उस व्यक्ति के साथ ज्यादतियाँ की गई, बल्कि उसकी दोनों बहनों (एक नाबालिग) को भी सरेआम बेइज्जत किया गया और उनकी पिटाई की गई। मामला मध्य प्रदेश के धार ज़िले में स्थित अर्जुन कॉलोनी का है। दरअसल, मुकेश की पत्नी ने उसे छोड़ दिया था और रवि नामक दूसरे युवक के साथ शादी रचा ली थी। वह रवि के साथ भाग भी गई थी। इसी बात पर गुस्साए मुकेश ने अपनी पत्नी के वर्तमान पति रवि को समझौता करने के लिए बुलाया। असल में, मुकेश और उसके परिजनों ने रवि को झाँसा देकर धोखे से बुलाया था।

रवि के साथ धार निवासी उसके दोस्त और उन दोस्तों की पत्नियाँ भी आई थीं। आरोपित ने पहले तो रवि को एक पेड़ से बाँध दिया और फिर उसके साथ आए उसके दोस्त की पत्नियों को भी रस्सियों से पेड़ से बाँध दिया। इसके बाद महिलाओं की डंडे से पिटाई की गई और उन पर पत्थर से वार किया गया। महिलाओं व रवि को पीटने के लिए रस्सियों का भी प्रयोग किया गया। जब रवि और दोनों महिलाओं की पिटाई हो रही थी, तब पूरा मोहल्ला खड़े होकर तमाशा देख रहा था। इतना ही नहीं, तमाशबीन इस वारदात की वीडियो भी बना रहे थे। बाद में सूचना मिलने पर पहुँची पुलिस ने जैसे-तैसे मामले को शांत कराया।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि आरोपितों ने पुलिस के पहुँचने के बाद भी पीड़ितों को पीटना नहीं छोड़ा। पुलिस से बेख़ौफ़ आरोपित उनके सामने ही महिलाओं और रवि को पीटते रहे। पुलिस ने मशक्कत कर पीड़ितों को आरोपितों के चंगुल से छुड़ाया। मामले में 9 लोगों को नामजद किया गया है। इनमें 3 महिलाएँ भी शामिल हैं। तीनों आरोपित महिलाओं को गिरफ़्तार कर लिया गया है। कुल मिलकर पाँच आरोपितों को पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किया जा चुका है। चार आरोपित अभी भी फरार हैं। पिटाई के समय कुछ लोग और बच्चे हँसते हुए भी दिख रहे हैं।

अभी जब आचार संहिता लगी हुई है और चुनाव के कारण क़ानून व्यवस्था और तगड़ा किए जाने की बातें कही जा रही हैं, इस तरह से महिलाओं व निर्दोष व्यक्ति के साथ अत्याचार का मामला सामने आना मध्य प्रदेश पुलिस और प्रशासन की पोल खोलता है। कमल नाथ सरकार के आने के बाद से ऐसे कई आपराधिक मामले सामने आ चुके हैं, जहाँ अपराधी पुलिस से बेख़ौफ़ नज़र आते हैं। महिलाओं की इतनी निर्मम तरीके से पिटाई की गई कि वो काफी चीख-चिल्ला रही थी। स्थानीय अख़बारों के मुताबिक़, महिलाओं के गुप्तांगों पर लात मारी गई और उनके कपड़े फाड़ डाले गए।

बंगाल में आतंक का अलर्ट: महिला आत्मघाती दस्ता कर सकता है हमला

केंद्रीय खुफिया विभाग, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) ने पश्चिम बंगाल में आतंकी हमले का अलर्ट जारी किया है। चुनावी माहौल में पश्चिम बंगाल के हर चरण में हिंसा हुई है। बृहस्पतिवार (मई 16, 2019) को जारी IB के अलर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश सीमा से लगे सिलीगुड़ी, कूच बिहार, अलीपुरद्वार और दार्जिलिंग में आतंकी हमले हो सकते हैं।

सेना के 123 माउंटेन ब्रिगेड हेडक्वार्टर की ओर से जारी अलर्ट के अनुसार दुनिया भर में आतंक का पर्याय बन चुके इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) की बांग्लादेशी शाखा ने हमले की योजना बनाई है। इसके लिए बांग्लादेश के प्रतिबंधित आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) के आतंकियों की मदद ली जा रही है। अलर्ट में दावा किया गया कि पश्चिम बंगाल के विस्तृत इलाके में इस आतंकी संगठन ने स्लीपर सेल तैयार कर रखा है, जिसकी मदद से आतंकी वारदात को अंजाम दे सकते हैं।

आईबी (IB) ने आशंका जताई है कि यह हमला आत्मघाती महिला आतंकियों द्वारा करवाया जा सकता है। इस अलर्ट को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क रहने का निर्देश दिया गया है। आईबी के अलर्ट के बाद भारत और बांग्लादेश सीमा रेखा पर BSF को अतिरिक्त सतर्कता बरतने का निर्देश दिया गया है। अलर्ट जारी होने के बाद पूरे उत्तर बंगाल को राज्य और केंद्रीय एजेंसियों की मदद से सुरक्षा घेरे में ले लिया गया है। आतंकियों के मंसूबोंं को नाकाम करने के लिए चप्पे-चप्पे पर विशेष निगरानी रखी जा रही है।

बता दें कि पिछले महीने के अंतिम सप्ताह में श्री लंका में सीरियल ब्लास्ट के बाद बांग्लादेश के आतंकियों ने बांग्ला भाषा में पोस्टर जारी किया था, जिसमें जल्द ही आतंकी हमला करने की धमकी दी गई थी। उसके बाद आईबी के ताजा अलर्ट में पश्चिम बंगाल सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया गया।

वतन-वापसी: ओमान में कैद-भूख के बाद सकुशल लौटीं कुलसुम बानो ने सुषमा स्वराज को कहा – Thank You

नौकरी का झांसा देकर हैदराबाद से ओमान ले जाई गई एक महिला 5 महीने बाद देश लौट आई है। मीडिया से हुई बातचीत में महिला ने अपनी आपबीती साझा की है और वतन-वापसी के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और भारतीय दूतावास को धन्यवाद दिया है।

कुलसुम बानो नामक महिला का कहना है कि अबरार नाम के एजेंट ने उन्हें मस्कट के ब्यूटी पार्लर में नौकरी दिलाने का ऑफर दिया था। एजेंट ने महिला से कहा था कि इस काम के लिए उसे तीस हजार रुपए मिलेंगे लेकिन वहाँ पहुँचने के बाद कुलसुम से घर के काम कराए जाने लगे।

कुलसुम बताती हैं कि उन्होंने वहाँ 1 महीने तक काम किया और फिर काम करने से मना कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन्हें 10 दिन तक कमरे में रखकर उनके साथ मारपीट की गई और खाने के लिए भी उन्हें कुछ नहीं दिया गया।

कुलसुम का कहना है कि इस दौरान उन्होंने ओमान स्थित भारतीय दूतावास में सहायता माँगी। दूतावास के अधिकारियों ने उन्हें 4 महीने दूतावास में रहने दिया। यहाँ उन्होंने अपनी बेटी से संपर्क किया और सारी परेशानी बताई तो बेटी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को इस मामले की शिकायत की।

इसके बाद भारतीय दूतावास ने उन पर लगाया 5000 रियाल का जुर्माना अदा किया और उन्हें वापस भारत भेज दिया गया। 8 मई को कुलसुम की वतन वापसी हुई।

बता दें इससे पहले हैदराबाद के रहने वाले एक कुरान टीचर को भी इसी तरह किसी एजेंट ने झांसा देकर सऊदी भेज दिया था। वहाँ पर उनसे सफाई का काम करवाया गया था। हाफिज़ ने भी भारत लौटकर सुषमा स्वराज को धन्यवाद दिया था।

घर बेचकर बनाया ‘बेजोड़’ तिरंगा, जानिए क्या है ख़ासियत इस झंडे की

मज़बूत इरादे और सच्ची लगन से हर सपने को साकार किया जा सकता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया हैदराबाद के रहने वाले आर सत्यनारायण ने जो पेशे से बुनकर हैं। काफ़ी समय से उनकी आँखों में एक सपना था जिसे पूरा करने की ललक में वो अपना सर्वस्य न्योछावर कर चुके थे। उनका सपना था कि वो भारत के राष्ट्रीय ध्वज को बिना सिलाई के इस तरह से तैयार करें कि उसमें कोई जोड़ ना आए। एक ऐसा तिरंगा जो दुनिया में मिसाल बन सके, एक ऐसा तिरंगा जो सच्ची देशभक्ति का परिचय दे सके। ऐसा अनोखा तिरंगा बनाने का आईडिया उन्हें एक शॉर्ट फ़िल्म ‘लिटिल इंडियंस’ को देखकर आया। इस सपने को पूरा करने की चाहत में उन्हें घर से बेघर होना पड़ा।

दरअसल, सत्यनारायण ने जिस तिरंगे का सपना देखा था वह 8 गुणे 12 फीट के झंडे के रूप में सामने आया। इस तिरंगे को बनाने के लिए उन्हें 6 लाख रुपए की ज़रूरत थी जो तंग हालात की वजह से जुटाना लगभग नामुमकिन था। कोई उपाय न सूझता देख उन्होंने अपना घर बेच दिया। इसके बाद तक़रीबन 4 साल के लंबे इंतजार के बाद उन्हें अपने काम में सफलता मिली।

यूँ तो देश के हर नागरिक के मन में अपने तिरंगे के लिए बहुत मान-सम्मान है, लेकिन अगर कोई उसे एक ही कपड़े के पीस पर तैयार करने की ठान ले और इसके लिए अपना घर-बार तक दाँव पर लगा दे तो वह व्यक्ति आम नागरिक से ख़ास बन जाता है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशाखापत्तनम रैली में सत्यनारायण ने उन्हें यह विशेष तिरंगा सौंपा था। उस समय पीएम मोदी को इस तिरंगे की ख़ास बातें बताने का मौक़ा उन्हें नहीं मिल पाया था। उन्होंने दावा किया कि अतीत में ऐसा कोई तिरंगा अब तक उपलब्ध नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने सपने को पूरा कर दुनिया को दिखा दिया कि अगर सच्ची लगन हो और इरादे मज़बूत हों तो किसी भी मंज़िल पर पहुँचा जा सकता है। अभी जो तिरंगे बनते हैं उनके लिए केसरिया, सफेद और हरे कपड़े को आपस में सिलकर तैयार किया जाता है। जबकि सत्यनारायण ने जो तिरंगा तैयार किया वो सिंगल कपड़े पर बिना किसी जोड़ के बनाया गया है, जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए वो कम है। अब उनकी दिली ख़्वाहिश है कि इस तिरंगे को लालक़िले पर फ़हराया जाए।

अंग्रेजों से लोहा लेने वाले मंगल पांडेय के वंशजों को मोदीराज में नहीं लगता है डर

देश में अंग्रेजी राज के खिलाफ अलख जगाने वाले और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कहे जाने वाले मंगल पांडेय की पाँचवी पीढ़ी के वंशज चाहते हैं कि अगली बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही बनें। सन 1857 में अंग्रेजों की सेना में विद्रोह का बिगुल फूँकने वाले मंगल पांडेय को फाँसी दे दी गई थी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के हवाले से खबर है कि उन्हीं मंगल पाण्डेय के वंशजों की दिली इच्छा है कि नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनें।

उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले में रहने वाले संतोष कुमार पांडेय और प्रभुनाथ पांडेय भाई हैं। उनके अनुसार भाजपा ने सरकार में रहते हुए बहुत काम किया है। पांडेय बंधु सरकार की तारीफ करते हुए कहते हैं कि भाजपा सरकार की उज्ज्वला योजना से उन्हें बिजली मिली, लोगों को घर मिले, किसानों को भी फायदा मिला और पाकिस्तान पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की गई। संतोष और प्रभुनाथ यह मानते हैं कि मोदी सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी सम्मान दिया और आज हम लोग भारत में इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं।

संतोष कुमार पांडेय स्कूल में अध्यापक की नौकरी करते हैं। वे कहते हैं कि उनके परिवार ने 1975 में इंदिरा गाँधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने नरेंद्र मोदी द्वारा हिंदी को प्रोत्साहित किए जाने की भी तारीफ की।

नरेंद्र मोदी से राहुल गाँधी की तुलना किए जाने पर पांडेय जी कहते हैं कि पहले बिजली की आपूर्ति बहुत खराब थी और केवल 3-4 घंटे ही बिजली आती थी। लेकिन अब 18 घंटे बिजली आती है। मंगल पांडेय के एक अन्य वंशज के अनुसार बलिया की हालत और छवि पहले बहुत ख़राब थी लेकिन मोदी सरकार में सड़कों से लेकर रेलवे तक सबमें सुधार आया है। बलिया अब पहले से अधिक साफ़ सुथरा हो गया है।

बलिया में लोक सभा निर्वाचन 2019 के अंतिम चरण में 19 मई को मतदान होना है।