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‘कॉन्ग्रेस में पढ़ने-लिखने वालों का अभाव’ – क्या दिग्विजय का इशारा राहुल गाँधी की ओर है?

मध्य प्रदेश के कद्दावर पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के भोपाल प्रत्याशी दिग्विजय सिंह ने अप्रत्याशित रूप से एक सच की स्वीकारोक्ति की है। उन्होंने यह माना कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद से उनकी पार्टी में लिखने-पढ़ने की, मतलब विचारों के आदान-प्रदान की परिपाटी ख़त्म हो गई है। और अब उनकी पार्टी विचारधारा के लिए कम्युनिस्टों पर निर्भर है। उन्होंने यह बात सीपीआई के कार्यालय में दिए गए अपने भाषण के दौरान कही।

‘नेहरू जी के बाद कॉन्ग्रेस ने लिखने-पढ़ने पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया’

26/11 को संघ की साजिश बताने वाली किताब का विमोचन करने वाले दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि पंडित नेहरू के बाद से किसी कॉन्ग्रेसी ने बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। आज भी सोच-विचार में उनकी पार्टी, भाकपा, माकपा, और यहाँ तक कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी भाकपा (माले) से प्रेरणा लेती है।

प्रज्ञा से पार पाने को है कन्हैया कुमार का सहारा

दिग्विजय सिंह के खिलाफ़ भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को प्रत्याशी बनाया है। प्रज्ञा को कॉन्ग्रेस ने उसी काल्पनिक ‘हिन्दू आतंकवाद’ का चेहरा बनाने की पुरजोर कोशिश की थी जिसे दिग्विजय सिंह ने प्रचारित करने में कोई कसार नहीं छोड़ी थी। और भोपाल से सैकड़ों किलोमीटर दूर से बेगूसराय के सीपीआई प्रत्याशी कन्हैया कुमार वामपंथी वोटरों को इकट्ठा कर दिग्विजय सिंह की सहायता करने 8-9 मई को भोपाल आएँगे। दिग्विजय ने भी बदले में अहसान उतारते हुए अपनी पार्टी के गठबंधन कैंडिडेट के खिलाफ जाकर कन्हैया कुमार का समर्थन किया, और कन्हैया को गठबंधन का टिकट न दिए जाने को अपने गठबंधन की भूल बताया।

कुत्ता कर रहा था BJP का प्रचार, पुलिस ने किया अरेस्ट: मालिक के खिलाफ FIR दर्ज

महाराष्ट्र में पुलिस द्वारा चुनाव के दिन (29 अप्रैल) अपने शरीर से चिपके भाजपा समर्थित स्टिकर के साथ घूमने वाले एक कुत्ते को हिरासत में लिए जाने की ख़बर सामने आई है। ख़बर के अनुसार, नवनाथनगर इलाक़े के निवासी एकनाथ मोतीराम चौधरी (65) को सोमवार दोपहर अंधारे अस्पताल के पास अपने कुत्ते के साथ देखा गया।

स्थानीय पुलिस अधिकारी के अनुसार कुत्ते का शरीर भाजपा के प्रतीक और “मोदी लाओ, देश बचाओ” के नारे के साथ कवर किया गया था (मोदी के लिए वोट, देश बचाओ)।

पुलिस ने जानकारी दी कि देश में मतदान प्रक्रिया अभी जारी है, इसलिए शहर में घूम रहे कुत्ते और उसके मालिक के बारे में उन्हें शिक़ायत मिली थी।

चुनाव नियमों के उल्लंघन के लिए चौधरी के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 171(ए) के तहत मामला दर्ज किया गया है, जो चुनाव के दिन प्रचार करने को प्रतिबंध से संबंधित है। एक स्थानीय पुलिस अधिकारी ने बताया कि पुलिस ने नगर निगम से कुत्ते को हिरासत में लेने के लिए कहा था, जिसके बाद निगम ने कुत्ते को हिरासत में ले लिया।

नहीं है जो मुहम्मद का, हमारा हो नहीं सकता: कॉन्ग्रेसी ‘आचार्य’ प्रमोद कृष्णन की घटिया और जहरीली कविता

भारतीय जनता पार्टी के प्रादुर्भाव के बाद से ही कॉन्ग्रेस ने भी सॉफ्ट हिंदुत्व का दिखावा शुरू कर दिया है। यही कारण था कि गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गाँधी ने मंदिर-मंदिर घूम कर ‘टेम्पल रन’ किया। कॉन्ग्रेस को भरोसा है कि कथित अल्पसंख्यक वर्ग तो उनके मुख्य वोटर हैं ही और हिंदुत्व का दिखावा कर हिन्दुओं को भी लुभाया जा सकता है। हाल ही में राहुल गाँधी चुनाव लड़ने के लिए वायनाड गए और कई कॉन्ग्रेस नेताओं ने साफ़-साफ़ कहा है कि अल्पसंख्यकों की अच्छी संख्या होने के कारण उन्हें वहाँ से जीतने में परेशानी नहीं होगी। इसी तरह नक्सलियों के भी समर्थन में कॉन्ग्रेस नेता बोलते रहे हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस अब वापस मुस्लिमों को लुभाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। सपा-बसपा महागठबंधन के दौर में मुस्लिम वोटरों के छिटकने की आशंका से घिरी कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाने में तेज़ी लाई है।

लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार और ख़ुद को आचार्य बताने वाले प्रमोद कृष्णन कॉन्ग्रेस के हर उस रवैये के साक्षात प्रतिमूर्ति हैं, जिस पर चलकर पार्टी अपनी खोई सत्ता हासिल करने की चेष्टा कर रही है। कॉन्ग्रेस नेता प्रमोद कृष्णन वैसे तो हिन्दू साधु-संत की वेशभूषा में रहते हैं लेकिन उनमें या उनकी विचारधारा में न हिन्दुओं के कोई लक्षण दिखते हैं और न ही साधु-संतों की मर्यादा का तनिक भी समावेश है। हिन्दू संत की चोली में प्रमोद कृष्णन को कॉन्ग्रेस ने झूठ, प्रोपेगेंडा और तुष्टिकरण की नीति पर अमल करने के लिए रखा हुआ है। लेकिन ऐसे में प्रमोद कृष्णन को अपने नाम से ‘आचार्य’ हटा देना चाहिए। नीचे दी गई वीडियो में आप इन्हें ‘मस्त-मस्त’ गाने पर थिरकते और गाते देख सकते हैं।

भारतीय अखाड़ा परिषद द्वारा पाखंडी बाबा के रूप में प्रसिद्ध प्रमोद कृष्णन संभल कल्कि पीठ के पीठाधीश्वर भी हैं लेकिन इन्होंने इस चोली में हिन्दू धर्म को बदनाम करने की हरसंभव कोशिश की है। प्रमोद कृष्णन के एक अन्य साथी चक्रपाणि महाराज को भी पाखंडी बाबा के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। ऐसा नहीं है कि प्रमोद कृष्णन इस बार चुनाव लड़ने के लिए कॉन्ग्रेस में आए हैं, उन्होंने 2014 में भी संभल लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था। कॉन्ग्रेस के टिकट पर उस समय उसकी ज़मानत ज़ब्त हो गई थी। प्रमोद कृष्णन को उस चुनाव में डेढ़ प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा था।

2017 में एक कार्यक्रम में प्रमोद कृष्णन ने सांप्रदायिक बयान देते हुए साफ़-साफ़ कहा था कि जो मुहम्मद का नहीं हो सकता वो हमारा भी कभी नहीं होगा। मुस्लिमों को लुभाने के लिए प्रमोद कृष्णन ने कह डाला था कि जो मुहम्मद का नहीं हुआ, वह किसी और का कभी नहीं हो सकता है। नीचे संलग्न की गई वीडियो में आप उन्हें ऐसा बोलते हुए सुन सकते हैं।

अपने आप को पैगम्बर मुहम्मद के दामाद हज़रत अली का अनुयायी बताने वाले प्रमोद कृष्णन चुनाव के दौरान ध्रुवीकरण की कोशिश करते रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक़ पर निर्णय देने के बावजूद वह टीवी न्यूज़ चैनलों पर आकर केंद्र सरकार से पूछते रहते हैं कि जैसे तीन तलाक़ पर कार्य किया गया, वैसे ही राम मंदिर पर क्यों नहीं आगे बढ़ा जा रहा है? लखनऊ में प्रमोद कृष्णन का मुक़ाबला वर्तमान सांसद और केंद्र गृह मंत्री राजनाथ सिंह से है। सपा-बसपा महागठबंधन ने यहाँ से कॉन्ग्रेस नेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को टिकट दिया है। शत्रुघ्न अपनी पार्टी को नज़रअंदाज़ कर अपनी पत्नी का प्रचार करने लखनऊ आए भी थे।

TMC ने की नए लेवल की गुंडई: EVM बटन पर छिड़का इत्र, हर वोटर की सूँघी ऊँगली और…

तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने बौखलाहट में अज़ीबोग़रीब तरीके आज़माने शुरू कर दिए हैं। तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने ईवीएम में किसी भी प्रकार की कथित छेड़छाड़ का पता लगाने के लिए एक नया तरीका खोजा है। आनंद बाजार पत्रिका में छपी एक ख़बर के अनुसार, बीरभूम लोकसभा क्षेत्र स्थित मंगलकोट क्षेत्र के माँझीग्राम गाँव में तृणमूल कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के नाम और चुनाव चिह्न के सामने वाले बटन पर तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा इत्र छिड़क दिया गया। इसके बाद जो भी मतदाता अंदर वोट देने के बाद बाहर निकल रहा था, ये गुंडे उसकी ऊँगली सूँघ रहे थे ताकि पता लगा सके कि मतदाताओं ने तृणमूल को वोट दिया है या नहीं। पहले से ही पूरे बंगाल में हिंसा फैला रहे तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों की इस हरक़त को लेकर ममता बनर्जी भी चुप हैं।

तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने उन मतदाताओं को परेशान किया, जिनकी ऊँगली से इत्र की महक नहीं आ रही थी। जिनकी ऊँगली से इत्र की महक आ रही थी, उन्हें यह समझकर छोड़ दिया गया कि उन्होंने तृणमूल को ही वोट दिया है। पार्टी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहे हैं, चुनाव आयोग को तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा फैलाई जा रही हिंसा को रोकने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।

चुनाव आयोग ने 30 अप्रैल की सुबह तक विवादास्पद TMC नेता अनुब्रत मंडल पर कड़ी निगरानी रखने का फैसला किया है। मतदानकर्मियों ने TMC नेता के प्रति अपना डर व्यक्त किया था जिसके बाद चुनाव आयोग ने रविवार (28 अप्रैल) को यह फैसला लिया। मतदानकर्मियों ने यह भी कहा था कि यदि TMC बीरभूम जिला अध्यक्ष मतदान के दिन एक बूथ से दूसरे बूथ तक चहलकदमी करेंगे यानी वहाँ आएँगे-जाएँगे तो इससे उन्हें ख़तरा है। बीरभूम में भाजपा कार्यालय के बाहर पुलिस तैनात थी, जहाँ यह आरोप लगाया गया था कि TMC के गुंडों ने कार्यालय में तोड़फोड़ की थी। मंडल ने इस आरोप का खंडन किया और कहा कि बीजेपी इन हमलों का ज़िक्र केवल ‘ध्यान आकर्षित’ करने के लिए कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस तरह की हिंसक वारदातों के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा कि तृणमूल के गुंडे विपक्षी प्रत्याशियों को प्रचार तक नहीं करने दे रहे। प्रधानमंत्री ने सीधा ममता पर हमला बोलते हुए उन्हें हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया और कहा कि तृणमूल सरकार दमनकारी नीतियों पर चल रही है।

रिपब्लिक टीवी, इंडिया टुडे के पत्रकारों पर TMC के गुंडों ने बरसाई लाठियाँ, महिला पत्रकार को भी नहीं बख़्शा

चौथे चरण के चुनाव के दौरान जहाँ सारा देश लगभग शांति से मतदान कर रहा था, वहीं पश्चिम बंगाल से हिंसा और धांधली की खबरें आईं। इन खबरों को कवर करने गई रिपब्लिक टीवी ने बताया है कि इस दौरान TMC के गुंडों ने उन पर हमला किया

रिपब्लिक टीवी के अनुसार, उनकी पत्रकार शांताश्री, अपने साथी पत्रकार के साथ आसनसोल से रिपोर्टिंग कर रही थीं। वहाँ TMC के गुंडों ने लाठियों से उनकी कार पर हमला किया और खिड़की तोड़ दी। शांताश्री ने बताया कि वे भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो की कार के पीछे-पीछे चल रहे थे। अचानक से TMC के गुंडे भड़क गए और उन्होंने उन पर हमला कर दिया। ख़बर के अनुसार, जिन-जिन मीडिया वाहनों ने भाजपा नेता की कार का पीछा किया, उन्हें ही निशाना बनाया गया।

गुंडों ने कथित तौर पर मीडियाकर्मियों को गालियाँ दीं और जब उन्हें रिपोर्ट करने की कोशिश की गई तो उनका पीछा किया गया। इससे पहले, TMC कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर आसनसोल में सुप्रियो की कार पर हमला किया था।

रिपब्लिक टीवी के चालक दल के अलावा, इंडिया टुडे के चालक दल और पत्रकार मनोग्य लोईवाल पर भी कथित तौर पर TMC के गुंडों द्वारा ही हमला किया गया।

जब चुनावी हिंसा की ख़बरें सामने आती हैं तो ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC सरकार की छवि उभरकर सामने आती है। बता दें कि चुनावों के दौरान पश्चिम बंगाल सबसे हिंसक राज्यों में से एक बना हुआ है। 2019 के लोकसभा चुनावों की शुरुआत से ही राज्य में राजनीतिक हिंसा और धमकियों का सिलसिला लगातार जारी रहा। पश्चिम बंगाल में कृष्णानगर मतदान केंद्र पर क्रूड बम पाए गए, और नादिया ज़िले के शांतिपुर मतदान केंद्र से भी बम बरामद किए गए।

चाय देर से मिली, लेट उठी, आसनसोल हिंसा की नहीं कोई जानकारी- TMC नेता मुनमुन सेन

लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में 9 राज्यों की 72 सीटों पर आज वोट डाले जा रहे हैं। जिसमें पश्चिम बंगाल की 8 सीटें भी शामिल हैं। पिछले चरणों की तरह इस बार भी पश्चिम बंगाल हिंसा से अछूता नहीं रहा। पहले तीन चरणों में भी बंगाल में मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा के साथ-साथ धांधली की खबरें सामने आईं थी। चौथे चरण के मतदान के दौरान आसनसोल के भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो पर हमला किया गया। साथ ही भाजपा कार्यकर्ताओं पर भी हमला किया गया।

वोटिंग के दौरान हुई हिंसा के बारे में जब तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की नेता और आसनसोल की उम्मीदवार मुनमुन सेन से पूछा गया तो उन्होंने कहा उन्हें इसके बारे में कुछ भी नहीं पता है, क्योंकि आज सुबह वो सोकर देर से जगी हैं। उन्होंने कहा कि बेड टी देर से मिलने की वजह से उनकी नींद देर से खुली और इस हिंसा के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।

वहीं जब पत्रकारों ने पश्चिम बंगाल में होने वाली हिंसा के बारे में पूछा कि इस तरह की हिंसा बार-बार क्यों हो रही है? तो मुनमुन ने इस पर आपत्ति जताते हुए पत्रकारों से कहा कि वो (पत्रकार) उस वक्त बहुत छोटे रहे होंगे, जब बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार के शासन काल में हिंसा हुआ करती थीं, वो भी सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में। कुल मिलाकर इस दौरान वो इस हिंसा पर कुछ भी बोलने से बचती नज़र आईं।

इसके साथ ही जब उनसे पिछले साल आसनसोल में रामनवमी के दौरान हुई हिंसा के बारे में पूछा गया कि क्या उन्होंने दंगे के शिकार हुए पीड़ितों से मुलाकात की थी, तो उन्होंने कहा कि उस दौरान वो काफी व्यस्त थीं। उस समय काफी रैलियाँ और बैठकें थीं, जिसकी वजह से वो उनसे नहीं मिल पाईं। वो सिर्फ अपना और तृणमूल का प्रचार कर रही हैं।

पत्नी के साथ कॉन्ग्रेस नेता इमरान मसूद के ‘डांस’ से मौलाना ख़फ़ा, कहा-‘हराम है ये, माफ़ी माँगे’

कॉन्ग्रेस नेता इमरान मसूद को अपनी पत्नी के साथ एक समारोह में डांस करना महँगा पड़ गया। इमरान की डांस वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। मौलानाओं की मानें तो ऐसा करना इस्लाम के ख़िलाफ़ है, इसलिए इमरान को इसके लिए माफ़ी माँगनी चाहिए।

इस वीडियो में कुछ औरतें ‘उड़ें जब-जब जुल्फें तेरी’ गाने पर डांस कर रही हैं, जिसमें इमरान की पत्नी भी शामिल हैं। इस वीडियो में लगातार बाकी औरतें और उनकी पत्नी इमरान को डांस करने के लिए कह रही हैं।

नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक इत्तेहाद उलेमा-ए-हिंद के अध्‍यक्ष मौलाना कारी मुस्तफा देहलवी ने मीडिया से हुई अपनी बातचीत में कहा, “इमरान मसूद की पत्‍नी को इस तरह के गानों पर नाचना, खुलेआम बेपर्दा होकर डांस करना जायज नहीं है, यह हराम है और इस्‍लाम इसकी इजाजत नहीं देता है। इस्‍लाम में इसकी मनाही है। इन लोगों को फौरी तौर पर अल्‍लाह से तौबा करनी चाहिए और माफी माँगनी चाहिए, यह बहुत बड़ा जुर्म है।”

गौरतलब है साल 2014 में मोदी की ‘बोटी-बोटी’ करने वाले इमरान मसूद कॉन्ग्रेस पार्टी का एक बड़ा नाम है। इस बार वह सहारनपुर से कॉन्ग्रेस के प्रत्याशी भी है। सहारनपुर में पहले चरण में मतदान हो चुका है। 23 मई को नतीजे सबके सामने होंगे।

The Print वालों, सीधे-सीधे बोलो हिन्दू प्रतीकों से सुलग जाती है (सीने में आग)

सुबह-सुबह उठते ही मोबाइल पर देखा द प्रिंट वालों ने दिल्ली के झंडेवालाँ वाले हनुमान जी की तस्वीर के साथ कुछ लिखा है। सुबह-सुबह बजरंगबली के दर्शन से मन प्रफुल्लित होने की बजाय दुश्चिंता से भर गया, क्योंकि पत्रकारिता के समुदाय विशेष की फ़ितरत पता है- हिन्दुओं की असली तारीफ़ करने की बजाय ये लोग खौलता तेल पी लेना पसंद करेंगे।

और मैं सही था- वह लेख इस बारे में था कि कैसे हिन्दू नेताओं और देवी-देवताओं की भव्य प्रतिमाएँ, उनके भव्य स्मारक समुदाय विशेष को ‘नर्वस’ कर रहे हैं।

जी हाँ। नर्वस- यानी बेचैन, परेशान। हिन्दू भव्यता समुदाय विशेष को बेचैन कर रही है- ऐसा मैं नहीं, प्रिंट कह रहा है।

बात हिन्दू मूल्यों की

लेख की शुरुआत में ही, बाकायदा लेखिका की पीएचडी का हवाला देकर, हाइपरलिंक लगा कर, बता दिया जाता है कि लेखिका समाजशास्त्र की ‘तीसमारखां’ जानकार हैं (और इसलिए इस मुद्दे पर वह जो कुछ बोलें तो उसे हमें चुपचाप सर झुकाकर मान लेना होगा)। आगे लेखिका बतातीं हैं कि प्रतिमाएँ और स्मारक किसी भी समय पर राष्ट्र के मूल्यों को प्रक्षेपित करते हैं। यानी हिन्दुओं की मूर्ति और स्मारक अगर समुदाय विशेष में बेचैनी भर रहे हैं तो ऐसा तभी हो सकता है जब दो में से एक बातें हों-

  1. या तो हिन्दू मूल्यों में ही अपने आप में ऐसी कोई खराबी है, जिससे समुदाय विशेष का डरना लाजमी है,

    और या फिर

  2. समुदाय विशेष की खुद की मूल प्रकृति और प्रवृत्ति ही यह हो कि हिन्दू मूल्यों का सांकेतिक, प्रतीकात्मक उत्थान भी उनके लिए बेचैनी का सबब हो जाए।

मुझे कोई तीसरा कारण नहीं दिखता, खुद लेखिका द्वारा वर्णित प्रतिमाओं के महत्व की संरचना के भीतर।

अब आते हैं हिन्दू मूल्यों पर। तो मुझे तो हिन्दू धर्म के मूल्यों में ऐसा कुछ नहीं दिखता, जिससे किसी को हिन्दू मूल्यों के नाम से ही बेचैनी होने लगे। न हम अपने पंथिक विचारों को इकलौता सच, इकलौता सही रास्ता मानते हैं, न ही हमारे किसी शास्त्र में ऐसा लिखा है कि जो तुमसे अलग विचार या कर्म करने की हिमाकत करे उसे परिवर्तित करो, मार डालो या सेक्स-गुलाम बनाकर बेच दो। इतिहास में शायद ही कोई वर्णन मिले जब किसी हिन्दू राजा ने अपने धर्म को मानने के लिए किसी दूसरे को मजबूर किया हो। हम तो “एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति” पर चलने वाले लोग हैं। तो अगर फिर भी हिन्दू मूल्यों के भव्यीकरण से समुदाय विशेष में बेचैनी का भाव आ रहा है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है?

बात मुख्य चित्र की  

लेखिका जी और द प्रिंट वालों, आप प्रतिमा-निर्माण को ‘पालतू प्रोजेक्ट’ तो नरेंद्र मोदी का बता रहे हो, लेकिन तस्वीर झंडेवालाँ वाले हनुमान जी की क्यों लगा रखी है? यह बनना शुरू 1994 में हुआ था, तब भी देश में ‘सेक्युलर’ कॉन्ग्रेस की सरकार थी, और 2007 में जब यह बनकर ख़त्म हुई तो देश में सोनिया माता और दिल्ली में शीला दीक्षित थीं- क्यों नहीं रोक लिया?

और अगर उस ‘सेक्युलर’ समय की मूर्तियों से भी समुदाय विशेष ‘नर्वस’ हो रहे हैं तो फिर तो क्या हमें मान लेना ही चाहिए कि उनकी बेचैनी अपनी सुरक्षा को लेकर नहीं, हिन्दू प्रतीक चिह्नों (और लेखिका के हिसाब से उन चिह्नों द्वारा इंगित हिन्दू मूल्यों) से घृणा को लेकर है? और अगर ऐसा है तो हम क्या करें? और क्यों करें?

20% बनाम 80%

लेखिका आगे याद दिलातीं हैं कि भारत की 20% आबादी गैर-हिन्दू है। अव्यक्त रूप से इसका मतलब यह है कि 20% समुदाय विशेष को खुश रखने के लिए सार्वजनिक जीवन से हिन्दू मूल्यों की अभिव्यक्ति समाप्त कर देनी चाहिए।

20% आबादी की असहिष्णुता के लिए 80% लोग अपने जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति बंद कर दें? और वो भी इसलिए नहीं कि उनके भय का कोई तर्कसंगत कारण है, बल्कि केवल इसलिए कि उन्हें दूसरे के मज़हब की अभिव्यक्ति नहीं बर्दाश्त!

और वह भी तब जब 20% को पहले से ही वह सभी वीवीआइपी अधिकार हैं जो 80% लोगों को नहीं है। केवल संवैधानिक और वैधानिक बात करूँ तो समुदाय विशेष को संविधान के अनुच्छेदों 25 से लेकर 30 तक का संरक्षण प्राप्त है, जो केवल और केवल अल्पसंख्यकों के लिए ही है, बहुसंख्यकों के लिए नहीं। और इसी आधार पर सबरीमाला की परंपरा भंग की गई, मंदिर को अपवित्र किया गया। अय्यप्पा के भक्तों की हर गिड़गिड़ाहट को हर दरवाजे पर यही कह कर दुत्कार दिया गया कि परम्पराओं और धार्मिक संस्थानों का संवैधानिक संरक्षण अल्पसंख्यकों को ही देता है संविधान, बहुसंख्यकों को नहीं।

RTE (शिक्षा का अधिकार) के अंतर्गत एक-चौथाई सीटों का लाभ भी केवल हिन्दुओं द्वारा चल रहे शिक्षण संस्थानों पर ही लागू है- मदरसों से लेकर ईसाईयों के कॉन्वेंट स्कूल तक इससे छूट पाते हैं, और जमकर अपने मूल्य बच्चों के बचपन और किशोरावस्था में घोलते हैं। हिन्दू अगर कोई स्कूल चलाए तो कानूनन उसे आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ता है जबकि अल्पसंख्यक स्कूल इससे बच जाते हैं।

इसके बाद भी अगर समुदाय विशेष वाले दो-तीन मूर्तियों से बेचैन हो रहें तो हिन्दू क्या करें? और क्यों करें?

ईशा के आदियोगी शिव को जबरदस्ती घसीटा

इस लेख में निजी संस्था ईशा फाउंडेशन द्वारा स्थापित 112 फीट की आदियोगी शिव प्रतिमा का उसी साँस में जिक्र किया गया है, जिसमें सरकारी खर्चे पर बन रही शिवाजी महाराज, सरदार पटेल आदि की प्रतिमाओं की बात हो रही है। ऐसा जानबूझकर इसलिए किया लेखिका ने ताकि बिना खुलकर झूठ बोले लोगों के मन में यह भ्रम फैलाया जा सके कि आदियोगी की प्रतिमा भी सरकारी संसाधनों से बनी है। जबकि सच्चाई यह है कि यह प्रतिमा एक निजी संस्थान ने अपने पैसे और अपनी जमीन पर तैयार की है।

और इसको घसीटने की कोशिश से लेखिका के पूरे लेख की मंशा साफ़ हो जाती है- कि समुदाय विशेष तब तक ‘बेचैन’ रहेंगे जब तक धर्म और संस्कृति, हिन्दू पंथ और सम्प्रदाय की हर अभिव्यक्ति बंद नहीं हो जाती। केवल सरकारी ही नहीं, निजी भी। यही हिन्दूफोबिया है

40 तृणमूल विधायक मेरे संपर्क में, बंगाल की मिट्टी से बना रसगुल्ला मेरे लिए प्रसाद: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर करारा निशाना साधा है। उन्होंने बंगाल के श्रीरामपुर में एक रैली को सम्बोधित करते हुए कहा कि ये सभी विधायक 23 मई के बाद तृणमूल कॉन्ग्रेस छोड़ कर भाजपा में आ जाएँगे। प्रधानमंत्री ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा:

“पहले सिर्फ़ मोदी को गालियाँ दी जाती थी, अब ईवीएम को भी दी जा रही है। तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडे लोगों को वोट डालने से रोक रहे हैं। विपक्ष का प्रचार अभियान मोदी को गालियाँ देने पर केन्द्रित है। अगर आप इन्हें निकाल देंगे तो कुछ नहीं बचेगा। दीदी के दिल में क्या है? असल में दिल्ली तो बहाना है, यहाँ पर भतीजे को जमाना है। बुआ और भतीजे का ये खेल पश्चिम बंगाल समझ चुका है। चिटफंड के नाम पर जिन ग़रीब परिवारों को जीवन खोना पड़ा है, उनके आँसुओं का जवाब इस बार जनता देने वाली है। ये दीदी का दमनचक्र ही है कि घुसपैठिए आराम से रहते हैं और राष्ट्रभक्तों, रामभक्तों, दुर्गाभक्तों, सरस्वती भक्तों को ख़तरे के साए में जीना पड़ता है। ये दीदी का दमनचक्र ही है कि गुंडों को पूरी सुरक्षा मिलती है, जब की बहन-बेटियों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिनों पहले फ़िल्म अभिनेता अक्षय कुमार को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी उन्हें बंगाली मिठाइयाँ भेजती हैं। इस पर पलटवार करते हुए ममता बनर्जी ने एक रैली के दौरान प्रधानमंत्री को मिटटी और कीचड़ से सने रसगुल्ले खिलाने की बात कही थी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पीएम ने कहा कि बंगाल की पवित्र मिट्टी से बना रसगुल्ला भी उनके लिए प्रसाद की तरह होगा।

पीएम मोदी ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार की जा रही हिंसा की वारदातों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बंगाल में आज रामनवमी के जुलूस डर के साए में निकाला जाता है। ममता सरकार को दमनकारी बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें अब उस माटी का प्रसाद मिलेगा तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा, जिस मिट्टी पर महापुरुषों के पैरों की धूल हो।

प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 23 सीटें जीतने की बात कही है। बंगाल में लगातार पाँव जमा रही भाजपा ने दशकों तक राज करने वाले वामपंथी दलों को आसानी से तीसरे स्थान पर ढकेल दिया है। उन्होंने बंगाल के लोगों को ‘मिशन महामिलावट’ के प्रति आगाह करते हुए कहा कि कुछ दल केंद्र में एक खिचड़ी सरकार चाहते हैं। बंगाल की मिट्टी से बने रसगुल्ले को रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, चैतन्य महाप्रभु, जगदीश चंद्र बोस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महापुरुषों की ‘चरण रज’ से जोड़ते हुए पीएम मोदी ने ममता बनर्जी को निशाना बनाया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि तृणमूल के गुंडे लोगों को वोट डालने से रोक रहे हैं और विपक्षी प्रत्याशियों को वोट डालने से रोक रहे हैं। घर में घुसे गद्दारों और आतंकियों का ज़िक्र करते हुए मोदी ने कहा की चौकीदार किसी को भी नहीं छोड़ेगा। पीएम ने लोगों को न सिर्फ़ तृणमूल बल्कि वामपंथी हिंसा की भी याद दिलाते हुए कहा कि कभी लाल आतंकवाद से ग्रसित गाँवों में अब बिजली पहुँच गई है।

आदिवासियों को गोली से मारा जा सकेगा: विवादित बयान के लिए राहुल गाँधी को लीगल नोटिस

राहुल गाँधी की बेलगाम बयानबाजियों को रोकने के लिए भाजपा के उपाध्यक्ष प्रभात झा ने उन्हें हाल ही में दो लीगल नोटिस भेजे हैं। बीते दिनों राहुल ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को ‘हत्या का आरोपित’ बताया था और अब उन्होंने प्रधानमंत्री पर इल्ज़ाम मढ़ते हुए कहा है कि उन्होंने आदिवासियों के लिए ऐसा कानून बनाया है जिसमें लिखा है कि आदिवासियों को गोली से मारा जा सकेगा।

चुनावी रैलियों में लोगों से ‘चौकीदार चोर है’ जैसे नारे दिलवाने के बाद अब राहुल गाँधी निराधार बातों पर उतर आए हैं। जिसके कारण पार्टी उपाध्यक्ष को कानून की ओर रुख करना पड़ा। मध्य प्रदेश के जबलपुर में रैली के दौरान बोलते हुए राहुल ने हाल ही में अमित शाह को ‘हत्या का आरोपित’ कहा था। जिस पर प्रभात झा ने कहा कि अमित शाह पर इस तरह का इल्जाम सीधे एक राष्ट्रीय पार्टी (BJP) पर निशाना साधना है, जिसके 11 करोड़ सदस्य हैं, जिनमें से एक देश के प्रधानमंत्री भी हैं।

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने राहुल के आरोपों पर निशाना साधते हुए कहा कि देश की अदालत और सीबीआई तो अमित शाह को निर्दोष घोषित कर चुकी है। ऐसे में वो जानना चाहते हैं कि क्या राहुल गाँधी खुद को अदालत समझते हैं। राहुल की टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए प्रभात झा ने उनसे तत्काल माफ़ी माँगने की बात की थी। साथ ही कहा था कि अगर राहुल माफ़ी नहीं माँगते हैं तो वह कोर्ट में मानहानि का मुकदमा लड़ने के लिए तैयार रहें।

अभी इस मामले में राहुल पर सवाल उठ ही रहे थे कि ‘जुमलेबाज’ राहुल गाँधी ने फिर से हवा में तीर चला दिया। सोशल मीडिया पर उनकी एक वीडियो शेयर की जा रही है। इसमें राहुल गाँधी प्रधानमंत्री पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने आदिवासियों के लिए एक नया कानून बनाया है, जिसमें लिखा है कि आदिवासियों को गोली से मारा जा सकेगा। इस वीडियो में राहुल दावा कर रहे हैं कि कानून में लिखा है, “आदिवासियों पर आक्रमण होगा।”

अब ऐसे में प्रभात झा ने राहुल गाँधी को एक बार फिर लीगल नोटिस भेजा है और साथ ही स्पष्ट किया है कि ऐसा कोई कानून पास नहीं हुआ है। उन्होंने राहुल के इस बयान को आदिवासियों को बरगलाने की एक कोशिश करार दिया है। और कहा कि अगर ऐसा कानून पास हुआ तो फिर राहुल गाँधी या उनके 44 सांसद उस समय कहाँ थे, जब इसे पास किया जा रहा था।

जैसे-जैसे चुनाव नतीजों के दिन नज़दीक आ रहे हैं कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की ऐसी बचकानी हरकतें दिन पर दिन और भी खुलकर सामने आने लगी हैं। उनके भाषणों को देखकर लग रहा है जैसे मतदान के आखिरी दिन तक वह लोगों को बरगलाने का काम करेंगे, क्या पता किधर से वोट मिल जाए। लेकिन बता दें कि उनके इन तमाम झूठ को सोशल मीडिया यूजर्स अच्छे से जान और समझ रहे हैं। चुनाव जीतने के लिए राहुल द्वारा अपनाए गए इन हथकंडो को यूजर्स ट्विटर पर खुद उजागर कर रहे हैं। लोगो की मानें तो राहुल गाँधी समय-समय पर मोदी से नफरत न करने की सिर्फ़ बातें करते आए हैं, असल में उनके चेहरे पर मोदी के लिए गुस्सा और नफरत साफ़ दिखाई देती है। कुछ लोग तो समाज में अराजकता फैलाने को और लोगों को भड़काने को ही उनका उद्देश्य बता रहे हैं।