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ज़िंदा है मायावी और रहस्यमयी हिममानव येती? सेना ने किया चौंकाने वाला ख़ुलासा, ज़ारी की तस्वीरें

हिमालय की विशाल बर्फीली पहाड़ियों पर अक्सर हिममानव के रहने की ख़बरें आती रहती हैं लेकिन आजतक कभी उसको देखा नहीं गया। इस बारे में दुनियाभर के पर्यटकों व खोजविदों द्वारा तरह-तरह के दावे किए जाते हैं और हिमालय भ्रमण के दौरान हिममानव के ज़िंदा होने के सबूत मिलने या उसे देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। अब भारतीय सेना ने भी हिममानव ‘येती’ की मौजूदगी का संकेत देते हुए कुछ तस्वीरें ज़ारी की है। इन तस्वीरों के बारे में सेना ने कहा है कि ये हिममानव येती के पाँवों के निशान हैं। सेना के अनुसार, रहस्यमयी येती के पाँवों के निशान 32 x 15 इंच के हैं। इन्हें 9 अप्रैल 2019 को मकालू बेस कैम्प के नज़दीक देखा गया। सेना के अनुसार, पूर्व में भी इस मायावी व रहस्यमयी हिममानव की मौजूदगी के सबूत मकालू-बरुन नेशनल पार्क में दर्ज किए गए थे।

भारतीय सेना की पर्वतारोही टीम ने येती के पाँवों के निशान के फोटो क्लिक किए। येती की मौजूदगी के सबूत तिब्बत और नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों में मिलते रहे हैं या उसे देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। भारतीय सेना ने 4 तस्वीरें रिलीज की हैं, जिन्हें आप उपर्युक्त ट्वीट में देख सकते हैं। येती की कहानियाँ सैंकड़ों साल पुरानी हैं। लद्दाख के बौद्ध मठों व वहाँ रहनेवाले भिक्षुओं का दावा है कि उन्होंने येती को देखा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि येती एक मनुष्य नहीं है बल्कि ध्रुवीय और भूरे भालू का क्रॉस ब्रीड है। फिर भी, वैज्ञानिकों में इसे लेकर अभी तक कोई एकमत नहीं बन पाया है। 2008 में इसे मेघालय के गारो पहाड़ी में देखा गया।

कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि यह बंदरों जैसी शक्लोसूरत वाला एक विशालकाय जीव है जो इंसानों की तरह चलने-फिरने की क्षमता रखता है। पर्वतारोही बीच होजशन ने 1832 में बताया था कि जब वह हिमालय में ट्रेकिंग कर रहे थे तब उनके गाइड ने एक ऐसे विशालकाय मनुष्य जैसे प्राणी को देखा जो इंसानों की तरह दो पैरों पर चल रहा था। होजशन के अनुसार, उसके शरीर पर घने लंबे बाल थे। 1889 में भी कुछ पर्वतारोहियों ने इस अजीब जानवर के पदचिह्नों के निशान देखने की बात कही। 1925 में एक फोटोग्राफर और रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी के सदस्य एमी डोमबोजी ने एक ऐसे विशाल प्राणी को देखा जो पेड़-पौधों से पत्तियाँ खींच रहा था।

डोमबोजी ने इस रहस्यमयी प्राणी के 7 इंच लम्बे और 4 इंच चौड़े पदचिह्न देखे थे। विक्टोरिया मेमोरियल कलकत्ता के क्यूरेटर कैप्टेन ने 9 फ़ीट लम्बे एक ऐसे प्राणी को देखने की बात कही थी, जिसने उनकी जान बचाई। उनके अनुसार, येती एक मददगार प्राणी है। एवरेट गाँव में एक लड़की जब याक चरा रही थी, तब एक विशालकाय प्राणी ने उसे धर लिया। हालाँकि, वो तो उसके चंगुल से निकलने में सफ़ल रहीं लेकिन उसके दोनों याकों को उस प्राणी ने खा डाला। 1974 में मिली इस शिकायत के बाद पुलिस ने जब छानबीन की तो उन्हें इस प्राणी के पदचिह्न मिले जिसके बारे में कहा गया कि वह येती ही था। 2009 में एक फिल्म निर्माता पियोत्रगोवाल्सकी ने पोलैंड की पहाड़ियों में एक राक्षस जैसा प्राणी देखने का दावा किया।

पकौड़े-चाय आप बेच नहीं पाएँगे सिद्धू साब! आप तो चोरों और घोटालेबाजों की गुलामी कीजिए

सर कटी मुर्गी की तरह यहाँ-वहाँ भागकर रोजाना अपने लिए नया आशियाना तलाशते नवजोत सिंह सिद्धू के लिए बेहूदा बयानबाजी कर चर्चा में आना कोई नई बात नहीं है। नवजोत सिंह सिद्धू अपनी जनसभाओं में केन्द्र की मोदी सरकार और भाजपा पर खूब हमलावर रहे हैं। हालाँकि, कॉन्ग्रेस में जाने के बाद सिद्धू भले ही भाजपा की आलोचना कर रहे हों, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था, जब भाजपा को अपनी ‘माँ’ बताने वाले सिद्धू का कई साल तक भारतीय जनता पार्टी के साथ ‘बेटे’ जैसा जुड़ाव रहा था। लेकिन, पार्टी बदलते ही सिद्धू ने ‘माँ’ को ‘गाली’ देनी शुरू कर दी है।

‘राजपरिवार’ और ‘राजमाता’ को खुश करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में कल बाचाल नवजोत सिंह सिद्धू ने घटियापन का एक और कीर्तिमान अपनी फर्जी शायरी की किताब में जोड़ लिया है। ट्विटर पर ‘राजमाता’ सोनिया गाँधी और सबसे बुजुर्ग पार्टी के चिरयुवा अध्यक्ष राहुल गाँधी की तस्वीर लगाकर घूमने वाले सिद्धू ने अपने इस बयान से साबित कर दिया है कि चापलूसी और चमचागिरी में वो अब कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को भी कड़ी टक्कर देने में सक्षम हैं।

सबसे ताजा और पिछले बयानों जितना ही वाहियात बयान नवजोत सिद्धू ने कल ही अपने ट्विटर एकाउंट के जरिए दिया है। खुद को अभिजात्य दिखाने के चक्कर में नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते हुए अपनी निम्नस्तरीय मानसिकता का परिचय देते हुए ‘फिलहाल’ कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने ट्वीट करते हुए लिखा है, “एक गलत वोट आपके बच्चों को चायवाला, पकौड़ेवाला या चौकीदार बना सकता है।”

घृणित अभिजात्य मानसिकता ही चायवाले और चौकीदारों से नफरत करना सिखाती है

कॉन्ग्रेस राजपरिवार की छत्रछाया में आते ही अभिजात्य मानसिकता का परिचय देते हुए, किसी भी दूसरे व्यक्ति को अपने से नीचे रखना, उसके सामाजिक परिवेश के आधार पर उसे अपमानित करना और उसे लज्जित महसूस करवाना सिद्धू ने सीख लिया है। इस तरह से राजपरिवार का प्रिय बनने का पहला चरण उन्होंने अच्छी तरह से पास कर लिया है।

नवजोत सिंह सिद्धू का यह बयान उन्हें चर्चा का विषय तो बना देता है, लेकिन ऐसा करते ही वो एक बार फिर तमाम कॉन्ग्रेस नेताओं की तरह ही नरेंद्र मोदी की सजाई हुई ‘पिच’ पर बल्लेबाजी करते नजर आते हैं। कॉन्ग्रेस पिछले 5 सालों में लगातार यही गलती दोहराती नजर आई है। नरेंद्र मोदी ने आम जनता के बीच स्वाभाविक रहकर, उसे सहज महसूस करवाकर उसका हृदय जीता है। जबकि, इसके ठीक उलट, सत्तापरस्त कॉन्ग्रेस लगातार अपने मूर्खतापूर्ण बयान और गुलाम मानसिकता की वजह से आत्मघाती गोल करती रही।

मसलन, नरेंद्र मोदी ने जब रोजगार के लिए पकौड़े बेचने वाले का उदाहरण दिया, तब पूरा नेहरुवियन सभ्यता का इकोसिस्टम पकोड़े बनाकर अपने परिवार का पेट भरने वालों को तुच्छ और हास्य का विषय बनाने में मशगूल हो गया था। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को चौकीदार बताया, तब कॉन्ग्रेस चौकीदारों के ही विरोध में खड़ी हो गई और नेपाल से लेकर अपने ही देश के भीतर नस्लीय भेदभाव जैसी टिप्पणियाँ कर अपनी ही बुजुर्ग पार्टी के ताबूत में आखिरी कीलें ठोकती देखी गई। हो सकता है कि कॉन्ग्रेस की नजरों में दलाली करना, भूमि घोटाला करना और बोफोर्स घोटाला करना ही सर्वश्रेष्ठ रोजगार हों, लेकिन क्या मात्र यह तर्क उन्हें अन्य गरीब और मध्यम वर्गीय लोगों के रोजगार का उपहास करने का अधिकार देने के लिए काफी है?

सामंतवादी कॉन्ग्रेस अभी औपनिवेशिक मानसिकता की गुलामी में जी रही है

निसंदेह नवजोत सिंह सिद्धू ने पकौड़ेवाला और चौकीदारों का बयान अपने पूरे होशोहवास में कॉन्ग्रेस राजपरिवार की नजरों में दुलारा बनने के लिए ही दिया है। सिद्धू अच्छे से जानते हैं कि कॉन्ग्रेस को किस स्तर की ‘जी हजूरी’ से खुश किया जा सकता है। पकौड़ेवाला, चायवाला और चौकीदार का उपहास बनाकर सिद्धू ने कॉन्ग्रेस की उसी प्राचीन प्रणाली में जान फूँक दी है, जो कॉन्ग्रेस की पहचान रही है। यह पहचान है, सामंतवादी मानसिकता और ब्रिटिश उपनिवेशवाद से सीखा गया सामाजिक और जातिगत नस्लभेद। ऐसा कर के कॉन्ग्रेस बहुत आसानी से हमेशा ही आम जनता से खुद को एक उचित दूरी पर स्थापित कर देती है और लोग महसूस करना भी शुरू कर देते हैं कि नेता ऐसा ही होता है।

BJP को अपनी माँ बताने वाले सिद्धू कॉन्ग्रेस में जाकर दे रहे माँ की गाली, दुखद!

एक समय ऐसा भी था जब घटिया बयान देकर स्वयं को राजनीति में स्थापित करने का सपना देखर रहे सिद्धू भाजपा को अपनी माँ बताते थे और उसके खिलाफ जाने वाले को ‘घृणित’ नजर से देखते थे। शायद तब भाजपा में रहते हुए पार्टी नेतृत्व की चापलूसी कर, उन्हें अपनी माँ बता देना सिद्धू की तत्कालीन रणनीति रही हो और आज भी वो उसी फॉर्मूले पर काम करना चाह रहे हैं।

उस समय नवजोत सिंह सिद्धू एक जनसभा में कह रहे थे, “भारतीय जनता पार्टी मेरी माँ है, भारतीय जनता पार्टी मेरी जननी है, मेरा स्वाभिमान है, मेरी पहचान है और जो मेरी माँ की पीठ में छुरा घोंपेगा, उसे वोट डालना गोमाँस खाने के बराबर है।”

सिद्धू के रूप में कॉन्ग्रेस के पास एक खिसियाया हुआ फूफा और बढ़ गया है

सिद्धू राजनीति के उस खिसियाए हुए फूफा जैसे बनकर रह गए हैं, जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ अटेंशन की चॉइस होती है। बीते दिनों पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले नवजोत सिंह सिद्धू ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया था। उसके बाद से वो बदहवास स्थिति में अक्सर अपने बयानों में भाजपा पर हमलावर रहे हैं। लेकिन हमला कर कॉन्ग्रेस परिवार की नजरों में बने रहने की कोशिशों में सिद्धू पूरी तरह से नस्लीय टिप्पणी पर ही उतर आए हैं।

पुलवामा आतंकी हमले में पाकिस्तान जैसे आतंकवाद की फैक्ट्री को ‘मासूम’ बताने और आतंकवाद को मजहब से एकदम अलग बताकर सोशल मीडिया पर गाली खाने वाले सिद्धू को ये समझना होगा कि नरेंद्र मोदी वर्तमान में राजनीति का पर्याय बन चुके हैं और उन्हें ऐसा बनाने में सिद्धू जैसे ही टुटपुँजिया ट्रॉल्स का महत्वपूर्ण योगदान है। वास्तविकता तो यह भी है कि मोदी को अपमानित करने के लिए जिस स्तर तक विपक्ष के नेता प्रतिदिन गिर रहे हैं, वो उनकी मानसिक वेदना को ही स्पष्ट करता है। यह वेदना विपक्ष में समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा उन्हें नकार दिए जाने से दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है और अभी देखना बाकी है कि आम चुनाव के नतीजों के दिन यही विपक्ष बेहूदगी और घटियापने का कौन-सा नया कीर्तिमान पेश करता है। तब तक… “ठोको-ठोको ताली!”

हमारी राय (व्यंग्य)

नवजोत सिंह सिद्धू को इस तस्वीर से प्रेरणा लेते हुए समझना चाहिए कि जमीन घोटालों में सर से पाँव तक डूबे राजपरिवार की चमचागिरी कर के गुलामी की जिंदगी जीने से बेहतर यही है कि वो भी ‘चायवाला’ बनकर गरिमामय जीवन जीना सीख लें।


‘आएगा तो मोदी ही!’ चीन की मीडिया और विशेषज्ञों ने लोकसभा चुनाव 2019 के लिए खिला दिया कमल

चीन की मीडिया में चर्चाओं का बाज़ार गरम है। भारत में हो रहे आम चुनाव पर शक्तिशाली चीन की पैनी नज़र है। वहाँ सरकार समर्थित मीडिया व विशेषज्ञ लगातार इस बात की चर्चा करने में लगे हुए हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव बाद फिर से जीत कर वापस आ पाएँगे? अगर हम चीनी विशेषज्ञों की राय को खंगालें तो पता चलता है कि चीनियों के मन में भी मोदी की वापसी को लेकर कोई शक नहीं है। चीन की प्रमुख मीडिया एजेंसियों में से एक ‘द ग्लोबल टाइम्स’ में सिंहुआ यूनिवर्सिटी के रिसर्च फेलो लू यांग ने एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी के बारे में चर्चा की है। आइए उनके लेख की पड़ताल करते हैं ताकि आपको पता चले की चीनी विशेषज्ञों के मन में मोदी के प्रति क्या राय है? उन्होंने अपने लेख में कहा है कि 23 मई के बाद भाजपा सत्ता में वापस लौटे, इसमें बहुत कम ही शक है।

लू यांग मानते हैं कि नरेंद्र मोदी का राजनितिक व्यक्तित्व काफ़ी आसानी से उनके सारे प्रतिद्वंद्वियों को मात दे देता है। वह भाजपा की फंडिंग और संगठनात्मक संरचना का भी जिक्र करते हैं। लू यांग ने अपने इस लेख में स्वीकारा है कि नरेंद्र मोदी एक और कार्यकाल के लिए तैयार हैं। उन्होंने लिखा कि मोदी के 2014 में सत्ता संभालने के साथ ही भारत की कूटनीति में बड़ा बदलाव आया, निवेश में बढ़ोतरी हुई और पड़ोसी देशों को महत्व दिया गया। पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को सुधारने की दिशा में मोदी द्वारा किए गए प्रयासों को गिनाते हुए उन्होंने कहा कि मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में ही पड़ोसी राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर ये जता दिया था कि पड़ोस से सम्बन्ध सुधारना उनकी प्राथमिकता है। इस समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ भी शामिल हुए थे।

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अपना पहला दौरा भूटान का किया। बांग्लादेश के साथ दशकों से चली आ रही सीमा समस्या का समाधान किया गया। लू यांग के अनुसार, मोदी को क्षेत्रीय सहयोग और स्थिरता का महत्व पता है। मोदी ने भले ही 2014 के चुनावों में पाकिस्तान को निशाने पर रखा लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने पाक से सम्बन्ध सुधारने की भरपूर कोशिश की। लू यांग भारत में हुए आतंकी हमलों को भारत-पाक संबंधों में तनातनी का कारण मानते हैं। अपने लेख में वो याद दिलाते हैं कि सितम्बर 2014 में मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपने गृह राज्य बुलाया और अपना 64वाँ जन्मदिन उनके साथ ही मनाया। चीन के ‘बेल्ट एंड रोड’ को जवाब देने के लिए भारत ने ट्रम्प प्रशासन के ‘इंडो-पैसिफिक’ नीति को अपनाया।

लू यांग मानते हैं कि डोकलाम के बाद भारत-चीन रिश्तों में सुधार आया है और दोनों देश एक-दूसरे के प्रति अपने व्यवहार में बदलाव ला रहे हैं। चीनी राष्ट्रपति के गृहक्षेत्र वुहान में मोदी-जिनपिंग के बीच हुई बैठक ने भारत-चीन रिश्ता को सुधारने में अहम भूमिका निभाई। बता दें कि डोकलाम में ढाई महीने से भी अधिक समय तक चले तनाव के बाद हुई उस बैठक के बाद माहौल में नरमी आई थी और भारतीय कूटनीतिक प्रयासों के कारण चीन को पीछे हटने को मज़बूर होना पड़ा था। चीनी मीडिया में चल रही बातों से लगता है कि चीन भी अब भारत के प्रभाव को स्वीकार कर रहा है।

प्रमुख चीनी न्यूज़ एजेंसी सिन्हुआ ने गुजरात में जातिवादी आन्दोलनों के कारण राज्य में भाजपा द्वारा 2014 में जीती गई लोकसभा सीटों की संख्या में कमी आने की बात कही है। लेकिन, सिन्हुआ ने कहा है कि मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को विस्तार देने के लिए ‘स्वच्छ भारत’, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसी योजनाओं की घोषणा की। वेबसाइट यह भी मानता है कि नरेंद्र मोदी को विपक्ष से कड़ी चुनौती मिल रही है। चीनी मीडिया द्वारा भारत में चल रहे विकास योजनाओं की चर्चा करना सुखद संकेत है क्योंकि देश और दुनिया को अब लग रहा है कि भारत विकास को लेकर सचमुच गंभीर है।

एक अन्य चीनी वेबसाइट ‘चाइना डेली’ ने भारत में चल रहे आम चुनावों के बारे में लिखा कि भले ही मोदी की कुछ योजनाएँ पूरी तरह से ज़मीन पर नहीं उतर पाईं लेकिन उन्होंने विदेशी कंपनियों को देश में व्यापार करने के लिए एक आसान माहौल दिया है। जीएसटी को चाइना डेली ने आज़ादी के बाद का अब तक का सबसे बड़ा टैक्स सुधार माना है। चाइना डेली ने एक अन्य लेख में विश्लेषकों के हवाले से कहा कि मोदी के ख़िलाफ़ अगर थोड़ा-मोड़ा रोष था भी तो पुलवामा हमले का करारा जवाब देने और पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई करने के कारण उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई है और देश में राष्ट्रवाद का उदय हुआ है।

चीन की प्रमुख वेबसाइट में से एक “साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट” में विशेषज्ञ रिचर्ड हेडेरियन लिखते हैं कि कुलीन नेहरू-गाँधी परिवार से आने वाले राहुल गाँधी एक वंशवादी राजनीति के प्रोडक्ट हैं न कि किसी बदलाव लाने वाले सामाजिक आंदोलन के। इसी वेबसाइट पर प्रकाशित एक अन्य लेख में कहा गया है कि पिछले वर्ष मोदी और जिनपिंग की 4 बार मुलाक़ात हुई, जिसकी वजह से भारत-चीन के रिश्तों में सुधार आया है। चीनी मीडिया में राहुल गाँधी की तुलना अन्य देशों के वंशवादी नेताओं के साथ की गई, वहीं लोकप्रियता में नरेंद्र मोदी को बड़े वैश्विक नेताओं के साथ रखा गया। राहुल गाँधी के उस बयान की भी चर्चा चीनी मीडिया में हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि मोदी जिनपिंग से डर गए हैं।

एक अन्य चीनी न्यूज़ मीडिया CGTN में विशेषज्ञ ये हेलिन ने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी आसानी से दूसरा कार्यकाल जीत लेंगे। हालाँकि, उन्होंने कहा कि भाजपा को थोड़ी परेशानियाँ भी होंगी क्योंकि जनता को उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं। चीन में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच वुहान में हुई मुलाक़ात की एनिवर्सरी भी मनाई जा रही है। भारत-चीन रिश्तों में सुधार का संकेत देते हुए भारतीय एवं चीनी एम्बेसी द्वारा वहाँ आर्ट्स और फ़िल्म फेस्टिवल्स आयोजित किए जा रहे हैं। चीनी मीडिया जिस तरह से भारतीय चुनावों के बारे में चर्चा कर रही है, उससे साफ़ दिखता है कि उनके अनुसार नरेंद्र मोदी ने भारत को ग्लोबल स्टेज पर चमकाने का कार्य किया है।

राहुल गाँधी को विदेशी नागरिकता पर 15 दिनों में स्थिति स्पष्ट करने का नोटिस, MHA का बड़ा क़दम

भारतीय गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को नोटिस थमाते हुए गृह मंत्रालय ने उनकी विदेशी नागरिकता पर 15 दिनों के भीतर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए ख़ुलासा किया था कि राहुल गाँधी ने एक प्राइवेट कम्पनी के रजिस्ट्रेशन काग़ज़ात में ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। ये कम्पनी लंदन में स्थित है। स्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर राहुल गाँधी की भारतीय नागरिकता व संसद सदस्यता समाप्त करने की माँग की थी।

राहुल गाँधी को गृह मंत्रालय द्वारा भेजी गई नोटिस

काग़ज़ात के अनुसार, राहुल गाँधी बैकॉप्स लिमिटेड नामक कम्पनी के डायरेक्टर और सेक्रटरी थे। स्वामी ने ये काग़ज़ात ब्रिटेन के कम्पनी लॉ अथॉरिटी से निकलवाने की बात कही थी। अब गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाते हुए राहुल को भेजी गई नोटिस में पूछा:

“मंत्रालय ने सांसद डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा एक शिकायत प्राप्त किया है। इसमें 2003 में लंदन में सूचीबद्ध कम्पनी ‘बैकॉप्स लिमिटेड’ का जिक्र करते हुए कहा गया है कि आप इसके डायरेक्टर और सेक्रटरी थे। इस कम्पनी का दर्ज पता – 51 सॉउथगेट स्ट्रीट, विंस्टर, हैम्पशायर, SO23 9EH है। 2005 एवं 2006 में फाइल किए गए कम्पनी के एनुअल रिटर्न्स में आपकी जन्मतिथि 19/06/1970 दर्ज है और आपने ख़ुद को एक ब्रिटिश नागरिक बताया है। आप 15 दिनों के भीतर इस मामले को लेकर मंत्रालय को अपनी स्थिति स्पष्ट करें।”

कम्पनी के काग़ज़ात जिसमें राहुल ने ख़ुद को ब्रिटिश बताया था

गृह मंत्रालय ने सुब्रह्मण्यम स्वामी की शिकायत की एक कॉपी भी नोटिस के साथ राहुल गाँधी को भेजी है। इससे पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी के आरोपों का खंडन करते हुए कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था कि राहुल गाँधी तभी से भारतीय नागरिक हैं, जब से उनका जन्म हुआ है। 2015 में जब सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ये गंभीर आरोप लगाए थे तब कॉन्ग्रेस ने कहा था कि ब्रिटिश सरकार से ज़रूर कोई ग़लती हुई है और वो उन्हें सुधार करने की अपील करेंगे। सवाल यह है कि अगर राहुल गाँधी ने ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था तो वह अमेठी के लिए नामांकन दाख़िल करते समय ख़ुद को भारतीय क्यों बताते हैं?

शत्रुघ्न के सामने एक और ‘शत्रु’: बिहार महागठबंधन में फिर से आई दरार, VIP ने खड़ा किया उम्मीदवार

भाजपा से कॉन्ग्रेस में शामिल हुए पटना साहिब के मौजूदा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को बिहार की पटना साहिब लोकसभा सीट से नामांकन दाखिल किया। इस बीच बिहार के महागठबंधन में एक बार फिर से दरार पड़ती दिख रही है। ऐसा लग रहा है कि महागठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। तभी तो महागठबंधन में शामिल पार्टियाँ एक दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी को मैदान में उतार रहे हैं।

बता दें कि, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने कॉन्ग्रेस उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ अपनी पार्टी की तरफ से रीता देवी को चुनावी मैदान में उतार दिया है। दरअसल, चुनाव के पाँचवें चरण के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने मधुबनी सीट पर वीआईपी के उम्मीदवार बद्री पूर्वे के खिलाफ अपनी पार्टी के बागी शकील अहमद को प्रत्याशी बनाया है। हालाँकि कहा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस ने शकील अहमद से नामांकन वापस लेने के लिए काफी मान-मनौव्वल किया, लेकिन शकील अहमद ने अपना नामांकन वापस नहीं लिया। और अब इसी का बदला लेने के लिए वीआईपी ने पटना साहिब से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी शत्रुघन सिन्हा के खिलाफ अपने प्रत्याशी को उतारने का फैसला कर लिया है।

शत्रुघ्न सिन्हा ने सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को नामांकन का पर्चा दाखिल करने के बाद इसकी तस्वीर साझा करते हुए ट्विटर पर एक कविता शेयर की। उन्होंने ट्वीट किया, “बिगुल बज गया है रण का, शांत नहीं बैठूँगा अब। प्रतिद्वंद्वी खड़ा है सामने, लेके कई हथियार, नि:शस्त्र नहीं मैं भी हूँ, संग मेरे है जनता का प्यार।” बिहार की इस सीट पर लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण 19 मई को वोट डाले जाएँगे। मुख्य तौर पर यहाँ शत्रुघ्न सिन्हा का मुकाबला बीजेपी उम्मीदवार और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से है।

सेक्स रैकेट का भंडाफोड़: मोहम्मद उमर और मोहम्मद अजीम गिरफ्तार, अफगानिस्तान से है कनेक्शन

गोवा के तटीय गाँव कैलंगुट में सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। मामले में जाँच के बाद दो अफगान अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया है।

सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को एक अधिकारी की सूचना पर की गई छापेमारी के बाद अफगानिस्तान सरकार के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में निदेशक समेत दो अफगान अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया।

नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में बतौर आंतरिक लेखा निदेशक काम करने वाले आरोपी मोहम्मद उमर एरियन और अफगानिस्तान में वकील मोहम्मद अजीम होदमन को कैलंगुट पुलिस स्टेशन के अधिकारियों द्वारा की गई छापेमारी में गिरफ्तार किया गया। इस छापेमारी के दौरान उज्बेकिस्तान की दो युवतियों को छुड़ाया भी गया।

बता दें कि पुलिस ने आईपीसी की अलग-अलग धाराओं के तहत इस केस को दर्ज किया है। इंस्पेक्टर रोपोसो ने जानकारी देते हुए बताया है कि अफगानिस्तान के इन दो अधिकारियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 370 (वेश्यवृत्ति), 370(3) और अनैतिक यातायात रोकथाम अधिनियम की धारा 4, 5 और 7 के तहत गिरफ्तारी की गई है।

बनिहाल CRPF हमला: पुलवामा दोहराने की नाकाम साज़िश में PhD स्कॉलर समेत 6 गिरफ़्तार

30 मार्च को जम्मू कश्मीर स्थित बनिहाल में सीआरपीएफ के काफ़िले पर हुए हमले का मामला सुलझा लिया गया है। इस हमले को जमात-ए-इस्लामी के छात्र गुट ने अंजाम दिया था और इसकी साज़िश पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन और जैश-ए-इस्लामी ने रची थी। राज्य पुलिस ने इस मामले में एक रिसर्च स्कॉलर समेत 6 आतंकियों को गिरफ़्तार किया है। सभी आतंकियों को एनआईए को सौंपने की तैयारी की जा रही है। पीएचडी स्कॉलर हिलाल अहमद मंटू बठिंडा की सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ता है। वह जमात के स्टूडेंट विंग का सदस्य है। जम्मू के आईजी एमके सिन्हा ने मामले को सुलझाने का दावा करते हुए बताया कि 30 मार्च को बनिहाल में पुलवामा जैसा कार ब्लास्ट करके सीआरपीएफ कॉनवाय पर हमला करने की कोशिश की गई। अगले ही दिन पुलिस ने इस कार को ब्लास्ट करने वाले ओवेस अमीन नाम के आत्मघाती हमलावर को पकड़ लिया था।

बनिहाल में भी पुलवामा हमले की तरफ ही बड़ी क्षति पहुँचाए जाने की योजना थी लेकिन आतंकी कामयाब नहीं हो पाए। इस साज़िश के पीछे पाकिस्तानी आतंकी मुन्ना बिहारी का नाम सामने आया है। मामले की तेज़ जाँच के लिए सतर्क पुलिस ने एसआईटी का गठन कर दक्षिण कश्मीर के उमर शफी, शोपियाँ निवासी आकिब शाह, शाहिद वानी उर्फ वाटसन और पुलवामा स्थित चकोरा का रहने वाला वसीम अहमद डार उर्फ डॉक्टर को दबोचा। पुलिस के अनुसार, मुन्ना बिहारी और हिज़्बुल आतंकी रियाज़ नायकु के कहने पर रईस और उमर ने ओवेस को आत्मघाती हमले के लिए तैयार किया था। इन्होंने मिलकर पुलवामा स्टाइल में ही कार को तैयार किया और फिर कार में विस्फोटक भी कर डाला। कार कहाँ से ली गई और आतंकियों ने विस्फोटक कहाँ से ख़रीदा, इस बारे में अभी तक कुछ ख़ुलासा नहीं हुआ है।

इस बार आतंकी संगठनों ने काफ़ी चालाकी से काम लिया था। हमले को अंजाम देने के लिए ऐसे लोगों के चयन किया गया, जिनके ख़िलाफ़ कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी। पुलिस के शक से बचने के लिए ऐसे आतंकियों को इस साज़िश में शामिल नहीं किया गया, जो पहले से सुरक्षा एजेंसियों के राडार पर थे। बनिहाल में हमला करने से पहले 26 मार्च को भी आतंकियों ने इसी तरह का प्रयास किया था लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी थी क्योंकि ब्लास्ट हुआ ही नहीं। जमात-ए-इस्लामी कश्मीर में मज़बूत प्रभाव रखता है और इसने 1971 के बाद से कुछ चुनावों में भी हिस्सा लिया था। राज्य में अलगाववादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में लगे जमात पर गृह मंत्रालय ने 2019 में 5 वर्षों का प्रतिबन्ध लगा दिया था।

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गृह मंत्रालय को पुख़्ता सूचना और सबूत मिले थे कि ये संगठन जम्मू कश्मीर में आतंकियों को कई सारी सुविधाएँ मुहैया करा रहा है। गिरफ़्तार आतंकियों ने कश्मीर में युवाओं को बरगलाने और मज़हब के नाम पर भड़काने की बात स्वीकार की है। बता दें कि 30 मार्च को बनिहाल में हुए हमले में सीआरपीएफ की गाड़ी क्षतिग्रस्त हो गई थी और जवानों को भी मामूली चोटें आई थीं। आतंकियों द्वारा विस्फोटकों से लदी सैंट्रो कार को जम्मू से श्रीनगर ले जाते वक़्त उड़ा दिया गया था। जिस कार में ब्लास्ट हुआ, उसके ड्राइवर को भी गिरफ़्तार कर लिया गया था। उसके आकाओं ने उसे सीआरपीएफ काफ़िले को उड़ाने के लिए बोला था लेकिन वह वहाँ से भाग निकला था। बाद में सुरक्षा बलों ने उसे धर दबोचा।

कर्मठ कन्हैया, अपरिपक्व तेजस्वी और 30 साल के ‘दोस्त’ को धोखा: लालू की राजनीति पर KC त्यागी का प्रहार

जदयू के कद्दावर नेता केसी त्यागी ने कहा है कि राजद सुप्रीमो लालू यादव को कन्हैया कुमार की लोकप्रियता चुभती है। त्यागी ने कहा कि लालू यादव ने कन्हैया कुमार को इसीलिए टिकट नहीं दिया क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि कन्हैया के उभार से उनके बेटों की राह में कोई रुकावट आए। बेगूसराय का चुनावी गणित समझाते हुए अनुभवी नेता ने कहा कि मुख्य मुक़ाबला तो राजद और भाजपा के बीच है लेकिन अगर कन्हैया महागठबंधन प्रत्याशी होते तो ये मुक़ाबला काँटे का होता। राज्यसभा सांसद त्यागी ने आगे कहा कि चूँकि परिवारवाद से ग्रसित लालू अपने बेटों को राजनीति में स्थापित करने में कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे, इसीलिए कन्हैया को टिकट देना उन्हें गँवारा न था। त्यागी ने तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार की तुलना करते हुए कहा कि कन्हैया की कृति और ख्याति तेजस्वी से कहीं ज्यादा है।

केसी त्यागी ने कन्हैया कुमार के तारीफ़ों के पुल बाँधते हुए कहा;

कन्हैया ने जो भी हासिल किया है वह अपने बलबूते पर हासिल किया है। वह अपनी कर्मठता से दुनिया की प्रख्यात यूनिवर्सिटी जेएनयू के छात्र अध्यक्ष बने जबकि तेजस्वी यादव अपने पिता की बदौलत नेता प्रतिपक्ष बने। तेजस्वी को डर था कि आने वाली राजनीति में कन्हैया उनको पछाड़ न दे, इसी डर की वजह से वामदल से गठबन्धन नहीं हो पाया। ऐसे तो 25-30 साल से सीपीआई और राजद में गठबन्धन रहा था, लेकिन अब ऐसा हुआ तो इसके पीछे यही कारण है। तेजस्वी यादव अपरिपक्व राजनीतिज्ञ हैं और वह अपने पिता लालू प्रसाद की कृति और ख्याति के बलबूते राजनीति कर रहे हैं। जबकि, कन्हैया अपने करिश्मे से चुनाव को रोचक बना दिया है। इस समय बेगूसराय में त्रिकोणीय मुकाबला हो रहा है।

केसी त्यागी ने पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर की गई टिप्प्णियों के सदर्भ में कहा कि नीतीश जी किसी पर भी अभद्र टिप्पणी नहीं किया करते हैं। केसी त्यागी फिलहाल जदयू के महासचिव हैं और राज्यसभा सांसद हैं। जदयू के वरिष्ठ नेताओं में से एक त्यागी को 2013 में पार्टी द्वारा राज्यसभा सांसद बनाया गया था। वे न्यूज़ चैनलों पर भी पार्टी की बात रखते नज़र आते हैं। बेगूसराय की बात करते हुए त्यागी ने उसे एक परिपक्व क्षेत्र बताया और कहा कि यह एक ऐसा क्षेत्र है जो साम्यवाद और समाजवाद के आन्दोलनों के लिए जाना जाता है। उन्होंने ‘विचारधारा में अंतर’ के बावजूद कन्हैया कुमार से सहानुभूति जताई।

इसके अलावा केसी त्यागी ने लालू यादव पर वामदलों के साथ धोखा करने का आरोप भी मढ़ा। उन्होंने कहा कि वामदल हमेशा लालू के लिए खड़े रहे लेकिन कन्हैया को टिकट न देकर लालू ने वामदलों को धोखा दिया। बता दें कि राजद सुप्रीमो अभी राँची कारावास में चारा घोटाला के मामले में अपनी सज़ा काट रहे हैं लेकिन टिकट वितरण सम्बन्धी सभी चुनावी निर्णय उन्होंने जेल से ही लिया है। लालू यादव पर नीतीश कुमार ने जेल में फोन का उपयोग कर बिहार चुनाव प्रभावित करने का आरोप लगाया था, जिसके बाद उनके सेल में गहन तलाशी ली गई थी। विपक्ष के कई नेताओं ने पिछले कुछ महीनों में लालू से जेल में ही जाकर मुलाक़ात की है।

आदिवासी प्रेमी राहुल गाँधी, 1966 में मिज़ोरम पर बम किसने बरसाए थे याद है?

राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष हैं, सोनिया गाँधी के पुत्र हैं, राजीव गाँधी के भी पुत्र हैं। किसी के भाई, किसी के साले, किसी के पोते और किसी के परनाती भी हैं। बचपन, किशोरावस्था और जवानी के बारे में देश को बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है। हालाँकि, उनके पिछले पाँच सालों का, और उनमें से भी पिछले तीन सालों का लेखा-जोखा इंटरनेट के पास है।

इन तीन सालों में राहुल गाँधी ने रैलियों में बोलना सीखा, और बोलने की आदत डाली, और फिर बड़बड़ाने लगे। बोलना सही बात है। बोलने से पता चल जाता है कि कौन गुजरात की महिलाओं को कहाँ का मजा देने की बात कर सकता है। बोलने से पता चल जाता है कि आप हर प्रश्न का जवाब वूमन इम्पावरमेंट कह कर दे सकते हैं। बोलने से पता चल जाता है कि आपके मस्तिष्क में जो सत्तर प्रतिशत ऑक्सीजन जा रहा है, वो किस कार्य के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

हाल ही में पत्रकारिता के स्वघोषित मानदंड ने सवाल उठाया था कि आखिर मोदी ही क्यों इंटरव्यू दे रहे हैं, बाक़ियों का इंटरव्यू क्यों नहीं दिखाती मीडिया। राहुल ने 2014 में इंटरव्यू दिए थे, फिर पता चला कि ऐसे धुरंधर और प्रखर नेता को सवाल चाहे पहले दे दीजिए, या बाद में, ये दाढ़ी बना कर आएँ या सॉल्ट एंड पेपर लुक में, इन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता।

राहुल गाँधी व्यक्तित्व नहीं, एक मानसिक अवस्था है। कभी-कभी व्यक्ति व्यक्तिवाचक संज्ञा से ऊपर उठ कर जातिवाचक संज्ञा हो जाता है, और उनमें से राहुल गाँधी जैसे महज़ चंद लोग ऐसे होते हैं जो व्यक्ति होते हुए भी विशेषण बन जाते हैं। राहुल गाँधी हमारे युग में एक केस स्टडी हैं जिसे भारत के आम चुनावों की ही तरह, विदेशी शिष्टमंडलों को आकर देखना चाहिए कि दुनिया को लोकतंत्र देने वाले देश के आधुनिक डेमोक्रेसी की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष कौन है, और उससे भी बड़ी बात कि वो क्या है!

हाल ही में एक रैली में राहुल गाँधी ने बताया कि सरकार ने एक कानून बनाया है जिसमें ये लिखा हुआ है कि आदिवासी को सरकार मार सकती है। यूँ तो राहुल गाँधी का मानसिक स्तर इतना ग़ज़ब का है कि वो आदिवासियों की यह बात गैरआदिवासी क्षेत्र में भी कह सकते हैं, लेकिन बेनेफिट ऑफ डाउट देते हुए मैं यह मान लेता हूँ कि यह डर उन्होंने किसी आदिवासी बहुल क्षेत्र की रैली में ही दिखाया होगा।

ज़ाहिर तौर पर यह बात इतनी ज़्यादा गलत है कि आप इसे सिरे से नकार देंगे। लेकिन हम उस भारत के नागरिक हैं जहाँ पिछले साल की अप्रैल में व्हाट्सएप्प पर फैलाए गए अफ़वाह को ‘टाइप किया हुआ है, तो सच ही होगा’ मान कर ऐसा हिंसक आंदोलन हुआ कि सामाजिक न्याय की बलि 12 लोग चढ़ गए। इसलिए, ऐसी बातों को नकारना नहीं चाहिए। ऐसी बातों पर प्राइम टाइम टीवी पर डिबेट होना चाहिए कि ये व्यक्ति आखिर रैलियों में क्या बोलता है, क्यों बोलता है!

लेकिन प्राइम टाइम नहीं होगा क्योंकि सारे प्राइम टाइम पर मोदी की रैली आती है, और जिस एक जगह पर नहीं आती उस पर यह विलाप होता है कि बाकी सब पर मोदी ही क्यों आ रहा है। कुल मिला कर मीडिया में कॉन्ग्रेस तंत्र को अपनी रक्त-मज्जा और ढाँचे से पूजने वाले लोग अपने प्रियतम नेता की करतूतों को ऐसे ही जाने देते हैं।

1966 का एक क़िस्सा याद आता है। इंदिरा गाँधी नई-नई प्रधानमंत्री बनी थी, और भारत के उत्तरपूर्व में विद्रोह हो गया। मिज़ोरम में मिजो नेशनल फ़्रंट ने असम रायफ़ल्स के सैन्य ठिकानों पर हमला बोल दिया और मार्च 1, 1966 को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। इंदिरा गाँधी ने देश के इतिहास में पहली बार, और अब तक आख़िरी बार, अपने ही नागरिकों पर, अपनी सीमा के भीतर एयरफ़ोर्स से बॉम्बिंग कराई।

मिज़ोरम में आदिवासी रहते हैं कि नहीं, ये आप लोग पता कर लीजिएगा। हम इस पर चर्चा कर सकते हैं कि उग्रवादियों ने सैन्य ठिकानों पर हमला किया था, और उनको दबाना ज़रूरी था। लेकिन, क्या वही एक रास्ता था मिसेज़ गाँधी के पास? क्या उसमें सिविलियन्स नहीं मरे? क्या आर्मी की मदद से एक छोटे इलाके की स्थिति नियंत्रण में नहीं लाई जा सकती थी? क्या अपने ही नागरिकों पर देश की एयरफ़ोर्स को हमला करने को मजबूर करना वैसा ही एकमात्र उपाय तो नहीं था जैसा कि इमरजेंसी?

राहुल गाँधी को ये बात याद नहीं होगी क्योंकि उनका दिमाग फेफड़ों द्वारा लिए गए 70 प्रतिशत ऑक्सिजन को अपने बालों द्वारा उत्सर्जित कर देता है, न कि न्यूरॉन्स की द्रुत हलचल के लिए इस्तेमाल में लाता है। अगर याद हो तो आदिवासियों के इलाकों में नक्सलियों की खूब पैठ थी। राजनाथ सिंह ने बिना सिविलियन्स को अपने ही सुरक्षा बलों की गोलियों का शिकार बनाए लगभग 30 जिलों में समेट दिया।

इसके लिए नक्सल आतंकियों को मुख्यधारा में लाने के द्वार खुले रखने के साथ, उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देने और उन इलाकों में विकास का रास्ता अख़्तियार करने की नीति अपनाई गई। परिणाम सामने थे कि नक्सली हिंसा में लगभग 60% की गिरावट आई। ये समझना मुश्किल नहीं है कि सरकार के पास सारे तरीके होते हैं लेकिन आपका चुनाव आपको समय की नजर में सही या गलत ठहराता है।

तो, राहुल गाँधी जी जिस केयरफ़्री एटीट्यूड के साथ यह बोल गए कि कानून में लिखा है कि आदिवासियों को मारा जा सकता है, वो अक्षरशः सही हैं क्योंकि उनके पास उनकी दादी की कानून की किताब होगी जिसे उन्होंने कई बार अपने हिसाब से लिखा था। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई ऐसी बातें की थीं, जो नैतिकता की परिभाषा से बाहर थी, और जिन बातों के होने की फर्जी आशंका पर राहुल और उनका गिरोह हर तीसरे दिन आपातकाल लाता रहा है।

राहुल गाँधी आखिर इतना सहज कैसे होते हैं?

इतनी सहजता से झूठ बोलना और मुस्कुरा देना दो तरह के ही लोग कर सकते हैं: मूर्ख या धूर्त। राहुल गाँधी बहुत कुछ हैं लेकिन मैं उन्हें धूर्त तो नहीं ही मानूँगा, क्योंकि धूर्त होने के लिए पढ़ा-लिखा और समझदार होना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर आप राजदीप सरदेसाई को धूर्त कह सकते हैं, रवीश कुमार को धूर्त कह सकते हैं, अरविन्द केजरीवाल को धूर्त कह सकते हैं, शेखर गुप्ता को धूर्त कह सकते हैं। उस लिहाज से राहुल गाँधी बहुत कुछ हैं, लेकिन मैं उन्हें मूर्ख ही मानूँगा।

मूर्खता के साथ सहजता बिना किसी प्रयास के ही आ जाती है। आप अगर मूर्ख नहीं होंगे तो आप राफेल का दाम, दस अलग-अलग रैलियों में 526 रुपए से 700 करोड़ रुपए तक नहीं बोलेंगे! मूर्ख को अपनी मूर्खता पर सबसे ज़्यादा विश्वास होता है, बजाय दूसरों की समझदारी पर। मैं जानता हूँ कि उन्हें जो स्क्रिप्ट लिख कर दिया जाता होगा, उस पर दाम सही लिखा रहता होगा। लेकिन रिलक्टेंट पोलिटिशियन राहुल गाँधी फ्लो में बोल जाते हैं और उनके इसी बोलने पर पत्रकारिता के समुदाय विशेष के कई माननीय सदस्य कहते हैं, “अगर वो बोल ही रहे हैं, तो जाँच करवाने में क्या समस्या है?”

राहुल के लगातार बोले जाने वाले झूठ

मैं बस दो पैराग्राफ़ में राहुल गाँधी द्वारा बोले गए कुछ झूठों की याद दिलाना चाहूँगा। कुछ प्रमुख झूठ हैं: मोदी अर्धसैनिक बलों को शहीद का दर्जा नहीं दे रहा, जबकि शहीद का दर्जा जैसी कोई बात होती ही नहीं। मोदी मनरेगा को बर्बाद कर रहा है, जबकि मनरेगा में सबसे ज़्यादा पैसा इसी सरकार ने दिया। मोदी सरकार घृणा फैलाती है, जबकि उनके अपने विधायक माइक लेकर गुजरात में बिहारियों को मारने की बातें करते पाए जा चुके हैं, और भारत के तमाम सबसे बड़े दंगों का ख़ून कॉन्ग्रेस के ही पूरे देह पर है। उन्होंने संसद में कहा कि मिराज 2000 HAL ने बनाया, जबकि ये कोरी बकवास है। राफेल पर उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने एयरफ़ोर्स से सलाह नहीं ली और रिलायंस को 30000 करोड़ दे दिए गए, ऐसी कोई बात नहीं है। पेरियार की मूर्ति टूटी तो भाजपा और संघ के नाम आरोप लगाया, जबकि नशे में धुत्त एक सीआरपीएफ़ जवान ने यह कार्य किया था। सरदार पटेल की मूर्ति को उन्होंने मेड इन चायना बताया था जबकि यह झूठ 2015 में ही नकारा जा चुका था।

उसके बाद, हाल ही में सिर्फ एक रैली में उन्होंने दस झूठ बोले जिनमें राफेल, मिग 21 HAL ने बनाया था, मनरेगा मोदी ने बर्बाद किया, उद्योगपतियों का 3.5 लाख करोड़ लोन माफ किया, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में दो दिन में किसानों का ऋण माफ किया गया, जेटली ने माल्या से मिल कर भागने में मदद की, सीबीआई के चीफ़ को मोदी ने हटवा दिया, जय शाह भाजपा सरकार की मदद से 80 करोड़ हर महीने का व्यवसाय कर रहे हैं! ऐसी ही उत्तरपूर्व के दौरे पर कहा कि मोदी ने उनके लिए कुछ नहीं किया, जबकि वहाँ के राज्य और केन्द्र की कॉन्ग्रेस सरकारों में जितना पिछले सत्तर साल में नहीं किया, उतना मोदी ने अपने कार्यकाल में कर दिया। वहीं, अपनी मूर्खता में बहते हुए उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि उत्तरपूर्व के राज्यों के युवाओं को मोदी सरकार मार रही है। इस पर मैं कोई सफ़ाई नहीं देना चाहता।

मुझे ये सब याद करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यह हर रैली में रिपीट मोड पर चलता रहता है। इस बार कॉन्ग्रेस की योजना पूरी तरह झूठ बोल कर चुनाव जीतने पर ही आधारित है क्योंकि इन्होंने सब्ज़बाग़ दिखाकर राजस्थान और मध्यप्रदेश तो अपने नाम कर ही लिया। ये बात और है कि दोनों जगह की जनता अब तेरह रुपए की ऋणमाफी पाकर, और उन लोगों का नाम लिस्ट में देख कर आश्चर्य में है जो किसान हैं ही नहीं।

जब मूर्खता से भी धूर्तता वाले परिणाम आ जाते हैं

मूर्खतापूर्ण वचन भी कई बार अपेक्षित परिणाम ले आते हैं। राहुल गाँधी के भाषणों के मध्य में वो लोग हैं जिन्हें राहुल गाँधी के परनाना, दादी, पिता और माता ने पीढ़ी दर पीढ़ी पिछड़ा, वंचित और गरीब बनाए रखा। उनकी दुर्बलता या सुभेद्यता का लाभ उठाना कॉन्ग्रेस पार्टी का राजकीय और राष्ट्रीय उद्योग बन गया। चूँकि यही ग़रीब, पिछड़े, वंचित और दुर्बल इल उद्योग के लिए कच्चा माल थे, तो उनकी स्थिति में छेड़छाड़ करना अपने फ़ैक्ट्री पर ताला मार कर लाभ कमाने की उम्मीद रखने जैसा होता।

यहाँ नई सरकार इन्हें घर, सिलिंडर, बल्ब, बिजली, शौचालय, और सड़क के साथ रोजगार के अवसर देकर सबल बना रही है, तो कॉन्ग्रेस के घरेलू उद्योग के रॉ मटीरियल पर कुठाराघात हो रहा है। फ़ंड सूख रहे हैं, पार्टी घाटे में चल रही है। इसलिए, नया पैंतरा है कि जो गरीबी से उबर रहे हैं, या अभी भी गरीब हैं, उन्हें गरीबी में ही रखने की कोशिश करो।

ऐसे लोगों को जब आप यह कह देंगे कि मोदी ने मनरेगा को बर्बाद कर दिया जिससे तुम्हें रोजगार मिलता था, तो वो परेशान हो जाएगा। ऐसे लोगों को आप कह देंगे कि सरकार ने तुम्हारा आरक्षण छीन लिया है, सुप्रीम कोर्ट से कहा कि खत्म हो जाएगा सब, तो वो सड़कों पर आ जाएगा (भले ही उसके हाथ में मशाल और पेट्रोल आप देंगे)। ऐसे लोगों को आप कह देंगे कि सरकार ने कानून बनाया है कि आदिवासी को मार दिया जाएगा, तो वो सोचने लगेगा कि अगर ऐसा कानून नहीं है तो ये आदमी माइक पर बोल कैसे रहा है!

आप रैलियों में ग़रीबों के रोजगार छिनने से झूठ बोलना शुरु करते हो और इस बात पर पहुँच जाते हो कि मोदी तो तुम्हें मारने के लिए कानून लिख चुका है, तो यह मूर्खता ज़रूर है, लेकिन जो वल्नरेबल लोग हैं, दुर्बल हैं, असहाय हैं, पहले से ही सर्वाइवल को लेकर परेशान हैं, वो तो डर ही जाएँगे। और जब वो डर जाएँगे तो किसे वोट देंगे? उसी पार्टी को जिसने उन तक यह सूचना पहुँचाई और ऐसे कानून को मिटा देने का वादा कर रहा है जो है ही नहीं!

क्योंकि महानता थोपी भी जा सकती है

इस बार राहुल गाँधी ने घरवालों की वह सलाह कुछ ज़्यादा ही गम्भीरता से ले ली जिसमें वो स्टेज पर बोलने से डर रहे होंगे, और किसी ने कह दिया होगा, “टेक इट ईज़ी, ब्रुह!” क्योंकि इतनी संजीदगी से अपनी मूर्खता का प्रदर्शन बहुत ही कम लोग करते हैं। रैलियों में तो मुझे याद नहीं है कि कोई ऐसे गम्भीर चेहरे के साथ खेतों में दवाई की फ़ैक्टरी लगाने से लेकर अालू-सोना वाली बात कर सकता हो।

राहुल गाँधी बड़े नेता बना दिए गए हैं। शेक्सपीयर द्वारा लिखे नाटक ‘ट्वैल्फ्थ नाइट’ का एक संवाद याद आता है जब मैलवेलियो महानता के बारे में कहता है, “…be not afraid of greatness: some are born great, some achieve greatness, and some have greatness thrust upon them.”

राहुल गाँधी पैदा तो ग्रेट हुए ही थे, लेकिन उनके बचपन, किशोरावस्था और जवानी के गायब हिस्सों के बाद, लग रहा था कि महानता उनकी पहुँच से बाहर ज रही है, तभी प्रौढ़ावस्था में ग्रेटनेस उन पर थ्रस्ट कर दिया गया कि ‘लो बे, महान बन जाओ। इस महान पार्टी की कमान संभालो जिसने अपने देश के लोगों पर बम बरसाए, सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपने हिसाब से बदला, सत्ता के लिए आपातकाल लाई, पार्टी फ़ंड के लिए जीप से लेकर बोफ़ोर्स और ज़मीन के भीतर के कोयले से लेकर आकाश में उड़ते हेलिकॉप्टर और आयनोस्फेयर के तरंगों तक में अपने महान घोटालों की छाप छोड़ दी है।”

राहुल गाँधी ने कहा, “बट, मम्मी!”

मम्मी ने कहा, “सत्तर साल से जिनको पाला है, वो हमारी फेंकी हड्डियों को चाटेंगे और तुम्हारे गुणगान में लगे रहेंगे। तुम बस महान बनने की औपचारिकताएँ पूरी कर लो। तुम मुस्कुराओ, फटी जेब दिखाओ, जनेऊ पहनो, रामभक्त बनो, शिवभक्त बनो, गोत्र बताओ, आँख मारो, बग़लें झाँकों, हमउम्र नेताओं से पूछो कि क्या बोलना है, रैलियों में हाथ हिलाओ, माइक पर बोलो, जो मन में आए बोलो, कुछ बातें रट लो, हर बार वही बोलते रहो… इतना ही करना है क्योंकि तुम इतने ही करने के लिए बने हो। बाकी काम मीडिया देख लेगी क्योंकि उन्हें हमने सालों देखा हैं।”

हाँ, हैं हमारे यहाँ जिहादी, इस्लामी चरमपंथी आतंकी: पाकिस्तानी सेना

सालों तक अपनी जमीन पर जिहादी आतंकी होने के खुले रहस्य को नकारने के बाद आख़िरकार पाकिस्तान को उसे स्वीकारना पड़ रहा है। पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस के महानिदेशक मेजर जनरल आसिफ गफूर ने सोमवार को प्रेस वार्ता कर यह स्वीकारोक्ति कर ली है कि उनके देश में हिंसक चरमपंथी इस्लामी संगठन और जिहादी मौजूद हैं। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब तक की पाकिस्तानी सरकारें इससे लड़ने में नाकाम रहीं हैं।

करता रहा भारत के दावे का विरोध

अब तक हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान भारत के इस दावे का विरोध करता रहा है कि उसकी ज़मीन पर इस्लामी दहशतगर्दों को खाद-पानी मिलता है। यह पहली बार है कि उसने अपने समाज और देश में मौजूद चरमपंथियों को स्वीकार किया है।

‘गँवाए हैं लाखों डॉलर’, पहले की सरकारें नाकाम

मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा, “हमने हिंसक चरमपंथी संगठनों और जिहादी संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया है और हम उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि दहशतगर्दी का समूल नाश करने के लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है, और उनके देश ने इस दहशत के साम्राज्य के कारण बहुत नुकसान उठाया है। उन्होंने कहा, “हमने आतंकवाद के कारण लाखों डॉलर गँवाए हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि उनके देश की पूर्ववर्ती सरकारें इस सबसे निपटने में नाकाम रहीं हैं। उन्होंने स्वीकारा, “सरकारें मेहरबानी करने में व्यस्त रही हैं और हर सुरक्षा एजेंसी इसी में व्यस्त रही है। इस वजह से हम प्रतिबंधित संगठनों के खिलाफ उस रणनीति को बनाने में नाकाम रहे हैं, जो हम आज बना रहे हैं।”

बालाकोट पर झूठ बरकरार

पाकिस्तान ने सच की इस एक स्वीकारोक्ति को भी बिना झूठ के नहीं रहने दिया। बालाकोट में कोई नुकसान नहीं होने के अपने झूठ पर कायम मेजर गफूर ने कहा, “बालाकोट में हमें कोई नुकसान नहीं हुआ, हमने स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को ले जाकर दिखा दिया। हम हिन्दुस्तानी मीडिया को भी ले जाने को तैयार हैं।”