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23 मई के बाद BJP से मिल जाएँगी ‘बहन जी’: मायावती के कैबिनेट मंत्री व बड़े नेता का दावा

कभी मायावती के खास रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बड़ी बात कही है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में नसीमुद्दीन ने कहा कि वह ‘बहन जी’ की राजनीति को अच्छी तरह जानते हैं। उन्होंने दवा किया कि मायावती 23 मई के बाद भाजपा से हाथ मिला लेंगी। नसीमुद्दीन सिद्दीकी मायावती कैबिनेट में मंत्री रहे हैं। पार्टी द्वारा निलंबित किए जाने के बाद उन्होंने 50 से भी अधिक पूर्व सांसदों, विधायकों और विधान पार्षदों के साथ फरवरी 2018 में कॉन्ग्रेस ज्वाइन किया था। नसीमुद्दीन ने प्रधानमंत्री पद के लिए मायावती की दावेदारी की चर्चाओं को लेकर आश्चर्य जताते हुए कहा कि ना तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और न ही रालोद अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह ने कभी प्रधानमंत्री पद के लिए मायावती का स्पष्ट तौर पर समर्थन किया है।

कभी बसपा के कद्दावर नेता रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा सुप्रीमो के बारे में बोलते हुए आगे कहा, “23 मई के बाद मायावती भाजपा से मिल जाएँगी। मायावती पहले भी भाजपा से मिल चुकी हैं और भाजपा को अपना वोट ट्रांसफर करा चुकी हैं। मायावती पर इस तरह का दबाव बनेगा कि वह भाजपा का हिस्सा बन जाएँगी। जब मायावती भाजपा के साथ चली जाएँगी तो सपा के सामने देश एवं प्रदेश हित में कॉन्ग्रेस के साथ आने के सिवाय अन्य कोई विकल्प नहीं रह जाएगा।“

नसीमुद्दीन ने दावा किया कि जितना वह मायावती को जानते हैं, उतना वह स्वयं को भी नहीं जानतीं। मायावती को पिछले 33 वर्षों से क़रीब से जानने की बात करते हुए नसीमुद्दीन ने कहा कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता। उन्होंने कहा कि वह मायावती का सम्मान करते हैं लेकिन उनके फिर से बसपा में शामिल होने की कोई संभावना नहीं है। आगे उन्होंने राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने का दावा किया। नसीमुद्दीन ने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाया था, जिसके बाद बसपा ने उन पर कार्रवाई की थी।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी 2019 लोकसभा चुनाव में बिजनौर से मैदान में हैं। उन्हें कॉन्ग्रेस ने टिकट दिया है। कभी बसपा में नंबर 2 की हैसियत रखने वाले नसीमुद्दीन पार्टी का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा थे। जहाँ भाजपा को बहुमत न मिलने की स्थिति में मायावती को पीएम बनाने के लिए विपक्ष के एकजुट होने को लेकर चर्चाएँ चल रही हैं, वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा है कि 23 मई से पहले ही सपा और बसपा का गठबंधन टूट जाएगा। नवभारत टाइम्स से एक्सक्लूसिव बातचीत में योगी ने कहा कि अखिलेश ने अभी तक नाम लेकर मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन देने की बात नहीं कही है।

उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा ने कॉन्ग्रेस को धता बताते हुए महागठबंधन बना लिया। इस गठबंधन में रालोद के चौधरी अजीत सिंह भी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में अंतिम चरण के तहत गोरखपुर और वाराणसी जैसी अहम सीटों पर मतदान होना है। जहाँ वाराणसी से ख़ुद पीएम मोदी उम्मीदवार हैं, गोरखपुर में वहाँ से 5 बार सांसद रहे योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा दाँव पर है। गोरखपुर उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी की हार के बाद मुख्यमंत्री योगी ने वहाँ पूरा ज़ोर लगा दिया है।

दिल्ली, यूपी के 7 रेलवे स्टेशनों को मिली 72 घंटे में बम से उड़ाने की धमकी, 1 गिरफ़्तार

दिल्ली और उत्तर प्रदेश के तक़रीबन सात रेलवे स्टेशन आतंकियों के निशाने पर हैं। इन सात स्टेशनों को बम से उड़ाने की धमकी एक आतंकवादी संगठन ने ईमेल के ज़रिए दी है। ख़बर के अनुसार, धमकी भरा ईमेल लखनऊ, गाज़ियाबाद और शामली के पुलिस अधिकारियों की ईमेल आईडी पर आया है। शामली पुलिस ने केस दर्ज करते हुए एक युवक को गिरफ़्तार किया है। इस मामले में एटीएस ने भी शामली पहुँचकर जाँच पड़ताल शुरू कर दी है। साथ ही यूपी की अन्य सुरक्षा और खुफ़िया एजेंसी भी उस युवक से पूछताछ कर रही है।

बता दें कि रेलवे स्टेशनों को बम से उड़ाने की धमकी उत्तर प्रदेश के सुरक्षा मुख्यालय लखनऊ, सीबीसीआईडी मुख्यालय, इंटेलीजेंस मुख्यालय सहित गाज़ियाबाद और शामली एसएसपी की ईमेल आईडी पर मिली है। दिल्ली का निज़ामुद्दीन और यूपी के गाज़ियाबाद, मेरठ शामली सहित करीब सात रेलवे स्टेशनों का नाम इस धमकी भरे ईमेल में शामिल है। ईमेल में इस बात का भी ज़िक्र है कि बताए गए रेलवे स्टेशनों को 72 घंटो में उड़ा दिया जाएगा। गाज़ियाबाद के एसएसपी उपेंद्र अग्रवाल ने इस तरह के ईमेल मिलने की पुष्टि की है। उन्होंने जानकारी दी कि इस सिलसिले में पुलिस की ओर से शामली की शहर कोतवाली में मामला दर्ज कर लिए गया है। एटीएस, साइबर सेल और सर्विलांस टीमें जाँच में जुट गई हैं।

जानकारी के अनुसार, रेलवे स्टेशनों को बम से उड़ाने के लिए इस तरह का धमकी भरा ईमेल पहली बार भेजा गया है। फ़िलहाल लखनऊ से लेकर मेरठ जोन के पुलिस अधिकारी इस मामले की जाँच-पड़ताल में जुट गए हैं। ईमेल गेटवे से डेटा, आईपी एड्रेस और अन्य जानकारियों के माध्यम से शामली पुलिस ने बुधवार (15 मई) को मेरठ से एक युवक को गिरफ़्तार किया था। पुलिस इसकी तह तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। पुलिस यह भी जानने में जुटी हुई है कि जिस युवक ने यह ईमेल भेजा है वो किसके कहने पर भेजा है और क्यों? सुरक्षा एजेंसियाँ यह जानने में भी जुटी हुई हैं कि आरोपी युवक का ब्रेनवॉश करने में किस आतंकी संगठन का हाथ है। इन सभी सवालों के जवाब मिल जाने पर ही पता चल सकेगा कि इस पूरी साज़िश में आख़िर किसका हाथ है।

पुलवामा मुठभेड़: जैश का कमांडर खालिद सहित 3 आतंकी ढेर, 1 जवान वीरगति को प्राप्त

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ गुरुवार (मई 16, 2019) की सुबह शुरू हुई। ताजा खबर के मुताबिक सुरक्षाबल अब तक 3 आतंकियों को ढेर कर चुके हैं। इस मुठभेड़ में एक जवान के वीरगति प्राप्त होने की भी खबर है। पूरे इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया है और तलाश अभियान अभी भी जारी है।

इस मुठभेड़ में मारे गए तीन आतंकियों में जैश का कमांडर खालिद भी शामिल है, जो 2017 में लेथपोरा के सीआरपीएफ कैंप पर हुए हमले का मास्टर माइंड था। पूरे इलाके में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएँ बंद कर दी गई हैं।

मीडिया की खबरों के मुताबिक पुलवामा के डालीपोरा में गुरुवार की सबुह-सुबह सुरक्षाबल को कुछ आतंकियों के छिपे होने की खबर मिली थी। इसके बाद सुरक्षाबल ने पूरे इलाके को खाली करवा लिया और तलाशी शुरू कर दी। इस दौरान आतंकियों द्वारा ओपन फायरिंग शुरू कर दी गई। जवाबी कार्रवाई में सेना ने 3 आतंकियों को ढेर किया।

बता दें कि इससे पहले रविवार को शोपियाँ में सुरक्षाबलों ने 2 आतंकियों को ढेर किया था। इन आतंकियों के हिंद सीतापुर इलाके में छिपे होने की खबर मिली थी। इसके बाद इलाके की घेराबंदी की गई थी और सर्च ऑपरेशन शुरू हुए थे। इस दौरान आतंकियों ने गोलियाँ चलाईं और सेना की जवाबी कार्रवाई में मारे गए।

इसी महीने 3 मई को सुरक्षाबलों द्वारा तीन आतंकियों को शोपियाँ में ही ढेर किया गया था। इसमें हिजबुल मुजाहिद्दिन का कमांडर लतीफ टाइगर भी शामिल था। टाइगर उन 10 आतंकियों का आखिरी कमांडर था, जो बुरहान वानी से जुड़े हुए थे।

PM पद छोड़ने को तैयार कॉन्ग्रेस, नीतीश भी आ सकते हैं साथ: गुलाम नबी आज़ाद

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने भविष्यवाणी करते हुए कहा है कि इस बार न तो भाजपा की सरकार बनने जा रही है और न ही राजग की। साथ ही आज़ाद ने नरेंद्र मोदी के फिर से प्रधानमंत्री न बनने की भी भविष्यवाणी की। ख़ास बात यह रही कि उन्होंने यह भी दावा नहीं किया कि कॉन्ग्रेस अकेले या यूपीए के दम पर सरकार बनाने में कामयाब होगी। आज़ाद ने ग़ैर-भाजपा, ग़ैर-राजग सरकार बनने की बात कह कई अटकलों को जन्म दे दिया। ग़ुलाम नबी आज़ाद के अनुसार, केंद्र में भाजपा और राजग के बिना एक ऐसी सरकार बनेगी, जिसमें कॉन्ग्रेस भी भागीदार होगी। उन्होंने आशा जताते हुए कहा कि अगर किसी कॉन्ग्रेस नेता को प्रधानमंत्री बनाए जाने की बात पर सहमति बनती है तो अच्छा है। साथ ही उन्होंने कहा:

“हम इसे कोई मुद्दा नहीं बनाने जा रहे हैं कि अगर हमें (कॉन्ग्रेस पार्टी को) प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की पेशकश नहीं की गयी तो हम किसी और दल के नेता को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे। कॉन्ग्रेस का एकमात्र ध्येय केंद्र में राजग को सरकार बनाने से रोकना है और ग़ैर-राजग सरकार बनाना है। ताज़ा लोकसभा चुनाव में भाजपा 125 सीटों तक सिमट जाएगी। 2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा पूरी तरह बेनकाब हो गयी है क्योंकि उसने समाज में नफरत फैलाने और बाँटने की अपनी विचारधारा का लगातार अनुसरण किया है।”

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष आज़ाद के इस बयान का सीधा इशारा यही था कि भाजपा और राजग को सरकार बनाने से रोकने के लिए कॉन्ग्रेस किसी भी तरह का ‘त्याग’ करने को मंज़ूर है और अगर राहुल गाँधी के अलावा किसी अन्य कॉन्ग्रेस नेता के नाम पर सहमति नहीं बनती है तो कॉन्ग्रेस के समर्थन से किसी अन्य समर्थक दल के नेता को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया जा सकता है। आज़ाद का यह बयान इसीलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने इशारों में ही यह माना है कि यूपीए को भी बहुमत नहीं मिलने जा रहा है। साथ ही ग़ुलाम नबी आज़ाद ने राजग को तोड़ने की बात कह सियासी माहौल को गर्मा दिया।

आज़ाद के अनुसार राजग में भी कई ऐसे दल हैं, जिनकी विचारधारा भाजपा से नहीं मिलती है। उन्होंने जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार का नाम लेते हुए कहा कि उनकी पार्टी भी ग़ैर-भाजपा सरकार के लिए दिल्ली में गठबंधन कर सकती है। आज़ाद का कहना था कि राजग में कई दल या तो मज़बूरी में भाजपा के साथ हैं या फिर सत्ता पाने की लालसा से वहाँ हैं। उन्होंने ऐसे दलों को भी ग़ैर-भाजपा सरकार के लिए चुनाव परिणाम आने के बाद साथ लिए जाने की बता कही।

उधर ख़बरें आई थीं कि यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी भी सक्रिय हो चली हैं और उन्होंने सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं को फोन कर 23 मई और 24 मई को दिल्ली में उपस्थित रहने का आग्रह किया है। कुल मिलकर कॉन्ग्रेस नेताओं के बयानों और क्रियाकलापों से इस बात का पता चलता है कि भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए एक खिचड़ी सरकार का खाका तैयार किया जा रहा है। उधर तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर भी तीसरे मोर्चे के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं और उन्होंने हाल ही में द्रमुक सुप्रीमो स्टालिन से चेन्नई में मुलाक़ात की।

आजम खान के समर्थकों की गुंडई से प्रशासनिक अधिकारी डरे, एसपी से की शिकायत

रामपुर में लगातार प्रशासनिक अधिकारी आजम खान से अपनी जान को खतरा होने की शिकायतें कर रहे हैं। मंगलवार (मई 14, 2019) को एसडीएम जगदंबा प्रसाद गुप्ता एसपी को पत्र लिखकर अचानक छुट्टी पर चले गए। उन्होंने कहा कि आज़म खान के समर्थकों से उनकी जान को खतरा है। इसी तरह एसडीएम सदर प्रेम प्रकाश तिवारी ने भी एसपी को पत्र लिखकर अपनी जान को खतरा बताया है। हालाँकि डीएम ने एसडीएम जगदंबा के निजी कारणों से अवकाश पर जाने की बात कही है और एसडीएम सदर प्रेम प्रकाश व सिटी मजिस्ट्रेट सर्वेश कुमार की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

गौरतलब है मंगलवार को एसडीएम जगदंबा और जिला मजिस्ट्रेट सर्वेश कुमार गुप्ता द्वारा लिखे पत्र के बाद आजम खान और जिला प्रशासन के अधिकारियों के बीच तनातनी बहुत बढ़ गई है। अधिकारियों की शिकायत है कि उनके घरों और दफ्तरों पर नजर रखी जा रही है। उनके मुताबिक उनके साथ कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है। एसपी शिव हरि मीणा ने बताया है कि एसडीएम व जिला मजिस्ट्रेट के आवास पर सुरक्षा मुहैया करवा दी गई है और एसडीएम सदर के पत्र के बारे में भी जाँच कराई जा रही है।

चुनाव से पूर्व उर्दू गेट तोड़ने और मदरसे के कमरे खाली कराने से शुरू हुआ विवाद अब गंभीर रूप ले चुका है। प्रशासन द्वारा दिखाई जा रही सख्ती से आजम खान के तेवर अफसरों के प्रति और भी उग्र हो गए हैं। इस बीच आजम खान के ख़िलाफ़ 16 मामले दर्ज किए गए जिसमें 5 मुकदमों पर हाईकोर्ट से उन्हें स्टे और गिरफ्तारी पर भी स्टे मिला है। इससे पहले भी सपा उम्मीदवार आजम खान पर कई बार चुनाव को प्रभावित करने का आरोप लग चुका है। इसके अलावा अपने उपर लगते इल्जामों को देख आजम खान ने भी खुद को अधिकारियों से खतरा बताया।

अपने ऊपर लगे इल्जामों की सफाई पर आजम ने कहा है कि जिला प्रशासन खुद उनकी हत्या की साजिश रच रहा है। उनके अनुसार मतदान वाले दिन रामपुर में डर और दहशत का माहौल था और अल्पसंख्यक मतदाता दहशत में थे। आजम के मुताबिक अधिकारी उन्हें चुनाव जीतते नहीं देखना चाहते हैं।

प्रियंका की रैली में कॉन्ग्रेस विरोधी नारे लगाने पर वकील को दौड़ा कर पीटा गया

एक व्यक्ति को प्रियंका गाँधी की रैली में कॉन्ग्रेस विरोधी नारे लगाना महंगा पड़ गया। लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण के लिए चुनाव प्रचार के दौरान कॉन्ग्रेस महासचिव वाराणसी पहुँची थी। प्रियंका ने वाराणसी में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी अजय राय के समर्थन में रोड शो किया और पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इस दौरान उनके रोड शो से पहले कार्यकर्ताओं द्वारा मारपीट करने की ख़बर आई। बुधवार (मई 15, 2019) को कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने व्यक्ति को पीटना शुरू कर दिया, जिसके बाद वहाँ हंगामा खड़ा हो गया। कार्यकर्ताओं का आरोप था कि उसने पार्टी विरोधी नारे लगाए हैं, इसीलिए उसे पीटा जा रहा है।

नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे प्रियंका की रैली से पहले कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता मारपीट पर उतारू हो गए हैं। ये घटना बनारस में लंका की है। जब ये घटना हुई, तब प्रियंका के रोड शो की शुरुआत नहीं हुई थी। जिस व्यक्ति की पिटाई हुई है, वह पेशे से अधिवक्ता है। पुलिस द्वारा बीच-बचाव करने के बाद कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को शांत कराया जा सका। इस दौरान वहाँ पर अफरा-तफरी का माहौल बना रहा। पुलिस ने सबको शांत करा कर रोड शो शुरू करवाया।

वाराणसी में प्रियंका गाँधी का रोड शो बीएचयू गेट से शुरू हुआ। इसके बाद उनका रोड शो शहर के अस्‍सी, सोनारपुरा, मदनपुरा, गोदौलिया होते हुए विश्‍वनाथ मंदिर के रास्ते पर बढ़ा। रोड शो के दौरान बड़ी संख्या में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रियंका के काफिले पर पुष्पवर्षा की, वहीं प्रियंका ने सभी का हाथ हिलाकर अभिवादन किया। इससे पहले नामांकन के लिए वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 6 किलोमीटर लम्बा रोड शो कर अपनी ताक़त दिखाई थी।

वाराणसी में पिछली बार रिकॉर्ड मतों से जीत करने वाले नरेंद्र मोदी इस बार भी भाजपा की तरफ से मैदान में हैं, वहीं कॉन्ग्रेस ने भी अपने प्रत्याशी में कोई बदलाव नहीं किया गया है। प्रधानमंत्री ने वाराणसी दौरे के समय गंगा आरती में भी हिस्सा लिया था। इस दौरान उनके साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी मौजूद थे।

कमल हासन पर चुनाव प्रचार के दौरान चला चप्पल, गोडसे को कहा था पहला हिन्दू आतंकी

बुधवार (मई 15, 2019) को मक्कल निधि मय्यम के संस्थापक और अध्यक्ष कमल हासन पर चप्पल फेंकी गई। उन्होंने हाल ही में महात्मा गाँधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को स्वतंत्र भारत का पहला आतंकी कहा था। उन्होंने कहा था कि गोडसे पहला हिन्दू आतंकी था। मदुरै के थिरुकरमपुण्ड्रम क्षेत्र में अभिनेता से नेता बने कमल हासन पर चप्पल तब फेंकी गई, जब वह वहाँ चुनाव प्रचार के लिए गए थे और उन्हें सुनने के लिए बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई। कमल हासन ने शाम 5 बजे थोप्पुर से अपनी चुनावी रैलियों की शुरुआत की लेकिन पेरियार नगर, सामनाथम, पनाइयुर और चिंतामणि- इन चार जगहों पर उनके कार्यक्रमों को बिना किसी पूर्व-सूचना के स्थगित कर दिया गया।

उन्होंने फिर से शाम 8 बजे विल्लापुरम से रैलियों की शुरुआत की, जहाँ कार्यकर्ताओं ने अच्छी-ख़ासी भीड़ जुटाने में सफलता पाई थी। इसके आधे घंटे बाद उन पर चप्पल फेंकी गई, जो सीधे भीड़ में जाकर गिरी। इसके बाद कुछ लोग कमल हासन के मंच के नजदीक पहुँच गए और उनके ख़िलाफ़ नारेबाजी शुरू कर दी। कमल हासन का विरोध किया गया। कमल हासन ने वहाँ उपस्थित भीड़ को धीरज रखते हुए चिंता न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा “आपको टेंशन लेने की ज़रुरत नहीं है, पुलिस देख लेगी कि क्या करना है और क्या नहीं।“

इस मामले में 11 लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई गई है। इनमें भाजपा कार्यकर्ताओं और हनुमान सेना के सदस्यों के नाम हैं। ज्ञात हो कि हाल ही में कमल हासन ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उसका नाम नाथूराम गोडसे था। उन्होंने कहा कि वो इसलिए ये नहीं कह रहे हैं, क्योंकि ये मुस्लिम बहुल इलाक़ा है, बल्कि वो ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि महात्मा गाँधी की प्रतिमा सामने है।

उनके इस बयान के बाद भारी बवाल खड़ा हो गया था। इसके बाद उनकी पार्टी ने सफाई देते हुए कहा, “कमल हासन (उक्त भाषण दे कर, जिसमें भारत का पहला आतंकवादी एक हिन्दू, नाथूराम गोडसे, को बताया गया था) सभी गुटों में मजहबी सहिष्णुता और सहअस्तित्व के लिए अपील करना चाहते थे और हर मजहब तथा हर रूप के चरमपंथ की निंदा करना चाहते थे।” कुछ दिनों पहले फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज ने भी नाथूराम गोडसे को हिन्दू आतंकी बताया था। मक्कल नय्यम ने अपने नेता का बचाव करते हुए कहा कि उनके भाषण को संदर्भ से परे समझ लिया गया है और दुर्भावना से एंटी-हिन्दू बताया जा रहा है। इससे आम आदमी में कन्फ्यूजन और चिंता पैदा हो रहा है।

Make In India: पहली बार मिसाइलें निर्यात करने को तैयार भारत, कई देश ख़रीदने को आए आगे

अब तक हथियारों का बड़ा आयातक के रूप में जाना जाने वाला भारत अब दूसरे देशों को मिसाइलें निर्यात करेगा। हम जानते हैं कि भारत अब तक हथियारों का आयात ही करता रहा है, लेकिन अब इसके उलट निर्यात करने की भी तैयारी चालू हो गई है। भारत की तरफ़ से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों और कुछ खाड़ी देशों को मिसाइलों की पहली खेप का निर्यात इसी साल की जाएगी। एक शीर्ष रक्षा अधिकारी के अनुसार, दक्षिण पूर्व एशिया और खाड़ी के देशों की ओर से रुचि दिखाए जाने के बाद भारत सरकार द्वारा यह निर्णय लिया गया है।

कार्यक्रम ‘इमडेक्स एशिया 2019 एग्जिबिशन’ को संबोधित करते हुए ब्रह्मोस एरोस्पेस के एचआर कोमोडर एसके अय्यर ने कहा कि सरकारों के बीच करार के बाद पहली बार मिसाइलों का एक्सपोर्ट किया जाएगा। उन्होंने जानकारी देते हुए बताया, “ऐसे कई दक्षिण पूर्व एशियाई देश हैं, जो हमारी मिसाइलों को खरीदने के लिए तत्पर हैं।” भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए अब अच्छे मौके इसीलिए बन रहे हैं क्योंकि खाड़ी देशों में धीमी आर्थिक विकास के साथ ही उन्हें कम दामों पर विश्वसनीय रक्षा उत्पादों की तलाश है। भारत अब ये चीजें उचित मूल्य में उन्हें मुहैया कराने की क्षमता रखता है।

तीन दिन तक चलने वाले इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, “यह हमारा पहला मिसाइल निर्यात होगा। इसके साथ ही हमारी मिसाइलों में खाड़ी के देश भी रुचि दिखा रहे हैं।” भारतीय डिफेंस सेक्टर के समक्ष दक्षिण पूर्व एशियाई देशों और खाड़ी देशों में निर्यात के अच्छे अवसर बन रहे हैं। भारत-रूस जॉइंट वेंचर ब्रह्मोस और डिफेंस कंपनी लार्सन ऐंड टर्बो ने इमडेक्स एग्जिबिशन में दक्षिण पूर्व एशियाई बाजार के लिए कई रक्षा उपकरणों को प्रदर्शित किया। कुछ छोटी अर्थव्यवस्थाएँ नवीनतम तकनीकों के साथ प्लेटफॉर्म अपग्रेड के माध्यम से पुराने उपकरणों को नया करने की तलाश में हैं, जिसके लिए उन्होंने भारत का रुख किया है।

तीन दिवसीय आईएमडीईएक्स एशिया एग्जिबिशन 2019 में विश्व की कुल 236 कम्पनियाँ भाग ले रही हैं। दुनिया भर से करीब 10,500 कंपनी प्रतिनिधि यहाँ आए हुए हैं। 30 देशों के 23 युद्धपोत भी प्रदर्शनी में शामिल किए गए हैं। भारत द्वारा मिसाइलें निर्णय करने को ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता के रूप में भी देखा जा रहा है। भारत अब रक्षा मामलों में कई तरह के उत्पादन की तरफ़ अपना ध्यान दे रहा है और फैक्ट्रियाँ स्थापित की जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अक़्सर कहते आ रहे हैं कि अब हमें इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की तरफ़ बढ़ना होगा।

बंगाल की चुनावी हिंसा की सबसे बड़ी कवरेज, इतनी हिंसा कि मेनस्ट्रीम मीडिया चर्चा भी नहीं करता

बंगाल पर ताजा ख़बर यह है कि आज चुनाव आयोग की नींद टूटी और उन्होंने बंगाल में हो रही चुनावी हिंसा पर संज्ञान लेते हुए चुनाव प्रचार पर अनुच्छेद 324 का प्रयोग करते हुए एक दिन पहले ही रोक लगा दी। आयोग ने अपने बयान में कहा कि कई पार्टियों ने उनसे बंगाल में हो रही हिंसा पर शिकायत दर्ज की थी और उन्होंने भी पाया कि कई जिलों में जिला प्रशासन और जिला पुलिस ने हर प्रत्याशी और पार्टी को समान रूप से सुरक्षा और बाकी सुविधाएँ नहीं प्रदान की।

आयोग ने कहा कि आम मतदाताओं की सुरक्षा चिंतनीय है और उन्हें बंगाल में स्वछंद और भयमुक्त वातावरण नहीं मिल पा रहा। आयोग ने यह भी कहा कि इस अनुच्छेद का प्रयोग शायद पहली बार हुआ है और अगर ऐसी ही स्थिति बनी तो वो फिर इसके प्रयोग से नहीं हिचकेंगे। हालाँकि, चुनाव आयोग ने यह नहीं बताया कि वो किस चुनाव में इसका प्रयोग करेंगे क्योंकि लोकसभा चुनाव तो अब लगभग निपट ही गया है और एक दिन पहले प्रचार रोक कर उन्होंने कोई तीर तो मारा नहीं है।

चुनाव आयोग इस लोकसभा चुनाव में, बंगाल के मामले में पूरी तरह से निकम्मी, डरपोक और ग़ैरज़िम्मेदार साबित हुई है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ, वो आगे अच्छे तरीके से साबित हो जाएगा। छठे चरण के मतदान हो जाने के बाद, सिर्फ एक चरण के मतदान बचे रहने पर चुनाव आयोग ने जिस तरह का एक्शन लिया है उसे अंग्रेज़ी में ‘टू लिटिल, टू लेट’, यानी ‘बहुत देर से, बहुत कम’ कहा जाता है।

मैं अब आप लोगों के सामने पिछले कुछ चरणों में तृणमूल के गुंडों और बंगाल प्रशासन की मिलीभगत से बंगाल में हुई हिंसा, मतदान के दौरान मतदाताओं को डराने, धमकाने, प्रॉक्सी वोटिंग करने, कार्यकर्ताओं की हत्या, पोलिंग अजेंट की पिटाई, विरोधी पार्टियों को रैली की इजाज़त न देने, हेलिकॉप्टर उतरने न देने से लेकर लगभग हर चुनावी क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी और नेताओं की गाड़ी तोड़ने, पोलिंग अजेंट की उँगली काटने तक, तथा बेतरतीब होती रही मार-पीट, तोड़-फोड़ एवं आगजनी आदि की घटनाओं का ज़िक्र करने जा रहा हूँ।

बंगाल की तस्वीर जो हरी नहीं, रक्तरंजित है

14 मई को तृणमूल के गुंडों ने भाजपा नेता अरविन्द मेनन के साथ कई जिला स्तर के नेताओं को पीटा। साथ ही, तुहीन मंडल नामक नेता के घर में भी उत्पात मचाया। इस साल की जनवरी के मामले को दोहराते हुए, ममता बनर्जी ने 13 मई को अमित शाह की जाधवपुर रैली के लिए इजाज़त नहीं दी और उनके हेलिकॉप्टर को उतरने से मना कर दिया गया। इसके साथ ही, दर्जनों भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं को मध्यरात्रि में उनके होटलों से कोलकाता पुलिस ने उठा लिया।

12 मई को ही मेदिनीपुर में हिन्दुओं को वोट देने से रोका गया। उसी दिन तृणमूल के गुंडों को मोदी के पोस्टर फाड़ते देखा गया। भाजपा प्रत्याशी भारती घोष की गाड़ी पर हमला हुआ और ममता के गुंडों ने उन्हें वोट डालने से भी रोका। इसी दिन छठे चरण के चुनाव के दौरान तृणमूल और भाजपा के एक-एक कार्यकर्ता की हत्या की गई, तथा दो और भाजपा कार्यकर्ताओं पर गोली चलाई गई। साथ ही, घटाल क्षेत्र में सुरक्षाबलों और ग्रामीणों पर कुछ दूसरे ग्रामीण लोगों ने पत्थरबाज़ी की।

7 मई को हिमांता बिसवा शर्मा और दिलीप घोष की गाड़ियों पर हमले किए गए। 6 मई को पाँचवे चरण के चुनाव के दौरान भाजपा पोलिंग एजेंट को क्रूरता से पीटा गया, वहीं भाजपा के बैरकपुर प्रत्याशी अर्जुन सिंह पर तृणमूल के गुंडों ने हमला किया। साथ ही, वहाँ के वोटरों को डराने-धमकाने की बातें भी सामने आईं। उसी दिन हुगली जिले में ईवीएम को तोड़ने की घटना हुई। वहीं, भाजपा प्रत्याशी लॉकेट चटर्जी की कार पर तृणमूल के गुंडों ने अटैक किया और शीशे तोड़ दिए। बनगाँव से ख़बर आई कि वहाँ तृणमूल के लोग वोटरों को बूथ में घुसने से ही रोक रहे थे।

1 मई को सीपीएम पोलिंग अजेंट शेख़ ख़िलाफ़त के घर को ममता दीदी के गुंडों ने आग के हवाले कर दिया। बीरभूम में भाजपा पोलिंग अजेंट की उँगली काट दी गई इन्हीं गुंडों के द्वारा। बाबुल सुप्रियो की कार को भी तोड़ा गया था। भाजपा नेता अपूर्बा चक्रवर्ती को इस्लामपुर में तृणमूल के गुंडों ने बुरी तरह से पीटा। सिलीगुड़ी में भाजपा कार्यकर्ता उत्तम मंडल और उनके भाई गौतम मंडल को तृणमूल के गुंडों ने मतिगारा क्षेत्र में पीटा और उनके दुकान में तोड़-फोड़ की। बाँकुरा के रानीबंध में भाजपा कार्यकर्ता अजीत मुर्मु को कथित तौर पर ममता दीदी के गुंडों ने इतना मारा कि अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई।

29 अप्रैल को दुबराजपुर इलाके में सुरक्षाबलों और ग्रामीणों में झड़प हो गई और उन्हें ब्लैंक फायर करना पड़ा। उसी दिन, आसनसोल में हो रहे दंगों पर तृणमूल नेत्री मुनमून सेन का जवाब था कि उन्हें बेड टी नहीं मिला। इंडिया टुडे और रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों पर भी बंगाल के चुनावी हिंसा पर रिपोर्टिंग के दौरान हमले किए गए, जिसमें महिला पत्रकार भी शामिल थीं। आश्चर्य की बात यह है कि एडिटर्स गिल्ड ने इस पर चुप्पी बनाए रखी। वस्तुतः, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

पूर्वी बर्दवान में तृणमूल के लोगों द्वारा कैमरे पर ईवीएम में दूसरों के वोट डालते देखे जाने पर चुनाव आयोग ने उस अफसर को सस्पैंड किया। इसी तरह 23 अप्रैल को भी तृणमूल के पोलिंग अजेंट और बूथ के प्रेज़ाइडिंग अफसर खुद ही वोट डालते पाए गए।

18 अप्रैल को रायगंज के हिन्दू मतदाताओं को वोटिंग करने से रोका गया और उनकी जगह कोई और वोट डालता रहा। कुछ लोग अगर वहाँ पहुँचे भी तो किसी और ने ही उनका वोट डाल रखा था। उसी दिन भाजपा के एक कार्यकर्ता शिशुपाल की लाश पेड़ से लटकती मिली। ये घटना परुलिया में हुई जहाँ पिछले साल भी दो और भाजपा कार्यकर्ताओं, त्रिलोचन महतो और दुलाल कुमार, की लाशें मिली थीं। महतो की लाश पेड़ से लटकी हुई थी, और दुलाल की एक हाय-टेंशन वाले बिजली के पोल पर।

इसी दिन एक साथ कई और खबरें आई थीं कि एक जगह ईवीएम पर भाजपा के प्रत्याशी के नाम और चिह्न पर काला टेप लगा हुआ मिला। कहीं से ट्वीट आया कि ममता के तृणमूल पार्टी के लोग सीआरपीएफ़ की वर्दी पहन कर घूम रहे हैं। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता ऑडियो क्लिप में बूथ क़ब्ज़ा करने की बात कह रहा है। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता अपने कार्यकर्ताओं को कह रहा है कि सीआरपीएफ़ आदि के जवानों को खदेड़ कर मारो और भगा दो।

मेनस्ट्रीम मीडिया और बंगाल की चुनावी हिंसा की कवरेज

मेनस्ट्रीम मीडिया में आपको ऐसी खबरें नहीं मिलेंगी। आपको यहाँ रवीश कुमार जैसे धूर्त लोग मिलेंगे जो बैलेंस करते रहेंगे कि भाजपा वाले मरे, तो तृणमूल वाले भी मरे हैं। इस समय रवीश कुमार यह बहुत ही कन्वीनिएंटली भूल जाते हैं कि राज्य सरकार ममता बनर्जी की है और किसी की भी हत्या की ज़िम्मेदारी उसी सरकार की है, चाहे मरने या मारने वाला कोई भी हो। इस मामले में ममता बनर्जी पूरी तरह से असफल रही हैं।

आप जब भी बंगाल और चुनावी हिंसा पर कुछ सर्च करेंगे तो अधिकतर बार आपको एक आँकड़ा मिल जाएगा जिसमें इस बात को छुपाने की पूरी कोशिश होगी कि ममता बनर्जी के कार्यकाल में हिंसक घटनाओं और हत्या का सिलसिला थमता ही नहीं। वहाँ आपको खबरों का पूरा दायरा इतने में समेट दिया जाएगा कि बंगाल तो हिंसा का गढ़ रहा ही है। अरे भाई! ‘रहा ही है’ से क्या मतलब? यहाँ पहले भी हिंसा होती रही तो क्या ममता बनर्जी को क्लीन चिट दे दें?

दुर्भाग्य से मेनस्ट्रीम मीडिया यही करता है। वह आपको 2003 में हुए पंचायत चुनावों में हुई हत्याओं की संख्या बता देगा और कहेगा कि पिछले साल के पंचायत चुनावों में एक नया रिकॉर्ड बना जिसमें सबसे ज़्यादा प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए गए। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक ख़बर के अनुसार 2018 के पंचायत चुनावों में बंगाल में 25, तो हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार 29 लोगों की हत्या हुई। इन 29 में से 13 लोग सिर्फ एक दिन में मार दिए गए। लेकिन मुख्यधारा की मीडिया को तो इसमें रुचि है कि 2003 में तो 76 मरे थे, जिनमें से 45 मुर्शीदाबाद से थे।

ये किस तरह का माहौल है?

इसकी बात कोई नहीं करता कि ये जो माहौल बना है, ये किस तरह का माहौल है। क्या ये डर का माहौल है? क्या ये आपातकाल वाला माहौल है? क्या दो-चार गौरक्षकों और गौतस्करों वाली घटनाओं पर सीधे मोदी से जवाब माँगने वाले पत्रकारों का समुदाय विशेष यह बताएगा कि आखिर ऐसा क्या है बंगाल में कि मजहबी दंगे हर जगह पर कुकुरमुत्तों की तरह हो जाते हैं। यहाँ पर किसकी शह पर यह हो रहा है? आखिर विरोधी पार्टियों के काडर की हत्या इतनी सहजता से कैसे हो जाती है?

क्या यही माहौल यह सुनिश्चित नहीं करता कि लोग चुनावों में ममता और उसकी पार्टी से डर कर रहें? आपका पड़ोसी किसी दिन पेड़ पर ख़ून से लथपथ लटका मिले और संदेश हो कि भाजपा को वोट देने पर यही हश्र होगा, तो आप कौन-सा विकल्प चुनेंगे? पंचायत चुनावों में आप कैसे प्रत्याशी बनेंगे जब तृणमूल के गुंडे सर पर तलवार लेकर मँडरा रहे हों? आखिर आप नोमिनेशन कैसे करेंगे?

यही तो कारण है कि आज के दौर में भी 48,650 पंचायत सीटों में से 16,814; 9,217 पंचायत समिति सीटों में से 3,059; और 825 ज़िला परिषद सीटों में से 203 पर निर्विरोध चुनाव हुए। आप यह सोचिए कि तृणमूल लगभग एक तिहाई, यानी 30% सीटों पर निर्विरोध जीत जाती है! कमाल की बात नहीं है ये? बीरभूम जैसी जगहों पर 90% सीट पर तृणमूल के खिलाफ कोई खड़ा ही नहीं हुआ!

चुनाव आयोग और राष्ट्रपति से अपील

बंगाल पूरी तरह से धधक रहा है। अगर हमारे देश के चुनाव आयोग को चुनावों के समय होने वाली हिंसा का भान छठे चरण के चुनाव हो जाने के बाद, अंतिम चरण के चुनाव से तीन दिन पहले होता है तो इसका सीधा मतलब है कि यह संस्था इस मामले में बिलकुल ही बेकार साबित हुई है। आखिर चुनाव आयोग को किस बात का इंतजार है?

सत्तारूढ़ पार्टी के पोलिंग अजेंट बूथों के भीतर वोट डाल रहे हैं, तृणमूल के गुंडों ने हर लोकसभा क्षेत्र में विरोधी पार्टियों के नेताओं के कार से लेकर घर तक पर हमले किए हैं, लोगों को डरा कर वोट कराया जा रहा है, लोगों को वोट करने से रोका जा रहा है, कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है, सुरक्षाबलों से झड़पें हो रही हैं, रैलियाँ रोकी जा रही हैं…

आखिर चुनाव आयोग क्या पोलिंग बूथ में बम फटने के इंतजार में है? इस तरह की कुव्यवस्था पर संज्ञान लेने में इतना समय कैसे लग गया? और आप करते भी क्या हैं? चुनाव प्रचार रुकवा देते हैं एक दिन पहले! इससे क्या हो जाएगा? जब सारी बात चुनावों के दिन होने वाली गड़बड़ियों और हिंसा पर आधारित है, तो प्रचार रोक कर चुनाव आयोग क्या बताना चाह रहा है?

इस मामले में राष्ट्रपति को संज्ञान ले कर, चुनाव आयोग को निर्देश देना चाहिए कि ऐसे संवेदनशील इलाके में मतदाताओं के लिए अगर सुरक्षित माहौल नहीं है, जो आयोग ने स्वयं ही माना है, तो मतदान दोबारा कराया जाए। आयोग की यह ज़िम्मेदारी है कि मतदाता बिना भय के वोट करे और मतदान कराने वाले तमाम अधिकारी भी भयमुक्त होकर उचित कार्यवाही करें।

अभी चक्कर यह है कि बाहर से आए मतदान कराने वाले अधिकारी, ऐसे मामलों में बस किसी भी तरह मतदान के वो चंद घंटे ज़िंदा रह कर घर को वापस जाने के लिए निकाल देते हैं। उन पर ‘संवेदनशील’ इलाके के नाम पर इतना दबाव होता है कि वो वहाँ के दबंगों के भरोसे ही मतदान करवाते हैं। उन्हें लगता है कि ज़िंदा रहना उनकी प्राथमिकता है, और वो वही करते भी हैं।

अगर राज्य स्वयं ही गुंडों को पाले, उनसे पूरा का पूरा बूथ मैनेज करवाए, उनके नेता यह आदेश देते पाए जाएँ कि सुरक्षाबलों को घेर कर मारो, उनके गुंडे इतने बदनाम हों कि वहाँ आनेवाला अधिकारी ईवीएम ही उन्हें सौंप दे, तो फिर इसमें चुनाव सही तरीके से कैसे हो पाएगा?

यही कारण है कि बंगाल में हुए चुनाव रद्द किए जाएँ और सारे सुरक्षा बलों को एक साथ बंगाल में रख कर, नए सिरे से, पूरी सुरक्षा के साथ, मतदान दोबारा कराए जाएँ। चाहे परिणाम किसी के भी पक्ष में जाए, मतलब उससे नहीं है। मतलब इससे है कि एक भी वोट जबरदस्ती न दिलवाया जाए। मतलब इससे है कि हर मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग अपनी इच्छा से करे। मतलब इससे है कि चुनाव हिंसा और डर के माहौल से मुक्त हो।

प्रियंका गाँधी गुंडों को संरक्षण देती हैं, लोगों को लड़वा के 5 साल के लिए चली जाती हैं: कॉन्ग्रेस MLA

कॉन्ग्रेस महासचिव पूर्वी उत्‍तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गाँधी वाड्रा पर उनके ही पार्टी के विधायक का गुस्सा फूट पड़ा है। प्रियंका गाँधी वाड्रा पर कॉन्ग्रेस विधायक राकेश सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा कि वह यहाँ आती हैं और लोगों को लड़वाकर दिल्ली चली जाती हैं, इसके बाद पाँच साल तक यहाँ के लोग आपस में लड़ते रहते हैं।

‘अपराधियों को संरक्षण देती है प्रियंका गाँधी’

राकेश सिंह ने आगे कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग मामले में रोजाना ED ऑफिस के चक्कर काट रहे रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी बहुत दिन से अपराधियों को संरक्षण दे रही हैं। रायबरेली के हरचंदपुर विधानसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस विधायक ने दावा किया कि उनके पास इसकी जानकारी भी है। प्रियंका गाँधी द्वारा ही यह साजिश रची जा रही है, जिसका परिणाम आने वाले समय में और खराब होगा। बता दें कि हरचंदपुर विधानसभा सीट सोनिया गाँधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली के अंतर्गत आती है।

MLA राकेश सिंह ने अपने दोनों भाई दिनेश सिंह और अवधेश सिंह का बचाव करते हुए कहा, “मेरे भाई पर प्रियंका गाँधी वाड्रा गलत आरोप लगा रही हैं। प्रियंका गाँधी को लगता है कि यहाँ पर दबाव बनाकर काम करेंगी।” दरअसल, लोकसभा चुनाव में दिनेश सिंह बीजेपी की तरफ से रायबरेली में सोनिया गाँधी को चुनौती दे रहे हैं। कभी कॉन्ग्रेस में सोनिया-प्रियंका के खास रहे दिनेश सिंह के खिलाफ आज पूरी पार्टी हमलावर है।

प्रियंका गाँधी एक घंटे के लिए आएँगी, लोगों को लड़वा के 5 साल के लिए चली जाएँगी

मंगलवार को हुई हिंसा में घायल जिला पंचायत सदस्यों और कॉन्ग्रेस MLA अदिति सिंह से मिलने प्रियंका गाँधी आज रायबरेली पहुँची थी। लेकिन इस दौरान उनकी ही पार्टी के हरचंदपुर से विधायक राकेश सिंह ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राकेश सिंह ने कहा, “प्रियंका गाँधी बहुत दिनों से अपराधियों को संरक्षण दे रही हैं। वह इसी तरह चुनाव में एक घंटे के लिए आएँगी और फिर जिले के लोगों को लड़वा के पाँच साल के लिए चली जाएँगी। मैं विधिक रूप से कॉन्ग्रेस का विधायक हूँ, लेकिन अगर वे (प्रियंका) मेरे भाइयों पर बाहर से गुंडा बुलवाकर हमला कराना चाहे या फिर कार्रवाई कराएँ तो ये भी गलत है।”

इस दौरान MLA राकेश सिंह ने कहा कि पार्टी और पद अस्थाई होता है, लेकिन भाई स्थाई होता है। ऐसे में अगर भाई के साथ गलत कार्रवाई होगी, तो वो भाई के साथ ही खड़े रहेंगे।